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अक्सर रात में टूट रही है नींद तो हो जाएं सतर्क, अनदेखी पड़ सकती है भारी

Category Archives: फिटनेस

अक्सर रात में टूट रही है नींद तो हो जाएं सतर्क, अनदेखी पड़ सकती है भारी

अक्सर लोग रात में नींद खुलने को मामूली परेशानी मानकर टाल देते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत शरीर की गंभीर गड़बड़ियों की ओर इशारा कर सकती है। लगातार बाधित नींद न सिर्फ दिनभर की थकान बढ़ाती है, बल्कि लंबे समय में यह कई गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है। चिकित्सा भाषा में बार-बार नींद टूटने की स्थिति को स्लीप फ्रैगमेंटेशन कहा जाता है, जिसे नजरअंदाज करना जोखिम भरा साबित हो सकता है।

क्यों बार-बार टूटती है नींद

रात में नींद बार-बार खुलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे गंभीर कारणों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया शामिल है, जिसमें सोते समय सांस लेने में रुकावट आती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है और दिमाग आपको जगा देता है। तेज खर्राटे, अचानक सांस घुटने का अहसास या हांफते हुए नींद खुलना इसके प्रमुख लक्षण माने जाते हैं।

दिल और शुगर पर पड़ता है असर

विशेषज्ञों के अनुसार, गहरी नींद की कमी का सीधा असर हृदय पर पड़ता है। बार-बार नींद टूटने से तनाव हार्मोन बढ़ता है, जिससे उच्च रक्तचाप और दिल की धड़कन में गड़बड़ी का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही नींद की कमी इंसुलिन की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, जिससे डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना भी ब्लड शुगर असंतुलन का संकेत हो सकता है।

मानसिक तनाव भी बड़ी वजह

मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद भी नींद की गुणवत्ता को खराब करते हैं। इसके अलावा रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम जैसी समस्या में सोते समय पैरों में बेचैनी, झुनझुनी या खिंचाव महसूस होता है, जिससे नींद बार-बार टूट जाती है। यह परेशानी अक्सर आयरन की कमी या नसों से जुड़ी समस्याओं से संबंधित होती है।

कब हो जाएं सतर्क

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दो हफ्ते या उससे अधिक समय तक रात में नींद बार-बार टूट रही है, तो इसे चेतावनी संकेत मानना चाहिए। समय पर जांच और इलाज से कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।

बेहतर नींद के लिए जरूरी कदम

अच्छी नींद के लिए नियमित सोने-जागने का समय तय करें, सोने से पहले मोबाइल और स्क्रीन से दूरी बनाएं और तनाव कम करने की कोशिश करें। यदि समस्या बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेकर स्लीप स्टडी कराना फायदेमंद हो सकता है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

(साभार)


बिना डाइट और एक्सरसाइज के घट रहा वजन? हो सकता है गंभीर बीमारी का संकेत

सेहतमंद रहने के लिए संतुलित खान-पान और स्वस्थ जीवनशैली का पालन करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है शरीर के संकेतों को समय रहते समझना। शरीर में होने वाला कोई भी असामान्य बदलाव—चाहे वह थकान हो, भूख में कमी या फिर वजन में अचानक गिरावट—अक्सर अंदरूनी गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।

आमतौर पर लोग बढ़ते वजन को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन बिना किसी डाइट या एक्सरसाइज के तेजी से वजन कम होना भी उतना ही गंभीर संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कुछ ही समय में शरीर का वजन लगातार घट रहा है, तो इसे हल्के में लेना नुकसानदायक साबित हो सकता है।

बिना कोशिश के घट रहा वजन, तो रहें सतर्क

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि अचानक और तेजी से वजन कम होना कई बार किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती लक्षण हो सकता है। हार्मोनल असंतुलन, पाचन तंत्र की समस्याएं, संक्रमण या फिर लंबे समय से चली आ रही कोई बीमारी इसके पीछे कारण बन सकती है। इसलिए यदि वजन घटने की कोई स्पष्ट वजह न हो, तो सतर्क होना बेहद जरूरी है।

वजन कम होना हमेशा अच्छी सेहत की निशानी नहीं

अक्सर वजन घटने को लोग फिटनेस से जोड़कर देखते हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हर बार वजन कम होना अच्छी सेहत का संकेत नहीं होता। यदि शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा या अंदरूनी तौर पर कोई समस्या पनप रही है, तो वजन अपने आप गिरने लगता है।

किन बीमारियों से जुड़ा हो सकता है अचानक वजन कम होना

जनरल फिजिशियन डॉ. रविंद्र डबास के अनुसार तेजी से वजन कम होना डायबिटीज, कैंसर, हाइपरथायरॉइडिज्म, सीलिएक डिजीज जैसी बीमारियों की ओर इशारा कर सकता है। हाइपरथायरॉइडिज्म की स्थिति में शरीर का मेटाबॉलिज्म जरूरत से ज्यादा तेज हो जाता है, जिससे कैलोरी तेजी से बर्न होने लगती है। वहीं डायबिटीज में भी शरीर वजन तेजी से खो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य का भी पड़ता है असर

डिप्रेशन, एंग्जायटी और लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भूख को कम कर देता है, जिसका सीधा असर वजन पर पड़ता है। इसके अलावा नींद की कमी और मानसिक थकान भी हार्मोनल संतुलन बिगाड़ देती है, जिससे वजन अनियंत्रित रूप से घट सकता है।

कब जाएं डॉक्टर के पास

यदि बिना किसी कारण कुछ ही हफ्तों में वजन तेजी से कम हो रहा है, कमजोरी महसूस हो रही है या भूख में लगातार कमी बनी हुई है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय रहते जांच कराने से गंभीर बीमारियों की पहचान संभव हो सकती है।

नोट: यह लेख सामान्य चिकित्सकीय जानकारियों पर आधारित है। किसी भी लक्षण या समस्या की स्थिति में विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।

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पैक्ड जूस और एनर्जी ड्रिंक बन रहे ‘मीठा जहर’, वैज्ञानिकों ने जारी किया अलर्ट

Sweet Poison Packaged Juices: आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में खान-पान की आदतें स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कई गंभीर बीमारियों की जड़ हमारी रोज़मर्रा की डाइट में छिपी है। खास तौर पर मीठे पेय पदार्थ—जैसे सॉफ्ट ड्रिंक्स, पैकेट बंद जूस, फ्लेवर्ड मिल्क और एनर्जी ड्रिंक्स—सेहत पर चुपचाप लेकिन गहरा असर डाल रहे हैं।

टीवी और डिजिटल विज्ञापनों में इन ड्रिंक्स को ताकत, फुर्ती और स्टैमिना बढ़ाने वाला बताया जाता है। वर्कआउट के बाद थकान दूर करने या खेल के दौरान ऊर्जा पाने के लिए युवा वर्ग इन्हें तेजी से अपना रहा है। लेकिन डॉक्टरों की चेतावनी है कि यही आदत भविष्य में गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है, खासकर लिवर से जुड़ी समस्याओं की।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन पेय पदार्थों में अत्यधिक मात्रा में मिलाई गई शुगर होती है, जिसमें फ्रक्टोज प्रमुख है। फ्रक्टोज का मेटाबॉलिज्म सीधे लिवर में होता है। जब शरीर को जरूरत से ज्यादा फ्रक्टोज मिलता है, तो लिवर इसे फैट में बदलकर जमा करने लगता है। लंबे समय तक ऐसा होने से फैटी लिवर डिज़ीज़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, जो लोग रोज़ाना मीठे पेय का सेवन करते हैं, उनमें फैटी लिवर की आशंका सामान्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक पाई गई है। यह बीमारी आगे चलकर स्टीटोहेपेटाइटिस जैसे गंभीर लिवर रोग में बदल सकती है, जिसमें लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अधिक शुगर वाली डाइट शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस और सूजन को बढ़ाती है। समय के साथ यह सूजन लिवर में स्थायी घाव (स्कार टिश्यू) बना सकती है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।

लिवर ही नहीं, मीठे पेय शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। शोध के मुताबिक, नियमित रूप से कोल्ड ड्रिंक या शुगर ड्रिंक्स पीने से पेट की चर्बी, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि प्यास बुझाने के लिए पानी, नारियल पानी या बिना शक्कर वाले प्राकृतिक पेय को प्राथमिकता दी जाए। छोटी-सी यह सावधानी भविष्य में बड़ी बीमारियों से बचा सकती है।


हाई कोलेस्ट्रॉल से बढ़ता है दिल की बीमारी का खतरा, जानिए कैसे करें बिना दवा के कंट्रोल

आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और बदलती खानपान की आदतों के बीच हाई कोलेस्ट्रॉल एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल दिल और दिमाग से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। हालांकि, हर स्थिति में दवाओं पर निर्भर रहना जरूरी नहीं होता। सही जानकारी, संतुलित आहार और जीवनशैली में सुधार कर कोलेस्ट्रॉल को प्राकृतिक तरीके से भी नियंत्रित किया जा सकता है।

कोलेस्ट्रॉल एक वसायुक्त पदार्थ होता है, जो शरीर के लिए सीमित मात्रा में जरूरी है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह रक्त नलिकाओं में जमा होकर रक्त प्रवाह में बाधा बन सकता है। इससे हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अनहेल्दी डाइट, शारीरिक गतिविधियों की कमी, मोटापा और धूम्रपान जैसी आदतें कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की मुख्य वजहें हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ आसान और नियमित बदलावों से कोलेस्ट्रॉल को संतुलन में रखा जा सकता है। सबसे पहले खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। रेड मीट, फुल फैट डेयरी उत्पाद और प्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन से बचना चाहिए। इसके बजाय नट्स, बीज, एवोकाडो और ओमेगा-3 से भरपूर मछलियों को आहार में शामिल करना हृदय के लिए लाभकारी माना जाता है।

दिनचर्या भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में अहम भूमिका निभाती है। समय पर नाश्ता करना और देर रात खाने से बचना शरीर के मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखता है। शोध बताते हैं कि नाश्ता छोड़ने या अनियमित भोजन करने से बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ सकता है।

इसके साथ ही फाइबर युक्त आहार को दिनचर्या में शामिल करना भी जरूरी है। घुलनशील फाइबर बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। जई, जौ, दालें, फल और हरी सब्जियां कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में सहायक मानी जाती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और स्वस्थ दिनचर्या अपनाकर कोलेस्ट्रॉल को काफी हद तक कंट्रोल में रखा जा सकता है। हालांकि, किसी भी बड़े बदलाव या समस्या की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

नोट: यह लेख चिकित्सकीय सलाह और विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है।

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सुबह खाली पेट भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं तो हो सकती है एसिडिटी की समस्या

अक्सर लोग सेहतमंद रहने की चाह में दिन की शुरुआत कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों से कर लेते हैं, जिन्हें वे सबसे ज्यादा फायदेमंद मानते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर पौष्टिक चीज हर समय शरीर के लिए लाभकारी नहीं होती। खासतौर पर सुबह खाली पेट कुछ चीजों का सेवन पाचन तंत्र पर उल्टा असर डाल सकता है और धीरे-धीरे कई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकता है।

चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार, रातभर के उपवास के बाद पेट में एसिड का स्तर अधिक होता है। ऐसे में यदि सुबह खाली पेट गलत खाद्य पदार्थ लिए जाएं, तो पेट की अंदरूनी परत प्रभावित हो सकती है। इसका असर केवल एसिडिटी या गैस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लंबे समय में यह मेटाबॉलिज्म से जुड़ी दिक्कतें, ब्लड शुगर असंतुलन और आंतों की सूजन जैसी समस्याएं भी पैदा कर सकता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि कौन-सी चीज कब खानी चाहिए।

खाली पेट इन चीजों से बढ़ सकती है परेशानी
खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू और मौसमी विटामिन-सी से भरपूर होते हैं, लेकिन सुबह खाली पेट इनका सेवन पेट में अतिरिक्त एसिड बना सकता है। इसी तरह फ्रूट जूस में फाइबर की कमी होती है और इसमें मौजूद फ्रुक्टोज अचानक ब्लड शुगर बढ़ा सकता है, जिससे कुछ देर बाद थकान महसूस होने लगती है।

कॉफी पीने की आदत भी खाली पेट नुकसानदेह हो सकती है। कैफीन पेट में एसिड के उत्पादन को बढ़ाता है और स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल को सक्रिय कर देता है, जिससे बेचैनी, घबराहट और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है।

दही को भले ही प्रोबायोटिक माना जाता हो, लेकिन खाली पेट लेने पर पेट में मौजूद तेज एसिड इसके लाभकारी बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता है। इससे दही के फायदे कम हो जाते हैं और कुछ लोगों को गैस या पेट दर्द की शिकायत हो सकती है।

सुबह क्या लेना है बेहतर
विशेषज्ञों के अनुसार, दिन की शुरुआत गुनगुने पानी से करनी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए बादाम, अखरोट, ओट्स या हल्का नाश्ता पाचन के लिए बेहतर रहता है। खट्टे फल, दही और जूस को नाश्ते के बाद या दिन में किसी अन्य समय लेना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। सही समय पर सही भोजन का चुनाव छोटी-सी आदत लग सकती है, लेकिन यही आदतें लंबे समय तक सेहत को सुरक्षित रखती हैं।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

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सर्दियों के मौसम में इम्यूनिटी मजबूत करने में कारगर हैं अदरक और लहसुन

सर्दियों के मौसम में सिर्फ गर्म कपड़े पहनना ही काफी नहीं होता, बल्कि शरीर को भीतर से गर्म और मजबूत रखना भी उतना ही जरूरी है। ठंड और शीतलहर के दौरान अगर शरीर की आंतरिक ऊर्जा कमजोर पड़ जाए, तो सर्दी-जुकाम, खांसी, जोड़ों के दर्द और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में भारतीय रसोई में मौजूद कुछ पारंपरिक चीजें प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती हैं। इनमें अदरक और लहसुन को सबसे प्रभावी माना जाता है।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार अदरक और लहसुन की तासीर गर्म होती है। इनमें मौजूद थर्मोजेनिक गुण शरीर के मेटाबॉलिज्म को सक्रिय कर अंदर से गर्माहट पैदा करते हैं। अदरक में पाया जाने वाला जिंजरॉल और लहसुन का एलिसिन तत्व रक्त संचार को बेहतर बनाता है, जिससे ठंड के कारण होने वाली सुस्ती और कमजोरी कम होती है। यही नहीं, ये दोनों तत्व सर्दियों में वायरल संक्रमण से बचाव में भी मददगार माने जाते हैं।

इनका नियमित और संतुलित सेवन श्वसन तंत्र को मजबूत करता है और फेफड़ों में जमा कफ को बाहर निकालने में सहायक होता है। ठंड के मौसम में दिल पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करने में भी लहसुन उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह रक्त को गाढ़ा होने से रोकता है। वहीं अदरक सूजन और जकड़न को कम कर जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने में सहायक है।

लहसुन को ऐसे करें शामिल
लहसुन का अधिक लाभ पाने के लिए इसे कच्चा या हल्का भूनकर सेवन करना बेहतर होता है। सुबह खाली पेट एक-दो कलियां शहद के साथ लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। दाल, सब्जी और सूप में लहसुन का इस्तेमाल स्वाद के साथ-साथ सेहत भी बढ़ाता है। कुछ लोग सरसों के तेल में लहसुन पकाकर उस तेल से पैरों की मालिश करते हैं, जिससे शरीर की ठंडक कम होने में मदद मिलती है।

अदरक से बढ़ेगी अंदरूनी गर्मी
अदरक की चाय या काढ़ा सर्दियों में सबसे आसान और असरदार उपाय माना जाता है। अदरक, तुलसी और काली मिर्च को पानी में उबालकर पीने से गले की खराश और सर्दी में राहत मिलती है। खाने से पहले अदरक के छोटे टुकड़े पर नमक और नींबू लगाकर चबाने से पाचन बेहतर होता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।

संक्रमण और जोड़ों के दर्द से सुरक्षा
सर्दियों में जोड़ों की अकड़न और दर्द आम समस्या है। अदरक और लहसुन में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण सूजन को कम करने में मदद करते हैं। इसके अलावा ये दोनों मिलकर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, जिससे मौसमी बीमारियां शरीर पर आसानी से हावी नहीं हो पातीं।

सावधानी भी जरूरी
हालांकि अदरक और लहसुन बेहद फायदेमंद हैं, लेकिन इनका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अधिक सेवन से एसिडिटी या पेट में जलन हो सकती है। गर्भवती महिलाएं या किसी विशेष दवा का सेवन कर रहे लोग इन्हें नियमित रूप से लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी पर आधारित है। किसी भी प्रकार की चिकित्सीय समस्या में डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।

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फैटी लिवर का खतरा- चीनी ही नहीं, किचन की ये आम चीजें भी बना रही हैं लिवर को बीमार

अब तक फैटी लिवर की बीमारी को केवल शराब या ज्यादा मीठा खाने से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन ताजा हेल्थ स्टडी और एक्सपर्ट्स की चेतावनियां कुछ और ही इशारा कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, हमारी रोजमर्रा की थाली में शामिल कुछ सामान्य खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो चुपचाप लिवर में फैट जमा कर रहे हैं और फैटी लिवर का खतरा कई गुना बढ़ा रहे हैं।

फैटी लिवर तब होता है जब लीवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है। शुरुआत में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ यह सूजन, लीवर फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है। बदलती जीवनशैली, प्रोसेस्ड फूड और गलत खानपान लिवर पर अतिरिक्त मेटाबॉलिक दबाव डाल रहे हैं, जिससे यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ चीनी कम करना काफी नहीं है। लीवर को सुरक्षित रखने के लिए उन खाद्य पदार्थों की पहचान करना जरूरी है जो रोजाना हमारे किचन से प्लेट तक पहुंच रहे हैं और धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं।

रिफाइंड आटा और प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट

मैदा से बने खाद्य पदार्थ जैसे सफेद ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स और पास्ता शरीर में तेजी से शुगर में बदल जाते हैं। इनमें फाइबर न होने के कारण ब्लड शुगर अचानक बढ़ती है और लिवर अतिरिक्त ग्लूकोज को फैट में बदलने लगता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज की वजह बनती है।

जरूरत से ज्यादा नमक

अधिक नमक का सेवन केवल दिल के लिए ही नहीं, लीवर के लिए भी खतरनाक माना जाता है। अचार, पैकेज्ड स्नैक्स और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में मौजूद सोडियम शरीर में पानी रोकने और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाता है। इससे लिवर की कोशिकाओं पर दबाव बढ़ता है और उनमें क्षति की संभावना बढ़ जाती है।

ट्रांस फैट और हाइड्रोजेनेटेड तेल

वनस्पति घी, दोबारा गरम किया गया तेल और बाहर के तले हुए खाद्य पदार्थ ट्रांस फैट से भरपूर होते हैं। ये फैट लीवर में सूजन बढ़ाने के साथ-साथ खराब कोलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाते हैं। लंबे समय तक इनके सेवन से लिवर के टिशूज में फैट जमा होने लगता है, जिसे शरीर आसानी से प्रोसेस नहीं कर पाता।

कैसे रखें लीवर को सुरक्षित?

फैटी लिवर से बचाव के लिए मैदा की जगह साबुत अनाज, जैसे जौ, बाजरा और ओट्स को भोजन में शामिल करें। ट्रांस फैट की जगह कोल्ड-प्रेस्ड या सीमित मात्रा में सरसों और जैतून के तेल का उपयोग करें। फाइबर युक्त आहार, नियमित व्यायाम और सक्रिय दिनचर्या लीवर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

ध्यान रखें, लीवर शरीर का प्राकृतिक फिल्टर है। यदि इसकी सेहत बेहतर रहेगी, तो पूरे शरीर पर उसका सकारात्मक असर दिखाई देगा।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

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दूषित पानी से बढ़ता स्वास्थ्य खतरा, केवल दस्त ही नहीं लीवर और किडनी भी होती है प्रभावित

स्वच्छ पानी को स्वास्थ्य की बुनियाद माना जाता है, लेकिन जब यही पानी दूषित हो जाए तो यह गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अक्सर गंदे पानी से होने वाली बीमारी को केवल दस्त या डायरिया तक सीमित समझ लिया जाता है, जबकि चिकित्सकों के अनुसार अशुद्ध जल शरीर के कई अहम अंगों पर सीधा असर डालता है। दूषित जल में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी शरीर में प्रवेश कर पाचन तंत्र से होते हुए लीवर, किडनी और तंत्रिका तंत्र तक को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सीवरेज और औद्योगिक अपशिष्ट से बढ़ता जोखिम

जब जल स्रोतों में सीवरेज का पानी या औद्योगिक कचरा मिल जाता है, तो वह पानी गंभीर संक्रामक रोगों का माध्यम बन जाता है। कई बार पानी दिखने में साफ होता है, लेकिन पाइपलाइन लीकेज या टंकी की गंदगी के कारण उसमें सूक्ष्म जीव मौजूद रहते हैं। ऐसे में हैजा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, खासकर घनी आबादी वाले इलाकों में।

डिहाइड्रेशन से लेकर किडनी तक असर

गंदा पानी पीने से होने वाले संक्रमण सिर्फ शरीर से पानी की कमी तक सीमित नहीं रहते। इन बीमारियों के कारण इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन पैदा होता है, जिससे किडनी फेल होने, कमजोरी और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।

टाइफाइड और हैजा का बड़ा कारण दूषित जल

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार टाइफाइड और हैजा का मुख्य कारण अशुद्ध पानी है। टाइफाइड साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया से होता है, जो तेज बुखार और आंतों में गंभीर संक्रमण पैदा करता है। वहीं हैजा में शरीर से पानी इतनी तेजी से बाहर निकलता है कि कुछ ही घंटों में मरीज की हालत बिगड़ सकती है। ये रोग दूषित जल के जरिए तेजी से फैलते हैं।

हेपेटाइटिस A और E से लीवर को खतरा

अशुद्ध पानी पीने से हेपेटाइटिस ए और ई जैसे वायरस शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। ये संक्रमण सीधे लीवर को प्रभावित करते हैं, जिससे पीलिया, थकान, उल्टी और भूख न लगने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। डॉक्टरों के अनुसार हेपेटाइटिस ई गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है और इससे रिकवरी में लंबा समय लग सकता है।

पेचिश और आंतों के संक्रमण

दूषित पानी में मौजूद परजीवी पेचिश और पेट में कीड़ों की समस्या पैदा करते हैं। इसके लक्षणों में पेट दर्द, मरोड़ और मल के साथ खून आना शामिल है। लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से आंतों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जिससे शरीर पोषक तत्वों को सही तरह से अवशोषित नहीं कर पाता। बच्चों में यह स्थिति कुपोषण और विकास संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है।

बचाव ही सबसे बेहतर उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पानी से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए सबसे जरूरी है सुरक्षित और शुद्ध जल का उपयोग। पानी को उबालकर पीना, क्लोरीन टैबलेट का इस्तेमाल और जल भंडारण के बर्तनों को साफ रखना प्रभावी उपाय माने जाते हैं। खुले में बिकने वाले पेय पदार्थों और बर्फ से परहेज करना भी जरूरी है। बुखार, दस्त या कमजोरी जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए।

नोट: यह लेख विभिन्न चिकित्सा रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

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बार-बार ठंड लगना हो सकता है पोषक तत्वों की कमी का संकेत, जानिए शरीर से जुड़ा अहम कारण

सर्द मौसम में ठंड महसूस होना आम बात है, लेकिन कई बार ऐसा देखा जाता है कि समान माहौल में बैठे लोगों में कुछ को असहनीय ठंड लगती है, जबकि बाकी सामान्य महसूस करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण केवल मौसम नहीं बल्कि शरीर के भीतर होने वाले पोषण असंतुलन और मेटाबॉलिक बदलाव भी हो सकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि मानव शरीर अपने तापमान को संतुलित रखने के लिए रक्त संचार, हार्मोन और ऊर्जा उत्पादन की प्रणाली पर निर्भर करता है। जब शरीर में आवश्यक विटामिन और मिनरल्स की कमी हो जाती है, तो यह संतुलन बिगड़ने लगता है। नतीजतन शरीर पर्याप्त गर्मी उत्पन्न नहीं कर पाता और व्यक्ति को बार-बार ठंड लगने लगती है।

डॉक्टरों के मुताबिक, आयरन की कमी इस समस्या की सबसे आम वजहों में से एक है। आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन घटता है, जिससे शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है और हाथ-पैर ठंडे रहने लगते हैं। वहीं विटामिन बी12 की कमी नसों को प्रभावित करती है, जिससे झुनझुनी और ठंडक का अहसास बढ़ जाता है।

इसके अलावा थायरॉइड हार्मोन असंतुलन, कम कैलोरी डाइट, लगातार खाली पेट रहना और अत्यधिक मानसिक तनाव भी शरीर की गर्मी बनाए रखने की क्षमता को कमजोर कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को ठंड अधिक महसूस होती है।

ठंड से तुरंत राहत पाने के लिए हल्की शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना या स्ट्रेचिंग फायदेमंद मानी जाती है। इससे रक्त प्रवाह बढ़ता है और शरीर जल्दी गर्म होता है। साथ ही गुनगुना पानी, हर्बल चाय या सूप पीने से भी आंतरिक तापमान में सुधार आता है।

पोषण विशेषज्ञ सर्दियों में गुड़, तिल, मूंगफली, बाजरा, खजूर, अदरक और लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करने की सलाह देते हैं। ये खाद्य पदार्थ शरीर में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाते हैं और रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं।

यदि पर्याप्त भोजन और जीवनशैली सुधार के बावजूद अत्यधिक ठंड लगने की समस्या बनी रहती है, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। समय रहते ब्लड टेस्ट कराने से आयरन, बी12 या अन्य पोषक तत्वों की कमी का पता लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बार-बार ठंड लगना किसी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है, इसलिए इसे हल्के में न लें। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित योग और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाकर शरीर की प्राकृतिक गर्मी बनाए रखने की क्षमता को मजबूत किया जा सकता है।


नए साल की पार्टियों के बाद कैसे रखें वजन कंट्रोल, एक्सपर्ट की खास सलाह

नए साल और लगातार चलने वाली पार्टियों के बीच ज्यादा खाना लगभग हर किसी के साथ हो जाता है। स्वादिष्ट व्यंजन और मिठाइयों के कारण कई लोग जरूरत से कहीं अधिक कैलोरी ले लेते हैं। इसके बाद वजन बढ़ने की चिंता में लोग अगले ही दिन जिम में जरूरत से ज्यादा कसरत करने या डाइट को अचानक बेहद सख्त बनाने की गलती कर बैठते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे सेहत के लिए नुकसानदायक मानते हैं।

वजन नियंत्रण और मेटाबॉलिज्म पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि एक दिन में बहुत अधिक खाने के बाद शरीर को खुद को संतुलित करने के लिए समय चाहिए। ज्यादा कैलोरी लेने पर शरीर के हार्मोन, खासतौर पर इंसुलिन और पाचन से जुड़े एंजाइम्स, अतिरिक्त दबाव में आ जाते हैं। ऐसे में तुरंत भारी एक्सरसाइज या भूखा रहना शरीर के संतुलन को और बिगाड़ सकता है।

वेट लॉस एक्सपर्ट डॉक्टर मल्हार गणला के अनुसार, पार्टी के बाद अगले एक-दो दिन शरीर के लिए रिकवरी पीरियड की तरह होते हैं। इस दौरान अत्यधिक वर्कआउट करने से भूख और इंसुलिन का चक्र गड़बड़ा सकता है, जिससे बार-बार खाने की तलब लगने लगती है। अगर यह आदत कुछ दिनों तक जारी रहे, तो शरीर तैलीय और नमकीन खाने का आदी हो सकता है, जो आगे चलकर इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह बन सकता है।

डॉक्टर बताते हैं कि जब हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, तो दिमाग बार-बार भूख के संकेत भेजता है, भले ही शरीर को वास्तव में खाने की जरूरत न हो। इसलिए जरूरी है कि पार्टी के बाद खुद को सजा देने के बजाय शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने का मौका दिया जाए।

विशेषज्ञों की सलाह है कि अधिक खाने के बाद अगले दो दिनों तक हल्का, सादा और घर का बना भोजन लिया जाए। इससे शरीर को अतिरिक्त कैलोरी को धीरे-धीरे खर्च करने का समय मिलता है और मेटाबॉलिज्म स्थिर रहता है। इस दौरान पर्याप्त पानी पीना और हल्की गतिविधि, जैसे टहलना, फायदेमंद हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वजन घटाने की जल्दबाजी से ज्यादा जरूरी है भूख और हार्मोनल संतुलन को सामान्य बनाए रखना। संयमित खानपान और धैर्य के साथ अपनाया गया तरीका न केवल वजन बढ़ने से बचाता है, बल्कि छुट्टियों के बाद शरीर को फिर से स्वस्थ लय में लौटाने में भी मदद करता है।

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