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वजन घटाने के लिए कर रहे हैं इंटरमिटेंट फास्टिंग? पहले जान लें इसके फायदे और नुकसान

Category Archives: फिटनेस

वजन घटाने के लिए कर रहे हैं इंटरमिटेंट फास्टिंग? पहले जान लें इसके फायदे और नुकसान

आज के दौर में तेजी से वजन कम करने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग का चलन काफी बढ़ गया है। इस तरीके में व्यक्ति दिन के कुछ तय घंटों में ही भोजन करता है और बाकी समय उपवास रखता है। वजन नियंत्रित करने के साथ-साथ कुछ शोधों में इसके ब्लड प्रेशर और आराम की अवस्था में दिल की धड़कन पर सकारात्मक प्रभाव के संकेत भी मिले हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित या उपयुक्त है।

खासकर पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों या नियमित रूप से दवाइयां लेने वालों को इसे शुरू करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। लंबे समय तक भोजन न करने से कुछ लोगों में सिरदर्द, कमजोरी, चक्कर या ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए वजन घटाने के लिए फास्टिंग शुरू करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

इंटरमिटेंट फास्टिंग से मिल सकते हैं ये फायदे

इंटरमिटेंट फास्टिंग का सबसे प्रमुख उद्देश्य खाने की अवधि को सीमित करना है। इससे कई लोगों में कुल कैलोरी का सेवन कम हो सकता है, जिसके चलते वजन घटाने में मदद मिल सकती है।

कुछ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने और आराम की अवस्था में दिल की धड़कन कम करने में मदद कर सकती है। एक अध्ययन में 16 घंटे तक उपवास रखने वाले पुरुषों में शरीर की चर्बी कम होने के संकेत देखे गए थे।

हालांकि, इन अध्ययनों के परिणामों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फास्टिंग का असर व्यक्ति की उम्र, वजन, खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

लंबे समय तक खाना न खाने से सिरदर्द की समस्या

इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने के बाद कुछ लोगों को सिरदर्द की शिकायत हो सकती है। लंबे समय तक भोजन न मिलने के कारण शरीर में होने वाले बदलाव इसके पीछे एक कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके साथ कमजोरी या चक्कर भी महसूस हो सकते हैं।

2020 में प्रकाशित एक समीक्षा में भी इंटरमिटेंट फास्टिंग करने वाले लोगों में सिरदर्द की समस्या सामने आई थी। हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति में समान नहीं होता। किसी व्यक्ति को हल्का सिरदर्द हो सकता है, जबकि किसी अन्य को ज्यादा परेशानी महसूस हो सकती है।

अगर फास्टिंग के दौरान बार-बार या तेज सिरदर्द की समस्या हो रही है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

डायबिटीज के मरीज रहें विशेष सावधान

डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करना सामान्य लोगों की तुलना में अधिक सावधानी की मांग करता है। लंबे समय तक भोजन न करने से ब्लड शुगर के स्तर में उतार-चढ़ाव हो सकता है।

खासकर इंसुलिन या ब्लड शुगर कम करने वाली दवाइयां लेने वाले लोगों में हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर बहुत कम होने का जोखिम बढ़ सकता है।

ऐसे में डायबिटीज के मरीजों को केवल वजन कम करने के उद्देश्य से अपने स्तर पर फास्टिंग शुरू नहीं करनी चाहिए। उन्हें पहले डॉक्टर से सलाह लेकर यह तय करना चाहिए कि उनके लिए किस तरह का खान-पान और भोजन का समय सुरक्षित रहेगा।

नियमित दवा लेते हैं तो पहले डॉक्टर से पूछें

अगर कोई व्यक्ति ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की दवाइयां नियमित रूप से ले रहा है, तो इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

फास्टिंग के कारण भोजन करने का समय बदल जाता है और ऐसे में कुछ दवाइयों के सेवन का समय भी प्रभावित हो सकता है। वहीं, कुछ दवाइयां भोजन के साथ लेना जरूरी होता है। लंबे समय तक खाली पेट रहने पर कमजोरी या चक्कर जैसी समस्या भी हो सकती है।

इसलिए किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति या नियमित दवा लेने वाले लोगों के लिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करना सही नहीं माना जाता। वजन कम करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सुरक्षित तरीके से करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्टों और अध्ययनों में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या नियमित दवा के मामले में फास्टिंग शुरू करने से पहले चिकित्सक की सलाह लें।


क्या RO का पानी घटा रहा है शरीर का B12? नए अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

आजकल घरों और दफ्तरों में साफ पानी के लिए आरओ का इस्तेमाल आम हो गया है। ज्यादातर लोग आरओ पानी को शुद्ध और सुरक्षित मानकर नियमित रूप से इसका सेवन करते हैं। हालांकि, एक हालिया स्वास्थ्य अध्ययन ने आरओ पानी पीने और शरीर में विटामिन B12 की कमी के बीच संभावित संबंध को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

पश्चिमी भारत में किए गए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि आरओ पानी का लंबे समय तक सेवन करने वाले लोगों में विटामिन B12 का स्तर कैसा रहता है। अध्ययन के आंकड़ों में आरओ पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों में B12 की कमी का अनुपात अन्य स्रोतों का पानी पीने वालों की तुलना में अधिक पाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इन नतीजों को सीधे तौर पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि आरओ पानी ही B12 की कमी की वजह है।

250 लोगों पर किया गया अध्ययन

शोध में कुल 250 लोगों को शामिल किया गया। जांच के दौरान 70 प्रतिभागियों यानी करीब 28 प्रतिशत लोगों में विटामिन B12 की कमी पाई गई।

आंकड़ों के मुताबिक आरओ पानी का इस्तेमाल करने वाले 79 प्रतिभागियों में से 40 लोगों यानी 50.6 प्रतिशत में B12 की कमी थी। वहीं, आरओ के अलावा दूसरे स्रोतों का पानी पीने वाले 171 लोगों में से 30 यानी करीब 17.5 प्रतिशत लोगों में विटामिन B12 का स्तर कम पाया गया।

अध्ययन के सांख्यिकीय विश्लेषण में भी आरओ पानी के इस्तेमाल और विटामिन B12 की कमी के बीच एक स्वतंत्र संबंध सामने आया।

क्या आरओ पानी सीधे B12 की कमी करता है?

अध्ययन का सबसे अहम पहलू यही है कि इसमें केवल दोनों चीजों के बीच संबंध देखा गया है। शोध ने यह साबित नहीं किया कि आरओ पानी पीने से सीधे शरीर में विटामिन B12 की कमी हो जाती है।

दरअसल, यह एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन था, जिसमें प्रतिभागियों की स्वास्थ्य स्थिति को एक निश्चित समय पर देखा गया। ऐसे अध्ययन किसी स्थिति और संभावित कारण के बीच संबंध तो दिखा सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से साबित नहीं कर सकते कि एक चीज दूसरी की वजह है।

खान-पान समेत कई पहलुओं की हुई जांच

शोध के दौरान प्रतिभागियों से उनके लिंग, खान-पान, दूध और डेयरी उत्पादों के सेवन तथा आरओ पानी के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी ली गई। साथ ही उनके विटामिन B12 स्तर की भी जांच की गई।

जिन प्रतिभागियों में पहले से ही विटामिन B12 की कमी के ज्ञात कारण मौजूद थे, उन्हें अध्ययन से बाहर रखा गया था। इसके बावजूद शोधकर्ताओं ने माना कि इस संबंध को बेहतर तरीके से समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है।

बड़े और लंबे अध्ययन की जरूरत

शोध के निष्कर्षों के आधार पर फिलहाल आरओ पानी को विटामिन B12 की कमी का सीधा और निश्चित कारण बताना उचित नहीं होगा। इस संबंध की पुष्टि के लिए ज्यादा लोगों को शामिल करते हुए लंबे समय तक अध्ययन करने की आवश्यकता है।

भविष्य के शोध में लोगों के खान-पान, जीवनशैली, पोषण और पानी के अलग-अलग स्रोतों जैसे कई कारकों को साथ में देखा जाना जरूरी होगा। इसलिए अगर आप नियमित रूप से आरओ पानी पीते हैं तो केवल इस अध्ययन के आधार पर इसे बंद करने का फैसला न लें। शरीर में B12 की कमी को लेकर चिंता हो तो चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच कराना बेहतर विकल्प है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट और शोध निष्कर्षों के आधार पर तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न माना जाए।

(साभार)


लंबे समय तक तेज बुखार के साथ कमजोरी और पेट दर्द को न करें नजरअंदाज, हो सकता है टायफाइड

लगातार या लंबे समय तक तेज बुखार के साथ थकान, कमजोरी, सिर दर्द, भूख कम लगना, जी मिचलाना, पेट दर्द, कब्ज या दस्त की शिकायत हो तो टायफाइड की आशंका हो सकती है। त्वचा पर हल्के गुलाबी रंग के दाने भी इसके लक्षणों में शामिल हो सकते हैं। टायफाइड साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है।

टायफाइड होने पर घबराने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह, निर्धारित उपचार, पर्याप्त आराम, सुरक्षित तरल पदार्थ और संतुलित भोजन पर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सही समय पर सेवन करना जरूरी है।

टायफाइड के लक्षण कई अन्य संक्रमणों से मिलते-जुलते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर टायफाइड मान लेना या अपने मन से दवा शुरू करना ठीक नहीं है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच और अन्य संभावित कारणों को ध्यान में रखकर उपचार करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, टायफाइड की पुष्टि के लिए रक्त जांच महत्वपूर्ण है।

बीमारी के दौरान शरीर को ऊर्जा और पोषण की जरूरत होती है। तेज बुखार, मितली या पेट की परेशानी के कारण भूख कम लग सकती है। ऐसे में अधिक भोजन करने के बजाय सहनशीलता के अनुसार हल्का और पौष्टिक भोजन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेना बेहतर रहता है। लगातार उल्टी हो, खाना-पानी न टिक रहा हो या कमजोरी बढ़ रही हो तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

तुरंत उपचार शुरू होने पर बुखार आम तौर पर 10 दिनों तक रह सकता है, जबकि उपचार में देरी होने पर यह 3-4 सप्ताह या उससे अधिक समय तक भी रह सकता है। इस दौरान लक्षण गंभीर हो सकते हैं और अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं।

केवल बुखार उतर जाने का मतलब संक्रमण पूरी तरह खत्म होना नहीं है। इसलिए डॉक्टर ने जितने दिनों के लिए दवाएं लिखी हैं, उनका पूरा कोर्स करना जरूरी है। बीच में दवा छोड़ने से संक्रमण दोबारा होने और बुखार की समस्या बढ़ने का खतरा रहता है।

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रभाकर भूषण मिश्रा के अनुसार, टायफाइड में हाइड्रेशन सबसे जरूरी है। साफ उबला हुआ पानी, ओआरएस, नारियल पानी, दाल का पानी या पतली छाछ लेते रहना चाहिए। टायफाइड में छोटी आंत के अंदर घाव-सा हो सकता है, इसलिए हल्का और जल्दी पचने वाला भोजन लेना चाहिए। उनके अनुसार, सही इलाज से टायफाइड 7-14 दिन में ठीक हो सकता है। दवाओं का कोर्स पूरा नहीं करने पर बीमारी दोबारा हो सकती है। ठीक होने के बाद टायफाइड का टीका भी लगवाया जा सकता है।


पेट रोज साफ नहीं होता? कब्ज समझकर न करें नजरअंदाज, इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

पेट से जुड़ी छोटी-सी परेशानी भी कई बार शरीर की किसी बड़ी समस्या का संकेत हो सकती है। अगर नियमित रूप से पेट साफ नहीं हो रहा है, मल त्याग के दौरान अधिक जोर लगाना पड़ रहा है या कई दिनों तक शौच नहीं हो पा रहा है, तो इसे केवल सामान्य कब्ज मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खानपान और जीवनशैली की गड़बड़ी के अलावा कुछ बीमारियां भी लंबे समय तक कब्ज की वजह बन सकती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कम फाइबर वाला भोजन, पर्याप्त पानी न पीना और शारीरिक गतिविधि की कमी कब्ज के सामान्य कारणों में शामिल हैं। हालांकि, यदि इन आदतों में सुधार के बावजूद समस्या लगातार बनी रहती है, तो इसके पीछे किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की संभावना को भी समझना जरूरी हो जाता है।

कैसे पहचानें कि कब्ज की समस्या है?

हर दिन मल त्याग न होना ही कब्ज का एकमात्र संकेत नहीं है। मल का कठोर या सूखा होना, शौच करते समय अधिक जोर लगाना, दर्द या परेशानी होना और मल त्याग के बाद भी पेट पूरी तरह साफ न होने का एहसास कब्ज की ओर इशारा कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, सप्ताह में तीन से कम बार मल त्याग होना भी कब्ज का संकेत माना जा सकता है। कई मामलों में खानपान और दिनचर्या में बदलाव से राहत मिल जाती है, लेकिन लंबे समय तक समस्या बने रहने पर इसके मूल कारण की जांच जरूरी हो सकती है।

डायबिटीज से भी जुड़ी हो सकती है समस्या

लगातार बढ़ा हुआ रक्त शर्करा स्तर शरीर की कई नसों को नुकसान पहुंचा सकता है। पाचन तंत्र को नियंत्रित करने वाली नसों पर इसका असर पड़ने से आंतों में भोजन और अपशिष्ट पदार्थों की गति धीमी हो सकती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को कब्ज और पेट ठीक से साफ न होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं।

इसीलिए यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से मधुमेह है और साथ ही लगातार कब्ज की शिकायत बनी हुई है, तो इसे सामान्य समस्या मानकर लंबे समय तक टालना ठीक नहीं है।

थायरॉइड कम होने पर भी हो सकती है कब्ज

हाइपोथायरायडिज्म यानी थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम होने की स्थिति में शरीर की चयापचय प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इसका असर पाचन तंत्र पर भी पड़ सकता है और आंतों की गतिविधि कम होने से कब्ज की शिकायत बढ़ सकती है।

इसके अलावा कुछ दवाओं और पोषक तत्वों की गोलियों के सेवन से भी कब्ज की समस्या हो सकती है। इसलिए लंबे समय से कब्ज रहने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर होता है।

पेट को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

कब्ज से बचाव के लिए भोजन में फाइबर की मात्रा बढ़ाना, पर्याप्त पानी और अन्य तरल पदार्थ लेना तथा नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करना फायदेमंद हो सकता है। फल, सब्जियां, साबुत अनाज और अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।

अगर इन उपायों के बावजूद कब्ज लंबे समय तक बनी रहती है, बार-बार होती है या इसके साथ अन्य असामान्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो चिकित्सक से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराना जरूरी है। इससे कब्ज के पीछे छिपे संभावित कारण का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

नोट: यह लेख उपलब्ध चिकित्सकीय जानकारी और विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी लगातार बनी स्वास्थ्य समस्या के लिए चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।

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पेट दर्द और सूजन को न करें नजरअंदाज, उभार दिखे तो हो जाएं सतर्क, हो सकता है हर्निया

पेट में दर्द या भारीपन को अक्सर लोग गैस, कब्ज या अपच से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार यह सामान्य परेशानी हो सकती है, लेकिन अगर पेट या जांघ के ऊपरी हिस्से यानी ग्रोइन में दर्द के साथ कोई उभार या गांठ नजर आने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह हर्निया का संकेत हो सकता है।

हर्निया ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर के अंदर मौजूद कोई अंग या ऊतक पेट की कमजोर मांसपेशियों की दीवार से बाहर की ओर निकलने लगता है। शुरुआत में इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर रूप ले सकता है। खासतौर पर जब आंत का कोई हिस्सा हर्निया में फंस जाए और उसकी रक्त आपूर्ति प्रभावित होने लगे।

क्या होता है हर्निया?

हर्निया तब विकसित होता है जब पेट की मांसपेशियों या ऊतकों की दीवार कमजोर हो जाती है और अंदर का कोई हिस्सा उस कमजोर जगह से बाहर की तरफ उभरने लगता है। पेट या ग्रोइन में दिखाई देने वाला उभार इसका सबसे आम संकेत माना जाता है।

कुछ लोगों में यह समस्या जन्म से मौजूद कमजोरी के कारण हो सकती है, जबकि कई मामलों में उम्र बढ़ने, मांसपेशियों के कमजोर होने या पेट के अंदर लगातार बढ़ते दबाव के कारण हर्निया विकसित हो सकता है।

किन कारणों से बढ़ सकता है खतरा?

हर्निया के पीछे कई कारण हो सकते हैं। लंबे समय तक कब्ज रहने और शौच के दौरान बार-बार जोर लगाने से पेट के अंदर दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह लगातार खांसी, अधिक वजन, भारी सामान उठाना और ऐसी गतिविधियां जिनमें पेट की मांसपेशियों पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जोखिम बढ़ा सकती हैं।

कुछ लोगों में पेट की दीवार कमजोर होने की समस्या जन्मजात भी होती है। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ शरीर के ऊतकों में आने वाली कमजोरी भी एक कारण हो सकती है।

इन संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

हर पेट दर्द हर्निया नहीं होता, लेकिन कुछ खास लक्षण इसकी ओर इशारा कर सकते हैं। जैसे—

पेट या ग्रोइन में गांठ या उभार दिखाई देना
खांसने या छींकने पर उभार का ज्यादा स्पष्ट होना
वजन उठाने या जोर लगाने पर दर्द बढ़ना
लंबे समय तक खड़े रहने पर भारीपन या असहजता महसूस होना
लेटने पर उभार या दर्द में राहत मिलना
ग्रोइन के आसपास जलन, खिंचाव या दबाव महसूस होना

अगर इस तरह के लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।

अचानक तेज दर्द हो तो तुरंत लें मेडिकल मदद

हर्निया की सबसे गंभीर स्थिति तब हो सकती है, जब उसमें आंत का हिस्सा फंस जाए। अगर उभार अचानक बड़ा या बेहद दर्दनाक हो जाए, तेज पेट दर्द होने लगे, पेट फूलने के साथ मतली या उल्टी हो या बुखार आ जाए, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में आंत तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है।

बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

हर्निया के जोखिम को कम करने के लिए शरीर का स्वस्थ वजन बनाए रखना, कब्ज से बचना और भोजन में पर्याप्त फाइबर शामिल करना मददगार हो सकता है। लगातार खांसी जैसी समस्या होने पर उसका इलाज कराना भी जरूरी है। भारी वजन उठाते समय सही तकनीक का इस्तेमाल करना भी महत्वपूर्ण है।

ध्यान रखें कि पेट में होने वाले हर दर्द को हर्निया नहीं कहा जा सकता। सही कारण जानने के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारी और विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लगातार बने रहने वाले लक्षण में चिकित्सकीय परामर्श लें।

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जल एवं मच्छर जनित रोगों का खतरा बढ़ा, स्वास्थ्य विभाग ने जारी की एडवाइजरी

बासी व खुले खाद्य पदार्थों से बचें, पानी उबालकर पीएं

घरों के आसपास पानी जमा न होने दें

देहरादून। बरसात में जल जनित एवं मच्छर जनित संक्रामक रोगों की आशंका बढ़ जाती है। डायरिया, पेचिश, टायफायड, हैजा, पीलिया एवं हेपेटाइटिस जैसे जल जनित रोगों के साथ ही डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे मच्छर जनित रोगों के मामले भी बढ़ने की संभावना रहती है। इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) के माध्यम से प्राप्त साप्ताहिक रिपोर्टों के दृष्टिगत स्वास्थ्य विभाग ने आमजन से विशेष सतर्कता बरतने तथा रोगों की रोकथाम के लिए आवश्यक सावधानियां अपनाने की अपील की है।

स्वास्थ्य विभाग ने जनसामान्य से बासी भोजन का सेवन न करने तथा बाजार में खुले में बिक रहे खाद्य पदार्थों एवं अधपके भोजन से बचने की अपील की है। तरबूज, खरबूज, गन्ने का रस आदि का सेवन केवल स्वच्छ एवं सुरक्षित होने पर ही करें। ठंडी वस्तुओं में प्रयुक्त होने वाली बर्फ के सेवन से भी बचें, क्योंकि इसमें दूषित पानी का प्रयोग होने की संभावना रहती है।

विभाग ने सलाह दी है कि घर में पानी को अच्छी तरह उबालकर रखें और पीने तथा खाना बनाने में इसी का प्रयोग करें। पानी को क्लोरीनयुक्त करने के लिए क्लोरीन की गोलियों का प्रयोग स्वास्थ्य कर्मियों के निर्देशानुसार ही किया जाए। शौचालय के उपयोग के बाद तथा भोजन करने से पहले साबुन से हाथ धोने की आदत अपनाएं। फलों एवं सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही सेवन करें।

मच्छर जनित रोगों की रोकथाम के लिए विशेष सतर्कता जरूरी
स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू, मलेरिया एवं चिकनगुनिया से बचाव के लिए लोगों से अपने घरों एवं आसपास पानी एकत्रित न होने देने की अपील की है। सभी पानी की टंकियों एवं जल भंडारण के बर्तनों को ढककर रखें। घरों में लगे गमलों के नीचे पानी एकत्रित करने वाली ट्रे न लगाएं और गमलों में पानी जमा न होने दें।

फ्रिज के पीछे, कूलर, गुलदस्तों, मनी प्लांट, पानी के बर्तनों सहित ऐसे सभी स्थानों की नियमित रूप से सफाई करें, जहां पानी जमा हो सकता है। इन वस्तुओं का पानी सप्ताह में कम से कम एक बार पूरी तरह खाली कर उन्हें सुखाकर ही दोबारा उपयोग करें।

स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से पुराने टूटे बर्तन, बोतल, डिब्बे, बेकार टायर आदि खुले में न फेंकने की अपील की है। इनमें जमा होने वाला पानी डेंगू फैलाने वाले एडीज मच्छर के प्रजनन का कारण बन सकता है।

मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करने, आवश्यकता के अनुसार मच्छररोधी साधनों का उपयोग करने तथा ऐसे कपड़े पहनने की सलाह दी गई है, जिससे शरीर का अधिक से अधिक हिस्सा ढका रहे। बच्चों एवं आमजन को मच्छर जनित रोगों से बचाव के संबंध में जागरूक करना भी आवश्यक है।

लक्षण दिखें तो तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें
स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि तेज बुखार, सिरदर्द, बदन एवं मांसपेशियों में दर्द, जोड़ों में दर्द, आंखों के पिछले हिस्से में दर्द तथा शरीर पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देने पर इसे नजरअंदाज न करें और तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें। ये लक्षण डेंगू सहित अन्य संक्रामक रोगों के संकेत हो सकते हैं।

विभाग ने आमजन से बिना चिकित्सकीय परामर्श के कोई दवा न लेने की अपील की है। डेंगू की जांच सभी सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है। ऐसे लक्षण होने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या सरकारी अस्पताल से संपर्क कर चिकित्सकीय सलाह एवं जांच अवश्य कराएं।

स्वास्थ्य विभाग ने आमजन से अपील की है कि स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल और मच्छरों की रोकथाम को अपनी दैनिक आदतों का हिस्सा बनाकर ही मानसून के दौरान संक्रामक रोगों से बचाव सुनिश्चित किया जा सकता है।


बार-बार थकना और ज्यादा प्यास लगना! बच्चों में दिखें ये बदलाव तो हो जाएं सावधान

बच्चों की सेहत को लेकर छोटी-सी लापरवाही भी कई बार बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है। खास बात यह है कि कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के शुरुआती संकेत बेहद सामान्य नजर आते हैं। बच्चा बार-बार थक रहा हो, खेलते समय जल्दी हांफने लगे, लगातार पानी मांगता हो या उसकी नींद और व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो माता-पिता को इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।

बच्चे अपनी परेशानी को हमेशा सही तरीके से बता नहीं पाते। ऐसे में उनके रोजमर्रा के व्यवहार और शारीरिक बदलावों पर नजर रखना जरूरी हो जाता है। हर बार इन लक्षणों का मतलब किसी गंभीर बीमारी से नहीं होता, लेकिन अगर ये समस्याएं लगातार बनी रहें या पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ जाएं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है।

लगातार थकान को सिर्फ आलस न समझें

अगर बच्चा पहले की तरह खेल-कूद नहीं कर पा रहा है, थोड़ी गतिविधि के बाद ही थक जाता है या पढ़ाई के दौरान उसका ध्यान बार-बार भटकता है, तो इसकी वजह सिर्फ आलस नहीं हो सकती। आयरन की कमी और एनीमिया में बच्चों को कमजोरी, थकान, चक्कर या सांस फूलने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

बच्चों के तेजी से बढ़ने के दौर में शरीर को आयरन की जरूरत भी बढ़ जाती है। लंबे समय तक इसकी कमी रहने पर बच्चे के शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।

बहुत ज्यादा प्यास और बार-बार पेशाब आए तो दें ध्यान

बच्चे का गर्मी या ज्यादा खेल-कूद के कारण पानी अधिक पीना सामान्य हो सकता है। लेकिन अगर बिना किसी स्पष्ट वजह के उसे लगातार बहुत ज्यादा प्यास लग रही है और पेशाब भी सामान्य से अधिक आ रहा है, तो इस संकेत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसे लक्षण डायबिटीज में भी दिखाई दे सकते हैं। बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के साथ टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी हो सकता है। अधिक वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी और परिवार में डायबिटीज का इतिहास कुछ बच्चों में जोखिम बढ़ा सकता है।

नींद और व्यवहार में बदलाव भी हो सकता है संकेत

अगर बच्चा अचानक ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा है, दिनभर सुस्ती महसूस करता है, ठीक से सो नहीं रहा या पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में उसकी रुचि कम हो गई है, तो माता-पिता को इस बदलाव पर ध्यान देना चाहिए।

नींद बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लगातार कम नींद लेने से वजन बढ़ने समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा बच्चे का खान-पान, रोजाना की शारीरिक गतिविधि और स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय भी उसकी सेहत को प्रभावित करता है।

बढ़ता वजन भी हो सकता है चिंता का विषय

बच्चे का वजन बढ़ना केवल उसकी शारीरिक बनावट से जुड़ा मामला नहीं है। बचपन में मोटापे की समस्या आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, टाइप-2 डायबिटीज, फैटी लिवर और स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती है।

इसलिए बच्चों के वजन, खान-पान और रोजाना की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि बच्चों के स्वस्थ विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर बच्चे में थकान, कमजोरी, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, सांस फूलना, नींद में बदलाव या व्यवहार में असामान्य परिवर्तन जैसे लक्षण लगातार बने रहते हैं, तो खुद से किसी बीमारी का अनुमान लगाने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।

(साभार)


देश में बढ़ रहा स्वाइन फ्लू का खतरा, बुखार नहीं तो भी इन संकेतों पर रहें अलर्ट

देश के कई हिस्सों में इन दिनों इन्फ्लुएंजा-ए के H1N1 वायरस को लेकर चिंता बढ़ी हुई है। दिल्ली-एनसीआर के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ रहे हैं। अगस्त के अंत तक दिल्ली में संक्रमितों का आंकड़ा 3200 के पार पहुंच गया था, जबकि उत्तर प्रदेश में 2 सितंबर तक H1N1 के 685 मामलों की प्रयोगशाला जांच में पुष्टि हो चुकी थी। कुछ राज्यों में संक्रमण से मौत के मामले भी सामने आए हैं।

हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर मरीजों में संक्रमण के लक्षण हल्के होते हैं और घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, डायबिटीज के मरीजों और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों में फ्लू ज्यादा परेशानी पैदा कर सकता है।

सिर्फ तेज बुखार को न मानें फ्लू का संकेत

स्वाइन फ्लू का नाम आते ही आमतौर पर तेज बुखार, खांसी और बदन दर्द जैसे लक्षण ध्यान में आते हैं। लेकिन H1N1 संक्रमण की पहचान केवल बुखार के आधार पर नहीं की जा सकती। कई मामलों में व्यक्ति को बुखार नहीं होता, फिर भी वह इन्फ्लुएंजा से संक्रमित हो सकता है।

अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार कुछ लोगों में फ्लू से जुड़े सांस संबंधी लक्षण बुखार के बिना भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में लगातार खांसी, गले में खराश, नाक बहना या बंद होना, सिरदर्द और असामान्य थकान जैसे संकेतों को सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर टालना ठीक नहीं है।

हर मरीज में एक जैसे लक्षण नहीं होते

H1N1 संक्रमण के लक्षण व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं। बुजुर्गों में फ्लू होने के बावजूद बुखार न आना संभव है। ऐसे मरीजों में भूख कम लगना, कमजोरी या अन्य सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

वहीं बच्चों में सांस से जुड़े लक्षणों के साथ उल्टी और दस्त जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। इसलिए केवल किसी एक लक्षण की मौजूदगी या अनुपस्थिति से H1N1 संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती।

लक्षण दिखने पर खुद से न करें बीमारी का अनुमान

फैमिली फिजिशियन डॉ. अरविंद डबास के मुताबिक खांसी, गले में खराश, नाक बंद होना और थकान जैसे लक्षण केवल फ्लू में ही नहीं, बल्कि कई दूसरे सांस संबंधी संक्रमणों में भी हो सकते हैं। ऐसे में सिर्फ लक्षणों के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि मरीज H1N1 से संक्रमित है या नहीं।

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर फ्लू की पुष्टि के लिए जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इसके लिए रैपिड फ्लू टेस्ट के अलावा मॉलिक्यूलर टेस्ट भी उपलब्ध हैं। मॉलिक्यूलर टेस्ट वायरस के आनुवंशिक पदार्थ यानी वायरल RNA की पहचान करता है और आमतौर पर रैपिड एंटीजन टेस्ट की तुलना में ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।

हालांकि प्रत्येक मरीज के लिए जांच जरूरी नहीं होती। डॉक्टर मरीज के लक्षण, संक्रमण के संपर्क में आने की संभावना और उसकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए जांच की जरूरत तय करते हैं।

सांस लेने में दिक्कत हो तो तुरंत लें डॉक्टर की सलाह

विशेषज्ञों के मुताबिक बुखार न होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को फ्लू नहीं हो सकता। खासतौर पर बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में बिना बुखार के भी इन्फ्लुएंजा संक्रमण हो सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण गंभीर रूप भी ले सकता है।

यदि फ्लू जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हों, सांस लेने में परेशानी हो, अत्यधिक कमजोरी महसूस हो या हालत बिगड़ती नजर आए तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कुछ मरीजों में डॉक्टर की सलाह पर एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

संक्रमण फैलने के खतरे को भी समझें

H1N1 को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संक्रमित व्यक्ति को बीमारी का स्पष्ट पता चलने से पहले भी वायरस दूसरों तक पहुंच सकता है। संक्रमण के शुरुआती दिनों में इसके फैलने की संभावना अधिक रहती है।

इसलिए फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर केवल बुखार का इंतजार करना सही रणनीति नहीं है। खांसी, गले में खराश, नाक संबंधी परेशानी और असामान्य थकान जैसे संकेतों पर भी ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न माना जाए।

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बच्चे की हाइट नहीं बढ़ रही? सिर्फ खान-पान को न मानें वजह, इन संकेतों पर दें खास ध्यान

बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ उसकी लंबाई में भी बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन अगर उम्र के हिसाब से बच्चे की हाइट में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है, तो माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है। कई बार कम लंबाई का कारण आनुवंशिक होता है और बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहता है। वहीं, कुछ मामलों में धीमी ग्रोथ शरीर में पोषण की कमी, हार्मोनल समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य परेशानी का संकेत भी हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे की हाइट का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने दोस्तों या हमउम्र बच्चों से कितना छोटा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखना है कि बच्चे की ग्रोथ समय के साथ किस गति से हो रही है। यदि बच्चा लगातार अपनी सामान्य ग्रोथ रफ्तार से बढ़ रहा है, तो कम कद कई बार सामान्य शारीरिक विशेषता हो सकता है।

माता-पिता की हाइट का भी पड़ता है असर

बच्चे की लंबाई निर्धारित करने में आनुवंशिकता की बड़ी भूमिका होती है। यदि माता-पिता दोनों की लंबाई अपेक्षाकृत कम है, तो बच्चे की हाइट भी स्वाभाविक रूप से कम रह सकती है। ऐसे मामलों में बच्चा स्वस्थ होने के बावजूद अपने हमउम्र बच्चों की तुलना में छोटा नजर आ सकता है।

कुछ बच्चों में शारीरिक विकास और किशोरावस्था की शुरुआत थोड़ी देर से होती है। ऐसे बच्चों में बाद के वर्षों में ग्रोथ स्पर्ट देखने को मिल सकता है और वे आगे चलकर सामान्य लंबाई हासिल कर सकते हैं।

पोषण की कमी भी हो सकती है वजह

बच्चे के शारीरिक विकास के लिए पर्याप्त कैलोरी, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल जरूरी होते हैं। लंबे समय तक संतुलित आहार न मिलने की स्थिति में ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। आयरन, आयोडीन और विटामिन ए जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी सामान्य वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, बच्चे की हाइट कम देखकर अपने स्तर पर विटामिन या अन्य सप्लीमेंट शुरू करना उचित नहीं है। डॉक्टर बच्चे के खान-पान, विकास की रफ्तार और अन्य लक्षणों का आकलन करने के बाद ही किसी पोषक तत्व की कमी की जांच या सप्लीमेंट की सलाह देते हैं।

कुछ बीमारियों का संकेत भी हो सकती है धीमी ग्रोथ

अगर बच्चे की लंबाई बढ़ने की रफ्तार लगातार कम हो रही है, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य समस्या भी हो सकती है। सीलिएक डिजीज, लंबे समय तक रहने वाली आंतों या किडनी की बीमारी, एनीमिया और हड्डियों से जुड़ी कुछ समस्याएं बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा हाइपोथायरॉइडिज्म और ग्रोथ हार्मोन की कमी जैसी हार्मोन संबंधी परेशानियां भी धीमी ग्रोथ का कारण बन सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक स्थितियां भी बच्चे की लंबाई को प्रभावित करती हैं।

किन संकेतों को नजरअंदाज न करें?

यदि बच्चा लगातार अपनी उम्र के मुकाबले बहुत छोटा है या पहले की तुलना में उसकी ग्रोथ की रफ्तार कम हो गई है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। खासतौर पर हाइट कम होने के साथ वजन भी कम हो रहा हो या बच्चे को लंबे समय से पेट दर्द, दस्त, कमजोरी अथवा अत्यधिक थकान जैसी समस्याएं रहती हों, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।

डॉक्टर आमतौर पर बच्चे की ग्रोथ हिस्ट्री, माता-पिता की लंबाई, जन्म से जुड़ी जानकारी, खान-पान और अन्य लक्षणों का मूल्यांकन करते हैं। जरूरत पड़ने पर कुछ जांचों के जरिए धीमी ग्रोथ के वास्तविक कारण का पता लगाया जाता है।

हर छोटा कद बीमारी नहीं

सबसे जरूरी बात यह है कि कम हाइट को तुरंत किसी बीमारी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। कई स्वस्थ बच्चों की लंबाई आनुवंशिक कारणों से कम होती है। चिंता का मुख्य कारण तब होता है, जब बच्चे की ग्रोथ की रफ्तार लगातार धीमी हो रही हो या उसके साथ अन्य स्वास्थ्य संबंधी लक्षण भी दिखाई दे रहे हों।

इसलिए बच्चे की लंबाई को लेकर चिंता होने पर खुद से दवा या सप्लीमेंट देने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित और सही तरीका है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या बच्चे की ग्रोथ को लेकर चिंता होने पर योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

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डायबिटीज में सिर्फ दवा नहीं, डाइट भी जरूरी, इन चीजों का रखें खास ध्यान

डायबिटीज को नियंत्रित रखना सिर्फ दवाइयां लेने तक सीमित नहीं है। रोजाना की डाइट, खाने की मात्रा और भोजन का समय भी ब्लड शुगर मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभा सकते हैं। गलत खान-पान से ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ सकता है, जबकि संतुलित और पौष्टिक भोजन शरीर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की डाइट एक जैसी नहीं हो सकती। उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधि, दवाइयों और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर खान-पान की जरूरत बदल सकती है। इसलिए डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह लेना जरूरी है।

ब्लड शुगर कंट्रोल में डाइट क्यों है जरूरी?

डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। ऐसे में भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट का ब्लड ग्लूकोज पर सीधा असर पड़ सकता है। संतुलित डाइट न केवल ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद कर सकती है, बल्कि वजन, ब्लड प्रेशर और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी उपयोगी हो सकती है।

1. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और गुणवत्ता पर दें ध्यान

कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ सकता है। इसलिए डायबिटीज में केवल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसके स्रोत पर भी ध्यान देना चाहिए। साबुत अनाज, दालें, सब्जियां और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

2. मीठे और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड से दूरी

मिठाइयां, शुगर वाले पेय, मीठी ड्रिंक्स और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर मैनेज करना मुश्किल बना सकते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना और अतिरिक्त चीनी की मात्रा पर नजर रखना फायदेमंद हो सकता है।

3. खाने में फाइबर को बनाएं हिस्सा

फाइबर युक्त भोजन लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास दे सकता है। सब्जियां, दालें, फल और साबुत अनाज इसके अच्छे स्रोत हैं। डाइट में पर्याप्त फाइबर शामिल करने से अनावश्यक स्नैकिंग और ज्यादा खाने से बचने में भी मदद मिल सकती है।

4. प्रोटीन और हेल्दी फैट को न करें नजरअंदाज

डायबिटीज की डाइट का मतलब केवल चावल, रोटी या अन्य कार्बोहाइड्रेट कम करना नहीं है। दाल, बीन्स, अंडे, मछली, कम वसा वाले डेयरी उत्पाद, नट्स और बीज जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि, इनकी सही मात्रा व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।

5. भोजन का समय और मात्रा भी मायने रखती है

ब्लड शुगर मैनेजमेंट में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या खाया जा रहा है, बल्कि कितनी मात्रा में और किस समय खाया जा रहा है, यह भी मायने रख सकता है। खासतौर पर इंसुलिन या कुछ विशेष डायबिटीज दवाएं लेने वाले लोगों को बिना सलाह के भोजन छोड़ने या डाइट में अचानक बदलाव करने से बचना चाहिए।

डायबिटीज में इन बातों का रखें ध्यान
खाने की प्लेट में सब्जियों और फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को पर्याप्त जगह दें।
साबुत अनाज और दालों जैसे पौष्टिक विकल्पों को प्राथमिकता दें।
मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें।
भोजन की मात्रा पर नजर रखें और जरूरत से ज्यादा खाने से बचें।
शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त पानी पिएं।
नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
ब्लड शुगर की रीडिंग के आधार पर डाइट में बदलाव डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से ही करें।
जरूरी बात

डायबिटीज का प्रबंधन हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की डाइट को देखकर उसे अपनी दिनचर्या में लागू करना सही नहीं है। दवा, इंसुलिन या खान-पान में बदलाव विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। यह किसी चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है।

(साभार)


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