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कनाडा में सिख समुदाय आतंकियों के दबाव से त्रस्त

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कनाडा में सिख समुदाय आतंकियों के दबाव से त्रस्त

भारत डोगरा
तेईस जून, 1985 को कनिष्क एअर इंडिया 182 विमान में उड़ते समय भयंकर विस्फोट हुआ जिससे हवाई जहाज अटलांटिक सागर में आयरलैंड के तटीय क्षेत्र के पास गिरा और उसमें सवार सभी 329 व्यक्ति मारे गए। इनमें से अधिकतर भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे। जिन परिवारों के सदस्य मारे गए आज भी उन्हें न्याय नहीं मिला। इसके अतिरिक्त, यह भी समय-समय पर प्राप्त होने वाले तथ्यों से स्पष्ट होता रहा है कि यदि कनाडा की गुप्तचर और पुलिस एजेंसियों ने समुचित कार्रवाई की होती तो बड़ी संभावना यह होती  कि इस हादसे को रोका जा सकता था।

कनाडा के पब्लिक सेफ्टी मंत्रालय ने ओंटारियो के पूर्व मंत्री बाब रे को इस त्रासदी की जांच का काम सौंपा था। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कनाडा गुप्तचर संस्थान (सीएसआईएस-कनाडियन सेक्युरिटी इंटेलीजेंस सर्विस) के अधिकारियों ने ऐसे दो खालिस्तानियों का पीछा किया जो उनके संदेह के दायरे में थे। दोनों एक टापूनुमा वीरान जंगली क्षेत्र में पहुंचे। यहां तक गुप्तचरों ने उनका पीछा किया। फिर जहां ये खालिस्तानी गए थे वहां से बड़े धमाके की आवाज आई। कोई बच्चा भी कहेगा कि इस धमाके की आवाज आने से पूछताछ की जरूरत और बढ़ गई थी पर इन गुप्तचरों ने ऐसा कुछ नहीं किया और आगे कोई कार्रवाई ही नहीं की। अब जब अन्य तथ्य सामने आ चुके हैं तो स्पष्ट है, जैसा कि जांच रिपोर्ट में भी कहा गया है, कि यह सुनसान इलाके में बम टेस्ट करने का प्रयास था क्योंकि दो वायुयानों में बम रखने की तैयारियां उस समय पूरे जोरों पर थीं। यदि समय पर इन खालिस्तानियों से भली-भांति पूछताछ कर ली जाती तो षडय़ंत्र को उसी समय रोक पाने की संभावना थी।
एक अन्य बड़ा मुद्दा है कि गुप्तचर एजेंसी सीएसआईएस ने पहले टेपों पर खालिस्तानी षडय़ंत्रकारियों की बहुत सी बातचीत रिकार्ड भी की थी और फिर इससे पहले कि इस रिकार्डिग का समुचित विश्लेषण हो पाता, इनको नष्ट कर दिया गया। जांच रिपोर्ट ने इस बारे में इस केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस जैसिफसन की टिप्पणी की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्होंने इसे ऐसी लापरवाही बताया था, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। आखिर, इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई, इस पर चर्चा हुई तो सीएसआईएस का यह पक्ष सामने आया कि उसके एक एजेंट ने खालिस्तानी षडय़ंत्रकारियों में घुसपैठ कर ली थी, हालांकि कनिष्क हादसे से तीन दिन पहले उसे अलग कर लिया गया। सीएसआईएस का पक्ष, जो प्रकाशित रिपोटरे में बताया गया है (जैसा बीबीसी की एक रिपोर्ट में भी छपा) कि उसने अपने इस एजेंट के बचाव के लिए टेप नष्ट किए।

पर ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एजेंट के पास जो जानकारी थी, उसका भरपूर उपयोग किया जाता तो इतना समय जरूर मिलता कि षडय़ंत्र का पता लगा कर उसे नाकाम कर दिया जाता। पर ऐसा नहीं हुआ। जांच रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जो जानकारी सीएसआईएस के पास होती थी वह कनाडियन पुलिस (आरसीएमपी) के साथ ठीक से शेयर नहीं की जाती थी। कनाडा के उच्च स्तर के कुछ सुरक्षा अधिकारियों ने इस बारे में गंभीर चिंता व्यक्त करनी आरंभ की कि कनाडा में बहुत से आतंकी संगठनों ने डेरा जमा लिया है। सीएसआईएस के पूर्व अध्यक्ष वार्ड एलकाक ने अपनी उच्चस्तरीय जानकारी के आधार पर सीनेट की एक विशेष समिति को बताया कि अमेरिका को छोड़ दें तो किसी भी अन्य देश की अपेक्षा कनाडा में अधिक आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। उन्होंने बताया कि उनका संस्थान सीएसआईएस की आतंक-विरोधी शाखा ऐसे 50 आतंकवादी संगठनों और इनसे जुड़े 350 व्यक्तियों की जांच कर रहा है। उन्होंने आगे बताया कि ये विभिन्न आतंकवादी संगठन आतंकवादी कार्रवाइयों में सहायता देते हैं, आतंकवाद के लिए धन एकत्र करते हैं, प्रोपेगंडा और असत्य (डिसइंफाम्रेशन) फैलाने के लिए विभिन्न समुदायों का दोहन-शोषण करते हैं, अप्रवासियों को डराते-धमकाते हैं, आतंकियों के लिए कनाडा में सुरक्षित शरण स्थलों की व्यवस्था करते हैं, आतंकियों की अमेरिका तक आने-जाने की व्यवस्था करते हैं, और अप्रवासियों की तस्करी करते हैं।

यह बयान कनाडा के फ्रेसर इंस्टीटय़ूट की अध्ययन रिपोर्ट में उपलब्ध है, जिसका शीषर्क है ‘कनाडा’ज इनएडिक्वेट रिस्पॉन्स टू टेररिज्म’। रिपोर्ट के लेखक हैं मार्टिन कोलाकोट। रिपोर्ट में बताया गया है कि विभिन्न खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों के अतिरिक्त अनेक अन्य तरह के आतंकवादी संगठन भी कनाडा में सक्रिय हैं, और इनका संबंध अनेक अन्य चर्चित आतंकवादी हमलों से भी जुड़ा रहा है। रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कई महत्त्वपूर्ण संदभरे में कनाडा की सरकार आतंकवाद के नियंत्रण के लिए असरदार कदम उठाने में असमर्थ रही है। रिपोर्ट ने बताया है कि खतरनाक आतंकी संगठनों पर सरकार प्रतिबंध नहीं लगा सकी और यहां तक कि ऐसे कुछ संगठन परोपकारी कार्य का आवरण लगा कर अपना प्रसार करते हैं, उस पर भी काफी समय तक रोक नहीं लग सकी। उनके विरुद्ध असरदार कार्रवाई करने के बहुत कम उदाहरण कनाडा में देखे गए हैं।

इतना ही नहीं, कुछ राजनीतिक दल और नेता भी अपने संकीर्ण स्वार्थी हितों के लिए ऐसी ढील देने की नीति अपनाते हैं। सीएसआईएस की रणनीतिक योजना के पूर्व मुख्य अधिकारी डेविड हैरिस से जब पूछा गया कि क्या कनाडा आतंकवादियों की सुरक्षित शरण स्थली बन रहा है, तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऐसी आशंका का बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां 50 आतंकवादी संगठनों की उपस्थिति है, जिनमें से अनेक प्रमुख आतंकवादी संगठन हैं। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक स्टीवर्ट बेल ने एक पुस्तक लिखी है, जिसका शीषर्क है-‘कोल्ड टैरर-कनाडा नरचर्स एंड एक्सपोटर्स टैररिज्म थ्रूआउट द र्वल्ड’। इसमें उन्होंने लिखा है कि कनाडा की आतंकी समस्याओं के कारण बहुत हिंसा हुई है, लोग मारे गए हैं। इससे कनाडा में समस्याएं बढ़ गई हैं, और कुछ समुदायों पर उग्रवादियों ने अपना नियंत्रण बढ़ा लिया है।

मेजर ग्रेग ले ने कनाडियन फोर्सेज कॉलेज के लिए एक अनुसंधान पत्र लिखा है, जिसका शीषर्क है, ‘द इवॉल्यूशन ऑफ टैररिज्म इन कनाडा-इन्क्रीज्ड थ्रेट इन अ कल्चर ऑफ इनडिफेरेंस’। इस अध्ययन में लिखा है कि आतंकियों की हिंसक और जबरदस्ती वाली प्रवृत्तियों से कनाडा के सिख समुदाय की समस्याएं और दुख-दर्द बढ़ गए हैं। बाब रे, जो आनटेरियो के मंत्री रह चुके थे, को कनिष्क त्रासदी की जांच का कार्य सौंपा गया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सिख समुदाय आतंकियों के दबाव से त्रस्त और परेशान है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जरूरी है कि कनाडा सरकार आतंकवाद पर नियंत्रण रखने की अपनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी भली-भांति निभाए।


सत्ता और पद के नशे से लड़खड़ाता सिस्टम

भूपेन्द्र गुप्ता
जब भी समाज घातक घटनाओं को नजरअंदाज करता है और उन पर कोई स्टैंड नहीं लेता तो वे नजीर बन जातीं हैं। अठारह साल पहले स्व जुगलकिशोर बागरी ने माध्यमिक शिक्षा मंडल के एक बाबू क़ा कालर पकड़ लिया था वे तब जल संसाधन  मंत्री थे। उसी काल में एक और मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने भी एक डाक्टर को थप्पड़ जड़ दिया था।घटनायें तो भुला दीं गईं किंतु विकृति बढ़ती गई है।

देश  आज जिस राह पर है वह निश्चित ही चौंकाने वाला है।प्रतिक्रियायें हिंसक और उन्मादी होती जा रहीं हैं। सीमायें अपने आप टूट रहीं हैं। ऐसा क्यों हो रहा है।
पूर्व म़ें हुईं तीन घटनाओं की तरह एक ही सप्ताह में  फिर से वैसी ही  नई घटनायें सामने आ गई हैं।जो झकझोरतीं हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने अपने सार्वजनिक भाषण में अल्पसंख्यकों को कठमुल्ला कहते हुए उन्हें देश के लिये खतरनाक बताया  है।वे कथित रूप से  बहुसंख्यकों के अनुसार देश चलाने की बात भी कहते हैं। उनके विरुद्ध महाअभियोग लाने की बात हो रही है।यह रेडिकिलाईजेशन (कट्टरता) की नई नजीर है।

इससे भी खतरनाक घटना गाजियाबाद के जिला जज द्वारा छोटी सी बात पर वकीलों से हुए वाद विवाद में जिला न्यायाधीश और वकीलों के बीच में कथित झूमा झटकी की है, जहां पुलिस द्वारा वकीलों की जबरदस्त पिटाई के बाद वकीलों द्वारा अदालत के बाहर पुलिस चौकी में आग लगा देने की है।यह दोनों घटनायें न्यायपालिका के आचरण पर रोशनी डालती हैं अगर न्यायाधीश इतने ही प्रतिक्रियावादी हो जायेंगे तब  निष्पक्ष न्याय की परिकल्पना ही व्यर्थ है।कल तक तो न्याय की मूर्ति की आंखों पर पट्टी थी लेकिन आज तो पट्टी हटा दी गई है ,तब जजों और वकीलों का यह कथित व्यवहार स्पष्ट संकेत है कि प्रतिक्रिया का उत्तेजक जहर पूरे कुंए में घुल चुका है। एक राष्ट्रीय दल के बड़े नेता के विरुद्ध विदिशा में शर्मनाक मामले में एफआईआर दर्ज हुई है।उसकी भतीजी ने ही उस पर यौन शोषण और रेप के आरोप लगाये हैं।हालांकि भाजपा ने उसे पार्टी से निष्कासित कर दिया है किंतु यह वासनागत उन्माद की पराकाष्ठा है जिसमें रिश्ते तार तार हो  गये हैं।पारिवारिकता के रिश्तों को भी अब संशय की नजर से देखा जायेगा।इसके पूर्व भी पन्ना में रिश्तों को कलंकित करने वाला मामला दर्ज हुआ था।संयोग से वे भी इसी दल के नेता थे।क्या रसूख और सत्ता का गुमान दैहिक शोषण की आजादी का कारण बन रहा है,या यह केवल समाज को निरंतर उत्तेजक बनाये रखने के राजनीतिक तमाशों का अनिवार्य परिणाम है।

रतलाम में मध्यप्रदेश की एक नवजात पार्टी के इकलौते विधायक और एक शासकीय डाक्टर के बीच खुल्ले गाली गलौज का वीडियो भी अपनी अपनी भूमिका में मगरूरियत का प्रमाण है।जो डाक्टर विधायक को अशोभनीय गालीयां दे रहा हो उसका व्यवहार मरीजों से कैसा होगा?दूसरी तरफ क्या विधायक को भी नियमित कार्यों में इतना अतिक्रमण करना चाहिये कि  सरकारी कर्मचारी भी आक्रामक प्रतिक्रिया करने लगें।यह परिस्थिति खतरनाक है।  जब  सत्ता और पद का नशा सर चढ़ कर बोलता  है तो सिस्टम टूटता है और विकृतियां पनपने लगतीं हैं। प्रदेश में घर से भागकर कथावाचक अघोरी और साधु बनने के लिये 13 नावालिग बच्चे उज्जैन में पकड़े गये हैं।उनमें से लगभग सभी ने बताया है कि वे रीलें देख देखकर भक्ति और लोकप्रियता के लिये घर छोड़ आये हैं।रील का नशा और झूठी चमक दमक किस तरह से समाज में तात्कालिक सफलता और अवसरों की तरफ भागने के लिये प्रेरित कर रही है ।तय है कि हमारा सामाजिक ताना-बाना इन मासूम महत्वाकांक्षाओं को समाधान देने मे असफल है।

मजदूरों के खाते खुलवाकर साइबर अपराधियों को खाते बेचने वाले गिरोह पकड़े जा रहे है।जल्दी अरबपति बनने की ख्वाहिश,अभावों से जूझने की बजाय गरीबों की मजबूरी और अशिक्षा को लूट का साधन बना लेने की कलाकारियां खतरनाक हो रहीं हैं।पोस्ट आफिस में एक बुजुर्ग पेशनर महिला कज खाते से लाखों रुपया उड़ा लेने वाले पोस्ट आफिस कर्मचारी को भी क्या लालच की गिनीज बुक का रिकार्ड बना रहा है।ये विकृतियां एक जगह नहीं वल्कि समाज के हर हिस्से में दिखाई दे रहीं हैं।
हमें एक ऐसे समाज में धकेला जा रहा है जहां थाट और एक्शन के बीच कोई टाईम डिस्टेंस नहीं है।क्रिया के बाद सोचा जा रहा है कि ऐसा क्यों किया गया?ऐसे काल प्रवाह में जब समाज फंसता है तो पछताने का भी अवसर नहीं मिलता,क्या पछतावे के पहले इस आक्रामकता को रोका जा सकता है। समाज सुधारक,लोकप्रिय कथावाचक ,राजनीतिक नेतृत्व और कार्यपालिका इस पर विचार करें,हालांकि देर तो हो ही चुकी है।


बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न दुर्भाग्यपूर्ण

अनिल जैन
जिस बांग्लादेश के निर्माण में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी, अब उसी के साथ भारत के रिश्ते अभूतपूर्व तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। वहां चार महीने पहले निर्वाचित सरकार के तख्तापलट और उसके बाद अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में शरण ले लेने के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते तो तल्ख हुए ही हैं, साथ ही बांग्लादेश में रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमलों की घटनाओं से भी दोनों देशों के रिश्तों में खासी कटुता आ गई है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बांग्लादेश में ऐसे लोगों की बड़ी तादाद हो गई है जो अपने देश की पहचान 1971 के संदर्भ में नहीं, बल्कि 1947 के संदर्भ में देखने लगे हैं। देश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस तो संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी कह चुके हैं, ‘बांग्लादेश बना, क्योंकि लोगों का उदारवाद, बहुलवाद एवं धर्मनिरपेक्षता में गहरा यकीन था। अब दशकों बाद नई पीढ़ी उन मूल्यों और उसूलों पर पुनर्विचार कर रही है, जैसा कि 1952 में हुआ था, जब हमारे देशवासियों ने अपनी मातृ भाषा बांग्ला की रक्षा का संकल्प लिया था।’ यानी 1952 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मजहबी आधार पर बने राष्ट्र (पाकिस्तान) को नकार कर भाषा एवं संस्कृति पर आधारित बहु-धर्मीय राष्ट्र को स्वीकार किया था। लेकिन अब लोग 1947 की तरफ देख रहे हैं, जब भारत का मजहबी आधार पर विभाजन हुआ था।
अब बात चूंकि मुस्लिम पहचान पर आ गई है, तो स्वाभाविक नतीजा यह है कि वहां धार्मिंक अल्पसंख्यकों के समान अधिकार की आकांक्षा पर चोट की जा रही है। इस रूप में पूरब की ओर भी पाकिस्तान की धारणा साकार हो रही है। यह घटनाक्रम ऐसे वक्त पर उभर कर सामने आया है, जब भारत उसे वैचारिक चुनौती देने के लिहाज से बेहद कमजोर स्थिति में है। चूंकि भारत में भी अब सत्ता प्रेरित मुख्य विमर्श हिन्दू-मुसलमान पर केंद्रित है, लिहाजा बांग्लादेश में हमेशा से मौजूद रही और अब सिर उठा कर सामने आ चुके महजबी कट्टरपंथी ताकतों को भी तर्क और ताकत मिल रही है।

वैसे शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से वहां मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने भी पाकिस्तान से रिश्तों में गर्माहट लाने की दिशा में ऐसे कई ठोस कदम उठाए हैं, जो भारत के हित में नहीं माने जा सकते। पिछले महीने ही पाकिस्तान का एक मालवाहक पोत कराची से चल कर बांग्लादेश के दक्षिणपूर्वी तट स्थित चटगांव बंदरगाह पर पहुंचा। 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के बाद से दोनों देशों में पहली बार सीधा समुद्री संपर्क हुआ है।

इससे पहले उनके बीच समुद्री व्यापार सिंगापुर या कोलंबो के जरिए होता था। खुद बांग्लादेश ने इस घटना को पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों में महत्त्वपूर्ण कदम की शुरु आत बताया है। कहा है कि इस रूट पर समुद्री संपर्क बनना दोनों देशों के बीच सप्लाई चेन को आसान बनाएगा, परिवहन के समय में कमी आएगी और आपसी व्यवसाय के लिए नये अवसरों के दरवाजे खुलेंगे।

जाहिर है कि यह सीधा समुद्री संपर्क पाकिस्तान और बांग्लादेश के राजनयिक रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव का संकेत है। इसके पहले खबर आई थी कि दोनों देश एक परमाणु सहयोग समझौते पर बातचीत कर रहे हैं, जिसके तहत पाकिस्तान परमाणु बिजली संयंत्र लगाने में बांग्लादेश की मदद करेगा। पूरा घटनाक्रम भारत के लिए चिंता का पहलू है। आम संबंधों के साथ दोनों देशों के उग्रवादी तत्वों के बीच संपर्क बनना भी आसान हो सकता है। लेकिन इस मामले में भारत कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं दिखता।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ को लेकर वहां की अंतरिम सरकार को अंतरराष्ट्रीय कठघरे में खड़ा करने की रणनीति पर राष्ट्रीय आम सहमति बनाने की बजाय भारत में सियासी पार्टयिां खासकर सत्तारूढ़ पार्टी राजनीतिक लाभ उठाने के अभियान में जुटी हुई हैं। भाजपा और उसके सहयोगी उग्र हिन्दूवादी संगठनों की ओर से देश में जगह-जगह बांग्लादेश के खिलाफ और वहां रह रहे हिन्दुओं के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। बांग्लादेश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करके उसे सबक सिखाने की बातें हो रही हैं। कहा जा रहा है कि पूरे बांग्लादेश को निबटाने के लिए भारत के दो राफेल विमान ही काफी हैं।

बांग्लादेश को बिजली, पानी और दूध की आपूर्ति बंद कर देने की बातें कही जा रही हैं। मगर भारत में यह सब करने और कहने से बांग्लादेश के हिन्दुओं का भला होने की बजाय और नुकसान ही हो रहा है। यही वजह है कि बांग्लादेश नेशनिलस्ट पार्टी की के सदस्य गायेर चंद्र रॉय को कहना पड़ा है कि उनके देश के मामलों में भारत दखलंदाजी करने और बांग्लादेश के राजनीतिक दलों को नियंत्रित करने की कोशिशों से बाज आए। भारत में बांग्लादेश विरोधी उग्र प्रदर्शनों और बयानों के अलावा एक खतरनाक और विभाजनकारी सिलसिला और जारी है, जो आग में घी का काम कर रहा है। यह सिलसिला है-हर पुरानी मस्जिद और दरगाह के नीचे मंदिर ढूंटने का। आए दिन किसी न किसी प्राचीन मस्जिद और दरगाह के नीचे मंदिर होने का दावा किया जा रहा है। उपासना स्थल कानून, 1991 के मुताबिक 15 अगस्त, 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धार्मिंक समुदाय के उपासना स्थल को किसी दूसरे धार्मिंक समुदाय के उपासना स्थल में नहीं बदला जा सकता।

इस कानून की अनदेखी करते हुए निचली अदालतें भी बगैर सोचे-समझे ऐसी मस्जिदों और दरगाहों के पुरातात्विक सर्वे के आदेश धड़ल्ले से जारी कर रही हैं। हर मस्जिद और दरगाह के नीचे शिवलिंग खोजने और मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के अभियान से जो नफरत का माहौल आज भारत में बना हुआ है, वैसा ही हिन्दुओं के खिलाफ उन्मादी माहौल अब बांग्लादेश में भी है, जो कुछ महीनों पर पहले तक बिल्कुल भी नहीं था। कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमानों को परेशान करने के लिए या बांग्लादेश में हिन्दुओं के उत्पीडऩ के विरोध के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उससे बांग्लादेश के हिन्दुओं की दुारियां कम होने की बजाय बढ़ ही रही हैं।


आईटी और डिजिटल नवाचार में आगे बढ़ता मध्यप्रदेश

सोनिया परिहार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में, आईटी और डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में मध्यप्रदेश हर दिन नए आयाम स्थापित कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करते हुए, प्रदेश ने अपने शासकीय विभागों और नागरिकों के लिए तकनीकी प्रगति और डिजिटल सुविधाओं का ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जो पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है। राज्य डिजिटल भारत के सपने को साकार करते हुये डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। इसमें मध्यप्रदेश राज्य इलेक्ट्रोनिक विकास निगम (एमपीएसईडीसी) और मध्यप्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (एमपीसीएसटी) अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।

म.प्र. में विकसित सॉफ्टवेयर ने देश में बनाई पहचान:मध्यप्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम (एमपीएसईडीसी) की अगुवाई में प्रदेश ने डिजिटल प्रौद्योगिकी में कई उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। संपदा 2.0 और साइबर तहसील जैसे प्लेटफॉर्म नागरिक सेवाओं को सरल बना रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश की पहचान को भी मजबूत कर रहे हैं। संपदा 2.0 ने संपत्ति पंजीकरण की प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर ई-पंजीकरण, ई-स्टाम्प, स्टाम्प शुल्क की गणना और दस्तावेज़ खोज जैसे कार्यों को घर बैठे संभव बनाया गया है। साइबर तहसील ने राजस्व न्यायालयों की प्रक्रियाओं को पारदर्शी और सुव्यवस्थित करते हुए भ्रष्टाचार को कम करने और जनता को त्वरित सेवाएं प्रदान करने का सफल प्रयास किया गया है।

निवेश और स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहन:सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), सूचना प्रौद्योगिकी-सक्षम सेवाएँ (आईटीईएस), इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन और विनिर्माण (ईएसडीएम) और डेटा केंद्रों की परिवर्तनकारी क्षमता को स्वीकार करते हुए, राज्य में दूरदर्शी “आईटी, आईटीईएस और ईएसडीएम निवेश प्रोत्साहन नीति 2023” बनाई गई है। राज्य के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए यह नीति डिज़ाइन की गई है। जबलपुर रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस पॉलिसी के दिशा निर्देश लॉन्च किए थे। नीति में निवेशकों को वित्तीय और गैरवित्तीय सहायता प्रदान करने के प्रावधान किए गए है। सभी वित्तीय सहायता, आवश्यक अनुमतियाँ, अनुमोदनों, आवेदनों और किसी भी अन्य संबंधित प्रक्रियाओं के लिए पूर्ण रूप से डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम भी बनाया गया है। राज्य के युवाओं को स्वरोजगार के लिये प्रोत्साहित करने और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए स्टार्ट-अप नीति-2022 लागू है।

राज्य में एवीजीसी नीति-2024 भी लागू की जा रही है, जिससे एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स (एवीजीसी) क्षेत्र में नई संभावनाओं का द्वार खुला है। राज्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा आदि को ध्यान में रखते हुए ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (त्रष्टष्ट) नीति 2024 भी तैयार की गई है। विकसित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर:वर्तमान में प्रदेश में 2 हजार से अधिक आईटी/आईटीईएस एवं ईएसडीएम इकाइयां कार्यरत हैं, जिनमें एमपीएसईडीसी में पंजीकृत 650 इकाइयां हैं, जिन्हें राज्य की नीतियों का लाभ मिला है। इन इकाइयों का टर्न ओवर 10 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष से अधिक है। देश की 50 से अधिक बड़ी आईटी एवं आईटीईएस इकाइयां मध्यप्रदेश में स्थापित हैं। प्रदेश से हर वर्ष 500 मिलियन डॉलर का निर्यात आईटी से जुड़ी कंपनियों के माध्यम से होता है। राज्य में 5 आईटी स्पेशल इकोनॉमिक जोन हैं। राज्य सरकार द्वारा 15 आईटी पार्क बनाए गए हैं, जिनसे डेढ़ लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। राज्य में 1200 से अधिक तकनीकी स्टार्ट-अप स्थापित हैं, जिनमें से दो “नीव क्लाउड और शॉप किराना” यूनिकॉर्न कंपनी हैं।

आईटी/आईटीएस/ईएसडीएम और डेटा सेंटर क्षेत्र में बढ़ता निवेश:राज्य में निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए आयोजित रीजनल इंडस्ट्री कॉनक्लेव और इंटरैक्टिव सेशन में आईटी/आईटीएस/ईएसडीएम और डेटा सेंटर क्षेत्र में निवेशकों ने विशेष उत्साह दिखाया। इस क्षेत्र में निवेश से रोजगार से नए अवसर सृजित होंगे। सागर में 1700 करोड़ से अधिक निवेश से डेटा स्थापित किया जा रहा है। बेंगलुरु में आयोजित इंटरएक्टिव सेशन ऑन इन्वेस्टमेंट के दौरान, एमपीएसईडीसी ने भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर संघ,, इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसोसिएशन ऑफ जिओस्पेशल इंडस्ट्रीज और टाई ग्लोबल जैसे प्रमुख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय उद्योग संघों के साथ समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। जबलपुर, नर्मदापुरम, मुंबई, कोयंबटूर, बेंगलुरु में कई बड़ी कंपनियों से करोड़ों के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए। यूके-जर्मनी से एसआरएएम-एमआरएएम ग्रुप द्वारा 25000 करोड़ रूपये निवेश से सेमी कंडक्टर और साइंस टेक्नोलॉजी पार्क विकसित करने का प्रस्ताव प्राप्त हुआ।

जीआईएस तकनीक का बढ़ता उपयोग:राज्य में जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) तकनीक का भी व्यापक उपयोग हो रहा है। 5त्र के लिए योजना, अनुमोदन और जीआईएस आधारित सेवाएं प्रदान करने के लिए “गति-शक्ति संचार पोर्टल” विकसित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए सर्वेक्षण, निगरानी और कार्यान्वयन के लिए “जल रेखा” जैसे पोर्टल कार्य कर रहे है। जीआईएस द्वारा तैयार किये गये लोकपथ मोबाइल ऐप और वेब एप्लिकेशन से पूरे राज्य में सडक़ों से संबंधित शिकायतों को दर्ज करने एवं उनके निराकरण को मॉनिटर करने की सुविधा दी जा रही है। शोध और शिक्षा के क्षेत्र में नया अध्याय:मध्यप्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (एमपीसीएसटी) के अंतर्गत राज्य में विज्ञान और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। उज्जैन तारामंडल में 3डी-4्य प्रोजेक्शन सिस्टम का अपग्रेडेशन और वराह मिहिर खगोलीय वेधशाला डोंगला का ऑटोमेशन इस दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं।

प्रशासनिक डिजिटलीकरण और पारदर्शिता:सरकार ने ई-एचआरएमएस पोर्टल और अन्य डिजिटल मंचों के जरिए मानव संसाधन और सरकारी प्रक्रियाओं को डिजिटाइज्ड किया है। मुख्यमंत्री प्रगति पोर्टल ने विभिन्न योजनाओं और निर्माण कार्यों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग को सुगम बनाया है। आईटी क्षेत्र में विगत एक वर्ष में प्राप्त उपलब्धियों ने डिजिटल प्रौद्योगिकी से प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई है और नागरिकों के जीवन को भी सरल और सुविधाजनक बनाया है। इन नवाचारों ने राज्य को आईटी निवेशकों के लिए एक आदर्श स्थान बना दिया है। प्रदेश डिजिटल भारत के सपने को साकार करते हुये वैश्विक आईटी मानचित्र पर अपनी अलग पहचान स्थापित कर रहा है।


सरकार ओसीसीआरपी की साख पर सवाल उठा रही

हरिशंकर व्यास
कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर आरोप है कि वे देश में विकास को बाधित कर रहे हैं, निवेश रोकना चाहते हैं, देश को बदनाम कर रहे हैं आदि आदि। सवाल है कि क्या गौतम अडानी के खिलाफ कोई बात कहना देश के खिलाफ बोलना हो गया? पहले तो भाजपा और केंद्र सरकार के इकोसिस्टम ने यह नैरेटिव बनाया कि सरकार के खिलाफ या नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलना देश के खिलाफ बोलना होता है। उन्होंने प्रधानमंत्री और सरकार को ही देश बना दिया। अब क्या नरेंद्र मोदी वाली स्थिति ही गौतम अडानी की भी देश में बना रहे है, जो उनके खिलाफ बोलने को भी देश के खिलाफ बोलना कहा जाएगा?

इसी तरह दूसरा सवाल यह है कि ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट यानी ओसीसीआरपी की किसी रिपोर्ट का हवाला देना देश विरोधी कैसे हो गया? यह संस्था तो पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के मामले खोलती है। इसका मतलब है कि संस्था भ्रष्टाचार विरोधी है। तो भ्रष्टाचार विरोधी संस्था भारत विरोधी संस्था कैसे हो गई? संस्था की रिपोर्ट भ्रष्टाचार के खिलाफ है और हम कह रहे हैं कि भारत के खिलाफ है। भाजपा का राहुल गांधी के ऊपर सबसे ज्यादा हमला इस बात को लेकर है कि उन्होंने ओसीसीआरपी की रिपोर्ट का बार बार हवाला दिया है। इस संस्था ने पेगासस से जासूसी का मामला खोला था और अडानी समूह द्वारा शेयर बाजार में हेराफेरी का भी खुलासा किया था। संस्था ने जो खुलासा किया उसके मेरिट पर बात करने की बजाय सरकार संस्था की साख पर सवाल उठा रही है।

बहरहाल, राहुल गांधी इस संस्था की रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार को कठघऱे में खड़ा कर रहे हैं तो उनके एजेंडे पर सवाल उठाया जा रहा है और उनको देश विरोधी बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वे यह मुद्दा नहीं उठाएंगे तो दुनिया इसके बारे में नहीं जानेगी। ओसीसीआरपी वैश्विक संस्था है, जिसमें दुनिया भर के पत्रकार जुड़े हैं यह रिपोर्ट दुनिया भर में देखी जाती है। इसका मतलब है कि राहुल गांधी मुद्दा नहीं भी उठाएं तब भी दुनिया के लोग जानेंगे कि भारत में क्या हो रहा है। वैसे राहुल गांधी ने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि वे कारोबार विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे एकाधिकारवाद के विरोधी हैं यानी दो चार लोगों के हाथ में सब कुछ सौंप देने का वे विरोध करते हैं। राहुल ने यह भी कहा कि अच्छे और ईमानदार उद्योगपति उनसे मिलते हैं तो उनकी बातों से सहमत होते हैं। उन्होंने कहा कि एकाधिकारवादी पूंजीपति राष्ट्रीय संस्थाओं के लिए ठीक नहीं हैं, प्रतिस्पर्धा के लिए ठीक नहीं हैं और छोटे उद्यमियों के लिए भी ठीक नहीं हैं।


इस बार का चुनाव केजरीवाल सरकार की असलियत पर होगा

अजीत द्विवेदी
दिल्ली का इस बार का चुनाव पिछले तीन चुनावों से अलग होने जा रहा है। ऐसा जमीन पर भले नहीं दिखाई दे या लोकप्रिय धारणा अभी ऐसी नहीं दिख रही हो लेकिन आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल जिस तरह से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं उससे लग रहा है कि जमीनी स्थितियां बदल गई हैं या बदल रही हैं। पहले तीन चुनावों की तरह केजरीवाल न तो अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के आंदोलन की लहर पर सवार हैं, न लोकपाल बनाने के संकल्प के आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं, न आम आदमी होने का दावा करके चुनाव लड़ रहे हैं और न ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने के दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। इस बार का चुनाव उनके और उनकी सरकार की असलियत पर होगा।

उनके राजकाज की असलियत हवा और पानी का प्रदूषण है, यमुना की गंदगी है तो स्थायी विकास के कार्यों का ठप्प होना और दिल्ली के घाटे की अर्थव्यवस्था की ओर बढऩा है। ध्यान रहे अरविंद केजरीवाल ने पहला चुनाव आंदोलन की लहर पर लड़ा था और बदलाव की चाह रखने वाले लोगों ने उनको वोट दे दिया था। उस समय लगातार तीन बार की कांग्रेस की सरकार से लोग उबे भी थे और निर्भया आंदोलन ने भी लोगों का मतदान व्यवहार तय करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। तब केजरीवाल की पार्टी 28 सीट के साथ दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि 32 सीट जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कांग्रेस को आठ सीटें मिली थीं।

कांग्रेस ने उस समय सबसे बड़ी रणनीतिक भूल की और आप को समर्थन देकर केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया। अरविंद केजरीवाल ने लोकपाल के नाम पर 49 दिन के बाद इस्तीफा दे दिया। अगला चुनाव लोकपाल और मुफ्त बिजली, पानी के नाम पर हुआ तो आदर्शवादी और आकांक्षी लोगों ने एक साथ होकर केजरीवाल को वोट दिया और वे 67 सीटें जीत गए। अगला चुनाव ‘मुफ्त की रेवड़ी’ और अच्छे स्कूल, अस्पताल के नाम पर हुआ और फिर आम आदमी पार्टी चुनाव जीत गई।

लेकिन 10 साल के शासन के बाद हर चीज की हकीकत लोगों के सामने है। ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और अन्ना हजारे को लोग भूल चुके हैं। युवा मतदाताओं का एक बड़ा समूह ऐसा है, जिसको न तो आंदोलन याद है और न अन्ना हजारे याद हैं। इसी तरह लोकपाल भी अब किसी को याद नहीं है। वह तो खुद केजरीवाल को भी याद नहीं है। अब तो भ्रष्टाचार रोकने के लिए मोबाइल से वीडियो बना लेने जैसे बेवकूफी भरे सुझावों के विज्ञापन भी दिल्ली सरकार नहीं दे रही है। इसी तरह केजरीवाल अब मफलर लपेट, खांसते हुए आम आदमी नहीं हैं, बल्कि 50 करोड़ रुपए के खर्च से बनाए उनके ‘शीशमहल’ की तस्वीरें और वीडियो दिल्ली की जनता देख चुकी है। ऐसे ही ‘मुफ्त की रेवड़ी’ में कुछ भी अनोखापन नहीं रह गया है।

एक के बाद एक राज्यों में सत्तारूढ़ दल या विपक्षी पार्टियां ढेर सारी वस्तुएं और सेवाएं मुफ्त में बांटने का वादा करके चुनाव जीत रही हैं। जनता को पता है कि जो जीत कर आएगी वह मुफ्त की चीजें देगा। किसी पार्टी की हिम्मत नहीं है कि ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बंद कर दे। इसलिए अरविंद केजरीवाल का यह भय दिखाना कि भाजपा आएगी तो मुफ्त बिजली, पानी और बस सेवा बंद कर देगी, बहुत कारगर नहीं होने वाला है।

सो, पिछले तीन चुनावों में जीत के जो फॉर्मूले थे वो या तो एक्सपोज हो गए हैं या अप्रासंगिक हो गए हैं। केजरीवाल की अब तक की जीत में एक बड़ा फैक्टर कांग्रेस पार्टी की कमजोरी का रहा है। कांग्रेस को 2013 के विधानसभा चुनाव में 24.60 फीसदी वोट आया था। अगले चुनाव में यानी 2015 में यह घट कर 9.70 फीसदी रह गई। यानी कांग्रेस का वोट 15 फीसदी कम हुआ। यह पूरा वोट और अलग से 10 फीसदी अतिरिक्त वोट आप को मिला, जिससे वह 2013 के 29.50 से बढ़ कर 2015 में 54 फीसदी वोट पर पहुंच गई। भाजपा के वोट में 0.8 फीसदी की कमी आई यानी उसने अपना वोट आधार बचाए रखा। 2020 के चुनाव में कांग्रेस और कमजोर हुई।

उसका वोट घट कर साढ़े पांच फीसदी पर आ गया, जबकि आम आदमी पार्टी को लगभग उतना ही वोट आया, जितना 2015 में आया था। इस बार फर्क यह था कि कांग्रेस का जो चार फीसदी के करीब वोट घटा वह भाजपा को चला गया। उसका वोट 33 फीसदी के औसत से बढ़ कर साढ़े 38 फीसदी हो गया। पांच फीसदी वोट बढऩे से भाजपा की पांच सीटें बढ़ीं।

दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत घटते जाने का हिसाब सीधे तौर पर उसकी राष्ट्रीय  हैसियत से जुड़ा है। वह 2013 में केंद्र की सत्ता में थी तो दिल्ली विधानसभा में उसे 24 फीसदी से ज्यादा वोट मिला। 2015 के दिल्ली चुनाव के समय तक वह बुरी तरह हार कर 44 लोकसभा सीट वाली पार्टी रह गई थी, जिसे मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा भी नहीं मिला था। अगले चुनाव यानी 2020 में भी उसकी कमोबेश यही स्थिति थी। वह 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी थी। परंतु 2024 के चुनाव में उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। उसने 99 सीटें जीती हैं और देश भर में उसकी वापसी की चर्चा शुरू हो गई है। भले वह हरियाणा और महाराष्ट्र में हार गई, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस की ओर रूझान दिखने लगा है। यह अरविंद केजरीवाल के लिए चिंता की बात है।

केजरीवाल की राजनीतिक सफलता मुस्लिम और प्रवासी वोटों पर टिकी हैं। अगर उसका एक हिस्सा कांग्रेस की ओर जाता है तो अरविंद केजरीवाल के लिए मुश्किल होगी। इसलिए वे कांग्रेस से मुस्लिम नेताओं को तोड़ कर उन्हें उम्मीदवार बना रहे हैं। लेकिन इससे नाराज आप के मुस्लिम नेता कांग्रेस और ऑल इंडिया एमआईएम की तरफ जा रहे हैं। आप विधायक अब्दुल रहमान कांग्रेस में गए हैं तो पार्षद ताहिर हुसैन एमआईएम में गए हैं। इस बीच आम आदमी पार्टी के महरौली के विधायक नरेश यादव कुरानशरीफ की बेअदबी के केस में दोषी ठहराए गए हैं। उनको दो साल की सजा हुई लेकिन केजरीवाल ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

मुसलमानों में इससे भी अरविंद केजरीवाल के प्रति संशय बढ़ा है। तभी आप, कांग्रेस और एमआईएम के बीच मुस्लिम वोट बंटता है या एकमुश्त आप की ओर जाता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। मुस्लिम के साथ दलित वोट का रूझान भी निर्णायक होगा। दिल्ली में दलित आबादी बहुत बड़ी है और उसका एकमुश्त वोट आप को मिलता रहा है। परंतु पिछले पांच साल में उसके दो बड़े दलित चेहरे राजकुमार आनंद और राजेंद्र पाल गौतम पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं।

केजरीवाल भले अपनी पदयात्रा में हर जगह कह रहे हों कि सभी 70 सीटों पर वे खुद लड़ रहे हैं और लोगों को उम्मीदवारों को नहीं देखना है लेकिन हकीकत यह है कि वे उम्मीदवारों पर सबसे ज्यादा मेहनत कर रहे हैं क्योंकि उनको अपने चेहरे पर भरोसा नहीं रहा। वे छोटे छोटे प्रबंधन में जुटे हैं। बाहर से लाकर नेताओं को टिकट दे रहे हैं। अपने विधायकों की टिकट काट रहे हैं या उनकी सीट बदल रहे हैं और मुफ्त की नई रेवडिय़ों की घोषणा कर रहे हैं। 2013 में उन्होंने कांग्रेस को उसी दिन हरा दिया था, जिस दिन ऐलान किया था कि वे नई दिल्ली सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ेंगे।

लेकिन 2024 में उसी दिन कमजोर दिखने लगे, जिस दिन उन्होंने अपने नंबर दो मनीष सिसोदिया की सीट पटपडग़ंज से बदल कर जंगपुरा कर दी। अरविंद केजरीवाल के नंबर दो नेता, जिन्होंने कथित तौर पर दिल्ली में शिक्षा क्रांति की है, जो कथित तौर पर दिल्ली के बच्चों के ‘मनीष चाचा’ हैं, जिनको केंद्र सरकार ने कथित तौर पर सिर्फ इसलिए जेल भेजा ताकि दिल्ली की शिक्षा क्रांति को रोका जा सके, वे उस सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे, जहां से तीन बार जीते हैं। वहां से चुनाव लडऩे के लिए एक कोचिंग संचालक को लाया गया है, जिनकी रील्स सोशल मीडिया में काफी लोकप्रिय होती हैं। वे थोक के भाव कांग्रेस और भाजपा के पूर्व विधायकों को अपनी पार्टी की टिकट दे रहे हैं। बहरहाल, इसमें संदेह नहीं है कि अरविंद केजरीवाल अब भी दिल्ली में सबसे बड़ी ताकत हैं।

वे लगातार दो विधानसभा चुनावों में 50 फीसदी से ज्यादा वोट लेकर जीते हैं। परंतु इस बार वह स्थिति नहीं दिख रही है। इस बार किसी लहर की बजाय छोटे छोटे प्रबंधनों से और उम्मीदवार बदल कर केजरीवाल सत्ता विरोधी लहर को थामना चाहते हैं तो मुफ्त की नई रेवडिय़ों की घोषणाओं से अपने वोट आधार को खुश करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने ऑटो वालों के लिए नई योजनाओं की घोषणा की है। आने वाले दिनों में कुछ और नई घोषणाएं होंगी। ऐसी घोषणाएं तो भाजपा भी करेगी। तभी मुकाबला हर सीट पर होगा और जमीनी प्रबंधन व वोट डलवाने की जिसकी मशीनरी बेहतर होगी वह जीतेगा।


भाजपा की निर्णायक लड़ाई का निष्कर्ष

अजीत द्विवेदी
संसद के शीतकालीन सत्र में हर दिन राजनीति का नया रंग देखने को मिल रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने किसी हाल में अडानी का मुद्दा नहीं छोडऩे का फैसला किया है तो दूसरी ओर सत्तारुढ़ दल यानी भाजपा भी निर्णायक लड़ाई की तैयारी में है। भाजपा की निर्णायक लड़ाई का निष्कर्ष यह है कि लोकसभा में यानी जनता के सदन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ‘गद्दार’ हैं, सबसे बड़े विपक्षी पार्टी कांग्रेस की संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी भी देश विरोधी हैं और अमेरिका दुश्मन देश है। भाजपा ने संसद की बहस और चर्चाओं के साथ साथ प्रेस कांफ्रेंस करके भी यह नैरेटिव स्थापित किया है। जब भाजपा के सांसदों ने आरोप लगाए तब भी ये आरोप गंभीर थे लेकिन अब तो केंद्र सरकार के मंत्रियों ने भी इन आरोपों को दोहराया है। तभी यह सवाल गंभीर हो गया है कि क्या सचमुच नेता प्रतिपक्ष ‘गद्दार’ या देश विरोधी हैं और क्या सचमुच अमेरिका भारत का दुश्मन है?

पहले अमेरिका पर लगाए गए आरोपों की चर्चा करें तो उसमें कई बातों का खुलासा हो गया है। भाजपा के सांसदों ने जब कहा कि ओसीसीआरपी यानी ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल है और इस संस्था को अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस और अमेरिकी विदेश विभाग की फंडिंग मिलती है तब अमेरिका ने इस पर अपना पक्ष रखा था। अमेरिका ने कहा था कि वह मीडिया की स्वतंत्रता का चैंपियन रहा है और इस तरह के किसी भी संगठन पर दबाव नहीं बनाता है। इतना ही नहीं अमेरिका ने इसे निराशाजनक बताया था कि भारत में सत्तारूढ़ दल इस किस्म के आरोप लगा रहा है। अब सवाल है कि भाजपा ने ये आरोप किस आधार पर लगाए थे? भाजपा का आरोप फ्रांस के मीडिया समूह ‘मीडियापार्ट’ की एक रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कथित तौर पर यह कहा गया था कि ओसीसीआरपी को अमेरिकी विदेश विभाग की फंडिंग है। अब ‘मीडियापार्ट’ ने जवाब दिया है और कहा है कि भारत में सत्तारूढ़ दल यानी भाजपा ‘फेक न्यूज’ फैला रही है। उसका कहना है कि उसकी रिपोर्ट को गलत तरीके से उद्धृत किया जा रहा है, अपने मनमाफिक राजनीतिक नैरेटिव सेट करने के लिए।

अमेरिका और फ्रांस के मीडिया समूह दोनों के जवाब के बाद भी भाजपा ने आरोप लगाना बंद नहीं किया है। भाजपा के सांसद अब भी दावा कर रहे हैं कि अमेरिका की फंडिंग से चल रहा एक संगठन भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। अब सवाल है कि उस संस्था यानी ओसीसीआरपी की भारत विरोधी गतिविधियां क्या हैं? ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट ने पेगासस के इस्तेमाल की जानकारी दी थी और एक रिपोर्ट में अडानी समूह पर शेयर बाजार में जोड़तोड़ का आरोप लगाया था। यही बात हिंडनबर्ग रिसर्च ने भी कही थी। सोचें, इसमें से कौन सी बात भारत विरोधी हो गई? अगर स्वतंत्र पत्रकारों के किसी समूह ने जासूसी के लिए पेगासस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की रिपोर्ट दी या किसी कंपनी विशेष पर जोड़तोड़ का आरोप लगाया तो इसे देश विरोधी कैसे माना जा सकता है? लेकिन भाजपा का कहना है कि यह संस्था भारत के आर्थिक विकास को रोकना चाहती है। घूमा फिरा कर यह बात भी कही जा रही है कि राहुल गांधी के इशारे पर यह काम हो रहा है।

इसका मतलब है कि राहुल गांधी इतने पावरफुल हैं कि वे अमेरिका जाते हैं और जॉर्ज सोरोस व अमेरिकी विदेश विभाग को इसके लिए तैयार करते हैं कि वे भारत विरोधी गतिविधियां चलाएं? भारत में आर्थिक विकास को बाधित करें? अगर ऐसा है तो फिर पूरी दुनिया में प्रधानमंत्री का डंका किस बात का बज रहा है? फिर तो डंका राहुल गांधी का बज रहा है जो वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश से मनचाहा काम करवा रहे हैं! फिर जो बाइडेन और डोनाल्ड ट्रंप किस बात के प्रधानमंत्री के दोस्त हैं, जो उनके देश से राहुल गांधी के कहने पर भारत विरोधी गतिविधियां चल रही हैं? एक बड़ा सवाल यह भी है कि अमेरिका को दुश्मन बता कर भारत को क्या हासिल होगा? पिछले कई दशकों से अमेरिका के साथ भारत के संबंध स्थिर और दोस्ताना रहे हैं। अगर इतना दोस्ताना नहीं भी होता तो किसी स्वतंत्र संस्था की रिपोर्ट के आधार पर किसी देश को दुश्मन या विरोधी बताना कोई अच्छी कूटनीति नहीं होती है। तभी यह सवाल भी है कि अमेरिका पर हमला सिर्फ ओसीसीआरपी में उसकी कथित फंडिंग की वजह से है या कहीं इसके पीछे अमेरिकी अदालत द्वारा गौतम अडानी व सागर अडानी सहित आठ लोगों को आरोपी बनाने, अमेरिकी अखबारों में भारत के बड़े नेताओं के नाम आने और अमेरिकी एजेंसियों द्वारा भारतीय नागरिकों को मोस्ट वांटेड और भगोड़ा बताने का भी हाथ है? जो हो यह एक गंभीर मामला है और सत्तारूढ़ दल को सोच समझ कर इस मामले में आरोप लगाने चाहिए।

दूसरी बात लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी को देश विरोधी बताने का है। राहुल को ‘गद्दार’ बताने का आधार यह है कि वे अमेरिका जाते हैं तो इल्हान उमर और कुछ अन्य भारत विरोधी लोगों से मिलते हैं और सोनिया गांधी इसलिए देश विरोधी हैं क्योंकि वे फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन एशिया पैसिफिक की सह अध्यक्ष हैं। यह संस्था कश्मीर को कथित तौर पर भारत से अलग करने की बात करती है। सोचें, नेता प्रतिपक्ष का पद एक संवैधानिक पद होता है और उस पद पर बैठे एक निर्वाचित नेता को भाजपा के सांसद संबित पात्रा ने कुछ लोगों से उनकी मुलाकातों के आधार पर ‘शीर्ष स्तर का ‘गद्दार’ कहा। इससे पहले राहुल गांधी पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार, अक्षमता आदि के आरोप लगते थे। उनको बालक बुद्धि तो अब भी कहा जाता है। संसदीय कार्य मंत्री ने सोमवार, नौ दिसंबर को ही उनको बालक बुद्धि कहा। लेकिन वही बालक बुद्धि देश के खिलाफ साजिश रच रहा है और ‘गद्दार’ है, यह पहली बार कहा जा रहा है। जाहिर है कि इस बार राहुल गांधी ने कुछ ज्यादा बड़ी तकलीफ दे दी है।

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अनाप शनाप बातें नहीं कहते हैं। वे भी प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा गिराने वाली बातें कहते हैं। लेकिन वे वही बातें कहते हैं, जो आजादी के बाद से अब तक कही जाती रही हैं। जो दूसरे प्रधानमंत्रियों के लिए कही गईं वैसी ही बातें वे भी कहते हैं। परंतु यह पहली बार है, जब सत्तारूढ़ दल ने नेता प्रतिपक्ष पर इतना बड़ा हमला किया है और नेता प्रतिपक्ष को ‘गद्दार’ ठहराया। निश्चित रूप से ऐसा कहने के लिए उसके पास कुछ बड़ा और पुख्ता सबूत होना चाहिए। राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए या संसद में उनका मुंह बंद कर देने के लिए इस तरह के आरोप नहीं लगाए जा सकते हैं। इस तरह के आरोप लगाए गए हैं तो केंद्र सरकार की एजेंसियों को उनकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। कायदे से जांच पहले होनी चाहिए थी और उसके बाद आरोप लगाए जाने  चाहिए थे। लेकिन अगर आरोप पहले लगा दिए गए हैं और केंद्र सरकार के मंत्री दावा कर रहे हैं कि आरोप का कंटेंट गंभीर है तो उसकी गहराई से जांच होनी चाहिए। सिर्फ जुबानी जंग नहीं होनी चाहिए और न इतने गंभीर आरोप का सिर्फ राजनीतिक इस्तेमाल होना चाहिए।


कांग्रेस को पुनर्जीवित नहीं कर पा रहे हैं राहुल

अजीत द्विवेदी
इस साल की शुरुआत में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की एक बैठक में जब अध्यक्ष पद के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम आगे आया तो उनको राहुल गांधी ने यह कह कर रोका था कि इसके लिए तो ममता बनर्जी से बात करनी होगी। विडम्बना देखिए कि थोड़े समय के बाद नीतीश कुमार और ममता बनर्जी दोनों ‘इंडिया’ ब्लॉक से बाहर हो गए और अब ममता बनर्जी ही अध्यक्ष पद की दावेदार हो गई हैं! समय का चक्र इतनी तेजी से घूमा है कि कांग्रेस के नेता समझ नहीं पा रहे हैं कि वे इस स्थिति का सामना कैसे करें। महज छह महीने पहले चार जून को जब लोकसभा के नतीजे आए तो कांग्रेस और राहुल गांधी की जय जयकार हो रही थी। परंतु उसके बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनाव ने सारी तस्वीर बदल दी। जम्मू कश्मीर, हरियाणा और महाराष्ट्र की हार ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी के विपक्ष का सर्वमान्य नेता होने की जो धारणा बनी थी वह सवालों के घेरे में आ गई है। एक के बाद एक विपक्षी पार्टियां राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठा रही हैं।
इसमें सबसे दिलचस्प टिप्पणी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव की थी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के नेता नहीं हैं। ‘इंडिया’ के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े हैं। पर सवाल है कि खडग़े कब नेता चुने गए? इस साल लोकसभा चुनाव से पहले 13 जनवरी को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की जो आखिरी बैठक हुई थी वह वर्चुअल थी और उसमें खडग़े को अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी थी। लेकिन उसके बाद कभी इस बात की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई कि खडग़े विपक्षी गठबंधन के अध्यक्ष हैं। 13 जनवरी की बैठक में सिर्फ नौ पार्टियों के नेता शामिल हुए थे। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को खुद खडग़े ने न्योता दिया था लेकिन वे उस बैठक में शामिल नहीं हुए थे। सो, जाहिर है कि खडग़े अनौपचारिक रूप से भले ‘इंडिया’ ब्लॉक का नेतृत्व करते हों लेकिन उनको नेता कभी नहीं घोषित किया गया।

फिर सवाल है कि रामगोपाल यादव ने क्यों कहा कि राहुल नेता नहीं हैं और खडग़े नेता हैं? इसलिए कहा क्योंकि चाहे समाजवादी पार्टी हो या तृणमूल कांग्रेस हो, उनको राहुल गांधी से समस्या है। यह समस्या रामगोपाल यादव की आगे कही बातों से जाहिर हो गई। उन्होंने कहा कि चाहे लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का, कांग्रेस कहीं भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही है। उन्होंने भाजपा के साथ आमने सामने के मुकाबले में कांग्रेस की कमजोरी का खासतौर से जिक्र किया। यह भी याद रखने की बात है कि पिछले साल दिसंबर में ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खडग़े का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था। तभी यह अनायास नहीं है कि आज खडग़े को रामगोपाल यादव ‘इंडिया’ ब्लॉक का नेता बता रहे हैं।

बहरहाल, राहुल गांधी के नेतृत्व पर जो सवाल उठ रहे हैं उसके दो पहलू हैं। एक पहलू यह है कि वे कांग्रेस में जोश नहीं भर पा रहे हैं। कांग्रेस को पुनर्जीवित नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस को रिइन्वेंट करके भाजपा से लडऩे लायक नहीं बना पा रहे हैं। वे वैचारिक और सैद्धांतिक धरातल पर तो भाजपा को टक्कर दे रहे हैं लेकिन जमीनी राजनीति और चुनाव में भाजपा का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। सो, विपक्षी पार्टियां और कांग्रेस नेताओं का भी एक बड़ा हिस्सा मान रहा है कि राहुल गांधी से नहीं हो पाएगा। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद वे न तो कांग्रेस को भाजपा से लडऩे लायक बना सकते हैं और न उनकी कमान में विपक्षी गठबंधन भाजपा को प्रभावी रूप से टक्कर दे पाएगा। तभी विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि ‘इंडिया’ ब्लॉक बना रहे लेकिन उसकी कमान किसी और नेता के हाथ में रहे। यह बात ‘इंडिया’ ब्लॉक में शामिल रामगोपाल यादव भी चाहते हैं और उससे बाहर रह कर राजनीति कर रही ममता बनर्जी भी चाहती हैं। इन सभी नेताओं को पता है कि भाजपा से लडऩे के लिए एक बड़े गठबंधन की जरुरत है, जिसमें कांग्रेस का होना भी जरूरी है। परंतु साथ ही ये नेता यह भी चाहते हैं कि कोई ज्यादा परिपक्व और चुनावी राजनीति में भाजपा को परास्त करने वाला नेता इस गठबंधन का नेतृत्व करे।

इस सचाई को समझना होगा कि सारी विपक्षी पार्टियां सत्ता चाहती हैं और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से मुक्ति चाहती हैं। वह तभी होगा, जब केंद्र में उनकी सरकार बनेगी। उनको लग रहा है कि राहुल गांधी के हाथ में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन की कमान रही तो ऐसा नहीं हो पाएगा। राहुल के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों का दूसरा पहलू यह है कि कई विपक्षी पार्टियां राहुल गांधी के साथ काम करने में असहज हैं। उनको लग रहा है कि राहुल व्यावहारिक राजनीति करने में सक्षम नहीं हैं। वे आदर्शवादी बातें ज्यादा करते हैं और व्यावहारिक राजनीति के दांवपेंच उन्होंने अभी तक नहीं सीखे हैं। विपक्षी पार्टियों और कांग्रेस के भी अनेक नेताओं व प्रादेशिक क्षत्रपों को राहुल गांधी की टीम के साथ काम करने में मुश्किल आती है। उनकी टीम के ज्यादातर सदस्य अराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं। राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन का महासचिव केसी वेणुगोपाल को बनाया है, जिनको देश के ज्यादातर राज्यों की जमीनी राजनीति की समझ नहीं है। हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस की हार के मुख्य कारणों में एक कारण केसी वेणुगोपाल भी हैं। हालांकि इस कारण की समीक्षा कभी नहीं होगी। वे खुद को इतना असुरक्षित महसूस करते हैं कि राहुल के आसपास किसी को फटकने नहीं देते। हर समय राहुल को घेरे रहते हैं। उनकी सहमति के बगैर राहुल से मिलना या बात करना नामुमकिन सा हो गया है।

तभी जैसे ही ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने ‘इंडिया’ का गठन किया है और मौका मिले तो इसका नेतृत्व करना चाहेंगी, वैसे ही महाराष्ट्र से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश तक कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों ने उनका स्वागत करना शुरू कर दिया। खुद शरद पवार ने ममता बनर्जी का समर्थन किया और उनका स्वागत करने की बात कही। उद्धव ठाकरे की पार्टी के संजय राउत और अखिलेश यादव की पार्टी के रामगोपाल यादव ने ममता बनर्जी का समर्थन किया। कांग्रेस के ऑल वेदर फ्रेंड राजद के नेता तेजस्वी यादव ने भी ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने में सक्षम बताया। इसके पीछे कारण यह है कि सभी विपक्षी पार्टियां संघर्ष करते करते थक गई हैं। उनको सत्ता चाहिए, जो कि राहुल की कमान में संभव नहीं दिख रहा है। नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के मुकाबले में पलड़ा हमेशा नरेंद्र मोदी का भारी रहता है। तभी भाजपा की ओर से हमेशा मोदी बनाम राहुल का मुकाबला बनाया जाता है तो राहुल गांधी का इकोसिस्टम भी इसे प्रोत्साहित करता है। हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि राहुल की जगह ‘इंडिया’ ब्लॉक की ओर से ममता बनर्जी या किसी और चेहरा आ जाएगा तो जीत की गारंटी हो जाएगी। परंतु ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेता कुछ नया आजमाने की जरुरत समझ रहे हैं। वैसे ममता बनर्जी ने कांग्रेस की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए यह भी कहा कि उनका इरादा पश्चिम बंगाल से बाहर जाने का नहीं है। इस तरह उन्होंने कांग्रेस और राहुल को आश्वस्त किया कि वे दिल्ली नहीं आ रही हैं। परंतु कांग्रेस नेता इसका मतलब और इसके खतरे जानते हैं।

बहरहाल, अगर कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र और हरियाणा में खराब प्रदर्शन नहीं किया होता तो शायद यह बात नहीं उठती। परंतु अब यह बात उठी है तो विपक्षी पार्टियां इसे किसी तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना चाहेंगी और दूसरी ओर कांग्रेस चुनावों के अगले चक्र यानी 2026 और 2027 तक इसे खींचना चाहेगी। ध्यान रहे 2026 में पश्चिम बंगाल के साथ केरल, तमिलनाडु, असम और मणिपुर के चुनाव हैं। उसमें कुछ राज्यों में कांग्रेस जीत सकती है। तभी वह उन चुनावों तक राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ ब्लॉक के पुनर्गठन का मामला टाले रखने की कोशिश करेगी।


खून-खराबे और बर्बादी भरे असद के शासन का अंत

श्रुति व्यास
सीरिया के राष्ट्रपति असद भाग गए है। देश में सेना, प्रशासन और सरकार खत्म है। बांग्लादेश की हसीना वाजेद के हालिया पतन के बाद एक और तानाशाह के पतन की कहानी लिखी जा रही है। राष्ट्रपति के राजधानी दमिश्क से भागने के साथ ही, असद परिवार का सीरिया पर पिछले 50 सालों से चला आ रहा राज खत्म हो गया है।
रविवार को सुबह-सुबह विद्रोही बलों ने दमिश्क में जयकारे लगाए। जश्न मनाते हुए हवा में गोलियां चलाईं। चारों ओर ‘अल्लाह-हु-अकबर’ की आवाजें गूंजने लगी। विद्रोही जनता को सीरिया पर नियंत्रण कायम करने में केवल 11 दिन लगे। विद्रोहियों के उत्तर-पश्चिमी सीरिया से अपने हमले शुरू करने के बाद से ही असद की सेना पीछे हटती गई, उन्हें विदेशी मदद न के बराबर हासिल हो सकी और उनके वफादारों ने देश छोडक़र भागना शुरू कर दिया। विद्रोहियों के लिए रास्ता साफ होता गया और एक हफ्ते के अंदर देश के पांच प्रांतों की राजधानियों पर असद का नियंत्रण खत्म था। उथलपुथल और अराजकता सीरिया के लिए नई बात नहीं हैं। वहां के लोग मुसीबतों के बीच जीने के आदी हैं। बशर अल-असद के जुल्मों के चलते वहां हालात पहले से ही बहुत खराब थे। खून-खराबा बड़े पैमाने पर हो रहा था और देश रहने लायक नहीं बचा था। फिर रविवार की सुबह देश देश पर इस्लामिक विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया।

हालाँकि इससे असद के 24 साल के निर्मम शासन का अंत हुआ है, लेकिन देश एक नर्क से निकल कर दूसरे नर्क में धकेल दिए जाने के मानिंद है। पिछली बार 2011 में असद गंभीर संकट में फंसे थे जब सीरिया के कई शहरों में जनता ने उनके सत्ता छोडऩे की मांग करते हुए बगावत की थी। उस समय असद ने सरकार की ताकत का इस्तेमाल अपनी ही जनता के खिलाफ करते हुए विरोध को सख्ती से कुचला था। धीरे-धीरे इस विरोध ने गृहयुद्ध का रूप ले लिया। असद ने अपनी डरावनी जेलों से जेहादी कैदियों को रिहा करके उनकी खिलाफत कर रही ताकतों और जेहादियों के बीच टकराव पैदा करने का प्रयास किया। उसके बाद उन्होंने अपने मुख्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी रूस और लंबे समय के इलाकाई दोस्त ईरान की सहायता ली।

ईरान ने लेबनान के शक्तिशाली हथियारबंद संगठन हिज्बुल्लाह के साथ मिलकर उन्हें सैनिक सहायता उपलब्ध करवाई जिससे वे देश पर दुबारा अपना नियंत्रण कायम करने में कामयाब रहे। इस गृहयुद्ध में तीन लाख से अधिक लोग मारे गए। कुछ अनुमानों के मुताबिक मरने वालों की संख्या इससे दोगुनी थी।  दसियों हजार लोग जेलों में बंद हैं। सन 2011 से लेकर आज तक कैद किए गए लोगों में से करीब एक लाख या तो गायब हो गए या उन्हें गायब कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों के मुताबिक, इन लोगों को योजनाबद्ध ढंग से क्रूर यातनाएं दी गईं। करीब 1.20 करोड़ लोग अपने घर छोडऩे को मजबूर हुए।देश में कई वर्षों तक युद्ध चलता रहा और इस दौरान सीरिया के बड़े शहरों पर असद का नियंत्रण बना रहा।

मगर उत्तर-पश्चिम के कुछ पहाड़ी इलाकों में हयात तहरीर अल-शाम (एचईएस), जिसने 2017 में अलकायदा से नाता तोड़ लिया था, का कब्जा रहा। यह इलाका बाकी दुनिया से कटा हुआ था। यह संगठन असद के लिए बहुत मामूली खतरा नजर आता था किंतु उसने अचानक आक्रमण किया और कुछ ही दिनों में अल्लेपो पर कब्जा कर लिया। सीरिया के दूसरे सबसे बड़े शहर अल्लेपो में विद्रोहियों के कब्जे के कुछ ही दिनों बाद एचटीएस नेता अबू मोहम्मद अल-जोलानी लड़ाकों के घेरे में शहर के प्राचीन किले की सीढिय़ों से शान से नीचे उतरे, जहां उत्साहित भीड़ ने उनका स्वागत किया। जोलानी के पूर्व में अलकायदा से संबंध रहे हैं, जिस कारण अमेरिका ने अभी भी उन पर एक करोड़ डालर का इनाम रखा हुआ है। लेकिन जनता के बीच उसकी सतत मौजूदगी और अपने समर्थकों से सीधे संवाद करने के कारण वे इस विद्रोह के नेता बतौर देखे जाने लगे हैं। राष्ट्रपति के रूप में अपने आखिरी घंटों के दौरान असद ने हालात पर काबू पाने की हरचंद कोशिश की। चारों ओर से घिर जाने के बाद भी उन्होंने अरब देशों से मदद की गुहार लगाना जारी रखा।

कई स्त्रोतों के मुताबिक उन्होंने यूएआई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायेद – जो एचटीएस जैसे इस्लामिक समूहों से नफरत के लिए जाने जाते हैं –  से भी मदद की भीख माँगी और उन्होंने मिस्र, जार्डन और कई अन्य देशों से भी। लेकिन कोई इस हारी हुई लड़ाई में उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। अब सीरिया पर इस्लामिक विद्रोहियों का कब्जा है। विद्रोही गठबंधन में कई इस्लामिक कट्टरंपथी और नरम धड़े शामिल हैं, जो आपसी मतभेदों के बावजूद असद शासन, इस्लामिक स्टेट और ईरान-समर्थित लड़ाकों से युद्ध करने के मामले में एकमत थे।

एचटीएस और सीरियन नेशनल आर्मी (एसएनए), जिसमें विभिन्न विचारधाराओं वाले दर्जनों संगठन सम्मिलित हैं, को तुर्की धन और हथियार मुहैया करवा रहा है।
सीरिया पर असद का राज खत्म होना तुर्की के लिए फायदेमंद है। तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यब अर्दोग़ान ने सीरिया में आए बदलाव का स्वागत किया है।शक नहीं कि एचटीएस पर सबसे अधिक प्रभाव तुर्की का ही रहेगा। जल्द ही अमेरिका के राष्ट्रपति बनने वाले डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को इस झमेले से दूर रखना चाहते हैं। “इस लड़ाई से हमारा कोई लेनादेना नहीं है,”  उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है। इसी तरह रूस की प्राथमिकता तरतूस में अपने नौसेना अड्डे को बचाए रखना होगा, जो भूमध्य सागर में उसका इकलौता बंदरगाह है। मगर जिस प्रश्न का उत्तर मिलना बाकी है वह यह है कि क्या सीरियाईओं को अंतत: अपने देश का पुनर्निर्माण करने का मौका मिलेगा? अभी तो वहां का माहौल बैचेनी और डर से भरा हुआ है।

इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस्लामिक संगठन एचटीअस तुर्की के काबू में रहेगा, या तुर्की, एचटीएस को उस हमले को रोकने का हुक्म दे सकेगा जिस हमले में एचटीएस को उसकी उम्मीद से ज्यादा कामयाबी हासिल हुई है। एचटीएस के पास इतने संसाधन नहीं हैं जितने सीरिया जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश का शासन चलाने के लिए जरूरी हैं। हालांकि एचटीएस ने ईसाईयों, अलावातियों और अन्य अल्पसंख्यक समूहों को भरोसा दिलाया है कि वे सुरक्षित रहेंगे लेकिन इस बात की काफी संभावना है कि इनमें से कुछ देश छोडक़र चले जाएं। फिलहाल, सीरियाईओं और सारी दुनिया के लिए राहत की सबसे बड़ी बात यह है कि खून-खराबे और बर्बादी भरे असद के शासन का अंत हो गया है।


खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी

प्रो. लल्लन प्रसाद
अक्टूबर, 2024 में महंगाई दर 6.21 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले 14 महीने का सबसे ऊंचा स्तर है, यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की 4-6% की सीमा, जो अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित मानी जाती है, के ऊपर है, जो चिंता का विषय है। खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

यह स्थिति ऐसे में है जब अधिकांश खाद्य पदार्थों की पैदावार कम नहीं हुई है। एक अनुमान के अनुसार वितरण की अव्यवस्था के कारण लगभग 20% गल्ला उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता जिनको उसकी आवश्यकता है। फर्जी राशन कार्ड और राशन कार्ड के दुरुपयोग और काले बाजार में गल्ला बेचने की घटनाएं आम हैं। व्यापारियों और अमीर किसानों द्वारा गल्ले का स्टॉक बढ़ा कर कीमतों को प्रभावित करने पर सरकारी नियंत्रण कमजोर है।

तेजी से बढ़ती आबादी के कारण खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ रही है। इसमें संदेह नहीं किंतु कीमतें उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। कुछ खाद्य पदाथरे की मांग-पूर्ति में बड़ा अंतर है, जिसके कारण उनकी कीमतों पर लगाम लगाना सरकार के लिए मुश्किल हो रहा है जैसे दालें, मौसमी सब्जियां, फल आदि। शाकाहारी लोगों की थालियां ही महंगी नहीं हुई हैं, वे लोग भी जो मांस, मछली, चिकन आदि का सेवन करते हैं, बढ़ती कीमतों से त्रस्त हैं।

खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त रोजमर्रा के उपयोग की चीजें-घी, तेल, साबुन, मसाले और किराने के अधिकांश सामान महंगे होते जा रहे हैं, जो लोगों की जेब पर भारी पड़ रहे हैं। कीमतों में वृद्धि के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यालय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति सितम्बर, 2024 में बढ़ कर 5.4 9% हो गई। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए मुद्रास्फीति दर क्रमश: 5.87% और 5.05% थी।

अक्टूबर के आंकड़े और भी निराशाजनक थे, महंगाई दर 6.21% पर पहुंच गई, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह 6.68% और शहरी क्षेत्रों के लिए 5.62त्न थी। शहर वालों की अपेक्षा गांव के लोगों पर महंगाई की मार अधिक देखी गई। रिजर्व बैंक ने महंगाई की इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए अल्पकालीन ऋण दर को बदलने से मना कर दिया और सरकार को सुनिश्चित करने को कहा कि मुद्रास्फीति मार्जिन को चार प्रतिशत पर लाने की कोशिश करे।

गेहूं की कीमत पिछले कुछ वर्षो से लगातार तेजी से ऊपर जा रही हैं। 2010 में गेहूं की औसत कीमत 1100 रुपये प्रति क्विंटल थी जो 2015-16 में 1450 पर आ गई, अक्टूबर, 2024 में यह 2700 के ऊपर पहुंच गई। किसानों को इसका लाभ मिला किंतु उतना नहीं जितना अपेक्षित था क्योंकि इनपुट कीमतें खाद, बीज, डीजल, भाड़ा, श्रम, सभी महंगे होते गए। सरकार ने 2024-25 के लिए गेहूं की न्यूनतम खरीद दर 2425 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की  जिसे किसान बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आम उपभोक्ता गेहूं की बढ़ती कीमतों से त्रस्त हैं। गरीबी में आटा गीला की कहावत चरितार्थ हो रही है। दालें शाकाहारी खाने में प्रोटीन की मुख्य स्रोत हैं, उनकी कीमतें पिछले कई वर्षो से लगातार बढ़ती जा रही हैं।

2020 में अरहर की दाल 80 रुपये प्रति किलो थी जो अब 180 प्रति किलो के लगभग है। अधिकांश दालों की खुदरा कीमत बाजार में 100 रुपये प्रति किलो के ऊपर है। दुनिया के दालों के कुल उत्पादन में भारत का हिस्सा 25% है, किंतु यह मांग से कम है, आयात की आवश्यकता पड़ती है। सब्जियों की कीमतें तो मौसम के अधीन रहती हैं, जिन पर जलवायु परिवर्तन का असर बराबर देखा जा रहा है।

पिछले कुछ महीनों से टमाटर, आलू, प्याज आदि की कीमतें आसमान छू रही हैं। आटा, दाल, सब्जी और मसालों की कीमतों में लगातार बढ़त घर के खाने की थाली दिनोंदिन महंगी करती जा रही है, औसतन 10% प्रति वर्ष से अधिक की वृद्धि हो रही है। ढाबों से लेकर रेस्टोरेंट, होटल सभी में खाना महंगा होता जा रहा है। मांस, मछली, चिकन, अंडे की कीमतों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। दूध उत्पादन में विगत वर्षो में अच्छी वृद्धि हुई है किंतु साथ ही कीमतें भी बढ़ी हैं। 2018-19 में भारत में दूध का उत्पादन 180 मिलियन टन के लगभग था जो 2023-24 में बढ़ कर 240 मिलियन के ऊपर पहुंच गया। इस बीच, दूध की सभी बड़ी कंपनियों ने कई बार कीमतों में वृद्धि की। देसी घी, खोवा और उनसे बनने वाली मिठाइयों की कीमतें भी बढ़ती जा रही हैं।

खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, सोना-चांदी, आभूषणों, प्रसाधन के सामानों आदि की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी आम आदमी को प्रभावित करता है। 2020 में 14.2 केजी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत सब्सिडी बिना 590 रुपये के लगभग थी, जो 2019 में 680 हो गई और वर्तमान में 800 के करीब है, विभिन्न राज्यों में कीमतों में कुछ अंतर है क्योंकि टैक्स की दरें एक सी नहीं हैं। पेट्रोल-डीजल कीमतों में भी इसी कारण राज्यों में अंतर है। इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करती हैं, जिनमें उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। इनकी कीमतों में बढ़त पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है, चीजों को महंगी कर देती है क्योंकि ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ जाता है, किराया भाड़ा महंगा हो जाता है। रेल, रोड, हवाई यातायात सभी महंगे हो जाते हैं। पांच वर्षो पूर्व दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 60 रुपये प्रति लीटर थी जो आज 95 के लगभग है। सोने की खपत विश्व में सबसे ज्यादा भारत में है। 2020 में 10 ग्राम 24 कैरट सोने का दाम 48600 रुपये था जो इस समय 74000 के करीब है।

महंगाई वैश्विक समस्या है। सिर्फ  भारत की नहीं है। महंगाई के मामले में भारत विश्व में दसवें स्थान पर है। कहावत है कि अर्थशास्त्र का इतिहास महंगाई का इतिहास है। इसमें कोई संदेह नहीं। हर व्यक्ति अपने जीवन में यह महसूस करता है। चाहे किसी भी देश का हो। पिछले कुछ वर्षो में भारत में महंगाई की अधिकतम दर 13.9%, 1991 में दर्ज की गई थी। आज भारत में महंगाई 6% से कुछ ऊपर है, जापान, चीन, सऊदी अरब में तीन प्रतिशत के लगभग है, जबकि रूस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली और यूके में 10त्न के ऊपर है, तुर्की और अज्रेटीना में 83% तक की महंगाई दर्ज की गई। दिवालिया होने के कगार पर पहुंचे देशों में महंगाई चरम सीमा पर पहुंच जाती है जैसे श्रीलंका में हुआ था और पाकिस्तान में हो रहा है। महंगाई पर नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका है उत्पादन में वृद्धि एवं प्रभावशाली विपणन-वितरण व्यवस्था।


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