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इस साल की गर्मी ने तोड़ा रिकॉर्ड, बिजली की मांग भी आसमान छू रही है

Category Archives: ब्लॉग

इस साल की गर्मी ने तोड़ा रिकॉर्ड, बिजली की मांग भी आसमान छू रही है

6.1 करोड़ यूनिट से अधिक बिजली की मांग ने बढ़ाई बिजली कटौती की आशंका

प्रियांश कुकरेजा

इस साल की गर्मी बहुत ज्यादा तेज़ हो रही है, जिससे तापमान लगातार बढ़ रहा है और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी मुश्किल हो गई है। दोपहर होते ही शहर की सड़कें सुनसान हो जाती हैं क्योंकि लोग गर्मी से बचने के लिए घरों में ही रहने लगते हैं। इस वजह से एसी, कूलर और पंखे ज़्यादा इस्तेमाल होने लगे हैं, जिससे बिजली की खपत बहुत बढ़ गई है। बिजली विभाग के अनुसार पूरे राज्य में बिजली की मांग 6.1 करोड़ यूनिट से भी ज्यादा हो गई है, जो अब तक सबसे ज़्यादा है। इतनी ज़्यादा बिजली की मांग के कारण कई जगहों पर बिजली कटौती हो रही है और लोगों को लाइट नहीं मिल रही। बिजली की मांग बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, जैसे ग्लोबल वार्मिंग, तेज़ी से बढ़ती आबादी, शहरों का बढ़ना, और गर्मियों में बिजली के उपकरणों का ज़्यादा इस्तेमाल। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम में अनियमितता बढ़ गई है, जिससे गर्मी और तेज़ हो गई है। तेजी से बढ़ते तापमान के मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना, पेड़ों की कटाई, फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, और समुद्र व हवा के पैटर्न में बदलाव हैं। बिजली विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे बिजली का इस्तेमाल केवल ज़रूरी कामों के लिए करें और बेवजह बिजली न जलाएं ताकि बिजली सबके लिए पर्याप्त रहे। विभाग ने बिजली कटौती को नियंत्रित करने के लिए योजना बनाई है ताकि बिजली का भार सही तरीके से बाँटा जा सके। इस समस्या का समाधान निकालने के लिए हमें ऊर्जा बचाने की आदत डालनी होगी, जैसे कि बिजली बचाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल करना, सोलर पैनल और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का अधिक से अधिक उपयोग करना, और स्मार्ट तकनीक के ज़रिए बिजली की आपूर्ति को बेहतर बनाना होगा। साथ ही, हमें अपने शहरों को पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा-कुशल बनाना होगा ताकि भविष्य में इस तरह की बिजली और गर्मी की समस्या से बेहतर तरीके से निपटा जा सके। अगर हम सब मिलकर बिजली बचाएंगे और पर्यावरण का ध्यान रखेंगे, तो हम गर्मी और बिजली की इस बड़ी चुनौती को आसानी से सामना कर पाएंगे।


देहरादून स्मार्ट सिटी मिशन: विकास की ओर एक स्मार्ट कदम

तकनीक, सुविधाएं और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर राजधानी को बनाया जा रहा है आधुनिक — लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं

प्रियांश कुकरेजा 

देहरादून स्मार्ट सिटी मिशन, जो भारत सरकार की स्मार्ट सिटी योजना के तहत 2017 में शुरू हुआ, उत्तराखंड की राजधानी को एक आधुनिक, पर्यावरण-संवेदनशील और तकनीकी रूप से सशक्त शहर बनाने का उद्देश्य रखता है। इस परियोजना के तहत 39 में से 18 परियोजनाएँ ₹503 करोड़ की लागत से पूरी हो चुकी हैं, जबकि 39 अन्य परियोजनाएँ ₹1,537 करोड़ के बजट के साथ कार्यान्वयन के चरण में हैं। इनमें प्रमुख कार्यों में स्मार्ट स्कूल, मल्टी-यूटिलिटी डक्ट (जिससे बिजली, पानी और इंटरनेट जैसी सुविधाएँ एक ही जगह से मिलेंगी), स्मार्ट शौचालय, सौर ऊर्जा समाधान और वर्षा जल संचयन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, 24 जल एटीएम लगाए गए हैं ताकि लोगों को साफ पीने का पानी आसानी से मिल सके। शहर में “सदैव दून” नाम से एक आधुनिक कमांड सेंटर भी शुरू किया गया है, जहाँ से 500 से ज़्यादा सीसीटीवी कैमरों के ज़रिए पूरे शहर की निगरानी की जा रही है। इसके ज़रिए ट्रैफिक, सुरक्षा, सफाई और आपातकालीन सेवाओं पर तुरंत कार्रवाई हो सकती है।

सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने के लिए इलेक्ट्रिक बसें चलाई जा रही हैं और स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए हैं जिससे ट्रैफिक जाम कम हो सके। स्मार्ट पार्किंग सिस्टम से लोग मोबाइल ऐप के ज़रिए पार्किंग की स्थिति देख सकते हैं। शहर के कुछ पुराने इलाकों जैसे पलटन बाजार और परेड ग्राउंड का सौंदर्यीकरण भी इस योजना का हिस्सा है ताकि वहां आने-जाने वालों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें।

हालांकि, परियोजना की प्रगति में कुछ चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। जैसे कि, निर्माण कार्यों के लिए लगभग 19,000 पेड़ काटे गए हैं जिससे पर्यावरण पर असर पड़ा है। इसके अलावा, कुछ काम तय समय पर पूरे नहीं हो पा रहे हैं और लोग यह भी कह रहे हैं कि उन्हें परियोजनाओं के बारे में पहले से जानकारी नहीं दी गई और उनकी राय नहीं ली गई।

देहरादून स्मार्ट सिटी मिशन एक बहुत ही अच्छा और ज़रूरी कदम है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे किस तरह से लागू किया जाता है। अगर प्रशासन पारदर्शिता बनाए रखे, नागरिकों को शामिल करे और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखे, तो यह शहर को केवल ‘स्मार्ट’ ही नहीं बल्कि अधिक सुरक्षित, स्वच्छ, और रहने लायक भी बना देगा। नई तकनीकों और सुविधाओं का आना निश्चित रूप से शहर के भविष्य को बेहतर बनाएगा, लेकिन यह तभी फायदेमंद होगा जब यह सबका ध्यान रखते हुए किया जाए।


महंगाई की चक्की में पिसता आम आदमी: एक दिन की नहीं, रोज़ की लड़ाई

मोनिका

यह एक जाना-पहचाना तथ्य है, जिसे आसान शब्दों में समझाया गया है। मुद्रास्फीति (Inflation) का मतलब है कि जब बाजार में बहुत सारा पैसा होता है लेकिन चीजें कम होती हैं, तो अधिक पैसा कम चीजों को खरीदने की कोशिश करता है। नतीजा यह होता है कि लोगों को जरूरी चीजें ज्यादा महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती हैं।
जैसे अगर पहले कोई चीज़ 50 रुपये में मिलती थी, तो अब वही चीज़ 100 रुपये में मिल रही है। ऐसे में आम आदमी के पास दो ही रास्ते होते हैं – या तो महंगे दामों पर चीजें खरीदे, या फिर उनका इस्तेमाल कम कर दे।

इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि 2015 में आपके पास 100 रुपये का एक नोट था, और वही नोट 2025 में भी 100 रुपये का ही है। लेकिन इन 10 सालों में महंगाई बढ़ गई है।
अगर 2015 में किसी चीज़ की कीमत 10 रुपये थी, और अब वही चीज़ 50 रुपये की हो गई है, तो पहले 100 रुपये में आप 10 चीजें खरीद सकते थे, लेकिन अब उतने ही पैसों में सिर्फ 2 ही चीजें मिलेंगी। यानी नोट का मूल्य (Face Value) तो वही है, लेकिन उसकी खरीदने की ताकत (Purchasing Power) कम हो गई है।

आपके हाथ में मौजूद नकद और बैंक में जमा पैसा धीरे-धीरे अपनी वास्तविक कीमत खोने लगता है, क्योंकि चारों तरफ चीजों की कमी हो जाती है, खासकर खाने-पीने की वस्तुओं की। ऐसे में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।
आम आदमी, जो अपनी तनख्वाह पर निर्भर करता है और सुरक्षित निवेश जैसे फिक्स्ड डिपॉज़िट में पैसे लगाता है, वह इस महंगाई की मार झेलता है। उसकी तनख्वाह भले ही बढ़ जाए, लेकिन वह केवल बढ़े हुए खर्चों को पूरा कर पाएगा, जीवन स्तर को बेहतर नहीं बना पाएगा।

महंगाई के कई कारण हो सकते हैं – जैसे अकाल, प्राकृतिक आपदाएं, युद्ध, या फिर व्यापारियों और लोगों द्वारा जरूरी चीजों जैसे भोजन, दवाइयों की जमाखोरी। जब जरूरी चीजों की आपूर्ति कम हो जाती है, तो सरकार को कभी-कभी राशनिंग (Rationing) जैसी व्यवस्था भी करनी पड़ती है।

हालांकि, अगर महंगाई को 3% से 5% के बीच नियंत्रित रखा जाए, तो इसे स्वस्थ आर्थिक संकेत माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे चीज़ों की आपूर्ति पर ज्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन मांग बढ़ती है। जब मांग बढ़ेगी, तो उत्पादन और रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे।


महंगाई की चक्की में पिसता आम आदमी

मोनिका

यह एक जाना-पहचाना तथ्य है, जिसे आसान शब्दों में समझाया गया है। मुद्रास्फीति (Inflation) का मतलब है कि जब बाजार में बहुत सारा पैसा होता है लेकिन चीजें कम होती हैं, तो अधिक पैसा कम चीजों को खरीदने की कोशिश करता है। नतीजा यह होता है कि लोगों को जरूरी चीजें ज्यादा महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती हैं।
जैसे अगर पहले कोई चीज़ 50 रुपये में मिलती थी, तो अब वही चीज़ 100 रुपये में मिल रही है। ऐसे में आम आदमी के पास दो ही रास्ते होते हैं – या तो महंगे दामों पर चीजें खरीदे, या फिर उनका इस्तेमाल कम कर दे।

इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि 2015 में आपके पास 100 रुपये का एक नोट था, और वही नोट 2025 में भी 100 रुपये का ही है। लेकिन इन 10 सालों में महंगाई बढ़ गई है।
अगर 2015 में किसी चीज़ की कीमत 10 रुपये थी, और अब वही चीज़ 50 रुपये की हो गई है, तो पहले 100 रुपये में आप 10 चीजें खरीद सकते थे, लेकिन अब उतने ही पैसों में सिर्फ 2 ही चीजें मिलेंगी। यानी नोट का मूल्य (Face Value) तो वही है, लेकिन उसकी खरीदने की ताकत (Purchasing Power) कम हो गई है।

आपके हाथ में मौजूद नकद और बैंक में जमा पैसा धीरे-धीरे अपनी वास्तविक कीमत खोने लगता है, क्योंकि चारों तरफ चीजों की कमी हो जाती है, खासकर खाने-पीने की वस्तुओं की। ऐसे में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।
आम आदमी, जो अपनी तनख्वाह पर निर्भर करता है और सुरक्षित निवेश जैसे फिक्स्ड डिपॉज़िट में पैसे लगाता है, वह इस महंगाई की मार झेलता है। उसकी तनख्वाह भले ही बढ़ जाए, लेकिन वह केवल बढ़े हुए खर्चों को पूरा कर पाएगा, जीवन स्तर को बेहतर नहीं बना पाएगा।

महंगाई के कई कारण हो सकते हैं – जैसे अकाल, प्राकृतिक आपदाएं, युद्ध, या फिर व्यापारियों और लोगों द्वारा जरूरी चीजों जैसे भोजन, दवाइयों की जमाखोरी। जब जरूरी चीजों की आपूर्ति कम हो जाती है, तो सरकार को कभी-कभी राशनिंग (Rationing) जैसी व्यवस्था भी करनी पड़ती है।

हालांकि, अगर महंगाई को 3% से 5% के बीच नियंत्रित रखा जाए, तो इसे स्वस्थ आर्थिक संकेत माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे चीज़ों की आपूर्ति पर ज्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन मांग बढ़ती है। जब मांग बढ़ेगी, तो उत्पादन और रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे।


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: मददगार तकनीक या नई परेशानी?

वंशिका 

आज की दुनिया में सबसे तेज़ बदलने वाली और हमारी ज़िंदगी पर बड़ा असर डालने वाली तकनीक है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)। जो काम पहले इंसानों को घंटों लगते थे, अब AI वो कुछ ही मिनटों में कर देता है। चाहे वह हेल्थकेयर हो, पढ़ाई हो, बिज़नेस हो या मनोरंजन, AI हर जगह काम कर रहा है। AI की मदद से काम जल्दी और सही तरीके से होता है, कंपनियाँ बेहतर फैसले ले पा रही हैं, बच्चे अपनी ज़रूरत के हिसाब से पढ़ाई कर पा रहे हैं और डॉक्टर बीमारियों को जल्दी पहचान पा रहे हैं। इसके साथ ही नई तकनीकें और स्किल्स बनने से नए रोजगार भी मिल रहे हैं। इस तरह AI हमारी ज़िंदगी के हर हिस्से में सुधार और तेजी से विकास ला रहा है।

AI और सोशल मीडिया आज बहुत करीब से जुड़े हुए हैं। जब आप सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हैं, तो जो पोस्ट, वीडियो या विज्ञापन आपको दिखते हैं, वो सब AI की मदद से चुने जाते हैं। AI समझता है कि आपको क्या पसंद है और आप क्या ज्यादा देखते हैं, फिर उसी हिसाब से आपको कंटेंट दिखाता है। इसके अलावा, फेस रिकग्निशन, ऑटोमेटिक कैप्शन, चैटबॉट्स और ट्रेंड्स की जानकारी भी AI की वजह से आसान हो गई है। सोशल मीडिया कंपनियाँ AI का इस्तेमाल करके करोड़ों लोगों का डाटा पढ़ती हैं ताकि आपकी सोशल मीडिया का अनुभव बेहतर हो और आप ज्यादा समय तक उस प्लेटफॉर्म पर बने रहें। जैसे-जैसे AI स्मार्ट होता जा रहा है, वैसे-वैसे इसका इस्तेमाल सोशल मीडिया में और बढ़ता जा रहा है, जिससे यह प्लेटफॉर्म्स और भी पर्सनल, इंटरएक्टिव और असरदार बनते जा रहे हैं। जैसे-जैसे AI तकनीक आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके साथ कई मुश्किलें भी बढ़ रही हैं। इन में से एक सबसे बड़ी और खतरनाक परेशानी है Deepfake टेक्नोलॉजी। Deepfake एक ऐसी तकनीक है जिसमें AI का इस्तेमाल करके किसी इंसान की आवाज़ और चेहरा बदल दिया जाता है, जिससे नकली वीडियो या ऑडियो बिल्कुल असली लगते हैं। इससे कई लोगों को परेशानी हो रही है। जैसे – किसी नेता का नकली भाषण बनाकर वायरल करना, किसी अभिनेता या आम इंसान का झूठा और गलत वीडियो बनाकर बदनाम करना, या किसी का चेहरा लगाकर अश्लील वीडियो बनाना। ऐसे वीडियो लोगों की इज़्ज़त और मानसिक स्थिति को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं। कई बार लोग इन फर्जी वीडियो को सच मान लेते हैं और गुमराह हो जाते हैं। Deepfake का इस्तेमाल ठगी, ब्लैकमेल और दूसरे साइबर अपराधों के लिए भी किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब असली और नकली में फर्क करना बहुत मुश्किल हो गया है। इसलिए Deepfake जैसी खतरनाक तकनीकों को कंट्रोल करने के लिए सख्त कानून और निगरानी की बहुत जरूरत है।AI एक बहुत ही काम की तकनीक है, जो अगर सही तरीके से इस्तेमाल की जाए तो हमारी ज़िंदगी को आसान, तेज़ और स्मार्ट बना सकती है। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम AI पर पूरा निर्भर न हो जाएं। AI को हमें एक मदद करने वाले दोस्त की तरह देखना चाहिए, न कि ऐसा कुछ जो हमें कंट्रोल करे। जहाँ इंसानी सोच, भावना और समझ की ज़रूरत होती है, वहाँ इंसान का फैसला ही सबसे ज़रूरी होता है। हमें AI टूल्स और ऐप्स का उपयोग समझदारी से करना चाहिए — जैसे अपने डाटा को सुरक्षित रखना, नकली खबरों और वीडियो से सावधान रहना और हर जानकारी को पहले अच्छी तरह जांचना। अगर हम AI का इस्तेमाल सिर्फ काम आसान करने और कुछ नया सीखने के लिए करें, और फैसले खुद लें, तो हम इसके फायदे अच्छे से ले सकते हैं और नुकसान से बच सकते हैं। AI हमारे जीवन का हिस्सा तो बन सकता है, लेकिन हमें यह तय करना होगा कि उसका इस्तेमाल हम करें, न कि वह हमें चलाए


जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा पूर्वोत्तर भारत

मोनिका 

हर बदलाव के पीछे कोई न कोई असर जरूर छिपा होता है — चाहे वह बदलाव कितना ही छोटा क्यों न हो। कई विचारकों और वैज्ञानिकों ने यह बात पहले ही कही है कि हमारे हर कर्म का कोई-न-कोई परिणाम ज़रूर होता है। न्यूटन का तीसरा नियम भी यही बताता है: हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। और जब हम इतने छोटे बदलावों के इतने बड़े परिणामों की बात कर रहे हैं, तो सोचिए उन बदलावों का क्या असर होगा जो मानव जाति रोज़ बड़े पैमाने पर कर रही है — जैसे तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या, पेड़ों की कटाई, बेतरतीब शहरीकरण, और बढ़ता कचरा। ये सभी बदलाव जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को और तेज कर रहे हैं।

जब मानव गतिविधियों का प्रभाव इतना गहरा है, तो जलवायु में बड़े पैमाने पर बदलाव कोई चौंकाने वाली बात नहीं होनी चाहिए।

पूर्वोत्तर भारत: जलवायु परिवर्तन की सीधी मार

हाल के हफ्तों में पूर्वोत्तर भारत, विशेष रूप से असम, जलवायु परिवर्तन की इस मार का बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। जैसे ही मानसून की शुरुआत हुई, इस क्षेत्र में भारी बारिश और बाढ़ ने तबाही मचा दी। असम की भौगोलिक स्थिति — जहां ऊँचाई से नीचे की ओर बहने वाली नदियाँ और विस्तृत मैदानी क्षेत्र हैं — प्राकृतिक आपदाओं को और अधिक गंभीर बना देती है।

ब्रह्मपुत्र नदी, जो बार-बार अपना रास्ता बदलती है, इस क्षेत्र में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है। अब जलवायु परिवर्तन के कारण भारी और अनियमित बारिश इस समस्या को और भी जटिल बना रही है।

तबाही के आंकड़े और मानवीय संकट

इस बार की बाढ़ में अब तक 6.8 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। असम के 66 राजस्व सर्किलों और 21 जिलों के लगभग 1500 गांव जलमग्न हो चुके हैं। अब तक 52 लोगों की जान जा चुकी है।

ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों का जलस्तर चेतावनी के स्तर को पार कर चुका है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए हालात बेहद गंभीर बन गए हैं। हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा है। कई इलाकों में सेना और एनडीआरएफ की टीमें राहत और बचाव कार्यों में लगी हुई हैं। अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन की घटनाएं भी सामने आई हैं।

प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है

जब पारिस्थितिक तंत्र (ecosystems) के चारों ओर का वातावरण तेजी से बदलता है, तो उसका सीधा असर वहां रहने वाले जीवों और मनुष्यों पर पड़ता है। असम और पूर्वोत्तर भारत में इस बार की बारिश और बाढ़ ने हमें फिर से यह याद दिला दिया है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है।

अब समय आ गया है कि हम अपने पर्यावरण के प्रति किए गए कर्मों पर विचार करें और उनके नतीजों को गंभीरता से लें। यदि अब भी हम नहीं जागे, तो आने वाले वर्षों में असम जैसी आपदाएं और भी भयावह रूप में सामने आएंगी।


आधुनिकता के अनेक सार्थक पक्ष भी हैं जो समाज को बेहतर बनाते हैं

भारत डोगरा
आधुनिक समाज में अनेक स्तरों पर जटिलताएं बढ़ रही हैं। तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं, और सामान्य जनजीवन पर उनका असर बड़े स्तर पर हो रहा है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया को ही लें तो इनका बहुत व्यापक असर हुआ है। दैनिक जीवन को हमने कई स्तरों पर कम समय में ही बदल दिया है। इनमें कुछ असर अच्छे हो सकते हैं, और कुछ बुरे। इस पर बहस हो सकती है, पर एक अधिक व्यापक सच्चाई यह है कि तकनीकी बदलाव में इतनी अधिक तेजी हुई है कि हमें उसे संतुलित और सुलझे हुए रूप में अपनाने के अवसर नहीं मिलते हैं। हम अभी संभलने की क्षमता प्राप्त कर ही रहे होते हैं कि तब तक बहुत कुछ गड़बड़ा जाता है। मुद्दा केवल तकनीकी बदलाव का ही नहीं है, बल्कि इससे आगे यह भी है कि इस बदलाव को विशेष दिशा में धकेलने के प्रयास साथ-साथ होते हैं। ये प्रयास प्राय: किसी भले उद्देश्य से नहीं जुड़े होते हैं अपितु शक्तिशाली और अति साधन-संपन्न तत्वों के अपना मुनाफा, नियंत्रण और आधिपत्य बढ़ाने की संकीर्ण सोच से जुड़े होते हैं। तकनीकी बदलावों के साथ ही लोगों की सोच को और कायरे को प्रभावित करने वाले पुराने स्रेतों का महत्त्व तेजी से कम होने लगता है, जबकि नये स्रेत हावी होने लगते हैं। इस स्थिति में समाज में नैतिकता की जो बहुत महत्त्वपूर्ण स्थिति और पहचान है, वह भी बहुत प्रभावित होती और बदलती है। क्या बुरा है और क्या गलत है, ऐसे बुनियादी सवाल और उनके जवाब नई तरह से प्रभावित होने लगते हैं। ऐसी कई प्रवृत्तियों, जिन्हें सामाजिक बुराई के रूप में मान्यता मिली हुई थी और ऐसी मान्यता मिलना तथ्य आधारित था, को अब बुराई माना ही नहीं जाता। गलत राह से रोकने के लिए जो सोच समाज में मौजूद थी, वही खिसकने लगती है।

इस तरह से एक ओर तो समाज में अनेक बुराइयां तेजी से फैल सकती हैं और इस कारण अनेक नये तनाव और समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके साथ-साथ समाज में कई मुद्दों पर अनिश्चय बढऩे की स्थिति आ सकती है। अनिश्चय की इस स्थिति के एक ओर तो अपने तनाव हैं और दूसरी ओर इसमें अनुचित तत्वों को अपना असर बढ़ाने के अधिक अवसर मिलते हैं। अत: ऐसे दौर और समय में रेखांकित करना और जोर देकर कहना बहुत जरूरी हो जाता है कि सामाजिक नैतिकता के अनेक शात तथ्य ऐसे हैं जो सदा महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक थे, आज भी हैं और सदा प्रासंगिक रहेंगे। एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि अपनी भलाई को समाज की भलाई के साथ जोड़ कर ही आगे बढ़ा जाए। इसके लिए जरूरी है कि सभी की भलाई, समाज की भलाई के बारे में सही समझ बनाने का प्रयास किया जाए जो समता, न्याय, अमन-शांति और पर्यावरण रक्षा जैसे बहुत व्यापक मान्यता के प्रतिष्ठित सिद्धांतों पर आधारित हो। अपनी प्रगति के बारे में सोचना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, पर सामाजिक नैतिकता की मांग है कि इस प्रगति की ऐसी राह अपनाई जाए जो सामाजिक भलाई से जुड़ी रहे और किसी भी तरह की सामाजिक क्षति से बचे। स्वयं की प्रगति के लिए, इस प्रगति में तेजी लाने के लिए अपनी क्षमताओं का भरपूर विकास करना उचित है, पर इसके लिए किसी और को क्षति पहुंचाना और समाज को क्षति पहुंचाना अनुचित है।

इस सोच का निष्कर्ष तो यही है कि मेहनत और सच्चाई की जिंदगी ही सबसे उचित जिदंगी है। यह एक शात सत्य है, सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है, पर आज इस तरह की बातें बहुत कम सुनी जाती हैं, या कोई फिर भी कह दे, तो कई बार इसे महज उपदेश या ओल्ड फैशन सोच कहा जाता है। इससे यही सिद्ध होता है कि तेज बदलाव के आधुनिक युग में सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित और आहत ही रहे हैं, पर इससे सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण और शात पक्षों का महत्त्व कम नहीं होता है। हां, इतना जरूर है कि इन्हें रेखांकित करना, इनकी याद दिलाना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।

इसी तरह सामाजिक संबंधों को बहुत ईमानदारी से निभाना सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इन नजदीकी संबंधों को आपसी गहरे विास के आधार पर बनाए रखना, इस विास को कभी नहीं तोडऩा मानव-जीवन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। गहरे विास पर आधारित यह संबंध अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है और साथ में सच्चाई, मेहनत, ईमानदारी पर आधारित जीवन के लिए ऐसे प्रगाढ़ संबंधों से बहुत सहारा भी मिलता है। ऐसे जीवन में कठिनाइयां भी आती हैं और आज के आधुनिक दौर में कई तरह से यह संभावना अधिक बढ़ गई है। अत: सुख-दुख, उतार-चढ़ाव के बीच अपना संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। कठिनाई और दुख की स्थिति में अपने को संभाल पाना और इसके लिए अपने नैतिक जीवन के आधार से मजबूती प्राप्त करना आवश्यक है। दूसरी ओर अधिक सफलता मिल जाने पर अपने संतुलन को बनाए रखना, अपने नैतिक मार्ग पर दृढ़ रहना और हर तरह के अहंकार और सफलता के अनुचित दोहन से बचना आवश्यक है।

जिस तरह की सामाजिक नैतिकता की जरूरत समाज को सदा रही है और तेज बदलावों के आधुनिक दौर में विशेष तौर पर है, उसे प्रतिष्ठित करने के प्रयास आज बहुत जरूरी हैं पर फिर भी उपेक्षित हैं। दूसरी ओर, इस तरह के चालू प्रवृत्ति के प्रयत्न अधिक देखे जाते हैं जिनमें चालाकी से एक तरह से लोगों को भ्रमित कर किसी असरदार व्यक्ति के नेतृत्व में लाया जाता है और उनकी भावनाओं का दोहन किया जाता है। ऐसे प्रयासों के स्थान पर सही तरह की सामाजिक नैतिकता प्रतिष्ठित हो तो समाज की उचित और संतुलित प्रगति से बहुत मदद मिलेगी।

मौजूदा दौर में अनेक गंभीर समस्याओं के बढऩे का एक व्यापक स्तर का कारण यह है कि इन समस्याओं पर नियंत्रण लगाने वाली जो नैतिकता आधारित मान्यताएं समाज में मौजूद थीं, उनका तेजी से हृास हुआ है। भ्रष्टाचार बढऩे का एक मुख्य कारण यह है तो दूसरी ओर, अन्य संदर्भ में, तरह-तरह के बढ़ते नशे की प्रवृत्ति को समझने के लिए भी इस तरह के बदलाव को समझना पड़ेगा जो बहुत स्पष्ट चाहे नजर न आएं पर बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। महिलाओं के विरुद्ध विशेष तरह की हिंसा और अपराधों को भी इस व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आधुनिकता अपने आप में बुरी है। आधुनिकता के अनेक सार्थक पक्ष भी हैं जो समाज को बेहतर बनाते हैं, या बना सकते हैं। पर समाज में व्यापक स्तर पर समझ बनानी होगी कि आधुनिकता के नाम पर जो कुछ समाज में आ रहा है और तेजी से आ रहा है, उसमें क्या अनुचित है, और क्या उचित है ताकि इस समझ के आधार पर आधुनिकता को हम सुलझे हुए और संतुलित आधार पर अपना सकें।


दक्षेस से भारत को सतर्क रहने की जरूरत

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने
महाशक्तियों की राजनीतिक और आर्थिक महत्त्वाकांक्षाओं ने तीसरी दुनिया के उभरने की संभावनाओं को सुनियोजित तरीके से खत्म कर दिया है। इसका प्रतिबिंब है दक्षिण एशिया और इन देशों का क्षेत्रीय संगठन दक्षेस जिसे सार्क भी कहा जाता है। अमेरिकी प्रभाव में पाकिस्तान की जमीन का सैन्य कार्यों के लिए उपयोग और नेपाल के आधे-अधूरे लोकतंत्र पर चीनी कम्युनिज्म की काली छाया के चलते दक्षिण एशिया के देशों को एकजुट रखने का ख्वाब कई दशकों पहले ही टूट चूका है। इस क्षेत्र में विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक मुद्दों पर गहरे तनाव  बढ़े हैं तथा सांस्कृतिक टकराव की स्थितियां भी निर्मिंत हो गई है।

इन जटिल स्थितियों ने सबसे ज्यादा चोट दक्षेस की स्थापना को पहुंचाई है जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया को एकजुट करना और इसके देशों के बीच समृद्धि, विकास और शांति को बढ़ावा देना बताया जाता था। हाल ही में बांग्लादेश और पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष किसी तीसरे देश में मिले और उनके बीच सार्क को पुनर्जीवित करने पर बात हुई तो इसमें संभावनाएं कम और मनोवैज्ञानिक दबाव की कूटनीति ज्यादा नजर आई। दरअसल, बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत के इस पड़ोसी देश की राजनीतिक परिस्थितियों में भी भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लंबे समय से सत्ता पर काबिज शेख हसीना के खिलाफ छात्रों का आंदोलन देश में राजनीतिक परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन बाद में कट्टरपंथी शक्तियों के प्रभाव में अब यह भारत विरोध के आंदोलन में परिवर्तित हो गया है। बांग्लादेश की मौजूदा अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनूस की पाकिस्तान के साथ राजनीतिक मुद्दों पर समाधान की जल्दबाजी की कोशिशों  में सकारात्मक पहल से ज्यादा भारत पर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने की कूटनीति ज्यादा नजर आ रही है और इसकी छाया दक्षिण एशिया के देशों के बीच आपसी सहयोग की संभावनाओं को पूरी तरह खत्म कर सकती है। सार्क में आठ देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल है। 8 दिसम्बर 1985 को काठमांडू, नेपाल से शुरू हुए इस क्षेत्रीय संगठन को तीसरी दुनिया के हितों के संरक्षण के लिए उम्मीदों के तौर पर देखा गया था और यह विश्वास किया गया था कि यह एक साझी आवाज होगी जिससे  इन देशों को वैश्विक मंच पर अपने मुद्दों को उठाने में मदद मिल सके। दक्षेस का पहला शिखर सम्मेलन 1985 में आयोजित हुआ था और इसके बाद से यह संगठन तमाम विरोधाभासों के बाद भी विभिन्न देशों के नेताओं की बैठकें आयोजित करता रहा है। यह संगठन क्षेत्रीय संघर्ष, आतंकवाद, नशीले पदाथरे की तस्करी और सीमा विवादों के समाधान के संभावनाओं पर भी काम करता है। दक्षिण एशिया दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात सभ्यताओं में से एक सिंधु सभ्यता का घर है और दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। जातीय, भाषाई और राजनीतिक विखंडन के इतिहास के बावजूद, इस क्षेत्र के लोग एक समान सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टिकोण से एकजुट माने जाते हैं।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक की एक रिपोर्ट में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की स्थिति बेहद निम्नतम बताई गई है। जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी से भुखमरी का संकट तो बढ़ा ही है साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं भी विकराल हो गई है। दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक उथल-पुथल के शिकार रहे हैं और भारत को छोडक़र अन्य देशों में अस्थिरता का अंदेशा बना रहता है।  दक्षेस की स्थापना का उद्देश्य दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग से शांति और प्रगति हासिल करना बताया गया था, लेकिन विभिन्न देशों के बीच विवाद इस पर पूरी तरह हावी रहे और इसी का परिणाम है कि दुनिया की बड़ी आबादी वाला यह संगठन आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में विफल रहा है। चीन जैसी विदेशी संस्थाओं पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। नेपाल और श्रीलंका की भी कुछ यही स्थिति है। दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान का मानवीय संकट बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच गया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश गरीबी से बेहाल है। यहां दो करोड़ से ज्यादा लोगों पर भुखमरी का संकट गहरा रहा है और लोगों की जिंदगी मुश्किल में है। तालिबान के आने के बाद वैश्विक आर्थिक मदद बंद  हो गई है और अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं। अफग़़ान सरकार की संपत्ति,केंद्रीय बैंक का रिज़र्व सब फ्रीज़ कर दिया गया है। प्रतिबंधों के कारण वहां की अर्थव्यवस्था लडखड़़ा गई है। मालदीव,बंगलादेश औए श्रीलंका चीन की कर्ज नीति के जाल में पूरी तरह फंस चूके है। दक्षिण एशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान है और सभी देशों को अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने देने के लिए सतर्क रहने की जरूरत होती है। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि दक्षेस के देश आपसी व्यापार और सम्बन्धों को बेहतर करके आपसी सहयोग को बढ़ाएं।

चीन जैसे देश का हस्तक्षेप दक्षिण एशिया के देशों के लिए घातक साबित हो रहा है। बांग्लादेश और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के विकल्प के तौर पर चीन को प्रस्तुत करना चाहते है। इस क्षेत्र में चीन के लिए युआन को मजबूत करने के गहरे अवसर भी है।  युआन कूटनीति में अधिनायकवाद, साम्यवादी आक्रामकता और मानवाधिकारों की अनदेखी शामिल है।  राजनीतिक अस्थिरता से अभिशिप्त दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव पृथकतावाद को बढ़ावा दे रहा है और कई देशों की संप्रभुता को भी खतरे में डाल रहा है। भारत पर सामरिक दबाव बढ़ाने के लिए चीन ने भारत के पड़ोसी देशों में सहायता की कूटनीति से अपना प्रभाव बढ़ाया है। अब दक्षेस पर उसकी नजर है। दक्षेस में कभी भारत की राजनीतिक हैसियत बहुत मजबूत हुआ करती थी, लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी है। भविष्य में यह भारत विरोधी देशों का मंच नहीं बन जाए इसे लेकर भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।


एक अच्छे, भले और नेक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह

हरिशंकर व्यास
शीर्षक चौंका सकता है। पर जरा समकालीन भारत अनुभवों और उनकी दिशा में झांके तो अगले बीस-पच्चीस वर्षों की क्या भारत संभावना दिखेगी? भारत पिछले दस वर्षों की विरासत में कदम उठाता हुआ होगा। इस विरासत का मंत्र और अनुभव बुद्धि नहीं लाठी है। हार्वर्ड नहीं हार्डवर्क है। सत्य नहीं झूठ है। सौम्यता नहीं अहंकार है। विनम्रता नहीं निष्ठुरता है। कानून नहीं बुलडोजर है। मान मर्यादा नहीं लंगूरपना है। विचार और बहस नहीं गाली तथा ट्रोल है। तर्क नहीं है लाठी है। प्रबुद्धता नहीं मूर्खता है। चाल, चेहरा, चरित्र नहीं, बल्कि अकड़, लालच और कदाचार है। इस तरह का निष्कर्ष 2014 के समय में अकल्पनीय था। तब अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी के हुंकारों, आंदोलनों के उमड़े जन सैलाबों की तलहटी में सत्य छुपा हुआ था। अज्ञात था। ऐसा होना हम हिंदुओं की नियति से है। हिंदुओं का भाग्य है जो वह गांधी के पीछे चले या अन्ना हजारे के या हाथ में कमल ले कर चले या झाडू, उसे वही झूठा अवतार मिलता है जो उसकी कलियुगी नियति है।

उस नाते डॉ. मनमोहन सिंह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपवाद थे। वे अकेले प्रधानमंत्री हैं, जिनकी शख्सियत ने झूठ, फरेब से लोगों का बहकाने, लोगों में जादू बनाने, दैवीय अवतार की इमेज बनाने, लोगों को डराने धमकाने या उनके वोट खरीदने जैसा वह कोई छल नहीं किया, वह राजनीति नहीं की जो आजाद भारत की राजनीति का ट्रेंडमार्क है। बावजूद इसके वे भारत के वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री थे। उसी के कर्म फल में वैश्विक बिरादरी तक ने, उन्हे स्मरण करते हुए एक युगांतरकारी, बुद्धिमान, समझदार, सौम्य और श्रेष्ठ प्रधानमंत्री की सच्ची भाव भंगिमा में श्रद्धांजलि दी है।

यह वस्तुनिष्ठ श्रद्धांजलि पिछले दस वर्षों के नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल के शासन अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में, समकालीन अनुभवों के संदर्भ तथा भारत की भावी दिशा के भान से भी है। इतिहास की कसौटी है जो घटना और नेतृत्व का मूल्यांकन पचास साल बाद किया जाता है। कोई युद्ध हुआ, राजा या प्रधानमंत्री मरा तो उसके बाद के अनुभवों, प्रभावों के पच्चीस-पचास साल बाद ही इतिहास फैसला लेता है कि नेहरू ने भारत बनाया था या बिगाड़ा था। नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया और उसकी विरासत के प्रधानमंत्री और राजनीति देश हित में थी या देश को बरबादी की और ले जाने वाली। डॉ. मनमोहन सिंह की शख्सियत कर्तव्यनिष्ठ थी। इतिहास निरपेक्ष थी। शासन के आखिर में जरूर उन्होंने अन्ना हजारे-केजरीवाल-मोदी के भूचालों में अपने मुंह से यह बोला था, उम्मीद जताई थी कि इतिहास उनके प्रति दयालु होगा!
और मेरी राय में उनका इतिहास भारत के आखिरी बुद्धिमान, उम्दा प्रधानमंत्री के नाते अमिट है। एक अच्छे’, भले’ और नेक’ प्रधानमंत्री। और सोचें, इन तीन शब्दों से अधिक मनुष्यों के बीच मनुष्य को और क्या पुण्यता चाहिए!

मैंने बतौर पत्रकार उनके प्रधानमंत्री रहते उनकी आलोचना की है तो उनकी प्रशंसा भी की। तारीफ खासकर तब जब डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका के साथ एटमी करार के लिए अपनी सरकार दांव पर लगाई थी। जिस वाम मोर्चे पर मनमोहन सरकार टिकी थी उसके घोर विरोध, सीपीएम नेता प्रकाश करात द्वारा सैद्धांतिक आधार पर वैयक्तिक प्रतिष्ठा दांव पर लगाने तथा वामपंथी पत्रकारों की चिल्लपों, सोनिया गांधी व अहमद पटेल की चिंताओं के बावजूद मनमोहन सिंह ने एटमी करार किया। भारत का वैश्विक अछूतपन मिटाया। वह फैसला देश की सामरिक चिंता, सुरक्षा, भू राजनीति और वैश्विक जमात में भारत के स्थान के खातिर वैसा ही दुस्साहसी फैसला था जैसा मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की कमान में वित्त नीति में परिवर्तनों का था।

मेरा पीवी नरसिंह राव के समय से ऑब्जर्वेशन रहा है कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कभी यह नहीं कहा कि उनके कारण आर्थिक सुधार और उदारवाद आया। वे कभी अहंकार में या अनजाने में भी यह नहीं बोले कि मैंने, या मेरे कारण भारत के उदारवादी निर्णय हुए। इसलिए क्योंकि वे पीवी नरसिंह राव की बुद्धिमत्ता, दूरदृष्टि और समझदारी के कायल थे। मेरा डॉ. मनमोहन सिंह से कभी नाता नहीं रहा लेकिन मैं पीवी नरसिंह राव, प्रधानमंत्री दफ्तर संभालने वाले भुवनेश चतुर्वेदी, पीवीआरके प्रसाद और इनके घेरे को गहराई से जानता था इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण में सामने था कि कैसे राजनीतिक दबावों, कैबिनेट के भीतर की चुनौतियों और दस, जनपथ की चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री के कवच से डा. मनमोहन सिंह ने पहला साहसी बजट पेश किया। कैसे खुद प्रधानमंत्री ने स्वंय उद्योग मंत्रालय संभालते हुए लाइसेंस, परमिट राज को खत्म करने की घोषणाएं कीं!

वह मौनी बाबा की मौन क्रांति थी। तभी स्वतंत्र भारत के इतिहास का सत्य है कि बुद्धि, विवेक और समझदारी के प्रतिमान पीवी नरसिंह राव ने उबलते पंजाब, बागी कश्मीर तथा अराजक उत्तर-पूर्व को सामान्य बनाया तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस को भी विवेक से सहा। दिलचस्प संयोग है कि पीवी नरसिंह राव ने पांच साल के आखिर में तथा मनमोहन सिंह ने दस साल शासन के आखिर में, दोनों ने एक जैसे बवंडरों का सामना किया। बावजूद इसके इतिहास दोनों के प्रति दयालु है। दुनिया में यदि भारत के वित्तीय, आर्थिक, सामरिक तथा कूटनीतिक प्रतिमानों में किसी को याद किया जाता है तो उनमें भारतीय नाम पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के हैं। अद्भुत है! स्मृति पर जोर डालें। याद करें पीवी नरसिंह राव, के खिलाफ अर्जुन सिंह, फोतेदार, नटवर सिंह, नारायण दत्त तिवारी सहित कांग्रेस के तमाम दरबारियों, वामपंथी-सेकुलर आलोचकों से लेकर हर्षद मेहता, जेठमलानी, अचार कारोबारी लक्खू भाई और विश्वासघाती सीताराम केसरी जैसे चेहरों के बनाए झूठे बवंडर को। सभी को इतिहास मिट्टी की धूल सा मिटा चुका है। और इतिहास में कीर्ति अंकित है तो वह नरसिंह राव की है। ऐसे ही याद करें, मनमोहन सिंह के खिलाफ बवंडर पैदा करने वाले विनोद राय, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी एंड पार्टी को! क्या इनमें से कोई एक भी सच्चा साबित हुआ? जो लोग नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को भगवान, अवतार, मसीहा मानते हैं, उन्हें और उनकी भावना को दरकिनार करके सोचें तो मनमोहन सिंह ने मनुष्य रूप में दस वर्ष भारत का जो शासन किया वह किस कसौटी पर बुरा था? क्या वे भ्रष्ट प्रमाणित हैं? क्या पूंजीवाद और उदारवाद के आस्थावान डॉ. मनमोहन सिंह पर ये आरोप हैं कि उनकी बदौलत गौतम अडानी जैसे किसी क्रोनी पूंजीपति ने भारत को चूना लगाया। दुनिया में भारत को बदनाम बनाया?

ये बातें देश की एकता-अखंडता, इतिहास के मायनों में क्षणिक और बेमानी हैं। इसलिए अहम बात भारत के आखिरी बुद्धिवान, उम्दा प्रधानमंत्री’ का शीर्षक है। क्यों कर ऐसा माना जाए? जवाब पर यह विचार करें कि नरेंद्र मोदी का अब तक का शासन वतर्मान और भविष्य का क्या रास्ता बनाए हुए है? जाहिर है नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया, नेहरू-गांधी परिवार के खूंटे के आइडिया से अलग एक भारत। अर्थात उस हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया का भारत, जिसका खूंटा संघ परिवार है। मान सकते हैं समकालीन भारत दो खूंटों की नियति लिए हुए है। स्वतंत्रता के बाद कोई साठ साल भारत गांधी-नेहरू परिवार के खूंटे से चला। अब समय संघ परिवार के खूंटे का है। और नरेंद्र मोदी के अवतार से हिंदू क्योंकि कथित तौर पर जागे हैं और वे देश और अपनी सुरक्षा में मुसलमान को चिन्हित किए हुए हैं तो जाहिर है उनकी प्राथमिक आवश्यकता क्या है? छप्पन इंची छाती का निरंतर नेतृत्व। इसलिए नरेंद्र मोदी की विरासत में आगे की राजनीति के चेहरों में अमित शाह हों या योगी आदित्यनाथ या हिमंता बिस्वा या देवेंद्र फडऩवीस, छप्पन इंची छाती के नेतृत्व, राजनीति और व्यवस्था की आवश्यकता स्थायी है। दूसरे शब्दों में भारत का गवर्नेंस शक्ति, वाक् शक्ति, भय बिन होय न प्रीत के लाठी दर्शन से ही चलेगा। शत्रु क्योंकि इतिहास और मुसलमान है तो पानीपत की लड़ाई का सिनेरियो भी तय है।  तभी नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ आदि का भारत जब भविष्य में हर जिले में एक हिंदुस्तान और एक पाकिस्तान लिए हुए होगा तो कल्पना संभव भी है कि दिल्ली के तख्त को कभी बुद्धिमत्तापूर्ण, विवेकी, समझदार, सौम्य शख्सियत के बैठने का गौरव प्राप्त हो?

और हां, यह भी जान लेना चाहिए कि संघ के खूंटे के समानांतर अब जो गांधी-नेहरू-सेकुलर खूंटा है वह खरबूजे को देख खरबूजे जैसी राजनीति करते हुए है। इसलिए सार्वजनिक जीवन और राजनीति में बुद्धि, विचार, बहस, विवेक, सौम्यता, भद्रता, अच्छापन, पढ़ाई-लिखाई आदि का अर्थ ही नहीं है। भारत अब वह बीहड़ है जिसमें मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंह राव जैसी शख्सियतों की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए फिर नोट करें डॉ. मनमोहन सिंह: भारत के आखिरी बुद्धिमान और उम्दा प्रधानमंत्री थे!


बिजली चोरी या फिर अवैध निर्माण जवाबदेही तय हो

रोहित कौशिक
इस समय उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर बिजली विभाग किसी भी रूप से बिजली चोरी करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। अतिक्रमण करने और अवैध कब्जा करने वाले लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई कर अवैध कब्जों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। निश्चित रूप से समाज में संदेश जाना चाहिए कि जो भी गलत काम करेगा उस पर कार्रवाई की जाएगी। ऐसा संदेश जाएगा तो लोग अवैध काम करने से डरेंगे और बेहतर व्यवस्था और अच्छा समाज बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन क्या ऐसी कार्रवाई करने की बात इतनी सरल है?

अनेक लोग इस तरह की कार्रवाई को गलत बता रहेैहैं। कुछ लोगों का आरोप है कि राजनीतिक द्वेष के कारण भी इस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नियमित रूप से इस तरह की कार्रवाई की जाती है? क्या नियमित रूप से देखा जाता है कि कहां बिजली चोरी हो रही है, और कहां लोगों ने अवैध रूप से मकान बनाए हुए हैं, या कब्जे किए हुए हैं? हो सकता है कि अपवाद के तौर पर कहीं ऐसा होता हो लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता। ज्यादातर मामलों में इस तरह की कार्रवाई किसी शिकायत या फिर अन्य कारणों से होती है।

सवाल है कि सामान्य तौर पर ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं होती? सामान्य तौर पर संबंधित कर्मचारी और अधिकारी क्या कर रहे होते हैं? कई मामलों में कर्मचारी और अधिकारी रित लेकर चुप हो जाते हैं, और अवैध काम की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं।  निश्चित रूप से भारत लगातार विकास की राह पर अग्रसर है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश में रित का खात्मा  नहीं हो सका है। भरे बाजार में बिना नक्शा पास हुए बड़ी-बड़ी बिल्डिंग कैसे बन जाती हैं? किसी सुनसान जगह पर ऐसी बिल्डिंग बने तो बात समझ में आती है कि उस बिल्डिंग पर किसी अधिकारी की नजर नहीं पड़ी होगी। लेकिन ऐसे मुख्य बाजार और ऐसी मुख्य सडक़, जहां से अधिकारी रोज गुजरते हैं, पर भी अवैध निर्माण धड़ल्ले से होते हैं।

समझ से परे है कि ऐसे निर्माण पर अधिकारियों का ध्यान क्यों नहीं जाता। जब ऐसी अवैध इमारतों में कोई हादसा हो जाता है, या इनकी शिकायत की जाती है तो अधिकारी तुरंत हरकत में जा जाते हैं। विपक्ष से जुड़े नेता की बिल्डिंग पर कार्रवाई होने में देर नहीं लगती। इसका सीधा सा अर्थ है कि संबंधित विभाग के कर्मचारी और अधिकारी जानबूझ कर अवैध निर्माण को प्रश्रय देते हैं, और जब अवैध निर्माण हो जाते हैं तो उन्हें ध्वस्त करने का डर दिखा कर उगाही की जाती है। आम तौर पर अवैध इमारतों के मालिकों को पहले नोटिस दिया जाता है। नोटिस देने के बाद ही अवैध निर्माण  को ध्वस्त किया जाता है।

लेकिन अक्सर नोटिस देने की प्रक्रिया में भी धांधली होती देखी गई है। कई लोगों ने आरोप लगाए हैं कि इमारत गिराने से पहले उन्हें नोटिस नहीं दिया गया। किसी भी रूप से बिजली की चोरी की जाएगी या फिर अवैध निर्माण किए जाएंगे तो इसका असर समाज और अंतत: देश पर ही पड़ेगा। ज्यों-ज्यों देश विकसित हो रहा है, त्यों-त्यों देश में बिजली की खपत भी बढ़ रही है। हालांकि पहले की अपेक्षा देश में बिजली उत्पादन बढ़ा है, लेकिन किसी भी तरह से बिजली चोरी होती है तो इसका असर बिजली की कुल क्षमता पर पड़ता है। भले सरकार बिजली निर्माण के लिए कितने भी नये बिजलीघर लगा ले लेकिन बड़े पैमाने पर हो रही बिजली चोरी नहीं रोकी गई तो इन बिजलीघरों का पूरा लाभ देश को नहीं मिल पाएगा। ऐसा नहीं है कि गरीबी के कारण ही लोग बिजली चोरी करते हैं, बड़ी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां भी बिजली चोरी करती पकड़ी जाती हैं।

पहले से ज्यादा शिक्षित समाज के कुछ लोगों को अवैध काम करने में न ही शर्म आती है, और न किसी तरह का डर होता है। अवैध काम करने के पीछे सारा दोष हमारी मानसिकता का है। इसी मानसिकता के चलते पहले हम गलत काम करते हैं, और बाद में रित देकर गलत काम को वैधता प्रदान करने की कोशिश करते हैं। कोढ़ में खाज यह कि प्रशासन और संबंधित कार्यालय पहले हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहता है, और बाद में खुद को ईमानदार साबित करने की कोशिश करता है।

यही कारण है कि इस सारी व्यवस्था में दोनों पक्ष यानी जिन पर कार्रवाई होती है, और जो कार्रवाई करते हैं, कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाते नजर आते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि बिजली चोरी  और अवैध निर्माण करने वालों पर तो कार्रवाई हो जाती है, लेकिन संबंधित विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बेहतर तो यह होगा कि ऐसे मामलों में विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो। उनसे पूछा जाए कि जब इस तरह के अवैध काम हो रहे थे तो वे कहां थे। निश्चित रूप से इस प्रक्रिया से एक बेहतर व्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी।


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