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ट्रंप की नीतियां हिंदुओं पर सर्वाधिक भारी

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ट्रंप की नीतियां हिंदुओं पर सर्वाधिक भारी

हरिशंकर व्यास
दुनिया के अधिकतर सभ्य, विकसित और लोकतांत्रिक देशों में जिस एक कौम को सबसे ज्यादा सम्मान और प्रेम के साथ स्वीकार किया जा रहा था, जिसे कोई दूसरी कौम अपने लिए खतरे की तरह नहीं देखती थी वह हिंदू कौम थी। लेकिन पिछले 10 साल में क्या हुआ है? पूरी दुनिया में हिंदुओं के प्रति घृणा बढ़ी है। उनके खिलाफ हेट स्पीच बढ़े हैं और उनको निशान  बनाने की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में, जहां लगभग 45 लाख भारतीय आबादी बताई जाती है, और जिसमें अधिकांश हिंदू हैं वहां भी हिंदुओं का जीवन मुश्किल हुआ है। भारत में चल रही जातीय व धार्मिक बहस वहां तक जा पहुंची है।

पिछले साल कैलिफोर्निया स्टेट में जातिगत भेदभाव को रोकने का विधेयक लाया गया था। यह विशुद्ध रूप से भारत को निशाना बनाने वाला विधेयक था। इसकी शुरुआत अमेरिका की टेक्नोलॉजी कंपनी सिस्को और उसके दो इंजीनियरों के खिलाफ एक भारतीय नागरिक के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करने के मामले से हुई थी। इस मुकदमे के आधार पर जातिगत भेदभाव रोकने का बिल आया। इसके खिलाफ कैलिफोर्निया के हिंदू समूहों ने प्रदर्शन भी किया। इसके बावजूद राज्य विधानसभा से यह बिल पास हो गया। बाद में कोलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने इसे वीटो करके रोक दिया।

हालांकि इसके बावजूद पूरे अमेरिका में इसकी व्यापक कवरेज हुई, जिसमें हिंदू समाज निशाने पर था। चौतरफा बदनामी हुई। भले कारोबारी स्तर पर हिंदुओं की पूछ बढ़ी है लेकिन एक समाज और संस्कृति के तौर पर उनकी बदनामी हुई है। चाहे जाति का मामला हो, भारत में धर्म के आधार पर होने वाले विभाजन का मामला हो या खालिस्तान का मामला हो हर बार अमेरिका में हिंदू निशाने पर आए। कट्टरपंथी गोरों के साथ  साथ अपने ही देश के सिख और दूसरे कई देशों के मुस्लिम उनको दुश्मन की तरह देखने लगे। आने वाले दिनों में हिंदुओं की मुश्किल और बढऩे वाली है क्योंकि राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप जो नीतिगत फैसले करने वाले हैं उनमें से कई फैसलों का शिकार हिंदू होंगे। ट्रंप नागरिकता देने वाले कानून में बदलाव करेंगे, और केवल ग्रीन कार्डधारक के बच्चों को ही जन्म से तब नागरिकता मिलेगी।

इसका नुकसान 10 लाख भारतीयों को होने वाला है। अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए ट्रंप सख्त कानून ला रहे हैं तो पहले से रह रहे अवैध प्रवासियों को निकालने के लिए दो सौ साल से ज्यादा पुराने कानून का सहारा लेंगे। इस कानून के तहत सरकार 14 साल से ज्यादा उम्र के किसी भी व्यक्ति को अवैध प्रवासन के आधार पर देश से निकाल सकती है। इसका भी नुकसान भारतीय हिंदुओं को अधिक होगा। सोचें, अच्छे दिन की उम्मीद में 2014 में भारत के हिंदुओं ने जो सरकार बनाई थी उसका क्या हासिल है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात से सबसे बड़ी संख्या में हिंदू भाग रहे हैं। वे अमेरिका, कनाडा जा रहे हैं।

गुजरात और पंजाब से लोग जहाज भर कर लैटिन अमेरिकी देशों में जाते हैं और वहां से डंकी रूट से कनाडा और अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रयास में इस साल अभी तक एक सौ भारतीय नागरिक मरे हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। हर घंटे अमेरिका की सीमा पर 10 भारतीय अवैध रूप से अमेरिका में घुसने की कोशिश में पकड़े जा रहे है, इनमें पांच गुजराती होते हैं। इस साल अब तक 90 हजार से ज्यादा लोग पकड़े जा चुके हैं। अमेरिका में अवैध प्रवासियों को पकडऩे और निकालने का अभियान जोर पकड़ेगा, तो मेक्सिको के नागरिकों के बाद सबसे बड़ा शिकार हिंदू होंगे। अमेरिका हो या कनाडा दोनों जगह हिंदू पीटे जा रहे हैं, अपमानित हो रहे हैं और निकाले जा रहे हैं।

सोचें, 10 साल में कहां से कहां पहुंच गए! 10 साल पहले इस तरह से देश के अमीर, गरीब और मध्य वर्ग के लोग भागते हुए नहीं थे। उनमें देश छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता लेने की होड़ नहीं मची थी। लेकिन पिछले 10 साल में 12 लाख से ज्यादा लोग भारत की नागरिकता छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता ले चुके हैं। सवाल है कि 10 साल में देश में ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से लोग देश छोड़ कर भागना चाह रहे हैं? या तो वे बेहतर जीवन की तलाश में जा रहे हैं या अपनी और अपने बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा की चिंता से जा रहे है?
भारत में ट्रंप की जीत की खुशी मनाई जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप की नीतियां हिंदुओं पर सर्वाधिक भारी पडऩे वाली है। नागरिकता कानून के साथ साथ ट्रंप वीजा के नियम भी बदलने वाले हैं, जिससे भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए वहां वीजा लेना मुश्किल होगा।

एच वन वीजा की संख्या सीमित होगी तो एच फोर वीजा के कानून में बदलाव होगा। इस कानून के तहत अमेरिका में एच वन वीजाधारक के आश्रित को रहने और काम करने की आजादी मिलती है। इसे ट्रंप बदल देंगे। उनकी संरक्षणवादी नीतियों से हिंदुओं की मुश्किल बढ़ेगी तो भारतीय कंपनियों के लिए भी कामकाज मुश्किल होगा। यह भी उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अमेरिकी कांग्रेस की कमेटियां भारत में धार्मिक और जातीय भेदभाव पर हर साल देने वाली अपनी रिपोर्ट में भारत को लेकर चिंता जताना बंद कर देंगी।


अमेरिका के साथ भारत के संबंध अब भी अच्छे

एस. सुनील
ट्रंप का एक और भाषण जो भारत में बहुत प्रसारित हुआ उसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहा है वह बर्बर है। दुनिया का कोई नेता, जब बांग्लादेश में प्रताडि़त हो रहे हिंदओं के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ तो ट्रंप हुए। क्या यह कोई मामूली बात है? क्या इस पर भारत के लोगों को खुशी नहीं मनानी चाहिए?

डोनाल्ड ट्रंप लौट आए हैं। अमेरिका के इतिहास में 131 साल में वे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने कमबैक किया है। चार साल राष्ट्रपति रहने और फिर बेहद कड़वाहट भरे चुनाव में हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद वापसी करके ट्रंप ने दिखाया है कि वे एक योद्धा हैं। उनके ऊपर महाभियोग चला। कई मुकदमे हुए। मुकदमे में सजा हुई। चुनाव प्रचार के दौरान उनके ऊपर गोली चली। लेकिन वे मैदान में डटे रहे और चुनाव जीता। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नतीजों के 24 घंटे से ज्यादा समय बीत जाने के बाद जब बधाई दी तो उनके साहस और योद्धा वाली भावना की तारीफ की और कहा कि वे ट्रंप के साथ यूक्रेन युद्ध पर बात करने के लिए तैयार हैं। ध्यान रखने की जरुरत है कि ट्रंप ने चुनाव प्रचार में कहा था कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद एक घंटे में यूक्रेन का युद्ध रूकवा देंगे। ट्रंप की जीत के बाद पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलदोमीर जेलेंस्की दोनों उम्मीद कर रहे हैं कि वे युद्ध खत्म कराएंगे। अगर ऐसा होता है तो सोचिए यह दुनिया के लिए कितनी राहत की बात होगी!

दुनिया का हर देश ट्रंप के लौटने को अपने हिसाब से देख रहा है और उस पर प्रतिक्रिया दे रहा है। यूरोप के देशों खास कर फ्रांस और जर्मनी की प्रतिक्रिया सधी हुई लेकिन आशंका वाली थी। ट्रंप के आने के बाद इमैनुएल मैक्रों और ओलाफ शुल्ज दोनों यूरोपीय संघ की एकजुटता की बात कर रहे हैं। ब्रिटेन की प्रतिक्रिया सामान्य थी लेकिन सबको पता है कि लेबर प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कोई बड़े प्रशंसक नहीं हैं। चीन के राष्ट्रपति ने तो उनको जीत पर निजी तौर पर बधाई ही नहीं दी। कुल मिला कर दुनिया के दो देश ऐसे हैं, भारत और इजराइल, जिनकी प्रतिक्रिया वास्तविक अर्थों में ट्रंप की जीत पर खुशी और संतोष वाली थी। इसी खुशी और संतोष के अंदाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अपने दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ को बधाई दी। नतीजों के तुरंत बाद उन्होंने बधाई दी और उसके थोड़ी देर बाद दोनों की बातचीत भी हुई, जिसकी जानकारी खुद प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी।

आश्चर्य नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप की जीत पर आम भारतीय नागरिकों ने भी खुशी मनाई। भारत के लोगों ने उनके भाषणों के वीडियो शेयर किए। उनके दो भाषण सबसे ज्यादा शेयर किए गए। अपने एक भाषण में ट्रंप ने कहा कि, ‘मैं हिंदुओं का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। अगर मैं चुनाव जीता तो हिंदुओं का, भारतीयों का एक सच्चा दोस्त व्हाइट हाउस में होगा’। उन्होंने आगे कहा, ‘भारतीय हिंदुओं की कई पीढिय़ों ने हमारे देश अमेरिका को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है’। अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव के 256 साल के इतिहास में किसी राष्ट्रपति ने भारत और हिंदुओं के बारे में इतनी सकारात्मक, सार्थक और अच्छी बातें नहीं कही हैं। ट्रंप का एक और भाषण जो भारत में बहुत प्रसारित हुआ उसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहा है वह बर्बर है। दुनिया का कोई नेता, जब बांग्लादेश में प्रताडि़त हो रहे हिंदओं के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ तो ट्रंप हुए। क्या यह कोई मामूली बात है? क्या इस पर भारत के लोगों को खुशी नहीं मनानी चाहिए?

ट्रंप की जीत पर भारतीयों के खुशी मनाने के एक नहीं कई कारण हैं। एक कारण तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके निजी संबंध बहुत अच्छे हैं। वे हमेशा प्रधानमंत्री की तारीफ करते रहे हैं और कई मौकों पर कहा है कि भारत के हितों की रक्षा के लिए नरेंद्र मोदी कुछ भी कर सकते हैं। दोनों नेताओं के निजी संबंधों की केमिस्ट्री कैसी है यह टेक्सास के ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ और अहमदाबाद में हुए ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम में दिखा। एक कार्यक्रम में अमेरिका में मोदी, मोदी के नारे लगे थे तो दूसरे में भारत में ट्रंप, ट्रंप के नारे लगे थे। दुनिया के दो सबसे बड़े और जीवंत लोकतांत्रिक देशों के नेताओं के हित एकाकार हो गए दिखते हैं। ट्रंप की जीत और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके प्रगाढ़ संबंधों से इस बात की गारंटी है कि अब दुनिया में कहीं भी भारत के और हिंदुओं के हितों को नुकसान पहुंचाने वालों की खैर नहीं होगी।

दुनिया जानती है कि आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीडि़त देश भारत है। भारत का एक पड़ोसी देश दशकों से छद्म युद्ध छेड़े हुआ है। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा और मजबूत होती आर्थिकी से परेशान अनेक वैश्विक ताकतें भारत विरोधी गतिविधियों में जुट गई हैं। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और कनाडा तक की सरजमीं से भारत विरोधी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। भारत के टुकड़े टुकड़े करने की इच्छा रखने वालों को मदद दी जा रही है। अलगाववादियों को शरण मिल रही है। डोनाल्ड ट्रंप की आतंकवाद पर सख्त नीति से ऐसी गतिविधियों पर लगाम लगेगी। कनाडा और अमेरिका में बैठ कर भारत के खिलाफ अभियान चलाने वाली ताकतें कमजोर होंगी। अलगाववादियों के प्रत्यर्पण का रास्ता भी साफ होगा। अमेरिका से हाल के दिनों में जो तनाव बना था उसमें कमी आएगी।

अमेरिका के बाद कनाडा में सत्ता परिवर्तन की बारी है। डोनाल्ड ट्रंप के सबसे मुखर समर्थक और दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति इलॉन मस्क ने कहा है कि अगले चुनाव में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो हारेंगे। गौरतलब है कि मस्क ने ट्रंप के समर्थन में अपना सब कुछ दांव पर लगाया था। दुनिया के किसी कारोबारी ने कभी भी राजनीति में जो नहीं किया होगा वह मस्क ने किया। उन्होंने ट्रंप के प्रचार में करोड़ों डॉलर खर्च किए। मस्क ने ही अर्ली वोटिंग में हर दिन एक मतदाता को 10 लाख डॉलर देने का ऐलान करके ट्रंप का माहौल बनाया। तभी पांच नवंबर को हुए मतदान से पहले ही अर्ली वोटिंग में आठ करोड़ से ज्यादा वोट पड़े और ट्रंप के जीतने का आधार पहले ही बन गया था। अभिव्यक्ति की आजादी, निर्बाध व्यापार की स्वतंत्रता, लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता और आतंकवाद विरोध के विचार में मस्क ने ट्रंप का साथ दिया। इसी सोच में वे कनाडा में ट्रूडो सरकार की विदाई का बंदोबस्त भी करेंगे। सोचिए यह भारत के लिए कितनी सुखद बात होगी कि अपनी मूर्खता और स्वार्थ से भरी राजनीति में भारत और कनाडा के संबंधों को तहस नहस करने वाले जस्टिन ट्रूडो विदा होंगे।

डोनाल्ड ट्रंप ने हमेशा पाकिस्तान को एक मवाली मुल्क माना है। उन्होंने राष्ट्रपति रहते उसकी मदद रोक दी थी। जो बाइडेन के शासन में फिर से पाकिस्तान को मदद मिलनी शुरू हुई है। लेकिन अब इस बात की पूरी संभावना है कि डोनाल्ड ट्रंप के राज में पाकिस्तान फिर अलग थलग होगा। उसे अमेरिका से कोई मदद नहीं मिलेगी। इतना ही विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ जैसी संस्थाओं से भी पाकिस्तान को जो मदद मिल रही है वह बंद होगी। यह सामान्य सामरिक समझ की बात है कि अगर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद बंद होती है तो उसके यहां फल फूल रहे आतंकवाद के नेटवर्क की कमर टूटेगी, जिसका सबसे बड़ा फायदा भारत को होगा। इससे भारत के खिलाफ चल रहा छद्म युद्ध कमजोर पड़ेगा। इसी तरह राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप पहले कार्यकाल की तरह इजराइल और अरब के देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने का प्रयास करेंगे। अगर अमेरिका, इजराइल और अरब देशों के संबंध सामान्य होते हैं तो यह भारत के लिए सामरिक और आर्थिक दोनों नजरिए से अच्छा होगा।

रूस और चीन के साथ ट्रंप के संबंध उलझे हुए हैं। परंतु इस उलझाव के बावजूद वे जो भी नीति अख्तियार करेंगे उससे भारत को फायदा ही होगा। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने जिस तरह से ट्रंप के प्रति रुख दिखाया है उससे लगता है कि रूस और अमेरिका के संबंधों में भी सामान्यीकरण की शुरुआत होगी। बाइडेन प्रशासन में दोनों के संबंध तनाव वाले रहे। तभी भारत के लिए भी अपने पुराने और आजमाए हुए दोस्त रूस के साथ कारोबारी या सामरिक संबंधों में मुश्किलें आईं। पिछले ही दिनों खबर आई कि अमेरिका ने भारत की 19 कंपनियों को इसलिए काली सूची में डाल दिया क्योंकि वे रूस के साथ कारोबार कर रही थीं। ट्रंप के कार्यकाल में इस तरह की घटनाएं नहीं होंगी। इससे रूस के साथ भारत के आर्थिक और रक्षा संबंध मजबूत होंगे। इसी तरह ट्रंप कह चुके हैं कि वे चीनी उत्पादों पर दो सौ फीसदी आयात शुल्क लगाएंगे। चीन जो दुनिया की फैक्टरी बना हुआ है, उसका यह स्टैटस ट्रंप खत्म करना चाहेंगे और ऐसे में उनकी व दुनिया की पहली पसंद भारत होगा। अगर चीन से व्यापार में कमी आती है तो भारत के साथ व्यापार बढ़ सकता है। भारत में सेमी कंडक्टर सहित दूसरे उत्पादों के निर्माण की नई इकाइयों के लिए भी रास्ता बनेगा।

अगर सामरिक मामले की बात करें तो अमेरिका के साथ भारत के संबंध अब भी अच्छे हैं। हाल ही में भारत ने अमेरिका से 32 हजार करोड़ रुपए की हथियार खरीद का समझौता किया है। भारत 31 प्रिडेटर ड्रोन खरीद रहा है। परंतु ट्रंप के शासन में भारत को अमेरिका का विशेष लड़ाकू विमान एफ 35 भी मिल सकता है। राफेल के बाद अगर एफ 35 लड़ाकू विमान भारत को मिलता है तो भारत की वायु प्रतिरक्षा ताकत कितनी बढ़ जाएगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्वाड से लेकर फाइव आइज देशों के साथ भारत के संबंध बेहतर होंगे और इन देशों के साथ खुफिया सूचनाओं की साझेदारी भी बढ़ेगी। सो, हिंदू हितों की बात हो या भारत की आर्थिक, सामरिक या कूटनीतिक ताकत का मामला हो, ट्रंप हर मोर्चे पर भारत के सच्चे मित्र साबित होंगे।


दशकों से अमेरिका और वैश्वीकरण एक-दूसरे का पर्याय

बलबीर पुंज
दीपावली के अवसर पर ट्रंप ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताया था। साथ ही अपनी सरकार आने पर दोनों देशों के बीच की साझेदारी को और आगे बढ़ाने का वादा किया था। ट्रंप बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा की कड़ी निंदा भी कर चुके हैं।

अमेरिका में रिपब्लिकन प्रत्याक्षी डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर इतिहास रचा है। वे अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति होंगे। सामरिक-आर्थिक रूप से विश्व के सबसे ताकतवर देशों में से एक होने के कारण शेष दुनिया में इस चुनाव को लेकर स्वाभाविक चर्चा रही। भारत में भी इसे लेकर दो कारणों से उत्साह दिखा। पहला— ट्रंप की प्रतिद्वंदी और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला देवी हैरिस का भारत से तथाकथित जुड़ाव’ होना। यह अलग बात है कि हैरिस कमोबेश भारत-हिंदू विरोधी ही रही हैं। दूसरा— डोनाल्ड ट्रंप, जोकि पहले भी राष्ट्रपति (2016-20) रह चुके है— उनका खुलकर हिंदू हितों की बात करना और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे मजहबी हमलों का संज्ञान लेना। परंतु इस सच का एक अलग पहलू भी है।

यह ठीक है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में तुलनात्मक रूप से भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिका ने बहुत कम हस्तक्षेप किया है। ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2019 में धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण और पुलवामा आतंकवादी हमले के प्रतिकार स्वरूप पाकिस्तान के भीतर भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया था। इस बार भी ट्रंप ने भारत-अमेरिका के संबंधों को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है। दीपावली के अवसर पर ट्रंप ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताया था। साथ ही अपनी सरकार आने पर दोनों देशों के बीच की साझेदारी को और आगे बढ़ाने का वादा किया था। ट्रंप बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा की कड़ी निंदा भी कर चुके हैं। अब तक सामने आई कई रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि बांग्लादेश में असंख्य हिंदुओं को मजहब के नाम पर जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या ट्रंप की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जीत, वैश्वीकरण के ताबूत में अंतिम कील होगी? ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में जो निर्णय लिए थे, जिसमें सात इस्लामी देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का फैसला तक शामिल था— उसमें उनकी सबसे प्रमुख नीति अमेरिका फर्स्ट’ थी, जिसे ट्रंप ने इस बार भी दोहराया है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने शुल्कों के माध्यम से भारत-चीन सहित अन्य एशियाई देशों के साथ यूरोपीय सहयोगियों पर भी निशाना साधा था। मई 2019 में ट्रंप ने भारत को न केवल टैरिफ किंग’ बताया था, साथ ही अमेरिकी बाजार में भारत को मिले विशेष व्यापार सुविधा (अमेरिकी व्यापारिक वरीयता कार्यक्रम) को भी समाप्त कर दिया था। तब ट्रंप ने कहा था, भारत एक उच्च शुल्क वाला देश है।ज् जब हम भारत को मोटरसाइकिल भेजते हैं, तो उसपर 100 प्रतिशत शुल्क होता है। जब भारत हमारे पास मोटरसाइकिल भेजता है, तो हम उनसे कोई शुल्क नहीं लेते। वो हमसे 100 प्रतिशत वसूल रहे हैं। ठीक उसी उत्पाद के लिए, मैं उनसे 25 प्रतिशत वसूलना चाहता हूं। इस बार ट्रंप अमेरिका में सभी आयातों पर 10 प्रतिशत, तो चीन से आयात पर 60 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने की बात की है। वास्तव में, ट्रंप की यह नीति संरक्षणवाद से प्रेरित है, जो वैश्वीकरण के लिए खतरा है। यह घटनाक्रम इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि दशकों से अमेरिका और वैश्वीकरण एक-दूसरे का पर्याय रहा है।
यह ठीक है कि साम्राज्यवादी चीन के बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ दशकों तक अस्पष्ट स्थिति अपनाने के बाद अमेरिका ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वर्ष 2016 के बाद ट्रंप प्रशासन ने पहली बार चीन को एक खतरे’ और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी’ के रूप में पेश किया था। उनसे पहले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन को इस तरह नहीं देखा था। भारत, जो चीन के साथ लगभग 3,488 किमी लंबी विवादित सीमा साझा करता है— पिछले छह दशकों से चीन की आक्रामक नीति का सामना कर रहा है, जिसमें 1962 का युद्ध और हालिया वर्षों में डोकलाम-गलवान-तवांग सहित अन्य सैन्य टकराव शामिल है। इस परिप्रेक्ष्य में ट्रंप से उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने पहले कार्यकाल की नीतियों का ही विस्तार करेंगे, जिसमें चीन के साम्राज्यवादी रवैये के खिलाफ मुखर होकर क्वाड समूह (भारत सहित) को मूर्त रूप दिया गया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अप्रवासन एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से इसपर आक्रमक रहे है और उनका दूसरा कार्यकाल अपेक्षित रूप से अवैध अप्रवासन को रोकने के अपने वादे को और सख्ती से लागू करने का प्रयास करेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक वर्ष में बाइडन प्रशासन के नेतृत्व में अमेरिका ने लगभग 1100 अवैध भारतीय प्रवासियों को वापस भेजा है। भारत भी स्पष्ट कर चुका है कि वह अवैध प्रवास का समर्थन नहीं करता। परंतु यदि ट्रंप अप्रवासन के मामले में और सख्ती दिखाते है, तो यह निसंदेह भारत के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है।

ट्रंप और हैरिस ने अपने चुनावी भाषणों में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को लुभाने (दीपावली पर बधाई सहित) का भरसक प्रयास किया। जहां कमला अपनी भारतीय पहचान स्थापित करने हेतु प्रसिद्ध भारतीय व्यंजन इडली-सांभर’ का उपयोग करती दिखी, तो ट्रंप ने अपने प्रतिनिधि विवेक रामास्वामी और उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार जेडी वैंस की पत्नी उषा वैंस को चुनाव-प्रचार में शामिल किया। सच तो यह है कि ट्रंप-हैरिस की कवायद विशुद्ध रूप से राजनीतिक थी। भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मान्यताओं और मूल्यों से जुड़े होने के कारण अधिकांश हिंदू और सिख अमेरिका के सबसे संपन्न, समृद्ध और शिक्षित वर्ग में गिने जाते है। अमेरिका की कुल आबादी में अमेरिकी-भारतीयों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम हैं, लेकिन उनकी औसत वार्षिक घरेलू आय लगभग 1,53,000 डॉलर (लगभग 1.3 करोड़ रुपये) है, जो अमेरिका के राष्ट्रीय औसत के दोगुने से भी अधिक है। यही नहीं, अमेरिका में 34 फीसदी के राष्ट्रीय औसत की तुलना में 79 प्रतिशत भारतीय ग्रेजुएट हैं।

विश्व के समक्ष आतंकवाद एक बड़ी समस्या है और भारत सदियों से इसका शिकार है। मजहबी आतंकवाद विरोधी अभियान में अमेरिका का दोहरा मापदंड किसी से छिपा नहीं है। गुड तालिबान, बैड तालिबान’ इसका एक हालिया प्रमाण है। क्या ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से इस संबंध में सुधार की अपेक्षा की जा सकती है?


नेपाल में भारतीय हिंदुओं की स्थितियां बहुत खराब

हरिशंकर व्यास
नेपाल एक समय हिंदू राष्ट्र था। दोनों देशों के लोगों के बीच रोटी, बेटी का संबंध था। जनकपुर धाम नेपाल में है, जिसे भगवान राम की ससुराल मानते हैं। पुराने मिथिला राज की राजधानी जनकपुर मानी जाती है। भारत के हजारों हिंदुओं का कारोबार नेपाल में है। सीमावर्ती शहरों का लगभग सारा कारोबार भारत के हिंदुओं के हाथ में है। नेपाल की 80 फीसदी आबादी हिंदू है। लेकिन पहले नीतिगत कारणों से भारतीय लोग नेपाली नागरिकों के निशाने पर आए और उसके बाद भारत के हिंदुओं को भी निशाना बनाया जाने लगा। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि भारत में हिंदू, मुस्लिम का विभाजन वहां भी पहुंच गया है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पिछले साल अक्टूबर में एक बड़ा विवाद हुआ था, जिसकी वजह से कई दिन तक उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे नेपालगंज के बांके शहर में कर्फ्यू लगा। असल में किसी व्यक्ति ने इंटरनेट पर इस्लाम के प्रति कोई आपत्तिजनक कंटेंट डाल दिया था। इसके विरोध में मुसलमानों ने प्रदर्शन किया। अगले दिन हिंदुओं ने शांति जुलूस निकाला तो जुलूस के ऊपर हमला हो गया। जम कर पथराव हुआ और गोलियां चलीं। वीडियो वायरल हुआ, जिसमें हिंदू भगवा ध्वज लिए हुए भाग रहे हैं और उन पर पत्थरों की बौछार हो रही है।

नेपाल में भले 80 फीसदी आबादी हिंदुओं की है लेकिन वहां भारतीय हिंदुओं की स्थितियां बहुत खराब है। भारत के लोगों के साथ भेदभाव हो रहा है, जिससे उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है। भू राजनीतिक कारणों से नेपाल की एक के बाद एक सरकारों ने भारत के प्रति विद्वेष की नीति अपनाई है। सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है तो चीन की दखल की वजह से भी नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं भडक़ी हैं। भारत के हिंदू, जो वहां कारोबार किसी तरह से अपने को बचाए हुए हैं वे कारोबार बंद करके भारत लौट रहे हैं।

पिछले साल दो हजार रुपए का नोट बंद किए जाने के बाद अचानक ऐसी स्थितियां बनीं, जिनसे भारतीयों, हिंदुओं को बड़ा नुकसान हुआ। नेपाल ने एकतरफा तरीके से भारतीय मुद्रा पर पाबंदी लगा दी। एक सौ रुपए से ऊपर के मूल्य की सारी मुद्राएं प्रतिबंधित कर दी गईं। सौ रुपए से ऊपर की खरीदारी पर नजर रखी जा रही है और टैक्स लगाया जा रहा है। भारतीय मुद्रा रुपए का नेपाली रूपए के मुकाबले तेजी से अवमूल्यित हो रहा है। भारत के कानून के मुताबिक कोई भारतीय नागरिक 25 हजार रुपए नकद लेकर नेपाल जा सकता है लेकिन नेपाल अब इस नियम को भी नहीं मान रहा है। 25 हजार रुपए नकद रखने पर नेपाल में गिरफ्तार किया जा सकता है। नेपाल के इस रवैए से सीमा के आसपास के लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपए का प्रतिदिन का कारोबार प्रभावित हो रहा है। नवंबर 2016 की नोटबंदी के समय से ही ऐसी स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों के बीच इसे लेकर बातचीत भी हुई, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकल सका। दूसरी ओर नेपाल के इस रवैए से तस्करी में बढ़ोतरी है। ड्रग्स और हथियारों से लेकर सोना और रोजमर्रा की जरुरत की चीजों की तस्करी हो रही है।


भारतीय रेलवे- पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित      

ए.के.खंडेलवाल
भारतीय रेलवे में सुरक्षा पहले से कहीं अधिक बेहतर हो गई है, जिसका श्रेय पिछले दशक में की गई योजनाबद्ध पहलों को दिया जा सकता है। भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे व्यस्त यात्री परिवहन नेटवर्क है और रेल-यात्री परिवहन में इसका विश्व में पहला स्थान है। रेलवे हर साल 1 लाख करोड़ यात्री किलोमीटर (पीकेएम) से अधिक की दूरी तय करती है और 685 करोड़ से अधिक यात्रियों को सफर कराती है। यह आँकड़ा चीन से भी काफी बड़ा है, जहाँ अपने विशाल नेटवर्क और आबादी के बावजूद लगभग 300 करोड़ यात्री ही रेल का उपयोग करते हैं।

सुरक्षा में इस उल्लेखनीय सुधार का प्रमाण दुर्घटनाओं की घटती संख्या से मिलता है। जहाँ 2000-01 में 473 बड़ी रेल दुर्घटनाएँ हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर केवल 40 रह गई है। यह गिरावट ट्रैक सुधार, मानव रहित लेवल क्रॉसिंग को हटाने, पुलों की स्थिति की नियमित निगरानी और डिजिटल तकनीक के प्रयोग से संभव हुई है।

रेलवे के सुरक्षा प्रयासों को यात्री और पटरियों की लंबाई के आधार पर और भी सराहा जा सकता है। प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक लोग 70,000 किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर यात्रा करते हैं। त्यौहारों के समय यह संख्या 3 करोड़ तक पहुँच जाती है। इसका मतलब है कि भारत में प्रतिदिन लगभग 2त्न लोग सुरक्षित रूप से रेल से सफर करते हैं, जबकि चीन में यह आँकड़ा 0.58त्न और अमेरिका में मात्र 0.09% है।

भारतीय रेलवे के लिए यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यह 2023-24 में सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से स्पष्ट होता है, और चालू वित्त वर्ष में इससे भी अधिक खर्च करने की योजना है। इसका उद्देश्य रेलों, पुलों, पटरियों और संकेत प्रणालियों के रखरखाव में सुधार करना है। साथ ही, ओवर- और अंडर-ब्रिज के निर्माण के माध्यम से पटरियों के निकट की सडक़ सुरक्षा में भी सुधार किया जाएगा।

रेलवे सुरक्षा प्रदर्शन का एक प्रमुख सूचकांक ‘प्रति दस लाख ट्रेन किलोमीटर पर दुर्घटना की संख्या’ (एपीएमटीके) है, जो 2000-01 में 0.65 से घटकर 2023-24 में 0.03 पर आ गया है। यह सुधार अत्याधुनिक तरीकों और उन्नत तकनीकों के उपयोग के कारण संभव हुआ है, जैसे कि बेहतर पटरी रखरखाव, पटरी दोषों का पता लगाने में सुधार, रेल वेल्ड विफलताओं को रोकना और मानवीय त्रुटियों को कम करना। पटरी रखरखाव में सुधार के लिए आधुनिक मशीनों की तैनाती में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहाँ 2013-14 में केवल 700 मशीनें उपयोग में थीं, वहीं अब यह संख्या बढक़र 1,667 हो गई है। इसके अतिरिक्त, परिसंपत्ति की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पूरे नेटवर्क में रेल ग्राइंडिंग का भी उपयोग किया जा रहा है। जिससे पटरियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। इसके साथ ही,उपद्रवी गतिविधियों, पटरियों से छेड़छाड़ और पटरियों पर अवरोध वस्तुओं के कारण होने वाले जोखिमों से निपटने के लिए नियमित गश्त की जाती है।

यात्रियों की सुरक्षा से आगे बढक़र, रेलवे अब वन्यजीव और पशुधन की सुरक्षा पर भी ध्यान दे रही है। 2024-25 तक 6,433 किलोमीटर रेलवे ट्रैक के किनारे बाड़ लगाने का लक्ष्य है, जिसमें से अगस्त 2024 तक 1,396 किलोमीटर पर काम पूरा कर लिया गया है। इससे मवेशियों के साथ टकराव की घटनाओं में कमी आएगी।
इन परिणामों को बनाए रखने और सुधार करने के लिए भारतीय रेलवे ने तकनीकी कार्यक्रमों और लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अपनाया है। इस पहल के तहत लोकोपायलटों को कोहरे वाले क्षेत्रों में परिचालन में सहायता के लिए जीपीएस-आधारित फॉग-पास डिवाइसेस की संख्या में वृद्धि की गई है, जो 2014-15 में केवल 90 थी और अब बढक़र 21,742 हो गई है। लोकोपायलटों की सतर्कता बढ़ाने के लिए सभी लोकोमोटिव में सतर्कता नियंत्रण उपकरण (वीसीडी) लगाए गए हैं, जिनकी संख्या 2013-14 में 10,000 से बढक़र अब 16,021 हो चुकी है। सुरक्षा उपायों के अंतर्गत, बड़ी पटरी (ब्रॉड-गेज) मार्गों पर स्थित 6,637 स्टेशनों में से 6,575 स्टेशनों पर पैनल इंटरलॉकिंग, रूट रिले इंटरलॉकिंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग जैसी उन्नत संकेत प्रणालियाँ स्थापित की गई हैं।

लोकोपायलटों की दक्षता को बेहतर बनाने के लिए ड्राइविंग कौशल और प्रतिक्रिया समय में सुधार के उद्देश्य से सिम्युलेटर-आधारित प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जो क्षेत्रीय अनुभव का अनुकरण करता है। अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को अग्निशमन और अग्निशामक यंत्रों के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 2023-24 के दौरान 6 लाख से अधिक रेलवे कर्मचारियों ने प्रारंभिक, प्रगति-उन्मुख, पुन: अभ्यास और विशिष्ट जैसे विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त किए हैं।

यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोत्तम प्राथमिकता देते हुए, एलएचबी कोचों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जो बेहतर दुर्घटना-रोकथाम सुविधाओं से लैस हैं। इन कोचों का डिज़ाइन इस तरह किया गया है कि यह रेल के पटरी से उतरने और यात्रियों के घायल होने की संभावना को कम करता है। टक्कर के दौरान एक-दूसरे पर चढऩे से बचने के लिए इन्हें इस प्रकार से बनाया गया है कि ये 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर भी सुरक्षित तरीके से परिचालित हो सकें। इसकी उत्पादन संख्या में भी महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। 2023-24 में 4,977 एलएचबी कोच बनाए गए हैं, जो 2013-14 के 2,467 से दोगुने से भी अधिक हैं।

इन सभी प्रयासों से भारतीय रेलवे पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो गई है। यात्री सुरक्षा और रेलवे में सुधार की दिशा में निरंतर प्रयास इसे एक सुरक्षित और विश्वसनीय परिवहन विकल्प बनाते हैं।


किसानों के लिए अधिक लाभदायक होगी

अमित बैजनाथ गर्ग
हाल में केंद्र सरकार ने छह रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (रूस्क्क) में वृद्धि की है। यह वृद्धि न्यूनतम 130 रु पये और अधिकतम तीन सौ रुपये प्रति क्विंटल है। गेहूं के एमएसपी में 150 रु पये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई।

रेपसीड और सरसों के दाम में  प्रति क्विंटल तीन सौ रु पये बढ़ाया गया है। मसूर में 275 रुपये की वृद्धि की गई है। सरकारी दर पर रबी फसलों की खरीद-बिक्री का सत्र अप्रैल, 2025 से शुरू होगा।

खास बात यह है कि अधिकतर फसलों की एमएसपी अब लागत के लगभग डेढ़ गुना हो चुकी है, जिसकी मांग किसानों की ओर से लगातार हो रही थी। एमएसपी में 23 फसलों को शामिल किया जा चुका है। एमएसपी बढ़ाने को लेकर किसान आंदोलन करते रहे हैं। सवाल है कि क्या इस बार एमएसपी बढऩे से अगली बार आंदोलन नहीं होगा! एमएसपी किसानों से तय दर पर फसल खरीदने की गारंटी है। इसकी वजह से किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है।

एमएसपी की शुरु आत 1967 में हुई थी। एमएसपी तय करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की रिपोर्ट का इस्तेमाल किया जाता है। सीएसीपी उत्पादन लागत, बाजार के रुझान और मांग-आपूर्ति के हिसाब से एमएसपी तय करता है। एमएसपी की गणना के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन हिस्सों में बांटता है। इसमें फसल उत्पादन के लिए किसानों के नकद खर्च के साथ-साथ पारिवारिक श्रम का भी हिसाब लगाया जाता है। एमएसपी बढऩे से किसानों को लाभकारी मूल्य मिलता है, और फसल विविधीकरण में मदद मिलती है।

एमएसपी बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी। हालांकि किसान नेता सरकार के दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार के कई उपाय हो सकते हैं। इसमें एक है मूल्य स्थिरता कोष का गठन यानी जब फसल की बाजार कीमत एमएसपी से नीचे चली जाए तो सरकार इसकी भरपाई करे। किसानों को धान-गेहूं की फसल की बजाय ज्यादा कीमत देने वाली फसल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। फल, सब्जी, मवेशी, मछली पालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंंग की आड़ में किसानों को कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। ये कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट तोड़ देती हैं, और किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। कर्ज में डूब जाता है और आत्महत्या तक के लिए मजबूर हो जाता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एमएसपी व्यवस्था का दबदबा इस सेक्टर में इनोवेशन को हतोत्साहित करेगा। किसान सरकारी व्यवस्था पर निर्भर होकर रह जाएंगे और जोखिम लेने से डरेंगे। इसलिए किसानों को चावल-गेहूं की एमएसपी खरीद के चक्र से छुटकारा दिलाने की जरूरत है। एमएसपी की कानूनी गारंटी किसानों का अहित करेगी। उनका दावा है कि स्वामीनाथन आयोग के मुताबिक फसलों के दाम बढ़ेंगे तो खाद्य वस्तुओं के दाम 25 से 30 फीसद बढ़ जाएंगे और सरकार के लिए महंगाई नियंत्रण कठिन हो जाएगा। किसानों का कहना है कि उनकी फसल की पूरी खरीद की जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी। किसान जितनी फसल पैदा करेंगे, उसकी एमएसपी पर पूरी खरीद सरकार और उसकी एजेंसियों को करनी होगी। तभी किसानों का भला होगा और फसलों का विविधीकरण भी पूरा हो जाएगा।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा आत्मनिर्भरता देश के स्थायित्व और सम्मान का विषय है। एमएसपी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ खुले बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप तंत्र भी साबित हुआ है। आयात द्वारा खाद्य सुरक्षा कतर, बहरीन आदि जैसे कम आबादी और मजबूत औद्योगिक-आर्थिक आधार वाले देशों के लिए व्यवहार्य मॉडल हो सकता है।

उनका दावा है कि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका प्रतिस्पर्धी कीमतों पर दुनिया के बाकी देशों के लिए गेहूं का उत्पादन और निर्यात कर सकते हैं, लेकिन तब कृषि गतिविधियों से जुड़े भारतीयों सहित दुनिया की आधी आबादी बेरोजगार हो जाएगी। उनका कहना है कि कुछ मामलों में आयात की पक्षपातपूर्ण सरकारी नीति ने देश में तिलहन किसानों और खाद्य तेलों के उद्योगों को हानि पहुंचाई है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में ऐसी नीतियों से बचना चाहिए।

कृषि विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर कहते हैं कि एमएसपी की कानूनी गारंटी देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ बाजारी मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित करेगी जिससे किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाया जा सकेगा। एमएसपी की कानूनी गारंटी तिलहन-दालों सहित सभी कृषि वस्तुओं में आत्मनिर्भरता के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगी जो ज्यादा पानी और संसाधनों की खपत वाली अनाज फसलों के उत्पादन की तुलना में किसानों के लिए अधिक लाभदायक होगी।


ईवीएम पर संदेह की उंगली

तनवीर जाफरी
हरियाणा विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों ने पूरे देश के न केवल सभी प्रमुख एजेंसीज द्वारा किए गए एक्जिट पोल्स को बुरी तरह झुठला दिया था, बल्कि बड़े-बड़े राजनैतिक विश्लेषकों को भी हैरानी में डाल दिया था। मजे की बात तो यह कि केवल कांग्रेस पार्टी ही  हरियाणा में सत्ता में वापसी की उमीदों को लेकर गद्गद् नहीं थी, बल्कि स्वयं भाजपा को भी यह अहसास था कि किसान आंदोलन, अग्निवीर योजना, पहलवानों, महंगाई जैसे तमाम ज्वलंत मुद्दे उठने के बाद राज्य में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में इनके अलावा भाजपा को दस वर्ष की सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी आशंका के कारण भाजपा ने लगभग 35 प्रतिशत वर्तमान विधायकों के टिकट काट दिए थे। टिकट कटने वालों में कई मंत्री भी शामिल थे।

भाजपा की इस कवायद के बावजूद उसके 12 में से 9 मंत्री चुनाव में पराजित हो गए। हद तो यह है कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और डिप्टी स्पीकर रणबीर सिंह गंगवा की सीटों को भी बदल दिया गया था। इन सबके बावजूद नायब सिंह सैनी और अनिल विज जैसे नेताओं को भी मामूली मतों से ही जीत हासिल हुई। राज्य में 10 विधानसभा सीटें तो ऐसी रही जहां बीजेपी की जीत का अंतर 5 हजार से भी कम रहा। चूंकि हरियाणा में विधानसभा के नतीजे कांग्रेस के लिए  अप्रत्याशित थे, इससिलए कांग्रेस ने सीधा आरोप लगा दिया कि हरियाणा चुनाव में उसे हरवाया गया है। उसका आरोप था कि कई जगह ईवीएम को हैक किया गया। इस सबके बीच सवाल यह भी उठा कि अनेक ईवीएम इंडिकेटर में बैटरी की मात्रा 90 व 95त्न तक दिखा रही थी, जबकि मतदान के अंतिम समय में प्राय: ईवीएम की बैटरी चार्जिंग की मात्रा 60-70 फीसद के बीच या इससे भी कम ही हुआ करती है। कांग्रेस का आरोप था कि जहां-जहां ईवीएम में बैटरी कम थी वहां-वहां कांग्रेस को प्राय: बढ़त मिली। इस आरोप का सीधा अर्थ है कि ईवीएम को बदल दिया गया था। कांग्रेस द्वारा 20 सीटों पर इस तरह की गड़बड़ी होने की शिकायत दर्ज कराई।

सवाल यह है कि बीती 17 मार्च को भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन के समय पर मुंबई में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था, राजा की आत्मा ईवीएम में है’, उस समय राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि एमके स्टालिन और फारूक अब्दुल्ला जैसे अनेक बड़े नेताओं ने भी ईवीएम का मुद्दा उठाया था। और उस समय भी सभी का ईवीएम को लेकर एक ही स्वर था कि यदि उनकी सरकार आएगी तो वे ईवीएम को हटा देंगे। सवाल यह है कि हरियाणा के साथ-साथ जम्मू कश्मीर विधानसभा के भी चुनाव परिणाम आए तो जम्मू कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को मिले स्पष्ट बहुमत को स्वीकारा जा रहा है, लेकिन हरियाणा में भाजपा को मिली जीत प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को पच नहीं पा रही। और वे खिसियायी बिल्ली खंबा नोचे के अंदाज में अपनी हार की भड़ास ईवीएम के त्रुटिपूर्ण होने की बात कहकर निकाल रहे हैं। बेशक, लोकतंत्र को सबको अपनी बात या राय रखने का हक है, लेकिन आचरण में दोहरापन नहीं होना चाहिए। यदि कांग्रेस के नेता हरियाणा में ईवीएम की कार्यप्रणाली में त्रुटियां निकाल रहे हैं तो फिर जम्मू कश्मीर विधानसभा परिणामों से सहमत क्यों? इससे पता चलता है कि वे अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, और चुनाव प्रक्रिया का अभिन्न और अविश्सनीय अंग बन चुके जरिए पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

इस प्रकार का आचरण किसी भी सूरत में लोकतंत्र के हित में नहीं है। उसे ध्यान रहना चाहिए कि पिछले लोक सभा चुनावों में इंडिया गठबंधन ने बेहतर प्रदर्शन किया था। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी अच्छा प्रदर्शन रहा। उस समय भी किसी ने ईवीएम पर इतना दोष नहीं मढ़ा। कर्नाटक में जीते तो भी ईवीएम ठीक थी? और इन सबसे बड़ी बात यह कि जब विपक्षी दलों के नेता ईवीएम को ही गलत बताते हैं फिर आखिर अब तक पूरे विपक्ष ने मिल कर ईवीएम के विरुद्ध संयुक्त रूप से कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं किया? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे ईवीएम विरोधी आंदोलन का भी किसी राजनैतिक दल ने खुल कर साथ नहीं दिया था?

यदि वास्तव में ईवीएम निष्पक्ष चुनाव प्रभावित करने की क्षमता रखती है तो निश्चित रूप से यह लोकतंत्र के लिए घातक है। सभी राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए। यहां तक कि यदि सत्ता पक्ष के भी कई वरिष्ठ नेता, तकनीकी एक्सपर्ट और पूरा विपक्ष ईवीएम से चुनाव नहीं चाहता तो इसके द्वारा होने वाले चुनावों का बहिष्कार तक किया जाना चाहिए क्योंकि सच तो यह है कि ईवीएम पर शुरु आती संदेह की उंगली तो भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा ही उठाई गई थी। वैसे भी इसकी संदिग्धता को लेकर इसलिए भी सवाल उठते रहते हैं कि आखिर, दुनिया के अनेक आधुनिक देशों ने इसका प्रचलन अपने देशों में क्यों बंद कर दिया? और आधुनिक होने के बावजूद ऐसे देशों में आज भी चुनाव बैलट पेपर द्वारा ही क्यों कराए जाते हैं? ईवीएम की संदिग्धता को लेकर स्थिति स्पष्ट,पारदर्शी और सर्वस्वीकार्य होनी चाहिए। बेईमानी पर आधारित लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र का परिचायक नहीं हो सकता।


भारत में विकास का अध्याय आगे बढ़ता जाएगा

डॉ. जयंतीलाल भंडारी
हाल में लाओस के वियनतियाने में आयोजित आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में आसियान देशों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद जो बयान जारी किया है, उसके मुताबिक ये देश इस समूचे क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता से असहज और परेशान हैं तथा भारत के साथ आर्थिक, कारोबारी और सुरक्षा संबंधों का नया दौर आगे बढ़ाएंगे। इसी तरह हाल में र्वल्ड बैंक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट अक्टूबर, 2024 में कहा गया है कि वैिक चुनौतियों के बीच चीन के प्रोत्साहन उपायों के बावजूद चीन की अर्थव्यवस्था सुस्त होगी और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

वर्ष 2024 में चीन की विकास दर घट कर 4.0 फीसद होगी जबकि भारत की विकास दर 6.3 फीसद से अधिक रहेगी। वस्तुत: भारत के पास उपभोक्ताओं का उभरता हुआ विशाल बाजार, युवाओं में जबरदस्त ढंग से आगे बढऩे की ललक, उद्यमिता की भावना और सुधार का रवैया वैिक संघर्ष और चुनौतियों के बावजूद भारत के लिए नये अवसरों का आधार है। गौरतलब है कि विगत 4 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरे कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन और इस्रइल-ईरान युद्ध की अनिश्चितता के बीच भी दुनिया का भारत पर असाधारण आर्थिक विश्वास बना हुआ है। मोदी ने कहा कि दुनिया की नजरों में यह युग भारत का युग है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

दुनिया में भारत ग्लोबल फिनटेक एडॉप्शन के मामले में पहले क्रम पर है। इंटरनेट उपभोक्ताओं के मामले में दूसरे क्रम पर है। स्टार्टअप के मामले में तीसरे क्रम पर है, और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे क्रम पर है। इतना ही नहीं, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और मूडी’ज जैसी वैिक एजेंसियां भी वैिक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत को दुनिया की सबसे विसनीय और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेश के पसंदीदा देश के रूप में देख रही हैं। यद्यपि इस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के विस्तारित होने के कारण वैिक अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर बढ़ रहा है, लेकिन फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में वैिक विश्वास और तेज विकास के मद्देनजर देसी उद्यमियों के साथ वैिक उद्यमियों के लिए भी बढ़ते अवसरों का परिदृश्य उभर कर दिखाई दे रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि हाल में दुनिया की ख्याति प्राप्त वित्तीय सेवा फर्म मॉर्गन स्टेनली ने कहा है कि सितम्बर, 2024 के दौरान भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए खुद को निवेश की पसंदीदा जगह बना लिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने अपनी नई रिपोर्ट-2024 में कहा है कि भारत आर्थिक विकास, विदेशी निवेश और नई तकनीकों के उपयोग की ऊंची संभावनाओं वाला देश है। अमेरिका चेंबर ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में अमेरिका की कंपनियों की वैिक निवेश पसंदगी में भारत का दूसरा स्थान है। इस समय चीन अमेरिकी निवेशकों की प्राथमिकता खोता जा रहा है। इतना ही नहीं,  अमेरिका और चीन में बढ़ते तनाव के माहौल में इस समय चीन में कार्यरत 12 लाख करोड़ रुपये निवेश वाली 50 अमेरिकी कंपनियां अपना कारोबार चीन से समेटने की तैयारी में हैं। इन कंपनियों में से 15 कंपनियां भारत में निवेश की तैयारी कर रही हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत 23 सितम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान न्यूयॉर्क में एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों पर काम करने वाली 15 प्रमुख अमेरिकी कंपनियों के सीईओ को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बहुआयामी क्षेत्रों में दुनिया के लिए अपार आर्थिक मौके हैं। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि अब भारत को आर्थिक दुनिया के उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख को दर्शाता है। वैिक राजनीतिक और आर्थिक मंचों पर भारत को विशेष अहमियत भारत की आर्थिक स्थिति से भी मिल रही है। अमेरिका और रूस, दोनों महाशक्तियों के साथ भारत की मित्रता के नये अध्याय दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा एवं भारतीय बाजार में मौके बढ़ा रहे हैं।

निस्संदेह भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, कृषि विकास और बढ़ती ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश-दुनिया के कारोबारियों और निवेशकों के लिए मौकों का नया द्वार खोल रहे हैं। देश में खाद्यान्न उत्पादन ऊंचाई बना रहा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक अब देश की खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ वैिक खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने के लिए भारत रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है। अब भारत दुनिया के खाद्य कटोरे के रूप में रेखांकित हो रहा है। भारत दुनिया के 150 से अधिक देशों को खाद्य पदाथरे के निर्यातक देश के रूप में दुनिया में रेखांकित हो रहा है। भारत दुनिया का आठवां बड़ा कृषि निर्यातक देश बन गया है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय शेयर बाजार ऊंचाई पर है, और दुनिया के लिए भारतीय शेयर बाजार में मौके बढ़ रहे हैं। वर्ष 2024 की शुरुआत से भारत में आईपीओ का बाजार गुलजार है। भारत में म्युचुअल फंड (एमएफ) में निवेश छलांगें लगा कर बढ़ रहे हैं। अगस्त, 2024 तक डीमैट खातों की संख्या 17.10 करोड़ के पार हो गई है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि विदेश व्यापार में भारत की नई संभावनाएं दुनिया के लिए नये मौके के रूप में हैं। ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत दुनिया के सक्षम और भरोसेमंद देश के रूप में वैिक आपूर्ति श्रृंखला में नई भूमिका निभा रहा है।

हम उम्मीद करें कि इस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के विस्तारित होने के कारण वैिक अर्थव्यवस्था में गिरावट के दौर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी बहुआयामी विशेषताओं के कारण मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी। साथ ही, आर्थिक विकास के रणनीतिक प्रयासों से भारत में विकास का अध्याय आगे बढ़ता जाएगा। साथ ही, रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे। इससे देश 2027 में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 में विकसित भारत बनने की डगर पर आगे बढ़ेगा।


राजनीतिक मकसद साधने की मंशा न हो

अजीत द्विवेदी
केंद्र सरकार ने जनगणना की अधिसूचना जारी नहीं की है, लेकिन एक, जनवरी 2025 से  प्रशासनिक सीमाएं सील हो जाएंगी और उससे पहले भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण का कार्यकाल अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया गया है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अगले साल जनगणना होगी। उसके अगले साल यानी 2026 में लोकसभा सीटों का परिसीमन होगा और फिर इसी आधार पर 2029 में साथ होने वाले चुनाव में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। इस बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने एक सामाजिक कार्यक्रम में, जहां 16 नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद दिया जाना था, वहां कहा कि ‘जब हम ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां संसद में सीटों की संख्या कम होने वाली है तो हमें छोटा परिवार क्यों रखना चाहिए’?

इसके आगे उन्होंने नवविवाहित जोड़ों से ज्यादा बच्चे पैदा करने और उन्हें सुंदर तमिल नाम देने का आग्रह किया। हालांकि उन्होंने संसद में सीटों की संख्या कम होने के बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा लेकिन उनका इशारा परिसीमन के बाद की स्थितियों की ओर था। उनसे पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी लोगों से ज्यादा बच्चे पैदा करने का आग्रह किया था। हालांकि उनका घोषित सरोकार यह था कि दक्षिण के राज्यों में आबादी बूढ़ी हो रही है और कामकाजी युवाओं की संख्या कम हो रही है। परंतु कहीं न कहीं वे भी इस बात से चिंतित हैं कि अगर आबादी के आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ तो दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक हैसियत घटेगी।

तभी यह बड़ा सवाल है कि लोकसभा सीटों के परिसीमन का आधार क्या होगा? क्या सीधे तौर पर जनसंख्या के हिसाब से सीटों की संख्या में बढ़ोतरी कर दी जाएगी? अगर ऐसा हुआ तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे बड़ी आबादी वाले राज्यों को फायदा होगा और दक्षिण भारत के राज्य घाटे में रहेंगे। तभी चंद्रबाबू नायडू और एमके स्टालिन की चिंता सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखती है। यह चिंता क्षेत्रीय वर्चस्व और फिर अस्मिता की राजनीति में भी बदल सकती है, जिससे एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

इसलिए सरकार को परिसीमन के फॉर्मूले के बारे में तर्कसंगत तरीके से विचार करना होगा और उस पर सभी दलों व राज्यों की सहमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी। ध्यान रहे लोकसभा सीटों का परिसीमन जम्मू कश्मीर की तरह नहीं होगा, जहां मनमाने तरीके से भौगोलिक सीमाओं का ध्यान रखे बगैर इस तरह से विधानसभा सीटों का सीमांकन हुआ कि जम्मू क्षेत्र में छह सीट बढ़ गई और कश्मीर घाटी में सिर्फ एक सीट बढ़ी।

आजादी के बाद से मोटे तौर पर आबादी के आधार पर ही लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तय होती रही है। तभी उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39 हैं। लेकिन आजादी के बाद राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को अलग अलग तरीके से लागू किया। आर्थिक रूप से विकसित राज्यों ने बेहतर ढंग से जनसंख्या नियंत्रण का किया तो उनके यहां जनसंख्या वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे आ गई। दक्षिण के राज्यों में तो जनसंख्या बढऩे की दर रिप्लसमेंट रेट से भी कम है। रिप्लेसमेंट रेट 2.1 है। इसका मतलब होता है कि अगर दो लोग मिल कर 2.1 बच्चे पैदा करते हैं तो जनसंख्या नहीं बढ़ेगी वह स्थिर हो जाएगी। दक्षिण के राज्यों में जनसंख्या बढऩे की दर 1.6 फीसदी है, जो रिप्लेसमेंट रेट से काफी कम है, जबकि उत्तर के राज्यों खास कर बिहार और उत्तर प्रदेश में वृद्धि दर रिप्लेसमेंट रेट से ज्यादा है।

ऐतिहासिक रूप से यह स्थिति रही है तभी दक्षिण के राज्यों में आबादी नियंत्रित हो गई और उत्तर भारत के राज्यों में बढ़ती चली गई। हालांकि अब वहां भी रफ्तार धीमी हो रही है लेकिन उन राज्यों की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। अगर इस आधार पर उनकी लोकसभा सीटें बढ़ती हैं तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने अपने यहां आबादी का बढऩा रोका। उन्होंने अच्छा काम किया इसके लिए उनको सजा नहीं दी जानी चाहिए।

अगर सरकार पारंपरिक रूप से आबादी को आधार बनाती है और औसतन 20 लाख की आबादी पर एक सीट का फॉर्मूला तय होता है तो दक्षिण के ज्यादातर राज्यों में सीटों में कोई बदलाव नहीं होगा, जबकि उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या 80 से बढ़ कर 120 हो जाएगी। बिहार में 40 से बढ़ कर 70 हो जाएगी। सोचें, इससे इन राज्यों की राजनीतिक हैसियत कितनी बढ़ जाएगी? अगर ऐसा होता है तो ओवरऑल लोकसभा की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। वैसे नए संसद भवन में इसकी तैयारी पहले हो चुकी है। नए संसद भवन में निचले सदन यानी लोकसभा में 880 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है। अगर संख्या इतनी नहीं भी बढ़ाएं तब भी आठ सौ तक संख्या जा सकती है। इस फॉर्मूले से यानी आबादी के अनुपात में सीटों की संख्या बढ़ाने का फैसला होता है तो दक्षिण के सभी राज्यों को मिला कर करीब 20 सीट का फायदा होगा। लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटें बढ़ जाएंगी।

अगर सरकार लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ाने का फैसला करती है तब परिसीमन में जनसंख्या का पैमाना 30 लाख की आबादी पर एक सीट का रखना होगा। अगर ऐसा किया जाता है तब उत्तर प्रदेश में 80 और बिहार में 42 सीटें होंगी। लेकिन ऐसे में कम से कम आठ राज्य ऐसे होंगे, जहां लोकसभा की एक भी सीट नहीं बनेगी क्योंकि उन राज्यों की आबादी 30 लाख से कम है। अगर किसी भी राज्य में जीरो सीट नहीं रखनी है यानी चाहे जितनी आबादी हो उसे कम से कम एक लोकसभा सीट देनी है तो सबसे छोटे राज्य की आबादी के हिसाब से एक सीट का फॉर्मूला बनाना होगा। ऐसे में ओवरऑल सीटों की संख्या में छह सीटों की बढ़ोतरी होगी यानी कुल सीट संख्या 549 हो जाएगी। लेकिन उत्तर प्रदेश में तब भी 12 सीटें बढ़ जाएंगी। बिहार में भी 10 सीटों का इजाफा होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि में भी ठीक ठाक बढ़ोतरी होगी। इसके बरक्स पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि में सीटों की संख्या घटेगी।

इनमें से कोई भी फॉर्मूला बहुत युक्तिसंगत नहीं लगता है। सीटों की मौजूदा संख्या कायम रखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आबादी बहुत बढ़ चुकी है और एक सांसद के लिए इतनी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करना संभव नहीं है। लेकिन सीटों की संख्या सीधे आबादी के आधार पर बढ़ा देना भी युक्तिसंगत नहीं है। सो, जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र और जीडीपी तीनों के औसत को आधार बनाना चाहिए। यानी किसी राज्य की जनसंख्या बहुत ज्यादा है और उसका कुछ फायदा उसे मिलता है तो किसी और राज्य को उसका भौगोलिक क्षेत्र ज्यादा बड़ा होने का फायदा मिलना चाहिए तो किसी राज्य को जीडीपी में ज्यादा योगदान करने का फायदा मिलना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं हो। किसी भी राज्य की राजनीतिक और विधायी हैसियत अनुपात से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। सभी पार्टियों को साथ लेकर उनकी सहमति से परिसीमन का फॉर्मूला तय करना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद साधने की मंशा न हो।


पटाखों के चलते हिंसा और हत्या

चेतन उपाध्याय
इस दीपावली पर पटाखे के कारण देश में जो कुछ हुआ हैं, उनमें से ज्यादातर में हिन्दू बनाम हिन्दू का मामला है। और निष्कर्ष है कि पटाखों के चलते हिंसा और हत्या के ज्यादातर मामलों में, लड़ाई हिन्दू बनाम हिन्दू की है। कोई 8वीं पास विद्यार्थी भी इंटरनेट पर ये सारे सबूत देख सकता है। यानी कि पटाखों ने हिन्दुओं को आपस में ही बँटने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि यह भी सच है कि धर्म विरोधी का तमगा मिल जाने के डर से अधिकाँश लोग इस सबको चुपचाप सह लेते हैं।

दूसरी बात यह है कि पटाखे के विरोध में गाँव-गाँव और मोहल्ले-मोहल्ले में हो रहे भयंकर विरोध और हिंसा के तमाम मामले थाने और मीडिया तक पहुँचते ही नहीं हैं। धर्म, परंपरा और उत्सव की आड़ में गुंडागर्दी और अराजकता है। और यह देशहित में नहीं है।

कड़वा सच है कि दीपावली का पटाखा हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने का माध्यम बन गया है। उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में पुलिस और प्रशासन की जानकारी में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जहाँ पर पर्व की आड़ में पटाखे का इस्तेमाल अपने दुश्मनों को सताने और हत्या करने में किया जा रहा है। पटाखे के कारण खुशियों का त्योहार नफरत, हिंसा और मातम का त्योहार बन गया है।

विदेशों में हरियाली का प्रतिशत बहुत ज्यादा होता है और यह हरियाली, आतिशबाजी के शोर और धुंए को सोख लेती है। साथ ही विदेशों में पटाखा फोडऩे के लिए एक बड़ा मैदान होता है जहाँ फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी तैयार रहती है। भारत देश में भी बड़े लोगों के घर के पास आप पटाखा नहीं फोड़ सकते, मगर आम आदमी के साथ,आये दिन कभी  धर्म की आड़ में डी.जे. तो कभी पटाखे की ऐसी गुंडागर्दी होती ही रहती है और ‘धार्मिक’ मामला बताकर पुलिस पल्ला झाड़ लेती है।

फिर पुलिस के मूकदर्शक बनने के बाद अपनी और अपने परिवार के सदस्य की जान बचाने के लिए जो भी आदमी, जानलेवा पटाखे का विरोध करता है, उसको धर्म विरोधी कह कर मार दिया जाता है मानो कि पटाखे से लोहवान, गुग्गुलु और चंदन की दिव्य महक आती हो। यह गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए।

इसलिए सरकार को चाहिए कि वह आम जनता के साथ ही कोर्ट को बताए कि जिस आतिशबाजी के कारण हर साल अरबों रुपये की संपत्ति आग में स्वाहा हो जाती है, जिस आतिशबाजी के चलते बेजुबान जानवरों की जान खतरे में पड़ जाती है, जिस आतिशबाजी के कारण देश भर के करोड़ों अस्थमा मरीज तड़पड़ाते हैं, जिस पटाखे के कारण लोग अपनी आँख की रोशनी और सुनने की क्षमता खो दे रहे हैं, जिस पटाखे के शोर और धुएं को रोकने की लड़ाई में लोग आपस में मर-कट कर पुलिस और कोर्ट का बोझ बढ़ा रहे हों, वह पटाखा किसी भी धर्म और परम्परा का हिस्सा नहीं हो सकता।

पटाखे पूरी तरह से बंद हो। ना तो शादी-विवाह में, ना दीपावली-होली पर, ना ईद-बारावफात में और ना ही क्रिसमस-नए साल पर। 1947 से पहले और फिर 1947 से 2024 तक क्या हुआ, इसकी चर्चा में समय नहीं गँवा कर, व्यापक जनहित में अभी से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सख्त जरुरत है। बारूद की गंध फैलाने का कार्य बंद होना चाहिए और बिना किसी धार्मिक भेदभाव के, साल के 365 दिन, पटाखों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में पटाखों का कोई स्थान नहीं है और बारूदी दुर्गंध फैलाने वाले पटाखों के उत्पादन और बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाना ही एकमात्र विकल्प है। ना रहेगा बाँस और ना बजेगी बाँसुरी।


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