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सिगरेट का धुआं सिर्फ फेफड़ों नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकता है नुकसान, बढ़ सकता है गंभीर बीमारी का खतरा

Category Archives: फिटनेस

सिगरेट का धुआं सिर्फ फेफड़ों नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकता है नुकसान, बढ़ सकता है गंभीर बीमारी का खतरा

धूम्रपान को अक्सर फेफड़ों की बीमारी और कैंसर से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका असर शरीर के कई दूसरे महत्वपूर्ण अंगों पर भी पड़ सकता है। सिगरेट के धुएं के साथ शरीर में पहुंचने वाले हानिकारक रसायन रक्त प्रवाह के जरिए अलग-अलग अंगों तक पहुंचते हैं। इनमें किडनी भी शामिल है, जो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक तंबाकू का सेवन शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों में किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।

किडनी तक कैसे पहुंचता है सिगरेट का नुकसान?

किडनी लगातार रक्त को फिल्टर करने का काम करती है। इसके साथ ही यह शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखने तथा ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है। ऐसे में रक्त प्रवाह से जुड़ी किसी भी समस्या का असर किडनी के कामकाज पर पड़ सकता है।

सिगरेट में मौजूद निकोटीन रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर सकता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने और किडनी तक रक्त पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहती है। धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा दे सकता है, जो लंबे समय में किडनी के ऊतकों और उनकी कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

कुछ अध्ययनों में धूम्रपान और क्रॉनिक किडनी डिजीज के बीच संबंध पाया गया है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है, उनमें धूम्रपान किडनी से जुड़े जोखिम को और बढ़ा सकता है।

रक्त वाहिकाओं पर भी पड़ता है असर

धूम्रपान का प्रभाव केवल किडनी के फिल्टरिंग सिस्टम तक सीमित नहीं रहता। सिगरेट का धुआं रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकता है। इसके अलावा रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ने और रक्त संचार प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

किडनी को अपना काम ठीक से करने के लिए पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन की जरूरत होती है। लंबे समय तक रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव किडनी की सामान्य कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।

दिल और दिमाग पर भी बढ़ता है खतरा

धूम्रपान का असर शरीर के पूरे कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पर पड़ सकता है। रक्त वाहिकाओं के प्रभावित होने से हृदय और मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाने वाली नसों पर भी असर पड़ सकता है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

इसके अलावा धूम्रपान शरीर में ट्राइग्लिसराइड और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित कर सकता है, जिससे हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है।

सिर्फ लंग कैंसर तक सीमित नहीं है खतरा

सिगरेट को फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, लेकिन तंबाकू का नुकसान केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। तंबाकू के धुएं में हजारों रसायन मौजूद होते हैं, जिनमें कई स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक माने जाते हैं। लंबे समय तक तंबाकू के संपर्क में रहने से शरीर के अलग-अलग हिस्सों में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

धूम्रपान का असर इम्यून सिस्टम, मुंह और मसूड़ों की सेहत, प्रजनन क्षमता और हड्डियों सहित शरीर की कई अन्य प्रणालियों पर भी पड़ सकता है।

धूम्रपान छोड़ना क्यों जरूरी?

धूम्रपान से होने वाले नुकसान को देखते हुए इसे छोड़ना स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या पहले से किडनी संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए तंबाकू से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या धूम्रपान छोड़ने के लिए डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

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मामूली सर्दी-जुकाम समझकर न करें नजरअंदाज, ये लक्षण हो सकते हैं साइनस संक्रमण के संकेत

बदलते मौसम में नाक बंद होना, छींक आना और सिरदर्द जैसी परेशानियां आम हैं। अक्सर लोग इन्हें सामान्य सर्दी-जुकाम मानकर घरेलू उपायों से ठीक होने का इंतजार करते हैं। हालांकि, अगर नाक बंद रहने के साथ चेहरे पर दबाव, गाढ़ा बलगम या सिर में लगातार दर्द बना हुआ है और समस्या कई दिनों तक दूर नहीं हो रही, तो मामला साइनस संक्रमण का भी हो सकता है। ऐसे लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना परेशानी को बढ़ा सकता है।

साइनस हमारी खोपड़ी के अंदर आंखों, नाक, माथे और गालों के आसपास मौजूद हवा से भरी छोटी-छोटी गुहाएं होती हैं। इनका संबंध सांस लेने और आवाज की गूंज से भी होता है। सामान्य स्थिति में इनकी अंदरूनी सतह बलगम बनाती है, जो छोटे मार्गों के जरिए नाक तक पहुंचकर बाहर निकल जाता है। लेकिन सूजन आने पर इन रास्तों में रुकावट पैदा हो सकती है और बलगम जमा होने लगता है।

कैसे शुरू होती है साइनस की समस्या?

साइनस संक्रमण की शुरुआत कई बार सामान्य वायरल सर्दी-जुकाम के बाद होती है। संक्रमण या एलर्जी के कारण नाक और साइनस की अंदरूनी परत में सूजन आ जाती है। इससे बलगम बाहर निकलने में परेशानी होती है और साइनस के भीतर दबाव बढ़ने लगता है।

अधिकतर मामलों में संक्रमण वायरस से जुड़ा होता है, जबकि कुछ परिस्थितियों में बैक्टीरिया भी इसकी वजह बन सकते हैं। इसके अलावा नाक की अंदरूनी संरचना में बदलाव, जैसे नाक की हड्डी का टेढ़ापन, भी बार-बार होने वाली साइनस की समस्या में भूमिका निभा सकता है।

किन संकेतों से पहचानें साइनस संक्रमण?

साइनस की परेशानी होने पर नाक और चेहरे के आसपास इसके लक्षण ज्यादा स्पष्ट नजर आ सकते हैं। नाक लंबे समय तक बंद रहना, गाढ़ा या ज्यादा मात्रा में नाक का स्राव, सिर में दर्द और चेहरे पर दबाव महसूस होना इसके प्रमुख संकेत हैं।

कुछ लोगों में गालों, माथे या आंखों के आसपास दर्द या भारीपन महसूस हो सकता है। इसके साथ सूंघने की क्षमता कमजोर पड़ना, गले में बलगम पहुंचना, खांसी और थकान जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। कभी-कभी स्वाद महसूस करने की क्षमता में भी बदलाव आ सकता है।

अगर लक्षण लगातार बने रहें, बार-बार वापस आएं या समय के साथ ज्यादा गंभीर होते जाएं, तो डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लेना बेहतर रहता है।

किन लोगों में ज्यादा हो सकता है खतरा?

जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम, एलर्जी या नाक बंद होने की शिकायत रहती है, उनमें साइनस से जुड़ी समस्या होने की संभावना बढ़ सकती है। नाक के रास्ते में लगातार रुकावट या उसकी संरचना से जुड़ी परेशानी भी जोखिम बढ़ा सकती है।

इसके अलावा धूल, धुआं और वायु प्रदूषण के संपर्क में ज्यादा रहने से नाक की अंदरूनी परत में जलन और सूजन हो सकती है। फफूंद, धूल या अन्य एलर्जेन से संवेदनशील लोगों में भी साइनस की समस्या दोबारा होने की आशंका रहती है।

बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

साइनस की परेशानी से बचने के लिए शरीर को पर्याप्त हाइड्रेटेड रखना, व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना और धूल-धुएं तथा प्रदूषित वातावरण से यथासंभव दूरी बनाना उपयोगी हो सकता है। जिन चीजों से एलर्जी होती है, उनसे बचना भी जरूरी है।

नाक बंद होने पर कुछ लोगों को भाप लेने से थोड़ी देर के लिए राहत महसूस हो सकती है, लेकिन बहुत गर्म भाप लेने से त्वचा या सांस की नली को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए घरेलू उपायों को इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए। यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं या बिगड़ रहे हैं, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे उचित कदम है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।

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सिर्फ माउथ फ्रेशनर नहीं है सौंफ, पाचन से लेकर वजन तक में हो सकती है मददगार

भारतीय खानपान में सौंफ का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। आमतौर पर इसे खाना खाने के बाद माउथ फ्रेशनर के तौर पर खाया जाता है, लेकिन इसकी पहचान केवल स्वाद और खुशबू तक सीमित नहीं है। सौंफ में मौजूद फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई प्राकृतिक पौधीय यौगिक इसे सेहत के लिहाज से भी उपयोगी बनाते हैं।

सौंफ का इस्तेमाल खासतौर पर पाचन से जुड़ी छोटी-मोटी परेशानियों के लिए पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। कई लोग इसे चबाकर खाते हैं तो कुछ लोग सौंफ की चाय या पानी का सेवन करते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सौंफ किसी बीमारी का इलाज नहीं है, बल्कि संतुलित डाइट का एक हिस्सा हो सकती है।

पाचन तंत्र के लिए मददगार हो सकती है सौंफ

खाने के बाद सौंफ खाने की परंपरा के पीछे पाचन से जुड़ी वजह भी मानी जाती है। सौंफ में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिक पाचन तंत्र की मांसपेशियों पर असर डाल सकते हैं, जिससे पेट में होने वाली हल्की ऐंठन और असहजता में राहत मिल सकती है।

गैस, पेट फूलने या भोजन के बाद भारीपन जैसी सामान्य परेशानियों में लोग पारंपरिक रूप से सौंफ का सेवन करते हैं। इसमें मौजूद फाइबर भी सामान्य पाचन प्रक्रिया के लिए उपयोगी होता है।

हालांकि, अगर कब्ज लंबे समय तक बनी रहती है, बार-बार तेज एसिडिटी होती है या पेट में लगातार दर्द रहता है, तो केवल सौंफ पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

क्या वजन घटाने में भी मदद करती है?

वजन कम करने के लिए सौंफ का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय है। सोशल मीडिया और घरेलू नुस्खों में सौंफ के पानी को वजन घटाने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, सौंफ सीधे तौर पर शरीर की चर्बी कम करती है या मेटाबॉलिज्म को तेजी से बढ़ाती है, इसके पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

हां, सौंफ में फाइबर मौजूद होता है और फाइबर युक्त चीजें कुछ समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकती हैं। इससे खाने की कुल मात्रा और कैलोरी सेवन को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।

वास्तविक वजन घटाने के लिए संतुलित भोजन, कैलोरी नियंत्रण, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

ब्लड शुगर को लेकर क्या कहते हैं शोध?

सौंफ में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पौधीय यौगिकों को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन किए गए हैं। कुछ शुरुआती शोधों में ब्लड शुगर और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सौंफ डायबिटीज की दवा का विकल्प है या इसके सेवन से ब्लड शुगर नियंत्रित हो जाएगा। डायबिटीज से पीड़ित लोगों को अपनी दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए और खानपान में किसी भी बड़े बदलाव से पहले विशेषज्ञ की राय लेना बेहतर है।

आंखों की सेहत के लिए भी उपयोगी?

सौंफ में कई एंटीऑक्सीडेंट और पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे कैरोटेनॉयड्स भी शामिल हैं, जो आंखों के स्वास्थ्य से जुड़े माने जाते हैं।

हालांकि, यह दावा करना सही नहीं होगा कि सौंफ खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है या मोतियाबिंद जैसी बीमारी रुक जाती है। आंखों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन और मिनरल से भरपूर संतुलित आहार, नियमित आंखों की जांच और जीवनशैली से जुड़े अन्य उपाय अधिक महत्वपूर्ण हैं।

कैसे करें सौंफ का सेवन?

सौंफ को सीमित मात्रा में भोजन के बाद चबाकर खाया जा सकता है। कुछ लोग इसे पानी में भिगोकर या हल्की हर्बल ड्रिंक के रूप में भी लेते हैं। हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ को जरूरत से ज्यादा मात्रा में लेने से बचना चाहिए।

अगर आप गर्भवती हैं, किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं या सौंफ का नियमित रूप से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहते हैं, तो डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लेना बेहतर रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। सौंफ को किसी बीमारी के इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा के विकल्प के रूप में नहीं लेना चाहिए।

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सिर्फ डाइट और एक्सरसाइज नहीं, मजबूत इम्युनिटी के लिए पूरी नींद भी जरूरी

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ पौष्टिक खाना और नियमित एक्सरसाइज ही काफी नहीं है। पर्याप्त और अच्छी नींद भी मजबूत इम्युनिटी के लिए बेहद अहम मानी जाती है। आज की व्यस्त जीवनशैली में देर रात तक जागना, मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करना और अनियमित समय पर सोना आम हो गया है। इसका असर केवल अगले दिन की थकान और सुस्ती पर नहीं पड़ता, बल्कि लंबे समय में शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

नींद के दौरान शरीर आराम करने के साथ-साथ खुद को रिकवर करने का काम करता है। इस दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी कई प्रक्रियाएं सक्रिय रहती हैं। इसलिए अगर आप बार-बार नींद पूरी नहीं कर रहे हैं, तो इसका असर आपकी सेहत पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

नींद का इम्युनिटी से क्या कनेक्शन है?

जब हम सोते हैं, तब शरीर में कई ऐसी प्रक्रियाएं चलती हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी होती हैं। पर्याप्त नींद शरीर को इन प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद करती है।

एक-दो दिन कम सोने से आमतौर पर बड़ी समस्या नहीं होती, लेकिन अगर नींद की कमी लगातार बनी रहे तो शरीर की सामान्य इम्यून प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि संक्रमण से बचाव के लिए खानपान और एक्सरसाइज के साथ-साथ नींद पर भी ध्यान देना जरूरी है।

कम नींद से बढ़ सकती है संक्रमण की आशंका

शरीर में प्रवेश करने वाले वायरस और अन्य संक्रमणों से मुकाबला करने में इम्युनिटी अहम भूमिका निभाती है। इसके लिए प्रतिरक्षा प्रणाली का सही तरीके से काम करना जरूरी है। कई अध्ययनों में नींद की कमी और संक्रमण के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध देखा गया है।

खासकर लगातार कम या खराब गुणवत्ता वाली नींद लेने पर सर्दी-जुकाम जैसे संक्रमणों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि देर रात तक जागने की आदत का प्रभाव सिर्फ सुबह की थकान या नींद आने तक सीमित नहीं रहता।

रोज कितने घंटे सोना चाहिए?

वयस्कों के लिए आमतौर पर हर रात कम से कम 7 घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है। बच्चों और किशोरों को उम्र के अनुसार इससे ज्यादा नींद की जरूरत हो सकती है।

हालांकि सिर्फ बिस्तर पर बिताया गया समय ही पर्याप्त नहीं है। अगर कोई व्यक्ति 7-8 घंटे सोने के बाद भी लगातार थका हुआ महसूस करता है, रात में बार-बार उसकी नींद खुलती है या लंबे समय से नींद से जुड़ी परेशानी बनी हुई है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

नींद की कमी का सेहत पर व्यापक असर

लगातार कम सोने को केवल इम्युनिटी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नींद की कमी का संबंध कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से भी पाया गया है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने से ब्लड प्रेशर, वजन बढ़ने, हृदय स्वास्थ्य और ब्लड शुगर से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

इसके अलावा नींद पूरी न होने पर ध्यान लगाने, याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में अच्छी नींद को केवल आराम का जरिया मानना सही नहीं होगा। यह शरीर और दिमाग की रोजाना रिकवरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बेहतर नींद के लिए क्या करें?

रोजाना सोने और जागने का समय लगभग एक जैसा रखें।
सोने से पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें।
रात में बहुत ज्यादा कैफीन लेने से बचें।
सोने के कमरे का वातावरण शांत और आरामदायक रखें।
दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
अगर लंबे समय से नींद की समस्या बनी हुई है, तो डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह लें।

नोट: यह लेख उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी बीमारी या लगातार बनी रहने वाली नींद की समस्या के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

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कम खाना खाने के बावजूद क्यों बढ़ता है वजन? रोटी नहीं, ये आदतें हो सकती हैं जिम्मेदार

अगर वजन घटाने की कोशिश के बावजूद आपका वजन कम होने के बजाय बढ़ रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ यह नहीं हो सकती कि आपने कितनी रोटियां खाईं। कई बार हम खाने की मात्रा पर तो नजर रखते हैं, लेकिन खाने के साथ ली जाने वाली दूसरी चीजों, शारीरिक गतिविधि, नींद और तनाव जैसी आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में कम खाना खाने के बावजूद शरीर का वजन बढ़ सकता है। आइए जानते हैं वे कौन-से कारण हैं, जिन पर वजन कम करते समय ध्यान देना जरूरी है।

दो रोटी खाने के बाद भी वजन क्यों बढ़ सकता है?

रोटी की संख्या कम करना अपने आप में वजन घटाने की गारंटी नहीं है। भोजन में इस्तेमाल होने वाला तेल, घी, मक्खन, दही, अचार, मिठाई और अन्य चीजें भी कुल कैलोरी बढ़ा सकती हैं। वजन में बदलाव मुख्य रूप से पूरे दिन की कुल कैलोरी खपत और शरीर द्वारा खर्च की जाने वाली ऊर्जा के संतुलन पर निर्भर करता है।

चाय और छोटे स्नैक्स भी डाल सकते हैं असर

कई बार मुख्य भोजन सीमित होता है, लेकिन दिनभर चाय, बिस्किट, नमकीन, जूस, मीठे पेय या दूसरे स्नैक्स लेते रहने से अतिरिक्त कैलोरी शरीर में पहुंचती रहती है। ये चीजें मात्रा में छोटी होती हैं, लेकिन बार-बार खाने पर इनका कुल असर काफी हो सकता है। इसलिए कुछ दिनों तक अपनी पूरी दिनचर्या और खान-पान का रिकॉर्ड रखना मददगार हो सकता है।

कम शारीरिक गतिविधि भी बन सकती है वजह

अगर आपका काम ज्यादातर बैठकर होता है और रोजाना चलना-फिरना या व्यायाम बहुत कम है, तो शरीर की ऊर्जा खपत भी कम हो सकती है। लंबे समय तक ऑफिस में बैठे रहना, लगातार मोबाइल या टीवी देखना और रोजाना कम कदम चलना वजन बढ़ने में योगदान दे सकता है।

नींद का बिगड़ा हुआ पैटर्न भी महत्वपूर्ण

वजन प्रबंधन में नींद की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार कम नींद लेने से भूख और पेट भरा होने की अनुभूति को नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित हो सकते हैं। इसके चलते कुछ लोगों में ज्यादा खाने या मीठे और अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों की इच्छा बढ़ सकती है।

तनाव में बढ़ सकती है खाने की इच्छा

लगातार तनाव रहने पर कुछ लोगों का खान-पान प्रभावित हो जाता है। तनाव के दौरान मीठी चीजें, तला-भुना खाना या जंक फूड खाने की इच्छा बढ़ सकती है। अगर तनाव से निपटने के लिए बार-बार खाने की आदत बन जाए, तो इसका असर वजन पर पड़ सकता है।

थायरॉयड की समस्या को भी न करें नजरअंदाज

अगर वजन बढ़ने के साथ थकान, ठंड अधिक लगना, कब्ज, त्वचा का रूखा होना या बाल झड़ने जैसी परेशानियां भी लगातार बनी हुई हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित है। कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है और वजन में बदलाव से जुड़ी हो सकती है।

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?

यदि वजन बिना किसी स्पष्ट वजह के लगातार बढ़ रहा है या इसके साथ अत्यधिक थकान, शरीर में सूजन, सांस फूलना, कब्ज, ठंड अधिक लगना जैसे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना बेहतर है। वजन कम करने के लिए केवल भोजन की मात्रा घटाने के बजाय संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी बीमारी, लगातार वजन बढ़ने या अन्य लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।

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गर्दन का दर्द समझकर न करें नजरअंदाज, लंबे स्क्रीन टाइम से बढ़ सकती है सर्वाइकल की समस्या

आज के समय में लंबे वक्त तक कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल का इस्तेमाल करने की वजह से युवाओं में गर्दन और कंधों से जुड़ी परेशानियां बढ़ रही हैं। कई लोग गर्दन में होने वाले दर्द और जकड़न को थकान या गलत तरीके से सोने का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, अगर दर्द बार-बार हो रहा है या लंबे समय तक बैठने के बाद गर्दन-कंधों में भारीपन महसूस होता है, तो इसके पीछे सर्वाइकल स्पाइन से जुड़ी समस्या भी हो सकती है।

सर्वाइकल की परेशानी में गर्दन में दर्द, अकड़न और भारीपन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कई बार यह दर्द कंधे, हाथ या सिर तक भी पहुंच जाता है। गलत पॉश्चर में लंबे समय तक बैठना, मांसपेशियों पर लगातार दबाव, तनाव और चोट इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं। कुछ मामलों में रीढ़ की डिस्क या नस पर दबाव पड़ने से भी दर्द, झनझनाहट और कमजोरी जैसी समस्या हो सकती है।

लंबे समय तक स्क्रीन देखना बढ़ा रहा परेशानी

ऑफिस या घर पर लगातार कई घंटे कंप्यूटर और लैपटॉप के सामने बैठना गर्दन के लिए नुकसानदायक हो सकता है। खासकर स्क्रीन नीचे होने पर बार-बार गर्दन झुकाकर काम करने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। एक ही मुद्रा में लंबे समय तक बैठे रहने से धीरे-धीरे मांसपेशियों में खिंचाव और जकड़न बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कंप्यूटर स्क्रीन को लगभग आंखों के स्तर पर रखना और काम के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक लेना जरूरी है। कुछ देर के अंतराल पर उठकर चलना और गर्दन-कंधों को आराम देना भी मददगार हो सकता है।

तनाव और चोट भी हो सकती है वजह

गर्दन में दर्द का संबंध केवल गलत पॉश्चर से नहीं होता। लगातार तनाव में रहने से शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव बढ़ सकता है, जिसका असर गर्दन और कंधों पर दिखाई देता है। वहीं गिरने, खेल के दौरान लगी चोट या रीढ़ की किसी समस्या के बाद भी गर्दन में दर्द शुरू हो सकता है।

अगर गर्दन के दर्द के साथ हाथ में झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

रोजमर्रा की आदतों में करें बदलाव

गर्दन की परेशानी से बचने के लिए काम करते समय पीठ और गर्दन को सही स्थिति में रखना चाहिए। डेस्क और कुर्सी की ऊंचाई ऐसी होनी चाहिए कि लंबे समय तक काम करते समय शरीर पर अनावश्यक दबाव न पड़े। मोबाइल चलाते समय लगातार गर्दन झुकाकर बैठने से भी बचना चाहिए।

काम के बीच छोटे ब्रेक लेने, हल्की शारीरिक गतिविधि करने और बिना जोर लगाए गर्दन को धीरे-धीरे दाएं-बाएं घुमाने जैसे हल्के मूवमेंट किए जा सकते हैं। नियमित व्यायाम मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकता है। सोते समय भी गर्दन को ऐसी स्थिति में रखना चाहिए, जिससे उस पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

यदि गर्दन का दर्द लगातार बना हुआ है, बार-बार लौट रहा है या इसके साथ हाथ-पैर में कमजोरी, सुन्नपन या झनझनाहट जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से जांच कराना बेहतर है।


एनीमिया में किशमिश कितनी फायदेमंद? जानिए कब डाइट से मिलेगा लाभ और कब जरूरी है इलाज

अक्सर थकान, कमजोरी, चक्कर या थोड़ा काम करने पर सांस फूलने जैसी समस्याओं को लोग सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार इसके पीछे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी यानी एनीमिया हो सकता है। एनीमिया की स्थिति में शरीर के अंगों और ऊतकों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे रोजमर्रा के काम भी मुश्किल लगने लगते हैं। खासकर महिलाओं और किशोरियों में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक आम समस्या है।

ऐसे में खान-पान को लेकर कई घरेलू उपाय बताए जाते हैं। चुकंदर, गुड़ और हरी सब्जियों के साथ भीगी हुई किशमिश खाने की सलाह भी अक्सर दी जाती है। माना जाता है कि किशमिश में मौजूद आयरन शरीर में खून बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजाना भीगी किशमिश खाने से एनीमिया पूरी तरह ठीक हो सकता है?

आयरन का स्रोत है किशमिश

किशमिश में आयरन समेत कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी होता है। यही वजह है कि संतुलित आहार में किशमिश को शामिल करना फायदेमंद हो सकता है।

अगर किसी व्यक्ति में हल्की आयरन की कमी भोजन में पोषक तत्वों की कमी के कारण हुई है, तो आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थों के साथ किशमिश का सेवन कुछ मदद कर सकता है। हालांकि, इसे एनीमिया का इलाज मानना सही नहीं होगा।

सिर्फ किशमिश पर निर्भर रहना ठीक नहीं

एनीमिया के कई कारण हो सकते हैं। महिलाओं में अत्यधिक मासिक रक्तस्राव, आहार में आयरन की कमी, शरीर में आयरन का सही तरीके से अवशोषण न होना या कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याएं इसकी वजह बन सकती हैं।

अगर हीमोग्लोबिन काफी कम है या एनीमिया किसी अन्य कारण से हुआ है, तो केवल किशमिश या किसी एक खाद्य पदार्थ के सेवन से समस्या दूर नहीं होगी। ऐसे मामलों में कारण की पहचान और चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।

भीगी किशमिश खाने का क्या फायदा?

किशमिश को पानी में भिगोने से वह नरम हो जाती है और कई लोगों के लिए इसे खाना एवं पचाना आसान हो सकता है। हालांकि, किशमिश को भिगोकर खाने से एनीमिया का इलाज होने का दावा नहीं किया जा सकता।

आयरन की कमी से बचने के लिए डाइट में किशमिश के साथ दालें, चना, राजमा, बीन्स, हरी पत्तेदार सब्जियां, सूखे मेवे और जरूरत के अनुसार मांस-मछली जैसे आयरन युक्त खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

आयरन के साथ विटामिन-सी भी जरूरी

एनीमिया में केवल आयरन की मात्रा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शरीर आयरन को कितनी अच्छी तरह अवशोषित कर रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है। खासतौर पर पौधों से मिलने वाले आयरन के अवशोषण में विटामिन-सी मददगार हो सकता है।

इसलिए आयरन युक्त भोजन के साथ आंवला, नींबू, संतरा, अमरूद या अन्य विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना उपयोगी हो सकता है।

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी?

अगर लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर, त्वचा का पीला पड़ना, दिल की धड़कन तेज होना या सामान्य काम करने पर सांस फूलने जैसी समस्या रहती है, तो इसे केवल खान-पान की कमी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर की सलाह से हीमोग्लोबिन और आवश्यक जांच कराना बेहतर है।

गंभीर एनीमिया की स्थिति में केवल भोजन के जरिए शरीर की आयरन जरूरत पूरी करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में डॉक्टर आवश्यकता के अनुसार आयरन सप्लीमेंट या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

निष्कर्ष: किशमिश संतुलित आहार का हिस्सा बनकर आयरन की जरूरत पूरी करने में योगदान दे सकती है, लेकिन इसे एनीमिया की दवा या पूर्ण इलाज नहीं माना जाना चाहिए। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर जांच और चिकित्सकीय सलाह सबसे जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी सप्लीमेंट या उपचार को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू न करें।

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बार-बार थकान और सुस्ती को न समझें सामान्य, हो सकता है इस बीमारी का संकेत

सुबह उठते ही थकान, दिनभर सुस्ती, वजन में लगातार बदलाव या बिना वजह चिड़चिड़ापन—इन लक्षणों को अक्सर लोग सामान्य कमजोरी या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर ये परेशानियां लंबे समय से बनी हुई हैं और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रही हैं, तो इनके पीछे थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन भी एक कारण हो सकता है।

थायरॉइड गर्दन के आगे मौजूद एक छोटी-सी ग्रंथि है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा के इस्तेमाल और कई महत्वपूर्ण शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने में भूमिका निभाती है। जब यह ग्रंथि जरूरत से कम हार्मोन बनाती है तो हाइपोथायरॉइडिज्म, जबकि ज्यादा हार्मोन बनने की स्थिति को हाइपरथायरॉइडिज्म कहा जाता है।

हर व्यक्ति में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं और केवल किसी एक लक्षण के आधार पर थायरॉइड की समस्या की पुष्टि नहीं की जा सकती। फिर भी कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लगातार थकान और शरीर में सुस्ती

पर्याप्त नींद लेने के बावजूद अगर सुबह उठने के बाद भी थकावट महसूस होती है या दिनभर ऊर्जा की कमी रहती है, तो इस पर ध्यान देना जरूरी है। हाइपोथायरॉइडिज्म में थकान और सुस्ती आम लक्षणों में शामिल हो सकते हैं।

अगर इसके साथ वजन बढ़ना, ठंड ज्यादा लगना, कब्ज, त्वचा का रूखापन या बाल झड़ने जैसी समस्याएं भी लगातार बनी हुई हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराने पर विचार किया जा सकता है।

वजन में लगातार बदलाव

बिना खानपान या व्यायाम में बड़े बदलाव के वजन बढ़ना भी थायरॉइड की गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है। हाइपोथायरॉइडिज्म में थायरॉइड हार्मोन कम बनने के कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है, जिससे वजन बढ़ने की समस्या सामने आ सकती है।

वहीं, थायरॉइड के ज्यादा सक्रिय होने पर कुछ लोगों का वजन बिना प्रयास के कम भी हो सकता है। हालांकि वजन में बदलाव के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं, इसलिए केवल वजन के आधार पर थायरॉइड की समस्या मान लेना सही नहीं है।

बेचैनी और चिड़चिड़ापन

मूड में बदलाव, बेचैनी या लगातार चिड़चिड़ापन भी कई बार हार्मोनल बदलावों से जुड़ा हो सकता है। हाइपरथायरॉइडिज्म में बेचैनी के साथ हाथ कांपना, दिल की धड़कन तेज होना, ज्यादा पसीना आना और नींद में परेशानी जैसी शिकायतें हो सकती हैं।

हालांकि तनाव, चिंता और नींद की कमी भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकते हैं। इसलिए लक्षणों के समूह और उनकी अवधि को ध्यान में रखना जरूरी है।

बाल और त्वचा में बदलाव

अगर बाल पहले की तुलना में अधिक झड़ने लगे हैं, त्वचा लगातार रूखी रहती है या शरीर में सामान्य से अधिक सूखापन महसूस होता है, तो इसके कई कारण हो सकते हैं। हाइपोथायरॉइडिज्म में इस तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

यदि बालों और त्वचा से जुड़ी समस्या के साथ थकान, वजन बढ़ना, कब्ज या ठंड अधिक लगने जैसी शिकायतें भी लंबे समय से हैं, तो चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर ये लक्षण कई सप्ताह से बने हुए हैं, लगातार बढ़ रहे हैं या आपकी रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक थायरॉइड हार्मोन की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

गर्दन में सूजन या गांठ, निगलने में परेशानी, सांस लेने में दिक्कत, बहुत तेज या अनियमित धड़कन जैसी समस्या होने पर जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।

ध्यान रखें: थकान, वजन में बदलाव या बाल झड़ना अपने आप में थायरॉइड बीमारी की पुष्टि नहीं करते। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच और डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी भी बीमारी का निदान या इलाज केवल चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

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बार-बार मांसपेशियों में खिंचाव? सिर्फ थकान नहीं, यह भी हो सकता है कारण

बार-बार पैरों में ऐंठन, मांसपेशियों में खिंचाव या सामान्य काम के बाद जरूरत से ज्यादा थकान महसूस होती है तो इसे सिर्फ कमजोरी मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। कई बार शरीर में जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन भी ऐसे लक्षणों की वजह बन सकता है। इन्हीं महत्वपूर्ण खनिजों में पोटैशियम शामिल है, जो मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी होता है।

हालांकि, पैरों में क्रैंप या कमजोरी होने का मतलब हर बार पोटैशियम की कमी होना नहीं है। पानी की कमी, अधिक व्यायाम, लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना और अन्य इलेक्ट्रोलाइट्स में असंतुलन भी ऐसी परेशानियां पैदा कर सकते हैं। इसलिए लगातार या गंभीर लक्षणों की स्थिति में सही कारण जानना जरूरी है।

शरीर के लिए क्यों जरूरी है पोटैशियम?

पोटैशियम शरीर में इलेक्ट्रोलाइट के रूप में काम करता है और कई जरूरी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। यह नसों के सामान्य कामकाज, मांसपेशियों के संकुचन और शरीर में तरल पदार्थ के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। हृदय की सामान्य धड़कन के लिए भी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन महत्वपूर्ण होता है।

पोटैशियम का स्तर बहुत कम या बहुत अधिक होना दोनों ही स्थितियां स्वास्थ्य के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं। इसलिए बिना जांच के पोटैशियम सप्लीमेंट लेना उचित नहीं माना जाता।

बार-बार क्रैंप हो तो सावधान

पोटैशियम का स्तर कम होने पर कुछ लोगों को मांसपेशियों में कमजोरी, खिंचाव या ऐंठन की शिकायत हो सकती है। खासकर यदि ये समस्या बार-बार होती है या इसके साथ मांसपेशियों में कमजोरी भी महसूस होती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

हालांकि क्रैंप के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। अत्यधिक व्यायाम, शरीर में पानी की कमी, लंबे समय तक खड़े रहना या बैठना और दूसरे इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन भी इसकी वजह बन सकता है।

हर समय थकान भी हो सकती है संकेत

पोटैशियम की गंभीर कमी की स्थिति में मांसपेशियों की कमजोरी और थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में रोजमर्रा के सामान्य काम भी पहले की तुलना में अधिक मुश्किल लग सकते हैं।

लेकिन लगातार थकान के पीछे नींद की कमी, तनाव, पोषण की कमी या अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकते हैं। यदि कमजोरी लंबे समय तक बनी रहती है या धीरे-धीरे बढ़ रही है तो चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

ज्यादा पसीना आने पर रखें खास ध्यान

गर्मी में लंबे समय तक रहने या ज्यादा शारीरिक मेहनत करने से शरीर से पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है। अत्यधिक पसीना आने के साथ कमजोरी, चक्कर या मांसपेशियों में ऐंठन हो तो शरीर के तरल और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन पर ध्यान देना जरूरी है।

सामान्य परिस्थितियों में संतुलित आहार और पर्याप्त तरल पदार्थ शरीर की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं। लेकिन लगातार या गंभीर लक्षण होने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

जांच के बाद ही लें सप्लीमेंट

यदि डॉक्टर को पोटैशियम की कमी का संदेह होता है तो रक्त जांच के जरिए शरीर में इसके स्तर की जांच की जा सकती है। कमी पाए जाने पर डॉक्टर खान-पान में बदलाव या जरूरत के अनुसार सप्लीमेंट की सलाह दे सकते हैं।

केले समेत कई खाद्य पदार्थों में पोटैशियम पाया जाता है, लेकिन केवल किसी एक खाद्य पदार्थ को खाने या खुद से पोटैशियम की गोलियां लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है। खासकर किडनी से जुड़ी समस्या वाले लोगों में पोटैशियम सप्लीमेंट का इस्तेमाल बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं करना चाहिए।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर आधारित है। लगातार ऐंठन, कमजोरी, चक्कर या अन्य परेशानियां होने पर चिकित्सक से सलाह लें। केवल इन लक्षणों के आधार पर पोटैशियम की कमी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

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क्या आपको भी लगती है सुबह उठते ही तेज भूख? तो जान लीजिये इसके पीछे की 5 बड़ी वजहें

सुबह आंख खुलते ही अगर आपको तेज भूख महसूस होती है, तो हर बार इसे किसी बीमारी से जोड़ना जरूरी नहीं है। रात के खाने और सुबह के नाश्ते के बीच कई घंटों का अंतर होने के कारण सुबह भूख लगना शरीर की सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। हालांकि, कुछ लोगों में यह भूख सामान्य से काफी अधिक होती है और बार-बार महसूस हो सकती है। ऐसे में इसके पीछे खान-पान, नींद और दिनचर्या से जुड़े कई कारण हो सकते हैं।

सुबह की तेज भूख को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि रात में आपने क्या और कितना खाया था, आपकी नींद कैसी रही और दिनभर आपकी शारीरिक गतिविधि कितनी रही। कुछ मामलों में लगातार बढ़ी हुई भूख किसी स्वास्थ्य समस्या से जुड़ी भी हो सकती है।

सुबह उठते ही ज्यादा भूख लगने की वजह

1. रात का भोजन कम होना
अगर रात में आपने जरूरत से कम खाना खाया है या भोजन पर्याप्त पौष्टिक नहीं था, तो सुबह शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत महसूस हो सकती है। इसका असर तेज भूख के रूप में दिखाई दे सकता है।

2. डाइट में प्रोटीन और फाइबर की कमी
प्रोटीन और फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं। रात के भोजन में इनकी कमी होने पर सुबह जल्दी भूख लग सकती है। दाल, अंडे, पनीर, दही, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे विकल्प संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।

3. रात में ज्यादा मीठा या प्रोसेस्ड फूड खाना
देर रात अधिक मीठी चीजें या अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाने से अगले दिन भूख और खाने की इच्छा प्रभावित हो सकती है। इसलिए रात के भोजन को संतुलित रखना बेहतर माना जाता है।

4. नींद पूरी न होना
नींद की कमी शरीर में भूख और पेट भरे होने की भावना को नियंत्रित करने वाले हार्मोन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि कम नींद लेने के बाद कुछ लोगों को अगले दिन सामान्य से ज्यादा भूख लग सकती है।

5. ज्यादा एक्सरसाइज या शारीरिक मेहनत
अगर आपने पिछले दिन सामान्य से अधिक व्यायाम किया है या ज्यादा शारीरिक मेहनत की है, तो शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में सुबह तेज भूख लगना स्वाभाविक हो सकता है।

क्या सुबह ज्यादा भूख लगना डायबिटीज का संकेत है?

केवल सुबह तेज भूख लगने के आधार पर डायबिटीज की आशंका नहीं जताई जा सकती। लेकिन अगर भूख बढ़ने के साथ बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बिना वजह वजन कम होना, कमजोरी या लगातार थकान जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो ब्लड शुगर की जांच कराना और डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।

सुबह की भूख को संतुलित रखने के तरीके

सुबह की भूख को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले रात के भोजन और दैनिक दिनचर्या पर ध्यान देना जरूरी है।

रात का खाना संतुलित और पौष्टिक रखें।
भोजन में पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर शामिल करें।
देर रात ज्यादा मीठी और अत्यधिक प्रोसेस्ड चीजें खाने से बचें।
रोज पर्याप्त और अच्छी नींद लेने की कोशिश करें।
सुबह उठने के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
नाश्ते में सिर्फ मीठी चीजों के बजाय प्रोटीन, फाइबर और पौष्टिक कार्बोहाइड्रेट को शामिल करें।
भूख को लगातार दबाने के बजाय शरीर की जरूरत के अनुसार संतुलित भोजन करें।

कब सावधान होने की जरूरत है?

अगर सुबह की तेज भूख लंबे समय तक बनी हुई है और इसके साथ अचानक वजन बढ़ना या कम होना, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, कमजोरी, चक्कर या बहुत ज्यादा थकान जैसे लक्षण भी नजर आ रहे हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर तब, जब खान-पान और दिनचर्या में कोई बड़ा बदलाव न हुआ हो और इसके बावजूद भूख असामान्य रूप से बढ़ गई हो।

ऐसी स्थिति में किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेकर उचित जांच कराना बेहतर रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी भी लगातार या असामान्य लक्षण की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।

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