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दिल की बीमारी से बचाव के लिए लाइफस्टाइल पर दें ध्यान, तंबाकू-मोटापा और कोलेस्ट्रॉल को लेकर रहें सतर्क

Category Archives: जीवन शैली

दिल की बीमारी से बचाव के लिए लाइफस्टाइल पर दें ध्यान, तंबाकू-मोटापा और कोलेस्ट्रॉल को लेकर रहें सतर्क

दिल की बीमारियों को लंबे समय तक बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर स्थितियां सामने आ रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जीवनशैली, खराब खान-पान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और तंबाकू के सेवन के कारण दिल की सेहत को लेकर कम उम्र से ही सतर्क रहने की जरूरत है।

विशेषज्ञों के मुताबिक परिवार में हार्ट डिजीज या डायबिटीज का इतिहास, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल जैसे कारक दिल की बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं। ऐसे में नियमित हेल्थ चेकअप और रोजाना व्यायाम जैसी आदतें जोखिम कम करने में मददगार हो सकती हैं।

प्रसिद्ध हार्ट सर्जन डॉ. श्रीराम नेने का कहना है कि दिल की बीमारी को लेकर ध्यान केवल हार्ट अटैक के बाद इलाज तक सीमित नहीं होना चाहिए। बीमारी से बचाव, शुरुआती संकेतों की पहचान और समय पर उपचार पर भी बराबर ध्यान देने की जरूरत है। इससे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।

कार्डियक सर्जन और मेदांता के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक डॉ. नरेश त्रेहान ने भी युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के मामलों पर चिंता जताते हुए लोगों को अपनी दिल की सेहत को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है। उनके अनुसार, जिन परिवारों में हार्ट डिजीज और डायबिटीज का इतिहास रहा है, उन्हें 25 साल की उम्र से पहले स्वास्थ्य जांच शुरू करा लेनी चाहिए। वहीं, जिन लोगों के परिवार में ऐसी बीमारियों का इतिहास नहीं है, उन्हें भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार 30 साल की उम्र से पहले जरूरी जांच कराने पर विचार करना चाहिए।

डॉ. त्रेहान के मुताबिक जीनोम सीक्वेंसिंग जैसी आधुनिक जांचों से भी आनुवंशिक जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। परिवार की मेडिकल हिस्ट्री, ब्लड टेस्ट और जीवनशैली से जुड़ी जानकारी को साथ में देखकर दिल की बीमारी के संभावित जोखिम का आकलन किया जा सकता है।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की रिसर्च एंड हेल्थ प्रमोशन डिविजन की वाइस प्रेसिडेंट प्रो. मोनिका अरोड़ा ने दिल की बीमारियों के बढ़ते मामलों के पीछे खराब जीवनशैली और खान-पान में बदलाव को अहम कारण बताया। उनके अनुसार पारंपरिक भारतीय भोजन की जगह जंक और प्रोसेस्ड फूड का सेवन बढ़ने से भी स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है।

विशेषज्ञों ने तंबाकू के सभी रूपों से दूरी बनाने की सलाह दी है। इसमें सिगरेट के अलावा गुटखा और दूसरे तंबाकू उत्पाद शामिल हैं। वेप और निकोटीन की लत को भी दिल की सेहत के लिए जोखिमपूर्ण बताया गया है।

ग्लोबल मेटाबोलिक हेल्थ अलायंस के डॉ. अमित गुप्ता के अनुसार दिल की बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी पर नियंत्रण रखना जरूरी है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर जैसे कारक दिल की बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं।

विशेषज्ञों ने बच्चों में बढ़ते मोटापे को भी चिंता का विषय बताया है। वजन को नियंत्रित रखने की आदत बचपन से विकसित करने की सलाह दी गई है। वहीं, बुजुर्गों को नियमित रूप से ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और वजन की जांच कराने, डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं लेने और समय-समय पर चिकित्सकीय परामर्श लेते रहने पर जोर दिया गया है।


सिलेंडर महीनेभर से पहले हो रहा खत्म? इन छोटी-छोटी बातों का रखें ध्यान, कम होगी गैस की खपत

रसोई गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों के बीच अगर सिलेंडर सामान्य से पहले खत्म हो रहा है, तो खाना पकाने की कुछ आदतों में बदलाव कर एलपीजी की खपत कम की जा सकती है। बर्नर की सफाई से लेकर सही बर्तन के इस्तेमाल तक कई छोटी सावधानियां गैस की बचत में मदद कर सकती हैं।

रसोई में बर्नर की स्थिति का गैस की खपत पर असर पड़ता है। बर्नर के छेद गंदगी के कारण बंद होने पर गैस ठीक तरह से नहीं जलती। ऐसे में बर्नर की नियमित सफाई करना जरूरी है। सप्ताह में कम से कम एक बार इसकी सफाई करने से बर्नर की कार्यक्षमता बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।

खाना पकाने के लिए प्रेशर कुकर का इस्तेमाल भी गैस बचाने का प्रभावी तरीका माना जाता है। सब्जी, दाल या पुलाव जैसी चीजें बनाते समय जहां संभव हो, कुकर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे खाना पकाने में लगने वाला समय कम होता है और एलपीजी की खपत भी घट सकती है।

इसके अलावा बर्तन का आकार और उसका निचला हिस्सा भी महत्वपूर्ण है। खाना पकाने के लिए हमेशा समतल तले वाले बर्तन का इस्तेमाल करना बेहतर रहता है। बर्तन का आकार भी बर्नर के अनुरूप होना चाहिए। छोटे बर्तन को बड़े बर्नर और बड़े बर्तन को छोटे बर्नर पर रखने से बचना चाहिए।

तेज आंच पर खाना पकाने से गैस की बचत होती है, यह धारणा सही नहीं है। सामान्य तौर पर मध्यम या धीमी आंच पर खाना पकाने से गैस की खपत कम रखने में मदद मिलती है और खाना भी अच्छी तरह पकता है।

गैस सिलेंडर जल्दी खत्म होने की एक वजह गैस लीकेज भी हो सकती है। इसलिए समय-समय पर गैस पाइप की जांच करनी चाहिए और उसमें दरार या किसी तरह की खराबी नजर आने पर उसे बदल देना चाहिए। साथ ही रेगुलेटर की स्थिति की भी जांच जरूरी है। गैस की गंध महसूस होने पर किसी भी तरह की आग या चिंगारी से बचते हुए तुरंत गैस सप्लाई बंद कर सुरक्षित तरीके से जांच करानी चाहिए।


करी पत्ता सिर्फ खाने का स्वाद नहीं बढ़ाता, ब्लड शुगर से लेकर पाचन तक में मिल सकता है फायदा

भारतीय रसोई में करी पत्ते का इस्तेमाल मुख्य रूप से तड़का लगाने और खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसकी खुशबू और स्वाद भोजन को खास बना देते हैं। हालांकि, करी पत्ता केवल मसाले के तौर पर ही उपयोगी नहीं माना जाता, बल्कि इसमें कई पोषक तत्व और पौधों से मिलने वाले यौगिक भी पाए जाते हैं।

करी पत्ते पर हुए कुछ शोधों में ब्लड शुगर, पाचन, हृदय स्वास्थ्य और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े संभावित फायदे सामने आए हैं। हालांकि, इसे किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए।

ब्लड शुगर में संभावित मदद: करी पत्ते में फाइबर और कुछ प्लांट-बेस्ड यौगिक मौजूद होते हैं। शुरुआती अध्ययनों में इनके ग्लूकोज कंट्रोल और इंसुलिन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर संभावित प्रभाव देखे गए हैं। हालांकि, डायबिटीज के मरीजों को इसे दवा का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत: करी पत्ते में कई एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। ये शरीर में फ्री रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को नियंत्रित करने में भूमिका निभा सकते हैं। इसी वजह से करी पत्ते को त्वचा और बालों के लिए भी उपयोगी माना जाता है।

पाचन के लिए उपयोगी: करी पत्ते में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद करता है। इसके कुछ यौगिकों में एंटीऑक्सीडेंट और सूजन कम करने वाले गुण भी पाए गए हैं। करी पत्ते का इस्तेमाल गैस, ब्लोटिंग और अपच जैसी सामान्य पाचन संबंधी परेशानियों में मददगार माना जाता है।

हृदय स्वास्थ्य में संभावित फायदा: करी पत्ते में मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट हृदय स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। कुछ अध्ययनों में इसके सेवन और कोलेस्ट्रॉल तथा ब्लड प्रेशर से जुड़े संभावित लाभों पर संकेत मिले हैं। हालांकि, हृदय रोग या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों को इसे इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

करी पत्ते को रोजमर्रा के भोजन में शामिल करना आसान है। इसे दाल, सब्जी, पोहा, उपमा, चटनी और अन्य व्यंजनों में डाला जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से किसी बीमारी की दवा ले रहा है, तो करी पत्ते का नियमित या अधिक मात्रा में सेवन शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।


न मन्त्रं नो यन्त्रं लिरिक्स | Na Mantram No Yantram Lyrics Full

 

Na Mantram No Yantram Lyrics देवी स्तोत्र# न मन्त्रं नो यन्त्रं लिरिक्स | Na Mantram No Yantram Lyrics

**न मन्त्रं नो यन्त्रं** एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तुति है, जिसमें भक्त माता भगवती के प्रति अपनी सरल भक्ति, विनम्रता और समर्पण की भावना व्यक्त करता है। यह स्तुति **देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम्** के नाम से भी प्रसिद्ध है।

अगर आप **न मन्त्रं नो यन्त्रं लिरिक्स**, **Na Mantram No Yantram Lyrics**, संस्कृत पाठ या इसका हिंदी अर्थ खोज रहे हैं, तो नीचे पूरा पाठ दिया गया है।

## न मन्त्रं नो यन्त्रं लिरिक्स

### श्लोक 1

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥

न मन्त्रं नो यन्त्रं संस्कृत लिरिक्स

श्लोक 2

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥

### श्लोक 3

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥

### श्लोक 4

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥

### श्लोक 5

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥

### श्लोक 6

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥

### श्लोक 7

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥

### श्लोक 8

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥

### श्लोक 9

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥

### श्लोक 10

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

### श्लोक 11

जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥

### श्लोक 12

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥

## न मन्त्रं नो यन्त्रं का सरल हिंदी भावार्थ

इस स्तुति में भक्त माता के सामने अपनी विनम्रता व्यक्त करता है। भक्त कहता है कि उसे मंत्र, यंत्र, ध्यान, पूजा की विधि या स्तुति का सही ज्ञान नहीं है, लेकिन वह माता का अनुसरण और स्मरण करना जानता है।

भक्त अपनी पूजा में हुई कमियों और भूलों के लिए माता से क्षमा मांगता है और माता की असीम करुणा पर विश्वास रखता है। स्तुति का प्रसिद्ध भाव है कि **कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती।**

आगे भक्त सांसारिक सुख, धन या मोक्ष की विशेष इच्छा न रखते हुए माता के नाम का स्मरण और जप करने की प्रार्थना करता है। अंत में वह अपने सभी अपराधों को स्वीकार करते हुए माता से अपनी स्थिति के अनुसार कृपा करने की विनती करता है।

Na Mantram No Yantram Lyrics देवी स्तोत्र

## न मन्त्रं नो यन्त्रं स्तुति का महत्व

यह स्तुति भक्त और माता के बीच **प्रेम, समर्पण, क्षमा और करुणा** की भावना को दर्शाती है। इसका मुख्य संदेश यह है कि भक्ति में केवल विधि-विधान ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण भी महत्वपूर्ण हैं।

इस स्तुति में भक्त अपनी अज्ञानता और पूजा में हुई कमियों को स्वीकार करता है और माता की करुणा पर भरोसा करता है।

## न मन्त्रं नो यन्त्रं का पाठ कब करें?

भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं। इसे विशेष रूप से:

* नवरात्रि के समय
* देवी पूजा के दौरान
* सुबह या शाम की प्रार्थना में
* ध्यान और साधना के समय
* माता के मंदिर में
* दैनिक भक्ति और नामस्मरण के दौरान

पढ़ा जा सकता है।

## Na Mantram No Yantram Lyrics – FAQs

### न मन्त्रं नो यन्त्रं क्या है?

**न मन्त्रं नो यन्त्रं** देवी की एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तुति का प्रारंभिक वाक्य है। यह भक्त की विनम्रता और माता के प्रति पूर्ण समर्पण को व्यक्त करती है।

### न मन्त्रं नो यन्त्रं किस स्तोत्र का हिस्सा है?

यह पाठ सामान्यतः **देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम्** के नाम से जाना जाता है।

### Na Mantram No Yantram Lyrics किस भाषा में हैं?

यह स्तोत्र **संस्कृत भाषा** में है। इसके श्लोकों में देवी के प्रति भक्ति, क्षमा-याचना और समर्पण का भाव व्यक्त किया गया है।

### न मन्त्रं नो यन्त्रं का मुख्य संदेश क्या है?

इस स्तुति का मुख्य संदेश माता की करुणा और भक्त के समर्पण में विश्वास है। भक्त अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगता है और माता से कृपा की प्रार्थना करता है।

### क्या न मन्त्रं नो यन्त्रं का पाठ नवरात्रि में किया जा सकता है?

हाँ, भक्त अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार नवरात्रि तथा अन्य देवी-उपासना के अवसरों पर इसका पाठ कर सकते हैं।

## निष्कर्ष

**न मन्त्रं नो यन्त्रं लिरिक्स** भक्त को अपनी कमियों को स्वीकार करने, माता से क्षमा मांगने और उनकी करुणा पर विश्वास रखने का संदेश देता है। इस स्तुति की सबसे भावपूर्ण शिक्षाओं में से एक है कि माता अपने भक्त को उसकी भूलों के बावजूद अपनाती है।

यदि आप **Na Mantram No Yantram Lyrics in Hindi**, संस्कृत पाठ और इसका सरल अर्थ खोज रहे हैं, तो यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी संदर्भ है।

**जय माता दी। 🙏**


बेडरूम में रखें ये पौधे, कमरे का माहौल रहेगा शांत और नींद के लिए बनेगा बेहतर वातावरण

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, लगातार बढ़ते स्क्रीन टाइम और तनाव के कारण बड़ी संख्या में लोग नींद न आने या कम सोने की समस्या से जूझ रहे हैं। अच्छी नींद सिर्फ शरीर को आराम ही नहीं देती, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद जरूरी होती है। ऐसे में यदि बेडरूम के माहौल को थोड़ा प्राकृतिक, शांत और शुद्ध बना लिया जाए, तो नींद की क्वालिटी (Sleep Quality) में जबरदस्त सुधार देखा जा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ चुनिंदा इनडोर प्लांट्स न केवल कमरे की खूबसूरती बढ़ाते हैं, बल्कि हवा को शुद्ध कर बेहतर और गहरी नींद लाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। यदि आप भी सुकून भरी नींद चाहते हैं, तो अपने बेडरूम में इन पौधों को जरूर जगह दें:

हवा को शुद्ध करने और नींद बढ़ाने वाले प्रमुख प्लांट्स

  • स्नेक प्लांट : यह एक ऐसा खास पौधा है जो रात के समय भी ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे कमरे की हवा शुद्ध रहती है और सांस लेना आसान हो जाता है।

  • लैवेंडर और जैस्मिन : लैवेंडर की भीनी खुशबू तनाव को कम करती है और मन को शांत करती है। वहीं, जैस्मिन (चमेली) की हल्की सुगंध चिंता दूर कर नींद को गहरा बनाने में मददगार है।

  • एलोवेरा और स्पाइडर प्लांट : ये दोनों पौधे हवा से हानिकारक टॉक्सिन्स और प्रदूषक तत्वों को दूर करते हैं और रात में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं।

  • पीस लिली और इंग्लिश आइवी : पीस लिली कमरे में नमी बनाए रखती है और टॉक्सिन्स कम करती है, जबकि इंग्लिश आइवी एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों को घटाकर सांस से जुड़ी समस्याओं से राहत दिलाती है।

  • एरेका पाम और गार्डेनिया : एरेका पाम एक नेचुरल ह्यूमिडिफायर की तरह काम करता है, और गार्डेनिया की प्राकृतिक खुशबू एक बेहतरीन ‘स्लीप इंड्यूसर’ का काम करती है जो दिमाग को पूरी तरह रिलैक्स कर देती है।

बेडरूम में इन प्राकृतिक पौधों का सही चुनाव करके आप न सिर्फ अपने कमरे को खूबसूरत बना सकते हैं, बल्कि फ्रेश हवा, शांत वातावरण और हल्की खुशबू के जरिए तनावमुक्त और गहरी नींद का आनंद भी ले सकते हैं [cite: अगर आप अपने बेडरूम में सही पौधों का चयन करते हैं, तो यह न सिर्फ आपके कमरे को सुंदर बनाएंगे बल्कि आपकी नींद की क्वालिटी को भी बेहतर बनाएंगे। नेचुरल एटमॉस्फियर, फ्रेश हवा और हल्की खुशबू मिलकर आपको सुकून भरी और गहरी नींद देने में मदद करेंगे।]।


Mental Health Tips: आपकी ये छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे बन सकती हैं मानसिक तनाव की वजह, आज ही करें सुधार

आज की इस तेज रफ्तार जिंदगी में शारीरिक सेहत के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी हो गया है। हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या और छोटी-छोटी आदतें सीधे तौर पर हमारी कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन को प्रभावित करती हैं। जिस तरह शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खानपान जरूरी है, उसी तरह दिमाग को तरोताजा रखने के लिए अपनी आदतों पर नजर रखना बेहद आवश्यक है, खासकर बढ़ती उम्र के साथ।

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ ऐसी आम आदतें हैं जो धीरे-धीरे हमारी भावनात्मक और मानसिक सेहत को कमजोर कर सकती हैं। आइए जानते हैं उन आदतों के बारे में जिनमें सुधार करना बहुत जरूरी है:

1. सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल

आज के समय में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इस पर जरूरत से ज्यादा समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। लगातार स्क्रीन के सामने रहने से दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता और वास्तविक जीवन की गतिविधियों के लिए समय कम बचता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर मौजूद अनहेल्दी या नकारात्मक कंटेंट भी तनाव को बढ़ावा दे सकता है।

2. नींद से समझौता करना

भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में लोग अक्सर अपनी नींद पूरी नहीं कर पाते हैं। अच्छी नींद सिर्फ शारीरिक थकान मिटाने के लिए नहीं, बल्कि दिमाग के सुचारू रूप से काम करने के लिए भी उतनी ही जरूरी है। लगातार कम सोने से एकाग्रता में कमी, याददाश्त कमजोर होने और निर्णय लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। मानसिक तनाव और चिंता से बचने के लिए रोजाना 7 से 9 घंटे की गहरी और पर्याप्त नींद लेनी चाहिए।

3. हर समय नकारात्मक विचार रखना

खुद को बार-बार कोसना, अपनी छोटी-छोटी कमियों को लेकर हद से ज्यादा चिंतित रहना या हर परिस्थिति का नकारात्मक पहलू देखना मानसिक सेहत के लिए ठीक नहीं है। इस तरह की सोच धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को कमजोर कर देती है। गलतियों से सीख लेना बेहतर है, लेकिन हर बात के लिए खुद को दोषी ठहराने की आदत से बचना चाहिए।

समय रहते इन आदतों में बदलाव करके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को काफी हद तक बेहतर बनाया जा सकता है।


घंटों बैठे रहने वालों के लिए जरूरी खबर, रोजाना इतने कदम चलने से कम हो सकता है सेहत का खतरा

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई लोगों की दिनचर्या शारीरिक गतिविधियों की कमी से घिरी हुई है। ऑफिस में घंटों डेस्क पर बैठकर काम करना, आने-जाने के लिए कार या बाइक का इस्तेमाल करना और घर पहुंचने के बाद सोफे या बिस्तर पर मोबाइल चलाना आम हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ ऐसी दिनचर्या को कई बीमारियों के बढ़ते जोखिम से जोड़ते हैं।

लंबे समय तक बैठे रहने की आदत का संबंध मोटापे के साथ-साथ डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़े हुए जोखिम से बताया गया है। इसके अलावा किडनी की बीमारी, फैटी लिवर, सीओपीडी, डिप्रेशन और एट्रियल फिब्रिलेशन जैसी समस्याओं का खतरा भी लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले लोगों में अधिक हो सकता है।

ऐसे में डेस्क जॉब करने वालों के लिए सवाल यह है कि क्या ज्यादा चलने से लगातार बैठे रहने के नुकसान को कम किया जा सकता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन और नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित शोधों के मुताबिक, नियमित शारीरिक गतिविधि लंबे समय तक बैठे रहने से जुड़े कुछ स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती है।

अध्ययन के अनुसार, जो लोग दिन का काफी समय बैठे हुए बिताते हैं, उनके लिए रोजाना करीब 2,200 से अधिक कदम चलना हृदय रोग और समय से पहले मृत्यु के जोखिम को कम करने से जुड़ा पाया गया। वहीं करीब 4,000 से 4,500 कदम प्रतिदिन चलने से निष्क्रिय जीवनशैली से जुड़े कुछ जोखिमों को कम करने में लाभ मिल सकता है।

शोध में रोजाना करीब 9,000 से 10,000 कदम चलने को भी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्तर की शारीरिक गतिविधि से मृत्यु के जोखिम में 39 प्रतिशत तक और हृदय रोग के जोखिम में 21 प्रतिशत तक कमी देखी गई।

हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इसका मतलब यह नहीं है कि दिनभर लगातार बैठे रहने के बाद केवल 10 हजार कदम चल लेने से लंबे समय तक बैठे रहने के सभी नुकसान खत्म हो जाते हैं। अध्ययन में करीब 14 घंटे बैठने से जुड़े हृदय रोग और हार्ट फेलियर के अतिरिक्त जोखिम को पूरी तरह खत्म करने वाला कोई निश्चित कदम स्तर नहीं मिला।

ऐसे में डेस्क जॉब करने वालों के लिए दिनभर की गतिविधियों में छोटे-छोटे बदलाव करना भी जरूरी है। लगातार कई घंटे बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर कुछ देर चलना, पानी लेने के लिए खुद जाना और संभव हो तो सीढ़ियों का इस्तेमाल करना उपयोगी आदतें हो सकती हैं। यानी रोजाना वॉक करना फायदेमंद है, लेकिन लंबे समय तक बैठे रहने की आदत को कम करना भी उतना ही जरूरी है।


भारत में बढ़ रहा फैटी लिवर का खतरा, 100 में 39 वयस्क प्रभावित; बच्चों में भी 35.4% अनुमान

फैटी लिवर अब सिर्फ उम्रदराज लोगों तक सीमित बीमारी नहीं रह गई है। बदलती जीवनशैली, बढ़ता मोटापा, डायबिटीज और खान-पान की आदतों में बदलाव के बीच इस बीमारी का खतरा बच्चों और युवाओं में भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। खास चिंता की बात यह है कि शुरुआती दौर में फैटी लिवर के लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते, जिसके कारण कई लोगों को बीमारी का पता काफी देर से चलता है।

नई दिल्ली में आयोजित विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस-2026 में विशेषज्ञों ने भारत में लिवर और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ पर चर्चा की। सम्मेलन में सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 39 प्रतिशत वयस्कों में फैटी लिवर की समस्या होने का अनुमान है। वहीं, भारतीय बच्चों में भी इसका अनुमान 35.4 प्रतिशत तक बताया गया है।

सिर्फ शराब को जिम्मेदार मानना सही नहीं

लिवर में जरूरत से ज्यादा वसा जमा होने की स्थिति को फैटी लिवर कहा जाता है। आमतौर पर लिवर की बीमारी का नाम सुनते ही शराब को इसका प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक फैटी लिवर के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

मोटापा, डायबिटीज, ज्यादा कैलोरी वाला भोजन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और खराब जीवनशैली इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में फैटी लिवर की रोकथाम के लिए केवल शराब से दूरी बनाना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि पूरे मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है।

बच्चों में बढ़ता खतरा चिंता का विषय

फैटी लिवर के बढ़ते मामलों में बच्चों का शामिल होना विशेषज्ञों के लिए विशेष चिंता का विषय है। बच्चों में बढ़ता वजन, जंक फूड और हाई-कैलोरी डाइट के साथ शारीरिक गतिविधियों की कमी लिवर की सेहत को प्रभावित कर सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बच्चों के वजन में लगातार बढ़ोतरी को केवल सामान्य विकास मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। संतुलित खान-पान और नियमित शारीरिक गतिविधियों को बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है।

पाचन संबंधी समस्याओं को भी नजरअंदाज न करें

विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस-2026 में सिर्फ फैटी लिवर ही नहीं, बल्कि पाचन तंत्र से जुड़ी अन्य समस्याओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक कब्ज, दस्त और पेट से जुड़ी दूसरी परेशानियां दुनिया भर में बेहद आम हैं।

एम्स के विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि कुछ लक्षणों को सामान्य मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मल में खून आना या निगलने में परेशानी जैसे संकेत सामने आने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

61 देशों के विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

30 सितंबर से 3 अक्टूबर 2026 तक आयोजित विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस में करीब 61 देशों के 3,000 विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। भारत में पहली बार आयोजित हो रहे इस सम्मेलन में पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों के बदलते स्वरूप पर चर्चा की जा रही है।

सम्मेलन का मुख्य विषय पाचन तंत्र के स्वास्थ्य में बदलाव और प्रकृति के संरक्षण से जुड़ा है। कार्यक्रम के पहले दिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी देश में लिवर और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ को लेकर चिंता जताई और लोगों को सतर्क रहने की जरूरत बताई।

बीमारी की जांच में AI की भूमिका पर भी चर्चा

सम्मेलन में स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल पर भी विशेषज्ञों ने चर्चा की। शोधकर्ता पाचन तंत्र से जुड़ी कई बीमारियों की पहचान और जांच को अधिक प्रभावी बनाने के लिए AI आधारित तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), सीलिएक रोग की बायोप्सी के विश्लेषण और अग्न्याशय की गांठों की पहचान में AI के संभावित इस्तेमाल पर शोध जारी है। लंबे समय तक रहने वाली सूजन और अग्न्याशय के कैंसर की पहचान में भी इस तकनीक की संभावनाओं पर अध्ययन किया जा रहा है।

विशेषज्ञों की सलाह क्या है?

फैटी लिवर के बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञों का जोर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन को नियंत्रित रखना और डायबिटीज जैसी स्थितियों पर नजर रखना लिवर की सेहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

कुल मिलाकर, फैटी लिवर को केवल वयस्कों की बीमारी मानना अब सही नहीं होगा। बच्चों में सामने आ रहे मामलों ने इस समस्या को लेकर जागरूकता और समय पर जांच की जरूरत को और महत्वपूर्ण बना दिया है।


डाइट में शामिल करें ये 5 चीजें, मैग्नीशियम की कमी पूरी करने में मिल सकती है मदद

आज की तेज रफ्तार जिंदगी और बदलती खानपान की आदतों के बीच लोगों में थकान, कमजोरी और ऊर्जा की कमी की शिकायत तेजी से बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे शरीर में मैग्नीशियम की कमी एक बड़ी वजह हो सकती है। यह जरूरी मिनरल मांसपेशियों, नसों, दिल और शरीर में ऊर्जा उत्पादन को सुचारू रखने में अहम भूमिका निभाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को लगातार थकान महसूस होती है, नींद पूरी नहीं होती, मांसपेशियों में खिंचाव या ऐंठन रहती है, तो उसे अपने खानपान पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अच्छी बात यह है कि मैग्नीशियम की कमी को दूर करने के लिए महंगे सप्लीमेंट्स की नहीं, बल्कि संतुलित और पौष्टिक आहार की जरूरत होती है।

हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, सरसों और चौलाई जैसी सब्जियों को मैग्नीशियम के अच्छे स्रोतों में गिना जाता है। इन्हें सब्जी, सूप या अन्य व्यंजनों के रूप में डाइट में शामिल किया जा सकता है।

केला: केले में मैग्नीशियम के साथ पोटैशियम भी पाया जाता है। इसे नाश्ते या दिन के दूसरे समय फल के तौर पर खाया जा सकता है।

नट्स और सीड्स: बादाम, काजू, अखरोट के अलावा कद्दू और सूरजमुखी के बीज भी मैग्नीशियम प्रदान करते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर और वसा भी मौजूद होती है।

दालें और बीन्स: चना, राजमा, लोबिया, मसूर और मूंग जैसी दालें मैग्नीशियम के साथ प्रोटीन और फाइबर भी देती हैं। इन्हें नियमित भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है।

डार्क चॉकलेट: कोको की अधिक मात्रा वाली डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम के साथ एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं। हालांकि इसे सीमित मात्रा में लेना बेहतर माना जाता है, क्योंकि कई उत्पादों में चीनी और कैलोरी अधिक हो सकती है।

मैग्नीशियम शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन लगातार थकान, ऐंठन या कमजोरी के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। ऐसे लक्षण लगातार बने रहने पर डॉक्टर की सलाह लेना उचित है। संतुलित आहार के जरिए शरीर को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।


ज्यादा नींद कहीं बिगाड़ न दे आपकी सेहत, उठते ही सिरदर्द होने के पीछे हो सकते हैं ये कारण

सुबह देर तक सोने के बाद उठते ही अगर सिर भारी लगे या दर्द होने लगे, तो इसे सिर्फ थकान समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई बार सामान्य से अधिक देर तक सोना, नींद के समय में अचानक बदलाव या नींद की गुणवत्ता खराब होना भी सिरदर्द की वजह बन सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति में इसके कारण अलग हो सकते हैं।

नींद शरीर और दिमाग को आराम देने के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा या अनियमित नींद कुछ लोगों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। अगर आपको अक्सर ज्यादा देर तक सोने के बाद सिरदर्द होता है, तो इसके पीछे पानी की कमी से लेकर माइग्रेन और सोने की गलत मुद्रा तक कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। आइए जानते हैं इसके संभावित कारण और इससे बचने के आसान तरीके।

ज्यादा सोने के बाद सिरदर्द होने की वजह क्या है?

सामान्य से अधिक देर तक सोने के बाद सिरदर्द होना कई कारणों से जुड़ा हो सकता है। खासतौर पर अगर आपकी नींद की दिनचर्या नियमित नहीं है, तो ऐसी समस्या बार-बार देखने को मिल सकती है।

1. नींद का समय बदल जाना

हमारा शरीर एक नियमित नींद-जागने के चक्र के अनुसार काम करता है। रोजाना तय समय पर सोने और उठने की आदत अचानक बदल जाए और आप छुट्टी वाले दिन कई घंटे ज्यादा सो लें, तो कुछ लोगों को उठने के बाद सिरदर्द, सुस्ती या भारीपन महसूस हो सकता है।

2. शरीर में पानी की कमी

सोते समय कई घंटों तक पानी नहीं पिया जाता। सामान्य से अधिक देर तक सोने पर यह अंतराल और बढ़ सकता है। इससे शरीर में हल्की पानी की कमी हो सकती है, जो कुछ लोगों में सिरदर्द का कारण बन सकती है। इसलिए सुबह उठने के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है।

3. लंबे समय तक खाली पेट रहना

देर तक सोने की वजह से नाश्ते का समय भी आगे बढ़ जाता है। लंबे समय तक कुछ न खाने से कुछ लोगों को कमजोरी, चक्कर या सिरदर्द जैसा महसूस हो सकता है। नियमित अंतराल पर संतुलित भोजन करना इस समस्या से बचने में मदद कर सकता है।

4. नींद ज्यादा, लेकिन आराम कम

यह जरूरी नहीं कि ज्यादा घंटे सोने का मतलब बेहतर नींद हो। अगर रात में बार-बार नींद खुलती है, खर्राटे आते हैं या नींद पूरी होने के बाद भी थकान महसूस होती है, तो नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में लंबे समय तक सोने के बावजूद सिरदर्द और सुस्ती बनी रह सकती है।

5. माइग्रेन भी हो सकता है कारण

कुछ लोगों में सोने के समय या अवधि में बदलाव माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है। अगर सिरदर्द के साथ रोशनी या तेज आवाज से परेशानी, मतली या सिर में धड़कता हुआ दर्द महसूस होता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

6. सोने की गलत मुद्रा

लंबे समय तक एक ही स्थिति में सोने या गर्दन को गलत कोण पर रखने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों में खिंचाव हो सकता है। इसका असर सिर तक पहुंच सकता है और उठने के बाद सिरदर्द या गर्दन में अकड़न महसूस हो सकती है।

कितने घंटे सोना पर्याप्त माना जाता है?

हर व्यक्ति की नींद की जरूरत उसकी उम्र और व्यक्तिगत स्थिति पर निर्भर करती है। अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए नियमित रूप से करीब 7 से 9 घंटे की नींद पर्याप्त मानी जाती है। हालांकि, सिर्फ नींद के घंटे महत्वपूर्ण नहीं हैं। अच्छी नींद के लिए उसकी गुणवत्ता और नियमितता भी उतनी ही जरूरी है।

ज्यादा सोने के बाद सिरदर्द से कैसे बचें?
रोजाना लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें।
सुबह उठने के बाद पर्याप्त पानी पिएं।
लंबे समय तक खाली पेट रहने से बचें।
सोते समय गर्दन और शरीर की सही मुद्रा बनाए रखें।
रात में पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद लेने की कोशिश करें।
छुट्टी के दिन भी अपनी सामान्य नींद की दिनचर्या में बहुत ज्यादा बदलाव न करें।
अगर सिरदर्द बार-बार होता है या इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर सिरदर्द लगातार बना रहता है, बार-बार होने लगा है या इसके साथ उल्टी, नजर धुंधली होना, कमजोरी, बोलने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। बार-बार होने वाले सिरदर्द के पीछे किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की भूमिका भी हो सकती है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी बीमारी या लगातार बने रहने वाले लक्षण के इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

(साभार)


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