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भारतीय पत्रकारिता को क्यों मिला विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वाँ स्थान

भारतीय पत्रकारिता को क्यों मिला विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वाँ स्थान

भारतीय पत्रकारिता को क्यों मिला विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वाँ स्थान

भारत, जहाँ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वहाँ आज पत्रकारिता अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए जूझ रही है। हर साल रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया जाता है। इस साल भी 2 मई को RSF की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें भारत को 151वाँ स्थान मिला है। पिछले साल भारत 159वें और 2023 में 161वें स्थान पर था। हालांकि मामूली सुधार हुआ है, लेकिन भारत अब भी “बहुत गंभीर” श्रेणी में शामिल है। 180 देशों में 151वाँ स्थान हमे यहाँ सोचने पर मजबूर करता हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ की भारत इस स्तिथि में आ गया हैं। आइये जानते हैं रिपोर्ट में क्या सामने आया।

क्या होता हैं प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक ( Press Freedom Index ) सालाना आने वाली एक रैंकिंग है जो विभिन्न देशों में पत्रकारों और समाचार संगठनों की स्वतंत्रता की डिग्री का आकलन करती है। यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा प्रकाशित किया जाता है, जो पेरिस स्थित एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है। रैंकिंग में देशों का मूल्यांकन पाँच मानकों में किया जाता हैं, जिनमे राजनीतिक, आर्थिक, विधायी (किसी देश में पत्रकारिता और मीडिया से जुड़ी कानूनी व्यवस्था, नियम और नीतियाँ कितनी स्वतंत्रता देती हैं), सामाजिक और सुरक्षा शामिल है। इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति को उजागर करना और उन चुनौतियों को सामने लाना है जिनका सामना पत्रकारिता को करना पड़ रहा है।

टेक कंपनिया बन रही वजह

रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स ने बताया कि प्रेस स्वतंत्रता का वैश्विक परिदृश्य इस बार पहली बार “कठिन स्थिति” में दर्ज किया गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है आर्थिक दबाव। रिपोर्ट के अनुसार, गूगल, अमेज़न, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी टेक कंपनियाँ विज्ञापन राजस्व का बड़ा हिस्सा ले रही हैं, जिससे पारंपरिक पत्रकारिता कमजोर पड़ रही है।

बड़े उद्योगपतियों का बढ़ता दायरा 

भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जहाँ मीडिया स्वामित्व राजनीतिक और कारोबारी घरानों के हाथों में सिमट गया है। रिपोर्ट ने विशेष रूप से मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के मीडिया क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया। RSF ने कहा कि 2014 के बाद से भारत का मीडिया “अनौपचारिक आपातकाल” जैसी स्थिति में है, जहाँ बड़े घराने और सरकार के बीच नजदीकी संबंधों ने मीडिया बहुलता को खतरे में डाल दिया है।

भारत अपने पड़ोसी देशों से पीछे

भारत अपने कई पड़ोसियों से पीछे है। नेपाल 90वें, मालदीव 104वें और श्रीलंका 139वें स्थान पर हैं। हालांकि भारत भूटान (152), पाकिस्तान (158), म्यांमार (169) और चीन (178) से बेहतर स्थिति में है। नॉर्वे, एस्तोनिया और नीदरलैंड्स शीर्ष तीन देशों में शामिल हैं।

160 देशों को करना पड़ रहा हैं संघर्ष

RSF ने चेतावनी दी है कि दुनिया के 160 देशों में मीडिया आर्थिक स्थिरता पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अमेरिका, अर्जेंटीना और ट्यूनीशिया में भी स्थानीय पत्रकारिता पर संकट गहराता जा रहा है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक बताया गया है, खासकर गाज़ा में, जहाँ की स्तिथि बेहद संवेदनशील हैं।

प्रेस रिपोर्ट साफ करती है कि पत्रकारिता केवल राजनीतिक दबाव ही नहीं, बल्कि आर्थिक संकट से भी गहरे खतरे में है।


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