Drop Us An Email Any Enquiry Drop Us An Emailshailesh.lekhwar2000@gmail.com
Call Us For Consultation Call Us For Consultation +91 9818666272

क्या वजन घटाने के लिए खाना कम कर देना काफी है, आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

Category Archives: फिटनेस

क्या वजन घटाने के लिए खाना कम कर देना काफी है, आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

आज की बदलती जीवनशैली में मोटापा एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। यह समस्या अब केवल उम्रदराज़ लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चे, युवा और कामकाजी वर्ग भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहा है। मोटापा न सिर्फ शारीरिक बनावट को प्रभावित करता है, बल्कि हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है।

वजन घटाने के लिए लोग अक्सर बिना सही जानकारी के कठोर डाइट, जरूरत से ज्यादा व्यायाम या गलत उपाय अपनाने लगते हैं, जिससे लाभ की जगह नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापे को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जिन पर आंख बंद कर भरोसा करना सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है।

यदि सही जानकारी के साथ संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाया जाए, तो मोटापे से बचाव संभव है। आइए जानते हैं मोटापे से जुड़ी कुछ आम मिथक और उनके पीछे का सच।

मिथ: मोटापा केवल जंक फूड खाने से होता है

यह मानना पूरी तरह सही नहीं है। असंतुलित आहार मोटापे का एक कारण जरूर है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। आनुवांशिक कारण, शारीरिक गतिविधियों की कमी, नींद पूरी न होना, मानसिक तनाव और लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना भी मोटापे के जोखिम को बढ़ाते हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग घंटों मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का उपयोग करते हैं, उनमें शारीरिक निष्क्रियता बढ़ जाती है, जिससे वजन तेजी से बढ़ने लगता है।

मिथ: वजन घटाने के लिए खाना कम कर देना ही काफी है

मोटापा कम करने के लिए केवल खाना छोड़ देना या बहुत कम खाना समाधान नहीं है। शरीर को सही मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि सबसे प्रभावी उपाय है।
दिन में कम से कम 30 मिनट टहलना, योग या हल्का व्यायाम करना और पौष्टिक भोजन लेना वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है।

मिथ: मोटापे से ग्रस्त हर व्यक्ति को डायबिटीज हो जाती है

मोटापा टाइप-2 डायबिटीज का एक जोखिम कारक जरूर है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर मोटे व्यक्ति को मधुमेह हो ही जाए। कई लोग मोटापे के बावजूद स्वस्थ रहते हैं, जबकि कुछ सामान्य वजन वाले लोगों को भी डायबिटीज हो सकती है। स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर मोटापा और डायबिटीज दोनों के खतरे को कम किया जा सकता है।

मिथ: अगर परिवार में मोटापा है तो आपको भी होगा

आनुवांशिकता का प्रभाव जरूर पड़ता है, लेकिन यह तय नहीं करता कि आपको मोटापा होगा ही। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में मोटापे का इतिहास रहा है, उन्हें अपने आहार और दिनचर्या को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है। सही आदतें अपनाकर मोटापे के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।
(किसी भी बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।)

(साभार )


घुटनों का दर्द और अकड़न? जानिए गठिया के कारण और घरेलू इलाज

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, गलत खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता ने जोड़ों से जुड़ी बीमारियों को तेजी से बढ़ा दिया है। कभी केवल उम्र बढ़ने से जुड़ी मानी जाने वाली गठिया (Arthritis) की समस्या अब युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है। जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज जब धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है, तो हड्डियां आपस में टकराने लगती हैं, जिससे घुटनों में दर्द, सूजन और अकड़न की शिकायत शुरू हो जाती है। सुबह उठते समय, लंबे समय तक बैठने के बाद या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते समय यह दर्द और अधिक परेशान करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में यूरिक एसिड का बढ़ना, ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, मोटापा और पोषक तत्वों की कमी भी गठिया को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण हैं। यदि शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो स्थिति धीरे-धीरे गंभीर हो सकती है और चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है। हालांकि, समय रहते जीवनशैली में सुधार, संतुलित आहार और कुछ प्राकृतिक उपाय अपनाकर जोड़ों के दर्द को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

गठिया में राहत देने वाले असरदार घरेलू मसाले

रसोई में मौजूद कुछ सामान्य मसाले गठिया के दर्द में रामबाण की तरह काम कर सकते हैं। हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन सूजन को कम करने वाला शक्तिशाली तत्व है, जो जोड़ों की अकड़न और दर्द को घटाने में मदद करता है। रोजाना गुनगुने दूध में हल्दी मिलाकर पीने से सूजन कम होती है। वहीं, अदरक का सेवन शरीर में सूजन पैदा करने वाले तत्वों को कम करता है और जोड़ों की कार्यक्षमता को बेहतर बनाता है। अदरक का काढ़ा या चाय नियमित रूप से लेने से आराम महसूस होता है।

मालिश और तेल से कैसे बढ़ेगा जोड़ों का लचीलापन?

नियमित तेल मालिश गठिया के मरीजों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है। मालिश से प्रभावित हिस्से में रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे जकड़न और दर्द में राहत मिलती है। लहसुन को सरसों के तेल में पकाकर उससे घुटनों की मालिश करना एक पुराना और असरदार घरेलू उपाय है। इसके अलावा जैतून का तेल और अरंडी का तेल भी सूजन कम करने में सहायक होते हैं। तेल की गर्माहट मांसपेशियों को आराम देती है और जोड़ों को लचीला बनाए रखने में मदद करती है।

खान-पान और व्यायाम में जरूरी बदलाव

गठिया से पीड़ित लोगों को अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे अखरोट, अलसी और मछली सूजन को कम करने में मदद करते हैं। इसके साथ ही हल्का और नियमित व्यायाम बेहद जरूरी है। तैराकी, योग और साइकिलिंग जैसे लो-इम्पैक्ट एक्सरसाइज जोड़ों पर अधिक दबाव डाले बिना उन्हें मजबूत बनाते हैं। वजन नियंत्रित रखना भी आवश्यक है, क्योंकि अतिरिक्त वजन सीधे घुटनों पर दबाव डालता है। रातभर भिगोए हुए मेथी दानों का पानी पीना यूरिक एसिड को संतुलित रखने में सहायक माना जाता है।

क्या रखें सावधानी?

यदि घुटनों में लगातार दर्द, अत्यधिक सूजन या जोड़ों से आवाज आने लगे, तो इसे नजरअंदाज न करें। घरेलू उपायों के साथ-साथ समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद जरूरी है। योग, संतुलित आहार और अनुशासित दिनचर्या अपनाकर लंबे समय तक जोड़ों को स्वस्थ रखा जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी उपचार को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

(साभार)


अचानक खड़े होते ही चक्कर आना? यह कमजोरी नहीं, हो सकता है किसी गंभीर बीमारी का संकेत

अक्सर लोग सोकर या लंबे समय तक बैठने के बाद जैसे ही अचानक खड़े होते हैं, तो आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है या सिर घूमने लगता है। अधिकांश लोग इसे कमजोरी, थकान या नींद पूरी न होने का असर मानकर टाल देते हैं। लेकिन चिकित्सकीय दृष्टि से यह स्थिति केवल सामान्य नहीं, बल्कि शरीर के भीतर चल रही किसी गड़बड़ी का संकेत भी हो सकती है। मेडिकल भाषा में इसे ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन कहा जाता है, जिसमें खड़े होते ही रक्तचाप अचानक गिर जाता है।

जब व्यक्ति अचानक खड़ा होता है, तो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से रक्त तेजी से पैरों की ओर चला जाता है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर का नर्वस सिस्टम तुरंत प्रतिक्रिया देता है—हृदय की धड़कन बढ़ाकर और रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर मस्तिष्क तक रक्त प्रवाह बनाए रखता है। लेकिन जब यह तंत्र सही ढंग से काम नहीं करता, तो कुछ क्षणों के लिए मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे चक्कर, धुंधलापन या बेहोशी जैसी स्थिति बन जाती है।

अचानक चक्कर आने के पीछे क्या हो सकते हैं चिकित्सीय कारण?

विशेषज्ञों के अनुसार खड़े होने पर चक्कर आने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे आम कारण डिहाइड्रेशन यानी शरीर में पानी की कमी है। इसके अलावा एनीमिया (खून की कमी), विटामिन B12 की कमी, लो ब्लड शुगर, या लंबे समय से ली जा रही ब्लड प्रेशर की दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं।
कुछ मामलों में हृदय संबंधी समस्याएं, हार्ट वाल्व की खराबी या नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारियां भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकती हैं।

क्या यह दिल या नर्वस सिस्टम की गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है?

डॉक्टरों का कहना है कि यदि यह समस्या बार-बार हो रही है, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। बार-बार चक्कर आना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर का बैरोरिफ्लेक्स सिस्टम, जो रक्तचाप को नियंत्रित करता है, सही से काम नहीं कर रहा।

यह स्थिति दिल की धड़कन में अनियमितता, नसों की क्षति या पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी की शुरुआती चेतावनी भी हो सकती है। खासतौर पर बुजुर्गों में इसके कारण अचानक गिरने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे गंभीर चोट या जान का जोखिम भी हो सकता है।

इस समस्या से बचाव के लिए अपनाएं ये आसान उपाय

इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए जीवनशैली में कुछ बदलाव बेहद कारगर साबित हो सकते हैं—

धीरे उठें: बिस्तर से उठते समय पहले कुछ देर बैठें, फिर धीरे-धीरे खड़े हों

पर्याप्त पानी पिएं: दिनभर शरीर को हाइड्रेट रखें, जरूरत पड़ने पर इलेक्ट्रोलाइट्स लें

नमक का संतुलन: डॉक्टर की सलाह से आहार में नमक की मात्रा संतुलित रखें

नियमित व्यायाम: पैरों की मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम करें, जिससे रक्त संचार बेहतर हो

शरीर के संकेतों को हल्के में न लें

अचानक आने वाले चक्कर को मामूली समझकर नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर समस्या का कारण बन सकता है। यदि सावधानियां बरतने के बावजूद चक्कर आना बंद न हो, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करें। चिकित्सक जरूरत पड़ने पर टिल्ट टेबल टेस्ट, ब्लड टेस्ट या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं।
याद रखें, शरीर समय-समय पर संकेत देता है—उन्हें समझना और समय पर कदम उठाना ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

(साभार)


सुबह पेट साफ नहीं होता? रात की ये गलत आदतें बन रही हैं कब्ज की सबसे बड़ी वजह

बदलती जीवनशैली और अनियमित दिनचर्या के चलते कब्ज (कॉन्स्टिपेशन) आज एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि दिनभर की भागदौड़ के बीच लोग रात के समय की छोटी-छोटी आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसका सीधा असर पाचन तंत्र पर पड़ता है। यही लापरवाही धीरे-धीरे कब्ज, गैस, एसिडिटी और अन्य पाचन संबंधी परेशानियों को जन्म देती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रात का समय शरीर की प्राकृतिक सफाई और डिटॉक्स प्रक्रिया के लिए बेहद अहम होता है। इस दौरान आंतों की सक्रियता बनी रहती है, जिससे सुबह पेट साफ होने की प्रक्रिया सुचारू रहती है। लेकिन देर रात भारी भोजन, पानी की कमी और तुरंत सो जाने जैसी आदतें इस प्रक्रिया को बाधित कर देती हैं। इससे आंतों में नमी कम होने लगती है और मल सख्त हो जाता है।

आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि यदि रात में पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला जाए, तो पेरिस्टालसिस की गति धीमी पड़ जाती है। इसका परिणाम सुबह पेट साफ न होने के रूप में सामने आता है, जो लंबे समय में बवासीर, क्रोनिक कब्ज और सूजन जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रात के समय की कुछ गलत आदतें सीधे मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करती हैं। इनमें देर रात तला-भुना या भारी भोजन करना, पर्याप्त पानी न पीना, भोजन के तुरंत बाद सो जाना और रात में चाय या कॉफी जैसे कैफीन युक्त पेय का सेवन शामिल है। ये आदतें आंतों की कार्यक्षमता को कमजोर कर देती हैं।

यदि ये गलतियां लंबे समय तक जारी रहती हैं, तो आंतों की दीवारें अपनी लचीलापन खोने लगती हैं। इससे क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन की स्थिति बन जाती है, जिसमें शरीर से विषैले तत्व बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे टॉक्सिन्स रक्त में मिलकर त्वचा संबंधी समस्याएं, लगातार थकान और सिरदर्द जैसी दिक्कतें पैदा कर सकते हैं। साथ ही आंतों में संक्रमण और सूजन का खतरा भी बढ़ जाता है।

कब्ज से बचाव के लिए विशेषज्ञ सोने से पहले कुछ सावधानियां अपनाने की सलाह देते हैं। रात के भोजन में फाइबर युक्त आहार जैसे सलाद, सब्जियां या दलिया शामिल करना चाहिए। भोजन के बाद हल्की सैर या कम से कम 100 कदम चलना पाचन क्रिया को सक्रिय रखता है। इसके अलावा सोने से पहले एक गिलास गुनगुना पानी पीना आंतों को हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है। भोजन और नींद के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर रखना भी जरूरी बताया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कब्ज कोई असाध्य बीमारी नहीं, बल्कि शरीर की ओर से दी गई चेतावनी है। यदि समय रहते अपनी रात की दिनचर्या में सुधार कर लिया जाए, तो न केवल कब्ज से राहत मिल सकती है, बल्कि ऊर्जा स्तर और मानसिक शांति में भी सुधार होता है। एक स्वस्थ पाचन तंत्र ही स्वस्थ शरीर और संतुलित जीवन की नींव माना जाता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जानकारियों पर आधारित है।

(साभार)


बिना जिम के वजन घटाने का आसान तरीका, डॉक्टर ने बताया फॉर्मूला

वजन घटाने को लेकर आमतौर पर लोगों के मन में जिम, कठिन एक्सरसाइज और सख्त डाइट की तस्वीर उभरती है, लेकिन मशहूर चिकित्सक डॉ. मल्हार गणला ने इस सोच को चुनौती दी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में उन्होंने दावा किया है कि सही पोषण और जीवनशैली में छोटे बदलाव अपनाकर बिना भारी वर्कआउट के मात्र ढाई महीने में 10 किलो तक वजन कम किया जा सकता है।

डॉ. गणला का कहना है कि वजन बढ़ने और घटने की प्रक्रिया केवल एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह शरीर के अंदर पोषक तत्वों के संतुलन और रोजमर्रा की आदतों से जुड़ी होती है। गलत डाइट और भूखे रहने की आदत मेटाबॉलिज्म को कमजोर कर देती है, जिससे वजन घटने के बजाय बढ़ने लगता है।

जिम न जा पाने वालों के लिए राहत की खबर

यह तरीका खासतौर पर उन लोगों के लिए कारगर बताया जा रहा है, जो व्यस्त दिनचर्या या समय की कमी के कारण जिम नहीं जा पाते। डॉक्टर ने तीन बुनियादी सिद्धांत बताए हैं, जिन्हें अपनाकर शरीर को प्राकृतिक रूप से फैट बर्न करने की स्थिति में लाया जा सकता है।

भूख को दबाने की बजाय समझने की सलाह

डॉ. गणला के अनुसार, वजन घटाने की शुरुआत भूख को मारने से नहीं, बल्कि उसे समझने से होती है। जब शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते, तो वह बार-बार खाने के संकेत देता है। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने ओमेगा-3 और 6, विटामिन D, विटामिन K2, मैग्नीशियम और रोजाना मल्टीविटामिन लेने की सलाह दी है। उनका दावा है कि इससे शरीर की न्यूट्रिएंट की कमी पूरी होती है और अनावश्यक खाने की इच्छा कम हो जाती है।

बाहर का खाना छोड़ना है जरूरी

वजन घटाने का दूसरा अहम नियम है बाहर के जंक और प्रोसेस्ड फूड से दूरी। डॉक्टर का कहना है कि घर का बना संतुलित भोजन न केवल सुरक्षित होता है, बल्कि यह मेटाबॉलिज्म को स्थिर रखने में भी मदद करता है। ऑफिस या बाहर जाते समय घर से खाना लेकर निकलने की आदत वजन घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

शुरुआती दौर में भारी एक्सरसाइज से परहेज

डॉ. गणला का सुझाव है कि शुरुआती ढाई महीनों तक भारी जिम वर्कआउट करने की जरूरत नहीं होती। इस दौरान हल्की वॉक, सीढ़ियों का इस्तेमाल और योग जैसे सूर्य नमस्कार पर्याप्त हैं। जब शरीर इन बदलावों के साथ तालमेल बिठा ले, तब एक्सरसाइज को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है।

स्वस्थ और स्थायी वजन घटाने का संदेश

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह तरीका “क्रैश डाइट” और जरूरत से ज्यादा कसरत के खतरों से बचाता है। सही पोषण, संतुलित भोजन और नियमित दिनचर्या अपनाकर वजन घटाना न केवल आसान बनता है, बल्कि लंबे समय तक बना भी रहता है।

नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार के सप्लीमेंट या डाइट प्लान को अपनाने से पहले चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है।

(साभार)


युवाओं में क्यों बढ़ रही घुटनों और जोड़ों के दर्द की समस्या, आइये जानते हैं इसके कारण

बदलती जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों में कमी के चलते घुटनों और जोड़ों के दर्द की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। कभी केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित रहने वाली यह परेशानी अब युवाओं को भी प्रभावित करने लगी है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, व्यायाम की कमी और बढ़ता वजन जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं, जिसका असर सीधे घुटनों की सेहत पर पड़ रहा है।

घुटने की सेहत क्यों है जरूरी
घुटना शरीर का एक प्रमुख जोड़ है, जो चलने-फिरने से लेकर बैठने, खड़े होने और सीढ़ियां चढ़ने जैसे दैनिक कार्यों में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में घुटनों में होने वाला दर्द केवल एक हिस्से तक सीमित न रहकर पूरे शरीर की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते इसके कारणों को पहचान कर उपचार न किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है और सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है।

ऑस्टियोआर्थराइटिस बना प्रमुख कारण
घुटने और जोड़ों के दर्द की सबसे आम वजह ऑस्टियोआर्थराइटिस मानी जाती है। इस स्थिति में उम्र या अत्यधिक दबाव के कारण जोड़ों की कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसने लगती है। इसके चलते सूजन, अकड़न और तेज दर्द की समस्या उत्पन्न होती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कम उम्र से ही घुटनों की देखभाल शुरू कर देने से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

पूरे शरीर पर पड़ता है असर
घुटनों में लगातार दर्द रहने से व्यक्ति की शारीरिक गतिविधि घट जाती है, जिससे मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। चलना-फिरना कम होने से वजन बढ़ने लगता है और इसके साथ ही हृदय रोग, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ जाता है। शुरुआत में मामूली लगने वाला दर्द अगर लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो गंभीर रूप ले सकता है।

घुटनों को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये उपाय

नियमित व्यायाम करें: हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम घुटनों पर पड़ने वाले दबाव को कम करते हैं।

संतुलित आहार लें: ओमेगा-3 फैटी एसिड, कैल्शियम और विटामिन-डी से भरपूर भोजन सूजन घटाने और हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है।

वजन नियंत्रित रखें: अतिरिक्त वजन जोड़ों पर दबाव बढ़ाता है, इसलिए वजन को संतुलित रखना बेहद जरूरी है।

सही जूतों का चयन करें: आरामदायक और अच्छी क्वालिटी के जूते घुटनों और एड़ियों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सी सतर्कता और सही आदतों को अपनाकर घुटनों और जोड़ों की समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

(साभार )


सिर्फ स्वाद नहीं, दवा भी है काली मिर्च, पाचन से इम्युनिटी तक असरदार

भारतीय रसोई में रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाले मसाले सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद उपयोगी माने जाते हैं। आयुर्वेद में ऐसे कई मसालों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें प्राकृतिक औषधि का दर्जा दिया गया है। इन्हीं में काली मिर्च और सफेद मिर्च भी शामिल हैं, जो पाचन से लेकर इम्युनिटी तक पर सकारात्मक असर डालती हैं।

आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार काली मिर्च का उपयोग सदियों से सर्दी-खांसी, पाचन संबंधी समस्याओं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। इसमें पाया जाने वाला प्रमुख तत्व पाइपरीन शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को बेहतर बनाता है, जिससे संपूर्ण स्वास्थ्य को लाभ मिलता है।

काली मिर्च: स्वाद के साथ सेहत का साथी
विशेषज्ञों का मानना है कि काली मिर्च केवल मसाला नहीं, बल्कि एक प्रभावी घरेलू उपचार भी है। यह पाचन एंजाइम्स के स्राव को बढ़ाती है, जिससे भोजन आसानी से पचता है। गैस, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याओं में भी यह राहत पहुंचाती है। आयुर्वेद में इसे भूख बढ़ाने और आंतों को सक्रिय रखने वाला बताया गया है। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि काली मिर्च में मौजूद पाइपरीन शरीर में फैट सेल्स बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है, जिससे वजन नियंत्रण में मदद मिलती है।

सर्दी-खांसी और इम्युनिटी में असरदार
काली मिर्च में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। शहद के साथ इसका सेवन गले की खराश, खांसी और जुकाम में राहत देता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं, जिससे इम्युनिटी मजबूत होती है।

सफेद मिर्च भी गुणों में किसी से कम नहीं
काली मिर्च की तरह सफेद मिर्च भी आयुर्वेद में उपयोगी मानी जाती है। इसमें एसेंशियल ऑयल, अल्कलॉइड, पाइपरीन और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो सूजन कम करने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में सहायक होते हैं। कुछ शोधों में इसके एंटी-ट्यूमर गुणों का भी उल्लेख मिलता है।

आहार विशेषज्ञों के अनुसार सफेद मिर्च का सीमित मात्रा में सेवन लाभकारी होता है। इसे शहद या दूध के साथ लिया जा सकता है। हालांकि, अधिक मात्रा में सेवन नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए संतुलन जरूरी है।

सफेद मिर्च में मौजूद फ्लेवोनोइड्स हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में सहायक माने जाते हैं। इसमें विटामिन-ए भी पाया जाता है, जो आंखों की रोशनी के लिए उपयोगी है। इसके नियमित सेवन से आर्थराइटिस, अपच, एसिडिटी और पेट फूलने जैसी समस्याओं में भी राहत मिल सकती है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल और आयुर्वेदिक रिपोर्ट्स में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। किसी भी औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक है।

(साभार)


अनियमित खान-पान और तनाव से बढ़ रही अपच की समस्या, सेहत पर पड़ रहा असर

तेज रफ्तार जिंदगी, काम का दबाव और बिगड़ी दिनचर्या आज लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रही है। खासतौर पर खान-पान की अनियमितता और तनाव के कारण पेट से जुड़ी परेशानियां तेजी से बढ़ी हैं। इन्हीं में से एक आम समस्या है अपच, जिसे चिकित्सकीय भाषा में डिस्पेप्सिया कहा जाता है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि पाचन तंत्र सही ढंग से काम नहीं कर पा रहा है।

अक्सर लोग स्वाद या समय की कमी के चलते जरूरत से ज्यादा भोजन कर लेते हैं या जल्दबाजी में खाना खा लेते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि पेट को भोजन पचाने में दिक्कत आने लगती है। इससे सीने में जलन, पेट फूलना, खट्टी डकारें और ऊपरी पेट में भारीपन जैसी समस्याएं सामने आती हैं। यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह परेशानी आगे चलकर गैस्ट्राइटिस या अल्सर जैसी गंभीर स्थिति में भी बदल सकती है। अपच न केवल शरीर को असहज बनाती है, बल्कि काम करने की क्षमता और मानसिक शांति को भी प्रभावित करती है।

खान-पान और समय में सुधार जरूरी

पाचन को बेहतर रखने के लिए सबसे जरूरी है भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना। इससे लार में मौजूद एंजाइम्स पाचन की प्रक्रिया को आसान बना देते हैं। इसके साथ ही रात का भोजन सोने से कम से कम तीन घंटे पहले करना चाहिए। देर रात भारी खाना खाने से लेटने पर पेट का एसिड ऊपर की ओर आ सकता है, जिससे सीने में जलन की समस्या बढ़ जाती है।

इन चीजों से रखें परहेज

अत्यधिक मसालेदार, तले-भुने खाद्य पदार्थ और कैफीन युक्त पेय पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये पेट में एसिड के असंतुलन का कारण बनते हैं। वहीं, कोल्ड ड्रिंक्स और कार्बोनेटेड पेय पेट में गैस बढ़ाते हैं। इनके बजाय छाछ, नारियल पानी और हल्की अदरक वाली चाय जैसे पेय पाचन के लिए अधिक लाभकारी माने जाते हैं।

सक्रिय दिनचर्या से मिलेगा लाभ

पाचन तंत्र का सीधा संबंध मानसिक स्थिति से भी होता है। ज्यादा तनाव लेने से पाचन प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। रोजाना हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, पैदल चलना या भोजन के बाद वज्रासन जैसे योगासन करने से पाचन बेहतर होता है। सक्रिय जीवनशैली से रक्त संचार सुधरता है और पाचक अंगों को सुचारु रूप से काम करने में मदद मिलती है।

कब जरूरी है डॉक्टर से संपर्क

हल्की अपच की स्थिति में अजवाइन का पानी, हींग या काला नमक जैसे घरेलू उपाय राहत दे सकते हैं। लेकिन यदि लंबे समय तक परेशानी बनी रहे, अचानक वजन घटने लगे, मल में खून आए या निगलने में दिक्कत हो, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें। संतुलित आहार और सही दिनचर्या अपनाकर अपच से काफी हद तक बचा जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और सामान्य स्वास्थ्य जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।


बढ़ता स्क्रीन टाइम आंखों की सेहत पर डाल रहा बुरा असर, वक़्त रहते हो जाएं सावधान

बदलती जीवनशैली और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता का असर अब आंखों की सेहत पर साफ नजर आने लगा है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग में आंखों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन देखने, असंतुलित खानपान और शुगर व ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के ठीक से नियंत्रित न होने के कारण आंखों की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

इन समस्याओं में ग्लूकोमा एक ऐसी बीमारी है, जो चुपचाप आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचाती है। यह रोग धीरे-धीरे आंखों की ऑप्टिक नर्व को प्रभावित करता है और समय रहते पहचान व इलाज न होने पर स्थायी अंधेपन का कारण भी बन सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि ग्लूकोमा दुनिया भर में अंधेपन का दूसरा सबसे बड़ा कारण माना जाता है, लेकिन इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजर नहीं आते, जिस वजह से लोग देर से डॉक्टर तक पहुंचते हैं।

क्या है ग्लूकोमा?

ग्लूकोमा में आंखों के अंदर दबाव बढ़ जाता है, जिससे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है। आंखों में मौजूद तरल पदार्थ का सही तरीके से बाहर न निकल पाना इस दबाव को बढ़ा देता है। उम्र बढ़ने के साथ इस बीमारी का खतरा बढ़ता जाता है। इसके अलावा जिन लोगों को डायबिटीज है, जिनके परिवार में पहले किसी को ग्लूकोमा रहा हो या जिन्हें आंखों में चोट लगी हो, उनमें इसका जोखिम अधिक होता है।

किन लक्षणों पर दें ध्यान

नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनुसार ग्लूकोमा की शुरुआत में आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। लेकिन बीमारी बढ़ने पर धीरे-धीरे किनारों से दिखाई देना कम होने लगता है। आंखों में भारीपन, दर्द, सिरदर्द या रोशनी के चारों ओर घेरा नजर आना भी इसके संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन लक्षणों को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।

बचाव और सावधानी जरूरी

हालांकि ग्लूकोमा से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन समय पर जांच और उपचार से अंधेपन के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए। इसके साथ ही संतुलित आहार, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियां, विटामिन सी और ओमेगा-3 फैटी एसिड शामिल हों, आंखों की सेहत के लिए फायदेमंद है। शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना भी आंखों की रोशनी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

(साभार)


गलत खान-पान बढ़ा रहा कैंसर का खतरा, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दी लाइफस्टाइल सुधारने की सलाह

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों की जीवनशैली और खाने-पीने की आदतों में तेजी से बदलाव आया है। यही बदलाव अब गंभीर बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज, हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर के साथ-साथ कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के पीछे भी असंतुलित लाइफस्टाइल और गलत खान-पान अहम कारण हैं। चिंता की बात यह है कि हाल के वर्षों में बच्चों में भी कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, ऐसे में खराब आहार और रसायन युक्त भोजन का असर उन पर ज्यादा तेजी से पड़ता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि कैंसर के खतरे किन वजहों से बढ़ रहे हैं और आहार में कौन-से बदलाव इसे रोकने में मददगार हो सकते हैं।

कैंसर से बचाव के लिए खान-पान में बदलाव जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल फास्ट फूड, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन कैंसर समेत कई बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है। इन खाद्य पदार्थों में मौजूद प्रिजर्वेटिव, ट्रांस फैट और केमिकल शरीर में हानिकारक बदलाव पैदा करते हैं। इसके साथ ही तंबाकू और शराब का सेवन भी कैंसर के प्रमुख कारणों में शामिल है।

प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड बढ़ाते हैं खतरा

चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड स्नैक्स और रेडी-टू-ईट फूड में आर्टिफिशियल फ्लेवर, प्रिजर्वेटिव और ट्रांस फैट की मात्रा अधिक होती है। ये तत्व शरीर में सूजन और कैंसरकारी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकते हैं। कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों का नियमित सेवन पेट और आंत से जुड़े कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है।

रेड और प्रोसेस्ड मीट का सीमित सेवन करें

अगर रोजाना या अधिक मात्रा में रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट का सेवन किया जाता है, तो यह भी कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने प्रोसेस्ड मीट को कैंसरकारक श्रेणी में रखा है। इनमें मौजूद केमिकल प्रिजर्वेटिव और अधिक वसा आंतों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्रोसेस्ड मीट का अधिक सेवन कोलोरेक्टल कैंसर के खतरे को बढ़ाता है, जबकि ज्यादा रेड मीट खाने से शरीर में सूजन बढ़ती है, जो कैंसर के विकास में सहायक हो सकती है।

ज्यादा मीठे पेय पदार्थ भी हैं नुकसानदेह

अत्यधिक चीनी का सेवन सीधे कैंसर का कारण भले न बने, लेकिन यह मोटापा और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है, जिन्हें कैंसर के बड़े जोखिम कारक माना जाता है। सॉफ्ट ड्रिंक्स, मीठे पेय और शुगर युक्त जूस ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बढ़ी हुई शुगर स्तन, लिवर और अग्न्याशय के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है। साथ ही अधिक चीनी शरीर में क्रॉनिक सूजन को बढ़ावा देती है, जिससे कैंसर कोशिकाओं के पनपने की संभावना बढ़ जाती है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार का आहार परिवर्तन करने से पहले चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।

(साभार)


Latest News in hindi

Call Us On  Whatsapp