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न शर्म न हया- संविधान की रोज हत्या

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न शर्म न हया- संविधान की रोज हत्या

ओमप्रकाश मेहता
भारतीय आजादी के इस हीरक वर्ष में कभी ‘विश्वगुरू’ का दर्जा प्राप्त हमारा देश अब किसी का ‘शिष्य’ बनने के काबिल भी नही रहा है, यद्यपि हमारे भाग्यविधाता सत्तारूढ़ नेता विश्वभर में जाकर अपनी खुद की प्रशंसा करते नहीं थकते, किंतु वास्तव में हमारी स्थिति उस मयूर जैसी है जो प्रगति के बादल देखकर अनवरत् नाचता है और उपलब्धि के अभाव में बाद में आंसू बहाता है।

आजादी के बाद से हमारे देश में भी राजनीति के अलग-अलग दौर रहे है, जवाहरलाल के जमाने की राजनीति प्रगति की कल्पना पर आधारित थी तो इंदिरा के जमाने से सत्ता के लिए सब कुछ करने की राजनीति का दौर शुरू हो गया और उन्होंने अपनी कुर्सी की रक्षा के लिए आपातकाल जैसा कदम उठाया, किंतु आज की राजनीति उसे भी आगे निकल गई है और आज कुर्सी के खातिर संविधान को भी बख्शा नही जा रहा है और वह सब किया जा रहा है, जिससे कुर्सी बची रहे।

लेकिन सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि आजादी के बाद से अब तक सब कुछ बदला किंतु राजनैताओं की सोच और मतदाता की समझ में कोई बदलाव नही आया, आज के राजनेता आजादी के पचहत्तर साल बाद भी चुनाव की उसी लीक पर चल रहे है जो प्रथम चुनाव के समय 1951 में देखी गई थी, आज भी राजनीति वादों और आश्वासनों पर टिकी है और आज के आम मतदाता को राजनेता उसी 1951 वाली नजर से ही देखते है और वैसा ही सलूक करते है, कभी प्रगति और विकास के नाम पर मांगे जाने वाले वोट आज धार्मिक नारों के आधार मांगें जा रहे है, सत्तापक्ष भाजपा यदि आज ‘बंटेगें तो कटेगें’ का नारा लगा रहा है तो प्रतिपक्षी दल ‘जुड़ेगे तो जीतेगें’ को अपनी जीत का माध्यम बना रहा है, यद्यपि सत्ता व प्रतिपक्ष के इन दोनों का मतलब एक ही है, किंतु दोनों का अपने नारों पर विश्वास अलग है, किंतु दोनों के नारों का लक्ष्य वही एक ”कुर्सी’’ है।

यहां सबसे दु:खद यह है कि हमारे संविधान में साफ-साफ लिखा है कि धर्म को राजनीति से बिल्कुल अलग रखेगें, किंतु आज धर्म और राजनीति का इतना समागम कर दिया है कि अब वोटरों के लिए धर्म और राजनीति दोनों को ही सही अर्थों में समझना मुश्किल हो रहा है, किंतु किया क्या जाए? आज जब सत्ता की कुर्सी ही अहम् हो गई है और उसके लिए अपना सर्वस्व लुटा देने वाली राजनीति शुरू हो गई है, तो इसके सामने सभी तर्क और प्रयास गौंण हो गए है और सबसे अधिक चिंता और खेद की बात यह है कि हमारी नई पीढ़ी या भारत के भविष्य को भी इसी तरह की राजनीति का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जो चिंताजनक है।

और आज की सबसे बड़ी चिंता व फिक्र की तो यह बात है कि सत्ता की घुरी अर्थात् देश के आम मतदाता को तो उसके भाग्य पर छोड़ दिया है और पांच साल में एक बार लुभावने नारों के साथ उसका द्वार खटखटाया जाता है और फिर उसे भगवान के भरोसे छोडक़र आज की राजनीति के भगवान आराध्य देव की तरह साल में केवल चार महीनें नही बल्कि चार साल के लिए मुंह ढंक कर गहरी निद्रा में खो जाते है, हमारे आम मतदाता अपने जीवन के हर क्षेत्र में चाहे निपुण हो गया हो, किंतु राजनीतिक सोच और राष्ट्रऊ के प्रति कर्तव्य के मामले में आज भी शून्य ही है, हमारे मान्यवर राजनेताओं ने उसे अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक उलझनों में ऐसा उलझा कर रखा कि उसे अपने कर्तव्य, दायित्व या अधिकारों के बारे में सोचने-विचारने का वक्त ही नही दिया, वह चौबीसों घण्टें अपनी नीति जिन्दगी की सोच में ही डूबा रहता है।

इस तरह कुल मिलाकर आज की राजनीति से ‘जनसेवा’ का पूरी तरह लोप हो चुका है और वह पूरी तरह ‘स्व-सेवा’ बनकर रह गई है और देश व राष्ट्र तथा समाज के बारे में सोचने के लिए किसी के भी पास वक्त नही है।


आतंकवाद वर्तमान विश्व की एक बड़ी समस्या

बलबीर पुंज
एक हालिया पॉडकास्ट में बात करते हुए शिंदे ने कहा, उस समय रिकॉर्ड पर जो आया था, उन्होंने वही कहा था। यह उनकी पार्टी (कांग्रेस) ने उन्हें बताया था कि भगवा आतंकवाद हो रहा। उस समय पूछा गया था तो बोल दिया था भगवा आतंकवादज् यह गलत था। इसी पॉडकास्ट में शिंदे, दिसंबर 2001 के संसद आतंकवादी हमले के दोषी और फांसी पर लटकाए जा चुके जिहादी अफजल गुरु को आतंकी कहने से बचते भी नजर आए।

मिथक हिंदू/भगवा आतंकवाद’ सिद्धांत कितनी बड़ी साजिश थी, उसका फिर खुलासा पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के एक दावे से हो जाता है। एक हालिया पॉडकास्ट में बात करते हुए शिंदे ने कहा, उस समय रिकॉर्ड पर जो आया था, उन्होंने वही कहा था। यह उनकी पार्टी (कांग्रेस) ने उन्हें बताया था कि भगवा आतंकवाद हो रहा। उस समय पूछा गया था तो बोल दिया था भगवा आतंकवादज् यह गलत था। इसी पॉडकास्ट में शिंदे, दिसंबर 2001 के संसद आतंकवादी हमले के दोषी और फांसी पर लटकाए जा चुके जिहादी अफजल गुरु को आतंकी कहने से बचते भी नजर आए।

यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस में पार्टी का अर्थ गांधी परिवार (सोनिया-राहुल-प्रियंका) है। यह चिंतन उस मानसिकता की उपज है, जिसमें इस्लामी आतंकवाद को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जायज ठहराने के लिए हिंदू आतंकवाद’ रूपी छलावा खड़ा किया गया था। इस साजिश में वामपंथियों और कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी शामिल था।

शिंदे के हालिया कबूलनामे से वह कड़वा सच भी एकाएक ध्यान में आता है कि ज्ञान-विज्ञान और पराक्रम जैसे गुणों से सुशोभित होते हुए भी भारत मध्यकाल में लगभग 600 वर्षों तक मुस्लिम और फिर 200 सालों तक अंग्रेजों के अधीन क्यों हो गया था। इतिहास साक्षी है कि यदि व्यक्तिगत खुन्नस के कारण जयचंद, पृथ्वीराज चौहान को धोखा नहीं देता, तो विदेशी आक्रांता मुहम्मद गौरी नहीं जीतता। इसी तरह यदि शाह वलीउल्लाह मराठाओं के खिलाफ अफगान अब्दाली को भारत नहीं बुलाता और प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर यदि सिराजुद्दौला को न छलता, तो भारत में अंग्रेजी साम्राज्य संभवत: स्थापित ही नहीं होता। कांग्रेस नीत यूपीए (वर्तमान आईएनडीआईए) कार्यकाल में उसी काले इतिहास को दोहराया गया था।

व्यक्तिगत, राजनीतिक और वैचारिक विरोध के चलते हिंदू/भगवा आतंकवाद’ शब्दावली की रचना कर दुनिया में भारत, हिंदू समाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य संगठनों को कलंकित करने का जाल बुना गया। इसकी जड़े 1993 के मुंबई श्रृंखलाबद्ध (12) बम धमाके में मिलती है, जिसमें 257 निरपराध मारे गए थे। तब महाराष्ट्र के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री शरद पवार ने आतंकियों की मजहबी पहचान और उद्देश्य से ध्यान भटकाने हेतु झूठ गढ़ दिया कि 13वां’ धमाका मस्जिद के पास हुआ था। यह प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से हिंदुओं को आतंकवाद से जोडऩे का प्रयास था। इसी चिंतन को यूपीए-काल (2004-14) में राहुल गांधी के साथ पी।चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने बतौर केंद्रीय गृहमंत्री आगे बढ़ाया था।

हद तो तब हो गई, जब कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2008 के भीषण मुंबई 26/11 आतंकवादी हमले के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ बता दिया। यहां तक, दिग्विजय ने इसी हमले में जिहादियों की गोलियों के शिकार हुए मुंबई आतंक निरोधक दस्ते के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे की मौत को हिंदूवादी संगठनों से जोडऩे का प्रयास किया था। इस संबंथ में तब पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा हाथों में पवित्र कलावा/मौली को आधार बनाकर कई समाचारपत्रों में आलेख तक प्रकाशित हुए थे। सोचिए, यदि आतंकी कसाब और डेविड हेडली (दाऊद सैयद गिलानी) के जीवित नहीं पकड़े जाते, तो क्या होता?

वास्तव में, यह हिंसा-घृणा के पीडि़तों को अपराधी’ और दोषियों को मासूम’ बताने की सेकुलरवादी’ (लेफ्ट-लिबरल’ सहित) साजिश है। 14 फरवरी 1998 को कोयंबटूर में श्रंखलाबद्ध 12 बम धमाकों हुए थे, जिसमें 58 बेकसूरों की मौत हो गई। आतंकवादियों का मुख्य निशाना भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी थे, जिन्हें तब चुनाव प्रचार के हेतु कोयंबटूर आना था। परंतु विमान परिचालन में देरी से उनकी जान बच गई। तब कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व ने न केवल इन बम धमाकों का आरोप संघ पर लगा दिया, बल्कि यहां तक कह दिया— अगर बम भाजपा के अलावा किसी और ने लगाया होता, तो ऐसा करने वाले ने निश्चित रूप से आडवाणी को मार देते। इसी मामले में अदालत द्वारा सैयद अहमद बाशा, फखरुद्दीन, इमाम अली आदि दोषी ठहराए गए थे।

प्रधानमंत्री मोदी के दानवीकरण हेतु इस कुनबे ने फरवरी 2019 के भीषण पुलवामा आतंकवादी हमले, जिसमें 40 सुरक्षाबलों का बलिदान हुआ था— उसे भाजपा द्वारा प्रायोजित’ बताने का प्रयास किया था। ऐसा ही जहरीला नैरेटिव 27 अक्टूबर 2013 को बिहार के पटना में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में भी बनाया गया था। तब प्रसिद्ध गांधी मैदान में उस समय 5 धमाके किए गए थे, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) लगभग तीन लाख की जनसभा को संबोधित कर रहे थे। तब तत्कालीन सत्तारुढ़ कांग्रेस के बड़े नेताओं ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से धमाकों के लिए भाजपा को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इसी मामले में अदालत ने हैदर अली, नुमान अंसारी, मोजिबुल्लाह, इम्तियाज आलम आदि को दोषी पाया था।

इसी कुनबे ने यह भी आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री मोदी बीता लोकसभा चुनाव जीतने के लिए अयोध्या स्थित राम मंदिर पर पुलवामा जैसा आतंकवादी हमला करा सकते है। वास्तव में, यह नैरेटिव 500 वर्ष पश्चात पुनर्निर्मित राम मंदिर पर प्रबल संभावित जिहादी हमले होने की स्थिति में न केवल हिंदुओं को लांछित करने, अपितु असली दोषियों को मासूम बताने के अग्रिम उपक्रम का भाग है। यह कोई पहली बार नहीं है। भडक़ाऊ भाषणों के लिए कुख्यात और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपी अब्दुल नासिर मदनी को जेल से बाहर निकालने हेतु वर्ष 2006 में होली की छुट्टियों के दिन— 16 मार्च को केरल विधानसभा में विशेष सत्र बुलाकर कांग्रेस और वामपंथियों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। ऐसी ही हमदर्दी यह समूह इशरतजहां, याकूब मेमन, अफजल गुरु, बुरहान वानी और आदिल अहमद डार जैसे घोषित आतंकवादियों के प्रति भी दिखा चुका है।

आतंकवाद वर्तमान विश्व की एक बड़ी समस्या है और भारत सदियों से इसका शिकार। इसके खिलाफ सभ्य समाज को हर हाल में लड़ाई को जीतनी होगी। यदि हम इसी तरह आतंकवाद के वास्तविक पीडि़तों को ही अपराधी’ बताते रहे, तो क्या हम इसके असली गुनाहगारों को सुरक्षित मार्ग’ प्रदान नहीं कर रहे? ऐसी स्थिति में क्या भारत, आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई जीत सकता है?


आंखों के आगे इतिहास

हरिशंकर व्यास
हां, आंखों देखा इतिहास! ऐतिहासिक मोड़ पर है मौजूदा सिरमौर सभ्यता अमेरिका। वह इस सप्ताह अपने हाथों अपनी सभ्यता का इतिहास बनाएगी। अमेरिकी मतदाता तय करेंगे कि वे अपने सभ्यतागत मूल्यों और सांचे की निरंतरता में कमला हैरिस को जिताते हैं या वैयक्तिक तानाशाही जिद्द वाले डोनाल्ड़ ट्रंप को जिताते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का अर्थ अमेरिका में विभाजन, संस्थाओं के पतन की गारंटी है। और जब कोई सभ्यता घर में विभाजित होती है तो उसकी ताकत, एकता, बुद्धि सब धरी रह जाती है। दो खेमों में विभाजित देश फिर धर्म, नस्ल, धन और अहंकार की आपसी लड़ाई का अखाड़ा होता है। ज्योंहि ऐसा हुआ त्योंहि सभ्यता को खत्म करने की ताक में बैठी बर्बर नस्ल और धर्म के लिए मौका खुलता है।

आज इस मौके की ताक में चीन है तो पुतिन और इस्लाम भी है। इन तीनों के इरादे आंखों के आगे लाइव उपस्थित हैं। सोचें, जिस अमेरिका ने इस सदी के आरंभ में, 9/11 के बाद आतंकवाद (इस्लाम) के खिलाफ वैश्विक जंग का हुंकारा मारा था, वह भटका हुआ है और उसकी जगह वह इजराइल इस्लाम को ठोक रहा है, जिसके नेता नेतन्याहू बिना इस समझ के क्रूरता दर्शा रहे हैं कि वे बंधकों को छुड़वा रहे हैं, बदला ले रहे हैं, देश को सुरक्षित बना रहे हैं या क्रूसेड है? मेरा मानना है इजराइल का ठोकना इस्लाम को और जिद्दी बनाना है? इसके नतीजे उलटे और उग्र होंगे। उस नाते यहूदियों और ईसाईयों दोनों की नासमझी है जो वे अपने जिद्दी भाई (अब्राहम की संतान, इस्लाम) को अपने मूल धर्म में लौटाने, उनकी घर वापसी की नहीं सोचते, बल्कि ठोक-ठोक कर तीसरे महायुद्ध, सभ्यतागत संघर्ष का पानीपत मैदान बना दे रहे हैं। इस्लाम की लाइव ठुकाई के फोटो इस्लाम को सुलगाने वाले हैं। निश्चित ही अतीत में इस्लाम की क्रूर तलवार और क्रूसेड़ के दृश्य आज के मुकाबले बेइंतहा खौफनाक थे। मगर पहले और दूसरे महायुद्ध के क्रम में यदि तीसरे महायुद्ध का सिनेरियो बन रहा है तो वह इस कारण पूरी पृथ्वी के लिए घातक होना है क्योंकि अब परमाणु हथियारों के जखीरे की वास्तविकता भी है।

इसलिए यहूदी बनाम मुसलमान, ईसाई बनाम इस्लाम, इजराइल बनाम ईरान, अमेरिका बनाम चीन, यूक्रेन बनाम रूस, उत्तर कोरिया बनाम दक्षिण कोरिया आदि की हकीकत का कुल सार आमने सामने की सीधी लड़ाई के पाले बनना है। हर पक्ष की जिद्द खूंखार होती हुई है। एक तरफ अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता तथा ईसाई और यहूदी हैं तो दूसरी और चीन है। फिर इस्लाम (जो इजराइल की ठुकाई से चीन-रूस से जुड़ता हुआ है) है। चीनी नेता बोलते नहीं हैं। न राष्ट्रपति माओ, देंग शियाओ पिंग भड़भडिय़ा नेता थे और न शी जिनफिंग हैं। ये चीनी नेता अतीत के अपने गौरव हान सभ्यता की वैश्विक पताका में चीन की श्रीवृद्धि के राष्ट्रवादी हैं। इनके लिए याकि मौजूदा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की ठोस पूंजी (रूसियों की तरह) क्रूर, कठोर, परिश्रमी चाइनीज जनता है। जिसका कभी भी लोकतंत्र, मानवीय मूल्यों, स्वतंत्रता से सरोकार नहीं रहा है। तभी माओ की क्रांति हो या देंग और शी जिनफिंग के वैश्विक कारखाने, अमीरतम बनने का मिशन, सभी में नेतृत्व, पार्टी और जनता ने एकनिष्ठता से काम किया है। उसके लिए असुरी महाशक्ति बनना मुश्किल नहीं था।

इसका लक्ष्य अब अमेरिका व पश्चिम सभ्यता की जगह अपने झंडे, अपनी व्यवस्थाओं में दुनिया को चलाना है। राष्ट्रपति शी जिनफिंग और उनके रणनीतिकारों ने चुपचाप बिसात बिछा दी है। चीन का लक्ष्य अमेरिका की जगह लेना है। एशिया का अधिपति होना है। चीन के लिए भारत, जापान, दक्षिण एशिया, ताइवान, आसियान देशों का जीरो अर्थ है। इसलिए क्योंकि ज्योंहि अमेरिका का पतन हुआ, दुनिया की उसकी चौधराहट छूटी या उसने छोड़ी तो पलक झपकते ये तमाम छोड़े बड़े देश चीन की कॉलोनी होंगे। यों भी दक्षिण या तीसरी दुनिया के ये देश आर्थिक तौर पर चीन से बंधे, उस पर आश्रित हैं। उधर परोक्ष तौर पर चीन ने रूस या पाकिस्तान के मार्फत मध्य एशिया के सभी इस्लामी देशों के अलावा अफगानिस्तान के तालिबान, ईरान और उन सब मुस्लिम देशों का विश्वास जीत लिया है जो इजराइल के हाथों घायल हैं।
अपनी इस ग्रैंड योजना, वैश्विक बिसात में चीन किस शातिरता से फैसले करते हुए है इसका प्रमाण ब्रिक्स की हालिया शिखर बैठक थी। राष्ट्रपति शी जिनफिंग और पुतिन ने बैठक में तुर्की के उन राष्ट्रपति एर्दोआन को बुलाया जो उइगर मुसलमानों के उत्पीडऩ के हवाले चीन के खिलाफ बोलते थे। एर्दोआन को शी और पुतिन ने पटा लिया है।

वे इनसे वैसे ही संतुष्ट हैं, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में यह हल्ला बनवाते हुए हैं कि कितनी बड़ी कूटनीतिक जीत हुई जो चीन ने लद्दाख में अपनी सेना पीछे की। भारत भी चीन के साथ बहुपक्षीय विश्व बनाने की और बढ़ता हुआ है। अर्थात भारत और चीन भाई भाई तथा अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता की दादागिरी के खिलाफ विश्व राजनीति में हिंदू राष्ट्र की भी एक अलग स्वतंत्र ढपली व विश्व व्यवस्था। और हम दक्षिण ब्लॉक, गुटनिरपेक्ष जमाने के देशों और परंपरागत मित्र रूस तथा चीन के हमराही हैं! बहरहाल, लाइव इतिहास फिलहाल अमेरिका बनाम चीन तथा यहूदी बनाम इस्लाम की जोर आजमाइश व परिवर्तनों का है। इसका एक अनहोना फोटो चीन और रूस द्वारा ठेठ यूरोप की सीमा पर बर्बर उत्तर कोरियाई सैनिकों को पहुंचा देना है। कल्पना करें डोनाल्ड ट्रंप जीते और उन्होंने यूक्रेन की मदद रोक कर रूस से समझौते का दबाव बनाया तो पुतिन के हौसले कितने बुलंद होंगे? रूसी-उत्तरी कोरियाई सेना के तब जश्न के फोटो यूरोपीय संघ पर कैसा प्रभाव बनाएंगे? ईरान के हौसले बुलंद होंगे या कम होंगे? हालांकि डोनाल्ड ट्रंप को ईरान विरोधी तथा नेतन्याहू परस्त माना जाता है लेकिन व्यक्तिवादी नेता ने यदि खुमैनी के घर जा कर पकौड़े खाने तथा अपने को अमनपरस्त बनाने की ठानी तो उसके गिरगिटी व्यवहार में रंग तो बदलते ही रहेंगे।

असल बात डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से विभाजित अमेरिका, विभाजित पश्चिमी बिरादरी की है। इसके सिनेरियो में चीन के लिए स्वर्णिम मौका बनेगा। वह अमेरिका को रिप्लेस कर अपने को नई विश्व व्यवस्था, नई मौद्रिक वित्तीय व्यवस्था का संचालक बनने की और बढ़ेगा। पृथ्वी की धुरी होने के हान सभ्यता के इलहाम को वास्तविकता के पंख लगेंगे। आर्थिक-सैनिक-राजनीतिक ताकत में सिरमौर होने का मौका खुलेगा।
सो, आंखों के आगे तीसरे महायुद्ध व सभ्यताओं के संघर्ष की अग्रिम झांकी है वही पृथ्वी के इतिहास का मोड़ भी है। इस सप्ताह स्पेन के वेलेंसिया में आठ घंठे की बारिश का वीडियो दहला देने वाला था। जलवायु परिवर्तन और विनाश की और बढ़ती पृथ्वी की सेहत की वह झांकी थी। वेलेंसिया विकसित देश का संपन्न इलाका है। इसलिए जलवायु परिवर्तन, बाढ़ या सूखे के एक्स्ट्रीम अनुभव में वेलेंसिया के फोटो में पानी में बही कारों का जो अंबार व कबाड़ दिखा वह चेतावनी है कि इलाका कितना ही समर्थ क्यों न हो प्रकृति के विनाश में किसी के बचने के अवसर नहीं हैं। इस साल भारत, दक्षिण एशिया में भी अतिवर्षा, बाढ़, गर्मी का एक्स्ट्रीम था लेकिन हम क्योंकि आदि हैं तो दिल-दिमाग वैसे विचलित नहीं हुआ जैसे वेलेंसिया के अनुभव से यूरोप विचलित है। सभी देख-जान-समझ रहे हैं कि पृथ्वी ऐसी ही यदि गर्म होती गई तथा जलवायु परिवर्तनों के अनुभवों में मानवता को हर समय जूझते रहना पड़ा तो सदी के आखिर में कहां पहुंचे हुए होंगे, लेकिन बावजूद इसके गंभीर कोई नहीं है!

दूसरी तरफ यह लाइव इतिहास भी है कि अतंरिक्ष यान वैसे ही उड़ और लैंड करने लगे हैं, जैसे एक हवाई जहाज करता है। एआई मानव बुद्धि को रिप्लेस कर रही है। विज्ञान ऐसी दवाईयां बना रहा है जिनसे मनुष्य शरीर आगे डायबिटीज, हार्ट, प्रोस्टेट, मोटापे, मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाएगा। लोगों को कमाई करने की जरूरत ही नहीं होगी। यूनिवर्सल इनकम की सुकून भरी जिंदगी में मनुष्य को सिर्फ अपने शगल, मौज-मस्ती में जीना है। वे सब काम रोबो और एआई करेंगे, जिन्हें मनुष्य करता हुआ है।

सोचें, कैसे दो एक्स्ट्रीम हैं। एक तरफ शी जिनफिंग, पुतिन, नेतन्याहू, डोनाल्ड ट्रंप, खुमैनी जैसों की जाहिल जिद्द लाइव है, प्राकृतिक आपदाएं हैं तो दूसरी और ज्ञान-विज्ञान के वे सत्य शोध हैं, जिससे मनुष्य के लिए अंतरिक्ष भी खुलता हुआ है!


कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार

अनिल चतुर्वेदी
कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार होती दिख रही है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में हार की बजह टटोलने के लिए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे जो तीन सदस्यीय टीम बनाई उसमें शामिल नेता शायद ऐसा ही जबाव अपने नेता को देने की तैयारी में हैं। यह अलग बात है कि इस फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग कमेटी में हरियाणा के पूर्व सीएम और इस चुनाव का सारा दारोमदार संभालने वाले भूपेन्द्र सिंह हुड्डा शामिल नहीं किए गए हैं।पर जिन्हें जि़म्मेदारी दी गई है उनके नाम उजागर भले नहीं किए गए हैं पर कांग्रेसी सूत्र बता रहे हैं कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ के जो दो नेता जाँच के लिए हरियाणा भेजे गए उन्हें ज़मीनी स्तर पर लोगों से इस हार के कारणों को टटोलने के निर्देश दिए गए हैं।

पर भला हार की इस निराशा में नेताओं की कितनी हिम्मत रहेगी घर-घर घूम कर हार की बाबत लोगों से पूछने की और सवाल उम्र का भी है सो आराम भी ज़रूरी होगा ही। तभी अगर दिल्ली के कांग्रेसी ही यह कहने लगें कि फ़ैक्ट्री पता करने गए ये दो नेता होटल में ठहर मोबाइल या फिर फ़ोन पर लोगों से बात कुछ पूछने के नाम पर यह पूछ रहे हों कि कि क्या हम ईवीएम की बजह से हारे हैं। तो नेता पर शक तो कोई भी कर ही सकता है ना! तब भला फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग का मतलब भी क्या रह जाता है। अब भला हरियाणा हार का घूँट तो कांग्रेसी पाकर रह जाएंगे पर चिंता तो बाक़ी उन सूबों की सता रही है जहां हरियाणा हार का असर पड़ता कांग्रेसियों को दिख रहा है। भला होता कि गुटबाज़ी छोड़ कांग्रेसी हरिया जीतते और फिर बाक़ी सूबों में सीना तान कर चुनाव लड़ रहे होते।

हरियाणा में जीत और जम्मू-कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन से भाजपा ही नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्साहित हैं। और तभी अब संघ महाराष्ट्र या झारखंड के चुनाव के लिए ही नहीं दिल्ली चुनाव को जीतने की तैयारी में लगा बताया जा रहा है। पिछले दिनों संघ की रणथंभोर में हुई दो दिन की बैठक हुई बैठक से दिल्ली के नेता खुश हैं। यह अलग बात है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की लोकसभा चुनावों के दौरान संघ को लेकर बयानबाज़ी से संघ के नेता नाराज़ बताए जा रहे थे पर हरियाणा की जीत ने इस नाखुशी को ख़त्म कर दिया ।चर्चा तो यह भी बताई जा रही है कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को लेकर भी संघ अब दखल देने की जगह खुद को अलग रखे हुए हैं।

भाजपा के ही कुछ नेतो यहाँ कह रहे हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की संघ को लेकर बयानबाज़ी के बाद संघ के मोंहन भागवत की नाराजग़ी के बावजूद जानते थे कि उनकी यह नाराजग़ी हरियाणा चुनाव में जीत के बाद ख़त्म हो जाएगी ,और हुआ भी ऐसा ही। संघ के ही एक अदने क़द के नेता तो यह भी कहने नहीं चूके कि संघ जानता है कि मोदी है तो मुमकिन है। ज़ाहिर है कि 2025 में विभिन्न राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर संघ तैयारी में लग गया है। बताया तो यह भी जा रहा है कि रणथंभोर में हुईसंघ की मीटिंग में ही दिल्ली चुनाव को लेकर भाजपा विधायकों,सांसदों और प्रांत व विभाग प्रमुखों को चुनावों की तैयारी में लग जाने को कह दिया है। दिल्ली के वरिष्ठ भाजपा विधायक की मानो तो संघ और पार्टी इस बार किसी भी शर्त पर दिल्ली का अपना वनबास ख़त्म करना चाहती है। अब संघ के बूते भाजपा क्या कर गुजरती है देखना बाक़ी है।

भाजपा दिल्ली की सत्ता के लिए बेताब हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता में बैठी आप पार्टी के अलावा कांग्रेस से चुनौती मिलनी है। दिल्ली के बदलते हालातों को देख भाजपा को आप पार्टी कमजोर होती दिख रही है। पार्टी के कई नेता मान बैठे हैं कि आप का मुस्लिम और दलित वोट आप से खिसक कर कांग्रेस की ओर जा सकता है ऐसे में इन दोनों पार्टियों के बीच वोटों की खींचातानी से भाजपा को राजनीतिक तौर पर फ़ायदा हो सकेगा। और तभी भाजपा इस चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती है। अब अगर कोई यह मान रहा हो कि भाजपा की यह रणनीति लोकसभा चुनाव के बाद बनी है तो ऐसा भी नहीं है। भाजपाई सूत्र मानते हैं कि लोकसभा चुनावों में टिकट बँटवारे के पहले ही भाजपा दिल्ली को लेकर चिंतित थी। और तभी उसने अपने सात में से छह सांसदों के टिकट काट नए चेहरे मैदान में उतारे। और सभी जीते भी। पर इनमें से तीन सांसदों को विधानसभा चुनावों उतारे जाना तय माना जा रहा है ।

इनमें रमेश बिधूडी ,प्रवेश वर्मा,और मीनाक्षी लेखी शामिल बताए जा रहे हैं। अब भले बाक़ी पूर्व सांसदों पर पार्टी दांव लगती है या नहीं यह अलग बात है पर चर्चा तो है कि इन तीनों को चुनाव की तैयारी शुरू करने के लिए भी कह दिया गया है। दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल फऱवरी 2025 तक है। यानी चुनाव इसके बाद ही होने हैं। सत्ता में बैठी आप पार्टी ने चुनावी तैयारी एक हफ़्ते पहले ही से की हुई है। कांग्रेस ने ब्लाक और जि़ला स्तर पर संगठन को मज़बूत करना शुरू कर दिया है। तो भाजपा पीछे भी कैसे रहती सो उसने भी जिताऊ नेताओं से तैयारी का इशारा किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें बेख़ौफ़ जीती हैं सो हौसला उसका भी कोई कम बुलंद नहीं है। मुक़ाबला तिकोना होना है। तीनों पार्टियों में इस बार घमासान है।


ब्रिक्स में मोदी के रुख अहम और विचारणीय

हरिशंकर व्यास
लाख टके का सवाल है कि भारत का रूपया चीन की युआन, रूस के रूबल करेंसी के लेन-देन में सुरक्षित है या डालर की व्यवस्था में? आजादी के बाद विश्व व्यापार में भारत का डालर में लेन-देन क्या भरोसेमंद या सुरक्षित था या नहीं? और यदि सुरक्षित था तो वह क्यों चीन-रूस की युआन-रूबल की नई विश्व लेन-देन व्यवस्था का ग्राहक या साझेदार बने? क्या चीनी वर्चस्वता की व्यवस्था में भारत की व्यापारिक-आर्थिक संप्रभुता को अधिक गांरटी होगी? यह सवाल कजाक की ब्रिक्स बैठक में पुतिन, शी जिन पिंग के एजेंडे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूख में अंहम और विचारणीय है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने मिसाल दी कि रूस और चीन अब अपना 95 प्रतिशत व्यापार रूबल और युआन में कर रहे है। उन्हे अमेरिकी डालर केंद्रीत अंतरराष्ट्रीय लेन देन व्यवस्था, स्विफ्ट की जरूरत नहीं है।

सवाल है पुतिन को ऐसी लॉबिग करने की जरूरत क्यों है? इसलिए क्योंकि यूक्रेन की लड़ाई के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर पाबंदियां लगाई है। वही चीन अपने आर्थिक साम्राज्य, भविष्य की सभ्यतागत धुरी के उद्देश्यों में, दुनिया के स्थाई नबर एक औद्योगिक कारखाने, व्यापार की नंबर एक हैसियत में स्वभाविक तौर पर सालों से चाह रहा है कि वैश्विक लेनदेन में डालर की जगह उसकी युआन करेंसी का उपयोग हो।
कजाक की ब्रिक्स बैठक का यह प्रमुख उद्देश्य था। लेकिन गनीमत है जो भारत और ब्राजिल चीन के असली मकसद (वर्चस्वता) को लेकर सर्तक है। चीन ने पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ( बीआरआई) और अब ब्रिक्स के नाम पर नई वैश्विक वित्तिय व्यवस्था का तानाबाना बनाया है। भारत उससे बचता, दूर रहता दिख रहा है। और यह सही है। कोई हर्ज नहीं है जो दो देश अपनी-अपनी करेंसी में एक-दूसरे याकि द्विपक्षीय आधार पर व्यापार करें। रूस और भारत में दशकों रूबल और रूपए में लेनदेन रहा है।

अभी भी है। लेकिन भारत कैसे चीनी करेंसी युआन की प्राथमिकता में अपना लेनदेन बना सकता है? रूस, चीन, पाकिस्तान जैसे मवाली देशों की करेंसियों के एक्सचेंज में रूपए को क्यों बांधे? पहली बात इन करेंसियों में वैश्विक पैमाने की संपदा और लेनदेन नहीं है। दूसरे रूस और चीन जब व्यवहार में मवालीपना, देशों की एकता-अखंडता में हमलावर, वर्चस्ववादी, आंतकवाद के पोषक तथा हवाला लेन-देन वाले है तो इनकी टोकरी में अपने रूपए को रख भारत कितनी जोखिम मोल लिए हुए होगा? चीन और रूस नियंत्रित किसी भी सिस्टम में पारदर्शिता क्या हो सकती है, इसे समझना मुश्किल नहीं है।

हकीकत है कि एक योरोपीय देश बेल्जियम से संचालित अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम की पारदर्शिता पर कभी ऊंगली नहीं उठी। इसकी करेंसी डालर है। इसलिए आंतकवाद, रूस-चीन-पाकिस्तान जैसे मवाली देशों के दो नंबरी या आंतकवादी फंडिग की लेन-देन का पता लग जाता है। कल्पना करें, इसकी जगह मास्को या बीजिंग में युआन करेंसी के अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम में काम हुआ तो उससे भारत क्या आंतकी फंडिग का सही ब्यौरा पा सकेगा? यह एक्सचेंज रूपए की रेट में उतार-चढ़ाव में लगड़ी मारते हुए क्या नहीं होगा? अन्य शब्दों में नए अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम में भारत के लिए सुरक्षा, भरोसे, पारदर्शिता की क्या गारंटी है? सही है मौजूदा स्विफ्ट व्यवस्था में डालर के कारण अमेरिका का रूतबा है।

अमेरिका और पश्चीमी देश हमलावर रूस पर पाबंदी लगाते है या आंतकवादी संगठनों के खिलाफ जंग का ऐलान करते है तो रूस और आंतकी संगठनों की सचमुच कमर टूटती है लेकिन उससे भारत को नुकसान है या लाभ? क्या भारत को सीमा पर चीन, पाकिस्तान के मवालीपने का अनुभव नहीं है? क्या आंतकियों का उसे स्थाई खतरा नहीं है? फिर इस सत्य की भी कैसे अनदेखी हो सकती है कि विश्व व्यापार का अस्सी प्रतिशत लेनदेन, बिलिंग डालर में हो रही है वहीं दुनिया भर के बैंकों का विदेशी मुद्दा कोष 60 प्रतिशत डालर करेंसी में रिजर्व है।
इसलिए अच्छा हुआ, जो कजाक में पुतिन-शी जिन पिंग के वेकल्पिक अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्साह नहीं दिखाया।


सोने की लगातार बढ़ती चमक

सतीश सिंह
मार्च 2019 से मार्च 2024 के दौरान सोने की कीमत में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।  मौजूदा परिदृश्य में यह दिसंबर तक 80 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर सकता है।  एक जनवरी 2024 को 24 कैरेट 10 ग्राम सोने की कीमत 63,352 रुपये थी, जो 79,710 रुपये के स्तर पर है।  सोने की कीमत में निरंतर वृद्धि होने के कारण सितंबर में वैश्विक बाजार में सोने का औसत दैनिक कारोबार 18 लाख करोड़ रुपये हो गया था, जो अप्रैल 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत कम है, पर 2023 के औसत 13. 6 लाख करोड़ रुपये से 32. 51 प्रतिशत अधिक है।

वैश्विक आर्थिक माहौल के नरम रहने, कुछ देशों में मंदी की आशंका, लंबे समय से भू-राजनीतिक संकट कायम रहने, अमेरिका के फेडरल रिजर्व द्वारा 18 सितंबर को नीतिगत दरों में 0.50 आधार अंकों की कटौती करने आदि के कारण निवेशकों का भरोसा डॉलर पर से उठ रहा है और लोग सोने में निवेश करना बेहतर समझ रहे हैं।  भारत में लंबे समय से नीतिगत दरों में बदलाव नहीं किया गया है, जिससे बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थानों में जमा पर ब्याज दर कम है।  तो, निवेशक अधिक प्रतिफल के लिए सोने में निवेश कर रहे हैं।

कीमत बढ़ने से इसके प्रतिफल में भी तेजी आयी है।  निवेशकों को एक सप्ताह में 0. 2 प्रतिशत, एक महीने में 0. 4 प्रतिशत, 2024 में 21 प्रतिशत, एक साल में 30 प्रतिशत और तीन सालों में 62 प्रतिशत का प्रतिफल मिला है।  भारतीय मानक ब्यूरो ने 14, 18, 22, 23 और 24 कैरेट से बने आभूषणों का 2022 से हॉलमार्किंग कर रखा है।  आगामी जनवरी से केंद्र सरकार आभूषण निर्माण में इस्तेमाल होने वाली हॉलमार्किंग को अनिवार्य करने जा रही है, जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है।  हॉलमार्किंग को लेकर बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है।

हॉलमार्क अनिवार्य होने से आभूषणों की शुद्धता सुनिश्चित करना संभव हो सकेगा।  इससे यह भी पता चल सकेगा कि पहले और आभूषण बनने के बाद सोने की गुणवत्ता कितनी प्रभावित हुई है, जिससे निवेशकों को बेहतर प्रतिफल मिलने में मदद मिलेगी।  वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, स्विट्जरलैंड ने मई 2024 में दुनिया में सबसे अधिक 2,461 करोड़ रुपये का सोना खरीदा, जबकि चीन ने 2,109 करोड़ रुपये का।  भारत 722 करोड़ रुपये की खरीद के साथ तीसरे स्थान पर रहा।  बीते पांच वित्त वर्षों में भारत ने अपने सोने की जमा में लगभग 204 टन की बढ़ोतरी की है।  मार्च 2019 में 618. 2 टन सोना भारतीय रिजर्व बैंक में जमा था, जो 31 मार्च 2024 को 33 प्रतिशत बढ़कर 822. 1 टन हो गया।  इसमें से 408. 3 टन देश में और 413. 8 टन विदेश में जमा था।

सोने के भंडार के मामले में अमेरिका 8,133. 46 टन के साथ दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि जर्मनी 3,352. 65 टन सोना के साथ दूसरे स्थान पर।  इटली 2,451. 84 टन के साथ तीसरे स्थान पर है।  फिर फ्रांस, रूस, चीन, स्विट्जरलैंड, जापान, भारत और नीदरलैंड जैसे देशों का स्थान है, जो वैश्विक स्तर पर क्रमशः पांचवें, छठवें, सातवें, आठवें, नौवें और दसवें स्थान पर हैं।  यह एक स्थापित और जगजाहिर तथ्य है कि सोने का महत्व अतुलनीय है।  यदि किसी देश की मुद्रा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होती है, तो सोने का भंडार उस देश की क्रय शक्ति और आर्थिक स्थिरता को बनाये रखने में प्रमुखता से मदद करता है।

वर्ष 1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में थी और उसके पास आयात करने के लिए पर्याप्त मात्रा में डॉलर नहीं थे, तो भारत ने सोने को गिरवी रखकर पैसे जुटाये थे और एक गंभीर आर्थिक संकट से बाहर निकलने में सफल रहा था।  यदि किसी देश के पास पर्याप्त सोने का भंडार है, तो उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत माना जाता है।  इससे यह भी पता चलता है कि वह देश अपनी अर्थव्यवस्था प्रबंधन अच्छी तरह से कर रहा है।  दूसरे देश और वैश्विक वित्तीय संस्थान भी ऐसे देश पर ज्यादा भरोसा करते हैं।  इस तरह, सोने का भंडार किसी भी देश की मुद्रा की कीमत का समर्थन करने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करता है।

भारत में सोने का महत्व आदिकाल से बना हुआ है और मौजूदा परिप्रेक्ष्य और आने वाले दिनों में भी इसकी मांग में कमी आने के आसार नहीं हैं।  भारतीय रिजर्व बैंक और दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा अधिक खरीद करने के कारण भी सोने की कीमत में इजाफा हुआ है।  देश में सोने की खरीद-फरोख्त और सोने की हॉलमार्किंग करने के कारण निवेशकों का सोने में निवेश करने के प्रति भरोसा बढ़ रहा है, जिसके कारण भी सोने की कीमत में वृद्धि हो रही है।  निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि सोना देश के वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में निवेशकों को आकर्षक प्रतिफल दे रहा है एवं वैश्विक स्तर पर प्रमुख देशों की अर्थव्यवस्था के नरम रहने, डॉलर में कमजोरी आने, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक संकट के बने रहने, महंगाई से पूरी तरह से राहत नहीं मिलने, सोने की मांग लगातार बढ़ने आदि कारकों के कारण हाल-फिलहाल में सोने की कीमत कम नहीं होने वाली है।


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