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बार-बार फूल रही है सांस तो न करें नजरअंदाज, दिल से लेकर फेफड़ों तक इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

Category Archives: फिटनेस

बार-बार फूल रही है सांस तो न करें नजरअंदाज, दिल से लेकर फेफड़ों तक इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलना, थोड़ी दूर चलते ही हांफने लगना या सामान्य काम करने के बाद भी सांस लेने में परेशानी होना कई लोग थकान समझकर टाल देते हैं। खासकर कम उम्र में ऐसी समस्या होने पर इसे फिटनेस की कमी या कमजोरी से जोड़ दिया जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार लगातार या असामान्य तरीके से सांस फूलना शरीर में किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। इसकी वजह केवल फेफड़ों से जुड़ी बीमारी ही नहीं, बल्कि हृदय संबंधी परेशानी, खून की कमी या अन्य गंभीर स्थितियां भी हो सकती हैं।

मेडिकल भाषा में सांस फूलने की समस्या को डिस्प्निया कहा जाता है। तेज दौड़ने, व्यायाम करने या अधिक मेहनत के बाद कुछ समय के लिए सांस तेज होना सामान्य है। लेकिन यदि बिना ज्यादा मेहनत के ही सांस फूलने लगे, थोड़ी दूरी चलने पर परेशानी होने लगे या आराम करते समय भी सांस लेने में दिक्कत महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

आखिर क्यों फूलती है सांस?

सांस फूलना अपने आप में कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर में किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए फेफड़े, हृदय, रक्त और मांसपेशियां मिलकर काम करते हैं।

फेफड़े हवा से ऑक्सीजन लेकर उसे रक्त तक पहुंचाते हैं। इसके बाद लाल रक्त कोशिकाएं ऑक्सीजन को शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाती हैं और हृदय इस रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है। इस प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर समस्या आने पर शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी महसूस हो सकती है।

दिल की बीमारी का भी हो सकता है संकेत

सांस फूलने को केवल फेफड़ों की समस्या मानना सही नहीं है। कई हृदय रोगों में भी यह शुरुआती लक्षण के रूप में सामने आ सकता है। यदि हृदय की पंपिंग क्षमता कमजोर हो जाए या हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन न पहुंच पाए, तो शरीर की जरूरत पूरी करने में परेशानी होती है और सांस फूल सकती है।

कोरोनरी आर्टरी डिजीज में हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में वसा और कोलेस्ट्रॉल जमा होने से उनका रास्ता संकरा हो सकता है। इससे हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और शारीरिक गतिविधि के दौरान सांस फूलने जैसी समस्या हो सकती है।

इसके अलावा हार्ट वाल्व की बीमारी में भी सांस फूलना देखा जा सकता है। हृदय के वाल्व रक्त को सही दिशा में प्रवाहित करने में मदद करते हैं। वाल्व के संकरे होने या सही तरीके से बंद न होने पर हृदय को रक्त पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है, जिससे सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

अस्थमा और सीओपीडी भी हो सकते हैं जिम्मेदार

सांस फूलने के प्रमुख कारणों में अस्थमा भी शामिल है। इसमें वायुमार्ग में सूजन और संकुचन हो सकता है, जिससे फेफड़ों में हवा का आवागमन प्रभावित होता है। इसके चलते सांस फूलने के साथ घरघराहट, खांसी और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

धूल, धुआं, परागकण, ठंडी हवा, एलर्जी या वायरल संक्रमण जैसी स्थितियां अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं।

वहीं क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) में वायुमार्ग और फेफड़ों की कार्यक्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होती है। इसमें लंबे समय तक खांसी, बलगम, सांस फूलना और मामूली शारीरिक गतिविधि के बाद भी थकान जैसी शिकायत हो सकती है।

खून की कमी से भी हो सकती है सांस फूलने की परेशानी

हर बार सांस फूलने की वजह हृदय या फेफड़ों की बीमारी नहीं होती। एनीमिया भी इसका एक कारण हो सकता है। शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने पर रक्त पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन को शरीर के अंगों तक नहीं पहुंचा पाता।

ऐसे में शरीर ऑक्सीजन की कमी पूरी करने के लिए तेजी से सांस लेने की कोशिश करता है। यही वजह है कि एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति को सामान्य काम करने, पैदल चलने या सीढ़ियां चढ़ने के दौरान भी सांस फूलने की शिकायत हो सकती है।

फेफड़ों में खून का थक्का पहुंचना भी गंभीर स्थिति

पल्मोनरी एम्बोलिज्म एक गंभीर स्थिति है, जिसमें शरीर की किसी नस में बना रक्त का थक्का टूटकर फेफड़ों की रक्त वाहिका तक पहुंच सकता है। इससे फेफड़ों में रक्त का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।

इस स्थिति में अचानक सांस फूलना, सीने में दर्द और दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे लक्षण अचानक सामने आएं तो इसे सामान्य थकान मानकर इंतजार करना उचित नहीं है और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

कब हो जाएं सतर्क?

अगर सांस फूलने की समस्या बार-बार हो रही है, पहले की तुलना में कम मेहनत पर ही सांस चढ़ने लगी है, आराम की स्थिति में भी सांस लेने में परेशानी होती है या इसके साथ सीने में दर्द, चक्कर, अत्यधिक कमजोरी या दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्या है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारियों और रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है। सांस फूलने की समस्या के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।


सोया चाप खाने से पहले जान लें फायदे और नुकसान, सेहत पर कैसा पड़ता है असर?

आज के समय में सोया चाप फास्ट फूड और रेस्टोरेंट मेन्यू का लोकप्रिय हिस्सा बन चुकी है। खासकर शाकाहारी लोगों के बीच इसे प्रोटीन से भरपूर विकल्प के रूप में पसंद किया जाता है। हालांकि, यह जितनी स्वादिष्ट होती है, उतना ही जरूरी है यह समझना कि इसे किस तरह तैयार किया गया है और कितनी मात्रा में खाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित मात्रा में और सही तरीके से बनाई गई सोया चाप फायदेमंद हो सकती है, लेकिन अत्यधिक प्रोसेस्ड या ज्यादा तेल-मसालों वाली सोया चाप सेहत पर नकारात्मक असर भी डाल सकती है।

क्या होती है सोया चाप?

सोया चाप मुख्य रूप से सोयाबीन प्रोटीन से तैयार किया जाने वाला खाद्य पदार्थ है, जिसे अक्सर शाकाहारी लोगों के लिए मीट के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सही गुणवत्ता वाली सोया चाप में प्रति 100 ग्राम लगभग 12 से 15 ग्राम प्रोटीन हो सकता है, जो शरीर की प्रोटीन जरूरत पूरी करने में मदद करता है।

सोया चाप खाने के फायदे

प्रोटीन की अच्छी मात्रा
सोया चाप शरीर को आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध कराती है, जो मांसपेशियों के विकास और ऊतकों की मरम्मत के लिए जरूरी माना जाता है।

लंबे समय तक पेट भरा रखने में मददगार
प्रोटीन युक्त भोजन जल्दी भूख नहीं लगने देता, जिससे अनावश्यक स्नैकिंग कम हो सकती है और वजन नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

फिटनेस पसंद लोगों के लिए उपयोगी
वर्कआउट करने वाले लोगों के लिए पर्याप्त प्रोटीन जरूरी होता है। संतुलित आहार के साथ सीमित मात्रा में सोया चाप इसका एक अच्छा विकल्प बन सकती है।

किन बातों का रखें ध्यान?

अधिक तेल और मसाले बढ़ा सकते हैं जोखिम
रेस्टोरेंट या स्ट्रीट फूड में मिलने वाली सोया चाप अक्सर अधिक तेल, क्रीम और मसालों के साथ बनाई जाती है, जिससे इसकी कैलोरी और फैट काफी बढ़ जाते हैं।

प्रोसेस्ड फूड होने के कारण सावधानी जरूरी
बाजार में उपलब्ध कई प्रकार की सोया चाप अत्यधिक प्रोसेस्ड होती हैं। इनमें स्वाद और बनावट बढ़ाने के लिए अतिरिक्त सामग्री मिलाई जाती है, जो नियमित सेवन के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।

कुछ लोगों को हो सकती है एलर्जी
सोया से एलर्जी या संवेदनशीलता रखने वाले लोगों में इसका सेवन गैस, पेट फूलना या पाचन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है।

हेल्दी तरीके से कैसे खाएं?
घर पर कम तेल और हल्के मसालों के साथ तैयार करें।
तली हुई या ज्यादा क्रीमी सोया चाप खाने से बचें।
इसे हरी सब्जियों, सलाद और संतुलित भोजन के साथ शामिल करें।
रोजाना या बहुत अधिक मात्रा में सेवन करने से बचें।
क्या इसे डाइट में शामिल करना चाहिए?

सोया चाप पूरी तरह से नुकसानदायक नहीं है। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि इसे किस तरह तैयार किया गया है और कितनी मात्रा में खाया जा रहा है। यदि इसे सीमित मात्रा में, कम तेल और संतुलित आहार के साथ खाया जाए तो यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत बन सकती है। हालांकि, बाजार में मिलने वाली अधिकांश सोया चाप में सोयाबीन के अलावा मैदा और व्हीट ग्लूटेन जैसी सामग्री भी मिलाई जाती है, इसलिए इसे नियमित भोजन का मुख्य हिस्सा बनाने से पहले गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या डाइट संबंधी निर्णय के लिए डॉक्टर या योग्य न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह अवश्य लें।

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क्या वजन घटाने के लिए रोटी छोड़ना जरूरी है? आइये जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

अक्सर वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोग सबसे पहले अपनी डाइट से रोटी को बाहर कर देते हैं। उनका मानना होता है कि रोटी खाने से वजन बढ़ता है, लेकिन पोषण विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा जरूरी नहीं है। यदि सही मात्रा में और संतुलित आहार के साथ रोटी का सेवन किया जाए, तो यह वेट लॉस प्लान का हिस्सा भी बन सकती है। आइए जानते हैं कि वजन घटाने के दौरान रोटी को लेकर क्या सच है और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

वजन कम करने के लिए केवल रोटी छोड़ देना कोई जादुई उपाय नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर का वजन तब घटता है, जब आप अपनी जरूरत से कम कैलोरी लेते हैं और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करते हैं। ऐसे में रोटी को पूरी तरह छोड़ने की बजाय सही मात्रा में खाना अधिक फायदेमंद हो सकता है।

क्या वेट लॉस में रोटी खा सकते हैं?

जवाब है—हां। अगर रोटी संतुलित डाइट का हिस्सा हो और उसके साथ पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियां शामिल हों, तो यह वजन घटाने में बाधा नहीं बनती। सबसे जरूरी बात है कि पूरे दिन की कुल कैलोरी पर ध्यान दिया जाए।

रोटी क्यों हो सकती है फायदेमंद?
साबुत गेहूं की रोटी में फाइबर होता है, जो लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है।
इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे दिनभर सक्रिय रहने में सहायता मिलती है।
दाल, पनीर, दही, अंडा या अन्य प्रोटीन स्रोतों के साथ रोटी खाने से भोजन अधिक संतुलित बनता है।

एक दिन में कितनी रोटी खानी चाहिए?

रोटी की मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह उम्र, वजन, जीवनशैली और शारीरिक गतिविधि पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर एक समय के भोजन में 1 से 2 मध्यम आकार की रोटी कई लोगों के लिए पर्याप्त मानी जाती है। बेहतर होगा कि मैदा की जगह साबुत गेहूं या मल्टीग्रेन आटे की रोटी का चयन करें।

इन बातों का रखें ध्यान
रोटी पर जरूरत से ज्यादा घी या मक्खन लगाने से बचें।
भोजन के साथ तली-भुनी और अधिक तेल वाली चीजों का सेवन कम करें।
जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाएं।
नियमित व्यायाम, पर्याप्त पानी और अच्छी नींद भी वजन घटाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।

नोट: यह जानकारी विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार की गई है। किसी भी विशेष डाइट या स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह लेना उचित रहेगा।

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गलत तकिया बन सकता है गर्दन दर्द की वजह, जानें सही तकिया चुनने का तरीका

अच्छी और गहरी नींद के लिए सिर्फ सही गद्दा ही नहीं, बल्कि सही तकिया भी बेहद अहम भूमिका निभाता है। अगर सुबह उठते ही गर्दन में दर्द, कंधों में जकड़न या सिर भारी महसूस होता है, तो इसकी वजह आपका तकिया भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गलत ऊंचाई या आकार का तकिया रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में अपनी सोने की आदत के अनुसार सही तकिया चुनना जरूरी है।

अच्छी नींद के लिए सही तकिया क्यों है जरूरी?

नींद के दौरान शरीर को पूरी तरह आराम तभी मिलता है, जब सिर, गर्दन और रीढ़ एक सीध में रहें। यदि तकिया बहुत ऊंचा, बहुत पतला या जरूरत से ज्यादा कठोर है, तो शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है। इसका असर नींद की गुणवत्ता के साथ-साथ अगले दिन की सेहत पर भी दिखाई देता है।

गलत तकिया बन सकता है दर्द की वजह

विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक गलत तकिया इस्तेमाल करने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे—

सुबह उठते ही गर्दन में दर्द या अकड़न
कंधों में भारीपन और जकड़न
सिरदर्द की शिकायत
रात में बार-बार नींद खुलना
पूरे दिन थकान महसूस होना
ज्यादा ऊंचा तकिया क्यों नहीं है सही?

अगर तकिया जरूरत से ज्यादा ऊंचा है, तो सोते समय गर्दन आगे की ओर झुक जाती है। इससे गर्दन की मांसपेशियों और नसों पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर पीठ के बल सोने वालों के लिए ऊंचा तकिया नुकसानदायक साबित हो सकता है।

बहुत पतला तकिया भी बढ़ा सकता है परेशानी

सिर्फ ऊंचा ही नहीं, बहुत पतला तकिया भी सही विकल्प नहीं माना जाता। यदि तकिया सिर और गर्दन को पर्याप्त सहारा नहीं देता, तो रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति बिगड़ सकती है। इससे गर्दन में खिंचाव, दर्द और सुबह उठने पर शरीर में थकान महसूस हो सकती है।

अपनी सोने की आदत के अनुसार चुनें तकिया

हर व्यक्ति के लिए एक जैसा तकिया उपयुक्त नहीं होता। सही चुनाव आपकी सोने की पोजीशन पर निर्भर करता है।

पीठ के बल सोने वाले लोग

मध्यम ऊंचाई वाला तकिया चुनें।
गर्दन को प्राकृतिक सपोर्ट मिले।
सिर और रीढ़ एक सीध में रहें।

करवट लेकर सोने वाले लोग

थोड़ा ऊंचा और मजबूत तकिया बेहतर माना जाता है।
इससे गर्दन और कंधों के बीच सही संतुलन बना रहता है और रीढ़ सीधी रहती है।

तकिया कब बदलना चाहिए?

समय के साथ तकिए की मजबूती और आकार बदलने लगता है, जिससे उसका सपोर्ट कम हो जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो सामान्यतः 1 से 3 साल के बीच तकिया बदल देना चाहिए। यदि तकिया दब गया हो, आकार बिगड़ गया हो या उस पर सोने के बाद लगातार दर्द महसूस हो, तो नया तकिया लेना बेहतर रहेगा।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। किसी भी लगातार दर्द या स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

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लो बीपी में ज्यादा नमक खाना सही या गलत? जानिए क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट्स

लो ब्लड प्रेशर (हाइपोटेंशन) होने पर अक्सर सबसे पहले नमक खाने या नमक वाला पानी पीने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इससे ब्लड प्रेशर तेजी से सामान्य हो सकता है। हालांकि, यह उपाय हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होता। कई बार बिना डॉक्टर की सलाह के ज्यादा नमक खाना फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि लो बीपी में नमक कब लाभदायक होता है और किन परिस्थितियों में इससे बचना चाहिए।

क्या लो बीपी में नमक खाना सही है?

नमक में मौजूद सोडियम शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। जब शरीर में सोडियम या तरल पदार्थों की कमी हो जाती है तो ब्लड प्रेशर गिर सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर जरूरत के अनुसार नमक और तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाने की सलाह दे सकते हैं। लेकिन हर बार लो बीपी की वजह सोडियम की कमी नहीं होती, इसलिए बिना कारण जाने नमक का सेवन बढ़ाना उचित नहीं माना जाता।

किन परिस्थितियों में मिल सकता है फायदा?

यदि लो ब्लड प्रेशर डिहाइड्रेशन, अधिक पसीना आने, उल्टी-दस्त या शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी के कारण हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार नमक और पर्याप्त पानी लेना लाभकारी हो सकता है। इसके साथ ओआरएस या अन्य इलेक्ट्रोलाइट युक्त पेय भी कुछ मामलों में मदद कर सकते हैं। हालांकि, इसका निर्णय व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

जरूरत से ज्यादा नमक क्यों है नुकसानदायक?

अधिक मात्रा में नमक खाने से शरीर पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। लगातार ज्यादा सोडियम लेने से:

ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है।
किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
शरीर में सूजन और पानी जमा होने की समस्या हो सकती है।
हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

इसी वजह से सिर्फ लो बीपी के डर से रोजाना अतिरिक्त नमक खाना स्वास्थ्य के लिए सही विकल्प नहीं है।

लो ब्लड प्रेशर होने पर क्या करें?
दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
लंबे समय तक खाली पेट रहने से बचें।
पौष्टिक और संतुलित आहार लें।
अचानक बैठने या लेटने की स्थिति से खड़े न हों।
बार-बार चक्कर आना, बेहोशी या अत्यधिक कमजोरी महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

किन लोगों को बरतनी चाहिए विशेष सावधानी?

जिन लोगों को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी, हृदय रोग या शरीर में सूजन की समस्या है, उन्हें नमक की मात्रा बढ़ाने से पहले चिकित्सकीय सलाह अवश्य लेनी चाहिए। ऐसे मामलों में बिना सलाह के नमक का सेवन बढ़ाना नुकसान पहुंचा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध कराई गई सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

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डायबिटीज का बढ़ता खतरा: मिठाई ही नहीं, ये आदतें भी बना सकती हैं मरीज

डायबिटीज का खतरा केवल मिठाई से नहीं, बल्कि खराब लाइफस्टाइल, मोटापा, तनाव और शारीरिक निष्क्रियता से भी बढ़ता है। विशेषज्ञों ने बचाव के लिए संतुलित खानपान और नियमित व्यायाम पर जोर दिया है।

शुगर यानी डायबिटीज आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हो चुकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं और कामकाजी लोगों में भी इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में करोड़ों लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और आने वाले वर्षों में मरीजों की संख्या में और बड़ा इजाफा होने की आशंका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर डायबिटीज किन कारणों से होती है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है।

इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (IDF) के अनुसार, दुनिया में करीब 589 मिलियन (58.9 करोड़) वयस्क डायबिटीज से प्रभावित हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह संख्या बढ़कर 853 मिलियन (85.3 करोड़) के पार पहुंच सकती है। चिंता की बात यह भी है कि बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद अपनी स्थिति से अनजान रहते हैं, जिससे समय पर इलाज नहीं हो पाता और गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।

क्या केवल चीनी खाने से होती है डायबिटीज?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि सिर्फ चीनी या मिठाई खाने से डायबिटीज हो जाती है। वास्तव में डायबिटीज एक मेटाबॉलिक बीमारी है, जिसमें शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या फिर इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर पाता। इसके कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है।

हालांकि, जरूरत से ज्यादा चीनी और मीठे पेय पदार्थों का सेवन वजन बढ़ाने का कारण बन सकता है। बढ़ता वजन और मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देते हैं, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। यानी चीनी अप्रत्यक्ष रूप से जोखिम बढ़ा सकती है, लेकिन यह बीमारी का एकमात्र कारण नहीं है।

लाइफस्टाइल भी निभाती है अहम भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधियों की कमी, असंतुलित भोजन, मोटापा, पर्याप्त नींद न लेना और लगातार तनाव में रहना भी डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का अधिक सेवन भी ब्लड शुगर को प्रभावित करता है।

किन खाद्य पदार्थों से बढ़ सकता है खतरा?

डॉक्टरों का कहना है कि केवल मिठाइयों से ही नहीं, बल्कि सफेद ब्रेड, मैदा, केक, बिस्कुट, पैकेज्ड जूस, कोल्ड ड्रिंक, तले हुए खाद्य पदार्थ और अत्यधिक प्रोसेस्ड स्नैक्स का बार-बार सेवन भी नुकसानदायक हो सकता है। इनमें मौजूद अतिरिक्त चीनी, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और अस्वास्थ्यकर फैट शरीर के वजन और ब्लड शुगर दोनों पर नकारात्मक असर डालते हैं।

तनाव और कम नींद भी बन सकते हैं वजह

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार तनाव और पर्याप्त नींद न लेने से शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा हो सकता है। इससे कोर्टिसोल जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो इंसुलिन की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा तनाव के दौरान लोग अक्सर अनहेल्दी फूड ज्यादा खाते हैं और शारीरिक गतिविधि कम कर देते हैं, जिससे डायबिटीज का खतरा और बढ़ जाता है।

पेट की चर्बी बढ़ना भी है चेतावनी

डॉक्टरों के मुताबिक, पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी टाइप-2 डायबिटीज का बड़ा जोखिम कारक है। मोटापे के कारण शरीर में सूजन बढ़ती है और इंसुलिन सही तरीके से काम नहीं कर पाता। ऐसे में नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और वजन नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है।

डायबिटीज से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मीठे पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, ट्रांस फैट और धूम्रपान-शराब से दूरी बनाए रखें। रोजाना शारीरिक गतिविधि बढ़ाएं, संतुलित भोजन करें, पर्याप्त पानी पिएं और कम से कम 150 मिनट प्रति सप्ताह मध्यम तीव्रता वाला व्यायाम करें। साथ ही 7-8 घंटे की अच्छी नींद और तनाव को नियंत्रित रखना भी डायबिटीज के खतरे को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या उपचार के लिए डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

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सुबह उठते ही होता है सिरदर्द? तो इसे हल्के में न लें, इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

सुबह नींद खुलते ही सिर में तेज दर्द या भारीपन महसूस होना कई लोगों की आम समस्या है। अक्सर लोग इसे थकान या तनाव का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यदि यह परेशानी लगातार बनी रहे तो यह शरीर में छिपी किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मॉर्निंग हेडेक डिहाइड्रेशन, नींद की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, माइग्रेन या स्लीप एपनिया जैसी स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में समय रहते इसकी वजह जानना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है।

पानी की कमी भी बन सकती है वजह

रातभर सोने के दौरान शरीर को कई घंटों तक पानी नहीं मिलता, जिससे हल्का डिहाइड्रेशन हो सकता है। शरीर में पानी की कमी होने पर मस्तिष्क पर असर पड़ता है और सुबह उठते ही सिरदर्द महसूस हो सकता है। इस समस्या से बचने के लिए दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना और सुबह उठकर एक-दो गिलास पानी पीने की आदत फायदेमंद मानी जाती है।

अधूरी नींद बढ़ाती है परेशानी

लगातार कम सोना या बार-बार नींद टूटना भी सुबह सिरदर्द का बड़ा कारण हो सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता और तनाव से जुड़े हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, जिससे सिरदर्द की शिकायत बढ़ सकती है। विशेषज्ञ रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की सलाह देते हैं।

स्लीप एपनिया को न करें नजरअंदाज

अगर सोते समय सांस कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है, तेज खर्राटे आते हैं या दिनभर अत्यधिक नींद महसूस होती है, तो यह स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिसके कारण सुबह उठते ही सिरदर्द और थकान महसूस हो सकती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहे तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

माइग्रेन भी हो सकता है कारण

माइग्रेन में सिर के एक हिस्से में तेज धड़कन जैसा दर्द होता है, जो कई घंटों तक बना रह सकता है। कई मरीजों में इसका दर्द सुबह उठते ही शुरू हो जाता है। इसके साथ मतली, उल्टी और तेज रोशनी या आवाज से परेशानी भी हो सकती है। बार-बार ऐसी समस्या होने पर न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए।

हाई ब्लड प्रेशर का संकेत

अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर भी सुबह सिरदर्द की वजह बन सकता है। यदि सिरदर्द के साथ चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना या सीने में दर्द जैसी शिकायत हो, तो इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। नियमित ब्लड प्रेशर की जांच इस जोखिम को कम करने में मदद करती है।

शराब और कैफीन का ज्यादा सेवन

रात में अधिक शराब पीने या जरूरत से ज्यादा कैफीन लेने से भी अगली सुबह सिरदर्द हो सकता है। वहीं, अचानक कैफीन छोड़ने पर भी यह समस्या देखने को मिलती है। इसलिए कैफीन का सीमित सेवन करें, शराब से बचें और शरीर में पानी की कमी न होने दें।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य सलाह पर आधारित है। यदि सुबह का सिरदर्द बार-बार हो रहा है या इसके साथ अन्य गंभीर लक्षण भी दिखाई दें, तो स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

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सिर्फ हेल्दी खाना नहीं, सही समय पर खाना भी है जरूरी, जानिए पूरे दिन का परफेक्ट डाइट शेड्यूल

आजकल लोग हेल्दी डाइट पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन भोजन का सही समय अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर को सिर्फ पौष्टिक भोजन ही नहीं, बल्कि सही समय पर भोजन मिलना भी उतना ही जरूरी है। अनियमित समय पर खाना खाने से पाचन तंत्र प्रभावित होता है और मोटापा, एसिडिटी, डायबिटीज व नींद से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में अगर आप खुद को दिनभर फिट और ऊर्जावान रखना चाहते हैं तो अपने खाने का एक तय शेड्यूल बनाना बेहद जरूरी है।

सेहतमंद रहने के लिए कब खाएं क्या? जानिए पूरे दिन का सही डाइट टाइम

सुबह का नाश्ता (7:00 से 9:00 बजे)

रातभर के लंबे अंतराल के बाद शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है। इसलिए सुबह उठने के एक से दो घंटे के भीतर नाश्ता कर लेना चाहिए। नाश्ते में प्रोटीन, फाइबर, फल, दूध, अंडा, ओट्स या दलिया जैसी चीजें शामिल करना फायदेमंद माना जाता है।

मिड मॉर्निंग स्नैक (10:30 से 11:30 बजे)

अगर दोपहर के भोजन में अभी समय है तो बीच में हल्का और पौष्टिक स्नैक लेना बेहतर रहता है। इस समय मौसमी फल, नारियल पानी, छाछ या थोड़े से ड्राई फ्रूट्स शरीर को ऊर्जा देने के साथ भूख भी नियंत्रित रखते हैं।

दोपहर का भोजन (12:30 से 2:00 बजे)

दोपहर का खाना दिन का सबसे संतुलित भोजन होना चाहिए। इसमें दाल, हरी सब्जियां, रोटी, चावल, सलाद और दही जैसी चीजें शामिल करें। कोशिश करें कि रोजाना लंच एक निश्चित समय पर ही करें, ताकि पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम कर सके।

शाम का हेल्दी स्नैक (4:00 से 5:30 बजे)

शाम के समय बहुत ज्यादा तली-भुनी चीजें खाने से बचें। इसकी जगह ग्रीन टी, स्प्राउट्स, भुना चना, मखाने या फल जैसे हल्के विकल्प चुनें। इससे रात के खाने तक ऊर्जा बनी रहती है और ओवरईटिंग की संभावना भी कम होती है।

रात का खाना (7:00 से 8:30 बजे)

विशेषज्ञों के मुताबिक रात का भोजन हल्का और जल्दी कर लेना चाहिए। सोने से कम से कम दो से तीन घंटे पहले डिनर करने से खाना आसानी से पच जाता है और नींद भी बेहतर आती है। रात में ज्यादा तला-भुना और भारी भोजन करने से बचना चाहिए।

देर से खाना खाने के क्या नुकसान हो सकते हैं?
पाचन प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
गैस और एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है।
वजन बढ़ने का खतरा रहता है।
ब्लड शुगर का स्तर प्रभावित हो सकता है।
नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है और सुबह थकान महसूस हो सकती है।
समय पर भोजन करने के फायदे
पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करता है।
शरीर को पूरे दिन पर्याप्त ऊर्जा मिलती है।
वजन नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
हार्मोन और मेटाबॉलिज्म संतुलित रहते हैं।
हृदय और संपूर्ण स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है।
रोजाना तय समय पर खाना खाने की डालें आदत

स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए केवल पौष्टिक भोजन चुनना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सही समय पर खाना भी उतना ही आवश्यक है। नियमित समय पर भोजन करने से शरीर की जैविक घड़ी (Body Clock) संतुलित रहती है, पाचन बेहतर होता है और कई बीमारियों का खतरा कम हो सकता है। यदि आप लंबे समय तक फिट और एक्टिव रहना चाहते हैं तो अपने खाने का समय तय करें और उसी का नियमित रूप से पालन करें।

नोट: यह जानकारी विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी विशेष बीमारी, दवा या डाइट संबंधी सलाह के लिए डॉक्टर या प्रमाणित डायटीशियन से परामर्श अवश्य लें।

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क्या आपकी भी सीढ़ियां चढ़ते ही फूलने लगती है सांस? तो जान लीजिये इसके पीछे के कारण

क्या कुछ ही सीढ़ियां चढ़ने के बाद आपकी सांसें तेज चलने लगती हैं और थकावट महसूस होने लगती है? अक्सर लोग इसे सामान्य कमजोरी या बढ़ती उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। लेकिन यदि थोड़ी सी शारीरिक मेहनत पर आपकी सांस बार-बार फूल रही है, तो यह शरीर द्वारा दिया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अलर्ट हो सकता है। समय रहते इसके कारणों को समझना और विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद जरूरी है।

सीढ़ियां चढ़ते समय आखिर क्यों फूलती है सांस?
सीढ़ियां चढ़ना एक मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि (Physical Activity) है। जब आप सीढ़ियां चढ़ते हैं, तो शरीर की मांसपेशियों को काम करने के लिए सामान्य से अधिक ऑक्सीजन और ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

दिल और फेफड़ों का तालमेल: इस अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए दिल तेजी से खून पंप करता है और फेफड़े अधिक ऑक्सीजन लेने के लिए तेजी से काम करते हैं।

सामान्य स्थिति: स्वस्थ व्यक्ति में कुछ मिनट विश्राम करने के बाद सांसें स्वाभाविक रूप से सामान्य हो जाती हैं।

असामान्य स्थिति: यदि दिल, फेफड़ों या रक्त संचार (Blood Circulation) में कोई रुकावट या समस्या हो, तो थोड़ी सी भी मेहनत पर सांस तेजी से फूलने लगती है।

सांस फूलने के मुख्य कारण
सांस फूलने की समस्या के पीछे सामान्य से लेकर गंभीर चिकित्सीय कारण हो सकते हैं:

सामान्य कारण:

शारीरिक सक्रियता की कमी (Sedentary Lifestyle) और मोटापा।

तेजी से सीढ़ियां चढ़ना या अत्यधिक तनाव/घबराहट।

धूम्रपान की आदत और बढ़ती उम्र।

चिकित्सीय (Medical) कारण:

फेफड़ों की बीमारियां: अस्थमा (Asthma) या सीओपीडी (COPD)।

हृदय संबंधी समस्याएं: दिल की कार्यक्षमता में कमी या आर्टरी ब्लॉक।

एनीमिया (Anemia): शरीर में हीमोग्लोबिन या खून की कमी।

थायरॉयड: थायरॉयड हार्मोन का असंतुलन।

कब हो जाएं तुरंत अलर्ट? (इमर्जेंसी के संकेत)

यदि सांस फूलने के साथ-साथ आपको निम्नलिखित लक्षण महसूस हों, तो इसे मेडिकल इमरजेंसी मानकर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

सीने में दर्द, भारीपन या जकड़न महसूस होना।

चक्कर आना, सिर घूमना या बेहोशी जैसी स्थिति बनना।

पर्याप्त आराम (Rest) करने के बाद भी सांस सामान्य न होना।

हाथ, पैर या होठों का रंग नीला या पीला पड़ना।

बचाव और ध्यान रखने योग्य सावधानियां
धीरे-धीरे शुरुआत करें: सीढ़ियां चढ़ते समय हड़बड़ी न करें, गति सामान्य रखें।

शारीरिक सक्रियता बढ़ाएं: रोजाना वॉक, हल्का व्यायाम और प्राणायाम (Breathing Exercises) को रूटीन में शामिल करें।

जीवनशैली में सुधार: वजन नियंत्रित रखें, संतुलित आहार लें और धूम्रपान से दूरी बनाएं।

दवाइयों का ध्यान रखें: यदि आप पहले से हृदय रोग या अस्थमा के मरीज हैं, तो अपनी दवाएं नियमित रूप से लें।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में स्वयं उपचार करने के बजाय डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।


कम उम्र में बढ़ रहा दिल की बीमारियों का खतरा, जानिए कौन-सी आदतें बन रही हैं वजह

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हृदय रोग केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गए हैं। बदलती जीवनशैली, अनियमित खान-पान और बढ़ते तनाव के कारण कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर और कार्डियक अरेस्ट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते दैनिक आदतों में सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में युवाओं में हृदय संबंधी बीमारियां और तेजी से बढ़ सकती हैं।

डॉक्टरों के अनुसार, आनुवंशिक कारणों के अलावा हमारी रोजमर्रा की कई गलत आदतें दिल को नुकसान पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। घंटों बैठे रहना, जंक फूड का अधिक सेवन, धूम्रपान, पर्याप्त नींद न लेना और शारीरिक गतिविधियों की कमी धीरे-धीरे हृदय की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ कम उम्र से ही हार्ट हेल्थ पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनियाभर में सबसे अधिक मौतें हृदय रोगों के कारण होती हैं। भारत में भी बदलती जीवनशैली, मोटापा, तनाव और डायबिटीज जैसी समस्याओं ने हृदय रोगों का खतरा बढ़ा दिया है। ऐसे में समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी हो गया है।

बढ़ रहा है हृदय रोगों का खतरा

विशेषज्ञ बताते हैं कि दिल पूरे शरीर में रक्त पहुंचाने का काम करता है। लेकिन जब धमनियों में कोलेस्ट्रॉल और फैट जमा होने लगता है या ब्लड प्रेशर लगातार बढ़ा रहता है, तो हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार ये समस्याएं लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होती रहती हैं।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक अध्ययन में भी सामने आया है कि भारत के अधिकांश वयस्कों में कोलेस्ट्रॉल या रक्त में फैट का कम से कम एक स्तर सामान्य सीमा से बाहर पाया गया, जो भविष्य में हृदय रोगों का कारण बन सकता है।

किन आदतों से बढ़ता है खतरा?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ सामान्य दिखने वाली आदतें धीरे-धीरे दिल को कमजोर कर सकती हैं।

लंबे समय तक बैठे रहना: लगातार कुर्सी पर बैठकर काम करने से शरीर की कैलोरी कम खर्च होती है, जिससे मोटापा, हाई ब्लड शुगर और बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है। इससे हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

जंक और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन: पिज्जा, बर्गर, पैकेट वाले स्नैक्स और तले-भुने खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और अनहेल्दी फैट अधिक होता है। इनका नियमित सेवन ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल दोनों को बढ़ा सकता है।

तंबाकू और धूम्रपान: सिगरेट या किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। इससे रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और दिल को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

व्यायाम की कमी: नियमित शारीरिक गतिविधि न करने से मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का खतरा बढ़ता है। रोजाना कम से कम 30 मिनट की हल्की या मध्यम एक्सरसाइज दिल को स्वस्थ रखने में मदद करती है।

लगातार तनाव: लंबे समय तक मानसिक तनाव रहने से स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और हृदय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

पर्याप्त नींद न लेना: रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद न मिलने पर हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

नियमित जांच भी है जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं अक्सर बिना किसी लक्षण के विकसित होती हैं। इसलिए समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना जरूरी है। जिन लोगों के परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनानी चाहिए।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्टों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

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