Saturday, June 27th, 2026

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आदि कैलास-ओम पर्वत यात्रा ने बनाया नया रिकॉर्ड, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

Daily Archives: 27/06/2026

आदि कैलास-ओम पर्वत यात्रा ने बनाया नया रिकॉर्ड, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आ रही है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या ने इस बार नया रिकॉर्ड कायम किया है। यात्रा के इतिहास में पहली बार दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों का आंकड़ा 50 हजार पार कर चुका है। मौसम और रास्तों का साथ मिला तो इस साल यह संख्या एक लाख के करीब पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।

 आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, यात्रा शुरू होने के महज 56 दिनों के भीतर अब तक कुल 50,521 श्रद्धालु आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन कर चुके हैं। अगर बीते साल (2025) की बात करें, तो पूरे यात्रा सीजन में केवल 36,600 लोग ही यहां पहुंचे थे। इस बार श्रद्धालुओं के भारी उत्साह का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यात्रा शुरू होने के महज 39वें दिन ही पिछले साल का पूरा रिकॉर्ड ध्वस्त हो चुका था।

 इस साल यात्रा के निर्बाध चलने के पीछे सबसे बड़ी वजह अनुकूल मौसम और साफ रास्ते रहे हैं। अमूमन जून के तीसरे हफ्ते से प्री-मानसून की बारिश के कारण रास्ते बंद होने लगते थे, लेकिन इस बार सीमांत इलाकों में बारिश का औसत सामान्य रहा है। पूरी यात्रा के दौरान सिर्फ एक बार मलघाट के पास पहाड़ी से पत्थर गिरने के कारण कुछ घंटों के लिए आवाजाही रुकी थी, जिसे छोड़कर यात्रा लगातार सुचारू रूप से चल रही है।

इस बंपर सफलता के बीच अब जिला प्रशासन आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों में भी पूरी तरह जुट गया है। मानसरोवर यात्रा का पहला दल 6 जून को पिथौरागढ़ पहुंचने वाला है। चूंकि आदि कैलाश और कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग ‘गुंजी’ तक एक समान ही है, इसलिए दोनों यात्राएं साथ चलने से उच्च हिमालयी व्यास घाटी में इस बार जबरदस्त चहल-पहल और रौनक देखने को मिलेगी।


चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राएं सदियों से रही हैं आस्था, समरसता और सहअस्तित्व का प्रतीक

आइए, हम सब मिलकर देवभूमि के इस देवतत्व, सद्भाव, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें

हेमकुंट साहिब के प्रथम ग्रंथी रहे थे चमोली के भ्यूंडार गांव निवासी नंदा सिंह

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक आत्मा यहां की समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक सहअस्तित्व में बसती है। चारधाम और हेमकुंट साहिब की यात्राएं इस विरासत का सबसे जीवंत और प्रेरणादायक उदाहरण हैं। सदियों से ये यात्राएं न केवल समानांतर रूप से संचालित होती रही हैं, बल्कि इन्होंने विभिन्न आस्थाओं को जोड़ते हुए भाईचारे, सहयोग और मानवीय मूल्यों को भी मजबूत किया है।

ऐसे समय में जब कुछ क्षणिक घटनाओं को आधार बनाकर सामाजिक और डिजिटल मंचों पर विभाजनकारी माहौल बनाने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं, उत्तराखंड की इस गौरवशाली परंपरा को याद करना और उसकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी बन जाती है। राजनीतिक लाभ या तात्कालिक उत्तेजना के लिए यदि इस सद्भाव को ठेस पहुंचती है, तो इसका असर केवल सामाजिक ताने-बाने पर ही नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी पड़ सकता है।

चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राएं हमेशा से एक-दूसरे की पूरक रही हैं। इन दोनों यात्राओं का प्रमुख प्रवेश द्वार ऋषिकेश है। केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंट साहिब जाने वाले श्रद्धालु यात्रा के बड़े हिस्से में एक ही मार्ग और एक जैसी सुविधाओं का उपयोग करते हैं। यात्रा मार्ग पर स्थानीय समुदाय, गुरुद्वारे, मंदिर समितियां, स्वयंसेवी संस्थाएं और आम लोग मिलकर सेवा, सहयोग और अतिथि सत्कार की परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं। यही उत्तराखंड की वह सांस्कृतिक चेतना है, जिसमें विविध आस्थाओं का सम्मान और परस्पर सौहार्द सर्वोपरि माना गया है।

नंदा सिंह की विरासत: समरसता का जीवंत प्रतीक
इतिहास भी इस साझा विरासत की पुष्टि करता है। चमोली जिले के भ्यूंडार गांव निवासी स्वर्गीय नंदा सिंह हेमकुंट साहिब गुरुद्वारे के प्रथम ग्रंथी रहे और लगभग ढाई दशक तक इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे। उनका जीवन इस बात का सशक्त प्रमाण है कि उत्तराखंड की संस्कृति ने कभी भी आस्था के आधार पर भेदभाव नहीं किया, बल्कि सदैव समावेश और सहयोग को अपनाया है।

चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की भी मजबूत आधारशिला हैं। परिवहन, होटल व्यवसाय, होम-स्टे, घोड़ा-खच्चर संचालन, स्थानीय व्यापार और हजारों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन यात्राओं से जुड़ी हुई है। इसलिए इन यात्राओं से जुड़े सौहार्दपूर्ण वातावरण को बनाए रखना केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया देते समय संयम, विवेक और उत्तराखंड की मूल सांस्कृतिक भावना को सर्वोपरि रखें। प्रश्न यह नहीं है कि किसी घटना पर आक्रोश व्यक्त किया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम क्षणिक आवेश को बढ़ावा देंगे या फिर अपनी सदियों पुरानी समरसता, शांति और सहअस्तित्व की परंपरा को और मजबूत करेंगे।

देवभूमि की पहचान उसकी आस्था जितनी ही उसकी सहिष्णुता और भाईचारे से भी है। यह साझा आध्यात्मिक विरासत केवल हमारी धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी भी है। आइए, हम सब मिलकर इस देवतत्व, इस सद्भाव और इस सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें।


उत्तराखंड में मानसून की दस्तक का इंतजार, फिलहाल तपिश और उमस ने बढ़ाई मुश्किलें

देहरादून: उत्तराखंड में इस साल मानसून की रफ्तार थोड़ी धीमी नजर आ रही है, जिसके चलते इसके करीब एक सप्ताह की देरी से पहुंचने की उम्मीद है। मानसून के इंतजार के बीच राज्य के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में भीषण गर्मी और उमस ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। शुक्रवार को पूरे प्रदेश के तापमान में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे लोग उमस से बेहाल रहे।

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी देहरादून का अधिकतम तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक होकर 36.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। वहीं, न्यूनतम तापमान में भी सामान्य से 2 डिग्री का इजाफा देखा गया, जो 25.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ। मैदानी इलाकों में तापमान बढ़ने के साथ-साथ चल रही गर्म हवाओं (लू) ने भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

मौसम विज्ञान केंद्र के पूर्वानुमान के मुताबिक, अगले तीन से चार दिनों के भीतर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मानसून दस्तक दे सकता है। मानसून के विधिवत पहुंचने से पहले पहाड़ी इलाकों में हल्की बारिश होने की संभावना है, जिससे वहां के लोगों को गर्मी से थोड़ी राहत मिलेगी। हालांकि, मैदानी क्षेत्रों में अभी कुछ दिन और तीखी गर्मी झेलनी पड़ सकती है।

मौसम विभाग ने 27 जून के लिए अलर्ट जारी करते हुए बताया कि पर्वतीय जिलों के कुछ हिस्सों में बिजली चमकने और गर्जन के साथ 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं, जिसके लिए ‘यलो अलर्ट’ जारी किया गया है।


पेट में 15 किलो की गाँठ लेकर पहुंची महिला, सफल कैंसर सर्जरी से मिली नई जिंदगी

देहरादून: श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल के कैंसर सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने एक 51 वर्षीय महिला के पेट से 15 किलो का विशाल ओवेरियन (अंडाशय) ट्यूमर सफलतापूर्वक निकालकर उसे नई जिंदगी दी है।

महिला पिछले कई महीनों से पेट के लगातार बढ़ने, भारीपन और असहजता की समस्या से परेशान थीं। जांच में सामने आया कि उनके पेट में करीब 15 किलो का बड़ा ट्यूमर मौजूद है। विशेषज्ञों की टीम ने चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन करते हुए ट्यूमर को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाल दिया। सर्जरी के बाद मरीज की हालत बेहतर बताई जा रही है और वह तेजी से स्वस्थ हो रही हैं।

कैंसर सर्जरी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज गर्ग ने बताया कि इतने बड़े ट्यूमर की सर्जरी काफी जटिल होती है, लेकिन टीम की सावधानी और विशेषज्ञता से ऑपरेशन सफल रहा।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज भी कई मरीज बीमारी को शुरुआती दौर में नजरअंदाज कर देते हैं और जब समस्या गंभीर हो जाती है, तब अस्पताल पहुंचते हैं। जागरूकता और समय पर जांच से ऐसी गंभीर स्थितियों से बचा जा सकता है।

डॉक्टरों ने महिलाओं से अपील की है कि यदि पेट लगातार बढ़ रहा हो, पेट फूलना, दर्द, जल्दी पेट भर जाना या बार-बार पेशाब आने जैसी समस्या हो तो इसे सामान्य न समझें। समय पर जांच और उपचार से गंभीर बीमारियों का बेहतर इलाज संभव है।


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