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कौन हैं वह कवियत्री जिसे छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है?

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कौन हैं वह कवियत्री जिसे छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है?

अपने विषय में कुछ कहना पड़े बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि अपने दोष देखना आपको अप्रिय लगता है, और उनको अनदेखा करना औरों को,

युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए ही दण्ड देता आ रहा है,

मुझे तो उस लहर की सी मृत्यु चाहिए जो तट पर दूर तक आकर चुपचाप समुद्र में लौट कर समुद्र बन जाती है,

महादेवी वर्मा के कुछ शब्द चाहे फिर वो अपने विषय में कुछ कहना हो या पुरुष स्त्री पर उनके विचार या फिर जीवन के अटल सत्य पर बोली गयी उनकी बाते हो, सभी उनके व्यक्तित्व को ‘मोती सा पिरोते’ । महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की वो कवयित्री जिनके बिना छायावाद युग अधूरा हैं, हम जब ग्यारवी बारहवी में पढ़ा करते थे तो उनकी गद्य रचनाओं से  हम सभी रूबरू हुए ही हैं। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तरप्रदेश के फारुकाबाद जिले में हुआ था. हिन्दी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री और साहित्य की बहुआयामी हस्ती रही। उन्हें “आधुनिक मीरा” और “हिन्दी के विशाल मंदिर की सरस्वती” कहा गया। उनकी रचनाओं में स्त्री संवेदना, समाज सुधार और करुणा की गहरी छाप मिलती है।

हिंदी साहित्य का छायावाद युग

हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद युग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्वर्णिम युग माना गया है। यह काल 1918 से 1937 ई. तक का माना जाता है। इस युग ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की और हिंदी कविता को नई दिशा दी। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ हैं  जिनमे जयशंकर प्रसाद की कामायनी (महाकाव्य), “आँसू”, “झरना” आदि कृतियाँ। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अनामिका, परिमल, सरोज स्मृति आदि रचनाए व सुमित्रानंदन पंत की पल्लव, युगांत, गीतिहंस आदि। महादेवी वर्मा की नीहार, संध्या गीत, दीपशिखा, यामा आदि शामिल हैं।

गिल्लू और मेरा परिवार आज भी लोकप्रिय

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में ऐसी कोमलता और संगीतमयता दी जो पहले केवल ब्रजभाषा में संभव मानी जाती थी। उनके प्रमुख कविता संग्रह नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा ने उन्हें जन-जन की कवयित्री बना दिया। उनका गद्य-साहित्य भी उतना ही सशक्त है, जिसमें अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी और शृंखला की कड़ियाँ प्रमुख हैं। उनकी बाल कहानियाँ जैसे गिल्लू और मेरा परिवार आज भी बच्चों और बड़ों दोनों के बीच लोकप्रिय हैं।

महादेवी वर्मा ने की महिला शिक्षा की अगुवाई

केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि समाज सुधारक और महिला शिक्षा की अगुवाई करने वाली भी थीं। उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या और कुलपति के रूप में कार्य किया और महिलाओं के लिए शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं।

सादा और संयमित जीवन उनकी पहचान 

जीवनभर उन्होंने सादा, संयमित और तपस्विनी जीवन जिया। बाल विवाह के बावजूद उन्होंने अविवाहित की तरह जीवन बिताया और साहित्य, संगीत, चित्रकला तथा पशु-पक्षियों के प्रति अपार प्रेम समर्पित किया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) समेत हिन्दी साहित्य के लगभग सभी प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

महादेवी वर्मा का नाम भारतीय साहित्य में हमेशा याद किया जाएगा। वे सिर्फ संवेदनशील कवयित्री ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामाजिक जागरूकता की मजबूत आवाज भी थीं।


क्या ये बॉलीवुड फिल्मों के गाने हैं या सस्ता मनोरंजन, देखिए लिस्ट आप भी हो जाएंगे हैरान

हमारा भारत देश फिल्म इंडस्ट्री के लिहाज से बहुत विविध है और यहाँ कई तरह की फिल्में बनाई जाती हैं। बॉलीवुड, जो देश की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, हर साल यहाँ सैकड़ों फिल्में रिलीज़ होती हैं। इन फिल्मों में अलग-अलग शैलियों जैसे रोमांस, एक्शन, कॉमेडी, थ्रिलर और ड्रामा की भरमार रहती है। आजकल देखा जाए तो बॉलीवुड में अजीबोगरीब गानों का ट्रेंड बढ़ता जा रहा हैं।

आइए जाने वो गाने जिनकी लिरिक्स के न सर होते है न पैर:

मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैयां फेविकोल से

पल पल न माने टिंकू जिया, इश्क का मंजन घिसे है पिया

कांता बाई मेरे कमरे में चुपके चुपके आई, मैं तो कर रहा था पढाई क्यों आई क्यों आई

तेरे चुम्मे में चवनप्राश है, हां तेरे चुम्मे में चवनप्राश है

डोंट टच माय बॉडी मेरे सैयां

मार दे तू बंप पे लात

चुटकी जो तूने काटी है,जोरो से काटी है यहाँ वहां

मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए

कुछ गाने इतने अटपटे होते हैं कि उन्हें सुनते ही मन में सवाल उठता है, क्या वाकई लोग इन्हें सुनते हैं? क्या इन गानों का बनना जरुरी है या ये सिर्फ एक तरह का सस्ता मनोरंजन है, जो दर्शकों को परोसा जा रहा है।


कौन थे जिसने अपना जीवन पहाड़ो को किया समर्पित और कहा “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार”

‘जंगल की जिंदा पैदावार ऑक्सीजन है यानि प्राणवायु, फिर उसके बाद पानी है, फिर उसके बाद मिट्टी है, फिर उसके बाद खाना है, फिर उसके बाद पशुओं के लिए चारा हैं, फिर उसके बाद कपड़ा है, फिर उसके बाद औषधि है, फिर छाया है, यह सब जंगल की जिंदा पैदावार है और जब पेड़ मर जाए, जंगल ख़त्म हो जाए तो इसके बाद इधन और इमारते लकड़ी है’ “सुन्दरलाल बहुगुणा” 

चिपको आंदोलन के प्रणेता 

सुंदरलाल बहुगुणा का नाम विश्व पटल पर हमेशा याद रखा जाएगा, भारत और विश्व में पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया एक नाम है सुन्दरलाल बहुगुणा जिन्हें पेड़ो का मित्र भी कहा जाता हैं । उनका जन्म उत्तराखंड के टिहरी जिले में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन को प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित किया। सुन्दरलाल बहुगुणा को सबसे अधिक चिपको आंदोलन के लिए जाना जाता है, जिसमें ग्रामीण, खासकर महिलाएं  पेड़ों को गले से लगाकर कटने से रोकती थी । “चिपको” का अर्थ ही है “गले लगाना”। 

रक्षासूत्र बंधती थी महिलाएं

1970 के दशक में, उत्तराखंड में जंगल कटाई और भूस्खलन के बीच संबंध को देखते हुए उन्होंने और चंडी प्रसाद भट्ट ने ग्रामीणों को पेड़ों की रक्षा के लिए संगठित किया। इस आंदोलन में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुईं। वे बर्फ में चलकर लकड़हारे से औजार लेतीं और पेड़ों को बचाने के लिए रक्षासूत्र बांधतीं। चिपको आंदोलन ने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों में पर्यावरण संकट की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार”।

15 साल के प्रतिबंध को किया अनशन

एक दौर वो भी आया जब 1981 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने उत्तराखंड में वाणिज्यिक पेड़ों की कटाई पर 15 साल के प्रतिबंध के लिए अनशन किया। 1983 में उन्होंने हिमालय में 4,000 किलोमीटर की पदयात्रा कर पर्यावरणीय गिरावट की ओर ध्यान खींचा। सुन्दरलाल बहुगुणा गांधीवादी विचारों के समर्थक थे, सरल जीवन जीते थे और ऊर्जा संरक्षण और स्वावलंबन पर जोर दिया करते थे। उनका मानना था कि भारत को सौर, पवन और जल ऊर्जा से स्वच्छ और गैर-हिंसात्मक समाज की दिशा में बढ़ना चाहिए।

कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित 

सुन्दरलाल बहुगुणा को उनके कार्यों के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें 1981 में पद्म श्री, 2009 में पद्म विभूषण, 1984 में राष्ट्रीय एकता पुरस्कार और 2020 में विश्व गौरव सम्मान शामिल हैं। वे वृक्ष मित्र के रूप में भी जाने जाते थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं “धरती की पुकार” और ‘भू प्रयोग में: बुनियादी परिवर्तन की ओर’।

सुंदरलाल बहुगुणा का जीवन पेड़ों, जंगलों और पहाड़ों को समर्पित रहा। 21 मई 2021 को कोविड-19 के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके कार्य और विचार आज भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में प्रेरणा स्रोत हैं। बहुगुणा जी ने हमें यह सिखाया कि धरती का सम्मान करना मानवता की जिम्मेदारी है।


हर जीवन है अनमोल, यही सिखाता है विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस

World Suicide Prevention Day: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (World Suicide Prevention Day) हर साल 10 सितंबर को मनाया जाता है, जो हमें जीवन में हो रहे गंभीर बदलावों और मानसिक स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को समझने का अवसर देता है। साल 2024 से 2026 तक इसकी थीम “Changing the Narrative on Suicide” यानी आत्महत्या को लेकर सोच और बातचीत को बदलना हैं। यह दिन दुनिया भर में आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे पर जागरूकता फैलाने और इसके प्रति बनी सामाजिक झिझक को दूर करने को समर्पित है। इसका मुख्य संदेश है, कदम उठाएँ, उम्मीद जगाएँ जिससे आत्महत्या को रोका जा सकता है।

सही कदम बचाए जीवन 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतर्राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम संगठन (IASP) ने मिलकर 2003 में इस दिन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य आत्महत्या के मामलों को कम करना और लोगों को जागरूक करना था कि सही समय पर सही कदम उठाकर जीवन बचाया जा सकता है

40 सेकंड में जाती है एक जान 

हर साल लगभग 7 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। यानी हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान दे देता है। यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि परिवारों, समाज और समुदाय के लिए गहरा आघात है। ऐसे में यह दिन हमें याद दिलाता है कि बातचीत, समझ और सहयोग से इन मौतों को रोका जा सकता है।

जागरूकता अभियान एक पहल

इस दिन विभिन्न देशों में कार्यक्रम और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोग सोशल मीडिया पर #WSPD जैसे हैशटैग का इस्तेमाल कर संदेश फैलाते हैं, कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सत्र आयोजित किए जाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण—लोग एक-दूसरे की बातें ध्यान से सुनते हैं।

सामान्य बातचीत से रोकना संभव

विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या को रोका जा सकता है, यदि हम समय रहते मदद माँगने और देने की पहल करें। जरूरत है मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बातचीत का हिस्सा बनाने की।

सबकी होगी जिम्मेदारी तभी बनेगी बात 

आत्महत्या को रोका जा सकता है पर जिम्मेदारी सबको उठानी होगी व्यक्ति, परिवार, समुदाय और सरकार को मिलकर काम करना होगा। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच, परामर्श और इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर, संकट की घड़ी में मददगार साबित होती हैं। समुदाय में जागरूकता फैलाना, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कलंक को कम करना और खुली बातचीत को बढ़ावा देना बेहद ज़रूरी है। मीडिया की जिम्मेदार रिपोर्टिंग, घातक वस्तुओं तक पहुंच को कम करना और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करना आत्महत्या की आशंका को कम करने के प्रभावी उपाय हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम हुआ लागू

भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास करना अपराध माना गया है। इसमें दोषी पाए जाने पर एक वर्ष तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।  लंबे समय से इस धारा पर विवाद रहा है, क्योंकि मानसिक तनाव या बीमारी के कारण आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को अपराधी ठहराना कई विशेषज्ञों को सही नहीं लगा। 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (Mental Healthcare Act, 2017) लागू हुआ। इसके तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले को अब अपराधी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता की ज़रूरत वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। सरकार की ज़िम्मेदारी है कि ऐसे व्यक्ति को इलाज और पुनर्वास उपलब्ध कराए।

जीवन की उथल पुथल में हम एक दूसरे से बात करना ही छोड़ देते है, कभी कभी किसीको सुनना जरुरी होता हैं तो कभी किसीको ये बताना हम आपके साथ है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हमें यही सिखाता है कि हर जिंदगी अनमोल हैं।


अनोखेपन का जश्न है वंडरफुल वीर्डोज़ डे, जाने क्या कुछ हटके करे आज

मानव सभ्यता की शुरुआत से ही ऐसे लोग रहे हैं जो भीड़ से अलग दिखते हैं। थोड़ा हटकर सोचना, अलग अंदाज़ में जीना और सामान्य से अलग रहना ही उन्हें ‘वीर्डो’ बनाता है। हालांकि हर दौर में इन्हें सराहा नहीं गया। लेकिन सन 2000 में अमेरिका के टेक्सास राज्य के ऑस्टिन शहर के कुछ नागरिकों ने ठाना कि इन अनोखे और अजीबोगरीब लोगों के लिए भी एक दिन मनाया जाना चाहिए। वहीं से शुरुआत हुई “Wonderful Weirdos Day” की। इसका मूल नारा था,“Keep Austin Weird”। इस पहल को टॉम रॉय का भी सहयोग मिला और धीरे-धीरे यह दिन अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया।

कैसे बनाए वंडरफुल डे?

यह दिन खासतौर पर उन लोगों के लिए है, जिनकी परिभाषा में ‘नॉर्मल’ थोड़ा अलग होता है। इसे मनाने के कुछ मज़ेदार तरीके हो सकते हैं, अनोखे बनें इस दिन ज़रा हटके कपड़े पहनें, कुछ अजीब बोलें या फिर अलग अंदाज़ में चलें। जैसे नाचते-नाचते दफ़्तर पहुँचना या दोस्तों के साथ कोई अजीबोगरीब एक्ट करना।

ड्रेस कोड में बदलाव

धारीदार शर्ट के साथ पोल्का डॉट्स वाली स्कर्ट पहनना हो या किसी कॉमिक बुक कैरेक्टर जैसा लुक अपनाना, आज सब माफ है, आप शूट के साथ जूता पहने, शर्ट के साथ शोर्ट पहने, कुछ भीजो फैशन ट्रेंड से हटकर हो और आपको लगे कुछ तो अलग है।

कुछ अजीबोगरीब फ़िल्में देखे 

अजीबोगरीब किरदारों पर बनी फ़िल्में देखें, जैसे सस्ती दुल्हन महंगा दूल्हा ,जवानी की भूल, दो लड़के दोनों कड़के , एक से मेरा क्या होगा, अरविंद देसाई की अजीब दास्तां , लेडी किलर , उधार का सिंदूर, मुर्दे की जान खतरे में।

वीर्ड म्यूज़िक सुनें

व्हाई दिस कोलावेरी, कैंदी पो, ठा ठा करके, मेरे हसबैंड मुझे प्यार नहीं करते, क्या बनेंगे पोहे बनेंगे, मैं लड़की पो पो पो, तू लड़का पो पो पो,  ‘जैसे संगीत इस दिन को आपके लिए और परफेक्ट बना सकते है।

अनोखा खाना खाए

मेनू कार्ड में हमेशा ऐसी बहुत सारी डिश होती है जिसे आप मंगवाने से पहले थोड़ा सोचते है तो कभी-कभी स्वाद में भी कुछ हटकर हो जाए। वैसे तो भारतीय बहुत कुछ अनोखा बनाते हैं पर कुछ एक्सपेरिमेंटल डिश आप ट्राइ कर सकते है जो आपने पहले कभी खाई न हो।

दूसरे वीर्डोज़ को सराहे, किसी दोस्त को कार्ड दें, नोट लिखें या सोशल मीडिया पर उन्हें टैग करके बताएं कि उनकी अजीबो गरीब हरकते ही उन्हें खास बनाती है। “वंडरफुल वीर्डो डे’  हमें याद दिलाता है कि ‘अलग होना’ ही हमें वाकई में अनोखा और खास बनाता हैं।


खुद के लिए समय चुराना भी है एक कला, जाने कैसे व्यस्त रहकर भी चुने खुद को

आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हर कोई इतना व्यस्त है कि खुद के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सच तो यह है कि खुद के लिए कुछ पल चुराना भी एक कला है। अगर आप ऑफिस और काम की भागदौड़ के बीच सुकून की तलाश में हैं, और कहीं दूर जाना आपके लिए संभव नहीं है, तो आपके आसपास भी कई ऐसी जगहें हैं जो आपको राहत दे सकती हैं।

पास वाला पार्क 

आपको सुनकर थोड़ा अटपटा लगे, लेकिन ऑफिस या घर के पास बने पार्क में बैठना आपको बेहद सुकून दे सकता है। ताज़ी हवा, हरी भरी घास और बच्चों की खिलखिलाहट आपको तनाव से दूर कर देगी।

नजदीक वाला मंदिर

कभी-कभी घर लौटने का मन न हो तो मंदिर एक शांत कोना बन सकता है। वहाँ की शांति और सकारात्मक ऊर्जा मन को हल्का कर देती है।

ऑफिस ब्रेक में टहलना

काम के बीच थोड़ी देर टहलना बंदिशों के बावजूद दवा की तरह असर करता है। यह छोटा सा बदलाव आपके मूड को बेहतर कर देता है।

रास्ते की अनदेखी जगह 

कभी समय से पहले निकल आए तो रास्ते में कोई जगह दिखी, जो आज से पहले आपने देखी कई बार हो पर रुके नहीं हो,वह रूककर थोड़ा ठहरे, आपको अच्छा लगेगा।

मन में पसंदीदा जगह की कल्पना 

अगर कहीं जाना संभव न हो तो आँखें बंद कर अपनी पसंदीदा जगह की कल्पना करें। यह मानसिक यात्रा भी आपको ताज़गी और हल्कापन देगी।

इस तरह, ज़िंदगी की भागदौड़ के बीच भी सुकून पाने के ठिकाने दूर नहीं, बल्कि आपके आसपास ही छिपे होते हैं। ज़रूरत बस उन्हें तलाशने और कुछ पल खुद को देने की है।


भारतीय पत्रकारिता को क्यों मिला विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वाँ स्थान

भारत, जहाँ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वहाँ आज पत्रकारिता अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए जूझ रही है। हर साल रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया जाता है। इस साल भी 2 मई को RSF की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें भारत को 151वाँ स्थान मिला है। पिछले साल भारत 159वें और 2023 में 161वें स्थान पर था। हालांकि मामूली सुधार हुआ है, लेकिन भारत अब भी “बहुत गंभीर” श्रेणी में शामिल है। 180 देशों में 151वाँ स्थान हमे यहाँ सोचने पर मजबूर करता हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ की भारत इस स्तिथि में आ गया हैं। आइये जानते हैं रिपोर्ट में क्या सामने आया।

क्या होता हैं प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक ( Press Freedom Index ) सालाना आने वाली एक रैंकिंग है जो विभिन्न देशों में पत्रकारों और समाचार संगठनों की स्वतंत्रता की डिग्री का आकलन करती है। यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा प्रकाशित किया जाता है, जो पेरिस स्थित एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है। रैंकिंग में देशों का मूल्यांकन पाँच मानकों में किया जाता हैं, जिनमे राजनीतिक, आर्थिक, विधायी (किसी देश में पत्रकारिता और मीडिया से जुड़ी कानूनी व्यवस्था, नियम और नीतियाँ कितनी स्वतंत्रता देती हैं), सामाजिक और सुरक्षा शामिल है। इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति को उजागर करना और उन चुनौतियों को सामने लाना है जिनका सामना पत्रकारिता को करना पड़ रहा है।

टेक कंपनिया बन रही वजह

रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स ने बताया कि प्रेस स्वतंत्रता का वैश्विक परिदृश्य इस बार पहली बार “कठिन स्थिति” में दर्ज किया गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है आर्थिक दबाव। रिपोर्ट के अनुसार, गूगल, अमेज़न, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी टेक कंपनियाँ विज्ञापन राजस्व का बड़ा हिस्सा ले रही हैं, जिससे पारंपरिक पत्रकारिता कमजोर पड़ रही है।

बड़े उद्योगपतियों का बढ़ता दायरा 

भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जहाँ मीडिया स्वामित्व राजनीतिक और कारोबारी घरानों के हाथों में सिमट गया है। रिपोर्ट ने विशेष रूप से मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के मीडिया क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया। RSF ने कहा कि 2014 के बाद से भारत का मीडिया “अनौपचारिक आपातकाल” जैसी स्थिति में है, जहाँ बड़े घराने और सरकार के बीच नजदीकी संबंधों ने मीडिया बहुलता को खतरे में डाल दिया है।

भारत अपने पड़ोसी देशों से पीछे

भारत अपने कई पड़ोसियों से पीछे है। नेपाल 90वें, मालदीव 104वें और श्रीलंका 139वें स्थान पर हैं। हालांकि भारत भूटान (152), पाकिस्तान (158), म्यांमार (169) और चीन (178) से बेहतर स्थिति में है। नॉर्वे, एस्तोनिया और नीदरलैंड्स शीर्ष तीन देशों में शामिल हैं।

160 देशों को करना पड़ रहा हैं संघर्ष

RSF ने चेतावनी दी है कि दुनिया के 160 देशों में मीडिया आर्थिक स्थिरता पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अमेरिका, अर्जेंटीना और ट्यूनीशिया में भी स्थानीय पत्रकारिता पर संकट गहराता जा रहा है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक बताया गया है, खासकर गाज़ा में, जहाँ की स्तिथि बेहद संवेदनशील हैं।

प्रेस रिपोर्ट साफ करती है कि पत्रकारिता केवल राजनीतिक दबाव ही नहीं, बल्कि आर्थिक संकट से भी गहरे खतरे में है।


कंपनी की छुट्टियों का एबीसी: जानें ईएल सीएल और सिक लीव के बारे में

आम तौर पर जब भी हम किसी कंपनी में काम करते हैं तो हम कई ऐसे शब्दावली को पढ़ते हैं जिनसे हम अनजान होते हैं,  जिनकी जानकारी हमे नहीं होती। ऐसे ही कुछ टर्मिनोलॉजी के बारे में आज हम बात करेंगे, ईएल, सीएल, और सिक लीव तीनो ही जब हम किसी कंपनी में काम करते हैं तो हमे मिलती हैं।

अर्जित छुट्टी जो हर सेक्टर में है अलग 

ईएल को कहते है अर्जित छुट्टी (Earned Leave) नाम से ही जाहिर है की वो छुट्टी जिससे हम खुद कमाते हैं एक सवेतन अवकाश है जो कर्मचारियों को उनकी सेवा अवधि या कार्य प्रदर्शन के आधार पर मिलता है। यह कर्मचारियों को आराम, व्यक्तिगत जिम्मेदारियाँ और छुट्टियों के लिए समय देता है, जिससे कार्य-जीवन संतुलन और कार्य करने की क्षमता बढ़ती है। भारत में सरकारी कर्मचारियों के लिए अप्रयुक्त ईएल 300 दिन (केंद्र) और 180 दिन (राज्य) तक बढ़ाया जा सकता है, जबकि निजी कंपनियाँ आमतौर पर 30-120 दिनों तक संचय की अनुमति देती हैं। तो अगर आप किसी निजी कंपनी में काम करते है तो यहा मिलना थोडा मुश्किल होता है।

अचानक मिलने वाली छुट्टी हैं कैजुअल लीव

कैजुअल लीव (Casual Leave) या आकस्मिक अवकाश महीने में कभी कभी दी जाने वाली छुट्टी है। अचानक कभी किसी कर्मचारी को कोई अवश्यक काम आ गया या कोई पर्सनल वर्क तब यह छुट्टी काम आती है। यह वेतनभोगी अवकाश होता है जोकि आपकी तनख्वाह में कोई असर नहीं डालता. यह लम्बे समय की छुट्टियों से अलग होता है। अब अचानक कभी किसी परिस्तिथि में फस जाओ तब आप इस छुट्टी का इस्तमाल कीजिएगा। 

बीमार होने पर सिक लीव 

जब कभी आप बीमार हो जाए और आप किसी कंपनी में काम करते हो तो सिक लीव आपको दी जाती है। यह भी एक सवेतन छुट्टी है, जिसमे कर्मचारी को स्वस्थ होने के लिए कुछ दिनों की छुट्टी दी जाती हैं। भारत में सिक लीव यानी बीमारी की छुट्टी के लिए कोई एक केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। इसकी व्यवस्था आम तौर पर कंपनियों की नीतियों और संबंधित अधिनियमों के आधार पर होती है, विशेषकर कारखानों के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार। निजी क्षेत्र में सामान्य तौर पर कर्मचारियों को प्रति वर्ष लगभग 12 दिन सवेतन बीमारी की छुट्टी दी जाती है। अगर छुट्टी तीन दिन से अधिक हो, तो डॉक्टर का प्रमाणपत्र जमा करना आवश्यक होता है। सिक लीव कितनी मिल रही है इसके लिए कंपनी द्वारा दिया गया बोंड पेपर जरुर पड़े। 

हमारे भारत देश में चाहे फिर वो सरकारी हो या निजी कुछ अवकाश निर्धारित किए गए है, भले ही वो सरकारी में ज्यादा और प्राइवेट में कम हो, पर दी जाती है. जरुरत है बस जागरूक होने की जब भी आप एक कर्मचारी के तौर पर कही काम करना शुरू करे तो अपने अधिकारों के बारे में जरुर जाने और किसी भी बोंड या अग्रीमेंट पेपर में हस्ताक्षर (Sign) करने से पहले अपने वकील या बड़ों से सलाह जरुर ले। 


महासागर की रखवाली करने वाला एक प्राचीन समुद्री जीव

शांत और धीमी गति जिसकी साथी, मनुष्यों के लिए नहीं है खतरा पर मनुष्य बनते जा रहे खतरा, एक ऐसा ही बड़ा समुद्री जीव है व्हेल शार्क

अंतर्राष्ट्रीय व्हेल शार्क दिवस विशेष : धरती पर जीवन की विविधता का एक अद्भुत उदाहरण है व्हेल शार्क (Rhincodon typus), आकार में यह समुद्र की सबसे बड़ी जीवित मछली है, जिसकी लंबाई 18 मीटर तक और वजन लगभग 20 टन तक हो सकता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह विशालकाय जीव पूरी तरह निर्दोष और शांत स्वभाव का होता है। हर साल 30 अगस्त को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय व्हेल शार्क दिवस हमें न केवल इस अद्भुत प्रजाति को जानने का अवसर देता है, बल्कि इसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी भी याद दिलाता है। हम सब आपस में जुड़े हुए हैं, हमारे द्वारा किया गया हर एक कार्य पृथ्वी में रह रहे हर एक जीव पर अपना प्रभाव डालता हैं।

व्हेल शार्क की दुनिया 

व्हेल शार्क ज़्यादातर गर्म पानी वाले महासागरों में पाई जाती है। यह पश्चिमी अटलांटिक महासागर (न्यूयॉर्क से लेकर ब्राज़ील तक), कैरेबियन सागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और लाल सागर के जल में भी देखी जा सकती है। भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव, थाईलैंड, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के तटीय क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी समुद्री जीवन की समृद्धि का प्रतीक है। नाम क्यों पड़ा “व्हेल शार्क”,  इसका शरीर आकार में व्हेल जैसा बड़ा होता है, लेकिन यह असल में शार्क की ही प्रजाति है।

व्हेल शार्क की शारीरिक बनावट 

व्हेल शार्क का शरीर चौड़ा और चपटा होता है। इसके सिर पर चौड़ा मुँह होता है जिसकी चौड़ाई लगभग 1.5 मीटर तक हो सकती है। इसके शरीर पर सफेद धब्बों और धारियों का अनोखा पैटर्न बना होता है, जो इसे समुद्र में बेहद आकर्षक बनाता है। यह पैटर्न हर व्हेल शार्क के लिए अद्वितीय होता है, जैसे इंसानों की उंगलियों के निशान।

फ़िल्टर-फीडिंग कर खाते हैं भोजन 

भले ही व्हेल शार्क का मुँह बहुत विशाल होता है, लेकिन यह सिर्फ सूक्ष्म समुद्री जीवों (Plankton), छोटी मछलियों और झींगों को ही खाती है। यह समुद्र में मुँह खोलकर तैरती है और पानी को छानकर भोजन अलग कर लेती है। इस प्रक्रिया को फ़िल्टर-फीडिंग कहते हैं। इंसानों या बड़े जीवों के लिए यह कभी भी ख़तरा नहीं होती।

लम्बा जीने वाली प्रजातियों में से एक 

वैज्ञानिकों के अनुसार, व्हेल शार्क जीवित शिशुओं को जन्म देती है। जन्म के समय इनकी लंबाई लगभग 55 सेंटीमीटर होती है। ये प्राणी सामान्यतः 70 से 100 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जिससे यह समुद्री दुनिया की दीर्घजीवी प्रजातियों में से एक है।

मनुष्य से संबंध और खतरे

व्हेल शार्क इंसानों के लिए बिल्कुल हानिरहित है। कई बार गोताखोर इनके करीब जाकर इन्हें छू भी लेते हैं और यह किसी तरह का आक्रामक व्यवहार नहीं दिखातीं।
लेकिन इंसानों द्वारा किया गया अत्यधिक शिकार, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और नावों की टक्कर इनकी प्रजाति को तेजी से खतरे में डाल रहे हैं। कई देशों में इनका शिकार भोजन और व्यापार के लिए किया जाता है। इन्हीं कारणों से IUCN (International Union for Conservation of Nature) ने व्हेल शार्क को संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में रखा है।

बचाने की आवश्यकता क्यों

व्हेल शार्क केवल समुद्र की शोभा ही नहीं बढ़ाती, बल्कि समुद्र का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। इसका संरक्षण करना हम सबकी जिम्मेदारी है। अंतर्राष्ट्रीय व्हेल शार्क दिवस हमें यह संदेश देता है कि धरती पर मौजूद हर प्रजाति की अपनी अहमियत है। यह दैत्याकार मगर शांत शार्क हमें सिखाती है कि आकार और ताक़त के बावजूद शांति और संतुलन जीवन का असली गुण है।
आज जरूरत है कि हम इसके संरक्षण के लिए जागरूक हों, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस अद्भुत जीव को देख सकें और समुद्र की गहराइयों में इसकी उपस्थिति से प्रेरणा पा सकें।


ओडिशा का प्राचीन मंदिर जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में है शामिल

ओडिशा के पुरी जिले में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर भारत की प्राचीन स्थापत्य कला का अनमोल खजाना है। 13वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने इसे सूर्य देव को समर्पित कर बनवाया। आज यह यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और भारतीय संस्कृति की शान माना जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि इसे 1250 ईस्वी के आसपास बनवाया गया था। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा नरसिंह देव ने बंगाल में मुस्लिम सेनाओं पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में करवाया, ताकि यह दिखा सके कि उनका शासन स्वयं देवताओं द्वारा मान्य और संरक्षित है। मंदिर को कलिंग आर्किटेक्चर शैली का भव्य और अद्वितीय उदाहरण माना गया है।

कोणार्क सूर्य मंदिर ओड़िया स्थापत्य कला का शिखर माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है इसकी अनूठी शिल्पकला और अद्भुत नक्काशी। मंदिर की योजना तीन मुख्य हिस्सों में बनी है — मुख्य गर्भगृह, उसके साथ जुड़ा प्रवेश और प्रार्थना कक्ष, और उससे आगे एक स्तंभों से घिरा नृत्य मंडप।

मंदिर को विशाल रथ का दिया गया है स्वरुप

मंदिर को सूर्य देव के विशाल रथ के रूप में बनाया गया है। इसके दोनों ओर बने 12 जोड़ी विशाल पत्थर के पहिए साल के महीनों और समय चक्र का प्रतीक हैं। इस रथ को खींचने के लिए सात घोड़ों की मूर्तियाँ बनाई गई थीं, जिनमें से आज केवल एक ही घोड़ा सुरक्षित है। पहियों और दीवारों के बीच बनी मूर्तियों में नृत्यांगनाएँ, अप्सराएँ और प्रेमालाप के दृश्य अंकित हैं, जो उस काल के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक पेश करते हैं।

मुख्य शिखर 227 फीट ऊँचा हुआ करता था 

यह मंदिर ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है ताकि इसकी पवित्रता और भव्यता स्पष्ट हो सके। कहा जाता है कि कभी इसका मुख्य शिखर लगभग 227 फीट ऊँचा था, लेकिन 19वीं शताब्दी तक वह ध्वस्त हो गया। उस समय कई मूर्तियाँ और शिल्प पास के मंदिरों और संग्रहालयों में ले जाए गए। 20वीं शताब्दी में इस मंदिर को बचाने के लिए गर्भगृह और मुख्य कक्ष को पत्थरों और रेत से भर दिया गया, ताकि पूरी इमारत ढह न जाए। आज केवल प्रवेश द्वार का शिखर बचा है, लेकिन वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं है।

नक्काशियों में दिखते जीवन के पृथक पहलु 

मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता इसकी अभिव्यक्ति है। 12 जोड़ी पहियों को वर्ष के 12 महीनों का प्रतीक माना जाता है और सात घोड़े संस्कृत छंदों की सात मात्राओं के प्रतीक हैं। नक्काशियों में प्रेम, सौंदर्य और जीवन के विभिन्न पहलुओं के दर्शन होता है। यहाँ तक कि कामुक मूर्तियाँ भी मंदिर की कलात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं, जो मानव जीवन और तंत्र परंपरा से जुड़े पहलुओं को दर्शाती हैं।

1984 में हुआ यूनेस्को में शामिल 

1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया और 2022 में इसके संरक्षण और मरम्मत का नया प्रोजेक्ट शुरू किया गया, जिसमें रेत हटाकर प्रवेश कक्ष को बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है। कोणार्क सूर्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह हमारे इतिहास, कला और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि भारतीय शिल्प और स्थापत्य दुनिया के किसी भी हिस्से से कम नहीं रहा है।


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