कभी-कभी हमारी सोच हमें खुश रखती है, लेकिन जब हम हकीकत से दूर हो जाएं, तो रिश्ते और तरक्की प्रभावित होती है
प्रियांश कुकरेजा
कभी-कभी हम ऐसी दुनिया में जीने लगते हैं जो हमारे मन ने बनाई होती है — एक ऐसी दुनिया जहां सब कुछ हमारे हिसाब से होता है, जहां हम खुद को सबसे सही और सबसे खास समझते हैं। मैंने भी ज़िंदगी में कई बार खुद को ऐसे ही सोचते हुए पाया है, जब मुझे लगने लगा कि मेरी ज़िंदगी में कोई परेशानी ही नहीं है जबकि असलियत कुछ और थी। जैसे बचपन में हम सोचते हैं कि हम हमेशा जीतेंगे, हमें कोई हरा नहीं सकता, या नौकरी या पढ़ाई में हम सबसे बेहतर हैं — पर धीरे-धीरे पता चलता है कि असलियत उससे अलग भी हो सकती है। ऐसा भ्रमित जीवन थोड़े समय के लिए अच्छा लग सकता है, क्योंकि इससे हमें खुशी, हिम्मत और हौसला मिलता है। जब हालात मुश्किल होते हैं, तो यही सोच हमें सहारा देती है। लेकिन अगर हम ज़्यादा देर तक इस सोच में रह जाएं, तो हम हकीकत को नजरअंदाज़ करने लगते हैं, गलत फैसले लेने लगते हैं और हमारे रिश्ते में भी असर पड़ता हैं। धीरे-धीरे हमारी तरक्की रुक जाती है, क्योंकि हम खुद को पहले से ही सही मानने लगते हैं और सीखने की इच्छा खो बैठते हैं। मेरे नजरिए से देखा जाए तो थोड़ा-बहुत भ्रम चल सकता है, क्योंकि ये हमें आगे बढ़ने की ताकत देता है, लेकिन हमें सच्चाई से भी जुड़ा रहना चाहिए। ज़रूरी है कि हम अपने सपनों और असलियत के बीच संतुलन बनाए रखें — सपने ज़रूरी हैं, लेकिन ज़मीन पर टिके रहना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।