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खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी

खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी

खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी

प्रो. लल्लन प्रसाद
अक्टूबर, 2024 में महंगाई दर 6.21 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले 14 महीने का सबसे ऊंचा स्तर है, यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की 4-6% की सीमा, जो अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित मानी जाती है, के ऊपर है, जो चिंता का विषय है। खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

यह स्थिति ऐसे में है जब अधिकांश खाद्य पदार्थों की पैदावार कम नहीं हुई है। एक अनुमान के अनुसार वितरण की अव्यवस्था के कारण लगभग 20% गल्ला उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता जिनको उसकी आवश्यकता है। फर्जी राशन कार्ड और राशन कार्ड के दुरुपयोग और काले बाजार में गल्ला बेचने की घटनाएं आम हैं। व्यापारियों और अमीर किसानों द्वारा गल्ले का स्टॉक बढ़ा कर कीमतों को प्रभावित करने पर सरकारी नियंत्रण कमजोर है।

तेजी से बढ़ती आबादी के कारण खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ रही है। इसमें संदेह नहीं किंतु कीमतें उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। कुछ खाद्य पदाथरे की मांग-पूर्ति में बड़ा अंतर है, जिसके कारण उनकी कीमतों पर लगाम लगाना सरकार के लिए मुश्किल हो रहा है जैसे दालें, मौसमी सब्जियां, फल आदि। शाकाहारी लोगों की थालियां ही महंगी नहीं हुई हैं, वे लोग भी जो मांस, मछली, चिकन आदि का सेवन करते हैं, बढ़ती कीमतों से त्रस्त हैं।

खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त रोजमर्रा के उपयोग की चीजें-घी, तेल, साबुन, मसाले और किराने के अधिकांश सामान महंगे होते जा रहे हैं, जो लोगों की जेब पर भारी पड़ रहे हैं। कीमतों में वृद्धि के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यालय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति सितम्बर, 2024 में बढ़ कर 5.4 9% हो गई। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए मुद्रास्फीति दर क्रमश: 5.87% और 5.05% थी।

अक्टूबर के आंकड़े और भी निराशाजनक थे, महंगाई दर 6.21% पर पहुंच गई, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह 6.68% और शहरी क्षेत्रों के लिए 5.62त्न थी। शहर वालों की अपेक्षा गांव के लोगों पर महंगाई की मार अधिक देखी गई। रिजर्व बैंक ने महंगाई की इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए अल्पकालीन ऋण दर को बदलने से मना कर दिया और सरकार को सुनिश्चित करने को कहा कि मुद्रास्फीति मार्जिन को चार प्रतिशत पर लाने की कोशिश करे।

गेहूं की कीमत पिछले कुछ वर्षो से लगातार तेजी से ऊपर जा रही हैं। 2010 में गेहूं की औसत कीमत 1100 रुपये प्रति क्विंटल थी जो 2015-16 में 1450 पर आ गई, अक्टूबर, 2024 में यह 2700 के ऊपर पहुंच गई। किसानों को इसका लाभ मिला किंतु उतना नहीं जितना अपेक्षित था क्योंकि इनपुट कीमतें खाद, बीज, डीजल, भाड़ा, श्रम, सभी महंगे होते गए। सरकार ने 2024-25 के लिए गेहूं की न्यूनतम खरीद दर 2425 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की  जिसे किसान बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आम उपभोक्ता गेहूं की बढ़ती कीमतों से त्रस्त हैं। गरीबी में आटा गीला की कहावत चरितार्थ हो रही है। दालें शाकाहारी खाने में प्रोटीन की मुख्य स्रोत हैं, उनकी कीमतें पिछले कई वर्षो से लगातार बढ़ती जा रही हैं।

2020 में अरहर की दाल 80 रुपये प्रति किलो थी जो अब 180 प्रति किलो के लगभग है। अधिकांश दालों की खुदरा कीमत बाजार में 100 रुपये प्रति किलो के ऊपर है। दुनिया के दालों के कुल उत्पादन में भारत का हिस्सा 25% है, किंतु यह मांग से कम है, आयात की आवश्यकता पड़ती है। सब्जियों की कीमतें तो मौसम के अधीन रहती हैं, जिन पर जलवायु परिवर्तन का असर बराबर देखा जा रहा है।

पिछले कुछ महीनों से टमाटर, आलू, प्याज आदि की कीमतें आसमान छू रही हैं। आटा, दाल, सब्जी और मसालों की कीमतों में लगातार बढ़त घर के खाने की थाली दिनोंदिन महंगी करती जा रही है, औसतन 10% प्रति वर्ष से अधिक की वृद्धि हो रही है। ढाबों से लेकर रेस्टोरेंट, होटल सभी में खाना महंगा होता जा रहा है। मांस, मछली, चिकन, अंडे की कीमतों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। दूध उत्पादन में विगत वर्षो में अच्छी वृद्धि हुई है किंतु साथ ही कीमतें भी बढ़ी हैं। 2018-19 में भारत में दूध का उत्पादन 180 मिलियन टन के लगभग था जो 2023-24 में बढ़ कर 240 मिलियन के ऊपर पहुंच गया। इस बीच, दूध की सभी बड़ी कंपनियों ने कई बार कीमतों में वृद्धि की। देसी घी, खोवा और उनसे बनने वाली मिठाइयों की कीमतें भी बढ़ती जा रही हैं।

खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, सोना-चांदी, आभूषणों, प्रसाधन के सामानों आदि की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी आम आदमी को प्रभावित करता है। 2020 में 14.2 केजी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत सब्सिडी बिना 590 रुपये के लगभग थी, जो 2019 में 680 हो गई और वर्तमान में 800 के करीब है, विभिन्न राज्यों में कीमतों में कुछ अंतर है क्योंकि टैक्स की दरें एक सी नहीं हैं। पेट्रोल-डीजल कीमतों में भी इसी कारण राज्यों में अंतर है। इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करती हैं, जिनमें उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। इनकी कीमतों में बढ़त पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है, चीजों को महंगी कर देती है क्योंकि ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ जाता है, किराया भाड़ा महंगा हो जाता है। रेल, रोड, हवाई यातायात सभी महंगे हो जाते हैं। पांच वर्षो पूर्व दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 60 रुपये प्रति लीटर थी जो आज 95 के लगभग है। सोने की खपत विश्व में सबसे ज्यादा भारत में है। 2020 में 10 ग्राम 24 कैरट सोने का दाम 48600 रुपये था जो इस समय 74000 के करीब है।

महंगाई वैश्विक समस्या है। सिर्फ  भारत की नहीं है। महंगाई के मामले में भारत विश्व में दसवें स्थान पर है। कहावत है कि अर्थशास्त्र का इतिहास महंगाई का इतिहास है। इसमें कोई संदेह नहीं। हर व्यक्ति अपने जीवन में यह महसूस करता है। चाहे किसी भी देश का हो। पिछले कुछ वर्षो में भारत में महंगाई की अधिकतम दर 13.9%, 1991 में दर्ज की गई थी। आज भारत में महंगाई 6% से कुछ ऊपर है, जापान, चीन, सऊदी अरब में तीन प्रतिशत के लगभग है, जबकि रूस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली और यूके में 10त्न के ऊपर है, तुर्की और अज्रेटीना में 83% तक की महंगाई दर्ज की गई। दिवालिया होने के कगार पर पहुंचे देशों में महंगाई चरम सीमा पर पहुंच जाती है जैसे श्रीलंका में हुआ था और पाकिस्तान में हो रहा है। महंगाई पर नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका है उत्पादन में वृद्धि एवं प्रभावशाली विपणन-वितरण व्यवस्था।


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