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आजादी के दशकों बाद भी देश की सड़कों के हाल बेहाल

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आजादी के दशकों बाद भी देश की सड़कों के हाल बेहाल

रजनीश कपूर
जब भी कभी हम विदेशों की सडक़ें और राजमार्गों पर फर्राटे से दौड़तीं गाडिय़ों को देखते हैं तो मन में यही सवाल उठता है कि हमारे देश में ऐसे दृश्य कब दिखेंगे। आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारे देश की सडक़ों के हाल बेहाल है। राजनैतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं पर इन बुनियादी सुविधाओं पर किसी भी दल का ध्यान नहीं जाता, लेकिन बीते कुछ वर्षो में सडक़ों व राजमार्गों के बनने में तेजी अवश्य आई है। वो अलग बात है कि चुनावी घोषणाओं के दबाव में और जल्दबाजी में इन सडक़ों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।

राजनैतिक दल कोई भी हो राजमार्ग बनाने की जल्दी में किसी ने भी राजमार्गों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए, जबकि विदेशों में राजमार्गों पर होने वाले हादसों के प्रति वहां की सरकारी और नागरिक काफी संवेदनशील हैं। दो वर्ष पहले जब मशहूर उद्योगपति साइरस मिस्त्री की एक सडक़ हादसे में मृत्यु हुई थी तो सडक़ नियमों को लेकर काफी चर्चा हुई। इस हादसे के पीछे कई कारण बताए गए, जैसे की तेज गति, हादसे की जगह सडक़ का कम चौड़ा होना, आदि। परंतु बुनियादी सवाल यह है कि किसी अमीर व्यक्ति द्वारा चलाई जाने वाली महंगी लग्जरी कार हो या किसी मामूली ट्रक या बस ड्राइवर द्वारा चलाए जाने वाला साधारण वाहन, क्या वाहन चलाने वाले और परिवहन नियम लागू करने वाले अपने-अपने काम के प्रति जिम्मेदार हैं?

 ये कहना गलत नहीं होगा कि हमारे देश में सडक़ सुरक्षा और परिवहन के नियम और कानून दोनों ही काफी लचर हैं। यही कारण है कि भारत में सडक़ दुर्घटनाएं और देशों की तुलना में काफी ज्यादा होती हैं? यदि कानून की बात करें तो हमारे देश के कानून इतने लचर हैं कि सडक़ दुर्घटना में यदि किसी की मृत्यु भी हो जाती है तो वाहन चालक को बड़ी आसानी से जमानत भी मिल जाती है। ज्यादातर ट्रक व बस ड्राइवरों को भी इस बात का पता है कि उन्हें कड़ी सजा नहीं मिलेगी। सडक़ नियम और कानून को सख्ती से लागू करने की जिम्मेदारी केवल ट्रैफिक पुलिस की नहीं होनी चाहिए। इनको लागू करने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए। होता यह है कि देश भर में सडक़ व यातायात नियमों के लिए केवल साल में एक ही बार ऐसे अभियान चलाए जाते हैं। यदि ऐसे जागरूकता अभियान महीने में एक बार चलाए जाएं तो ड्राइवरों और आम जनता के बीच जानकारी सही से पहुंचेगी। वे जागरूक होंगे और नियम तोडऩे से पहले कई बार सोचेंगे। इसके साथ ही कानून में भी कड़ी सजा के प्रावधान होने चाहिए जिससे कि सभी के बीच एक संदेश जाए कि यदि सडक़ और यातायात नियमों को अनदेखा किया या उन्हें तोड़ा तो उसका परिणाम महंगा पड़ेगा। कड़े कानून लागू होने की बात करें तो होता यह है कि कई सडक़ों पर और राजमागरे पर कुछ निर्धारित स्थानों पर स्पीड चेक करने वाले कैमरे लगे होते हैं। इनकी जानकारी वहां से नियमित रूप से निकालने वाले ड्राइवरों को पहले से ही होती है। इसलिए वे उस जगह पर अपनी गाड़ी को नियंत्रित गति से चलाते हैं। ऐसे में दुर्घटनाएं टल तो जाती हैं परंतु जैसे ही वो कैमरे की दृष्टि से दूर होते हैं, वैसे ही गाड़ी के एक्सलेरेटर को जोर से दबा देते हैं। मतलब यह हुआ कि केवल चालान से बचने की नीयत से ही वे गाड़ी को निर्धारित गति से चलाते हैं, जबकि यह तथ्य जगज़ाहरि है कि यदि आप अपनी गाड़ी को नियंत्रित गति से चलाते हैं तो न सिर्फ दुर्घटना टलती है बल्कि ईधन भी कम खर्च होता है।

सरकार और ट्रैफिक पुलिस को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जो कैमरे तेज रफ्तार से चलने वाली गाडिय़ों का चालान करते हैं, उनसे अधिक काम भी लिया जा सकता है। स्पीड कैमरे की तकनीक की बात करें तो उसमें लगे रेडार से एक सिग्नल जाता है जो केवल तेज रफ्तार से चलने वाली गाड़ी की ही फोटो खींचते हैं। यदि इसी तकनीक में थोड़ा सा सुधार किया जाए तो वही कैमरा कई ट्रैफिक उल्लंघनों की फोटो भी खींच सकता है।

ये सब बातें मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब आज से कुछ वर्ष पहले मैं लंदन की यात्रा पर था तो वहां मेरे स्थानीय मित्र ने गाड़ी को राजमार्ग पर लाने से पहले चश्मा लगा लिया। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि, ‘मेरी गाड़ी और ड्राइविंग लाइसेंस पर जो फोटो लगी है उसमें मैंने मामूली नंबर का नजर का चश्मा पहना हुआ है। यदि मैं बिना चश्मे के गाड़ी चलाऊंगा तो मेरा चालान हो जाएगा।’ उनका मतलब यह था कि जगह-जगह लगे कैमरे हर पहलू को पकड़ लेते हैं। आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में एक से बढक़र एक गुणवत्ता वाले कैमरे उपलब्ध हैं जो इन सभी पहलुओं को पकड़ सकते हैं। जरूरत केवल सही सोच और पहल करने की इच्छा की है। देखना यह है कि हमारे देश में ऐसे बदलाव कब होंगे? केवल चुनावी घोषणाओं के चलते नये-नये राजमार्ग खोलने से कुछ नहीं होगा। सडक़ और यातायात  नियमों को सख्ती से लागू भी किया जाए। शायद तभी हमारे देश में सडक़ दुर्घटनाओं में कमी आए।


युवाओं में बेरोजगारी की दर अधिक

प्रह्लाद सबनानी
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति की सदस्य शमिका रवि के हालिया रिसर्च पेपर में कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं। भारत के आर्थिक विकास के कई क्षेत्रों के संबंध में तथ्यों पर आधारित सारगॢभत बातें बताने के साथ-साथ यह भी जानकारी दी गई है कि किस प्रकार भारत में अब ग्रामीण इलाके भी अर्थव्यवस्था में अपना योगदान बढ़ा रहे हैं। यह भी कि किस प्रकार भारत में तेज गति से हो रहे आर्थिक विकास का लाभ देश के युवाओं को रोजगार के अधिक अवसरों के रूप में मिल रहा है। किसी भी देश के लिए श्रम की भागीदारी एवं बेरोजगारी, दो अलग-अलग मुद्दे हैं।

श्रम की भागीदारी में 18-59 वर्ष के बीच के वे लोग शामिल रहते हैं, जो अर्थ के अर्जन हेतु या तो कुछ कार्य कर रहे हैं अथवा कोई आर्थिक कार्य करने को उत्सुक हैं एवं इस हेतु रोजगार तलाश रहे हैं। पिछले 40 वर्षो के दौरान चीन में श्रम की औसत भागीदारी 75 प्रतिशत से ऊपर रही है अर्थात प्रत्येक 4 में से 3 लोग या तो रोजगार में रहे हैं अथवा रोजगार तलाशते रहे हैं। वियतनाम में श्रम की भागीदारी 72-73 प्रतिशत के बीच रही है। बांग्लादेश में यह 60 प्रतिशत से अधिक रही है परंतु भारत में 5 वर्ष पूर्व तक केवल 50 प्रतिशत के आसपास थी जो आज बढक़र 57 प्रतिशत हो गई है। अर्थात इतने बड़े देश में कुल कार्य करने योग्य जनसंख्या में से आधे से कुछ कम आबादी या तो रोजगार में नहीं है अथवा रोजगार तलाश भी नहीं रही है। यह स्थिति भारत जैसे देश के लिए ठीक नहीं है। दूसरे, बेरोजगारी से आश्य ऐसे नागरिकों से है, जो रोजगार तलाश रहे हैं, लेकिन रोजगार मिल नहीं रहा। भारत में ऐसे नागरिकों की संख्या मात्र 3 प्रतिशत है।

समय के साथ बेरोजगारी की दर में थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता रहता है परंतु, जब इस स्थिति को विभिन्न प्रदेशों के बीच तुलना करते हुए देखते हैं, तो बेरोजगारी की दर में भारी अंतर दिखाई देता है। गुजरात, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे राज्यों में बेरोजगारी की दर 0.9-1.5 प्रतिशत के बीच है, जबकि केरल में 12.5 प्रतिशत है। आर्थिक विकास में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी अधिक निर्मिंत होते हैं। इसलिए देश में रोजगार के नये अवसर निर्मिंत करने के लिए व्यवसाय को बढ़ाना होगा, विकास को बढ़ाना होगा। केवल केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारें समस्त नागरिकों को रोजगार उपलब्ध नहीं करा सकतीं। इस हेतु, निजी क्षेत्र को आगे आना होगा। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के संस्थानों के रोजगार के अवसर निर्मिंत करने की कुछ सीमाएं हैं।

आज भारत में 30 वर्ष के अंदर की उम्र के नागरिकों में बेरोजगारी की दर 12 प्रतिशत है, जबकि देश में कुल बेरोजगारी की दर 3.1 प्रतिशत है। अत: युवाओं में बेरोजगारी की दर अधिक दिखाई देती है। युवाओं में कौशल का अभाव है। इसलिए केंद्र सरकार विशेष कार्यक्रम लागू कर युवाओं में कौशल विकसित का प्रयास कर रही है। विशेष रूप से युवाओं के लिए कहा जा रहा है कि वे 30 वर्ष की उम्र तक काम करना ही नहीं चाहते क्योंकि इस उम्र तक वे रोजगार के अच्छे अवसर ही तलाशते रहते हैं। 30 वर्ष की उम्र के बाद वे दबाव में आने लगते हैं एवं फिर जो भी रोजगार अवसर मिलता है, उसे स्वीकार कर लेते हैं।

इसलिए 30 वर्ष से अधिक की उम्र के नागरिकों के बीच बेरोजगारी की दर बहुत कम है। यह स्थिति हाल के समय में अन्य देशों में भी देखी जा रही है। युवाओं की अपनी नजर में सही रोजगार के अवसर के लिए वे इंतजार करते रहते हैं, अथवा अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं।
आज विशेष रूप से भारत में रोजगार के अवसरों की कमी नहीं है। युवाओं में कौशल एवं मानसिकता का अभाव एवं केवल सरकारी नौकरी को ही रोजगार के अवसर के लिए चुनना ही भारत में श्रम की भागीदारी में कमी के लिए जिम्मेदार तत्व हैं। अधिक डिग्रियां प्राप्त करने वाले युवा रोजगार के अच्छे अवसर तलाश करने में ही लंबा समय व्यतीत कर देते हैं। कम डिग्री प्राप्त एवं कम पढ़े-लिखे नागरिक छोटी उम्र से ही रोजगार प्राप्त कर लेते हैं।

यह भी कटु सत्य है कि डिग्री प्राप्त करने एवं वास्तविक धरातल पर कौशल विकसित करने में बहुत अंतर है। आज भी भारत में कई कंपनियों को शिकायत है कि देश में इंजीनीयर्स तो बहुत मिलते हैं परंतु उच्च कौशल प्राप्त इंजीनीयर्स की भारी कमी है। तमिलनाडु में किए गए एक अध्ययन में तथ्य उभर कर   आया है कि किसी भी देश के नागरिक जब अधिक उम्र में रोजगार प्राप्त करते हैं, तो उनकी कुल उम्र भर की कुल वास्तविक औसत आय बहुत कम हो जाती है। इसके विपरीत जो नागरिक अपनी उम्र के शुरुआती पड़ाव में ही रोजगार प्राप्त कर लेते हैं, उनकी कुल उम्र भर की वास्तविक औसत आय तुलनात्मक रूप से बहुत बढ़ जाती है। भारत में स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जाना चाहिए एवं युवाओं को सरकारी नौकरी की चाहत को छोडक़र निजी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने के प्रयास करने चाहिए। युवाओं को अपने स्वयं के व्यवसाय प्रारंभ करने के प्रयास भी करने चाहिए।


भारतीय संविधान में कलात्मकता

गजेंद्र सिंह शेखावत
हमारा भारत देश संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का एक जीता जागता अनुभव है। इसके इतिहास को सरल शब्दों में व्यक्त करना अत्यंत कठिन है। इससे भी अधिक कठिन है पांच हजार से अधिक वर्षों की सभ्यता के इतिहास को एक दस्तावेज़ के रूप में व्यक्त करना, जो देश की स्वतंत्रता के समय एक नए स्वतंत्र हुए राष्ट्र के भाग्य का मार्गदर्शन करने वाला हो। लेकिन आचार्य नंदलाल बोस केवल एक कलाकार नहीं थे और भारत के संविधान पर चित्रण उनके लिये केवल एक और कार्य नहीं था। संविधान में चित्रण के लिए उनकी दृष्टि हड़प्पा सभ्यता के समय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक भारत की यात्रा का वर्णन करती है।

यह सभी चित्रण संविधान के अंतिम पृष्ठ पर सूचीबद्ध हैं और उन्हें बारह ऐतिहासिक काल में वर्गीकृत किया गया है: मोहनजोदड़ो काल, वैदिक काल, महाकाव्य काल, महाजनपद और नंद काल, मौर्य काल, गुप्त काल, मध्यकालीन काल, मुस्लिम काल, ब्रिटिश काल, भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी आंदोलन और प्राकृतिक विशेषताएँ।

संविधान की शुरुआत हमारे राष्ट्रीय प्रतीक के चित्रण से होती है। नंदलाल बोस इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट थे कि प्रतीक में शेर बिल्कुल असली शेरों की तरह दिखें, उनकी चाल और चेहरे के हाव-भाव सही हों और आयु के हिसाब से उनमें बदलाव हो। राष्ट्रीय प्रतीक के डिजाइनर दीनानाथ भार्गव, जो उस समय कला भवन में एक युवा छात्र थे, इस कलाकृति को चित्रित करने से पहले शेरों के हाव-भाव, शारीरिक भाषा और तौर-तरीकों का अध्ययन करने के लिए महीनों तक कोलकाता चिडिय़ाघर गए। प्रस्तावना पृष्ठ और कई अन्य पृष्ठों को बेहर राममनोहर सिन्हा ने डिजाइन किया था। नंदलाल बोस ने बिना किसी बदलाव के प्रस्तावना हेतु सिन्हा जी की बनाई कलाकृति का समर्थन किया। इस पृष्ठ पर निचले दाएं कोने में देवनागरी में सिन्हा का संक्षिप्त हस्ताक्षर राम है। संविधान की प्रस्तावना एक हाथ से लिखा हुआ लेख है जो आयताकार बॉर्डर से घिरा हुआ है। बॉर्डर के चार कोनों में चार पशुओं को दर्शाया गया है। दर्शाए गए चार जानवर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के आधार से लिए गए हैं। बॉर्डर की कलाकृति में कमल की आकृति प्रमुखता से दिखाई देती है।  कमल की आकृति बॉर्डर कलाकृति में प्रमुखता से दिखाई देती है।

संविधान का प्रत्येक भाग एक चित्र से आरंभ होता है और अलग-अलग पृष्ठों पर अलग-अलग बॉर्डर डिज़ाइन दर्शाए गए हैं। कलाकारों के हस्ताक्षर चित्र पर और बॉर्डर के पास दिखाई देते हैं जो इस प्रोजेक्ट में सभी के सहयोग को दर्शाता है। अनेक पृष्ठों पर कई हस्ताक्षर हैं जो बंगाली, हिंदी, तमिल और अंग्रेजी में दिखाई देते हैं। भारत के संविधान के भाग 19 में विविध विषयों से संबंधित एक चित्र है जिसमें नेताजी सैन्य पोशाक में अपने सैनिकों से घिरे हुए सलामी दे रहे हैं। नंदलाल बोस के हस्ताक्षर चित्रण पर दिखाई देते हैं और ए. पेरुमल के हस्ताक्षर पृष्ठ के बाएं निचले कोने पर दिखाई देते हैं। वे कला को लोगों तक ले जाने वाले कलाकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे शांतिनिकेतन के गाँवों में जाते और संथाल घरों की दीवारों को जानवरों, पक्षियों और पेड़ों वाली प्रकृति की थीम से सजाते। वे शांतिनिकेतन के कला भवन में चार दशकों से अधिक समय तक नंदलाल बोस जैसे महान कलाकारों के साथ रहे और काम किया, उन्हें स्नेह से पेरुमलदा कहा जाता था।

संविधान का भाग 4, जो प्रथम अनुसूची के भाग में राज्यों से संबंधित है, वह ध्यान में बैठे भगवान महावीर की समृद्ध रंगीन चित्र से शुरू होता है, जिसमें वे अपनी आँखें बंद करके और हथेलियाँ एक दूसरे पर टिकाकर बैठे हुए हैं। भगवान महावीर के दोनों ओर एक-एक पेड़ हैं और फ्रेम में एक मोर भी दिखाई दे रहा है जो प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को दर्शाता है। यह मूल संविधान के कुछ रंगीन चित्रों में से एक है। रंगीन चित्रों में जमुना सेन और नंदलाल बोस के हस्ताक्षर हैं। इस पृष्ठ पर बॉर्डर डिज़ाइन में राजनीति नामक कलाकार के हस्ताक्षर भी हैं।

भारतीय संविधान का भाग 15 चुनावों पर केंद्रित है। इस पृष्ठ पर दिए गए चित्रों में भारत के दो वीर सपूत छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह को दिखाया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए चित्र धीरेंद्र कृष्ण देब बर्मन द्वारा बनाए गए हैं, जो त्रिपुरा राजघराने के सदस्य थे और रवींद्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। बॉर्डर डिज़ाइन पर कृपाल सिंह शेखावत के हस्ताक्षर हैं, जो भारत के एक प्रसिद्ध कलाकार और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले थे, जिन्हें जयपुर की प्रतिष्ठित ब्लू पॉटरी की कला को पुनर्जीवित करने के लिए जाना जाता है।

शांतिनिकेतन में ललित कला संस्थान कला भवन ने भारत और दुनिया के सभी कोनों से छात्रों और कलाकारों को आकर्षित किया, इस प्रकार विभिन्न प्रभावों को समाहित करते हुए उत्कृष्टता की निरंतर खोज करते हुए एक इकोसिस्टम निर्मित किया और अंत में, एक अनूठी भारतीय शैली और कला निर्मित की। इस पर काम करने वाले कई कलाकारों ने अपने करियर में महान ऊंचाइयों को हासिल किया, लेकिन इस परियोजना के समय शांतिनिकेतन के छात्र और सहयोगी ही थे जो अपने श्रद्धेय ‘मास्टर मोशाय’ नंदलाल बोस के सपने को जीवंत करने के लिए प्रयत्नशील थे।

संविधान में चित्रों की प्रेरणा भारत के विशाल इतिहास, भौतिक परिदृश्य, पौराणिक चित्र और स्वतंत्रता संग्राम में निहित है। भारत के संविधान का भाग 13 ‘भारतीय क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और उनके परस्पर संबंधो’ से संबंधित है। इस पृष्ठ पर दिया गया चित्रण महाबिलापुरम में स्मारकों के समूह का हिस्सा है जो यूनेस्को द्वारा अंकित विश्व धरोहर स्थल है। ‘गंगा का अवतरण’ एक बड़ी, खुली हवा में बनी चट्टान की नक्काशी वाली मूर्ति है जो स्वर्ग से धरती पर गंगा नदी के उतरने के कथा को पत्थर में दर्शाती है। नंदलाल बोस के हस्ताक्षर चित्र पर दिखाई देते हैं और जमुना सेन का नाम बॉर्डर के बाएं निचले कोने पर दिखाई देता है।

भाग 3 जो मौलिक अधिकारों से संबंधित है, उसमें रामायण का एक दृश्य दिखाया गया है। इस पृष्ठ के बॉर्डर पर जमुना सेन के हस्ताक्षर हैं। भाग 4 जो राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों से संबंधित है, उसमें महाभारत का एक दृश्य दिखाया गया है। बानी पटेल और नंदलाल बोस के नाम दाईं ओर नीचे दिए गए चित्रण पर दिखाई देते हैं और विनायक शिवराम मसोजी का नाम बॉर्डर के बाएं कोने पर दिखाई देता है।

संविधान का भाग 7 ‘पहली अनुसूची के भाग बी में शामिल राज्यों’ से संबंधित है। इस खंड की शुरुआत में दिए गए चित्रण में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रसार को दर्शाया गया है। उन्हें हाथी पर सवार दिखाया गया है, जो सभी तरह के साज-सज्जा से सुसज्जित है और बौद्ध भिक्षुओं से घिरा हुआ है। यह चित्रण अजंता की शैली में है, जिसमें भिक्षुओं को शरीर के ऊपरी हिस्से को बिना वस्त्रों और आभूषणों के साथ दिखाया गया है। यह चित्रण नंदलाल बोस द्वारा किया गया था, जिनका काम अजंता भित्तिचित्रों में पाई जाने वाली कलात्मक परंपराओं से बहुत प्रभावित था। चित्रण के निचले बाएँ भाग पर ए. पेरुमल का नाम भी दिखाई देता है। बॉर्डर डिज़ाइन में ब्योहर राममनोहर सिन्हा के हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने प्रस्तावना और कई अन्य पृष्ठों को भी डिज़ाइन किया था। यहाँ उन्होंने हिंदी में राममनोहर के रूप में हस्ताक्षर किए हैं। यह संविधान के उन कुछ पन्नों में से एक है, जिस पर नंदलाल बोस और उनके सबसे वरिष्ठ छात्र ब्योहर राममनोहर सिन्हा दोनों के नाम हैं।

भारत का संविधान इस मायने में अनूठा है कि यह मूल रूप से एक हस्तलिखित दस्तावेज़ था। इसे अंग्रेजी में प्रेम बिहारी रायज़ादा और हिंदी में वसंत के. वैद्य ने सुलेखित किया था। रायज़ादा ने प्रवाहपूर्ण इटैलिक शैली का इस्तेमाल किया और सुलेख की कला अपने दादा से सीखी। संविधान हॉल (जिसे अब कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है) के एक कमरे में काम करते हुए, उन्होंने छह महीने के दौरान दस्तावेज़ तैयार किया। उन्होंने इसे लिखते समय सैकड़ों पेन निब का इस्तेमाल किया। भारत के संविधान के अंग्रेजी संस्करण के सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा (प्रेम) के हस्ताक्षर दस्तावेज़ के हर पृष्ठ पर दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय महत्व की इस परियोजना को शुरू करने के लिए उन्होंने यही एकमात्र अनुरोध किया था।

भारत का संविधान एक मौलिक कला ग्रंथ है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है। भारतीय संविधान में कलात्मकता भारत के बहुस्तरीय इतिहास को दर्शाती है और सामाजिक सांस्कृतिक, पौराणिक, क्षेत्रीय, आध्यात्मिक, भौतिक परिदृश्य तथा अन्य कारकों के प्रति श्रद्धांजलि है जो भारत को एक अद्वितीय और जीवंत अनुभव बनाते हैं।
यह एक ऐसे राष्ट्र की वास्तविकता को दर्शाता है जो अपने प्राचीन अतीत को स्वीकार करता है, विविधता में एकता का उत्सव मनाता है और भविष्य की ओर देखता है।


यमुना हमारी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर

सुशील देव
छठ पूजा के अवसर पर यमुना नदी एक बार फिर चर्चा का विषय बनी। इसकी साफ-सफाई और स्वच्छता को लेकर फिर से कई सवाल दागे गए। वादे-कस्में दुहराए गए। लेकिन हर बार यह चर्चा-परिचर्चा किसी समाधान तक नहीं पहुंचती। हर साल यही होता है-राजनीतिक बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और गंदी राजनीति का खेल। गंदी राजनीति की वजह से यमुना कहीं अधिक गंदी हो रही है। चर्चाओं के दौरान नदी की स्थिति पर केवल औपचारिक बातें की जाती हैं। यमुना की हालत हर दिन बिगड़ती जा रही है। गंदे नालों का पानी, झाग, बदबूदार काला पानी और जहरीले रसायन न केवल नदी को दूषित कर रहे हैं, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों की जिंदगी पर भी गंभीर असर डाल रहे हैं। राजनीतिक दल केवल अपनी राजनीति साधने में व्यस्त हैं।

कभी पवित्र मानी जाने वाली यमुना की दुर्दशा कोई नई बात नहीं है। इसे स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए कई सरकारें आई और गई। लाखों-करोड़ों रु पये खर्च हुए, बड़े-बड़े आंदोलन और अभियान चलाए गए, लेकिन नतीजा शून्य ही रहा। नदी को गंदा करने वाले असली गुनहगार कौन हैं, यह आज तक तय नहीं हो सका। दरअसल, यह समस्या प्रशासनिक लापरवाही और खराब ड्रेनेज व्यवस्था का नतीजा है। दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह से फेल हो चुका है। थोड़ी सी बारिश होते ही राजधानी की सडक़ों पर पानी भर जाता है।

बारिश का पानी के निकलने का कोई समुचित इंतजाम नहीं है। नालों की सफाई न होने और जल निकासी की व्यवस्था खराब होने से नाले उफान मारते हैं। पहले नदी का पानी बढऩे से शहर में बाढ़ आती थी, लेकिन अब शहर का पानी ही बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देता है। दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम 1976 के टाउन प्लान पर आधारित है। उस समय दिल्ली की आबादी केवल 60 लाख थी, जो अब 2024 में बढ़ कर लगभग 3 करोड़ हो गई है। इस 48 साल पुराने सिस्टम से मौजूदा आबादी की जरूरतें पूरी करना संभव नहीं है। नया ड्रेनेज मास्टर प्लान बनाने की कई घोषणाएं हुई, लेकिन वह अब तक कागजों में ही सिमटा हुआ है। दिल्ली में 2846 से ज्यादा नाले हैं, जिनकी कुल लंबाई 3692 किलोमीटर है। इनमें से कई नाले ठोस कचरे, सीवेज और अतिक्रमण के कारण जाम हो चुके हैं। कई बड़े नालों का गंदा पानी सीधे यमुना में गिरता है। इससे नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। यमुना मॉनिटरिंग कमिटी ने सभी बड़े नालों के मुहाने पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी लगाने की सिफारिश की थी लेकिन इस दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

2018 में आईआईटी के एक प्रोफेसर ने दिल्ली सरकार को नया ड्रेनेज मास्टर प्लान सौंपा था। इस प्लान में बारिश के पानी और सीवेज के लिए अलग-अलग व्यवस्था करने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इस पर भी काम शुरू नहीं हो पाया। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सीवरेज और बाढ़ के पानी की निकासी के लिए अलग व्यवस्था नहीं होगी, तब तक समस्या बनी रहेगी। वहीं पीडब्ल्यूडी के मुताबिक, दिल्ली का मौजूदा ड्रेनेज सिस्टम 24 घंटे में केवल 50 मिमी. बारिश को ही संभाल सकता है। इससे अधिक बारिश होने पर जलभराव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2000 के बाद दिल्ली में तेजी से शहरीकरण हुआ। खाली जमीनों पर अनधिकृत कॉलोनियां बस गई, हरित क्षेत्र घट गए और फ्लैटों का निर्माण बढ़ गया। इस सबने ड्रेनेज सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डाला।

दिल्ली के तीन प्रमुख प्राकृतिक जल निकासी बेसिन-ट्रांस यमुना, बारापुला और नजफगढ़-भी ठोस कचरे और अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहे हैं। कई जगह जल निकासी के रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हैं। आरके पुरम, करोल बाग और दरियागंज जैसे इलाकों में नालों पर अतिक्रमण के कारण उनकी सफाई मुश्किल हो गई है। यह समस्या यमुना नदी के प्रदूषण को और बढ़ा रही है। यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए जरूरी है कि नालों का गंदा पानी सीधे नदी में जाने से रोका जाए। ठोस कचरे और सीवेज के उचित प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होना चाहिए। नालों की नियमित सफाई और उन पर अतिक्रमण हटाना भी अनिवार्य है।

यमुना को साफ करने के लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा। हमें अपने नालों और नदी में कचरा डालने से बचना होगा। सरकार को भी अपने वादों पर अमल करते हुए एसटीपी स्थापित करने और ड्रेनेज मास्टर प्लान को लागू करने में तत्परता दिखानी चाहिए। यमुना नदी की स्थिति केवल एक नदी का मुद्दा भर नहीं है, यह हमारे प्रशासन, राजनीति और समाज की सामूहिक विफलता को भी दर्शाता है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। यमुना केवल एक नदी भर नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर भी है। इसे बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।


सुगम्य भारत अभियान- नौ वर्षों की प्रगति की झलक और आगे की राह

अरमान अली
इससे बेहतर संयोग नहीं हो सकता है, जैसे ही हम अति महत्वाकांक्षी सुगम्य भारत अभियान (सुगम्य भारत अभियान) के नौ साल पूरे होने का उत्सव मनाने, विश्लेषण करने और उस पर विचार करने की तैयारी कर रहे हैं, ठीक उसी दरम्यान सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जो इसके उद्देश्य को मजबूत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 नवंबर को केंद्र सरकार को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 40 के तहत अनिवार्य नियम बनाने का निर्देश दिया। यह निर्देश जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक स्थान और सेवाएं दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभ हों, भारत की समावेशिता की खोज को नया प्रोत्साहन प्रदान करता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2015 में उत्साह और दूरदर्शिता के साथ सुगम्य भारत अभियान की शुरुआत की गई। अभियान का उद्देश्य देशभर में दिव्यांगजनों के लिए बाधा रहित और सुखद/अनुकूल वातावरण तैयार करना है। साथ ही परिवहन प्रणालियों और सूचना और संचार पारिस्थितिकी तंत्र में पहुंच सुनिश्चित करना है।

यह अपनी तरह का पहला राष्ट्रव्यापी प्रयास था, जिसमें योजनाबद्ध तरीके से टियर 1 शहरों में 50 सबसे महत्वपूर्ण भवनों और टियर 2 शहरों में 25 प्रमुख भवनों को पूर्ण रूप से सुगम्यता के लिए लक्षित किया गया था। मुझे राज्यों के मुख्य सचिवों द्वारा बुलाई गई कई उच्च-स्तरीय बैठकों में भाग लेने की बातें याद हैं। उन बैठकों में विभागों को प्रगति की निगरानी करने और अपने-अपने क्षेत्रों में सुगम्यता उपायों को अपडेट करने का काम सौंपा गया था।  इन सत्रों ने सरकार के इरादे की गंभीरता को सुदृढ़ किया और ऐसी परिवर्तनकारी पहल के लिए आवश्यक प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।

चंडीगढ़ जैसे शहर जो अपनी बेहतर शहरी योजना के लिए जाने जाते हैं और भुवनेश्वर जो अपनी सुलभता पहल के लिए प्रसिद्ध हैं, इस अभियान के प्रेरक उदाहरण के रूप में उभरे कि इस अभियान द्वारा क्या हासिल किया जा सकता है। फिर भी अपने अभूतपूर्व दृष्टिकोण के बावजूद इस अभियान को विशेष रूप से राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सुगम्यता राज्य का विषय है, ऐसे में इसके कारण कार्यान्वयन का अधिकांश बोझ राज्यों पर पड़ता है, जिनमें से कई राज्यों को महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

सीमित जवाबदेही तंत्र और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी ने प्रगति को और बाधित किया। अभियान के महत्वाकांक्षी लक्ष्य कई क्षेत्रों में पूरे नहीं हुए जैसे सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को फिर से तैयार करना और डिजिटल पहुंच को बढ़ावा देना। समय पर सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से इस मिशन में नई तात्कालिकता आ गई। सिफारिशों को कानूनी अधिदेशों में परिवर्तित करके  कोर्ट का निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि सुगम्य भारत अभियान को गति खोने की अनुमति नहीं दी जा सकती।


इच्छा शक्ति से ही नियंत्रित हो सकेगा प्रदूषण

रजनीश कपूर
हम और आप जब भी कोई वाहन खऱीदते हैं तो हम उस वाहन की क़ीमत के साथ-साथ रोड टैक्स, जीएसटी आदि टैक्स भी देते हैं। इन सब टैक्स देने का मतलब हुआ कि यह सब राशि सरकार की जेब में जाएगी और घूम कर जनता के विकास के लिए इस्तेमाल की जाएगी। परंतु रोड टैक्स के नाम पर ली जाने वाली मोटी रक़म क्या वास्तव में जनता पर ख़र्च होती है?

बीते कुछ सप्ताह से दिल्ली एनसीआर और उत्तर भारत को प्रदूषण के बादलों ने घेर रखा है। इससे आम जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। प्रदूषण की रोकथाम को लेकर सरकार ने कई तरह की पाबंदियाँ लगा दी हैं।
इसके चलते असमंजस की स्थिति बनी हुई है। लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इन पाबंदियों के चलते कई रोजग़ारों पर भी असर पडऩे लगा है। निर्माण कार्य में लगे दिहाड़ी मज़दूर वर्ग इन पाबंदियों के चलते सबसे अधिक परेशान है।
तमाम टीवी चैनलों पर प्रदूषण के बिगड़ते स्तर पर काफ़ी बहस हो रही है। परंतु क्या किसी ने हमारे देश में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सही व ठोस कदम उठाने की बात की है?

क्या केवल निर्माण कार्यों और वाहनों पर प्रतिबंध से प्रदूषण के स्तर में कमी आएगी? ऐसे अनेकों कारण हैं जिन पर अगर सरकार ध्यान दे तो प्रदूषण में नियंत्रण पाया जा सकता है।
सबसे पहले बात करें वाहन प्रदूषण की। इस बात पर इसी कॉलम में कई बार लिखा जा चुका है कि एक विशेष आयु या श्रेणी के वाहन को प्रतिबंध करने से क्या प्रदूषण में कमी आएगी?
इसका उत्तर हाँ और नहीं दोनों ही है। यदि कोई वाहन, जो कि पुराने माणकों पर चल रहा है और उसके पास वैध पीयूसी प्रमाण पत्र नहीं है तो निश्चित रूप से ऐसे वाहन को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
परंतु यदि वही वाहन प्रदूषण के तय माणकों की सीमा में पाया जाता है तो उसे प्रतिबंधित करने का क्या औचित्य है?
हम और आप जब भी कोई वाहन खऱीदते हैं तो हम उस वाहन की क़ीमत के साथ-साथ रोड टैक्स, जीएसटी आदि टैक्स भी देते हैं।
इन सब टैक्स देने का मतलब हुआ कि यह सब राशि सरकार की जेब में जाएगी और घूम कर जनता के विकास के लिए इस्तेमाल की जाएगी।

परंतु रोड टैक्स के नाम पर ली जाने वाली मोटी रक़म क्या वास्तव में जनता पर ख़र्च होती है? क्या हमें अपनी महँगी गाडिय़ों को चलाने के लिए साफ़-सुथरी और बेहतरीन सडक़ें मिलती हैं?
टूटी-फूटी सडक़ों की समय-समय पर मरम्मत होती है? क्या देश भर में सडक़ों की मरम्मत करने वाली एजेंसियाँ अपना काम पूरी निष्ठा से करतीं हैं? इनमें से अधिकतर सवालों के जवाब आपको नहीं में ही मिलेंगे।
टूटी-फूटी सडक़ों पर वाहन अवरोधों के साथ चलने पर मजबूर होते हैं, नतीजा जगह-जगह ट्रैफिक़ जाम हो जाता है। ऐसे जाम में खड़े रहकर आप न सिफऱ् अपना समय ज़ाया करते हैं बल्कि महँगा ईंधन भी ज़ाया करते हैं।
जितनी देर तक जाम लगा रहेगा, आपका वाहन बंपर-टू-बंपर चलेगा और बढ़ते हुए प्रदूषण की आग में घी का काम करेगा। ऐसे में जिन वाहनों को पुराना समझ कर प्रतिबंधित किया जाता है, उनसे कहीं ज़्यादा मात्रा में नये वाहनों द्वारा प्रदूषण होता है।
इसलिए लोक निर्माण विभाग या अन्य एजेंसियों की यह जि़म्मेदारी होनी चाहिए कि वह सडक़ों को दुरुस्त रखें जिससे प्रदूषण को बढ़ावा न मिले।

इसके साथ ही ट्रैफिक़ नियंत्रण की समस्या भी एस समस्या है जिससे प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है। मिसाल के तौर पर आपको आपके शहर में ऐसे कई चौराहे मिल जाएँगे जहां लाल-बत्ती की अवधि ज़रूरत और ट्रैफिक़ के प्रवाह के अनुसार मेल नहीं खाती।
नतीजा, ऐसे चौराहों पर ट्रैफिक़ की लंबी क़तारें। ऐसा नहीं है कि पूरा दिन ही ऐसे चौराहों पर लंबी क़तारें लगती हैं। ज़्यादातर क़तारें ट्रेफिक के पीक घंटों में लगती हैं।

यदि उस समय ट्रैफिक़ पुलिस द्वारा चुनिंदा चौराहों को नियंत्रित किया जाए तो जाम की समस्या पर आसानी से क़ाबू पाया जा सकता है। इसके लिए कुछ मामूली से ही परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
आज गूगल मैप पर आप घर बैठे ही हर गली नुक्कड़ का ट्रैफिक़ देख सकते हैं। यदि ्लान कर सकते हैं तो ट्रैफिक़ कंट्रोल रूम के अधिकारी, संबंधित इलाक़े के ट्रैफिक़ अधिकारी को इस समस्या के प्रति झकझोर क्यों नहीं सकते?
ट्रैफिक़ को नियंत्रित करने के जैसे, ही प्रदूषण के अन्य कारकों पर भी लगाम कसी जा सकती है। ज़रूरत है तो इच्छा शक्ति की।
यहाँ आपको याद दिलाना चाहूँगा कि 2010 में जब हमारे देश में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था तो दिल्ली में एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी कि ट्रैफिक़ जाम नहीं होते थे।

जगह-जगह पर ट्रैफिक़ पुलिस के सिपाही ट्रैफिक़ पर पैनी नजऱ बनाए हुए थे। यानी डंडे के ज़ोर पर व्यवस्था को नियंत्रित किया जा रहा था।
यदि एक ट्रैफिक़ की समस्या को डंडे के ज़ोर पर, किसी विशेष इंतज़ाम के लिए नियंत्रित जा सकता है तो आम दिनों में क्यों नहीं?
अब बात करें दीपावली के बाद हर वर्ष होने वाली पराली जलाए जाने की। यह बात जाग-ज़ाहिर है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान हर वर्ष इन्हीं दिनों पराली जलाते हैं।

यह समस्या हर वर्ष प्रदूषण का कारण बनती है। हर वर्ष बड़ी-बड़ी बातें और घोषणाएँ की जाती हैं लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
यदि कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हो या कोविड के दौरान लॉकडाउन लागू करना हो, जब इन्हें सख़्ती से लागू किया जा सकता है तो पराली को जलाने से क्यों नहीं रोका जा सकता?

ठीक उसी तरह कारख़ानों से निकलने वाले धुएँ को भी नियंत्रित करना असंभव नहीं है। सरकार चाहे तो इस राह में ठोस कदम उठा कर प्रदूषण को नियंत्रण में ला सकती है।
केवल नारों, घोषणाओं और प्रतिबंधों से नहीं इच्छा शक्ति से ही नियंत्रित हो सकेगा प्रदूषण। जहां चाह वहाँ राह!


कांग्रेस को ईवीएम के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए

शकील अख़्तर
महाराष्ट्र में भाजपा की अविश्वसनीय स्ट्राइक रेट। और ईवीएम पर सवाल तेज हुआ तो सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट सवाल की शक्ल में आ जाता है कि जीतने पर चुप हार गए तो ईवीएम पर सवाल?  नरेटिव सेट कर दिया।  ऐसे कहा जा रहा है जैसे विपक्ष कोर्ट में गया हो। यह एक पुरानी टेक्टिस हैज् किसी आदमी से इस तरह की पीआईएल दाखिल करवा दो। और उसके बाद कहो कि सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को करारा जवाब दिया। जो बात बीजेपी और मोदी सरकार कहती है वही चुनाव आयोग कहता है, फिर वही बात सुप्रीम कोर्ट से आती है।

विपक्ष का मुख्य मुद्दा नरेंद्र मोदी को हटाना है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने सभी संस्थाओं  पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि सिवाए विपक्ष के कोई आवाज बची ही नहीं है। और विपक्ष जिसमें कांग्रेस बड़ी पार्टी है उसके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का यह कहना सही है कि हमारा माइक ही बंद कर दिया जाता है। मगर उससे ज्यादा यह कहना बहुत महत्वपूर्ण, दमदार और उत्साहवर्धक है कि माइक बंद कर दो मगर मैं खड़ा रहूंगा। नेता प्रतिपक्ष कहते हैं कि मुझसे कहा जाता है कि माइक बंद हो गया तो बैठ जाओ। मगर मैं बैठूंगा नहीं। खड़ा रहूंगा।

तो एक आवाज जो विपक्ष की बची है उसे भी बंद करने की कोशिश है। लेकिन यही एक काम सबसे मुश्किल है। विपक्ष के तमाम नेता एक मजबूत ताकत के रूप में खड़े हुए हैं। राहुल ने यही कहा बैठेंगे नहीं। खड़े रहेंगे। लड़ते रहेंगे। और जाहिर है तब तक जब तक कि लोकतंत्र अपनी मूल भावना के अनुरूप वापस नहीं आ जाता।
और जैसा कि हमारा पहला वाक्य स्पष्ट है कि ऐसा प्रधानमंत्री मोदी को हटाए बिना नहीं हो सकता। सबसे बड़ा इंस्टिट्यूशन तो न्यायपालिका था। लेकिन अभी रिटायर हुए और नई पोस्टिंग की राह देख रहे चीफ जस्टिस चन्द्रचुड़ ने क्या कहा? हम विपक्ष नहीं! क्या मतलब है इसका? इसका मतलब ऐसे समझिए जैसे सरकार कहे कि हमने कोई जनता का ठेका नहीं ले रखा है। अभी नहीं कहा। मगर यही हालत रही तो जल्दी ही डायरेक्ट यह कह दिया जाएगा कि क्या तुम्हारी गरीबी, बेरोजगारी हमारी जिम्मेदारी है? बस यह कहने के लिए चुनाव में जाने की मजबूरी ना हो।

हालांकि सब कुछ सेट है। मगर फिर भी चुनाव में जाना पड़ता है। इसलिए जनता पर अप्रत्यक्ष रूप से सब कुछ डाला जाता है। उसके अधिकारो की बात न करके केवल कर्तव्य याद दिलाए जाते हैं। मगर डायरेक्ट अभी यह कहने की स्थिति नहीं है कि आप कौन?

इसलिए वह स्थिति आए उससे पहले देश में वापस लोकतंत्र को चाहने वालों को मोदी को हटाना पड़ेगा। और मोदी को हटाने के लिए ईवीएम को हटाना पड़ेगा। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संविधान दिवस पर बहुत महत्वपूर्ण बात कही है। वोट ईवीएम से नहीं। अगर कांग्रेस यह आन्दोलन सारे विपक्षी दलों को विश्वास में लेकर सही तैयारी से करती है तो समझ लीजिए की ईवीएम हटते ही मोदी भी हट गए। कांग्रेसी भी, दूसरे भी मोदी सरकार की जान बताते हैं कि इस तोते में है। मगर सही यह है कि जान ईवीएम में है।

कैसे? इसका एक उदाहरण बताते हैं। महाराष्ट्र के अविश्वसनीय स्ट्राइक रेट। भाजपा के 90 प्रतिशत के बाद ईवीएम पर सवाल तेज हो गए। और सवाल होते ही सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट सवाल की शक्ल में आ जाता है कि जीतने पर चुप हार गए तो ईवीएम पर सवाल?  नरेटिव सेट कर दिया। मीडिया इसी पर लगा हुआ है। और गोदी मीडिया के बाद दूसरा बड़ा प्रचार उपकरण व्ह्ट्स एप भी। विपक्ष के हारने का बहाना ईवीएम!

ऐसे कहा जा रहा है जैसे विपक्ष कोर्ट में गया हो। यह एक पुरानी टेक्टिस है जिसे विपक्ष उजागर नहीं कर पाता कि कोई भी गंभीर मामला होने पर किसी भी गैर गंभीर या अपने किसी आदमी से इस तरह की पीआईएल दाखिल करवा दो। और उसके बाद कहो कि सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को करारा जवाब दिया। जो बात चुनाव आयोग कहता है, बीजेपी और मोदी सरकार कहती है वही बात जब सुप्रीम कोर्ट से आती है तो जनता फिर सोचने लगती है कि मैंने ही बेरोजगारी, मंहगाई के खिलाफ वोट दिया था दूसरों ने नहीं। अब मेरे अकेले वोट से क्या होता है?  मोदी जी यही चाहते हैं। उनके विरोध की आवाज निराश हो जाए।

अब जरा यह देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता को पूरा मौका दिया गया कि वह अपनी बात कहे। और उसने बताया कि वह तीन लाख अनाथ बच्चों को बचा चुका है। 40 लाख विधावाओं की उसने मदद की है। 155 देशों की यात्राएं। 180 पूर्व आईएएस, आईपीएस, न्यायधीश उसकी याचिका के साथ है। और 18 राजनीतिक दल भी।

कोर्ट में वह खुद ही अपनी पैरवी कर रहा था। और माननीय न्यायधीश उससे और सवाल पूछ पूछकर उसे खूब आत्म प्रचार का मौका दे रहे थे। याचिकाकर्ता था डाक्टर ए के पाल और सुप्रीम कोर्ट की बैंच थी न्यायधीश विक्रम नाथ और पीवी वराले की। क्या मतलब था पाल की बातों का? मगर फैसला आ गया। माहौल बन गया। और यह कोई एक अकेला मामला नहीं है। ऐसे ही कई बड़े मुद्दों पर जानबुझकर अपने लोगों से याचिका दाखिल करवाकर उस मुद्दे को कमजोर कर दिया जाता है। और मनचाहा नरेटिव (कहानियां) बना लिया जाता है। कांग्रेस को और विपक्ष को यह भी ध्यान रखना चाहिए और तत्काल बात स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही यह समझना चाहिए कि ईवीएम पर यह याचिका क्यों दाखिल की गई। इसीलिए कि उन्हें मालूम है कि ईवीएम ही एक ऐसा मुद्दा है जो अगर ठीक वही जनादेश देने लगे जो मतदाता ने उसमें फीड किया है तो फिर उनका इस तरह चुनाव जीतना मुश्किल है।

जैसा कि हमने उपर कहा कि हर संस्थान पर कब्जा कर लिया है। और चुनाव आयोग जैसे इन्स्टिट्यूशन तो बिल्कुल सरकार की भाषा बोलने लगे हैं। विपक्ष को गैर जिम्मेदार और आदतन हमला करने वाला तक बता दिया। इसलिए अब पूरी चुनाव प्रणाली ही शक के घेरे में आ गई है। वोटर लिस्ट में नाम काटने और जाली नाम चढ़ाने के आरोपों के बाद यह गंभीर आरोप भी है कि मतदाता सूची फाइनल होने से पहले उसका एक्सेस ( पहुंच) भाजपा के पास होता है। वह अपनी मर्जी से नाम काटती और जोड़ती है। अभी कांग्रेस ने महाराष्ट्र के मामले में यह आरोप लगाया।

तो मतदाता सूची से लेकर नतीजों की घोषणा रोक लेने तक हर जगह धांधली के आरोप हैं। मगर उल्टा चुनाव आयोग विपक्ष को चेतावनी देती है कि भविष्य में ऐसे आरोप नहीं लगाएं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने ईवीएम को मैनेज कर लेने की बात पहले नहीं समझी थी। 2018 में जब राहुल खुद कांग्रेस अध्यक्ष थे पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन दिल्ली के इन्दिरा गांधी ओपन स्टेडियम में हुआ था। वहां बाकायदा ईवीएम के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। मगर उस पर कोई अमल नहीं किया गया।

29 नवम्बर को कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई सीअब्ल्यूसी की मीटिंग हुई। उसमें आन्दोलन पर विचार होगा। कांग्रेसियों को इससे बहुत उम्मीद है। पिछले कुछ समय से कांग्रेस जिस तरह सडक़ पर संघर्ष कर रही है उसने मोदी को हिलाया तो है। लोग कहते हैं कांग्रेस सडक़ पर क्यों नहीं आती। यह भी एक नरेटिव ( झूठी धारणा ) है। राहुल ने दो यात्राएं कीं। पहली तो चार हजार किलोमीटर पैदल। कन्याकुमारी से कश्मीर तक। दूसरी साढ़े छह हजार किलोमीटर से उपर। यह सब कहां कीं? सडक़ पर नहीं थीं? हवा में उड़ते हुए जा रहे थे? बोल देते हैं चाहे जो! कांग्रेस को सडक़ पर उतरना चाहिए।

राहुल से ज्यादा देश में किसी ने
यात्राएं नहीं की। दस हजार किलो मीटर से उपर। इन यात्राओं ने माहौल बदला। ईवीएम के बावजूद मोदी लोकसभा में बहुमत नहीं पा पाए। चन्द्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार के सहारे सरकार बनाना पड़ी। लेकिन यह भी कहना पड़ेगा कि हरियाणा की अप्रत्याशित हार ने राहुल की बनाई सारी बढ़त को खत्म कर दिया। हरियाणा की निम्नतम स्तर पर की गई गुटबाजी कांग्रेस को बहुत महंगी पड़ी। कांग्रेस को ईवीएम के खिलाफ तो आंदोलन करना चाहिए। वह एक बड़ा कारण है। मगर उसका बहाना बनाकर गुटबाज नेता मुझे मुख्यमंत्री बना दो, मुझे भी बना दो के अपने स्वार्थी और पार्टी विरोधी आचरण से मुक्त नहीं हो सकते।
लड़ाई बहुकोणीय है। ईवीएम के साथ अपने अंदर के उन सारे क्षत्रपों को बाहर फेंकने की जिन्हें अपने निज स्वार्थ के आगे कुछ नहीं दिखता है। कांग्रेस को कम से कम दो राज्यों में जहां सबसे ज्यादा गुटबाजी रही और हार का प्रमुख कारण भी राजस्थान और हरियाणा वहां तो कड़ाई करना ही पड़ेगी। तभी ईवीएम के खिलाफ उसकी लड़ाई की विश्वसनीयता बढ़ेगी।


बाइडन बहुत कमजोर राष्ट्रपति साबित हुए

श्रुति व्यास
जो बाइडन का राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल अंत की ओर है। उन्हें जनवरी में व्हाइट हाउस छोडऩा है इसलिए उन्हे अपना सामान बांधना है तो अपनी विरासत को भी संवारना है। उन्होंने 44वें राष्ट्रपति के रूप में जब पद संभाला था तब उन्हें उम्मीद थी कि वे ऐसी विरासत छोड़ जाएंगे जिसके चलते उन्हें  फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट (एफडीआर) के बाद अमेरिका के सबसे प्रगतिशील राष्ट्रपति के रूप में याद किया जाएगा। लेकिन तकदीर को कुछ और मंजूर था। बाइडन बहुत कमज़ोर राष्ट्रपति साबित हुए है और वे कलह से भरी दुनिया छोड़े जा रहे हैं।

कोई शक नहीं कि जो बाइडन का पद छोडऩा और डोनाल्ड ट्रंप का उनकी जगह लेना सत्ता के अन्य हस्तांतरणों की तुलना में बहुत डरावना है क्योंकि कई युद्ध जारी हैं। एक नयी जंग छिडऩे के आसार नजऱ आ रहे हैं। बाइडन प्रशासन अपने अंतिम दिनों में अधिक से अधिक काम निपटाने में जुटा हुआ है। उसे पर्दा गिरने से पहले बहुत कुछ करना है।

पहला मसला है यूक्रेन का बाइडन ने बहुत समय बर्बाद करने के बाद यूक्रेन को अमेरिका द्वारा दी गईं लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी है। वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस ने यूक्रेन की सैन्य सहायता के लिए 6 अरब डालर की जो मंजूरी दी थी, उसकी बची हुई रकम उनके व्हाइट हाउस छोडऩे के पहले खर्च कर दी जाए। इस ह्रदय परिवर्तन का कारण शायद यह है कि रूस की मदद के लिए हजारों उत्तर कोरियाई सैनिकों को अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया गया है जिसे अमेरिका युद्ध के विस्तार के रूप में देख रहा है।

पश्चिमी मिसाइलों का इस्तेमाल रूस के भीतरी इलाकों पर हमले के लिए करने की इजाजत यूक्रेन को देकर बाइडन ने न केवल उत्तर कोरिया को बल्कि पुतिन को भी सन्देश दिया है। हालांकि इस फैसले से अग्रिम मोर्चों पर यूक्रेन की कमजोर स्थिति में कोई नाटकीय बदलाव नहीं होगा, लेकिन इससे यूक्रेन का मनोबल बढ़ेगा और 20 जनवरी के बाद ट्रंप की पहल पर होने वाली संभावित वार्ताओं में उसका पक्ष मजबूत होगा। ऐसा बताया जाता है कि ट्रम्प ने पुतिन को फ़ोन कर कहा है कि वे युद्ध को और तेज न करें। मगर क्रेमलिन का कहना है कि ऐसा कोई फ़ोन नहीं आया।

दूसरा मसला है पश्चिम एशिया में युद्ध का। गाजा में शुरू हुआ युद्ध लेबनान तक पहुंच गया है और अब शायद उसकी लपटें ईरान तक पहुँच जाएँ। इस मामले में एक और नया घटनाक्रम है। अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू को गिरफ्तार करने की बात कही है। बाइडन ने इसे असहनीय बताकर अमेरिका के पाखण्ड को उजागर किया है। फिर युद्धविराम की बातें भी हो रही हैं। इजराइल की कैबिनेट ने कल रात एक बैठक में हिजबुल्ला के खिलाफ 14 महीनों से चल रहे युद्ध को विराम देने को मंजूरी दी है।

पहले से लिखी जा चुकी पटकथा का यह बहुत खूबसूरत मंचन था। नेतन्याहू ने टेलीविजऩ पर आकर अपने देश की जनता को समझौते के बारे में बताया। फिर जो बाइडन ने व्हाइट हाउस के रोज़ गार्डन में इसे एक ‘ऐतिहासिक मौका’ बताया। अब ऐसी उम्मीद है कि युद्ध ख़त्म हो सकता है। अमेरीका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा, “हमास का पहले दिन से ही प्रयास रहा है कि वह इस युद्ध में दूसरों को भी घसीट ले। अगर उसे लगेगा कि नए दस्ते लड़ाई के मैदान की ओर कूच नहीं कर रहे हैं तो हमास वह करेगा जो इस लड़ाई को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी है।” अमेरिका को अब उम्मीद है कि लेबनान के साथ हुए समझौते से गाजा में चल रही लड़ाई रुकेगी।
जो हुआ उससे डोनाल्ड ट्रम्प खुश नहीं होंगे। उन्होंने अक्टूबर में लेबनानी-अमरीकी मतदाताओं से वायदा किया था कि वे उनकी मातृभूमि में लड़ाई बंद करवा देंगे। मगर बाइडन के शांति दूत बन जाने से वे यह श्रेय लेने से वंचित रह गए हैं।

बाइडन अब केवल 55 दिनों तक राष्ट्रपति रहेंगे। जाहिर है कि वे जल्दी में हैं। वे नेपथ्य की ओर खिसकते जा रहे हैं और मंच की स्पॉटलाइट अब उन पर नहीं है। उनका उत्तराधिकारी आने वाले दिनों को आकार देने में जुटा हुआ है। मगर इस सबके बावजूद ओवल ऑफिस में तो अभी वे ही बैठते हैं। उनके कार्यकाल का उपसंहार लिखा जाना बाकी है। वे चाहेंगे कि उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद किया जाए जिसने लम्बे समय से चली आ रही दुश्मनियों को ख़त्म किया न कि ऐसे राष्ट्रपति के रूप में जो अपने उत्तराधिकारी के लिए समस्याओं का पहाड़ छोड़ गया।


महायुति के रूप में चुनाव लड़ने को हुए मजबूर

ओमप्रकाश मेहता
देश अभी भी राष्ट्रवादी की आंधी से काफी दूर है और क्षेत्रवाद अभी भी भारतीय राजनीति में सिर चढकर बोल रहा है, यह संदेश फिर एक बार हाल ही में सम्पन्न दो राज्य विधानसभाओं के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है, साथ ही इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने आज के प्रमुख राजनीतिक दलों की स्थिति को भी स्पष्ट कर दिया है। कौन सा दल कितने गहरे पानी में है, उसकी अहमियत क्या रह गई है, उसे जन समर्थन कितना प्राप्त है, इन सब सवालों का जवाब देश के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा ‘महायुति’ बनाकर चुनाव लडऩे से स्पष्ट हो रहा है, कभी देश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ा करती थी और सरकारें बनाती थी, वे आज ‘महायुति’ के रूप में चुनाव लडऩे को मजबूर है, यही आज की राजनीति की मजबूरी है।

हाल ही में महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव परिणामों ने जहां मोदी की कथित ‘एक-छत्रता’ की स्थिति को स्पष्ट कर दिया है वहीं देश का वास्तविक राजनीतिक चरित्र भी लाकर सामने खड़ा दिया है। आज जबकि देश की आजादी को करीब पचहत्तर साल का अरसा हो चुका है, तब यह महसूस किया जा रहा है कि अब देश का आम वोटर भी जागरूक होने लगा है और वह अब किसी लोभ-लालच या बहकावें से दूर रह कर अपने मताधिकार का उपयोग करने लगा है, नरेन्द्र मोदी एक दशक से भी अधिक समय से प्रधानमंत्री है, किंतु झारखण्ड जैसा राज्य आज भी उनके प्रभाव से मुक्त है, अपने क्षेत्रिय हित को ध्यान में रखकर अपना राजनीतिक भविष्य तय कर रहा है, यही सही अर्थों में राजनीतिक जागरूकता का परिचायक है।

इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दोनों राज्यों के मतदाताओं को अपनी अस्मिता से कितना लगा है, महाराष्ट्र ने जहां अपनी संस्कृति व राजनीतिक जागरूकता का परिचय देते हुए स्थानीय को महत्व देकर अपना मत प्रकट किया, वहीं झारखण्ड ने भी अपनी स्थानीयता को महत्व देते हुए, अपना मत प्रकट किया, यही आज के मतदाताओं की जागरूकता का स्पष्ट प्रमाण है, वे राष्ट्रीय और स्थानीय हितों का अंतर समझने लगे है, साथ ही इन परिणामों से यह भी स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक दल अहम् नहीं, क्षेत्रवाद का हित सर्वोपरी है।

अब धीरे-धीरे राष्ट्रीय हो या स्थानीय सभी राजनीतिक दलों को अपनी स्थिति का भी सही अहसास हो गया है। यही मतदाताओं की जागरूकता का परिचायक है। ज्.यदि यही सिलसिला चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब भारतीय राजनीति फिर से विश्व की ‘सिरमौर’ बनकर विश्व पर राज करेगी और विश्व के सभी देश उसके अनन्य समर्थक होंगें।


ड्रग्स का कारोबार बिना रोक टोक जारी

विनीत नारायण
आए दिन देश में ऐसी अनेकों खबरें आती रहती हैं कि करोड़ों के मूल्य के नशीले पदार्थ पकड़े जाते हैं। इन पकड़ी गई ड्रग्स की मात्रा इतनी ज़्यादा होती है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये ड्रग्स देश भर में वितरण के लिये ही आई हैं। पर ये कारोबार बिना रोक टोक जारी है। जबकि सिंगापुर में ड्रग्स के विरुद्ध इतना सख्त कानून है कि वहाँ ड्रग्स को छूने से भी ये लोग डरते हैं। कुछ वर्ष पहले एक फि़ल्म आई थी उड़ता पंजाब’, जिसमें दिखाया गया था कि प्रदेश सरकार की लापरवाही से पंजाब के घर-घर में मादक दवाओं का प्रयोग फैल गया है। जिसके चलते पंजाब कि पूरी युवा पीढ़ी तबाह हो रही है। जिनमें हर वर्ग के युवा शामिल हैं। गरीब-अमीर का कोई भेद नहीं। उस वक्त पंजाब में अकाली दल की सरकार थी, तो आम आदमी पार्टी ने सरकार को इस तबाही के लिए जि़म्मेदार ठहराकर अपना चुनाव अभियान चलाया। इधर पिछले दस वर्षों से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, पर क्या ये सरकार दावे से कह सकती है कि दिल्ली में मादक पदार्थों की बिक्री सारे आम नहीं हो रही?

कुछ महीने पहले हरियाणा के सोनीपत में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्थानीय डिग्री कॉलेज के छात्रों को नशीली दवाओं के सेवन के विरुद्ध भाषण दे रहे थे। तभी एक छात्र ने उनसे पूछा कि हमारे कॉलेज के बाहर पान की दुकान पर नशीली दवाएँ रात-दिन बिकती हैं तो आपकी पुलिस क्या कर रही है? जब हर युवा को पता है कि उनके शहर में कहाँ-कहाँ नशीली दवाएँ बिकती हैं तो आपका पुलिस विभाग इतना नकारा कैसे है कि वो इन बेचनेवालों को पकड़ नहीं पाता। पुलिस अधिकारी निरुत्तर हो गये।

मेरे एक पत्रकार मित्र ने 1996 में मुझे बताया था कि देश के एक प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने के मुखिया के विरुद्ध मादक दवाएँ अवैध रूप से उत्पादन करने और अफगानिस्तान भेजने के आरोप पर उनकी जनहित याचिका सारे सबूतों के बावजूद दो दशकों से ठंडे बस्ते में पड़ी है। क्योंकि उस घराने के गहरे संबंध हर प्रमुख दल के बड़े नेताओं से हैं। सबको इस कांड का पता भी है। पर कोई कुछ नहीं करता।
उधर पिछले कुछ वर्षों से गुजरात के एक पोर्ट से बार-बार भारी मात्रा में नशीली दवाएँ पकड़ी जा रही हैं। पर इसके पीछे कौन है वो सामने नहीं आ रहा। आए दिन देश में ऐसी अनेकों खबरें आती रहती हैं कि करोड़ों के मूल्य के नशीले पदार्थ पकड़े जाते हैं। इन पकड़ी गई ड्रग्स की मात्रा इतनी ज़्यादा होती है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये ड्रग्स देश भर में वितरण के लिये ही आई हैं। पर ये कारोबार बिना रोक टोक जारी है। जबकि सिंगापुर में ड्रग्स के विरुद्ध इतना सख्त कानून है कि वहाँ ड्रग्स को छूने से भी ये लोग डरते हैं। क्योंकि पकड़े जाने पर सज़ा-ए-मौत मिलती है, बचने का कोई रास्ता नहीं।

गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, भोपाल, अमृतसर और चेन्नई, यूपी के हापुड़ और गुजरात के अंकलेश्वर तक ड्रग्स तस्करों का नेटवर्क का भांडाफोड़ हुआ है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 13 दिनों में 13,000 करोड़ रुपये कीमत की कोकीन और 40 किलो हाइड्रोपोनिक थाईलैंड मारिजुआना जब्त की। इतना ही नहीं 2004 से 2014 के बीच जब्त की गई ड्रग्स का मूल्य 5,900 करोड़ रुपए था, जबकि 2014 से 2024 के बीच जब्त की गई ड्रग्स का मूल्य 22,000 करोड़ रुपये है।

दूसरी तरफ़ दुनियाँ भर में दादागिरी दिखाने वाला अमेरिका जो ख़ुद को बहुत ताकतवर मानता है वहाँ ड्रग्स का खूब प्रचलन है। ज़ाहिर है ड्रग माफिया की पकड़ बहुत ऊँची है। यही हाल दुनियाँ के तमाम दूसरे देशों का है जहां इस कार्टल के विरुद्ध आवाज उठाने वालों को दबा दिया जाता है या ख़त्म कर दिया जाता है। चाहे वो व्यक्ति न्यायपालिका या सरकार के बड़े पद पर ही क्यों न हो। सब जानते हैं कि इन नशीली दवाओं के सेवन से लाखों घर तबाह हो जाते है। औरतें विधवा और बच्चे अनाथ हो जाते हैं। बड़े-बड़े घर के चिराग बुझ जाते हैं। पर कोई सरकार चाहें केंद्र की हो या प्रांतों की इसके ख़िलाफ़ कोई  ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाती।

सनातन धर्म का बड़े तीर्थ जगन्नाथ पुरी हो या पश्चिमी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र गोवा, हिमाचल प्रदेश के पर्यटक स्थल कुल्लू, मनाली हो या धर्मशाला, भोलेनाथ की नगरी काशी हो या केरल का प्रसिद्ध समुद्र तटीय नगर त्रिवेंद्रम, राजधानी दिल्ली का पहाडग़ंज इलाक़ा हो या मुंबई के फार्म हाउसों में होने वाली रेव पार्टियाँ, हर ओर मादक दवाओं का प्रचलन खुले आम हो रहा है। आज से नहीं दशकों से। हर आम और खास को पता है कि ये दवाएँ कहाँ बिकती हैं, तो क्या स्थानीय पुलिस और नेताओं को नहीं पता होगा। फिर ये सब कारोबार कैसे चल रहा है? जिसमें करोड़ों रुपये के वारे न्यारे होते हैं।

नशीली दवाओं में प्रमुख हैं: अफीम, पोस्त और इनसे बनने वाली मॉर्फिन, कोडीन, हेरोइन या सिंथेटिक विकल्प मेपरिडीन, मेथाडोन। इनकी भारी लोकप्रियता का कारण है कि इनके सेवन से भय, तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है। सदा असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहने वाले कलाकार और फिल्मी सितारों में ये इसीलिए जल्दी पैठ बना लेती हैं। इनमें से कुछ उत्पाद मेडिकल साइंस में भी चिकित्सा के लिये उपयोग किए जाते हैं। जैसे दर्द निवारक दवा बनाने के लिए।

पर इस छूट का गलत फ़ायदा उठाकर प्राय: दवा कंपनियाँ नशीली दवाओं के नेटवर्क का हिस्सा बन जाती हैं और अरबों रुपया कमाती हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस व्यापार को करने वाले न सिर्फ कानून का उल्लंघन कर रहे हैं बल्कि एक सामाजिक और नैतिक संकट को भी जन्म दे रहे हैं। ऐसे में यदि सरकार और संबंधित एजेंसियाँ सख़्ती नहीं दिखाएँगी तो ऐसे अपराध और अपराधी बढ़ते ही जाएँगे।
ये सब बंद हो सकता है अगर केंद्रीय और प्रांतीय सरकारें अपने कानून कड़े बनायें और उन्हें सख्ती से लागू करें। अगर हर जिले के पुलिस अधीक्षक को ये आदेश मिले कि उसके जिले में ड्रग्स की बिक्री होती पायी गयी तो उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाएगा।फिर देखिए कैसे नशीली दवाओं का व्यापार बंद होता है। पर देश के जनता के हित में  ऐसा सोचने वाले नेता हैं ही कहाँ? अगर होते तो तपोभूमि भारत “उड़ता भारत कैसे बनती ?”


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