Friday, October 16th, 2026

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मच्छरों के काटने से सिर्फ डेंगू-मलेरिया ही नहीं, एनीमिया का भी बढ़ सकता है खतरा

Category Archives: फिटनेस

मच्छरों के काटने से सिर्फ डेंगू-मलेरिया ही नहीं, एनीमिया का भी बढ़ सकता है खतरा

मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां सेहत के लिए गंभीर परेशानी बन सकती हैं। डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे संक्रमणों से बचाव के लिए सावधानी बरतना जरूरी है। मलेरिया का संक्रमण शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर एनीमिया यानी खून की कमी का कारण भी बन सकता है। खासकर छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इस बीमारी के प्रति अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

मलेरिया और एनीमिया के बीच क्या है 

मलेरिया संक्रमित मादा एनोफेलीज मच्छर के काटने से फैलता है। इसका कारण प्लास्मोडियम नामक परजीवी है, जो शरीर में पहुंचकर लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। ये कोशिकाएं शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं।

संक्रमण के कारण लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं, जिससे हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो सकता है। इस स्थिति में एनीमिया विकसित होने की आशंका रहती है। गंभीर मामलों में मरीज को थकान, कमजोरी, सांस लेने में परेशानी और दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत

मलेरिया किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन पांच साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाओं में गंभीर संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। बार-बार मलेरिया होने से शरीर में खून की कमी की समस्या बढ़ सकती है। गर्भावस्था के दौरान यह संक्रमण मां और गर्भस्थ शिशु, दोनों के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।

हालांकि, मलेरिया से संक्रमित प्रत्येक व्यक्ति को एनीमिया हो, यह जरूरी नहीं है। इसका खतरा संक्रमण की गंभीरता और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

मलेरिया होने पर बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, बदन दर्द और थकान जैसी परेशानियां हो सकती हैं। वहीं, एनीमिया के कारण त्वचा या आंखों में पीलापन, चक्कर आना, कमजोरी और सांस फूलने की समस्या सामने आ सकती है।

यदि बुखार के साथ अत्यधिक कमजोरी, सांस लेने में कठिनाई, बेहोशी या दौरे पड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें। समय पर जांच से बीमारी की पहचान और उचित इलाज में मदद मिलती है।

मच्छरों से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय

मच्छरदानी का प्रयोग करें: सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।

रिपेलेंट का इस्तेमाल करें: मच्छरों से बचाव के लिए सुरक्षित मच्छर भगाने वाले उत्पादों का उपयोग करें।

पानी जमा न होने दें: घर और आसपास के स्थानों पर जमा पानी को साफ करते रहें।

बुखार होने पर जांच कराएं: लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से संपर्क करें और उनकी सलाह के अनुसार इलाज लें।

खुद से दवाएं न लें: मलेरिया की दवा या आयरन सप्लीमेंट बिना चिकित्सकीय सलाह के न लें।

मलेरिया की समय पर पहचान और उचित उपचार से गंभीर जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है। इसलिए मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाने के साथ बीमारी के लक्षणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।


नमक कम खाने के बावजूद क्यों बढ़ता है ब्लड प्रेशर? रोजमर्रा की इन आदतों पर दें ध्यान

आजकल उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर की समस्या तेजी से लोगों की सेहत को प्रभावित कर रही है। आमतौर पर ब्लड प्रेशर बढ़ने पर खानपान में नमक की मात्रा कम करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, केवल नमक पर नियंत्रण रखना ही पर्याप्त नहीं है। नींद की कमी, लगातार तनाव, शारीरिक गतिविधियों का अभाव, जरूरत से ज्यादा कैफीन और शराब का सेवन जैसी आदतें भी ब्लड प्रेशर को प्रभावित कर सकती हैं।

कई लोग अपनी डाइट में बदलाव तो कर लेते हैं, लेकिन जीवनशैली से जुड़ी दूसरी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं। इसके कारण ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, मोटापा, नींद के दौरान सांस लेने में परेशानी और कुछ दवाओं का इस्तेमाल भी उच्च रक्तचाप के जोखिम से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में जरूरी है कि लोग अपनी दैनिक दिनचर्या पर ध्यान दें और समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच कराएं।

तनाव भी बन सकता है ब्लड प्रेशर बढ़ने की वजह-  काम का दबाव, आर्थिक परेशानियां और पारिवारिक जिम्मेदारियां व्यक्ति को लंबे समय तक तनाव में रख सकती हैं। तनाव के दौरान शरीर में कुछ हार्मोन सक्रिय होते हैं, जिससे दिल की धड़कन तेज हो सकती है और रक्त वाहिकाएं सिकुड़ सकती हैं। इससे ब्लड प्रेशर कुछ समय के लिए बढ़ सकता है। तनाव के कारण कई लोग जरूरत से ज्यादा खाने, धूम्रपान या शराब का सेवन करने लगते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

पर्याप्त नींद नहीं लेना पड़ सकता है भारी-  नींद की कमी का असर केवल थकान और चिड़चिड़ेपन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह हृदय स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। लगातार कम या खराब गुणवत्ता वाली नींद को हाई ब्लड प्रेशर के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है।

इसके अलावा, सोते समय तेज खर्राटे आना, सांस रुकने जैसी स्थिति और दिन में अत्यधिक नींद महसूस होना स्लीप एपनिया के संकेत हो सकते हैं। इस समस्या में नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती और फिर शुरू होती है। इसका संबंध उच्च रक्तचाप से भी पाया गया है।

चाय-कॉफी का अधिक सेवन भी करें नियंत्रित- चाय और कॉफी का सेवन भारतीय दिनचर्या का अहम हिस्सा है। लेकिन इनमें मौजूद कैफीन कुछ लोगों में ब्लड प्रेशर को अस्थायी रूप से बढ़ा सकता है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितनी मात्रा में कैफीन लेता है और उसका शरीर इसके प्रति कितना संवेदनशील है।

एनर्जी ड्रिंक्स में भी कैफीन की अधिक मात्रा हो सकती है। इसलिए पहले से उच्च रक्तचाप की समस्या से जूझ रहे लोगों को इनके सेवन को लेकर सतर्क रहना चाहिए।

दिनभर बैठे रहने की आदत बढ़ा सकती है जोखिम- ऑफिस में लंबे समय तक कुर्सी पर बैठे रहना, घर में लगातार सोफे पर समय बिताना और शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनाकर रखना भी सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। निष्क्रिय जीवनशैली से वजन बढ़ने की आशंका रहती है, जिससे उच्च रक्तचाप का खतरा भी बढ़ सकता है।

नियमित शारीरिक गतिविधि हृदय को स्वस्थ रखने और ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने में मदद करती है। इसके लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैरना और घर के सामान्य काम करना भी उपयोगी हो सकता है।

शराब और तंबाकू से दूरी बनाना जरूरी- शराब का अधिक सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है। वहीं, तंबाकू और निकोटीन रक्त वाहिकाओं तथा हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। धूम्रपान के दौरान ब्लड प्रेशर और हृदय गति में अस्थायी बढ़ोतरी हो सकती है। लंबे समय तक इन आदतों को जारी रखने से हृदय रोग और स्ट्रोक का जोखिम भी बढ़ सकता है।

बचाव के उपाय: शराब से परहेज करना और धूम्रपान सहित तंबाकू के सभी उत्पादों से दूरी बनाना बेहतर स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। यदि इन आदतों को छोड़ने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर की मदद ली जा सकती है।

कुछ दवाएं भी प्रभावित कर सकती हैं ब्लड प्रेशर

कई लोगों को जानकारी नहीं होती कि सामान्य बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं भी ब्लड प्रेशर को प्रभावित कर सकती हैं। सर्दी-जुकाम में नाक खोलने के लिए ली जाने वाली कुछ दवाएं और इबुप्रोफेन जैसे कुछ दर्द निवारक इसके उदाहरण हैं। हालांकि, इनका असर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, दवा की खुराक और इस्तेमाल की अवधि पर निर्भर करता है।

पैकेट वाले खाद्य पदार्थ और मोटापा भी हैं अहम कारण- ब्लड प्रेशर बढ़ने का संबंध केवल खाने में ऊपर से डाले जाने वाले नमक से नहीं है। चिप्स, नमकीन, पैकेट वाले स्नैक्स और प्रोसेस्ड फूड में भी सोडियम की मात्रा अधिक हो सकती है। इनका नियमित और ज्यादा सेवन शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ा सकता है।

इसके अलावा, जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेना और शारीरिक गतिविधि की कमी वजन बढ़ने का कारण बन सकते हैं। अधिक वजन होने पर हृदय को शरीर में रक्त पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है, जिससे उच्च रक्तचाप का जोखिम बढ़ सकता है।

ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने के लिए क्या करें?

उच्च रक्तचाप कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी मौजूद रह सकता है। इसलिए केवल सिरदर्द, चक्कर या अन्य लक्षणों के आधार पर इसका पता लगाने की कोशिश करना सही नहीं है। नियमित जांच से ब्लड प्रेशर की स्थिति को समझने और समय पर उचित कदम उठाने में मदद मिलती है।

स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, पर्याप्त नींद लेना, तनाव को नियंत्रित करना, नियमित व्यायाम करना और नमक का सेवन सीमित रखना इसके जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है। यदि घर पर ब्लड प्रेशर की रीडिंग बार-बार अधिक आ रही है, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

ध्यान रखें कि जीवनशैली में बदलाव के बावजूद कुछ लोगों को ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने के लिए दवाओं की जरूरत पड़ती है। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं बंद करना या उनकी खुराक बदलना खतरनाक हो सकता है।


रात में नाभि पर सरसों का तेल लगाने का चलन, जानिए त्वचा और पेट से जुड़े दावों की सच्चाई

बदलते मौसम के साथ त्वचा में रूखापन, होंठों का फटना और शरीर में खिंचाव जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। ऐसे में कई लोग घरेलू नुस्खों का सहारा लेते हैं। भारतीय परिवारों में सरसों के तेल का इस्तेमाल लंबे समय से मालिश और त्वचा की देखभाल के लिए किया जाता रहा है। इन्हीं उपायों में रात को सोने से पहले नाभि में सरसों के तेल की कुछ बूंदें डालना भी शामिल है। हालांकि, इस नुस्खे से जुड़े सभी स्वास्थ्य लाभ वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं।

त्वचा का रूखापन कम करने में कैसे मदद कर सकता है तेल?

सरसों के तेल में फैटी एसिड होते हैं, जो त्वचा को मुलायम बनाने में मदद कर सकते हैं। तेल त्वचा की सतह पर एक परत बनाकर नमी के नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकता है। सर्द और शुष्क मौसम में इससे त्वचा को आराम मिल सकता है।

हालांकि, नाभि में तेल लगाने से पूरे शरीर की त्वचा का रूखापन दूर होने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। बेहतर परिणाम के लिए प्रभावित हिस्से पर सीधे मॉइस्चराइजर लगाना अधिक उपयोगी हो सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को सरसों के तेल से जलन या एलर्जी भी हो सकती है।

क्या नाभि में तेल लगाने से फटे होंठ ठीक होते हैं?

सर्दियों और शुष्क मौसम में होंठों की नमी कम होने से वे फटने लगते हैं। घरेलू नुस्खों में नाभि पर तेल लगाने को होंठों की देखभाल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस दावे की पुष्टि करने वाले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

फटे होंठों की देखभाल के लिए पेट्रोलियम जेली या बिना खुशबू वाला लिप बाम लगाना बेहतर विकल्प है। होंठों को बार-बार चाटने से बचना और पर्याप्त पानी पीना भी मददगार हो सकता है।

पेट की परेशानी और मासिक धर्म के दर्द में कितना फायदा?

पेट के आसपास हल्के हाथों से मालिश करने पर कुछ लोगों को आराम महसूस हो सकता है। मालिश से मिलने वाली गर्माहट और सुकून मांसपेशियों के तनाव को अस्थायी रूप से कम करने में मदद कर सकते हैं। मासिक धर्म के दौरान पेट के निचले हिस्से पर हल्की मालिश भी कुछ महिलाओं को राहत दे सकती है।

हालांकि, नाभि में सरसों का तेल डालने से पाचन संबंधी समस्याएं दूर होने या पेट की परेशानी ठीक होने का पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यदि पेट दर्द लगातार बना रहता है या उसके साथ अन्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

नाभि में तेल लगाने का सही तरीका क्या है?

यदि आप त्वचा की देखभाल के लिए इस उपाय को आजमाना चाहते हैं, तो कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है।

सबसे पहले नाभि और उसके आसपास की त्वचा को साफ करके अच्छी तरह सुखा लें।

सरसों के तेल की थोड़ी-सी मात्रा लेकर नाभि के आसपास हल्के हाथों से लगाएं।

तेल को नाभि में अधिक मात्रा में भरने या जोर से रगड़ने से बचें।

पहली बार इस्तेमाल करने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करें।

जलन, खुजली, लालिमा या सूजन होने पर तेल का इस्तेमाल बंद कर दें।

ध्यान रखें कि नाभि में तेल लगाना जरूरी नहीं है और इससे विशेष स्वास्थ्य लाभ मिलने की गारंटी नहीं है।

किन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी?

जिन लोगों को सरसों के तेल से एलर्जी है या जिनकी त्वचा संवेदनशील है, उन्हें इसका इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। नाभि के आसपास घाव, कट, लालिमा या संक्रमण होने पर वहां तेल लगाने से बचें। छोटे बच्चों की त्वचा पर भी बिना चिकित्सकीय सलाह के ऐसे घरेलू प्रयोग नहीं करने चाहिए।


ज्यादा मक्खन खाना सेहत के लिए पड़ सकता है भारी, बढ़ सकता है कोलेस्ट्रॉल और मोटापे का खतरा

आजकल फूड ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर खाने को ज्यादा स्वादिष्ट दिखाने के लिए उसमें भरपूर मक्खन डालने का चलन बढ़ रहा है। बटर से तैयार व्यंजन देखने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन इनका नियमित रूप से अधिक सेवन सेहत पर बुरा असर डाल सकता है। मक्खन में मौजूद सैचुरेटेड फैट और अधिक कैलोरी के कारण वजन बढ़ने से लेकर हृदय संबंधी समस्याओं तक का जोखिम बढ़ सकता है।

मक्खन दूध से बनने वाला डेयरी उत्पाद है, जिसमें वसा की मात्रा काफी अधिक होती है। सीमित मात्रा में इसका सेवन संतुलित आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे रोजाना ज्यादा मात्रा में खाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मक्खन खाते समय इसकी मात्रा और पूरे दिन के आहार में शामिल वसा पर ध्यान देना जरूरी है।

बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा

मक्खन में सैचुरेटेड फैट अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसका जरूरत से ज्यादा सेवन रक्त में एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा सकता है। जब एलडीएल कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, तो धमनियों में प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ सकता है। इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है।

धमनियों में प्लाक जमा होने से रक्त का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर हृदय रोग और हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए जिन लोगों को पहले से कोलेस्ट्रॉल या हृदय संबंधी परेशानी है, उन्हें अपने खानपान में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

ज्यादा मक्खन से बढ़ सकता है वजन

मक्खन में कैलोरी की मात्रा भी काफी अधिक होती है। एक बड़े चम्मच मक्खन में लगभग 100 कैलोरी हो सकती हैं। अगर रोजाना भोजन में जरूरत से ज्यादा मक्खन शामिल किया जाए, तो शरीर को मिलने वाली कुल कैलोरी बढ़ जाती है। लंबे समय तक अतिरिक्त कैलोरी लेने से वजन बढ़ने की आशंका रहती है।

वजन बढ़ने और मोटापे के कारण डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए पराठे, ब्रेड, सब्जियों और अन्य व्यंजनों में मक्खन का इस्तेमाल करते समय मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।

मस्तिष्क की सेहत पर भी पड़ सकता है असर

सैचुरेटेड फैट के अधिक सेवन और मस्तिष्क के स्वास्थ्य के बीच संबंधों को लेकर भी कई अध्ययन किए गए हैं। कुछ शोधों में अधिक संतृप्त वसा के सेवन को अल्जाइमर रोग और डिमेंशिया के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा गया है।

हालांकि, ऐसे अध्ययनों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि मक्खन खाने से सीधे अल्जाइमर या डिमेंशिया होता है। इन बीमारियों के पीछे उम्र, आनुवंशिक कारणों और जीवनशैली समेत कई कारक हो सकते हैं। फिर भी, संतृप्त वसा का सेवन सीमित रखना समग्र स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है।

रोजाना कितनी सैचुरेटेड फैट लेनी चाहिए?

स्वास्थ्य संबंधी सामान्य दिशानिर्देशों के अनुसार, रोजाना मिलने वाली कुल कैलोरी में सैचुरेटेड फैट की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए, 2,000 कैलोरी प्रतिदिन लेने वाले व्यक्ति के लिए यह मात्रा लगभग 22 ग्राम प्रतिदिन होती है।

यह सीमा केवल मक्खन से मिलने वाली वसा के लिए नहीं, बल्कि पूरे दिन खाए जाने वाले सभी खाद्य पदार्थों से मिलने वाली संतृप्त वसा के लिए है। घी, पनीर, क्रीम और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों में भी इसकी मात्रा अधिक हो सकती है।

मक्खन की जगह क्या इस्तेमाल करें?

खाने में वसा की मात्रा संतुलित रखने के लिए मक्खन का इस्तेमाल सीमित किया जा सकता है। इसकी जगह जरूरत और व्यंजन के अनुसार सरसों, मूंगफली या जैतून जैसे असंतृप्त वसा वाले तेलों का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, इनका सेवन भी उचित मात्रा में करना जरूरी है, क्योंकि सभी प्रकार की वसा में कैलोरी अधिक होती है।

कुल मिलाकर, मक्खन को पूरी तरह छोड़ना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है, लेकिन इसका अत्यधिक सेवन करने से बचना चाहिए। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और सही मात्रा में वसा का सेवन लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद कर सकता है।


अखरोट या बादाम, दिमाग के लिए कौन ज्यादा फायदेमंद? जानिए दोनों के पोषक तत्वों और स्वास्थ्य लाभों के बारे में

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शरीर के साथ-साथ दिमाग को स्वस्थ रखना भी बेहद जरूरी है। इसके लिए संतुलित आहार की अहम भूमिका होती है। अखरोट और बादाम ऐसे सूखे मेवे हैं, जिन्हें पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। दोनों में मौजूद अलग-अलग पोषक तत्व मस्तिष्क, हृदय और शरीर के सामान्य कामकाज को बेहतर बनाए रखने में योगदान दे सकते हैं। लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि दिमाग की सेहत के लिए अखरोट ज्यादा फायदेमंद है या बादाम।

विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों मेवों की अपनी खूबियां हैं। अखरोट पौधों से मिलने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत है, जबकि बादाम विटामिन ई, मैग्नीशियम, प्रोटीन और फाइबर उपलब्ध कराता है। इसलिए किसी एक को सभी लोगों के लिए बेहतर बताने के बजाय दोनों के पोषण संबंधी फायदों को समझना जरूरी है।

अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 दिमाग के लिए उपयोगी

अखरोट में अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) पाया जाता है, जो ओमेगा-3 फैटी एसिड का एक प्रकार है। यह मस्तिष्क की सामान्य कार्यप्रणाली और कोशिकाओं के स्वास्थ्य के लिए जरूरी पोषण का हिस्सा है। अखरोट में पॉलीफेनॉल जैसे एंटीऑक्सीडेंट भी मौजूद होते हैं, जो शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में भूमिका निभाते हैं।

स्पेन में किशोरों पर किए गए एक अध्ययन में अखरोट के सेवन और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता के बीच संभावित संबंध देखा गया था। अध्ययन में 11 से 16 वर्ष की उम्र के करीब 700 किशोर शामिल थे। उन्हें छह महीने तक रोजाना 30 ग्राम अखरोट खाने के लिए कहा गया। अध्ययन के निष्कर्षों में नियमित रूप से अखरोट खाने वाले कुछ प्रतिभागियों में ध्यान से जुड़े सकारात्मक संकेत सामने आए।

हालांकि, इस तरह के शोध से यह साबित नहीं होता कि केवल अखरोट खाने से याददाश्त बढ़ती है या मस्तिष्क संबंधी बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। दिमाग की सेहत के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण हैं।

बादाम भी दिमाग के लिए क्यों है फायदेमंद?

बादाम में विटामिन ई, मैग्नीशियम, प्रोटीन, फाइबर और असंतृप्त वसा पाई जाती है। इनमें मौजूद विटामिन ई कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाने में मदद करता है। वहीं, मैग्नीशियम तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी है।

बादाम में मौजूद प्रोटीन और फाइबर शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ पेट भरा रहने में भी मदद कर सकते हैं। इसके अलावा, इसमें पाई जाने वाली असंतृप्त वसा संतुलित आहार का हिस्सा है और हृदय स्वास्थ्य को बनाए रखने में योगदान दे सकती है।

हालांकि, बादाम खाने से याददाश्त बढ़ने या एकाग्रता में सुधार होने की गारंटी नहीं दी जा सकती। इसके लाभ व्यक्ति के संपूर्ण खानपान और जीवनशैली पर भी निर्भर करते हैं।

अखरोट और बादाम में क्या है मुख्य अंतर?

अखरोट: इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड ALA और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। जो लोग पौधों से मिलने वाले ओमेगा-3 का अच्छा स्रोत तलाश रहे हैं, उनके लिए अखरोट उपयोगी विकल्प है।

बादाम: इसमें विटामिन ई, मैग्नीशियम, प्रोटीन और फाइबर अच्छी मात्रा में मिलते हैं। ये पोषक तत्व शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली और संतुलित आहार की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं।

दोनों मेवों की पोषण संबंधी खूबियां अलग हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अखरोट हर मामले में बादाम से बेहतर है या बादाम के सभी फायदे अखरोट से अधिक हैं।

बच्चों की डाइट में भी शामिल कर सकते हैं मेवे

बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए संतुलित आहार जरूरी है। उम्र के अनुसार उचित मात्रा में अखरोट और बादाम देने से उन्हें जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं। हालांकि, छोटे बच्चों को साबुत मेवे देने से दम घुटने का खतरा हो सकता है। इसलिए उनकी उम्र और खाने की क्षमता के अनुसार मेवों को बारीक पीसकर या उपयुक्त रूप में देना चाहिए। एलर्जी की आशंका होने पर विशेष सावधानी बरतें।

रोजाना कितनी मात्रा में खाएं?

अखरोट और बादाम को सीमित मात्रा में रोजाना के आहार में शामिल किया जा सकता है। सामान्य तौर पर एक छोटी मुट्ठी बिना नमक वाले मिश्रित मेवे कई लोगों के लिए व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, सही मात्रा उम्र, कुल कैलोरी जरूरत, स्वास्थ्य और अन्य आहार संबंधी स्थितियों पर निर्भर करती है।


किशोरों की मानसिक सेहत पर बढ़ रहा चिंता का असर, जानें लक्षण और बचाव के उपाय

पढ़ाई का बढ़ता दबाव, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और भविष्य को लेकर अनिश्चितता किशोरों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकती है। इस उम्र में होने वाले शारीरिक और भावनात्मक बदलावों के बीच कई किशोर चिंता और घबराहट का सामना करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में लगभग हर सात में से एक किशोर 10 से 19 वर्ष की उम्र के बीच किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित होता है। एंग्जायटी यानी अत्यधिक चिंता भी किशोरों में पाई जाने वाली आम समस्याओं में शामिल है।

विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही सहायता लेना जरूरी है। लगातार बनी रहने वाली चिंता पढ़ाई, नींद, सामाजिक संबंधों और रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर डाल सकती है।

शरीर में भी दिखाई दे सकते हैं एंग्जायटी के संकेत

एंग्जायटी का असर केवल सोच और भावनाओं तक सीमित नहीं रहता। कई बार इसके शारीरिक लक्षण भी सामने आते हैं। इनमें दिल की धड़कन तेज होना, सिरदर्द, चक्कर आना, अधिक पसीना आना, हाथ-पैर कांपना और सांस लेने में परेशानी महसूस होना शामिल हो सकता है।

कुछ किशोरों को पेट में दर्द, मितली, भूख में बदलाव या नींद से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि, ऐसे लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।

बार-बार चिंता करना और ध्यान लगाने में परेशानी

मानसिक स्तर पर एंग्जायटी से प्रभावित किशोर छोटी-छोटी बातों को लेकर भी परेशान रह सकते हैं। भविष्य में क्या होगा, परीक्षा में अच्छे अंक आएंगे या नहीं और दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, जैसी चिंताएं उनके मन में लगातार चल सकती हैं।

इसके अलावा पढ़ाई में ध्यान न लगना, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बार-बार डर महसूस होना और रात में ठीक से नींद न आना भी चिंता से जुड़े संकेत हो सकते हैं। यदि ये परेशानियां लंबे समय तक बनी रहें और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

व्यवहार में बदलाव को भी समझें

किशोरों में चिंता का असर उनके व्यवहार पर भी पड़ सकता है। कुछ बच्चे दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने लगते हैं, जबकि कुछ नई गतिविधियों या ऐसी जगहों पर जाने से बचते हैं, जहां उन्हें असहजता महसूस होती है। कुछ मामलों में वे किसी काम को लेकर बार-बार आश्वासन मांग सकते हैं या एक ही गतिविधि को दोहराने लगते हैं।

माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें डांटने या उनकी परेशानी को छोटी बात मानकर टालने के बजाय, उनकी बात ध्यान से सुनना और उन्हें सुरक्षित माहौल देना अधिक उपयोगी हो सकता है।

एंग्जायटी कम करने में मददगार हो सकते हैं ये उपाय

खुलकर बातचीत करें: अपनी परेशानी किसी भरोसेमंद दोस्त, माता-पिता, शिक्षक या काउंसलर के साथ साझा करें।

शारीरिक गतिविधि अपनाएं: नियमित टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना या पसंदीदा खेल खेलना तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

गहरी सांस लेने का अभ्यास करें: धीमी और नियंत्रित सांस लेने तथा मेडिटेशन से मन को शांत करने में सहायता मिल सकती है।

नींद का ध्यान रखें: नियमित समय पर सोने-जागने की आदत बनाएं और सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें।

काम की योजना बनाएं: पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों को छोटे हिस्सों में बांटें, ताकि एक साथ बहुत अधिक दबाव महसूस न हो।

कैफीन और नशीले पदार्थों से बचें: चाय-कॉफी का अत्यधिक सेवन कम करें और सिगरेट, शराब व अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहें।


बांग्लादेश में डेंगू का कहर, 90 हजार से ज्यादा मरीज अस्पताल पहुंचे; 281 लोगों की मौत

मानसून के बाद मच्छर जनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन इस बार बांग्लादेश में डेंगू की स्थिति गंभीर होती नजर आ रही है। देश में डेंगू के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। अब तक 90 हजार से अधिक मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ चुकी है, जबकि 281 लोगों की मौत की सूचना है। अक्टूबर में भी संक्रमण की रफ्तार चिंता बढ़ा रही है।

बांग्लादेश पहले से ही संक्रामक बीमारियों की चुनौती का सामना कर रहा है। इसी बीच डेंगू के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है। अकेले अक्टूबर में 10,736 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया और 36 लोगों की मौत हुई।

बीमारी की पहचान में देरी बनी बड़ी चुनौती

डेंगू के बढ़ते मामलों के साथ सबसे बड़ी चिंता मरीजों की समय पर पहचान और इलाज को लेकर सामने आई है। बांग्लादेश के इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी डिजीज कंट्रोल एंड रिसर्च (IEDCR) की समीक्षा में मौत के मामलों का विश्लेषण किया गया।

प्रोफेसर क्वाजी अहमद जाकी के नेतृत्व में की गई समीक्षा में 119 मौतों को शामिल किया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि एक तिहाई से अधिक मरीज अस्पताल में भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर ही दम तोड़ गए। कई मरीजों में डेंगू की पहचान होने में भी काफी समय लगा।

कई मरीजों में तीन दिन से ज्यादा की देरी

समीक्षा के मुताबिक, कुछ मामलों में डेंगू की पुष्टि होने से पहले मरीजों को तीन दिन या उससे अधिक समय तक बीमारी की सही पहचान का इंतजार करना पड़ा। ऐसे में विशेषज्ञों के लिए समय पर जांच और उपचार उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बन गया है।

डेंगू के चारों स्ट्रेन सक्रिय होने की खबर

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार बांग्लादेश में इस समय डेंगू वायरस के चारों प्रमुख स्ट्रेन सक्रिय बताए जा रहे हैं। इसका एक असर यह भी है कि पहले डेंगू से संक्रमित हो चुके लोगों को दोबारा संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू का दोबारा संक्रमण कुछ परिस्थितियों में गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे में पहले संक्रमित रह चुके लोगों को भी बुखार या अन्य लक्षण दिखाई देने पर लापरवाही से बचने की सलाह दी जाती है।

2023 में सबसे ज्यादा मौतों का रिकॉर्ड

बांग्लादेश में डेंगू का बड़ा प्रकोप पहली बार वर्ष 2000 में सामने आया था। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में डेंगू से 1,705 लोगों की मौत हुई थी, जो देश में इस बीमारी से हुई सबसे अधिक वार्षिक मौतों का आंकड़ा रहा है।

इस साल अब तक 281 मौतें हो चुकी हैं और अक्टूबर में संक्रमण की रफ्तार जारी रहने से स्वास्थ्य अधिकारियों की चिंता बढ़ी हुई है। मानसून के बाद मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बने रहने पर आने वाले दिनों में स्थिति पर नजर बनाए रखना जरूरी माना जा रहा है।


सुबह मुनक्का खाना कितना फायदेमंद? जानें इसके पोषक तत्व और सेवन का सही तरीका

सूखे मेवों में शामिल मुनक्का स्वाद के साथ-साथ कई पोषक तत्वों का स्रोत भी माना जाता है। इसे लोग सीधे खाने के अलावा रातभर पानी में भिगोकर भी खाते हैं। सीमित मात्रा में मुनक्का को संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, इसका सेवन व्यक्ति की उम्र, खानपान और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर करना बेहतर रहता है।

मुनक्का में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद कर सकता है। नियमित डाइट में सीमित मात्रा में इसे शामिल करने से कब्ज जैसी समस्या में राहत मिल सकती है। इसके साथ पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है।

शरीर को मिल सकती है तुरंत ऊर्जा

मुनक्का में प्राकृतिक कार्बोहाइड्रेट और शुगर मौजूद होती है। यही वजह है कि इसे कम मात्रा में खाने से शरीर को ऊर्जा मिल सकती है। सुबह या दिन के समय इसका सेवन किया जा सकता है, लेकिन कुल डाइट में प्राकृतिक शुगर और कैलोरी की मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।

पोटैशियम भी करता है मदद

मुनक्का में पोटैशियम समेत कई खनिज तत्व पाए जाते हैं। पोटैशियम शरीर में मांसपेशियों और नर्वस सिस्टम के सामान्य कार्य के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। संतुलित आहार के साथ मुनक्का इन पोषक तत्वों की पूर्ति में योगदान दे सकता है।

एंटीऑक्सीडेंट से भी भरपूर

मुनक्का में पॉलीफेनॉल जैसे एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड पाए जाते हैं। ये शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में भूमिका निभाते हैं। हालांकि, किसी एक खाद्य पदार्थ को संपूर्ण स्वास्थ्य का समाधान मानने के बजाय इसे विविध और संतुलित डाइट का हिस्सा रखना बेहतर है।

आयरन का भी मिलता है स्रोत

मुनक्का में आयरन भी मौजूद होता है, इसलिए यह डाइट में आयरन की मात्रा बढ़ाने का एक विकल्प हो सकता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति में आयरन की कमी या एनीमिया है, तो केवल मुनक्का पर निर्भर रहना सही नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह और आवश्यक जांच के आधार पर उपचार जरूरी है।

भिगोकर खाना कितना सही?

कई लोग मुनक्का को रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाते हैं। इससे यह नरम हो जाता है और कुछ लोगों के लिए इसे खाना आसान हो सकता है। हालांकि, इसे भिगोने से पोषक तत्वों में कोई असाधारण या चमत्कारी बदलाव होने का दावा नहीं किया जा सकता।

कितनी मात्रा में खाएं?

मुनक्का की सही मात्रा हर व्यक्ति के लिए एक जैसी नहीं हो सकती। उम्र, दैनिक खानपान, कैलोरी की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार इसकी मात्रा तय करना बेहतर है। इसे सीमित मात्रा में डाइट में शामिल करें और साथ में अपने पूरे आहार में शुगर व कैलोरी की मात्रा पर भी नजर रखें।


दिनभर मोबाइल-लैपटॉप देखने वालों सावधान! आंखों में थकान, जलन और धुंधलेपन से बचने के लिए अपनाएं ये 7 तरीके

मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल ने रोजमर्रा की जिंदगी को काफी आसान बना दिया है, लेकिन इसका असर आंखों की सेहत पर भी पड़ सकता है। पढ़ाई, ऑफिस का काम, ऑनलाइन मीटिंग और मनोरंजन के लिए लोग लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहते हैं। लगातार बिना ब्रेक स्क्रीन पर नजर टिकाए रखने से आंखों में थकान और असहजता जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक स्क्रीन देखने के दौरान पलकें कम झपकने से आंखों में सूखापन बढ़ सकता है। इसके अलावा आंखों में जलन, पानी आना, धुंधला दिखाई देना और सिरदर्द जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। इसे आमतौर पर डिजिटल आई स्ट्रेन यानी डिजिटल आंखों की थकान से जोड़ा जाता है।

20-20-20 नियम से दें आंखों को आराम

स्क्रीन पर लगातार नजर रखने के बजाय समय-समय पर आंखों को आराम देना जरूरी है। इसके लिए 20-20-20 नियम अपनाया जा सकता है। यानी हर 20 मिनट में करीब 20 सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाकर लगभग 20 फीट दूर किसी चीज को देखें। इससे आंखों को कुछ समय के लिए फोकस बदलने का मौका मिलता है।

स्क्रीन को आंखों से उचित दूरी पर रखें

मोबाइल को बहुत पास रखकर देखने की आदत से बचें। लैपटॉप या कंप्यूटर की स्क्रीन भी ऐसी दूरी पर रखें, जहां कंटेंट पढ़ने के लिए आंखों पर अतिरिक्त जोर न लगाना पड़े। लंबे समय तक काम करते समय बैठने की स्थिति और स्क्रीन की ऊंचाई भी आरामदायक रखना बेहतर है।

लगातार स्क्रीन देखने के बीच लें ब्रेक

ऑफिस, पढ़ाई या मनोरंजन के दौरान लगातार कई घंटे स्क्रीन देखने के बजाय बीच-बीच में छोटे ब्रेक लेते रहें। कुछ समय के लिए स्क्रीन से नजर हटाने और दूर देखने से आंखों को आराम मिल सकता है।

कमरे और स्क्रीन की रोशनी का रखें ध्यान

बहुत तेज या बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखने से असहजता बढ़ सकती है। कमरे की रोशनी के मुताबिक स्क्रीन की ब्राइटनेस को एडजस्ट करें। साथ ही स्क्रीन पर पड़ने वाली सीधी रोशनी और अनावश्यक प्रतिबिंब से बचने की कोशिश करें।

पलकें झपकाना न भूलें

स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करने के दौरान कई लोग सामान्य से कम पलकें झपकाते हैं। इससे आंखों में सूखापन महसूस हो सकता है। इसलिए मोबाइल या कंप्यूटर इस्तेमाल करते समय नियमित रूप से पलकें झपकाते रहना जरूरी है।

अंधेरे कमरे में मोबाइल चलाने से बचें

बिल्कुल अंधेरे कमरे में चमकदार स्क्रीन देखने के बजाय आसपास पर्याप्त रोशनी रखना बेहतर है। स्क्रीन और कमरे की रोशनी में बहुत ज्यादा अंतर होने पर आंखों को असहजता महसूस हो सकती है।

लगातार परेशानी हो तो डॉक्टर से कराएं जांच

अगर आंखों में बार-बार दर्द या जलन, लगातार धुंधला दिखाई देना, सिरदर्द या नजर से जुड़ी दूसरी परेशानी बनी रहती है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में नेत्र विशेषज्ञ से जांच और सलाह लेना उचित रहेगा।

यह भी समझना जरूरी है कि स्क्रीन देखने से होने वाली अस्थायी आंखों की थकान और आंखों की स्थायी रोशनी कम होना एक ही समस्या नहीं हैं। अगर नजर में लगातार बदलाव महसूस हो रहा है, तो इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।

इसलिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है। स्क्रीन टाइम को संतुलित करना, बीच-बीच में ब्रेक लेना, सही दूरी बनाए रखना और आंखों को पर्याप्त आराम देना आंखों पर पड़ने वाले तनाव को कम करने में मदद कर सकता है।


बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम आंखों के लिए बन सकता है परेशानी, ऐसे रखें नजरों का ख्याल

आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन पढ़ाई और मनोरंजन के चलते बच्चों की दिनचर्या में स्क्रीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ गया है। मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसका सीधा असर उनकी आंखों और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आगामी 8 अक्टूबर 2026 को मनाए जाने वाले विश्व दृष्टि दिवस (World Sight Day) के अवसर पर वैश्विक अभियान ‘लव योर आइज़’ (अपनी आंखों से प्यार करें) के तहत बच्चों की दृष्टि सुरक्षा और उनके सही स्क्रीन टाइम को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।

स्क्रीन टाइम और आंखों पर इसके दुष्परिणाम
विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक लगातार स्क्रीन के सामने रहने से बच्चों की आंखों में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसमें आंखों का सूखापन, थकान, सिरदर्द और धुंधलापन आम है। इसके अलावा, नजदीक की चीजों पर लगातार फोकस करने और आउटडोर गतिविधियों में कमी आने के कारण बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष – दूर की चीजें धुंधली दिखना) का खतरा काफी बढ़ जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों के अनुसार:

1 वर्ष से कम उम्र: के बच्चों के लिए किसी भी प्रकार के स्क्रीन समय की बिल्कुल सलाह नहीं दी जाती है।

2 से 4 वर्ष की आयु: के बच्चों के लिए स्क्रीन देखने का समय प्रतिदिन अधिकतम 1 घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए, और जितना कम हो उतना बेहतर है।

बच्चों की आंखें सुरक्षित रखने के कामगार उपाय
माता-पिता इन आसान उपायों को अपनाकर बच्चों की आंखों की रक्षा कर सकते हैं:

20-20-20 नियम अपनाएं: बच्चे को कहें कि हर 20 मिनट के बाद स्क्रीन से नजर हटाकर करीब 20 फीट दूर किसी वस्तु को कम से कम 20 सेकंड के लिए देखें।

आउटडोर खेल: बच्चों को रोजाना कम से कम 90 मिनट दिन के उजाले में बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।

दूरी और समय सीमा: मोबाइल या टैबलेट को आंखों के बेहद पास रखकर देखने से रोकें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर दें।

नियम बनाएं: भोजन के समय, पढ़ाई के दौरान और सोने से पहले घर में ‘स्क्रीन-फ्री’ माहौल रखें। अचानक पूरी तरह पाबंदी लगाने के बजाय स्क्रीन का समय धीरे-धीरे कम करें।

विशेषज्ञ की सलाह: यदि बच्चे को बार-बार सिरदर्द, आंखें मिचमिचाने या दूर की चीजें देखने में परेशानी हो, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ (Ophthalmologist) से जांच कराएं।


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