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शक्तिमान से लेकर रामायण तक, एक से बढ़कर एक कहानियाँ जिसने दूरदर्शन को बनाया ख़ास

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शक्तिमान से लेकर रामायण तक, एक से बढ़कर एक कहानियाँ जिसने दूरदर्शन को बनाया ख़ास

66 Years of Doordarshan: दूरदर्शन से जुड़ी हुई यादे कितनी पुरानी हो सकती है, 80’s-90’s का वो समय जब छत पर एंटीना हुआ करता और एक उसे ख़राब मौसम के बाद ठीक करने जाता। अब वो सब तो देखने को नहीं मिलता क्योंकि वो समय अब यादों में रह गया हैं। आज दूरदर्शन 66 साल पूरे कर चूका हैं जोकि अपने आप में एक गौरव का विषय हैं। रामायण महाभारत से लेकर ॐ नमः शिवाय का वो स्वर आज भी कई घरों में सुनाई देता होगा पर सबके मोबाइल फ़ोन में।

दूरदर्शन की स्थापना कब हुई? 

दूरदर्शन (डीडी) भारत का सार्वजनिक सेवा टेलीविजन प्रसारक है, जिसकी स्थापना 15 सितम्बर, 1959 में सरकार द्वारा की गई थी। इसका नाम दो हिंदी शब्दों ‘दूर’ और ‘दर्शन’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “दूर की झलक”। दूरदर्शन का संचालन और प्रबंधन प्रसार भारती द्वारा किया जाता है, जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन एक ऑटोनोमस आर्गेनाईजेशन है। अपनी स्थापना के बाद लंबे समय तक यह भारत का एकमात्र टेलीविजन चैनल रहा और लगभग 30 वर्षों तक दर्शकों को समाचार, शिक्षा, खेल, सांस्कृतिक और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम उपलब्ध कराता रहा। 1980 और 1990 के दशक में दूरदर्शन अपनी लोकप्रियता के चरम पर था और उस समय यह भारतीय घर-घर का अहम हिस्सा बन चुका था। वर्तमान में यह अपने 35 से अधिक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय उपग्रह चैनलों के माध्यम से देशभर में प्रसारण करता है और सार्वजनिक सेवा प्रसारण के क्षेत्र में अब भी अपनी अहम भूमिका निभा रहा है।

कौन कौन से सीरियल जिन्होंने छोड़ी एक गहरी छाप

चन्द्रमुखी जिसका फूल आज भी महकता हैं, चंद्रकांता की कहानी जो आज भी सदियों पुरानी हैं, जो कहूंगा सच कहूंगा का पत्थर पर लिखा हुआ वो नाम आज भी है, मैं बनूंगी एयर होस्टेस की वो उड़ाने हर घर में आज भी है जिंदा, ब्योमकेश बक्शी का वो जासूसी अंदाज, हम लोग एक मिडिल क्लास फैमिली के संघर्षो की कहानी, गली गली सिम के वो आनोखे करैक्टर, यहाँ के हम सिकंदर के वो प्रेरणा देते यूथ, सुपर हीरो शक्तिमान की वो सीख, रविवार की वो रंगोली जिसके गीत सुनने के लिए सभी इंतज़ार किया करते थे।

सभी एक से बढ़कर एक सीरियल जो हमेशा हम सभी के दिलों में जिंदा रहेंगे, वैसे तो दूरदर्शन आज भी हैं पर वो पुराने धारावाहिकों की यादें उन्हें आज भी एक खूबसूरत युग बनाता हैं।


UPI के नए नियम 15 सितंबर से हुए लागू, अब बड़े ट्रांजैक्शन करना हुआ आसान

UPI New Rules Start Today: आजकल एक रूपए का लेन देन हो या फिर लाखों का, हर कोई यूपीआई का इस्तमाल करता हुए नज़र आता हैं। इसी बीच अगर कोई बड़ा बदलाव होता है, तो हर कोई उसपर नजर बनाए रखता हैं। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों यूज़र्स के लिए एक बड़ी खबर है। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने UPI ट्रांजैक्शन लिमिट में बदलाव किए हैं, जो 15 सितंबर 2025 से लागू हो गए हैं। अब इंश्योरेंस, लोन EMI, कैपिटल मार्केट निवेश और ट्रैवल जैसी श्रेणियों में ग्राहक एक दिन में 10 लाख रुपये तक का भुगतान कर सकते हैं।

पर्सन टू मर्चेंट पर लागू होंगे बदला

यह बदलाव सिर्फ पर्सन टू मर्चेंट (P2M) पेमेंट्स पर लागू होंगे। व्यापारी व संस्थान को पेमेंट करते समय नई सीमा मान्य होगी। जबकि पर्सन टू पर्सन (P2P) ट्रांसफर की सीमा पहले जैसी ही 1 लाख रुपये प्रतिदिन रहेगी। हालांकि, बैंक अपनी रिस्क पॉलिसी के आधार पर इस लिमिट को और कम तय कर सकते हैं।

नए बदलाव एक नजर में

इंश्योरेंस प्रीमियम और कैपिटल मार्केट निवेश की सीमा को  2 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये प्रति ट्रांजैक्शन, दैनिक सीमा 10 लाख रुपये।

ट्रैवल बुकिंग और गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस पेमेंट्स, अब प्रति लेनदेन 5 लाख और प्रतिदिन 10 लाख रुपये तक।

लोन और EMI कलेक्शन, प्रति लेनदेन 5 लाख, जबकि दैनिक सीमा 10 लाख।

क्रेडिट कार्ड बिल पेमेंट अब एक बार में 5 लाख रुपये, दैनिक सीमा 6 लाख रुपये।

ज्वेलरी खरीदारी पर 1 लाख से बढ़ाकर 2 लाख रुपये, दैनिक सीमा 6 लाख।

बैंकिंग सेवाओं (जैसे टर्म डिपॉजिट्स डिजिटल ऑनबोर्डिंग) की अधिकतम राशि 5 लाख रुपये।

फॉरेक्स पेमेंट्स (BBPS के जरिए) अब सीमा 5 लाख रुपये तक।

NPCI ने कहा कि UPI अब छोटे भुगतानों से लेकर हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन्स तक हर जगह उपयोग में लाया जा रहा है। ऐसे में बाजार की मांग और डिजिटल लेनदेन की बढ़ती संख्या को देखते हुए नई लिमिट तय की गई है, ताकि बड़े लेनदेन भी बिना किसी दिक्कत के किए जा सकें।


हिंदी दिवस विशेष: हिंदी अभिव्यक्ति का माध्यम, मात्रभाषा और एक उम्मीद

Hindi Diwas Special: हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। आज यानी 14 सितम्बर को हर साल हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी हम बचपन से पढ़ते आए हैं, और हम में से कई लोगों का यह पसंदीदा विषय भी रहा है। सबसे अधिक अंक अगर किसी विषय में आते हैं तो ज्यदात्तर वह विषय हिन्दी ही होता है। हिन्दी दिवस पूरे भारतवर्ष में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। स्कूल, कॉलेज और कार्यालय परिसरों में हर जगह अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

दरअसल, 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया था कि हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाया जाए। उस समय यह माना गया कि भारत के अधिकांश क्षेत्रों में हिन्दी बोली और समझी जाती है, इसलिए इसे केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार करना उचित होगा। हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने के निर्णय को जन-जन तक पहुँचाने और इसके महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से वर्ष 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाने लगा।

हिन्दी दिवस की बात हो और हिन्दी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कवियों का नाम स्मरण न किया जाए, यह संभव नहीं है। हिन्दी साहित्य की अमूल्य रचनाओं के माध्यम से अनेक कवियों ने योगदान दिया है। इनमें विशेष रूप से कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, मलिक मुहम्मद जायसी, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और रामधारी सिंह दिनकर का नाम प्रमुख है।

आप सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। हिन्दी दिवस मनाने के कई तरीके हो सकते हैं, आप हिन्दी में एक कविता लिखकर खुद को या अपने घरवालों को सुना सकते हैं। विद्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा भी शुरू हो चुका होगा और यह लंबे समय तक चलेगा, तो क्यों न एक दिन खुद को पूरी तरह हिन्दी के रंग में रंग दिया जाए।


कौन हैं वह कवियत्री जिसे छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है?

अपने विषय में कुछ कहना पड़े बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि अपने दोष देखना आपको अप्रिय लगता है, और उनको अनदेखा करना औरों को,

युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए ही दण्ड देता आ रहा है,

मुझे तो उस लहर की सी मृत्यु चाहिए जो तट पर दूर तक आकर चुपचाप समुद्र में लौट कर समुद्र बन जाती है,

महादेवी वर्मा के कुछ शब्द चाहे फिर वो अपने विषय में कुछ कहना हो या पुरुष स्त्री पर उनके विचार या फिर जीवन के अटल सत्य पर बोली गयी उनकी बाते हो, सभी उनके व्यक्तित्व को ‘मोती सा पिरोते’ । महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की वो कवयित्री जिनके बिना छायावाद युग अधूरा हैं, हम जब ग्यारवी बारहवी में पढ़ा करते थे तो उनकी गद्य रचनाओं से  हम सभी रूबरू हुए ही हैं। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तरप्रदेश के फारुकाबाद जिले में हुआ था. हिन्दी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री और साहित्य की बहुआयामी हस्ती रही। उन्हें “आधुनिक मीरा” और “हिन्दी के विशाल मंदिर की सरस्वती” कहा गया। उनकी रचनाओं में स्त्री संवेदना, समाज सुधार और करुणा की गहरी छाप मिलती है।

हिंदी साहित्य का छायावाद युग

हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद युग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्वर्णिम युग माना गया है। यह काल 1918 से 1937 ई. तक का माना जाता है। इस युग ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की और हिंदी कविता को नई दिशा दी। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ हैं  जिनमे जयशंकर प्रसाद की कामायनी (महाकाव्य), “आँसू”, “झरना” आदि कृतियाँ। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अनामिका, परिमल, सरोज स्मृति आदि रचनाए व सुमित्रानंदन पंत की पल्लव, युगांत, गीतिहंस आदि। महादेवी वर्मा की नीहार, संध्या गीत, दीपशिखा, यामा आदि शामिल हैं।

गिल्लू और मेरा परिवार आज भी लोकप्रिय

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में ऐसी कोमलता और संगीतमयता दी जो पहले केवल ब्रजभाषा में संभव मानी जाती थी। उनके प्रमुख कविता संग्रह नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा ने उन्हें जन-जन की कवयित्री बना दिया। उनका गद्य-साहित्य भी उतना ही सशक्त है, जिसमें अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी और शृंखला की कड़ियाँ प्रमुख हैं। उनकी बाल कहानियाँ जैसे गिल्लू और मेरा परिवार आज भी बच्चों और बड़ों दोनों के बीच लोकप्रिय हैं।

महादेवी वर्मा ने की महिला शिक्षा की अगुवाई

केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि समाज सुधारक और महिला शिक्षा की अगुवाई करने वाली भी थीं। उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या और कुलपति के रूप में कार्य किया और महिलाओं के लिए शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं।

सादा और संयमित जीवन उनकी पहचान 

जीवनभर उन्होंने सादा, संयमित और तपस्विनी जीवन जिया। बाल विवाह के बावजूद उन्होंने अविवाहित की तरह जीवन बिताया और साहित्य, संगीत, चित्रकला तथा पशु-पक्षियों के प्रति अपार प्रेम समर्पित किया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) समेत हिन्दी साहित्य के लगभग सभी प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

महादेवी वर्मा का नाम भारतीय साहित्य में हमेशा याद किया जाएगा। वे सिर्फ संवेदनशील कवयित्री ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामाजिक जागरूकता की मजबूत आवाज भी थीं।


क्या ये बॉलीवुड फिल्मों के गाने हैं या सस्ता मनोरंजन, देखिए लिस्ट आप भी हो जाएंगे हैरान

हमारा भारत देश फिल्म इंडस्ट्री के लिहाज से बहुत विविध है और यहाँ कई तरह की फिल्में बनाई जाती हैं। बॉलीवुड, जो देश की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, हर साल यहाँ सैकड़ों फिल्में रिलीज़ होती हैं। इन फिल्मों में अलग-अलग शैलियों जैसे रोमांस, एक्शन, कॉमेडी, थ्रिलर और ड्रामा की भरमार रहती है। आजकल देखा जाए तो बॉलीवुड में अजीबोगरीब गानों का ट्रेंड बढ़ता जा रहा हैं।

आइए जाने वो गाने जिनकी लिरिक्स के न सर होते है न पैर:

मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैयां फेविकोल से

पल पल न माने टिंकू जिया, इश्क का मंजन घिसे है पिया

कांता बाई मेरे कमरे में चुपके चुपके आई, मैं तो कर रहा था पढाई क्यों आई क्यों आई

तेरे चुम्मे में चवनप्राश है, हां तेरे चुम्मे में चवनप्राश है

डोंट टच माय बॉडी मेरे सैयां

मार दे तू बंप पे लात

चुटकी जो तूने काटी है,जोरो से काटी है यहाँ वहां

मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए

कुछ गाने इतने अटपटे होते हैं कि उन्हें सुनते ही मन में सवाल उठता है, क्या वाकई लोग इन्हें सुनते हैं? क्या इन गानों का बनना जरुरी है या ये सिर्फ एक तरह का सस्ता मनोरंजन है, जो दर्शकों को परोसा जा रहा है।


कौन थे जिसने अपना जीवन पहाड़ो को किया समर्पित और कहा “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार”

‘जंगल की जिंदा पैदावार ऑक्सीजन है यानि प्राणवायु, फिर उसके बाद पानी है, फिर उसके बाद मिट्टी है, फिर उसके बाद खाना है, फिर उसके बाद पशुओं के लिए चारा हैं, फिर उसके बाद कपड़ा है, फिर उसके बाद औषधि है, फिर छाया है, यह सब जंगल की जिंदा पैदावार है और जब पेड़ मर जाए, जंगल ख़त्म हो जाए तो इसके बाद इधन और इमारते लकड़ी है’ “सुन्दरलाल बहुगुणा” 

चिपको आंदोलन के प्रणेता 

सुंदरलाल बहुगुणा का नाम विश्व पटल पर हमेशा याद रखा जाएगा, भारत और विश्व में पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया एक नाम है सुन्दरलाल बहुगुणा जिन्हें पेड़ो का मित्र भी कहा जाता हैं । उनका जन्म उत्तराखंड के टिहरी जिले में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन को प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित किया। सुन्दरलाल बहुगुणा को सबसे अधिक चिपको आंदोलन के लिए जाना जाता है, जिसमें ग्रामीण, खासकर महिलाएं  पेड़ों को गले से लगाकर कटने से रोकती थी । “चिपको” का अर्थ ही है “गले लगाना”। 

रक्षासूत्र बंधती थी महिलाएं

1970 के दशक में, उत्तराखंड में जंगल कटाई और भूस्खलन के बीच संबंध को देखते हुए उन्होंने और चंडी प्रसाद भट्ट ने ग्रामीणों को पेड़ों की रक्षा के लिए संगठित किया। इस आंदोलन में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुईं। वे बर्फ में चलकर लकड़हारे से औजार लेतीं और पेड़ों को बचाने के लिए रक्षासूत्र बांधतीं। चिपको आंदोलन ने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों में पर्यावरण संकट की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार”।

15 साल के प्रतिबंध को किया अनशन

एक दौर वो भी आया जब 1981 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने उत्तराखंड में वाणिज्यिक पेड़ों की कटाई पर 15 साल के प्रतिबंध के लिए अनशन किया। 1983 में उन्होंने हिमालय में 4,000 किलोमीटर की पदयात्रा कर पर्यावरणीय गिरावट की ओर ध्यान खींचा। सुन्दरलाल बहुगुणा गांधीवादी विचारों के समर्थक थे, सरल जीवन जीते थे और ऊर्जा संरक्षण और स्वावलंबन पर जोर दिया करते थे। उनका मानना था कि भारत को सौर, पवन और जल ऊर्जा से स्वच्छ और गैर-हिंसात्मक समाज की दिशा में बढ़ना चाहिए।

कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित 

सुन्दरलाल बहुगुणा को उनके कार्यों के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें 1981 में पद्म श्री, 2009 में पद्म विभूषण, 1984 में राष्ट्रीय एकता पुरस्कार और 2020 में विश्व गौरव सम्मान शामिल हैं। वे वृक्ष मित्र के रूप में भी जाने जाते थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं “धरती की पुकार” और ‘भू प्रयोग में: बुनियादी परिवर्तन की ओर’।

सुंदरलाल बहुगुणा का जीवन पेड़ों, जंगलों और पहाड़ों को समर्पित रहा। 21 मई 2021 को कोविड-19 के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके कार्य और विचार आज भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में प्रेरणा स्रोत हैं। बहुगुणा जी ने हमें यह सिखाया कि धरती का सम्मान करना मानवता की जिम्मेदारी है।


हर जीवन है अनमोल, यही सिखाता है विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस

World Suicide Prevention Day: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (World Suicide Prevention Day) हर साल 10 सितंबर को मनाया जाता है, जो हमें जीवन में हो रहे गंभीर बदलावों और मानसिक स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को समझने का अवसर देता है। साल 2024 से 2026 तक इसकी थीम “Changing the Narrative on Suicide” यानी आत्महत्या को लेकर सोच और बातचीत को बदलना हैं। यह दिन दुनिया भर में आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे पर जागरूकता फैलाने और इसके प्रति बनी सामाजिक झिझक को दूर करने को समर्पित है। इसका मुख्य संदेश है, कदम उठाएँ, उम्मीद जगाएँ जिससे आत्महत्या को रोका जा सकता है।

सही कदम बचाए जीवन 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतर्राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम संगठन (IASP) ने मिलकर 2003 में इस दिन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य आत्महत्या के मामलों को कम करना और लोगों को जागरूक करना था कि सही समय पर सही कदम उठाकर जीवन बचाया जा सकता है

40 सेकंड में जाती है एक जान 

हर साल लगभग 7 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। यानी हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान दे देता है। यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि परिवारों, समाज और समुदाय के लिए गहरा आघात है। ऐसे में यह दिन हमें याद दिलाता है कि बातचीत, समझ और सहयोग से इन मौतों को रोका जा सकता है।

जागरूकता अभियान एक पहल

इस दिन विभिन्न देशों में कार्यक्रम और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोग सोशल मीडिया पर #WSPD जैसे हैशटैग का इस्तेमाल कर संदेश फैलाते हैं, कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सत्र आयोजित किए जाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण—लोग एक-दूसरे की बातें ध्यान से सुनते हैं।

सामान्य बातचीत से रोकना संभव

विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या को रोका जा सकता है, यदि हम समय रहते मदद माँगने और देने की पहल करें। जरूरत है मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बातचीत का हिस्सा बनाने की।

सबकी होगी जिम्मेदारी तभी बनेगी बात 

आत्महत्या को रोका जा सकता है पर जिम्मेदारी सबको उठानी होगी व्यक्ति, परिवार, समुदाय और सरकार को मिलकर काम करना होगा। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच, परामर्श और इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर, संकट की घड़ी में मददगार साबित होती हैं। समुदाय में जागरूकता फैलाना, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कलंक को कम करना और खुली बातचीत को बढ़ावा देना बेहद ज़रूरी है। मीडिया की जिम्मेदार रिपोर्टिंग, घातक वस्तुओं तक पहुंच को कम करना और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करना आत्महत्या की आशंका को कम करने के प्रभावी उपाय हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम हुआ लागू

भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास करना अपराध माना गया है। इसमें दोषी पाए जाने पर एक वर्ष तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।  लंबे समय से इस धारा पर विवाद रहा है, क्योंकि मानसिक तनाव या बीमारी के कारण आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को अपराधी ठहराना कई विशेषज्ञों को सही नहीं लगा। 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (Mental Healthcare Act, 2017) लागू हुआ। इसके तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले को अब अपराधी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता की ज़रूरत वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। सरकार की ज़िम्मेदारी है कि ऐसे व्यक्ति को इलाज और पुनर्वास उपलब्ध कराए।

जीवन की उथल पुथल में हम एक दूसरे से बात करना ही छोड़ देते है, कभी कभी किसीको सुनना जरुरी होता हैं तो कभी किसीको ये बताना हम आपके साथ है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हमें यही सिखाता है कि हर जिंदगी अनमोल हैं।


अनोखेपन का जश्न है वंडरफुल वीर्डोज़ डे, जाने क्या कुछ हटके करे आज

मानव सभ्यता की शुरुआत से ही ऐसे लोग रहे हैं जो भीड़ से अलग दिखते हैं। थोड़ा हटकर सोचना, अलग अंदाज़ में जीना और सामान्य से अलग रहना ही उन्हें ‘वीर्डो’ बनाता है। हालांकि हर दौर में इन्हें सराहा नहीं गया। लेकिन सन 2000 में अमेरिका के टेक्सास राज्य के ऑस्टिन शहर के कुछ नागरिकों ने ठाना कि इन अनोखे और अजीबोगरीब लोगों के लिए भी एक दिन मनाया जाना चाहिए। वहीं से शुरुआत हुई “Wonderful Weirdos Day” की। इसका मूल नारा था,“Keep Austin Weird”। इस पहल को टॉम रॉय का भी सहयोग मिला और धीरे-धीरे यह दिन अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया।

कैसे बनाए वंडरफुल डे?

यह दिन खासतौर पर उन लोगों के लिए है, जिनकी परिभाषा में ‘नॉर्मल’ थोड़ा अलग होता है। इसे मनाने के कुछ मज़ेदार तरीके हो सकते हैं, अनोखे बनें इस दिन ज़रा हटके कपड़े पहनें, कुछ अजीब बोलें या फिर अलग अंदाज़ में चलें। जैसे नाचते-नाचते दफ़्तर पहुँचना या दोस्तों के साथ कोई अजीबोगरीब एक्ट करना।

ड्रेस कोड में बदलाव

धारीदार शर्ट के साथ पोल्का डॉट्स वाली स्कर्ट पहनना हो या किसी कॉमिक बुक कैरेक्टर जैसा लुक अपनाना, आज सब माफ है, आप शूट के साथ जूता पहने, शर्ट के साथ शोर्ट पहने, कुछ भीजो फैशन ट्रेंड से हटकर हो और आपको लगे कुछ तो अलग है।

कुछ अजीबोगरीब फ़िल्में देखे 

अजीबोगरीब किरदारों पर बनी फ़िल्में देखें, जैसे सस्ती दुल्हन महंगा दूल्हा ,जवानी की भूल, दो लड़के दोनों कड़के , एक से मेरा क्या होगा, अरविंद देसाई की अजीब दास्तां , लेडी किलर , उधार का सिंदूर, मुर्दे की जान खतरे में।

वीर्ड म्यूज़िक सुनें

व्हाई दिस कोलावेरी, कैंदी पो, ठा ठा करके, मेरे हसबैंड मुझे प्यार नहीं करते, क्या बनेंगे पोहे बनेंगे, मैं लड़की पो पो पो, तू लड़का पो पो पो,  ‘जैसे संगीत इस दिन को आपके लिए और परफेक्ट बना सकते है।

अनोखा खाना खाए

मेनू कार्ड में हमेशा ऐसी बहुत सारी डिश होती है जिसे आप मंगवाने से पहले थोड़ा सोचते है तो कभी-कभी स्वाद में भी कुछ हटकर हो जाए। वैसे तो भारतीय बहुत कुछ अनोखा बनाते हैं पर कुछ एक्सपेरिमेंटल डिश आप ट्राइ कर सकते है जो आपने पहले कभी खाई न हो।

दूसरे वीर्डोज़ को सराहे, किसी दोस्त को कार्ड दें, नोट लिखें या सोशल मीडिया पर उन्हें टैग करके बताएं कि उनकी अजीबो गरीब हरकते ही उन्हें खास बनाती है। “वंडरफुल वीर्डो डे’  हमें याद दिलाता है कि ‘अलग होना’ ही हमें वाकई में अनोखा और खास बनाता हैं।


खुद के लिए समय चुराना भी है एक कला, जाने कैसे व्यस्त रहकर भी चुने खुद को

आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हर कोई इतना व्यस्त है कि खुद के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सच तो यह है कि खुद के लिए कुछ पल चुराना भी एक कला है। अगर आप ऑफिस और काम की भागदौड़ के बीच सुकून की तलाश में हैं, और कहीं दूर जाना आपके लिए संभव नहीं है, तो आपके आसपास भी कई ऐसी जगहें हैं जो आपको राहत दे सकती हैं।

पास वाला पार्क 

आपको सुनकर थोड़ा अटपटा लगे, लेकिन ऑफिस या घर के पास बने पार्क में बैठना आपको बेहद सुकून दे सकता है। ताज़ी हवा, हरी भरी घास और बच्चों की खिलखिलाहट आपको तनाव से दूर कर देगी।

नजदीक वाला मंदिर

कभी-कभी घर लौटने का मन न हो तो मंदिर एक शांत कोना बन सकता है। वहाँ की शांति और सकारात्मक ऊर्जा मन को हल्का कर देती है।

ऑफिस ब्रेक में टहलना

काम के बीच थोड़ी देर टहलना बंदिशों के बावजूद दवा की तरह असर करता है। यह छोटा सा बदलाव आपके मूड को बेहतर कर देता है।

रास्ते की अनदेखी जगह 

कभी समय से पहले निकल आए तो रास्ते में कोई जगह दिखी, जो आज से पहले आपने देखी कई बार हो पर रुके नहीं हो,वह रूककर थोड़ा ठहरे, आपको अच्छा लगेगा।

मन में पसंदीदा जगह की कल्पना 

अगर कहीं जाना संभव न हो तो आँखें बंद कर अपनी पसंदीदा जगह की कल्पना करें। यह मानसिक यात्रा भी आपको ताज़गी और हल्कापन देगी।

इस तरह, ज़िंदगी की भागदौड़ के बीच भी सुकून पाने के ठिकाने दूर नहीं, बल्कि आपके आसपास ही छिपे होते हैं। ज़रूरत बस उन्हें तलाशने और कुछ पल खुद को देने की है।


भारतीय पत्रकारिता को क्यों मिला विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वाँ स्थान

भारत, जहाँ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वहाँ आज पत्रकारिता अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए जूझ रही है। हर साल रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया जाता है। इस साल भी 2 मई को RSF की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें भारत को 151वाँ स्थान मिला है। पिछले साल भारत 159वें और 2023 में 161वें स्थान पर था। हालांकि मामूली सुधार हुआ है, लेकिन भारत अब भी “बहुत गंभीर” श्रेणी में शामिल है। 180 देशों में 151वाँ स्थान हमे यहाँ सोचने पर मजबूर करता हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ की भारत इस स्तिथि में आ गया हैं। आइये जानते हैं रिपोर्ट में क्या सामने आया।

क्या होता हैं प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक ( Press Freedom Index ) सालाना आने वाली एक रैंकिंग है जो विभिन्न देशों में पत्रकारों और समाचार संगठनों की स्वतंत्रता की डिग्री का आकलन करती है। यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा प्रकाशित किया जाता है, जो पेरिस स्थित एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है। रैंकिंग में देशों का मूल्यांकन पाँच मानकों में किया जाता हैं, जिनमे राजनीतिक, आर्थिक, विधायी (किसी देश में पत्रकारिता और मीडिया से जुड़ी कानूनी व्यवस्था, नियम और नीतियाँ कितनी स्वतंत्रता देती हैं), सामाजिक और सुरक्षा शामिल है। इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति को उजागर करना और उन चुनौतियों को सामने लाना है जिनका सामना पत्रकारिता को करना पड़ रहा है।

टेक कंपनिया बन रही वजह

रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स ने बताया कि प्रेस स्वतंत्रता का वैश्विक परिदृश्य इस बार पहली बार “कठिन स्थिति” में दर्ज किया गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है आर्थिक दबाव। रिपोर्ट के अनुसार, गूगल, अमेज़न, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी टेक कंपनियाँ विज्ञापन राजस्व का बड़ा हिस्सा ले रही हैं, जिससे पारंपरिक पत्रकारिता कमजोर पड़ रही है।

बड़े उद्योगपतियों का बढ़ता दायरा 

भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जहाँ मीडिया स्वामित्व राजनीतिक और कारोबारी घरानों के हाथों में सिमट गया है। रिपोर्ट ने विशेष रूप से मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के मीडिया क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया। RSF ने कहा कि 2014 के बाद से भारत का मीडिया “अनौपचारिक आपातकाल” जैसी स्थिति में है, जहाँ बड़े घराने और सरकार के बीच नजदीकी संबंधों ने मीडिया बहुलता को खतरे में डाल दिया है।

भारत अपने पड़ोसी देशों से पीछे

भारत अपने कई पड़ोसियों से पीछे है। नेपाल 90वें, मालदीव 104वें और श्रीलंका 139वें स्थान पर हैं। हालांकि भारत भूटान (152), पाकिस्तान (158), म्यांमार (169) और चीन (178) से बेहतर स्थिति में है। नॉर्वे, एस्तोनिया और नीदरलैंड्स शीर्ष तीन देशों में शामिल हैं।

160 देशों को करना पड़ रहा हैं संघर्ष

RSF ने चेतावनी दी है कि दुनिया के 160 देशों में मीडिया आर्थिक स्थिरता पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अमेरिका, अर्जेंटीना और ट्यूनीशिया में भी स्थानीय पत्रकारिता पर संकट गहराता जा रहा है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक बताया गया है, खासकर गाज़ा में, जहाँ की स्तिथि बेहद संवेदनशील हैं।

प्रेस रिपोर्ट साफ करती है कि पत्रकारिता केवल राजनीतिक दबाव ही नहीं, बल्कि आर्थिक संकट से भी गहरे खतरे में है।


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