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कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार

कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार

कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार

अनिल चतुर्वेदी
कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार होती दिख रही है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में हार की बजह टटोलने के लिए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे जो तीन सदस्यीय टीम बनाई उसमें शामिल नेता शायद ऐसा ही जबाव अपने नेता को देने की तैयारी में हैं। यह अलग बात है कि इस फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग कमेटी में हरियाणा के पूर्व सीएम और इस चुनाव का सारा दारोमदार संभालने वाले भूपेन्द्र सिंह हुड्डा शामिल नहीं किए गए हैं।पर जिन्हें जि़म्मेदारी दी गई है उनके नाम उजागर भले नहीं किए गए हैं पर कांग्रेसी सूत्र बता रहे हैं कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ के जो दो नेता जाँच के लिए हरियाणा भेजे गए उन्हें ज़मीनी स्तर पर लोगों से इस हार के कारणों को टटोलने के निर्देश दिए गए हैं।

पर भला हार की इस निराशा में नेताओं की कितनी हिम्मत रहेगी घर-घर घूम कर हार की बाबत लोगों से पूछने की और सवाल उम्र का भी है सो आराम भी ज़रूरी होगा ही। तभी अगर दिल्ली के कांग्रेसी ही यह कहने लगें कि फ़ैक्ट्री पता करने गए ये दो नेता होटल में ठहर मोबाइल या फिर फ़ोन पर लोगों से बात कुछ पूछने के नाम पर यह पूछ रहे हों कि कि क्या हम ईवीएम की बजह से हारे हैं। तो नेता पर शक तो कोई भी कर ही सकता है ना! तब भला फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग का मतलब भी क्या रह जाता है। अब भला हरियाणा हार का घूँट तो कांग्रेसी पाकर रह जाएंगे पर चिंता तो बाक़ी उन सूबों की सता रही है जहां हरियाणा हार का असर पड़ता कांग्रेसियों को दिख रहा है। भला होता कि गुटबाज़ी छोड़ कांग्रेसी हरिया जीतते और फिर बाक़ी सूबों में सीना तान कर चुनाव लड़ रहे होते।

हरियाणा में जीत और जम्मू-कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन से भाजपा ही नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्साहित हैं। और तभी अब संघ महाराष्ट्र या झारखंड के चुनाव के लिए ही नहीं दिल्ली चुनाव को जीतने की तैयारी में लगा बताया जा रहा है। पिछले दिनों संघ की रणथंभोर में हुई दो दिन की बैठक हुई बैठक से दिल्ली के नेता खुश हैं। यह अलग बात है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की लोकसभा चुनावों के दौरान संघ को लेकर बयानबाज़ी से संघ के नेता नाराज़ बताए जा रहे थे पर हरियाणा की जीत ने इस नाखुशी को ख़त्म कर दिया ।चर्चा तो यह भी बताई जा रही है कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को लेकर भी संघ अब दखल देने की जगह खुद को अलग रखे हुए हैं।

भाजपा के ही कुछ नेतो यहाँ कह रहे हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की संघ को लेकर बयानबाज़ी के बाद संघ के मोंहन भागवत की नाराजग़ी के बावजूद जानते थे कि उनकी यह नाराजग़ी हरियाणा चुनाव में जीत के बाद ख़त्म हो जाएगी ,और हुआ भी ऐसा ही। संघ के ही एक अदने क़द के नेता तो यह भी कहने नहीं चूके कि संघ जानता है कि मोदी है तो मुमकिन है। ज़ाहिर है कि 2025 में विभिन्न राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर संघ तैयारी में लग गया है। बताया तो यह भी जा रहा है कि रणथंभोर में हुईसंघ की मीटिंग में ही दिल्ली चुनाव को लेकर भाजपा विधायकों,सांसदों और प्रांत व विभाग प्रमुखों को चुनावों की तैयारी में लग जाने को कह दिया है। दिल्ली के वरिष्ठ भाजपा विधायक की मानो तो संघ और पार्टी इस बार किसी भी शर्त पर दिल्ली का अपना वनबास ख़त्म करना चाहती है। अब संघ के बूते भाजपा क्या कर गुजरती है देखना बाक़ी है।

भाजपा दिल्ली की सत्ता के लिए बेताब हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता में बैठी आप पार्टी के अलावा कांग्रेस से चुनौती मिलनी है। दिल्ली के बदलते हालातों को देख भाजपा को आप पार्टी कमजोर होती दिख रही है। पार्टी के कई नेता मान बैठे हैं कि आप का मुस्लिम और दलित वोट आप से खिसक कर कांग्रेस की ओर जा सकता है ऐसे में इन दोनों पार्टियों के बीच वोटों की खींचातानी से भाजपा को राजनीतिक तौर पर फ़ायदा हो सकेगा। और तभी भाजपा इस चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती है। अब अगर कोई यह मान रहा हो कि भाजपा की यह रणनीति लोकसभा चुनाव के बाद बनी है तो ऐसा भी नहीं है। भाजपाई सूत्र मानते हैं कि लोकसभा चुनावों में टिकट बँटवारे के पहले ही भाजपा दिल्ली को लेकर चिंतित थी। और तभी उसने अपने सात में से छह सांसदों के टिकट काट नए चेहरे मैदान में उतारे। और सभी जीते भी। पर इनमें से तीन सांसदों को विधानसभा चुनावों उतारे जाना तय माना जा रहा है ।

इनमें रमेश बिधूडी ,प्रवेश वर्मा,और मीनाक्षी लेखी शामिल बताए जा रहे हैं। अब भले बाक़ी पूर्व सांसदों पर पार्टी दांव लगती है या नहीं यह अलग बात है पर चर्चा तो है कि इन तीनों को चुनाव की तैयारी शुरू करने के लिए भी कह दिया गया है। दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल फऱवरी 2025 तक है। यानी चुनाव इसके बाद ही होने हैं। सत्ता में बैठी आप पार्टी ने चुनावी तैयारी एक हफ़्ते पहले ही से की हुई है। कांग्रेस ने ब्लाक और जि़ला स्तर पर संगठन को मज़बूत करना शुरू कर दिया है। तो भाजपा पीछे भी कैसे रहती सो उसने भी जिताऊ नेताओं से तैयारी का इशारा किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें बेख़ौफ़ जीती हैं सो हौसला उसका भी कोई कम बुलंद नहीं है। मुक़ाबला तिकोना होना है। तीनों पार्टियों में इस बार घमासान है।


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