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12वीं के बाद कौन से डिप्लोमा कोर्स बनाएंगे आपके करियर की राह सुगम

Category Archives: शिक्षा

12वीं के बाद कौन से डिप्लोमा कोर्स बनाएंगे आपके करियर की राह सुगम

अगर आपने 12वीं की पढाई पूरी कर ली है और अब समझ नहीं आ रहे कि आगे क्या करना है, तो परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। इस मोड़ पर आपके पास कई विकल्प मौजूद हैं। सबसे पहले ज़रूरी है कि आप खुद को समझें,आपकी रुचि किस क्षेत्र में है और आपकी ताक़तें कहाँ हैं। अगर आप किसी नए क्षेत्र में कदम रखना चाहते हैं या जल्दी स्किल हासिल करना चाहते हैं, तो डिप्लोमा कोर्सेज आपके लिए बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं।

डिप्लोमा क्यों है फायदेमंद

डिप्लोमा कोर्स आमतौर पर 6 महीने से 1 साल तक के होते हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह आपको किसी भी फील्ड की बेसिक नॉलेज और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देता है। अगर आप आगे ग्रेजुएशन या पोस्ट-ग्रेजुएशन करना चाहें, तो यह आपके लिए मजबूत नींव का काम करेगा। या फिर आप तुरंत नौकरी या प्रोफेशनल करियर शुरू करना चाहें, तो यह आपके लिए तैयार स्किल-पैकेज साबित होगा।

कौन कौन से डिप्लोमा कोर्स 12वीं के बाद आपकी स्किल्स बढ़ा सकते हैं 

  1. डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेंट
  2. डिप्लोमा इन इंटीरियर डिजाइनिंग
  3. डिप्लोमा इन आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस
  4. डिप्लोमा इन ग्राफ़िक डिजाईन
  5. डिप्लोमा इन वेब डिजाईन एंड डेवलपमेंट
  6. डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन
  7. डिप्लोमा इन फैशन डिजाईन
  8. डिप्लोमा इन डिजिटल मार्केटिंग

डिप्लोमा कोर्स करने के कई फायदे होते हैं , वो आप पर निर्भर करता कि आपका चुनाव आपको कहा ले जाता हैंइसके साथ ही,  आपके पास कई और डिप्लोमा कोर्सेज के विकल्प मौजूद हैं जिनमे योगा और नेचुरोपैथी, साइबर सिक्यूरिटी, इवेंट मैनेजमेंट, डेटा साइंस, फार्मेसी, हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट जैसे कई विकल्प हैं। 


भारत डार्क कॉमेडी को समझने के लिए तैयार है?

समीक्षा सिंह

हाल ही में “India’s Got Latent” के एक एपिसोड ने एक छोटी सी टिप्पणी की वजह से देश में विवाद की चिंगारी फैला दी। यूट्यूबर रणवीर अलाहबादिया और अपूर्वा ने एक प्रतियोगी से माज़ाकिया अंदाज़ में सवाल किया। इस सहज मज़ाक ने जैसे ही वायरल होना शुरू किया, सोशल मीडिया और मीडिया में बवाल खड़ा हो गया, FIR दर्ज हुई, महाराष्ट्र सरकार ने जांच बुलाई, और हर जगह से आपत्ति की आवाज़ें उठने लगीं
जिस पर असर हुआ ये कि मंच के दूसरे होस्ट समय रैना ने शो के सारे एपिसोड यूट्यूब से हटा दिए । रणवीर को इतना दबाव महसूस हुआ कि उन्होंने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक माफी माँगी, कहना पड़ा कि वाकई में ये मज़ाक सही नहीं था । इसके साथ ही उन्हें FIRs, पुलिस पूछताछ, यहाँ तक कि घटना की संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का ध्यान आकर्षित हो गया
कभी एक जोक , कभी एक मीम या कभी किसी फिल्म की एक लाइन ही इतना बड़ा मुद्दा बन जाती कि लोग गुस्से में आ जाते है । फर्क नहीं पड़ता की आपका मकसद हँसाना था या किसी बात की तरफ ध्यान दिलाना । बस किसी को बुरा लग जाता है और वही बात खत्म.
डार्क कॉमेडी का काम ही होता है उन बातों पर हँसना, जिनसे हम डरते हैं — मौत, सेक्स, अपंगता, राजनीति, मानसिक बीमारी, धर्म, समाज की सच्चाई। लेकिन भारत में इन बातों पर ना बात होती है, ना मज़ाक। यही सबसे बड़ी दिक्कत है।
क्योंकि ज़्यादातर भारतीयों के लिए ह्यूमर बस हँसी नहीं है, वो एक भावना है। यहाँ जोक को मनोरंजन की तरह नहीं, बल्कि अपने ऊपर लिया जाता है। अगर आप किसी चीज़ का मज़ाक उड़ाते हैं, तो लोग मान लेते हैं कि आप उसका अपमान कर रहे हैं। अगर आप किसी दुखद चीज़ पर हँसते हैं, तो लोग समझते हैं कि आप पत्थरदिल हैं। इस माहौल में डार्क कॉमेडी को आर्ट नहीं, हमला समझा जाता है।
हमारी संस्कृति और परवरिश हमें सिखाती है कि शराफत से रहो, बड़ों की इज़्ज़त करो, सिस्टम से सवाल मत करो। हम पहले तमीज़ सीखते हैं, सोच बाद में। इसी वजह से हम उन बातों से दूर भागते हैं जो हमें असहज लगती हैं। और जहाँ सच बोलना ही गलत लगने लगे, वहाँ मज़ाक करना तो और भी मुश्किल हो जाता है।
भारत में सेक्स, मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता, जाति और राजनीति जैसे मुद्दों पर लोग खुलकर बात नहीं करते। बच्चे सवाल न करें, बस सुनें और मानें — यही सिखाया जाता है। ऐसे में जब कोई कॉमेडियन या कलाकार इन बातों को छूता है, और वो भी मज़ाक में, तो लोग उसे समझने की बजाय गुस्सा करने लगते हैं।


देहरादून,को भारत की शिक्षा राजधानी क्यों माना जाता है?

प्रियांश कुकरेजा 

जब भी भारत में पढ़ाई के लिए सबसे अच्छी जगह की बात होती है, तो देहरादून का नाम सबसे पहले लिया जाता है। देहरादून को भारत की शिक्षा राजधानी कहा जाता है क्योंकि यहां बहुत पुराने, भरोसेमंद और शानदार स्कूल और कॉलेज हैं, जहां से पढ़कर कई बड़े और मशहूर लोग निकले हैं। देहरादून शहर पहाड़ियों के बीच बसा है, यहां का मौसम बोहत सुंदर होता है और देहरादून का हालात  पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा है। दून स्कूल, वेल्हम गर्ल्स और बॉयज़ स्कूल, मसूरी इंटरनेशनल स्कूल और ओक ग्रोव स्कूल जैसे नामी स्कूलों में राहुल गांधी, राजीव गांधी, करण थापर और विक्रम सेठ जैसे जाने माने लोग पढ़ चुके हैं। यहां फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI), इंडियन मिलिट्री अकैडमी (IMA), यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज़ (UPES), ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, (DIT) डीआईटी यूनिवर्सिटी और (IMS) यूनिसन जैसे संस्था भी हैं, जहां देश और विदेश से छात्र पढ़ने आते हैं। देहरादून एक साफ-सुथरा, शांत और सुरक्षित शहर है, जहां लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर, हॉस्टल और पढ़ाई के लिए हर ज़रूरी सुविधा मिलती है। मेरी नजर में देहरादून सिर्फ एक शहर नहीं है, बल्कि ऐसी जगह है जहां पढ़ाई को बहुत अहमियत दी जाती है। यहां का हालात छात्रों को मेहनत करने, नियम का पालन करने और खुद पर भरोसा रखने की सीख देता है। अगर कोई शांति और अच्छे हालात में पढ़ाई करके अपना भविष्य बनाना चाहता है, तो देहरादून उसके लिए एक बहुत अच्छा जगह है।


बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”

जानिए बच्चे कैसे सोचते हैं, क्या सीखते हैं, और पैरेंट्स के लिए कौन-सी बातें ज़रूरी हैं समझना

समीक्षा सिंह 

अक्सर मम्मी-पापा को लगता है कि “बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”, या “हम जो कहते हैं, उसका उस पर कोई असर नहीं होता”। लेकिन ये बात समझना ज़रूरी है कि बच्चों की नींव शुरू के सालों में ही बनती है। अगर शुरुआती सालों में सही परवरिश की जाए — मतलब प्यार, समझ, सही दिशा और एक अच्छा माहौल मिले — तो बच्चा धीरे-धीरे अपने आप समझदार बनता है और पेरेंट्स की बातों को अहमियत देता है। लेकिन अगर शुरू से ही सिर्फ डांट-फटकार, या इग्नोर करना हो, तो बच्चा या तो विद्रोही हो जाता है या बिलकुल ही चुप और डरपोक। खासतौर पर पापा का बच्चे के साथ रिश्ता बहुत मायने रखता है — अगर पिता प्यार से पेश आएं, तो बच्चा खुद को सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करता है।
बेटा और बेटी को अलग नज़र से देखना या उनके साथ अलग व्यवहार करना भी उनके दिमाग और सोच पर असर डालता है। दोनों को बराबरी का मौका और प्यार मिलना चाहिए।
इसलिए ये ज़रूरी है कि पैरेंट्स बच्चे को शुरुआत से ही सुने, उसकी बातें समझें, और उसको यह महसूस कराएं कि वो मायने रखता है। ऐसा करने से बच्चा पेरेंट्स की बात भी सुनता है और अपने मन की भी खुलकर कहता है।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पैरेंटिंग का तरीका बहुत बदल गया है। माता-पिता इतने बिज़ी हो गए हैं कि उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं होता। कई बार पेरेंट्स बच्चों पर ज़्यादा कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं (जिसे हम सख्त पैरेंटिंग कहते हैं), जबकि ज़रूरत इस बात की है कि बच्चों को प्यार, समझ और थोड़ी आज़ादी भी मिले — ताकि वो खुलकर सोच सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।
बच्चों की रोज़ की रूटीन भी उनके मानसिक विकास के लिए ज़रूरी है। सही समय पर सोना, खेलना, पढ़ाई करना, और थोड़ी क्रिएटिव एक्टिविटीज़ करना बहुत फायदेमंद होता है। आजकल बच्चे मोबाइल, रील्स और वीडियो गेम्स में ज़्यादा उलझे हुए हैं, जिससे उनका ध्यान बंटता है और वो चिड़चिड़े हो जाते हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम कम होना चाहिए।
खाने-पीने की आदतें भी बच्चों के मन और मूड को बहुत प्रभावित करती हैं। हर दिन चिप्स, कोल्ड ड्रिंक या जंक फूड खाने से बच्चे थके-थके और चिड़चिड़े महसूस करते हैं। अगर शुरुआत से ही घर में हेल्दी खाने की आदत डाल दी जाए — जैसे फल, हरी सब्ज़ियाँ, दूध वगैरह — तो बच्चे भी उसे अपनाते हैं।
और सबसे जरूरी बात — बच्चों से ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिससे उन्हें लगे कि वो अच्छे नहीं हैं। जैसे “तुम कुछ नहीं कर सकते”, “देखो फलाने का बच्चा कितना अच्छा है” वगैरह। इससे उनके मन में हीन भावना आ सकती है। हर बच्चे की सोच और समझ अलग होती है, बस हमें उन्हें समझने और उनका साथ देने की ज़रूरत है।


  प्रतिष्ठा, परंपरा, और प्रथा — क्या ये सब डिजिटल दुनिया में खो गए हैं?

प्रतिष्ठा, परंपरा और प्रथा… ये शब्द अब सिर्फ़ पुरानी फिल्मों के डायलॉग बनकर रह गए हैं।

समीक्षा सिंह

आज का युवा तेज़ी से बदलती दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है, लेकिन इसी दौड़ में कहीं न कहीं हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता पीछे छूटती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि हमारी यह सांस्कृतिक गिरावट किस वजह से हो रही है — क्या यह पश्चिमी प्रभाव है या फिर डिजिटल दुनिया की गिरफ्त?

डिजिटलीकरण ने हमारे जीवन को आसान ज़रूर बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह हमारे पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों को चुपचाप निगलता जा रहा है। पहले बच्चों को बाहर खेलने मे मज़ा आता था , अब वे मोबाइल और टैबलेट में व्यस्त हैं।

त्यौहार अब घर की रौनक का कारण नहीं, इंस्टाग्राम स्टोरी का हिस्सा बनकर रह गए हैं। तकनीक ने संवाद को सहज बनाया है, लेकिन संबंधों को कमज़ोर।

साथ ही, पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव भी हमारे युवाओं की सोच और जीवनशैली को बदल रहा है। अब अंग्रेज़ी भाषा में बात करना आज के दुनिया की पहचान बन चुका है और भारतीय परिधान, रीति-रिवाज या पारंपरिक सोच को बैकवर्ड’ समझा जाने लगा है।

असल में, न तो तकनीक गलत है, न ही विदेशी संस्कृति। दोष उस सोच का है जो हमें अपनी पहचान से कटने पर मजबूर कर रही है। युवाओं को यह सिखाना ज़रूरी है कि नयी सोच का मतलब अपनी जड़ों को भूलना नहीं होता। तकनीक का इस्तेमाल ज़रूर करें, लेकिन उस तकनीक से अपने संस्कारों को मिटने न दें।

आज ज़रूरत है कि हम अपने परिवार में बच्चों को भारतीय भाषाओं, लोक कथाओं और रीति-रिवाज़ों से परिचित कराएं। दुनिया से सीखना अच्छी बात है, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। हमारी संस्कृति की ताकत इसकी विविधता, गहराई और सहनशीलता में है। उसे मिटने न दें… उसे अपनाएं, उसे जिएं और अगली पीढ़ी को सिखाएं।


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