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विकास की रफ़्तार तेज़ है, लेकिन ज़िंदगी अब भी नाज़ुक है

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विकास की रफ़्तार तेज़ है, लेकिन ज़िंदगी अब भी नाज़ुक है

वंशिका 

सफ़र हमेशा खास होता है — कभी खुशी से भरा, तो कभी बहुत ही दर्दनाक। ज़िंदगी कब क्या मोड़ ले ले, इसका कोई अंदाज़ा नहीं होता। अहमदाबाद प्लेन हादसे ने हर किसी को अंदर तक झकझोर दिया है। जो लोग नए सपनों के साथ एक नई शुरुआत करने जा रहे थे, उन्हें क्या पता था कि चंद पलों में सब कुछ बदल जाएगा। उनकी ज़िंदगी, उनके सपने — सब अधूरे रह गए। इस घटना ने एक बार फिर से ये सिखा दिया कि ज़िंदगी कितनी नाज़ुक और अनिश्चित है। हमें हर पल को पूरी तरह जीना चाहिए, क्योंकि कौन जाने अगला पल हमारे साथ हो या नहीं।

हम 21वीं सदी में जी रहे हैं — एक ऐसा समय जहाँ तकनीक ने दुनिया को हमारी हथेलियों में ला दिया है। तेज़ रफ्तार विमान, एडवांस सुरक्षा सिस्टम, जीपीएस, ऑटो-पायलट — सब कुछ है। लेकिन इतने विकास के बावजूद भी हम इंसानी ज़िंदगी को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बना पाए। टेक्नोलॉजी बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन एक जीवन की कीमत नहीं चुका सकती। मशीनें गलती कर सकती हैं, लेकिन उनका दर्द महसूस करने वाला इंसान ही होता है।

ऐसे हादसे सिर्फ एक परिवार को नहीं तोड़ते, वे पूरे समाज की आंखें खोलते हैं। हर मुस्कुराता चेहरा जो उस प्लेन में बैठा था, अपने पीछे कई अधूरे रिश्ते, बातें और ख्वाहिशें छोड़ गया। यह एक चेतावनी भी है — कि हम अपने अपनों को समय दें, दिल से जिएं और छोटी-छोटी बातों के लिए शुक्रगुज़ार रहें।

ज़िंदगी बहुत कीमती है, और बहुत छोटी भी। इसे टालने, पीछे हटने या ग़ुस्से में बिताने के लिए नहीं मिली। हर दिन, हर सफ़र, और हर रिश्ता — एक मौका है जीने का, महसूस करने का। इसीलिए जितना हो सके, खुलकर जिएं, प्यार करें और दूसरों के लिए भी दुआ करें। और सबसे ज़रूरी बात — तकनीक पर भरोसा करें, लेकिन इंसानियत को कभी मत भूलें।


डिजिटल लत का नया चेहरा: जब हर स्क्रॉल में छिपा हो एक जाल

मोनिका

इंटरएक्टिविटी यानी परस्पर क्रिया किसी भी सूचना प्रणाली में हमें जानकारी तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने में कुछ हद तक नियंत्रण देती है। सुनने में यह हमारे लिए फायदेमंद लगता है — हमें विकल्प मिलते हैं, जैसे किसी चौराहे पर खड़े होकर रास्ता चुनना। लेकिन डिजिटल दुनिया में ये रास्ते पहले से तय होते हैं, जिन्हें एक कंप्यूटर प्रोग्राम डिज़ाइन करता है। हम सिर्फ उन्हीं विकल्पों में से चुन सकते हैं जो वह सिस्टम हमें दिखाता है।

शॉर्ट फॉर्म कंटेंट ने इसी इंटरएक्टिविटी को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है — इतना कि अब यह एक गंभीर लत बन चुकी है।

30 सेकंड की एक छोटी सी वीडियो हमें घंटों तक स्क्रीन पर बांधे रख सकती है। हर वीडियो हमारे दिमाग को थोड़ा-थोड़ा dopamine देता है, एक ऐसा रसायन जो हमें खुशी का अहसास देता है। लेकिन यह खुशी कभी पूरी नहीं होती — जितना ज्यादा देखो, उतनी ही ज्यादा इच्छा होती है। यही कारण है कि हम बार-बार स्क्रॉल करते रहते हैं, बिना रुके।

शॉर्ट फॉर्म कंटेंट की शुरुआत 2013 में Vine नाम के ऐप से हुई थी। इस प्लेटफॉर्म पर सिर्फ 6 सेकंड की वीडियो बनाई जाती थी, और लोग काफी तेजी से मशहूर हुए — जैसे Logan Paul, King Bach वगैरह। लेकिन एक मजबूत बिज़नेस मॉडल की कमी की वजह से Vine बंद हो गया।

2018 में चीनी कंपनी ByteDance ने Musical.ly को लॉन्च किया, जो बाद में TikTok बना। TikTok ने एडिटिंग टूल्स, म्यूजिक फिल्टर्स और एक जबरदस्त एल्गोरिदम के ज़रिए लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया — और यही एल्गोरिदम हमारे dopamine सिस्टम पर सीधा असर डालने लगा।

2020 तक हर बड़ा प्लेटफॉर्म शॉर्ट फॉर्म कंटेंट में उतर चुका था — YouTube Shorts, Instagram Reels, Snapchat Spotlight। अब यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया था, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया बन गई थी जो धीरे-धीरे हमारी सोचने और समझने की क्षमता को कमजोर करने लगी।

आज हमारा फोकस करने का समय, सोचने की गहराई और फैसला लेने की ताकत सब घटती जा रही है। हम सोचते हैं कि “30 सेकंड की वीडियो से क्या फर्क पड़ेगा?” लेकिन यही वीडियो हमें रोज़ के कई घंटे छीन लेती है। ध्यान की हालत ये हो गई है कि हम अब 30 सेकंड की रील भी 2x स्पीड पर देखते हैं।

इन सबके पीछे जो असली वजह है, वो है एल्गोरिदम। ये हमें वही कंटेंट दिखाते हैं, जो हमारी सोच से मेल खाता है — जिससे हम सहमत हों या असहमत, दोनों ही मामलों में हमें उलझा कर रखते हैं। इससे हमारी सोच सीमित हो जाती है और हम एक तरह के ही विचारों में घिर जाते हैं।

इंटरएक्टिविटी हमें विकल्प देती तो है, लेकिन यह विकल्प भी उन्हीं रास्तों पर चलते हैं जो पहले से बनाए जा चुके होते हैं। हमें लगता है कि हम कंट्रोल में हैं, लेकिन असल में हमारे हाथ में बस कुछ सीमित विकल्प ही होते हैं। बाकी सब उस सॉफ्टवेयर के हाथ में होता है जिसने वो सिस्टम बनाया है।

सबसे बड़ी बात ये है कि इस लत के कोई साफ़ लक्षण नहीं दिखते — न कोई खून की जांच, न कोई मेडिकल रिपोर्ट। लेकिन इसका असर सीधा हमारे दिमाग पर होता है। सोचने की शक्ति कम होती जाती है, निर्णय लेने में परेशानी होने लगती है, और हम बस एक रील से दूसरी रील पर जाते रहते हैं — बिना सोचे समझे।

एक समय ऐसा आता है जब इंसान सिर्फ शरीर से जिंदा रहता है, लेकिन दिमाग से थक चुका होता है। हम चल-फिर तो रहे होते हैं, लेकिन सोच नहीं पा रहे होते।

अब सवाल यह है — क्या सच में कंट्रोल हमारे हाथ में है?


भ्रमित जीवन: सपनों की दुनिया या हकीकत से दूर जाना?

कभी-कभी हमारी सोच हमें खुश रखती है, लेकिन जब हम हकीकत से दूर हो जाएं, तो रिश्ते और तरक्की प्रभावित होती है

प्रियांश कुकरेजा

कभी-कभी हम ऐसी दुनिया में जीने लगते हैं जो हमारे मन ने बनाई होती है — एक ऐसी दुनिया जहां सब कुछ हमारे हिसाब से होता है, जहां हम खुद को सबसे सही और सबसे खास समझते हैं। मैंने भी ज़िंदगी में कई बार खुद को ऐसे ही सोचते हुए पाया है, जब मुझे लगने लगा कि मेरी ज़िंदगी में कोई परेशानी ही नहीं है जबकि असलियत कुछ और थी। जैसे बचपन में हम सोचते हैं कि हम हमेशा जीतेंगे, हमें कोई हरा नहीं सकता, या नौकरी या पढ़ाई में हम सबसे बेहतर हैं — पर धीरे-धीरे पता चलता है कि असलियत उससे अलग भी हो सकती है। ऐसा भ्रमित जीवन थोड़े समय के लिए अच्छा लग सकता है, क्योंकि इससे हमें खुशी, हिम्मत और हौसला मिलता है। जब हालात मुश्किल होते हैं, तो यही सोच हमें सहारा देती है। लेकिन अगर हम ज़्यादा देर तक इस सोच में रह जाएं, तो हम हकीकत को नजरअंदाज़ करने लगते हैं, गलत फैसले लेने लगते हैं और हमारे रिश्ते में भी असर पड़ता हैं। धीरे-धीरे हमारी तरक्की रुक जाती है, क्योंकि हम खुद को पहले से ही सही मानने लगते हैं और सीखने की इच्छा खो बैठते हैं। मेरे नजरिए से देखा जाए तो थोड़ा-बहुत भ्रम चल सकता है, क्योंकि ये हमें आगे बढ़ने की ताकत देता है, लेकिन हमें सच्चाई से भी जुड़ा रहना चाहिए। ज़रूरी है कि हम अपने सपनों और असलियत के बीच संतुलन बनाए रखें — सपने ज़रूरी हैं, लेकिन ज़मीन पर टिके रहना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।


देहरादून,को भारत की शिक्षा राजधानी क्यों माना जाता है?

प्रियांश कुकरेजा 

जब भी भारत में पढ़ाई के लिए सबसे अच्छी जगह की बात होती है, तो देहरादून का नाम सबसे पहले लिया जाता है। देहरादून को भारत की शिक्षा राजधानी कहा जाता है क्योंकि यहां बहुत पुराने, भरोसेमंद और शानदार स्कूल और कॉलेज हैं, जहां से पढ़कर कई बड़े और मशहूर लोग निकले हैं। देहरादून शहर पहाड़ियों के बीच बसा है, यहां का मौसम बोहत सुंदर होता है और देहरादून का हालात  पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा है। दून स्कूल, वेल्हम गर्ल्स और बॉयज़ स्कूल, मसूरी इंटरनेशनल स्कूल और ओक ग्रोव स्कूल जैसे नामी स्कूलों में राहुल गांधी, राजीव गांधी, करण थापर और विक्रम सेठ जैसे जाने माने लोग पढ़ चुके हैं। यहां फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI), इंडियन मिलिट्री अकैडमी (IMA), यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज़ (UPES), ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, (DIT) डीआईटी यूनिवर्सिटी और (IMS) यूनिसन जैसे संस्था भी हैं, जहां देश और विदेश से छात्र पढ़ने आते हैं। देहरादून एक साफ-सुथरा, शांत और सुरक्षित शहर है, जहां लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर, हॉस्टल और पढ़ाई के लिए हर ज़रूरी सुविधा मिलती है। मेरी नजर में देहरादून सिर्फ एक शहर नहीं है, बल्कि ऐसी जगह है जहां पढ़ाई को बहुत अहमियत दी जाती है। यहां का हालात छात्रों को मेहनत करने, नियम का पालन करने और खुद पर भरोसा रखने की सीख देता है। अगर कोई शांति और अच्छे हालात में पढ़ाई करके अपना भविष्य बनाना चाहता है, तो देहरादून उसके लिए एक बहुत अच्छा जगह है।


बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”

जानिए बच्चे कैसे सोचते हैं, क्या सीखते हैं, और पैरेंट्स के लिए कौन-सी बातें ज़रूरी हैं समझना

समीक्षा सिंह 

अक्सर मम्मी-पापा को लगता है कि “बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”, या “हम जो कहते हैं, उसका उस पर कोई असर नहीं होता”। लेकिन ये बात समझना ज़रूरी है कि बच्चों की नींव शुरू के सालों में ही बनती है। अगर शुरुआती सालों में सही परवरिश की जाए — मतलब प्यार, समझ, सही दिशा और एक अच्छा माहौल मिले — तो बच्चा धीरे-धीरे अपने आप समझदार बनता है और पेरेंट्स की बातों को अहमियत देता है। लेकिन अगर शुरू से ही सिर्फ डांट-फटकार, या इग्नोर करना हो, तो बच्चा या तो विद्रोही हो जाता है या बिलकुल ही चुप और डरपोक। खासतौर पर पापा का बच्चे के साथ रिश्ता बहुत मायने रखता है — अगर पिता प्यार से पेश आएं, तो बच्चा खुद को सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करता है।
बेटा और बेटी को अलग नज़र से देखना या उनके साथ अलग व्यवहार करना भी उनके दिमाग और सोच पर असर डालता है। दोनों को बराबरी का मौका और प्यार मिलना चाहिए।
इसलिए ये ज़रूरी है कि पैरेंट्स बच्चे को शुरुआत से ही सुने, उसकी बातें समझें, और उसको यह महसूस कराएं कि वो मायने रखता है। ऐसा करने से बच्चा पेरेंट्स की बात भी सुनता है और अपने मन की भी खुलकर कहता है।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पैरेंटिंग का तरीका बहुत बदल गया है। माता-पिता इतने बिज़ी हो गए हैं कि उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं होता। कई बार पेरेंट्स बच्चों पर ज़्यादा कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं (जिसे हम सख्त पैरेंटिंग कहते हैं), जबकि ज़रूरत इस बात की है कि बच्चों को प्यार, समझ और थोड़ी आज़ादी भी मिले — ताकि वो खुलकर सोच सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।
बच्चों की रोज़ की रूटीन भी उनके मानसिक विकास के लिए ज़रूरी है। सही समय पर सोना, खेलना, पढ़ाई करना, और थोड़ी क्रिएटिव एक्टिविटीज़ करना बहुत फायदेमंद होता है। आजकल बच्चे मोबाइल, रील्स और वीडियो गेम्स में ज़्यादा उलझे हुए हैं, जिससे उनका ध्यान बंटता है और वो चिड़चिड़े हो जाते हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम कम होना चाहिए।
खाने-पीने की आदतें भी बच्चों के मन और मूड को बहुत प्रभावित करती हैं। हर दिन चिप्स, कोल्ड ड्रिंक या जंक फूड खाने से बच्चे थके-थके और चिड़चिड़े महसूस करते हैं। अगर शुरुआत से ही घर में हेल्दी खाने की आदत डाल दी जाए — जैसे फल, हरी सब्ज़ियाँ, दूध वगैरह — तो बच्चे भी उसे अपनाते हैं।
और सबसे जरूरी बात — बच्चों से ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिससे उन्हें लगे कि वो अच्छे नहीं हैं। जैसे “तुम कुछ नहीं कर सकते”, “देखो फलाने का बच्चा कितना अच्छा है” वगैरह। इससे उनके मन में हीन भावना आ सकती है। हर बच्चे की सोच और समझ अलग होती है, बस हमें उन्हें समझने और उनका साथ देने की ज़रूरत है।


देहरादून की छुपी हुई जगहें: भीड़ से दूर, दिल के करीब

एक स्थानीय की नज़र से देहरादून की वो अनदेखी जगहें, जहाँ सुकून, हरियाली और सच्ची खूबसूरती मिलती है।

प्रियांश कुकरेजा 

“देहरादून, उत्तराखंड की राजधानी, एक ऐसा शहर है जो अपनी ठंडी हवा, हरे-भरे पेड़ों, खूबसूरत पहाड़ियों, और शांति से बहते झरनों के लिए जाना जाता है। यहाँ की वादियाँ इतनी सुंदर हैं कि हर घूमने वाला बार-बार आने का मन बना लेता है। यह जगह उन लोगों के लिए खास “जो लोग शांत और सुंदर जगहों पर आराम करना चाहते हैं।

“लेकिन देहरादून सिर्फ रोबर्स केव, मसूरी या सहस्त्रधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर अपने भीतर कई ऐसे छुपे हुए स्थान है जिन्हें केवल एक स्थानीय ही पूरी तरह समझ सकता है। खालंगा वॉर मेमोरियल, जहाँ गोरखा सैनिकों की वीरता की गूंज आज भी सुनाई देती है, मालदेवता की शांत बहती नदी और हरियाली जो मन को सुकून देती है, और शिखर फॉल्स और किमादी वॉटरफॉल जैसे ट्रेकिंग स्पॉट जो भीड़ से दूर हैं और प्रकृति के करीब। लांडूर जहा सालों भर मौसम बहुत ही प्यारा रहता है थानों गांव की ताजी हवा और पक्षियों की आवाजाई देखने को मिलती हैं, वहीं FRI की पीछे छुपी वाल्किंग पथ आपको हर कदम पर हरियाली का एहसास कराती हैं। और तपकेश्वर मंदिर के आगे के जंगलों में जो शांत नदी बहती है, वो शब्दों मे बयान नही हो सकती है। देहरादून सिर्फ एक हिल स्टेशन नहीं, कहानियों और एहसासों से भरा एक जादुई शहर है—जहाँ हर मोड़ पर कुछ नया देखने, सुनने और महसूस करने को मिलता है।

 लेकिन एक स्थानीय होने के नाते मैं यही कहूंगा कि जैसे-जैसे बाहर से लोग इन जगहों पर आ रहे हैं, वैसे-वैसे हमें सफ़ाई और पर्यावरण की सुरक्षा का और अधिक ध्यान रखना चाहिए। कृपया जहां भी जाएं, प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें, कचरा खुले में न फेंके और इन खूबसूरत जगहों को वैसा ही रहने दें जैसा आपने पहली बार देखा—शुद्ध, शांत और स्वच्छ।


G7 में मोदी का न्योता: कनाडा से रिश्तों में नया दौर

मोनिका 

साल 2025 में G7 सम्मेलन की अध्यक्षता कनाडा कर रहा है, और यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सम्मेलन में विशेष मेहमान के रूप में आमंत्रित किया है, भले ही भारत G7 का सदस्य नहीं है।

जब मार्क कार्नी से इस आमंत्रण को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ कहा कि भारत “दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक अहम कड़ी है।” ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री को बुलाना स्वाभाविक था, चाहे अभी एक कानूनी जांच चल रही हो। यह बैठक ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे अहम विषयों पर चर्चा के लिए आयोजित की जा रही है।

हालांकि, भारत और कनाडा के रिश्ते बीते कुछ समय से सहज नहीं रहे हैं। 2023 में कनाडा के उस समय के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर यह आरोप लगाया था कि 18 जून 2023 को कनाडा में खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार की भूमिका थी।

भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और जवाब में कहा कि कनाडा खालिस्तानी अलगाववादियों को पनाह दे रहा है, जो भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने नरेंद्र मोदी को सम्मेलन में आमंत्रित किया और यह कहा कि “कनाडा में इस मामले की कानूनी प्रक्रिया चल रही है, जो काफी आगे बढ़ चुकी है। ऐसे में इस पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी करना फिलहाल उचित नहीं होगा।” गौरतलब है कि इस मामले में कनाडा में रहने वाले चार भारतीय नागरिकों पर आरोप लगाए गए हैं।

कनाडा में सिख समुदाय का इतिहास काफी पुराना है। वे 1800 के दशक के आखिरी वर्षों से वहां काम की तलाश में जाना शुरू हुए थे। उस समय वे मुख्य रूप से लकड़ी की मिलों में, रेलवे ट्रैक बिछाने और जंगलों में काम करते थे। आज, 100 से ज्यादा सालों की स्थायी मौजूदगी के बाद उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी कनाडा में रह रही है।

वहीं दूसरी ओर, पंजाब में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। युवा बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं या बहुत कम वेतन पर काम कर रहे हैं। किसान कर्ज में डूबे हुए हैं और जल स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है। नशा एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है, और कुछ प्रभावशाली परिवार इसमें शामिल होते हुए भी आसानी से बच निकलते हैं।

खालिस्तान की मांग एक बार फिर चर्चा में है, जिससे कई लोग डरे हुए हैं। कुछ हिंदू नेताओं की हत्या को भी खालिस्तानी समर्थकों से जोड़ा गया है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर सिख खालिस्तानी नहीं होता — सिख समुदाय का बड़ा हिस्सा मेहनती, शांतिप्रिय और अच्छे जीवन की तलाश में जुटा हुआ है।

इसी कारण कई सिख कनाडा की ओर रुख करते हैं — कोई नौकरी के लिए, कोई पढ़ाई के लिए, तो कुछ लोग अवैध तरीके अपनाकर भी वहां पहुंच जाते हैं। कनाडा में पहले से बसे कुछ लोग भारत में रह रहे लोगों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर उन्हें बुला लेते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो भारत में अपराधों में लिप्त होने के बाद वहां जाकर बस जाते हैं और वहीं से भारत विरोधी गतिविधियां चलाते हैं। दूसरी ओर, कनाडा को भी श्रमिकों की ज़रूरत है और वह ऐसे लोगों को स्वीकार करता है, जबकि अमेरिका अब ज़्यादातर योग्य और उच्च कुशल लोगों को ही प्राथमिकता देता है।

इस पूरी स्थिति को देखें तो यह एक तरह का मांग और आपूर्ति का मामला बन चुका है — भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में काम के इच्छुक लोगों की कोई कमी नहीं है, जबकि कनाडा में जनसंख्या कम है और श्रम की मांग अधिक।

ऐसे में, प्रधानमंत्री मोदी को G7 सम्मेलन में बुलाना सिर्फ एक राजनयिक कदम नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को फिर से सामान्य करने की कोशिश भी माना जा सकता है। इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा, “भारत और कनाडा जैसे जीवंत लोकतंत्र, जो आपसी मानवीय रिश्तों से गहराई से जुड़े हैं, पारस्परिक सम्मान और साझा हितों के आधार पर नई ऊर्जा के साथ मिलकर काम करेंगे। इस सम्मेलन में मिलने की प्रतीक्षा है।”

यह कदम न सिर्फ दो लोकतांत्रिक और आर्थिक रूप से मजबूत देशों के रिश्तों में नया मोड़ ला सकता है, बल्कि एक बार फिर सहयोग और समझदारी की भावना को आगे बढ़ाने की दिशा में भी असरदार साबित हो सकता है।


सेल्फ-केयर: खुद से जुड़ने की सबसे ज़रूरी आदत

ये कोई ऐशो-आराम नहीं, बल्कि दिमाग, दिल और शरीर के बीच तालमेल की शुरुआत है—क्योंकि जब आप खुद का ख्याल रखते हैं, तभी दूसरों के लिए भी पूरी तरह से साथ दे पाते हैं

प्रियांश कुकरेजा 

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर दूसरों का ख्याल रखते-रखते खुद को भूल जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि खुद की देखभाल यानी सेल्फ-केयर करना कोई शौक़ नहीं बल्कि ज़रूरी है। सेल्फ-केयर का मतलब है अपने शरीर, मन और दिल का ध्यान रखना—जैसे समय पर सोना, अच्छा खाना, थोड़ी कसरत करना, अपनी भावनाओं को समझना, ज़रूरत पड़ने पर “ना” कहना, और कभी-कभी खुद के लिए थोड़ा समय निकालना।

मेरे नज़रिए से, सेल्फ-केयर का मतलब सिर्फ आराम करना नहीं है, बल्कि खुद को समझना भी है। ये जानना कि हमें क्या चीज़ें थकाती हैं, और क्या हमें ऊर्जा देती हैं। ये वो छोटी-छोटी चीज़ें हो सकती हैं जो हमें खुद से जोड़ती हैं—”जैसे बिना किसी जल्दी के अपनी सुबह की चाय का स्वाद लेना, दिन की शुरुआत कुछ गहरी साँसों के साथ करना, या बस खुद से यह पूछना कि ‘मैं आज कैसा महसूस कर रहा/रही हूँ?’” यह हमें न सिर्फ तनाव से बचाता है बल्कि हमारी सेहत को बेहतर बनाता है, मानसिक रूप से मज़बूत करता है और हमें खुश रहने में मदद करता है। अगर हम खुद को समय नहीं देंगे, तो हम दूसरों का भी ठीक से साथ नहीं दे पाएंगे।

इसलिए हर दिन कुछ मिनट अपने लिए निकालना बहुत ज़रूरी है—चाहे वो एक कप चाय के साथ बैठना हो, थोड़ा सा टहलना, कोई पसंदीदा चीज़ करना या बस चैन से सांस लेना। याद रखें, खुद से प्यार करना और अपनी देखभाल करना पहली ज़िम्मेदारी है, क्योंकि जब आप खुद खुश रहेंगे, तभी दुनिया भी खूबसूरत लगेगी।


देवभूमि उत्तराखंड: आस्था, प्रकृति और शांति की अद्भुत भूमि

जहाँ चार धाम, ऋषियों की तपस्थली और हेमकुंड साहिब जैसी पवित्र जगहें मिलती हैं आत्मा को सच्ची शांति

प्रियांश कुकरेजा 

भारत के उत्तरी भाग में स्थित उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ यानी ‘देवताओं की भूमि’ कहा जाता है क्योंकि यह जगह सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता से भरी नहीं है, बल्कि यहाँ धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत बड़ा है। यह वही धरती है जहाँ हिंदू धर्म के चार प्रमुख तीर्थ—बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री—मौजूद हैं, जिनकी यात्रा से मोक्ष मिलने की बात मानी जाती है। साथ ही, यहाँ से गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियाँ निकलती हैं, जिनका ज़िक्र वेदों और पुराणों में भी किया गया है। ऋषिकेश और हरिद्वार जैसे स्थान योग और ध्यान के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं, जहाँ दुनिया भर से लोग आत्मा की शांति पाने आते हैं। उत्तराखंड वह जगह है जहाँ पुराने समय से महात्मा व्यास, वल्मीकि, कण्व जैसे महान ऋषियों ने तपस्या की और धार्मिक ग्रंथ लिखे। यहाँ कई पुराने मंदिर जैसे केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागेश्वर, नैना देवी और मां धारी देवी इस प्रदेश की धार्मिक गरिमा को और बढ़ाते हैं।

साथ ही, उत्तराखंड की खूबसूरत पर्वतीय घाटियाँ, ठंडी हवाएँ और शांत वातावरण हमारी आत्मा को शांति देते हैं। यहाँ समुद्र तल से लगभग 4,633 मीटर ऊँचाई पर स्थित हेमकुंड साहिब भी है, जो दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की तपस्थली माना जाता है। बर्फ से घिरे इस पवित्र स्थान पर हर साल सिख श्रद्धालु और ट्रेकर्स बड़ी संख्या में आते हैं। इन सब कारणों से उत्तराखंड सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास की जगह है,

आज के तेज़ और व्यस्त जीवन में, जब हम हर समय भाग-दौड़ में रहते हैं, उत्तराखंड की यह पवित्र भूमि हमें प्रकृति के करीब आकर दिल और दिमाग को आराम देने का मौका देती है। यहाँ का साफ-सुथरा वातावरण और पवित्र जगहें हमें सच्ची खुशी, सादगी और शांति का अहसास कराती हैं। इसलिए उत्तराखंड न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि हमारे मन और आत्मा के लिए भी बहुत खास है। यही वजह है कि देवभूमि उत्तराखंड हर किसी के दिल में एक अलग जगह रखती है।


क्या हमें सच में अपनी बात कहने की आज़ादी है?

मोनिका

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार है, जिसका अर्थ यह है कि यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन क्या वाकई हम इसे हर जगह इस्तेमाल कर पाते हैं? हर जगह – चाहे वो घर हो, ऑफिस हो या फिर कोई भी सामाजिक स्थान – एक superiority complex यानी “मैं बड़ा हूँ इसलिए मैं सही हूँ” वाली सोच देखने को मिलती है।

जब हम छोटे होते हैं, तब हम अपने माता-पिता की बात मानते हैं क्योंकि उस समय हमारे पास सही-गलत समझने की समझ नहीं होती। फिर धीरे-धीरे जब हम किशोरावस्था में पहुँचते हैं और सोचने-समझने लगते हैं, तो दुनिया हमें ये जताती है कि हम अभी भी बहुत छोटे हैं, और दुनियादारी की बातें हमारी समझ से बाहर हैं। इसी उम्र में जब हमें अपनी बात कहने की ज़रूरत महसूस होती है, तब हमें चुप रहने की सलाह दी जाती है – “बड़े हो जाओ, फिर कहना।”

बड़े होकर जब हम ऑफिस में पहुँचते हैं, तो हालात अलग नहीं होते। यहाँ भी बिना कुछ कहे, बिना अपनी राय रखे, हमें अपने वरिष्ठ अधिकारियों की बात माननी पड़ती है – चाहे वो सही हों या गलत। यहाँ सवाल उठता है – क्या हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है?

हमें समझाया जाता है कि अनुच्छेद 19 के अंतर्गत हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, और उसी अनुच्छेद के उपखंड 2 के तहत इस स्वतंत्रता पर कुछ सीमाएँ भी लगाई गई हैं – जैसे कि हम नफ़रत, हिंसा या समाज में विद्वेष फैलाने वाली बातों को बढ़ावा नहीं दे सकते। ये बातें स्पष्ट हैं और इन पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

लेकिन मैं इस ब्लॉग में किसी बड़े राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे पर बात नहीं कर रही हूँ। मैं तो उन रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों पर बात कर रही हूँ जहाँ एक आम इंसान अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे इस्तेमाल करता है और कहाँ पर उसे रोक देता है – उस अनकहे दायरे की तलाश में हूँ जहाँ हर कोई कभी न कभी खुद को पाता है।

बहुत से लोग खुद को “साफगो” या “बोल्ड” कहते हैं – जो जो भी कहना है, वो मुंह पर कह देते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है जब हमें अपनी ये “साफगोई” छोड़नी पड़ती है, और सामने वाले की बात सुननी पड़ती है – चाहे वो गलत ही क्यों न हो। ऐसी स्थिति में एक कहावत याद आती है – “कभी-कभी गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।” उस पल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहीं पीछे छूट जाती है। आप जानते हैं कि आप सही हैं, फिर भी आप चुप रहना चुनते हैं – सिर्फ इसलिए क्योंकि उस समय बोलने से बात और बिगड़ सकती थी।

मैं जानती हूँ कि चुप रहना एक स्वैच्छिक निर्णय होता है, लेकिन फिर भी सवाल वहीं का वहीं है – क्या हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सच में हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, अगर हमें हर मोड़ पर उसे छोड़ना पड़े?

कई बार हम खुद से सवाल करते हैं – क्या मुझे बोल देना चाहिए था? मैं तो सही थी फिर भी क्यों चुप रही? अगर बोलती तो शायद उसे बुरा लग जाता… और यही पछतावा हमारे साथ रह जाता है।

इस ब्लॉग में मैं बस यही समझने की कोशिश कर रही हूँ कि ज़िंदगी के बहुत बुनियादी स्तर पर हम अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे जीते हैं। हम कौन-सी सीमाएँ खुद तय करते हैं, और किन सीमाओं को समाज हम पर थोप देता है। और अंत में सवाल यही रहता है – क्या हमने सच में अपनी बात कह दी? या फिर हम फिर से चुप रह गए…


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