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पेट दर्द और सूजन को न करें नजरअंदाज, उभार दिखे तो हो जाएं सतर्क, हो सकता है हर्निया

Category Archives: जीवन शैली

पेट दर्द और सूजन को न करें नजरअंदाज, उभार दिखे तो हो जाएं सतर्क, हो सकता है हर्निया

पेट में दर्द या भारीपन को अक्सर लोग गैस, कब्ज या अपच से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार यह सामान्य परेशानी हो सकती है, लेकिन अगर पेट या जांघ के ऊपरी हिस्से यानी ग्रोइन में दर्द के साथ कोई उभार या गांठ नजर आने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह हर्निया का संकेत हो सकता है।

हर्निया ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर के अंदर मौजूद कोई अंग या ऊतक पेट की कमजोर मांसपेशियों की दीवार से बाहर की ओर निकलने लगता है। शुरुआत में इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर रूप ले सकता है। खासतौर पर जब आंत का कोई हिस्सा हर्निया में फंस जाए और उसकी रक्त आपूर्ति प्रभावित होने लगे।

क्या होता है हर्निया?

हर्निया तब विकसित होता है जब पेट की मांसपेशियों या ऊतकों की दीवार कमजोर हो जाती है और अंदर का कोई हिस्सा उस कमजोर जगह से बाहर की तरफ उभरने लगता है। पेट या ग्रोइन में दिखाई देने वाला उभार इसका सबसे आम संकेत माना जाता है।

कुछ लोगों में यह समस्या जन्म से मौजूद कमजोरी के कारण हो सकती है, जबकि कई मामलों में उम्र बढ़ने, मांसपेशियों के कमजोर होने या पेट के अंदर लगातार बढ़ते दबाव के कारण हर्निया विकसित हो सकता है।

किन कारणों से बढ़ सकता है खतरा?

हर्निया के पीछे कई कारण हो सकते हैं। लंबे समय तक कब्ज रहने और शौच के दौरान बार-बार जोर लगाने से पेट के अंदर दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह लगातार खांसी, अधिक वजन, भारी सामान उठाना और ऐसी गतिविधियां जिनमें पेट की मांसपेशियों पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जोखिम बढ़ा सकती हैं।

कुछ लोगों में पेट की दीवार कमजोर होने की समस्या जन्मजात भी होती है। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ शरीर के ऊतकों में आने वाली कमजोरी भी एक कारण हो सकती है।

इन संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

हर पेट दर्द हर्निया नहीं होता, लेकिन कुछ खास लक्षण इसकी ओर इशारा कर सकते हैं। जैसे—

पेट या ग्रोइन में गांठ या उभार दिखाई देना
खांसने या छींकने पर उभार का ज्यादा स्पष्ट होना
वजन उठाने या जोर लगाने पर दर्द बढ़ना
लंबे समय तक खड़े रहने पर भारीपन या असहजता महसूस होना
लेटने पर उभार या दर्द में राहत मिलना
ग्रोइन के आसपास जलन, खिंचाव या दबाव महसूस होना

अगर इस तरह के लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।

अचानक तेज दर्द हो तो तुरंत लें मेडिकल मदद

हर्निया की सबसे गंभीर स्थिति तब हो सकती है, जब उसमें आंत का हिस्सा फंस जाए। अगर उभार अचानक बड़ा या बेहद दर्दनाक हो जाए, तेज पेट दर्द होने लगे, पेट फूलने के साथ मतली या उल्टी हो या बुखार आ जाए, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में आंत तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है।

बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

हर्निया के जोखिम को कम करने के लिए शरीर का स्वस्थ वजन बनाए रखना, कब्ज से बचना और भोजन में पर्याप्त फाइबर शामिल करना मददगार हो सकता है। लगातार खांसी जैसी समस्या होने पर उसका इलाज कराना भी जरूरी है। भारी वजन उठाते समय सही तकनीक का इस्तेमाल करना भी महत्वपूर्ण है।

ध्यान रखें कि पेट में होने वाले हर दर्द को हर्निया नहीं कहा जा सकता। सही कारण जानने के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारी और विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लगातार बने रहने वाले लक्षण में चिकित्सकीय परामर्श लें।

(साभार)


जल एवं मच्छर जनित रोगों का खतरा बढ़ा, स्वास्थ्य विभाग ने जारी की एडवाइजरी

बासी व खुले खाद्य पदार्थों से बचें, पानी उबालकर पीएं

घरों के आसपास पानी जमा न होने दें

देहरादून। बरसात में जल जनित एवं मच्छर जनित संक्रामक रोगों की आशंका बढ़ जाती है। डायरिया, पेचिश, टायफायड, हैजा, पीलिया एवं हेपेटाइटिस जैसे जल जनित रोगों के साथ ही डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे मच्छर जनित रोगों के मामले भी बढ़ने की संभावना रहती है। इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) के माध्यम से प्राप्त साप्ताहिक रिपोर्टों के दृष्टिगत स्वास्थ्य विभाग ने आमजन से विशेष सतर्कता बरतने तथा रोगों की रोकथाम के लिए आवश्यक सावधानियां अपनाने की अपील की है।

स्वास्थ्य विभाग ने जनसामान्य से बासी भोजन का सेवन न करने तथा बाजार में खुले में बिक रहे खाद्य पदार्थों एवं अधपके भोजन से बचने की अपील की है। तरबूज, खरबूज, गन्ने का रस आदि का सेवन केवल स्वच्छ एवं सुरक्षित होने पर ही करें। ठंडी वस्तुओं में प्रयुक्त होने वाली बर्फ के सेवन से भी बचें, क्योंकि इसमें दूषित पानी का प्रयोग होने की संभावना रहती है।

विभाग ने सलाह दी है कि घर में पानी को अच्छी तरह उबालकर रखें और पीने तथा खाना बनाने में इसी का प्रयोग करें। पानी को क्लोरीनयुक्त करने के लिए क्लोरीन की गोलियों का प्रयोग स्वास्थ्य कर्मियों के निर्देशानुसार ही किया जाए। शौचालय के उपयोग के बाद तथा भोजन करने से पहले साबुन से हाथ धोने की आदत अपनाएं। फलों एवं सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही सेवन करें।

मच्छर जनित रोगों की रोकथाम के लिए विशेष सतर्कता जरूरी
स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू, मलेरिया एवं चिकनगुनिया से बचाव के लिए लोगों से अपने घरों एवं आसपास पानी एकत्रित न होने देने की अपील की है। सभी पानी की टंकियों एवं जल भंडारण के बर्तनों को ढककर रखें। घरों में लगे गमलों के नीचे पानी एकत्रित करने वाली ट्रे न लगाएं और गमलों में पानी जमा न होने दें।

फ्रिज के पीछे, कूलर, गुलदस्तों, मनी प्लांट, पानी के बर्तनों सहित ऐसे सभी स्थानों की नियमित रूप से सफाई करें, जहां पानी जमा हो सकता है। इन वस्तुओं का पानी सप्ताह में कम से कम एक बार पूरी तरह खाली कर उन्हें सुखाकर ही दोबारा उपयोग करें।

स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से पुराने टूटे बर्तन, बोतल, डिब्बे, बेकार टायर आदि खुले में न फेंकने की अपील की है। इनमें जमा होने वाला पानी डेंगू फैलाने वाले एडीज मच्छर के प्रजनन का कारण बन सकता है।

मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करने, आवश्यकता के अनुसार मच्छररोधी साधनों का उपयोग करने तथा ऐसे कपड़े पहनने की सलाह दी गई है, जिससे शरीर का अधिक से अधिक हिस्सा ढका रहे। बच्चों एवं आमजन को मच्छर जनित रोगों से बचाव के संबंध में जागरूक करना भी आवश्यक है।

लक्षण दिखें तो तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें
स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि तेज बुखार, सिरदर्द, बदन एवं मांसपेशियों में दर्द, जोड़ों में दर्द, आंखों के पिछले हिस्से में दर्द तथा शरीर पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देने पर इसे नजरअंदाज न करें और तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें। ये लक्षण डेंगू सहित अन्य संक्रामक रोगों के संकेत हो सकते हैं।

विभाग ने आमजन से बिना चिकित्सकीय परामर्श के कोई दवा न लेने की अपील की है। डेंगू की जांच सभी सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है। ऐसे लक्षण होने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या सरकारी अस्पताल से संपर्क कर चिकित्सकीय सलाह एवं जांच अवश्य कराएं।

स्वास्थ्य विभाग ने आमजन से अपील की है कि स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल और मच्छरों की रोकथाम को अपनी दैनिक आदतों का हिस्सा बनाकर ही मानसून के दौरान संक्रामक रोगों से बचाव सुनिश्चित किया जा सकता है।


बार-बार थकना और ज्यादा प्यास लगना! बच्चों में दिखें ये बदलाव तो हो जाएं सावधान

बच्चों की सेहत को लेकर छोटी-सी लापरवाही भी कई बार बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है। खास बात यह है कि कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के शुरुआती संकेत बेहद सामान्य नजर आते हैं। बच्चा बार-बार थक रहा हो, खेलते समय जल्दी हांफने लगे, लगातार पानी मांगता हो या उसकी नींद और व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो माता-पिता को इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।

बच्चे अपनी परेशानी को हमेशा सही तरीके से बता नहीं पाते। ऐसे में उनके रोजमर्रा के व्यवहार और शारीरिक बदलावों पर नजर रखना जरूरी हो जाता है। हर बार इन लक्षणों का मतलब किसी गंभीर बीमारी से नहीं होता, लेकिन अगर ये समस्याएं लगातार बनी रहें या पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ जाएं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है।

लगातार थकान को सिर्फ आलस न समझें

अगर बच्चा पहले की तरह खेल-कूद नहीं कर पा रहा है, थोड़ी गतिविधि के बाद ही थक जाता है या पढ़ाई के दौरान उसका ध्यान बार-बार भटकता है, तो इसकी वजह सिर्फ आलस नहीं हो सकती। आयरन की कमी और एनीमिया में बच्चों को कमजोरी, थकान, चक्कर या सांस फूलने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

बच्चों के तेजी से बढ़ने के दौर में शरीर को आयरन की जरूरत भी बढ़ जाती है। लंबे समय तक इसकी कमी रहने पर बच्चे के शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।

बहुत ज्यादा प्यास और बार-बार पेशाब आए तो दें ध्यान

बच्चे का गर्मी या ज्यादा खेल-कूद के कारण पानी अधिक पीना सामान्य हो सकता है। लेकिन अगर बिना किसी स्पष्ट वजह के उसे लगातार बहुत ज्यादा प्यास लग रही है और पेशाब भी सामान्य से अधिक आ रहा है, तो इस संकेत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसे लक्षण डायबिटीज में भी दिखाई दे सकते हैं। बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के साथ टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी हो सकता है। अधिक वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी और परिवार में डायबिटीज का इतिहास कुछ बच्चों में जोखिम बढ़ा सकता है।

नींद और व्यवहार में बदलाव भी हो सकता है संकेत

अगर बच्चा अचानक ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा है, दिनभर सुस्ती महसूस करता है, ठीक से सो नहीं रहा या पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में उसकी रुचि कम हो गई है, तो माता-पिता को इस बदलाव पर ध्यान देना चाहिए।

नींद बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लगातार कम नींद लेने से वजन बढ़ने समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा बच्चे का खान-पान, रोजाना की शारीरिक गतिविधि और स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय भी उसकी सेहत को प्रभावित करता है।

बढ़ता वजन भी हो सकता है चिंता का विषय

बच्चे का वजन बढ़ना केवल उसकी शारीरिक बनावट से जुड़ा मामला नहीं है। बचपन में मोटापे की समस्या आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, टाइप-2 डायबिटीज, फैटी लिवर और स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती है।

इसलिए बच्चों के वजन, खान-पान और रोजाना की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि बच्चों के स्वस्थ विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर बच्चे में थकान, कमजोरी, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, सांस फूलना, नींद में बदलाव या व्यवहार में असामान्य परिवर्तन जैसे लक्षण लगातार बने रहते हैं, तो खुद से किसी बीमारी का अनुमान लगाने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।

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देश में बढ़ रहा स्वाइन फ्लू का खतरा, बुखार नहीं तो भी इन संकेतों पर रहें अलर्ट

देश के कई हिस्सों में इन दिनों इन्फ्लुएंजा-ए के H1N1 वायरस को लेकर चिंता बढ़ी हुई है। दिल्ली-एनसीआर के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ रहे हैं। अगस्त के अंत तक दिल्ली में संक्रमितों का आंकड़ा 3200 के पार पहुंच गया था, जबकि उत्तर प्रदेश में 2 सितंबर तक H1N1 के 685 मामलों की प्रयोगशाला जांच में पुष्टि हो चुकी थी। कुछ राज्यों में संक्रमण से मौत के मामले भी सामने आए हैं।

हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर मरीजों में संक्रमण के लक्षण हल्के होते हैं और घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, डायबिटीज के मरीजों और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों में फ्लू ज्यादा परेशानी पैदा कर सकता है।

सिर्फ तेज बुखार को न मानें फ्लू का संकेत

स्वाइन फ्लू का नाम आते ही आमतौर पर तेज बुखार, खांसी और बदन दर्द जैसे लक्षण ध्यान में आते हैं। लेकिन H1N1 संक्रमण की पहचान केवल बुखार के आधार पर नहीं की जा सकती। कई मामलों में व्यक्ति को बुखार नहीं होता, फिर भी वह इन्फ्लुएंजा से संक्रमित हो सकता है।

अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार कुछ लोगों में फ्लू से जुड़े सांस संबंधी लक्षण बुखार के बिना भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में लगातार खांसी, गले में खराश, नाक बहना या बंद होना, सिरदर्द और असामान्य थकान जैसे संकेतों को सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर टालना ठीक नहीं है।

हर मरीज में एक जैसे लक्षण नहीं होते

H1N1 संक्रमण के लक्षण व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं। बुजुर्गों में फ्लू होने के बावजूद बुखार न आना संभव है। ऐसे मरीजों में भूख कम लगना, कमजोरी या अन्य सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

वहीं बच्चों में सांस से जुड़े लक्षणों के साथ उल्टी और दस्त जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। इसलिए केवल किसी एक लक्षण की मौजूदगी या अनुपस्थिति से H1N1 संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती।

लक्षण दिखने पर खुद से न करें बीमारी का अनुमान

फैमिली फिजिशियन डॉ. अरविंद डबास के मुताबिक खांसी, गले में खराश, नाक बंद होना और थकान जैसे लक्षण केवल फ्लू में ही नहीं, बल्कि कई दूसरे सांस संबंधी संक्रमणों में भी हो सकते हैं। ऐसे में सिर्फ लक्षणों के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि मरीज H1N1 से संक्रमित है या नहीं।

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर फ्लू की पुष्टि के लिए जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इसके लिए रैपिड फ्लू टेस्ट के अलावा मॉलिक्यूलर टेस्ट भी उपलब्ध हैं। मॉलिक्यूलर टेस्ट वायरस के आनुवंशिक पदार्थ यानी वायरल RNA की पहचान करता है और आमतौर पर रैपिड एंटीजन टेस्ट की तुलना में ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।

हालांकि प्रत्येक मरीज के लिए जांच जरूरी नहीं होती। डॉक्टर मरीज के लक्षण, संक्रमण के संपर्क में आने की संभावना और उसकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए जांच की जरूरत तय करते हैं।

सांस लेने में दिक्कत हो तो तुरंत लें डॉक्टर की सलाह

विशेषज्ञों के मुताबिक बुखार न होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को फ्लू नहीं हो सकता। खासतौर पर बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में बिना बुखार के भी इन्फ्लुएंजा संक्रमण हो सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण गंभीर रूप भी ले सकता है।

यदि फ्लू जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हों, सांस लेने में परेशानी हो, अत्यधिक कमजोरी महसूस हो या हालत बिगड़ती नजर आए तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कुछ मरीजों में डॉक्टर की सलाह पर एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

संक्रमण फैलने के खतरे को भी समझें

H1N1 को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संक्रमित व्यक्ति को बीमारी का स्पष्ट पता चलने से पहले भी वायरस दूसरों तक पहुंच सकता है। संक्रमण के शुरुआती दिनों में इसके फैलने की संभावना अधिक रहती है।

इसलिए फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर केवल बुखार का इंतजार करना सही रणनीति नहीं है। खांसी, गले में खराश, नाक संबंधी परेशानी और असामान्य थकान जैसे संकेतों पर भी ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न माना जाए।

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बच्चे की हाइट नहीं बढ़ रही? सिर्फ खान-पान को न मानें वजह, इन संकेतों पर दें खास ध्यान

बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ उसकी लंबाई में भी बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन अगर उम्र के हिसाब से बच्चे की हाइट में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है, तो माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है। कई बार कम लंबाई का कारण आनुवंशिक होता है और बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहता है। वहीं, कुछ मामलों में धीमी ग्रोथ शरीर में पोषण की कमी, हार्मोनल समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य परेशानी का संकेत भी हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे की हाइट का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने दोस्तों या हमउम्र बच्चों से कितना छोटा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखना है कि बच्चे की ग्रोथ समय के साथ किस गति से हो रही है। यदि बच्चा लगातार अपनी सामान्य ग्रोथ रफ्तार से बढ़ रहा है, तो कम कद कई बार सामान्य शारीरिक विशेषता हो सकता है।

माता-पिता की हाइट का भी पड़ता है असर

बच्चे की लंबाई निर्धारित करने में आनुवंशिकता की बड़ी भूमिका होती है। यदि माता-पिता दोनों की लंबाई अपेक्षाकृत कम है, तो बच्चे की हाइट भी स्वाभाविक रूप से कम रह सकती है। ऐसे मामलों में बच्चा स्वस्थ होने के बावजूद अपने हमउम्र बच्चों की तुलना में छोटा नजर आ सकता है।

कुछ बच्चों में शारीरिक विकास और किशोरावस्था की शुरुआत थोड़ी देर से होती है। ऐसे बच्चों में बाद के वर्षों में ग्रोथ स्पर्ट देखने को मिल सकता है और वे आगे चलकर सामान्य लंबाई हासिल कर सकते हैं।

पोषण की कमी भी हो सकती है वजह

बच्चे के शारीरिक विकास के लिए पर्याप्त कैलोरी, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल जरूरी होते हैं। लंबे समय तक संतुलित आहार न मिलने की स्थिति में ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। आयरन, आयोडीन और विटामिन ए जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी सामान्य वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, बच्चे की हाइट कम देखकर अपने स्तर पर विटामिन या अन्य सप्लीमेंट शुरू करना उचित नहीं है। डॉक्टर बच्चे के खान-पान, विकास की रफ्तार और अन्य लक्षणों का आकलन करने के बाद ही किसी पोषक तत्व की कमी की जांच या सप्लीमेंट की सलाह देते हैं।

कुछ बीमारियों का संकेत भी हो सकती है धीमी ग्रोथ

अगर बच्चे की लंबाई बढ़ने की रफ्तार लगातार कम हो रही है, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य समस्या भी हो सकती है। सीलिएक डिजीज, लंबे समय तक रहने वाली आंतों या किडनी की बीमारी, एनीमिया और हड्डियों से जुड़ी कुछ समस्याएं बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा हाइपोथायरॉइडिज्म और ग्रोथ हार्मोन की कमी जैसी हार्मोन संबंधी परेशानियां भी धीमी ग्रोथ का कारण बन सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक स्थितियां भी बच्चे की लंबाई को प्रभावित करती हैं।

किन संकेतों को नजरअंदाज न करें?

यदि बच्चा लगातार अपनी उम्र के मुकाबले बहुत छोटा है या पहले की तुलना में उसकी ग्रोथ की रफ्तार कम हो गई है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। खासतौर पर हाइट कम होने के साथ वजन भी कम हो रहा हो या बच्चे को लंबे समय से पेट दर्द, दस्त, कमजोरी अथवा अत्यधिक थकान जैसी समस्याएं रहती हों, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।

डॉक्टर आमतौर पर बच्चे की ग्रोथ हिस्ट्री, माता-पिता की लंबाई, जन्म से जुड़ी जानकारी, खान-पान और अन्य लक्षणों का मूल्यांकन करते हैं। जरूरत पड़ने पर कुछ जांचों के जरिए धीमी ग्रोथ के वास्तविक कारण का पता लगाया जाता है।

हर छोटा कद बीमारी नहीं

सबसे जरूरी बात यह है कि कम हाइट को तुरंत किसी बीमारी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। कई स्वस्थ बच्चों की लंबाई आनुवंशिक कारणों से कम होती है। चिंता का मुख्य कारण तब होता है, जब बच्चे की ग्रोथ की रफ्तार लगातार धीमी हो रही हो या उसके साथ अन्य स्वास्थ्य संबंधी लक्षण भी दिखाई दे रहे हों।

इसलिए बच्चे की लंबाई को लेकर चिंता होने पर खुद से दवा या सप्लीमेंट देने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित और सही तरीका है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या बच्चे की ग्रोथ को लेकर चिंता होने पर योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

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डायबिटीज में सिर्फ दवा नहीं, डाइट भी जरूरी, इन चीजों का रखें खास ध्यान

डायबिटीज को नियंत्रित रखना सिर्फ दवाइयां लेने तक सीमित नहीं है। रोजाना की डाइट, खाने की मात्रा और भोजन का समय भी ब्लड शुगर मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभा सकते हैं। गलत खान-पान से ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ सकता है, जबकि संतुलित और पौष्टिक भोजन शरीर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की डाइट एक जैसी नहीं हो सकती। उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधि, दवाइयों और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर खान-पान की जरूरत बदल सकती है। इसलिए डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह लेना जरूरी है।

ब्लड शुगर कंट्रोल में डाइट क्यों है जरूरी?

डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। ऐसे में भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट का ब्लड ग्लूकोज पर सीधा असर पड़ सकता है। संतुलित डाइट न केवल ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद कर सकती है, बल्कि वजन, ब्लड प्रेशर और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी उपयोगी हो सकती है।

1. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और गुणवत्ता पर दें ध्यान

कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ सकता है। इसलिए डायबिटीज में केवल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसके स्रोत पर भी ध्यान देना चाहिए। साबुत अनाज, दालें, सब्जियां और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

2. मीठे और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड से दूरी

मिठाइयां, शुगर वाले पेय, मीठी ड्रिंक्स और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर मैनेज करना मुश्किल बना सकते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना और अतिरिक्त चीनी की मात्रा पर नजर रखना फायदेमंद हो सकता है।

3. खाने में फाइबर को बनाएं हिस्सा

फाइबर युक्त भोजन लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास दे सकता है। सब्जियां, दालें, फल और साबुत अनाज इसके अच्छे स्रोत हैं। डाइट में पर्याप्त फाइबर शामिल करने से अनावश्यक स्नैकिंग और ज्यादा खाने से बचने में भी मदद मिल सकती है।

4. प्रोटीन और हेल्दी फैट को न करें नजरअंदाज

डायबिटीज की डाइट का मतलब केवल चावल, रोटी या अन्य कार्बोहाइड्रेट कम करना नहीं है। दाल, बीन्स, अंडे, मछली, कम वसा वाले डेयरी उत्पाद, नट्स और बीज जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि, इनकी सही मात्रा व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।

5. भोजन का समय और मात्रा भी मायने रखती है

ब्लड शुगर मैनेजमेंट में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या खाया जा रहा है, बल्कि कितनी मात्रा में और किस समय खाया जा रहा है, यह भी मायने रख सकता है। खासतौर पर इंसुलिन या कुछ विशेष डायबिटीज दवाएं लेने वाले लोगों को बिना सलाह के भोजन छोड़ने या डाइट में अचानक बदलाव करने से बचना चाहिए।

डायबिटीज में इन बातों का रखें ध्यान
खाने की प्लेट में सब्जियों और फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को पर्याप्त जगह दें।
साबुत अनाज और दालों जैसे पौष्टिक विकल्पों को प्राथमिकता दें।
मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें।
भोजन की मात्रा पर नजर रखें और जरूरत से ज्यादा खाने से बचें।
शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त पानी पिएं।
नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
ब्लड शुगर की रीडिंग के आधार पर डाइट में बदलाव डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से ही करें।
जरूरी बात

डायबिटीज का प्रबंधन हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की डाइट को देखकर उसे अपनी दिनचर्या में लागू करना सही नहीं है। दवा, इंसुलिन या खान-पान में बदलाव विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। यह किसी चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है।

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सिगरेट का धुआं सिर्फ फेफड़ों नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकता है नुकसान, बढ़ सकता है गंभीर बीमारी का खतरा

धूम्रपान को अक्सर फेफड़ों की बीमारी और कैंसर से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका असर शरीर के कई दूसरे महत्वपूर्ण अंगों पर भी पड़ सकता है। सिगरेट के धुएं के साथ शरीर में पहुंचने वाले हानिकारक रसायन रक्त प्रवाह के जरिए अलग-अलग अंगों तक पहुंचते हैं। इनमें किडनी भी शामिल है, जो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक तंबाकू का सेवन शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों में किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।

किडनी तक कैसे पहुंचता है सिगरेट का नुकसान?

किडनी लगातार रक्त को फिल्टर करने का काम करती है। इसके साथ ही यह शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखने तथा ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है। ऐसे में रक्त प्रवाह से जुड़ी किसी भी समस्या का असर किडनी के कामकाज पर पड़ सकता है।

सिगरेट में मौजूद निकोटीन रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर सकता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने और किडनी तक रक्त पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहती है। धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा दे सकता है, जो लंबे समय में किडनी के ऊतकों और उनकी कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

कुछ अध्ययनों में धूम्रपान और क्रॉनिक किडनी डिजीज के बीच संबंध पाया गया है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है, उनमें धूम्रपान किडनी से जुड़े जोखिम को और बढ़ा सकता है।

रक्त वाहिकाओं पर भी पड़ता है असर

धूम्रपान का प्रभाव केवल किडनी के फिल्टरिंग सिस्टम तक सीमित नहीं रहता। सिगरेट का धुआं रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकता है। इसके अलावा रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ने और रक्त संचार प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

किडनी को अपना काम ठीक से करने के लिए पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन की जरूरत होती है। लंबे समय तक रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव किडनी की सामान्य कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।

दिल और दिमाग पर भी बढ़ता है खतरा

धूम्रपान का असर शरीर के पूरे कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पर पड़ सकता है। रक्त वाहिकाओं के प्रभावित होने से हृदय और मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाने वाली नसों पर भी असर पड़ सकता है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

इसके अलावा धूम्रपान शरीर में ट्राइग्लिसराइड और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित कर सकता है, जिससे हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है।

सिर्फ लंग कैंसर तक सीमित नहीं है खतरा

सिगरेट को फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, लेकिन तंबाकू का नुकसान केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। तंबाकू के धुएं में हजारों रसायन मौजूद होते हैं, जिनमें कई स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक माने जाते हैं। लंबे समय तक तंबाकू के संपर्क में रहने से शरीर के अलग-अलग हिस्सों में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

धूम्रपान का असर इम्यून सिस्टम, मुंह और मसूड़ों की सेहत, प्रजनन क्षमता और हड्डियों सहित शरीर की कई अन्य प्रणालियों पर भी पड़ सकता है।

धूम्रपान छोड़ना क्यों जरूरी?

धूम्रपान से होने वाले नुकसान को देखते हुए इसे छोड़ना स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या पहले से किडनी संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए तंबाकू से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या धूम्रपान छोड़ने के लिए डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

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मामूली सर्दी-जुकाम समझकर न करें नजरअंदाज, ये लक्षण हो सकते हैं साइनस संक्रमण के संकेत

बदलते मौसम में नाक बंद होना, छींक आना और सिरदर्द जैसी परेशानियां आम हैं। अक्सर लोग इन्हें सामान्य सर्दी-जुकाम मानकर घरेलू उपायों से ठीक होने का इंतजार करते हैं। हालांकि, अगर नाक बंद रहने के साथ चेहरे पर दबाव, गाढ़ा बलगम या सिर में लगातार दर्द बना हुआ है और समस्या कई दिनों तक दूर नहीं हो रही, तो मामला साइनस संक्रमण का भी हो सकता है। ऐसे लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना परेशानी को बढ़ा सकता है।

साइनस हमारी खोपड़ी के अंदर आंखों, नाक, माथे और गालों के आसपास मौजूद हवा से भरी छोटी-छोटी गुहाएं होती हैं। इनका संबंध सांस लेने और आवाज की गूंज से भी होता है। सामान्य स्थिति में इनकी अंदरूनी सतह बलगम बनाती है, जो छोटे मार्गों के जरिए नाक तक पहुंचकर बाहर निकल जाता है। लेकिन सूजन आने पर इन रास्तों में रुकावट पैदा हो सकती है और बलगम जमा होने लगता है।

कैसे शुरू होती है साइनस की समस्या?

साइनस संक्रमण की शुरुआत कई बार सामान्य वायरल सर्दी-जुकाम के बाद होती है। संक्रमण या एलर्जी के कारण नाक और साइनस की अंदरूनी परत में सूजन आ जाती है। इससे बलगम बाहर निकलने में परेशानी होती है और साइनस के भीतर दबाव बढ़ने लगता है।

अधिकतर मामलों में संक्रमण वायरस से जुड़ा होता है, जबकि कुछ परिस्थितियों में बैक्टीरिया भी इसकी वजह बन सकते हैं। इसके अलावा नाक की अंदरूनी संरचना में बदलाव, जैसे नाक की हड्डी का टेढ़ापन, भी बार-बार होने वाली साइनस की समस्या में भूमिका निभा सकता है।

किन संकेतों से पहचानें साइनस संक्रमण?

साइनस की परेशानी होने पर नाक और चेहरे के आसपास इसके लक्षण ज्यादा स्पष्ट नजर आ सकते हैं। नाक लंबे समय तक बंद रहना, गाढ़ा या ज्यादा मात्रा में नाक का स्राव, सिर में दर्द और चेहरे पर दबाव महसूस होना इसके प्रमुख संकेत हैं।

कुछ लोगों में गालों, माथे या आंखों के आसपास दर्द या भारीपन महसूस हो सकता है। इसके साथ सूंघने की क्षमता कमजोर पड़ना, गले में बलगम पहुंचना, खांसी और थकान जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। कभी-कभी स्वाद महसूस करने की क्षमता में भी बदलाव आ सकता है।

अगर लक्षण लगातार बने रहें, बार-बार वापस आएं या समय के साथ ज्यादा गंभीर होते जाएं, तो डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लेना बेहतर रहता है।

किन लोगों में ज्यादा हो सकता है खतरा?

जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम, एलर्जी या नाक बंद होने की शिकायत रहती है, उनमें साइनस से जुड़ी समस्या होने की संभावना बढ़ सकती है। नाक के रास्ते में लगातार रुकावट या उसकी संरचना से जुड़ी परेशानी भी जोखिम बढ़ा सकती है।

इसके अलावा धूल, धुआं और वायु प्रदूषण के संपर्क में ज्यादा रहने से नाक की अंदरूनी परत में जलन और सूजन हो सकती है। फफूंद, धूल या अन्य एलर्जेन से संवेदनशील लोगों में भी साइनस की समस्या दोबारा होने की आशंका रहती है।

बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

साइनस की परेशानी से बचने के लिए शरीर को पर्याप्त हाइड्रेटेड रखना, व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना और धूल-धुएं तथा प्रदूषित वातावरण से यथासंभव दूरी बनाना उपयोगी हो सकता है। जिन चीजों से एलर्जी होती है, उनसे बचना भी जरूरी है।

नाक बंद होने पर कुछ लोगों को भाप लेने से थोड़ी देर के लिए राहत महसूस हो सकती है, लेकिन बहुत गर्म भाप लेने से त्वचा या सांस की नली को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए घरेलू उपायों को इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए। यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं या बिगड़ रहे हैं, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे उचित कदम है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।

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सिर्फ माउथ फ्रेशनर नहीं है सौंफ, पाचन से लेकर वजन तक में हो सकती है मददगार

भारतीय खानपान में सौंफ का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। आमतौर पर इसे खाना खाने के बाद माउथ फ्रेशनर के तौर पर खाया जाता है, लेकिन इसकी पहचान केवल स्वाद और खुशबू तक सीमित नहीं है। सौंफ में मौजूद फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई प्राकृतिक पौधीय यौगिक इसे सेहत के लिहाज से भी उपयोगी बनाते हैं।

सौंफ का इस्तेमाल खासतौर पर पाचन से जुड़ी छोटी-मोटी परेशानियों के लिए पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। कई लोग इसे चबाकर खाते हैं तो कुछ लोग सौंफ की चाय या पानी का सेवन करते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सौंफ किसी बीमारी का इलाज नहीं है, बल्कि संतुलित डाइट का एक हिस्सा हो सकती है।

पाचन तंत्र के लिए मददगार हो सकती है सौंफ

खाने के बाद सौंफ खाने की परंपरा के पीछे पाचन से जुड़ी वजह भी मानी जाती है। सौंफ में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिक पाचन तंत्र की मांसपेशियों पर असर डाल सकते हैं, जिससे पेट में होने वाली हल्की ऐंठन और असहजता में राहत मिल सकती है।

गैस, पेट फूलने या भोजन के बाद भारीपन जैसी सामान्य परेशानियों में लोग पारंपरिक रूप से सौंफ का सेवन करते हैं। इसमें मौजूद फाइबर भी सामान्य पाचन प्रक्रिया के लिए उपयोगी होता है।

हालांकि, अगर कब्ज लंबे समय तक बनी रहती है, बार-बार तेज एसिडिटी होती है या पेट में लगातार दर्द रहता है, तो केवल सौंफ पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

क्या वजन घटाने में भी मदद करती है?

वजन कम करने के लिए सौंफ का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय है। सोशल मीडिया और घरेलू नुस्खों में सौंफ के पानी को वजन घटाने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, सौंफ सीधे तौर पर शरीर की चर्बी कम करती है या मेटाबॉलिज्म को तेजी से बढ़ाती है, इसके पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

हां, सौंफ में फाइबर मौजूद होता है और फाइबर युक्त चीजें कुछ समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकती हैं। इससे खाने की कुल मात्रा और कैलोरी सेवन को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।

वास्तविक वजन घटाने के लिए संतुलित भोजन, कैलोरी नियंत्रण, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

ब्लड शुगर को लेकर क्या कहते हैं शोध?

सौंफ में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पौधीय यौगिकों को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन किए गए हैं। कुछ शुरुआती शोधों में ब्लड शुगर और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सौंफ डायबिटीज की दवा का विकल्प है या इसके सेवन से ब्लड शुगर नियंत्रित हो जाएगा। डायबिटीज से पीड़ित लोगों को अपनी दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए और खानपान में किसी भी बड़े बदलाव से पहले विशेषज्ञ की राय लेना बेहतर है।

आंखों की सेहत के लिए भी उपयोगी?

सौंफ में कई एंटीऑक्सीडेंट और पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे कैरोटेनॉयड्स भी शामिल हैं, जो आंखों के स्वास्थ्य से जुड़े माने जाते हैं।

हालांकि, यह दावा करना सही नहीं होगा कि सौंफ खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है या मोतियाबिंद जैसी बीमारी रुक जाती है। आंखों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन और मिनरल से भरपूर संतुलित आहार, नियमित आंखों की जांच और जीवनशैली से जुड़े अन्य उपाय अधिक महत्वपूर्ण हैं।

कैसे करें सौंफ का सेवन?

सौंफ को सीमित मात्रा में भोजन के बाद चबाकर खाया जा सकता है। कुछ लोग इसे पानी में भिगोकर या हल्की हर्बल ड्रिंक के रूप में भी लेते हैं। हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ को जरूरत से ज्यादा मात्रा में लेने से बचना चाहिए।

अगर आप गर्भवती हैं, किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं या सौंफ का नियमित रूप से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहते हैं, तो डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लेना बेहतर रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। सौंफ को किसी बीमारी के इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा के विकल्प के रूप में नहीं लेना चाहिए।

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सिर्फ डाइट और एक्सरसाइज नहीं, मजबूत इम्युनिटी के लिए पूरी नींद भी जरूरी

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ पौष्टिक खाना और नियमित एक्सरसाइज ही काफी नहीं है। पर्याप्त और अच्छी नींद भी मजबूत इम्युनिटी के लिए बेहद अहम मानी जाती है। आज की व्यस्त जीवनशैली में देर रात तक जागना, मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करना और अनियमित समय पर सोना आम हो गया है। इसका असर केवल अगले दिन की थकान और सुस्ती पर नहीं पड़ता, बल्कि लंबे समय में शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

नींद के दौरान शरीर आराम करने के साथ-साथ खुद को रिकवर करने का काम करता है। इस दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी कई प्रक्रियाएं सक्रिय रहती हैं। इसलिए अगर आप बार-बार नींद पूरी नहीं कर रहे हैं, तो इसका असर आपकी सेहत पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

नींद का इम्युनिटी से क्या कनेक्शन है?

जब हम सोते हैं, तब शरीर में कई ऐसी प्रक्रियाएं चलती हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी होती हैं। पर्याप्त नींद शरीर को इन प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद करती है।

एक-दो दिन कम सोने से आमतौर पर बड़ी समस्या नहीं होती, लेकिन अगर नींद की कमी लगातार बनी रहे तो शरीर की सामान्य इम्यून प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि संक्रमण से बचाव के लिए खानपान और एक्सरसाइज के साथ-साथ नींद पर भी ध्यान देना जरूरी है।

कम नींद से बढ़ सकती है संक्रमण की आशंका

शरीर में प्रवेश करने वाले वायरस और अन्य संक्रमणों से मुकाबला करने में इम्युनिटी अहम भूमिका निभाती है। इसके लिए प्रतिरक्षा प्रणाली का सही तरीके से काम करना जरूरी है। कई अध्ययनों में नींद की कमी और संक्रमण के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध देखा गया है।

खासकर लगातार कम या खराब गुणवत्ता वाली नींद लेने पर सर्दी-जुकाम जैसे संक्रमणों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि देर रात तक जागने की आदत का प्रभाव सिर्फ सुबह की थकान या नींद आने तक सीमित नहीं रहता।

रोज कितने घंटे सोना चाहिए?

वयस्कों के लिए आमतौर पर हर रात कम से कम 7 घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है। बच्चों और किशोरों को उम्र के अनुसार इससे ज्यादा नींद की जरूरत हो सकती है।

हालांकि सिर्फ बिस्तर पर बिताया गया समय ही पर्याप्त नहीं है। अगर कोई व्यक्ति 7-8 घंटे सोने के बाद भी लगातार थका हुआ महसूस करता है, रात में बार-बार उसकी नींद खुलती है या लंबे समय से नींद से जुड़ी परेशानी बनी हुई है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

नींद की कमी का सेहत पर व्यापक असर

लगातार कम सोने को केवल इम्युनिटी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नींद की कमी का संबंध कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से भी पाया गया है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने से ब्लड प्रेशर, वजन बढ़ने, हृदय स्वास्थ्य और ब्लड शुगर से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

इसके अलावा नींद पूरी न होने पर ध्यान लगाने, याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में अच्छी नींद को केवल आराम का जरिया मानना सही नहीं होगा। यह शरीर और दिमाग की रोजाना रिकवरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बेहतर नींद के लिए क्या करें?

रोजाना सोने और जागने का समय लगभग एक जैसा रखें।
सोने से पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें।
रात में बहुत ज्यादा कैफीन लेने से बचें।
सोने के कमरे का वातावरण शांत और आरामदायक रखें।
दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
अगर लंबे समय से नींद की समस्या बनी हुई है, तो डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह लें।

नोट: यह लेख उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी बीमारी या लगातार बनी रहने वाली नींद की समस्या के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

(साभार)


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