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भारत में विकास का अध्याय आगे बढ़ता जाएगा

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भारत में विकास का अध्याय आगे बढ़ता जाएगा

डॉ. जयंतीलाल भंडारी
हाल में लाओस के वियनतियाने में आयोजित आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में आसियान देशों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद जो बयान जारी किया है, उसके मुताबिक ये देश इस समूचे क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता से असहज और परेशान हैं तथा भारत के साथ आर्थिक, कारोबारी और सुरक्षा संबंधों का नया दौर आगे बढ़ाएंगे। इसी तरह हाल में र्वल्ड बैंक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट अक्टूबर, 2024 में कहा गया है कि वैिक चुनौतियों के बीच चीन के प्रोत्साहन उपायों के बावजूद चीन की अर्थव्यवस्था सुस्त होगी और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

वर्ष 2024 में चीन की विकास दर घट कर 4.0 फीसद होगी जबकि भारत की विकास दर 6.3 फीसद से अधिक रहेगी। वस्तुत: भारत के पास उपभोक्ताओं का उभरता हुआ विशाल बाजार, युवाओं में जबरदस्त ढंग से आगे बढऩे की ललक, उद्यमिता की भावना और सुधार का रवैया वैिक संघर्ष और चुनौतियों के बावजूद भारत के लिए नये अवसरों का आधार है। गौरतलब है कि विगत 4 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरे कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन और इस्रइल-ईरान युद्ध की अनिश्चितता के बीच भी दुनिया का भारत पर असाधारण आर्थिक विश्वास बना हुआ है। मोदी ने कहा कि दुनिया की नजरों में यह युग भारत का युग है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

दुनिया में भारत ग्लोबल फिनटेक एडॉप्शन के मामले में पहले क्रम पर है। इंटरनेट उपभोक्ताओं के मामले में दूसरे क्रम पर है। स्टार्टअप के मामले में तीसरे क्रम पर है, और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे क्रम पर है। इतना ही नहीं, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और मूडी’ज जैसी वैिक एजेंसियां भी वैिक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत को दुनिया की सबसे विसनीय और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेश के पसंदीदा देश के रूप में देख रही हैं। यद्यपि इस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के विस्तारित होने के कारण वैिक अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर बढ़ रहा है, लेकिन फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में वैिक विश्वास और तेज विकास के मद्देनजर देसी उद्यमियों के साथ वैिक उद्यमियों के लिए भी बढ़ते अवसरों का परिदृश्य उभर कर दिखाई दे रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि हाल में दुनिया की ख्याति प्राप्त वित्तीय सेवा फर्म मॉर्गन स्टेनली ने कहा है कि सितम्बर, 2024 के दौरान भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए खुद को निवेश की पसंदीदा जगह बना लिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने अपनी नई रिपोर्ट-2024 में कहा है कि भारत आर्थिक विकास, विदेशी निवेश और नई तकनीकों के उपयोग की ऊंची संभावनाओं वाला देश है। अमेरिका चेंबर ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में अमेरिका की कंपनियों की वैिक निवेश पसंदगी में भारत का दूसरा स्थान है। इस समय चीन अमेरिकी निवेशकों की प्राथमिकता खोता जा रहा है। इतना ही नहीं,  अमेरिका और चीन में बढ़ते तनाव के माहौल में इस समय चीन में कार्यरत 12 लाख करोड़ रुपये निवेश वाली 50 अमेरिकी कंपनियां अपना कारोबार चीन से समेटने की तैयारी में हैं। इन कंपनियों में से 15 कंपनियां भारत में निवेश की तैयारी कर रही हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत 23 सितम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान न्यूयॉर्क में एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों पर काम करने वाली 15 प्रमुख अमेरिकी कंपनियों के सीईओ को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बहुआयामी क्षेत्रों में दुनिया के लिए अपार आर्थिक मौके हैं। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि अब भारत को आर्थिक दुनिया के उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख को दर्शाता है। वैिक राजनीतिक और आर्थिक मंचों पर भारत को विशेष अहमियत भारत की आर्थिक स्थिति से भी मिल रही है। अमेरिका और रूस, दोनों महाशक्तियों के साथ भारत की मित्रता के नये अध्याय दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा एवं भारतीय बाजार में मौके बढ़ा रहे हैं।

निस्संदेह भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, कृषि विकास और बढ़ती ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश-दुनिया के कारोबारियों और निवेशकों के लिए मौकों का नया द्वार खोल रहे हैं। देश में खाद्यान्न उत्पादन ऊंचाई बना रहा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक अब देश की खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ वैिक खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने के लिए भारत रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है। अब भारत दुनिया के खाद्य कटोरे के रूप में रेखांकित हो रहा है। भारत दुनिया के 150 से अधिक देशों को खाद्य पदाथरे के निर्यातक देश के रूप में दुनिया में रेखांकित हो रहा है। भारत दुनिया का आठवां बड़ा कृषि निर्यातक देश बन गया है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय शेयर बाजार ऊंचाई पर है, और दुनिया के लिए भारतीय शेयर बाजार में मौके बढ़ रहे हैं। वर्ष 2024 की शुरुआत से भारत में आईपीओ का बाजार गुलजार है। भारत में म्युचुअल फंड (एमएफ) में निवेश छलांगें लगा कर बढ़ रहे हैं। अगस्त, 2024 तक डीमैट खातों की संख्या 17.10 करोड़ के पार हो गई है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि विदेश व्यापार में भारत की नई संभावनाएं दुनिया के लिए नये मौके के रूप में हैं। ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत दुनिया के सक्षम और भरोसेमंद देश के रूप में वैिक आपूर्ति श्रृंखला में नई भूमिका निभा रहा है।

हम उम्मीद करें कि इस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के विस्तारित होने के कारण वैिक अर्थव्यवस्था में गिरावट के दौर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी बहुआयामी विशेषताओं के कारण मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी। साथ ही, आर्थिक विकास के रणनीतिक प्रयासों से भारत में विकास का अध्याय आगे बढ़ता जाएगा। साथ ही, रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे। इससे देश 2027 में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 में विकसित भारत बनने की डगर पर आगे बढ़ेगा।


राजनीतिक मकसद साधने की मंशा न हो

अजीत द्विवेदी
केंद्र सरकार ने जनगणना की अधिसूचना जारी नहीं की है, लेकिन एक, जनवरी 2025 से  प्रशासनिक सीमाएं सील हो जाएंगी और उससे पहले भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण का कार्यकाल अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया गया है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अगले साल जनगणना होगी। उसके अगले साल यानी 2026 में लोकसभा सीटों का परिसीमन होगा और फिर इसी आधार पर 2029 में साथ होने वाले चुनाव में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। इस बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने एक सामाजिक कार्यक्रम में, जहां 16 नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद दिया जाना था, वहां कहा कि ‘जब हम ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां संसद में सीटों की संख्या कम होने वाली है तो हमें छोटा परिवार क्यों रखना चाहिए’?

इसके आगे उन्होंने नवविवाहित जोड़ों से ज्यादा बच्चे पैदा करने और उन्हें सुंदर तमिल नाम देने का आग्रह किया। हालांकि उन्होंने संसद में सीटों की संख्या कम होने के बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा लेकिन उनका इशारा परिसीमन के बाद की स्थितियों की ओर था। उनसे पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी लोगों से ज्यादा बच्चे पैदा करने का आग्रह किया था। हालांकि उनका घोषित सरोकार यह था कि दक्षिण के राज्यों में आबादी बूढ़ी हो रही है और कामकाजी युवाओं की संख्या कम हो रही है। परंतु कहीं न कहीं वे भी इस बात से चिंतित हैं कि अगर आबादी के आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ तो दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक हैसियत घटेगी।

तभी यह बड़ा सवाल है कि लोकसभा सीटों के परिसीमन का आधार क्या होगा? क्या सीधे तौर पर जनसंख्या के हिसाब से सीटों की संख्या में बढ़ोतरी कर दी जाएगी? अगर ऐसा हुआ तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे बड़ी आबादी वाले राज्यों को फायदा होगा और दक्षिण भारत के राज्य घाटे में रहेंगे। तभी चंद्रबाबू नायडू और एमके स्टालिन की चिंता सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखती है। यह चिंता क्षेत्रीय वर्चस्व और फिर अस्मिता की राजनीति में भी बदल सकती है, जिससे एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

इसलिए सरकार को परिसीमन के फॉर्मूले के बारे में तर्कसंगत तरीके से विचार करना होगा और उस पर सभी दलों व राज्यों की सहमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी। ध्यान रहे लोकसभा सीटों का परिसीमन जम्मू कश्मीर की तरह नहीं होगा, जहां मनमाने तरीके से भौगोलिक सीमाओं का ध्यान रखे बगैर इस तरह से विधानसभा सीटों का सीमांकन हुआ कि जम्मू क्षेत्र में छह सीट बढ़ गई और कश्मीर घाटी में सिर्फ एक सीट बढ़ी।

आजादी के बाद से मोटे तौर पर आबादी के आधार पर ही लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तय होती रही है। तभी उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39 हैं। लेकिन आजादी के बाद राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को अलग अलग तरीके से लागू किया। आर्थिक रूप से विकसित राज्यों ने बेहतर ढंग से जनसंख्या नियंत्रण का किया तो उनके यहां जनसंख्या वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे आ गई। दक्षिण के राज्यों में तो जनसंख्या बढऩे की दर रिप्लसमेंट रेट से भी कम है। रिप्लेसमेंट रेट 2.1 है। इसका मतलब होता है कि अगर दो लोग मिल कर 2.1 बच्चे पैदा करते हैं तो जनसंख्या नहीं बढ़ेगी वह स्थिर हो जाएगी। दक्षिण के राज्यों में जनसंख्या बढऩे की दर 1.6 फीसदी है, जो रिप्लेसमेंट रेट से काफी कम है, जबकि उत्तर के राज्यों खास कर बिहार और उत्तर प्रदेश में वृद्धि दर रिप्लेसमेंट रेट से ज्यादा है।

ऐतिहासिक रूप से यह स्थिति रही है तभी दक्षिण के राज्यों में आबादी नियंत्रित हो गई और उत्तर भारत के राज्यों में बढ़ती चली गई। हालांकि अब वहां भी रफ्तार धीमी हो रही है लेकिन उन राज्यों की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। अगर इस आधार पर उनकी लोकसभा सीटें बढ़ती हैं तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने अपने यहां आबादी का बढऩा रोका। उन्होंने अच्छा काम किया इसके लिए उनको सजा नहीं दी जानी चाहिए।

अगर सरकार पारंपरिक रूप से आबादी को आधार बनाती है और औसतन 20 लाख की आबादी पर एक सीट का फॉर्मूला तय होता है तो दक्षिण के ज्यादातर राज्यों में सीटों में कोई बदलाव नहीं होगा, जबकि उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या 80 से बढ़ कर 120 हो जाएगी। बिहार में 40 से बढ़ कर 70 हो जाएगी। सोचें, इससे इन राज्यों की राजनीतिक हैसियत कितनी बढ़ जाएगी? अगर ऐसा होता है तो ओवरऑल लोकसभा की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। वैसे नए संसद भवन में इसकी तैयारी पहले हो चुकी है। नए संसद भवन में निचले सदन यानी लोकसभा में 880 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है। अगर संख्या इतनी नहीं भी बढ़ाएं तब भी आठ सौ तक संख्या जा सकती है। इस फॉर्मूले से यानी आबादी के अनुपात में सीटों की संख्या बढ़ाने का फैसला होता है तो दक्षिण के सभी राज्यों को मिला कर करीब 20 सीट का फायदा होगा। लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटें बढ़ जाएंगी।

अगर सरकार लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ाने का फैसला करती है तब परिसीमन में जनसंख्या का पैमाना 30 लाख की आबादी पर एक सीट का रखना होगा। अगर ऐसा किया जाता है तब उत्तर प्रदेश में 80 और बिहार में 42 सीटें होंगी। लेकिन ऐसे में कम से कम आठ राज्य ऐसे होंगे, जहां लोकसभा की एक भी सीट नहीं बनेगी क्योंकि उन राज्यों की आबादी 30 लाख से कम है। अगर किसी भी राज्य में जीरो सीट नहीं रखनी है यानी चाहे जितनी आबादी हो उसे कम से कम एक लोकसभा सीट देनी है तो सबसे छोटे राज्य की आबादी के हिसाब से एक सीट का फॉर्मूला बनाना होगा। ऐसे में ओवरऑल सीटों की संख्या में छह सीटों की बढ़ोतरी होगी यानी कुल सीट संख्या 549 हो जाएगी। लेकिन उत्तर प्रदेश में तब भी 12 सीटें बढ़ जाएंगी। बिहार में भी 10 सीटों का इजाफा होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि में भी ठीक ठाक बढ़ोतरी होगी। इसके बरक्स पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि में सीटों की संख्या घटेगी।

इनमें से कोई भी फॉर्मूला बहुत युक्तिसंगत नहीं लगता है। सीटों की मौजूदा संख्या कायम रखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आबादी बहुत बढ़ चुकी है और एक सांसद के लिए इतनी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करना संभव नहीं है। लेकिन सीटों की संख्या सीधे आबादी के आधार पर बढ़ा देना भी युक्तिसंगत नहीं है। सो, जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र और जीडीपी तीनों के औसत को आधार बनाना चाहिए। यानी किसी राज्य की जनसंख्या बहुत ज्यादा है और उसका कुछ फायदा उसे मिलता है तो किसी और राज्य को उसका भौगोलिक क्षेत्र ज्यादा बड़ा होने का फायदा मिलना चाहिए तो किसी राज्य को जीडीपी में ज्यादा योगदान करने का फायदा मिलना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं हो। किसी भी राज्य की राजनीतिक और विधायी हैसियत अनुपात से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। सभी पार्टियों को साथ लेकर उनकी सहमति से परिसीमन का फॉर्मूला तय करना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद साधने की मंशा न हो।


पटाखों के चलते हिंसा और हत्या

चेतन उपाध्याय
इस दीपावली पर पटाखे के कारण देश में जो कुछ हुआ हैं, उनमें से ज्यादातर में हिन्दू बनाम हिन्दू का मामला है। और निष्कर्ष है कि पटाखों के चलते हिंसा और हत्या के ज्यादातर मामलों में, लड़ाई हिन्दू बनाम हिन्दू की है। कोई 8वीं पास विद्यार्थी भी इंटरनेट पर ये सारे सबूत देख सकता है। यानी कि पटाखों ने हिन्दुओं को आपस में ही बँटने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि यह भी सच है कि धर्म विरोधी का तमगा मिल जाने के डर से अधिकाँश लोग इस सबको चुपचाप सह लेते हैं।

दूसरी बात यह है कि पटाखे के विरोध में गाँव-गाँव और मोहल्ले-मोहल्ले में हो रहे भयंकर विरोध और हिंसा के तमाम मामले थाने और मीडिया तक पहुँचते ही नहीं हैं। धर्म, परंपरा और उत्सव की आड़ में गुंडागर्दी और अराजकता है। और यह देशहित में नहीं है।

कड़वा सच है कि दीपावली का पटाखा हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने का माध्यम बन गया है। उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में पुलिस और प्रशासन की जानकारी में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जहाँ पर पर्व की आड़ में पटाखे का इस्तेमाल अपने दुश्मनों को सताने और हत्या करने में किया जा रहा है। पटाखे के कारण खुशियों का त्योहार नफरत, हिंसा और मातम का त्योहार बन गया है।

विदेशों में हरियाली का प्रतिशत बहुत ज्यादा होता है और यह हरियाली, आतिशबाजी के शोर और धुंए को सोख लेती है। साथ ही विदेशों में पटाखा फोडऩे के लिए एक बड़ा मैदान होता है जहाँ फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी तैयार रहती है। भारत देश में भी बड़े लोगों के घर के पास आप पटाखा नहीं फोड़ सकते, मगर आम आदमी के साथ,आये दिन कभी  धर्म की आड़ में डी.जे. तो कभी पटाखे की ऐसी गुंडागर्दी होती ही रहती है और ‘धार्मिक’ मामला बताकर पुलिस पल्ला झाड़ लेती है।

फिर पुलिस के मूकदर्शक बनने के बाद अपनी और अपने परिवार के सदस्य की जान बचाने के लिए जो भी आदमी, जानलेवा पटाखे का विरोध करता है, उसको धर्म विरोधी कह कर मार दिया जाता है मानो कि पटाखे से लोहवान, गुग्गुलु और चंदन की दिव्य महक आती हो। यह गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए।

इसलिए सरकार को चाहिए कि वह आम जनता के साथ ही कोर्ट को बताए कि जिस आतिशबाजी के कारण हर साल अरबों रुपये की संपत्ति आग में स्वाहा हो जाती है, जिस आतिशबाजी के चलते बेजुबान जानवरों की जान खतरे में पड़ जाती है, जिस आतिशबाजी के कारण देश भर के करोड़ों अस्थमा मरीज तड़पड़ाते हैं, जिस पटाखे के कारण लोग अपनी आँख की रोशनी और सुनने की क्षमता खो दे रहे हैं, जिस पटाखे के शोर और धुएं को रोकने की लड़ाई में लोग आपस में मर-कट कर पुलिस और कोर्ट का बोझ बढ़ा रहे हों, वह पटाखा किसी भी धर्म और परम्परा का हिस्सा नहीं हो सकता।

पटाखे पूरी तरह से बंद हो। ना तो शादी-विवाह में, ना दीपावली-होली पर, ना ईद-बारावफात में और ना ही क्रिसमस-नए साल पर। 1947 से पहले और फिर 1947 से 2024 तक क्या हुआ, इसकी चर्चा में समय नहीं गँवा कर, व्यापक जनहित में अभी से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सख्त जरुरत है। बारूद की गंध फैलाने का कार्य बंद होना चाहिए और बिना किसी धार्मिक भेदभाव के, साल के 365 दिन, पटाखों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में पटाखों का कोई स्थान नहीं है और बारूदी दुर्गंध फैलाने वाले पटाखों के उत्पादन और बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाना ही एकमात्र विकल्प है। ना रहेगा बाँस और ना बजेगी बाँसुरी।


न शर्म न हया- संविधान की रोज हत्या

ओमप्रकाश मेहता
भारतीय आजादी के इस हीरक वर्ष में कभी ‘विश्वगुरू’ का दर्जा प्राप्त हमारा देश अब किसी का ‘शिष्य’ बनने के काबिल भी नही रहा है, यद्यपि हमारे भाग्यविधाता सत्तारूढ़ नेता विश्वभर में जाकर अपनी खुद की प्रशंसा करते नहीं थकते, किंतु वास्तव में हमारी स्थिति उस मयूर जैसी है जो प्रगति के बादल देखकर अनवरत् नाचता है और उपलब्धि के अभाव में बाद में आंसू बहाता है।

आजादी के बाद से हमारे देश में भी राजनीति के अलग-अलग दौर रहे है, जवाहरलाल के जमाने की राजनीति प्रगति की कल्पना पर आधारित थी तो इंदिरा के जमाने से सत्ता के लिए सब कुछ करने की राजनीति का दौर शुरू हो गया और उन्होंने अपनी कुर्सी की रक्षा के लिए आपातकाल जैसा कदम उठाया, किंतु आज की राजनीति उसे भी आगे निकल गई है और आज कुर्सी के खातिर संविधान को भी बख्शा नही जा रहा है और वह सब किया जा रहा है, जिससे कुर्सी बची रहे।

लेकिन सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि आजादी के बाद से अब तक सब कुछ बदला किंतु राजनैताओं की सोच और मतदाता की समझ में कोई बदलाव नही आया, आज के राजनेता आजादी के पचहत्तर साल बाद भी चुनाव की उसी लीक पर चल रहे है जो प्रथम चुनाव के समय 1951 में देखी गई थी, आज भी राजनीति वादों और आश्वासनों पर टिकी है और आज के आम मतदाता को राजनेता उसी 1951 वाली नजर से ही देखते है और वैसा ही सलूक करते है, कभी प्रगति और विकास के नाम पर मांगे जाने वाले वोट आज धार्मिक नारों के आधार मांगें जा रहे है, सत्तापक्ष भाजपा यदि आज ‘बंटेगें तो कटेगें’ का नारा लगा रहा है तो प्रतिपक्षी दल ‘जुड़ेगे तो जीतेगें’ को अपनी जीत का माध्यम बना रहा है, यद्यपि सत्ता व प्रतिपक्ष के इन दोनों का मतलब एक ही है, किंतु दोनों का अपने नारों पर विश्वास अलग है, किंतु दोनों के नारों का लक्ष्य वही एक ”कुर्सी’’ है।

यहां सबसे दु:खद यह है कि हमारे संविधान में साफ-साफ लिखा है कि धर्म को राजनीति से बिल्कुल अलग रखेगें, किंतु आज धर्म और राजनीति का इतना समागम कर दिया है कि अब वोटरों के लिए धर्म और राजनीति दोनों को ही सही अर्थों में समझना मुश्किल हो रहा है, किंतु किया क्या जाए? आज जब सत्ता की कुर्सी ही अहम् हो गई है और उसके लिए अपना सर्वस्व लुटा देने वाली राजनीति शुरू हो गई है, तो इसके सामने सभी तर्क और प्रयास गौंण हो गए है और सबसे अधिक चिंता और खेद की बात यह है कि हमारी नई पीढ़ी या भारत के भविष्य को भी इसी तरह की राजनीति का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जो चिंताजनक है।

और आज की सबसे बड़ी चिंता व फिक्र की तो यह बात है कि सत्ता की घुरी अर्थात् देश के आम मतदाता को तो उसके भाग्य पर छोड़ दिया है और पांच साल में एक बार लुभावने नारों के साथ उसका द्वार खटखटाया जाता है और फिर उसे भगवान के भरोसे छोडक़र आज की राजनीति के भगवान आराध्य देव की तरह साल में केवल चार महीनें नही बल्कि चार साल के लिए मुंह ढंक कर गहरी निद्रा में खो जाते है, हमारे आम मतदाता अपने जीवन के हर क्षेत्र में चाहे निपुण हो गया हो, किंतु राजनीतिक सोच और राष्ट्रऊ के प्रति कर्तव्य के मामले में आज भी शून्य ही है, हमारे मान्यवर राजनेताओं ने उसे अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक उलझनों में ऐसा उलझा कर रखा कि उसे अपने कर्तव्य, दायित्व या अधिकारों के बारे में सोचने-विचारने का वक्त ही नही दिया, वह चौबीसों घण्टें अपनी नीति जिन्दगी की सोच में ही डूबा रहता है।

इस तरह कुल मिलाकर आज की राजनीति से ‘जनसेवा’ का पूरी तरह लोप हो चुका है और वह पूरी तरह ‘स्व-सेवा’ बनकर रह गई है और देश व राष्ट्र तथा समाज के बारे में सोचने के लिए किसी के भी पास वक्त नही है।


आतंकवाद वर्तमान विश्व की एक बड़ी समस्या

बलबीर पुंज
एक हालिया पॉडकास्ट में बात करते हुए शिंदे ने कहा, उस समय रिकॉर्ड पर जो आया था, उन्होंने वही कहा था। यह उनकी पार्टी (कांग्रेस) ने उन्हें बताया था कि भगवा आतंकवाद हो रहा। उस समय पूछा गया था तो बोल दिया था भगवा आतंकवादज् यह गलत था। इसी पॉडकास्ट में शिंदे, दिसंबर 2001 के संसद आतंकवादी हमले के दोषी और फांसी पर लटकाए जा चुके जिहादी अफजल गुरु को आतंकी कहने से बचते भी नजर आए।

मिथक हिंदू/भगवा आतंकवाद’ सिद्धांत कितनी बड़ी साजिश थी, उसका फिर खुलासा पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के एक दावे से हो जाता है। एक हालिया पॉडकास्ट में बात करते हुए शिंदे ने कहा, उस समय रिकॉर्ड पर जो आया था, उन्होंने वही कहा था। यह उनकी पार्टी (कांग्रेस) ने उन्हें बताया था कि भगवा आतंकवाद हो रहा। उस समय पूछा गया था तो बोल दिया था भगवा आतंकवादज् यह गलत था। इसी पॉडकास्ट में शिंदे, दिसंबर 2001 के संसद आतंकवादी हमले के दोषी और फांसी पर लटकाए जा चुके जिहादी अफजल गुरु को आतंकी कहने से बचते भी नजर आए।

यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस में पार्टी का अर्थ गांधी परिवार (सोनिया-राहुल-प्रियंका) है। यह चिंतन उस मानसिकता की उपज है, जिसमें इस्लामी आतंकवाद को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जायज ठहराने के लिए हिंदू आतंकवाद’ रूपी छलावा खड़ा किया गया था। इस साजिश में वामपंथियों और कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी शामिल था।

शिंदे के हालिया कबूलनामे से वह कड़वा सच भी एकाएक ध्यान में आता है कि ज्ञान-विज्ञान और पराक्रम जैसे गुणों से सुशोभित होते हुए भी भारत मध्यकाल में लगभग 600 वर्षों तक मुस्लिम और फिर 200 सालों तक अंग्रेजों के अधीन क्यों हो गया था। इतिहास साक्षी है कि यदि व्यक्तिगत खुन्नस के कारण जयचंद, पृथ्वीराज चौहान को धोखा नहीं देता, तो विदेशी आक्रांता मुहम्मद गौरी नहीं जीतता। इसी तरह यदि शाह वलीउल्लाह मराठाओं के खिलाफ अफगान अब्दाली को भारत नहीं बुलाता और प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर यदि सिराजुद्दौला को न छलता, तो भारत में अंग्रेजी साम्राज्य संभवत: स्थापित ही नहीं होता। कांग्रेस नीत यूपीए (वर्तमान आईएनडीआईए) कार्यकाल में उसी काले इतिहास को दोहराया गया था।

व्यक्तिगत, राजनीतिक और वैचारिक विरोध के चलते हिंदू/भगवा आतंकवाद’ शब्दावली की रचना कर दुनिया में भारत, हिंदू समाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य संगठनों को कलंकित करने का जाल बुना गया। इसकी जड़े 1993 के मुंबई श्रृंखलाबद्ध (12) बम धमाके में मिलती है, जिसमें 257 निरपराध मारे गए थे। तब महाराष्ट्र के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री शरद पवार ने आतंकियों की मजहबी पहचान और उद्देश्य से ध्यान भटकाने हेतु झूठ गढ़ दिया कि 13वां’ धमाका मस्जिद के पास हुआ था। यह प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से हिंदुओं को आतंकवाद से जोडऩे का प्रयास था। इसी चिंतन को यूपीए-काल (2004-14) में राहुल गांधी के साथ पी।चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने बतौर केंद्रीय गृहमंत्री आगे बढ़ाया था।

हद तो तब हो गई, जब कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2008 के भीषण मुंबई 26/11 आतंकवादी हमले के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ बता दिया। यहां तक, दिग्विजय ने इसी हमले में जिहादियों की गोलियों के शिकार हुए मुंबई आतंक निरोधक दस्ते के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे की मौत को हिंदूवादी संगठनों से जोडऩे का प्रयास किया था। इस संबंथ में तब पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा हाथों में पवित्र कलावा/मौली को आधार बनाकर कई समाचारपत्रों में आलेख तक प्रकाशित हुए थे। सोचिए, यदि आतंकी कसाब और डेविड हेडली (दाऊद सैयद गिलानी) के जीवित नहीं पकड़े जाते, तो क्या होता?

वास्तव में, यह हिंसा-घृणा के पीडि़तों को अपराधी’ और दोषियों को मासूम’ बताने की सेकुलरवादी’ (लेफ्ट-लिबरल’ सहित) साजिश है। 14 फरवरी 1998 को कोयंबटूर में श्रंखलाबद्ध 12 बम धमाकों हुए थे, जिसमें 58 बेकसूरों की मौत हो गई। आतंकवादियों का मुख्य निशाना भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी थे, जिन्हें तब चुनाव प्रचार के हेतु कोयंबटूर आना था। परंतु विमान परिचालन में देरी से उनकी जान बच गई। तब कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व ने न केवल इन बम धमाकों का आरोप संघ पर लगा दिया, बल्कि यहां तक कह दिया— अगर बम भाजपा के अलावा किसी और ने लगाया होता, तो ऐसा करने वाले ने निश्चित रूप से आडवाणी को मार देते। इसी मामले में अदालत द्वारा सैयद अहमद बाशा, फखरुद्दीन, इमाम अली आदि दोषी ठहराए गए थे।

प्रधानमंत्री मोदी के दानवीकरण हेतु इस कुनबे ने फरवरी 2019 के भीषण पुलवामा आतंकवादी हमले, जिसमें 40 सुरक्षाबलों का बलिदान हुआ था— उसे भाजपा द्वारा प्रायोजित’ बताने का प्रयास किया था। ऐसा ही जहरीला नैरेटिव 27 अक्टूबर 2013 को बिहार के पटना में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में भी बनाया गया था। तब प्रसिद्ध गांधी मैदान में उस समय 5 धमाके किए गए थे, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) लगभग तीन लाख की जनसभा को संबोधित कर रहे थे। तब तत्कालीन सत्तारुढ़ कांग्रेस के बड़े नेताओं ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से धमाकों के लिए भाजपा को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इसी मामले में अदालत ने हैदर अली, नुमान अंसारी, मोजिबुल्लाह, इम्तियाज आलम आदि को दोषी पाया था।

इसी कुनबे ने यह भी आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री मोदी बीता लोकसभा चुनाव जीतने के लिए अयोध्या स्थित राम मंदिर पर पुलवामा जैसा आतंकवादी हमला करा सकते है। वास्तव में, यह नैरेटिव 500 वर्ष पश्चात पुनर्निर्मित राम मंदिर पर प्रबल संभावित जिहादी हमले होने की स्थिति में न केवल हिंदुओं को लांछित करने, अपितु असली दोषियों को मासूम बताने के अग्रिम उपक्रम का भाग है। यह कोई पहली बार नहीं है। भडक़ाऊ भाषणों के लिए कुख्यात और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपी अब्दुल नासिर मदनी को जेल से बाहर निकालने हेतु वर्ष 2006 में होली की छुट्टियों के दिन— 16 मार्च को केरल विधानसभा में विशेष सत्र बुलाकर कांग्रेस और वामपंथियों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। ऐसी ही हमदर्दी यह समूह इशरतजहां, याकूब मेमन, अफजल गुरु, बुरहान वानी और आदिल अहमद डार जैसे घोषित आतंकवादियों के प्रति भी दिखा चुका है।

आतंकवाद वर्तमान विश्व की एक बड़ी समस्या है और भारत सदियों से इसका शिकार। इसके खिलाफ सभ्य समाज को हर हाल में लड़ाई को जीतनी होगी। यदि हम इसी तरह आतंकवाद के वास्तविक पीडि़तों को ही अपराधी’ बताते रहे, तो क्या हम इसके असली गुनाहगारों को सुरक्षित मार्ग’ प्रदान नहीं कर रहे? ऐसी स्थिति में क्या भारत, आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई जीत सकता है?


आंखों के आगे इतिहास

हरिशंकर व्यास
हां, आंखों देखा इतिहास! ऐतिहासिक मोड़ पर है मौजूदा सिरमौर सभ्यता अमेरिका। वह इस सप्ताह अपने हाथों अपनी सभ्यता का इतिहास बनाएगी। अमेरिकी मतदाता तय करेंगे कि वे अपने सभ्यतागत मूल्यों और सांचे की निरंतरता में कमला हैरिस को जिताते हैं या वैयक्तिक तानाशाही जिद्द वाले डोनाल्ड़ ट्रंप को जिताते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का अर्थ अमेरिका में विभाजन, संस्थाओं के पतन की गारंटी है। और जब कोई सभ्यता घर में विभाजित होती है तो उसकी ताकत, एकता, बुद्धि सब धरी रह जाती है। दो खेमों में विभाजित देश फिर धर्म, नस्ल, धन और अहंकार की आपसी लड़ाई का अखाड़ा होता है। ज्योंहि ऐसा हुआ त्योंहि सभ्यता को खत्म करने की ताक में बैठी बर्बर नस्ल और धर्म के लिए मौका खुलता है।

आज इस मौके की ताक में चीन है तो पुतिन और इस्लाम भी है। इन तीनों के इरादे आंखों के आगे लाइव उपस्थित हैं। सोचें, जिस अमेरिका ने इस सदी के आरंभ में, 9/11 के बाद आतंकवाद (इस्लाम) के खिलाफ वैश्विक जंग का हुंकारा मारा था, वह भटका हुआ है और उसकी जगह वह इजराइल इस्लाम को ठोक रहा है, जिसके नेता नेतन्याहू बिना इस समझ के क्रूरता दर्शा रहे हैं कि वे बंधकों को छुड़वा रहे हैं, बदला ले रहे हैं, देश को सुरक्षित बना रहे हैं या क्रूसेड है? मेरा मानना है इजराइल का ठोकना इस्लाम को और जिद्दी बनाना है? इसके नतीजे उलटे और उग्र होंगे। उस नाते यहूदियों और ईसाईयों दोनों की नासमझी है जो वे अपने जिद्दी भाई (अब्राहम की संतान, इस्लाम) को अपने मूल धर्म में लौटाने, उनकी घर वापसी की नहीं सोचते, बल्कि ठोक-ठोक कर तीसरे महायुद्ध, सभ्यतागत संघर्ष का पानीपत मैदान बना दे रहे हैं। इस्लाम की लाइव ठुकाई के फोटो इस्लाम को सुलगाने वाले हैं। निश्चित ही अतीत में इस्लाम की क्रूर तलवार और क्रूसेड़ के दृश्य आज के मुकाबले बेइंतहा खौफनाक थे। मगर पहले और दूसरे महायुद्ध के क्रम में यदि तीसरे महायुद्ध का सिनेरियो बन रहा है तो वह इस कारण पूरी पृथ्वी के लिए घातक होना है क्योंकि अब परमाणु हथियारों के जखीरे की वास्तविकता भी है।

इसलिए यहूदी बनाम मुसलमान, ईसाई बनाम इस्लाम, इजराइल बनाम ईरान, अमेरिका बनाम चीन, यूक्रेन बनाम रूस, उत्तर कोरिया बनाम दक्षिण कोरिया आदि की हकीकत का कुल सार आमने सामने की सीधी लड़ाई के पाले बनना है। हर पक्ष की जिद्द खूंखार होती हुई है। एक तरफ अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता तथा ईसाई और यहूदी हैं तो दूसरी और चीन है। फिर इस्लाम (जो इजराइल की ठुकाई से चीन-रूस से जुड़ता हुआ है) है। चीनी नेता बोलते नहीं हैं। न राष्ट्रपति माओ, देंग शियाओ पिंग भड़भडिय़ा नेता थे और न शी जिनफिंग हैं। ये चीनी नेता अतीत के अपने गौरव हान सभ्यता की वैश्विक पताका में चीन की श्रीवृद्धि के राष्ट्रवादी हैं। इनके लिए याकि मौजूदा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की ठोस पूंजी (रूसियों की तरह) क्रूर, कठोर, परिश्रमी चाइनीज जनता है। जिसका कभी भी लोकतंत्र, मानवीय मूल्यों, स्वतंत्रता से सरोकार नहीं रहा है। तभी माओ की क्रांति हो या देंग और शी जिनफिंग के वैश्विक कारखाने, अमीरतम बनने का मिशन, सभी में नेतृत्व, पार्टी और जनता ने एकनिष्ठता से काम किया है। उसके लिए असुरी महाशक्ति बनना मुश्किल नहीं था।

इसका लक्ष्य अब अमेरिका व पश्चिम सभ्यता की जगह अपने झंडे, अपनी व्यवस्थाओं में दुनिया को चलाना है। राष्ट्रपति शी जिनफिंग और उनके रणनीतिकारों ने चुपचाप बिसात बिछा दी है। चीन का लक्ष्य अमेरिका की जगह लेना है। एशिया का अधिपति होना है। चीन के लिए भारत, जापान, दक्षिण एशिया, ताइवान, आसियान देशों का जीरो अर्थ है। इसलिए क्योंकि ज्योंहि अमेरिका का पतन हुआ, दुनिया की उसकी चौधराहट छूटी या उसने छोड़ी तो पलक झपकते ये तमाम छोड़े बड़े देश चीन की कॉलोनी होंगे। यों भी दक्षिण या तीसरी दुनिया के ये देश आर्थिक तौर पर चीन से बंधे, उस पर आश्रित हैं। उधर परोक्ष तौर पर चीन ने रूस या पाकिस्तान के मार्फत मध्य एशिया के सभी इस्लामी देशों के अलावा अफगानिस्तान के तालिबान, ईरान और उन सब मुस्लिम देशों का विश्वास जीत लिया है जो इजराइल के हाथों घायल हैं।
अपनी इस ग्रैंड योजना, वैश्विक बिसात में चीन किस शातिरता से फैसले करते हुए है इसका प्रमाण ब्रिक्स की हालिया शिखर बैठक थी। राष्ट्रपति शी जिनफिंग और पुतिन ने बैठक में तुर्की के उन राष्ट्रपति एर्दोआन को बुलाया जो उइगर मुसलमानों के उत्पीडऩ के हवाले चीन के खिलाफ बोलते थे। एर्दोआन को शी और पुतिन ने पटा लिया है।

वे इनसे वैसे ही संतुष्ट हैं, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में यह हल्ला बनवाते हुए हैं कि कितनी बड़ी कूटनीतिक जीत हुई जो चीन ने लद्दाख में अपनी सेना पीछे की। भारत भी चीन के साथ बहुपक्षीय विश्व बनाने की और बढ़ता हुआ है। अर्थात भारत और चीन भाई भाई तथा अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता की दादागिरी के खिलाफ विश्व राजनीति में हिंदू राष्ट्र की भी एक अलग स्वतंत्र ढपली व विश्व व्यवस्था। और हम दक्षिण ब्लॉक, गुटनिरपेक्ष जमाने के देशों और परंपरागत मित्र रूस तथा चीन के हमराही हैं! बहरहाल, लाइव इतिहास फिलहाल अमेरिका बनाम चीन तथा यहूदी बनाम इस्लाम की जोर आजमाइश व परिवर्तनों का है। इसका एक अनहोना फोटो चीन और रूस द्वारा ठेठ यूरोप की सीमा पर बर्बर उत्तर कोरियाई सैनिकों को पहुंचा देना है। कल्पना करें डोनाल्ड ट्रंप जीते और उन्होंने यूक्रेन की मदद रोक कर रूस से समझौते का दबाव बनाया तो पुतिन के हौसले कितने बुलंद होंगे? रूसी-उत्तरी कोरियाई सेना के तब जश्न के फोटो यूरोपीय संघ पर कैसा प्रभाव बनाएंगे? ईरान के हौसले बुलंद होंगे या कम होंगे? हालांकि डोनाल्ड ट्रंप को ईरान विरोधी तथा नेतन्याहू परस्त माना जाता है लेकिन व्यक्तिवादी नेता ने यदि खुमैनी के घर जा कर पकौड़े खाने तथा अपने को अमनपरस्त बनाने की ठानी तो उसके गिरगिटी व्यवहार में रंग तो बदलते ही रहेंगे।

असल बात डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से विभाजित अमेरिका, विभाजित पश्चिमी बिरादरी की है। इसके सिनेरियो में चीन के लिए स्वर्णिम मौका बनेगा। वह अमेरिका को रिप्लेस कर अपने को नई विश्व व्यवस्था, नई मौद्रिक वित्तीय व्यवस्था का संचालक बनने की और बढ़ेगा। पृथ्वी की धुरी होने के हान सभ्यता के इलहाम को वास्तविकता के पंख लगेंगे। आर्थिक-सैनिक-राजनीतिक ताकत में सिरमौर होने का मौका खुलेगा।
सो, आंखों के आगे तीसरे महायुद्ध व सभ्यताओं के संघर्ष की अग्रिम झांकी है वही पृथ्वी के इतिहास का मोड़ भी है। इस सप्ताह स्पेन के वेलेंसिया में आठ घंठे की बारिश का वीडियो दहला देने वाला था। जलवायु परिवर्तन और विनाश की और बढ़ती पृथ्वी की सेहत की वह झांकी थी। वेलेंसिया विकसित देश का संपन्न इलाका है। इसलिए जलवायु परिवर्तन, बाढ़ या सूखे के एक्स्ट्रीम अनुभव में वेलेंसिया के फोटो में पानी में बही कारों का जो अंबार व कबाड़ दिखा वह चेतावनी है कि इलाका कितना ही समर्थ क्यों न हो प्रकृति के विनाश में किसी के बचने के अवसर नहीं हैं। इस साल भारत, दक्षिण एशिया में भी अतिवर्षा, बाढ़, गर्मी का एक्स्ट्रीम था लेकिन हम क्योंकि आदि हैं तो दिल-दिमाग वैसे विचलित नहीं हुआ जैसे वेलेंसिया के अनुभव से यूरोप विचलित है। सभी देख-जान-समझ रहे हैं कि पृथ्वी ऐसी ही यदि गर्म होती गई तथा जलवायु परिवर्तनों के अनुभवों में मानवता को हर समय जूझते रहना पड़ा तो सदी के आखिर में कहां पहुंचे हुए होंगे, लेकिन बावजूद इसके गंभीर कोई नहीं है!

दूसरी तरफ यह लाइव इतिहास भी है कि अतंरिक्ष यान वैसे ही उड़ और लैंड करने लगे हैं, जैसे एक हवाई जहाज करता है। एआई मानव बुद्धि को रिप्लेस कर रही है। विज्ञान ऐसी दवाईयां बना रहा है जिनसे मनुष्य शरीर आगे डायबिटीज, हार्ट, प्रोस्टेट, मोटापे, मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाएगा। लोगों को कमाई करने की जरूरत ही नहीं होगी। यूनिवर्सल इनकम की सुकून भरी जिंदगी में मनुष्य को सिर्फ अपने शगल, मौज-मस्ती में जीना है। वे सब काम रोबो और एआई करेंगे, जिन्हें मनुष्य करता हुआ है।

सोचें, कैसे दो एक्स्ट्रीम हैं। एक तरफ शी जिनफिंग, पुतिन, नेतन्याहू, डोनाल्ड ट्रंप, खुमैनी जैसों की जाहिल जिद्द लाइव है, प्राकृतिक आपदाएं हैं तो दूसरी और ज्ञान-विज्ञान के वे सत्य शोध हैं, जिससे मनुष्य के लिए अंतरिक्ष भी खुलता हुआ है!


कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार

अनिल चतुर्वेदी
कांग्रेस फिर एक बार अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर फोडने को तैयार होती दिख रही है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में हार की बजह टटोलने के लिए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे जो तीन सदस्यीय टीम बनाई उसमें शामिल नेता शायद ऐसा ही जबाव अपने नेता को देने की तैयारी में हैं। यह अलग बात है कि इस फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग कमेटी में हरियाणा के पूर्व सीएम और इस चुनाव का सारा दारोमदार संभालने वाले भूपेन्द्र सिंह हुड्डा शामिल नहीं किए गए हैं।पर जिन्हें जि़म्मेदारी दी गई है उनके नाम उजागर भले नहीं किए गए हैं पर कांग्रेसी सूत्र बता रहे हैं कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ के जो दो नेता जाँच के लिए हरियाणा भेजे गए उन्हें ज़मीनी स्तर पर लोगों से इस हार के कारणों को टटोलने के निर्देश दिए गए हैं।

पर भला हार की इस निराशा में नेताओं की कितनी हिम्मत रहेगी घर-घर घूम कर हार की बाबत लोगों से पूछने की और सवाल उम्र का भी है सो आराम भी ज़रूरी होगा ही। तभी अगर दिल्ली के कांग्रेसी ही यह कहने लगें कि फ़ैक्ट्री पता करने गए ये दो नेता होटल में ठहर मोबाइल या फिर फ़ोन पर लोगों से बात कुछ पूछने के नाम पर यह पूछ रहे हों कि कि क्या हम ईवीएम की बजह से हारे हैं। तो नेता पर शक तो कोई भी कर ही सकता है ना! तब भला फ़ैक्ट्री फ़ाइंडिंग का मतलब भी क्या रह जाता है। अब भला हरियाणा हार का घूँट तो कांग्रेसी पाकर रह जाएंगे पर चिंता तो बाक़ी उन सूबों की सता रही है जहां हरियाणा हार का असर पड़ता कांग्रेसियों को दिख रहा है। भला होता कि गुटबाज़ी छोड़ कांग्रेसी हरिया जीतते और फिर बाक़ी सूबों में सीना तान कर चुनाव लड़ रहे होते।

हरियाणा में जीत और जम्मू-कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन से भाजपा ही नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्साहित हैं। और तभी अब संघ महाराष्ट्र या झारखंड के चुनाव के लिए ही नहीं दिल्ली चुनाव को जीतने की तैयारी में लगा बताया जा रहा है। पिछले दिनों संघ की रणथंभोर में हुई दो दिन की बैठक हुई बैठक से दिल्ली के नेता खुश हैं। यह अलग बात है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की लोकसभा चुनावों के दौरान संघ को लेकर बयानबाज़ी से संघ के नेता नाराज़ बताए जा रहे थे पर हरियाणा की जीत ने इस नाखुशी को ख़त्म कर दिया ।चर्चा तो यह भी बताई जा रही है कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को लेकर भी संघ अब दखल देने की जगह खुद को अलग रखे हुए हैं।

भाजपा के ही कुछ नेतो यहाँ कह रहे हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की संघ को लेकर बयानबाज़ी के बाद संघ के मोंहन भागवत की नाराजग़ी के बावजूद जानते थे कि उनकी यह नाराजग़ी हरियाणा चुनाव में जीत के बाद ख़त्म हो जाएगी ,और हुआ भी ऐसा ही। संघ के ही एक अदने क़द के नेता तो यह भी कहने नहीं चूके कि संघ जानता है कि मोदी है तो मुमकिन है। ज़ाहिर है कि 2025 में विभिन्न राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर संघ तैयारी में लग गया है। बताया तो यह भी जा रहा है कि रणथंभोर में हुईसंघ की मीटिंग में ही दिल्ली चुनाव को लेकर भाजपा विधायकों,सांसदों और प्रांत व विभाग प्रमुखों को चुनावों की तैयारी में लग जाने को कह दिया है। दिल्ली के वरिष्ठ भाजपा विधायक की मानो तो संघ और पार्टी इस बार किसी भी शर्त पर दिल्ली का अपना वनबास ख़त्म करना चाहती है। अब संघ के बूते भाजपा क्या कर गुजरती है देखना बाक़ी है।

भाजपा दिल्ली की सत्ता के लिए बेताब हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता में बैठी आप पार्टी के अलावा कांग्रेस से चुनौती मिलनी है। दिल्ली के बदलते हालातों को देख भाजपा को आप पार्टी कमजोर होती दिख रही है। पार्टी के कई नेता मान बैठे हैं कि आप का मुस्लिम और दलित वोट आप से खिसक कर कांग्रेस की ओर जा सकता है ऐसे में इन दोनों पार्टियों के बीच वोटों की खींचातानी से भाजपा को राजनीतिक तौर पर फ़ायदा हो सकेगा। और तभी भाजपा इस चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती है। अब अगर कोई यह मान रहा हो कि भाजपा की यह रणनीति लोकसभा चुनाव के बाद बनी है तो ऐसा भी नहीं है। भाजपाई सूत्र मानते हैं कि लोकसभा चुनावों में टिकट बँटवारे के पहले ही भाजपा दिल्ली को लेकर चिंतित थी। और तभी उसने अपने सात में से छह सांसदों के टिकट काट नए चेहरे मैदान में उतारे। और सभी जीते भी। पर इनमें से तीन सांसदों को विधानसभा चुनावों उतारे जाना तय माना जा रहा है ।

इनमें रमेश बिधूडी ,प्रवेश वर्मा,और मीनाक्षी लेखी शामिल बताए जा रहे हैं। अब भले बाक़ी पूर्व सांसदों पर पार्टी दांव लगती है या नहीं यह अलग बात है पर चर्चा तो है कि इन तीनों को चुनाव की तैयारी शुरू करने के लिए भी कह दिया गया है। दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल फऱवरी 2025 तक है। यानी चुनाव इसके बाद ही होने हैं। सत्ता में बैठी आप पार्टी ने चुनावी तैयारी एक हफ़्ते पहले ही से की हुई है। कांग्रेस ने ब्लाक और जि़ला स्तर पर संगठन को मज़बूत करना शुरू कर दिया है। तो भाजपा पीछे भी कैसे रहती सो उसने भी जिताऊ नेताओं से तैयारी का इशारा किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें बेख़ौफ़ जीती हैं सो हौसला उसका भी कोई कम बुलंद नहीं है। मुक़ाबला तिकोना होना है। तीनों पार्टियों में इस बार घमासान है।


ब्रिक्स में मोदी के रुख अहम और विचारणीय

हरिशंकर व्यास
लाख टके का सवाल है कि भारत का रूपया चीन की युआन, रूस के रूबल करेंसी के लेन-देन में सुरक्षित है या डालर की व्यवस्था में? आजादी के बाद विश्व व्यापार में भारत का डालर में लेन-देन क्या भरोसेमंद या सुरक्षित था या नहीं? और यदि सुरक्षित था तो वह क्यों चीन-रूस की युआन-रूबल की नई विश्व लेन-देन व्यवस्था का ग्राहक या साझेदार बने? क्या चीनी वर्चस्वता की व्यवस्था में भारत की व्यापारिक-आर्थिक संप्रभुता को अधिक गांरटी होगी? यह सवाल कजाक की ब्रिक्स बैठक में पुतिन, शी जिन पिंग के एजेंडे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूख में अंहम और विचारणीय है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने मिसाल दी कि रूस और चीन अब अपना 95 प्रतिशत व्यापार रूबल और युआन में कर रहे है। उन्हे अमेरिकी डालर केंद्रीत अंतरराष्ट्रीय लेन देन व्यवस्था, स्विफ्ट की जरूरत नहीं है।

सवाल है पुतिन को ऐसी लॉबिग करने की जरूरत क्यों है? इसलिए क्योंकि यूक्रेन की लड़ाई के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर पाबंदियां लगाई है। वही चीन अपने आर्थिक साम्राज्य, भविष्य की सभ्यतागत धुरी के उद्देश्यों में, दुनिया के स्थाई नबर एक औद्योगिक कारखाने, व्यापार की नंबर एक हैसियत में स्वभाविक तौर पर सालों से चाह रहा है कि वैश्विक लेनदेन में डालर की जगह उसकी युआन करेंसी का उपयोग हो।
कजाक की ब्रिक्स बैठक का यह प्रमुख उद्देश्य था। लेकिन गनीमत है जो भारत और ब्राजिल चीन के असली मकसद (वर्चस्वता) को लेकर सर्तक है। चीन ने पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ( बीआरआई) और अब ब्रिक्स के नाम पर नई वैश्विक वित्तिय व्यवस्था का तानाबाना बनाया है। भारत उससे बचता, दूर रहता दिख रहा है। और यह सही है। कोई हर्ज नहीं है जो दो देश अपनी-अपनी करेंसी में एक-दूसरे याकि द्विपक्षीय आधार पर व्यापार करें। रूस और भारत में दशकों रूबल और रूपए में लेनदेन रहा है।

अभी भी है। लेकिन भारत कैसे चीनी करेंसी युआन की प्राथमिकता में अपना लेनदेन बना सकता है? रूस, चीन, पाकिस्तान जैसे मवाली देशों की करेंसियों के एक्सचेंज में रूपए को क्यों बांधे? पहली बात इन करेंसियों में वैश्विक पैमाने की संपदा और लेनदेन नहीं है। दूसरे रूस और चीन जब व्यवहार में मवालीपना, देशों की एकता-अखंडता में हमलावर, वर्चस्ववादी, आंतकवाद के पोषक तथा हवाला लेन-देन वाले है तो इनकी टोकरी में अपने रूपए को रख भारत कितनी जोखिम मोल लिए हुए होगा? चीन और रूस नियंत्रित किसी भी सिस्टम में पारदर्शिता क्या हो सकती है, इसे समझना मुश्किल नहीं है।

हकीकत है कि एक योरोपीय देश बेल्जियम से संचालित अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम की पारदर्शिता पर कभी ऊंगली नहीं उठी। इसकी करेंसी डालर है। इसलिए आंतकवाद, रूस-चीन-पाकिस्तान जैसे मवाली देशों के दो नंबरी या आंतकवादी फंडिग की लेन-देन का पता लग जाता है। कल्पना करें, इसकी जगह मास्को या बीजिंग में युआन करेंसी के अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम में काम हुआ तो उससे भारत क्या आंतकी फंडिग का सही ब्यौरा पा सकेगा? यह एक्सचेंज रूपए की रेट में उतार-चढ़ाव में लगड़ी मारते हुए क्या नहीं होगा? अन्य शब्दों में नए अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम में भारत के लिए सुरक्षा, भरोसे, पारदर्शिता की क्या गारंटी है? सही है मौजूदा स्विफ्ट व्यवस्था में डालर के कारण अमेरिका का रूतबा है।

अमेरिका और पश्चीमी देश हमलावर रूस पर पाबंदी लगाते है या आंतकवादी संगठनों के खिलाफ जंग का ऐलान करते है तो रूस और आंतकी संगठनों की सचमुच कमर टूटती है लेकिन उससे भारत को नुकसान है या लाभ? क्या भारत को सीमा पर चीन, पाकिस्तान के मवालीपने का अनुभव नहीं है? क्या आंतकियों का उसे स्थाई खतरा नहीं है? फिर इस सत्य की भी कैसे अनदेखी हो सकती है कि विश्व व्यापार का अस्सी प्रतिशत लेनदेन, बिलिंग डालर में हो रही है वहीं दुनिया भर के बैंकों का विदेशी मुद्दा कोष 60 प्रतिशत डालर करेंसी में रिजर्व है।
इसलिए अच्छा हुआ, जो कजाक में पुतिन-शी जिन पिंग के वेकल्पिक अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्साह नहीं दिखाया।


सोने की लगातार बढ़ती चमक

सतीश सिंह
मार्च 2019 से मार्च 2024 के दौरान सोने की कीमत में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।  मौजूदा परिदृश्य में यह दिसंबर तक 80 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर सकता है।  एक जनवरी 2024 को 24 कैरेट 10 ग्राम सोने की कीमत 63,352 रुपये थी, जो 79,710 रुपये के स्तर पर है।  सोने की कीमत में निरंतर वृद्धि होने के कारण सितंबर में वैश्विक बाजार में सोने का औसत दैनिक कारोबार 18 लाख करोड़ रुपये हो गया था, जो अप्रैल 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत कम है, पर 2023 के औसत 13. 6 लाख करोड़ रुपये से 32. 51 प्रतिशत अधिक है।

वैश्विक आर्थिक माहौल के नरम रहने, कुछ देशों में मंदी की आशंका, लंबे समय से भू-राजनीतिक संकट कायम रहने, अमेरिका के फेडरल रिजर्व द्वारा 18 सितंबर को नीतिगत दरों में 0.50 आधार अंकों की कटौती करने आदि के कारण निवेशकों का भरोसा डॉलर पर से उठ रहा है और लोग सोने में निवेश करना बेहतर समझ रहे हैं।  भारत में लंबे समय से नीतिगत दरों में बदलाव नहीं किया गया है, जिससे बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थानों में जमा पर ब्याज दर कम है।  तो, निवेशक अधिक प्रतिफल के लिए सोने में निवेश कर रहे हैं।

कीमत बढ़ने से इसके प्रतिफल में भी तेजी आयी है।  निवेशकों को एक सप्ताह में 0. 2 प्रतिशत, एक महीने में 0. 4 प्रतिशत, 2024 में 21 प्रतिशत, एक साल में 30 प्रतिशत और तीन सालों में 62 प्रतिशत का प्रतिफल मिला है।  भारतीय मानक ब्यूरो ने 14, 18, 22, 23 और 24 कैरेट से बने आभूषणों का 2022 से हॉलमार्किंग कर रखा है।  आगामी जनवरी से केंद्र सरकार आभूषण निर्माण में इस्तेमाल होने वाली हॉलमार्किंग को अनिवार्य करने जा रही है, जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है।  हॉलमार्किंग को लेकर बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है।

हॉलमार्क अनिवार्य होने से आभूषणों की शुद्धता सुनिश्चित करना संभव हो सकेगा।  इससे यह भी पता चल सकेगा कि पहले और आभूषण बनने के बाद सोने की गुणवत्ता कितनी प्रभावित हुई है, जिससे निवेशकों को बेहतर प्रतिफल मिलने में मदद मिलेगी।  वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, स्विट्जरलैंड ने मई 2024 में दुनिया में सबसे अधिक 2,461 करोड़ रुपये का सोना खरीदा, जबकि चीन ने 2,109 करोड़ रुपये का।  भारत 722 करोड़ रुपये की खरीद के साथ तीसरे स्थान पर रहा।  बीते पांच वित्त वर्षों में भारत ने अपने सोने की जमा में लगभग 204 टन की बढ़ोतरी की है।  मार्च 2019 में 618. 2 टन सोना भारतीय रिजर्व बैंक में जमा था, जो 31 मार्च 2024 को 33 प्रतिशत बढ़कर 822. 1 टन हो गया।  इसमें से 408. 3 टन देश में और 413. 8 टन विदेश में जमा था।

सोने के भंडार के मामले में अमेरिका 8,133. 46 टन के साथ दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि जर्मनी 3,352. 65 टन सोना के साथ दूसरे स्थान पर।  इटली 2,451. 84 टन के साथ तीसरे स्थान पर है।  फिर फ्रांस, रूस, चीन, स्विट्जरलैंड, जापान, भारत और नीदरलैंड जैसे देशों का स्थान है, जो वैश्विक स्तर पर क्रमशः पांचवें, छठवें, सातवें, आठवें, नौवें और दसवें स्थान पर हैं।  यह एक स्थापित और जगजाहिर तथ्य है कि सोने का महत्व अतुलनीय है।  यदि किसी देश की मुद्रा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होती है, तो सोने का भंडार उस देश की क्रय शक्ति और आर्थिक स्थिरता को बनाये रखने में प्रमुखता से मदद करता है।

वर्ष 1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में थी और उसके पास आयात करने के लिए पर्याप्त मात्रा में डॉलर नहीं थे, तो भारत ने सोने को गिरवी रखकर पैसे जुटाये थे और एक गंभीर आर्थिक संकट से बाहर निकलने में सफल रहा था।  यदि किसी देश के पास पर्याप्त सोने का भंडार है, तो उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत माना जाता है।  इससे यह भी पता चलता है कि वह देश अपनी अर्थव्यवस्था प्रबंधन अच्छी तरह से कर रहा है।  दूसरे देश और वैश्विक वित्तीय संस्थान भी ऐसे देश पर ज्यादा भरोसा करते हैं।  इस तरह, सोने का भंडार किसी भी देश की मुद्रा की कीमत का समर्थन करने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करता है।

भारत में सोने का महत्व आदिकाल से बना हुआ है और मौजूदा परिप्रेक्ष्य और आने वाले दिनों में भी इसकी मांग में कमी आने के आसार नहीं हैं।  भारतीय रिजर्व बैंक और दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा अधिक खरीद करने के कारण भी सोने की कीमत में इजाफा हुआ है।  देश में सोने की खरीद-फरोख्त और सोने की हॉलमार्किंग करने के कारण निवेशकों का सोने में निवेश करने के प्रति भरोसा बढ़ रहा है, जिसके कारण भी सोने की कीमत में वृद्धि हो रही है।  निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि सोना देश के वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में निवेशकों को आकर्षक प्रतिफल दे रहा है एवं वैश्विक स्तर पर प्रमुख देशों की अर्थव्यवस्था के नरम रहने, डॉलर में कमजोरी आने, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक संकट के बने रहने, महंगाई से पूरी तरह से राहत नहीं मिलने, सोने की मांग लगातार बढ़ने आदि कारकों के कारण हाल-फिलहाल में सोने की कीमत कम नहीं होने वाली है।


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