मोनिका
इंटरएक्टिविटी यानी परस्पर क्रिया किसी भी सूचना प्रणाली में हमें जानकारी तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने में कुछ हद तक नियंत्रण देती है। सुनने में यह हमारे लिए फायदेमंद लगता है — हमें विकल्प मिलते हैं, जैसे किसी चौराहे पर खड़े होकर रास्ता चुनना। लेकिन डिजिटल दुनिया में ये रास्ते पहले से तय होते हैं, जिन्हें एक कंप्यूटर प्रोग्राम डिज़ाइन करता है। हम सिर्फ उन्हीं विकल्पों में से चुन सकते हैं जो वह सिस्टम हमें दिखाता है।
शॉर्ट फॉर्म कंटेंट ने इसी इंटरएक्टिविटी को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है — इतना कि अब यह एक गंभीर लत बन चुकी है।
30 सेकंड की एक छोटी सी वीडियो हमें घंटों तक स्क्रीन पर बांधे रख सकती है। हर वीडियो हमारे दिमाग को थोड़ा-थोड़ा dopamine देता है, एक ऐसा रसायन जो हमें खुशी का अहसास देता है। लेकिन यह खुशी कभी पूरी नहीं होती — जितना ज्यादा देखो, उतनी ही ज्यादा इच्छा होती है। यही कारण है कि हम बार-बार स्क्रॉल करते रहते हैं, बिना रुके।
शॉर्ट फॉर्म कंटेंट की शुरुआत 2013 में Vine नाम के ऐप से हुई थी। इस प्लेटफॉर्म पर सिर्फ 6 सेकंड की वीडियो बनाई जाती थी, और लोग काफी तेजी से मशहूर हुए — जैसे Logan Paul, King Bach वगैरह। लेकिन एक मजबूत बिज़नेस मॉडल की कमी की वजह से Vine बंद हो गया।
2018 में चीनी कंपनी ByteDance ने Musical.ly को लॉन्च किया, जो बाद में TikTok बना। TikTok ने एडिटिंग टूल्स, म्यूजिक फिल्टर्स और एक जबरदस्त एल्गोरिदम के ज़रिए लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया — और यही एल्गोरिदम हमारे dopamine सिस्टम पर सीधा असर डालने लगा।
2020 तक हर बड़ा प्लेटफॉर्म शॉर्ट फॉर्म कंटेंट में उतर चुका था — YouTube Shorts, Instagram Reels, Snapchat Spotlight। अब यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया था, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया बन गई थी जो धीरे-धीरे हमारी सोचने और समझने की क्षमता को कमजोर करने लगी।
आज हमारा फोकस करने का समय, सोचने की गहराई और फैसला लेने की ताकत सब घटती जा रही है। हम सोचते हैं कि “30 सेकंड की वीडियो से क्या फर्क पड़ेगा?” लेकिन यही वीडियो हमें रोज़ के कई घंटे छीन लेती है। ध्यान की हालत ये हो गई है कि हम अब 30 सेकंड की रील भी 2x स्पीड पर देखते हैं।
इन सबके पीछे जो असली वजह है, वो है एल्गोरिदम। ये हमें वही कंटेंट दिखाते हैं, जो हमारी सोच से मेल खाता है — जिससे हम सहमत हों या असहमत, दोनों ही मामलों में हमें उलझा कर रखते हैं। इससे हमारी सोच सीमित हो जाती है और हम एक तरह के ही विचारों में घिर जाते हैं।
इंटरएक्टिविटी हमें विकल्प देती तो है, लेकिन यह विकल्प भी उन्हीं रास्तों पर चलते हैं जो पहले से बनाए जा चुके होते हैं। हमें लगता है कि हम कंट्रोल में हैं, लेकिन असल में हमारे हाथ में बस कुछ सीमित विकल्प ही होते हैं। बाकी सब उस सॉफ्टवेयर के हाथ में होता है जिसने वो सिस्टम बनाया है।
सबसे बड़ी बात ये है कि इस लत के कोई साफ़ लक्षण नहीं दिखते — न कोई खून की जांच, न कोई मेडिकल रिपोर्ट। लेकिन इसका असर सीधा हमारे दिमाग पर होता है। सोचने की शक्ति कम होती जाती है, निर्णय लेने में परेशानी होने लगती है, और हम बस एक रील से दूसरी रील पर जाते रहते हैं — बिना सोचे समझे।
एक समय ऐसा आता है जब इंसान सिर्फ शरीर से जिंदा रहता है, लेकिन दिमाग से थक चुका होता है। हम चल-फिर तो रहे होते हैं, लेकिन सोच नहीं पा रहे होते।
अब सवाल यह है — क्या सच में कंट्रोल हमारे हाथ में है?