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ओपिनियन और एग्जिट पोल सब गलत साबित हुए

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ओपिनियन और एग्जिट पोल सब गलत साबित हुए

हरिशंकर व्यास
सोशल मीडिया में लगभग सन्नाटा है। यूट्यूब चैनल्स पर भी कोई खास शोर-शराबा नहीं है। मीडिया समूहों ने अपने चैनलों पर झारखंड विधानसभा के लिए पहले चरण के मतदान के बाद ओपिनियन पोल्स प्रसारित किए लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया और न किसी ने उनको गंभीरता से लिया। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के आधार पर कोई भी पार्टी जीत का दावा भी नहीं कर रही है। मीडिया समूह खुद ही अपने सर्वेक्षण को लेकर भरोसे में नहीं हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि लोकसभा चुनाव के समय तक जो ओपिनियन और एक्जिट पोल में जो बड़े नाम माने जाते थे वे तस्वीर से बाहर हो गए हैं। असल में लोकसभा चुनाव और उसके बाद हरियाणा विधानसभा चुनाव ने तमाम सर्वे एजेंसियों, मीडिया समूहों, सोशल मीडिया के योद्धाओं और यूट्यूब चैनल्स के पक्षपाती व अपेक्षाकृत निष्पक्ष पत्रकारों को भी गलत साबित कर दिया। किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर क्या हुआ।

चार महीने में दूसरी बार ज्यादातर मीडिया समूह, सर्वे एजेंसियां और सोशल मीडिया के राजनीतिक विश्लेषक गलत साबित हुए। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में ज्यादातर मीडिया समूहों और सर्वे एजेंसियों ने भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की थी। कई समूह तो ऐसे थे, जिन्होंने एक्जिट पोल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘अबकी बार चार सौ पार’ के नारे को साकार होता देखा था। भाजपा को तीन सौ से चार या उससे भी ज्यादा सीटें मिलने की भविष्यवाणी की जा रही थी। हालांकि ‘नया इंडिया’ के इसी ‘गपशप’ कॉलम में चार जून के नतीजों से ठीक पहले वाले शनिवार यानी एक जून को संभावित नतीजों की टेबल छपी थी, जिसमें भाजपा को 235 सीटें  मिलने का अनुमान लगाया गया था।

ओपिनियन और एक्जिट पोल सब गलत साबित हुए। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने 204 सीटें जीत ली और भाजपा 240 सीट पर रह गई। उसके बाद हुए हरियाणा और जम्मू कश्मीर के चुनाव में तमाम सर्वे एजेंसियों और मीडिया समूहों ने सावधानी बरती। फिर भी सब गलत साबित हुए। लगभग सभी सर्वेक्षणों में कांग्रेस को जीतते हुए दिखाया गया था। लेकिन सारी अटकलों को गलत साबित करते हुए भाजपा तीसरी बार जीत गई। उसके बाद दो तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक प्रतिक्रिया में कांग्रेस पर जोरदार हमला हुआ। राहुल गांधी के करीबी नेताओं पर टिकट बेचने और 10 तरह की गड़बड़ी के आरोप लगे। दूसरी प्रतिक्रिया ईवीएम के जरिए भाजपा के जीत जाने की थी।


वायु प्रदूषण की जंग को गंभीरता से लेना होगा

श्रुति व्यास
भारत और पाकिस्तान लड़ रहे है, पर एक दूसरे से नहीं  बल्कि जहरीली हवाओं से। अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने उपग्रह से एक तस्वीर खींची है जिसमें जहरीली धुंध की एक मोटी चादर पूर्वी पाकिस्तान से लेकर पूरे उत्तर भारत पर छाई हुई है। लाहौर तो मोटी जहरीली चादर से इस हद तक ढका हुआ है कि नजर तक नहीं आ रहा है। जनता पीड़ा झेल रही है, सांस लेना मुहाल है और जिंदा रहना मुश्किल होता हुआ है। हवा में जलने की बदबू घुली है, आंखों में चुभन है तो गले में जलन।

जनाब शहरयार की गज़़ल की इस पंक्ति सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है का सन्दर्भ भले भले ही दूसरा हो, मगर आज इससे लाहौर से लेकर दिल्ली तक की स्थिति का सटीक वर्णन हैं।

पिछले हफ्ते स्विस संस्था आईक्यूएयर ने लाहौर का प्रदूषण सूचकांक 1,165 बताया था। वहां स्कूल बंद कर दिए गए हैं और रोजीरोटी कमाने के काम रूक से गए हैं।
दिल्ली में हालात आज बहुत बिगड़े। शहर छोडक़र नीले गगन और साफ हवा वाली जगह पर चले जाने की जरूरत महसूस हुई। दीपावली के 13 दिन बाद, 13 नवंबर को दिल्ली की सुबह मलिन और धूल-धुंध भरी थी। मुझे सुबह उठते ही अपने लिविंग रूम में पेट्रोल या डीजल के जलने जैसी गंध का अहसास हुआ। एयर प्यूरीफायर्स के मीटर खतरनाक स्तर दर्शाने वाले लाल रंग पर थे। एक्स के जरिए सूचना दी जा रही थी कि दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार में एक्यूआई 1696 तक पहुंच गया है। धुएं भरा मटमैला आसमान, थमी हुई हवा, जलने की बदबू, नजर न आने वाली लपटें, खराश भरे गले, बीमारी और जल्दी मौत के मुंह में चले जाने का भय – मुझे डिप्रेशन महसूस होने लगा। बुधवार को दिल्ली में आधिकारिक रूप से ‘प्रदूषित मौसम’ का आगाज था।

वे दिन बीत गए जब दिल्ली की सुबहें ठंडी और स्फूर्तिदायक होती थीं। दोपहरें सुहानी होती थीं और हवा में पेड़ों से गिरी पत्तियों की गंध होती थी। रक्तिम शामें, अपने साथ सर्दी का अहसास लाती थीं।  हम लोधी गार्डन में टहलते थे, सर्दी की धूप में छत पर बैठते थे। मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूं कि लाहौर में भी सर्दी का मौसम इतना ही खुशनुमा होता होगा। अब वह सब एक सपना, एक कल्पना लगता है।

जो दिल्ली के बाहर जा सकते हैं, वे जा रहे हैं। जिनके सामने कोई चारा नहीं हैं, वे जितने दिन काम करते हैं उससे ज्यादा दिन बीमार होकर घर में कैद रहते हैं। मेरा मानना है कि चूंकि केन्द्र एवं राज्य सरकारें इस मौसमी प्रदूषण का कोई हल निकालने में असफल रही हैं, इसलिए उन्हें एक कानून बनाना चाहिए कि नवंबर से जनवरी तक के तीन महीने वर्क फ्राम होम एवं लर्न फ्राम होम होंगे। यदि आप युद्ध लडऩा नहीं जानते तो कम से कम आपको अपने लोगों को सुरक्षित शरणस्थल तो मुहैया कराना ही चाहिए।

जहां तक भारत और पाकिस्तान के रिश्तों का सवाल है, चूंकि मौसम दोनों देशों के लिए विषाक्त है, इसलिए दोनों देशों के बीच ‘धुंध कूटनीति’ प्रारंभ करने की बातें होने लगी हैं। पाकिस्तानी पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज, जो इन हालातों के लिए भारत को दोषी ठहराती हैं – भारतीय पंजाब के किसानों द्वारा पराली जलाने के कारण – ने कहा है कि जब तक दोनों पंजाब मिलकर कदम नहीं उठाते तब तक इस समस्या से निपटना मुमकिन नहीं है।  भारत ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है।

मुझे पता है कि हमारे चीन से रिश्ते भी कुछ हद तक ‘विषाक्त’ हैं, लेकिन समस्या की गंभीरता के मद्देनजर हमें इस ‘प्रदूषण ऋतु’ से निपटने के बारे में उससे कुछ सबक सीखने चाहिए। बीजिंग, जिसे ज़हरीली हवा का शहर कहा जाता था, की वायु आज पहले से बेहतर है। जहां हम अभी भी आतंकित हैं, वहीं चीन को कामयाबी इसलिए हासिल हुई क्योंकि वहां सरकार से लेकर जनता तक – सबने वायु प्रदूषण से मुकाबले में अपनी-अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाई। कोयले का उपयोग कम करके उसके स्थान पर गैस और ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल करने पर बहुत जोर दिया। सरकार ने इलेक्ट्रिक कारों को खरीदना, पेट्रोल कारों की खरीददारी से आसान बना दिया। कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को बंद किया गया, विश्व की सबसे बड़ी प्राकृतिक गैस चलित परिवहन प्रणाली स्थापित की गई और उसका संचालन शुरू हुआ। पुराने व्यावसायिक वाहनों को सडक़ों से हटाने का हुक्म दिया गया, प्रदूषण के अपेक्षाकृत कड़े मानक लागू किए गए और एक बढिय़ा मेट्रो सेवा प्रारंभ कर उसके उपयोग को प्रोत्साहित किया गया।

लेकिन, हमारे यहां आधी-अधूरी योजनाएं बनाई जाती हैं, गलत नीतियां बनाई जाती हैं और पड़ोसी राज्यों से समन्वय और सहयोग नहीं होता है। जबकि  जी भर कर राजनीति की जाती है, जिससे सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाता है।  नतीजा यह कि यह ऐतिहासिक महानगर धुएं और धुंध में डूबता जा रहा है।

मुझे लगता है कि पाकिस्तान चीन से मदद की गुहार करेगा और उससे वायु शुद्ध करने वाले उपकरण प्राप्त करेगा। लेकिन भारत तो विश्व गुरू है। और अगर उसे विश्व गुरु का खि़ताब अपने पास रखना है तो उसे वायु प्रदूषण के खिलाफ चल रही इस जंग को गंभीरता से लेना होगा। इसके पहले कि सब कुछ बर्बाद हो जाए।


बदलते भारत की बदलती तस्वीर

जया वर्मा सिन्हा
विविधताओं से भरा अपना देश निराला है। अपने यहाँ, चीज़ों को अलग नज़रिए से देखने की प्रशस्त परंपरा रही है। हमारे लिए गंगा और गोदावरी नदियों के नाम नहीं, जीवन दायिनी माँ के पर्यायी हैं। संगीत, कानों को सुख देने का सिफऱ् साधन नहीं, सुरों की साधना का ज़रिया है।कुछ वैसे ही, हम देशवासियों के लिए, भारतीय रेल, महज़ एक अदद इंजन और डेढ़ दर्जन डिब्बों से लैस गाड़ी नहीं, घर परिवार से दूर जीविकार्जन कर रहे हमारे श्रमिकों, किसानों, जवानों और करोड़ों नागरिकों का अपने परिवारों और प्रियजनों से भावनात्मक रिश्तों को जोड़ता एक पुल है। पूरब से पश्चिम, और उत्तर से दक्षिण बिछी पटरियों पर सिफऱ् हमारी ट्रेनें नहीं दौड़तीं – उनसे होकर रिश्तों के एहसास गुजऱते हैं। विराट भारत देश की विविधताओं को अपने अंतर में समेटे, भारतीय रेल, भारत सरकार की प्रतिनिधि भी है, और देशवासियों की आकांक्षाओं का प्रतीक भी!

इन आकांक्षाओं की अग्नि परीक्षा हर साल त्योहारों के मौसम में होती है, जब परिवार से दूर जीवन यापन कर रहे करोड़ों देशवासी अपने घरों को लौटते हैं। महानगरों की गुमनामी भरी जि़न्दगी में, साल भर की जी तोड़ मेहनत के बाद, अपनों से मिलने के अरमान लिए ये मेहनतकश एक विशाल समूह में निकल पड़ते हैं रेल के सफऱ पर। संख्या इतनी ज़्यादा, कि अगर आपने उस परिवेश में कभी काम ना किया हो, तो देखते ही हाथ-पाँव फूल जायें। और, अगर बात त्योहार और विशेष दिनों में उमड़ते जन-सैलाब की हो, तो सिफऱ् रेल संचालन से बात नहीं बनती। आपको रेलवे स्टेशन पर आये लोगों के सुचारू रूप से ठहरने, टिकट खऱीदने, जलपान आदि की भी पर्याप्त व्यस्तता करनी होती है। इसके लिए रेल अधिकारी-कर्मचारियों के अलावा स्वयं सेवी संगठनों का भी सहयोग मिलता है। भारतीय रेल प्रशासन को करोड़ों की संख्या में आये यात्रियों को अपने गंतव्यों तक पहुँचने का कई दशकों का अनुभव है, पर अब सारी कोशिश इस अनुभव को क्रमश: सुखद बनाने की है।

अगर विदेशी मेहमानों से कभी इस विषय पर चर्चा हो, तो वे दांतों तले उँगलियाँ दबा लेते हैं। यातायात प्रबंधन की जानकारी रखने वाले कई साथी, यह सुनकर कि त्योहारों के दौरान रेलवे ने एक लाख सत्तर हज़ार ट्रेनों के फेरों के अलावा 7,700 विशेष ट्रेनों का संचालन किया, हैरत में पड़ जाते हैं। अब आप, सूरत के पास स्थित औद्योगिक शहर ऊधना को ही ले लीजिये – यहाँ के रेलवे स्टेशन से प्रतिदिन औसतन सात-आठ हज़ार यात्रियों का आवागमन होता है – चार नवंबर को इस छोटे से स्टेशन पर चालीस हज़ार से ज़्यादा की भीड़ उमड़ आयी। अगर, रेलवे प्रशासन ने एक टीम की तरह काम करते हुए उचित व्यवस्थाएँ ना की होती, तो यात्रियों की परेशानी का अन्दाज़ लगाना भी मुश्किल होता। त्योहार के दौरान, देश भर में सबसे अधिक  आवागमन नई दिल्ली स्टेशन से हुआ। इस अवधि में सिफऱ् इस स्टेशन से, यात्रियों की माँग पर एक दिन मे 64 स्पेशल और 19 अनारक्षित ट्रेनों का संचालन किया गया।

विदेशी मेहमानों से भरी एक सभा में जब त्योहारों में रेल यात्रा की चर्चा हुई, तो एक राजनयिक यह सुनकर दंग रह गये कि इस साल अकेले छठ महापर्व के पहले, 4 नवम्बर को, लगभग 3 करोड़ लोग ट्रेन से अपने गंतव्यों तक गये, और त्योहार के दिनों में तो रेलवे ने लगभग 25 करोड़ यात्रियों को यात्रा करने में मदद की। संबंधित राजनयिक ने, हल्की मुस्कान के साथ कहा कि पाकिस्तान की कुल आबादी से ज़्यादा लोगों ने तो महज़ कुछ दिनों में ही आपकी ट्रेनों में यात्रा की!

भारतीय रेल को यह एहसास है कि देश के पूर्वी हिस्सों से बड़ी संख्या में उद्योग केंद्रों में श्रम कर रहे हमारे इन भाई-बहनों का देश के निर्माण में अहम किरदार है। जम्मू की अटल टनल से लेकर मुंबई की सी-लिंक तक, और बेंगलुरु की आई-टी प्रतिष्ठानों से लेकर दिल्ली के निर्माणाधीन भवनों तक को, पूरब की मिट्टी में रचे बसे लोगों ने अपने हाथों से गढ़ा है। देश की सीमाओं पर तैनात फ़ौज या सीमा सुरक्षा बल के जवान हों, पंजाब के खेतों में फ़सल उगा रहे मज़दूर, सरकारी ऑफिसों तथा निजी संस्थानों में सेवारत कर्मचारी, बड़े-बुज़ुर्ग, या देश की प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में पढ़ रहे विद्यार्थी, ये सब अपने अपने तरीक़ों से आज और आनेवाले कल के भारत को गढ़ रहे हैं।

भारतीय रेल भी आधुनिक तकनीक और सुविधाओं से लैस वन्दे भारत, अमृत भारत, नमो भारत जैसी ट्रेनों के लगातार विस्तार और देशभर में हजार से ज़्यादा रेलवे स्टेशनों को अमृत स्टेशन में बदलकर एक नयी और विश्वस्तरीय यात्रा पर चल पड़ी है। बदलते भारत की बदलती तस्वीर भारतीय रेल के स्वरूप मे अब उभरने लगी है।


ट्रंप की नीतियां हिंदुओं पर सर्वाधिक भारी

हरिशंकर व्यास
दुनिया के अधिकतर सभ्य, विकसित और लोकतांत्रिक देशों में जिस एक कौम को सबसे ज्यादा सम्मान और प्रेम के साथ स्वीकार किया जा रहा था, जिसे कोई दूसरी कौम अपने लिए खतरे की तरह नहीं देखती थी वह हिंदू कौम थी। लेकिन पिछले 10 साल में क्या हुआ है? पूरी दुनिया में हिंदुओं के प्रति घृणा बढ़ी है। उनके खिलाफ हेट स्पीच बढ़े हैं और उनको निशान  बनाने की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में, जहां लगभग 45 लाख भारतीय आबादी बताई जाती है, और जिसमें अधिकांश हिंदू हैं वहां भी हिंदुओं का जीवन मुश्किल हुआ है। भारत में चल रही जातीय व धार्मिक बहस वहां तक जा पहुंची है।

पिछले साल कैलिफोर्निया स्टेट में जातिगत भेदभाव को रोकने का विधेयक लाया गया था। यह विशुद्ध रूप से भारत को निशाना बनाने वाला विधेयक था। इसकी शुरुआत अमेरिका की टेक्नोलॉजी कंपनी सिस्को और उसके दो इंजीनियरों के खिलाफ एक भारतीय नागरिक के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करने के मामले से हुई थी। इस मुकदमे के आधार पर जातिगत भेदभाव रोकने का बिल आया। इसके खिलाफ कैलिफोर्निया के हिंदू समूहों ने प्रदर्शन भी किया। इसके बावजूद राज्य विधानसभा से यह बिल पास हो गया। बाद में कोलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने इसे वीटो करके रोक दिया।

हालांकि इसके बावजूद पूरे अमेरिका में इसकी व्यापक कवरेज हुई, जिसमें हिंदू समाज निशाने पर था। चौतरफा बदनामी हुई। भले कारोबारी स्तर पर हिंदुओं की पूछ बढ़ी है लेकिन एक समाज और संस्कृति के तौर पर उनकी बदनामी हुई है। चाहे जाति का मामला हो, भारत में धर्म के आधार पर होने वाले विभाजन का मामला हो या खालिस्तान का मामला हो हर बार अमेरिका में हिंदू निशाने पर आए। कट्टरपंथी गोरों के साथ  साथ अपने ही देश के सिख और दूसरे कई देशों के मुस्लिम उनको दुश्मन की तरह देखने लगे। आने वाले दिनों में हिंदुओं की मुश्किल और बढऩे वाली है क्योंकि राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप जो नीतिगत फैसले करने वाले हैं उनमें से कई फैसलों का शिकार हिंदू होंगे। ट्रंप नागरिकता देने वाले कानून में बदलाव करेंगे, और केवल ग्रीन कार्डधारक के बच्चों को ही जन्म से तब नागरिकता मिलेगी।

इसका नुकसान 10 लाख भारतीयों को होने वाला है। अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए ट्रंप सख्त कानून ला रहे हैं तो पहले से रह रहे अवैध प्रवासियों को निकालने के लिए दो सौ साल से ज्यादा पुराने कानून का सहारा लेंगे। इस कानून के तहत सरकार 14 साल से ज्यादा उम्र के किसी भी व्यक्ति को अवैध प्रवासन के आधार पर देश से निकाल सकती है। इसका भी नुकसान भारतीय हिंदुओं को अधिक होगा। सोचें, अच्छे दिन की उम्मीद में 2014 में भारत के हिंदुओं ने जो सरकार बनाई थी उसका क्या हासिल है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात से सबसे बड़ी संख्या में हिंदू भाग रहे हैं। वे अमेरिका, कनाडा जा रहे हैं।

गुजरात और पंजाब से लोग जहाज भर कर लैटिन अमेरिकी देशों में जाते हैं और वहां से डंकी रूट से कनाडा और अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रयास में इस साल अभी तक एक सौ भारतीय नागरिक मरे हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। हर घंटे अमेरिका की सीमा पर 10 भारतीय अवैध रूप से अमेरिका में घुसने की कोशिश में पकड़े जा रहे है, इनमें पांच गुजराती होते हैं। इस साल अब तक 90 हजार से ज्यादा लोग पकड़े जा चुके हैं। अमेरिका में अवैध प्रवासियों को पकडऩे और निकालने का अभियान जोर पकड़ेगा, तो मेक्सिको के नागरिकों के बाद सबसे बड़ा शिकार हिंदू होंगे। अमेरिका हो या कनाडा दोनों जगह हिंदू पीटे जा रहे हैं, अपमानित हो रहे हैं और निकाले जा रहे हैं।

सोचें, 10 साल में कहां से कहां पहुंच गए! 10 साल पहले इस तरह से देश के अमीर, गरीब और मध्य वर्ग के लोग भागते हुए नहीं थे। उनमें देश छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता लेने की होड़ नहीं मची थी। लेकिन पिछले 10 साल में 12 लाख से ज्यादा लोग भारत की नागरिकता छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता ले चुके हैं। सवाल है कि 10 साल में देश में ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से लोग देश छोड़ कर भागना चाह रहे हैं? या तो वे बेहतर जीवन की तलाश में जा रहे हैं या अपनी और अपने बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा की चिंता से जा रहे है?
भारत में ट्रंप की जीत की खुशी मनाई जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप की नीतियां हिंदुओं पर सर्वाधिक भारी पडऩे वाली है। नागरिकता कानून के साथ साथ ट्रंप वीजा के नियम भी बदलने वाले हैं, जिससे भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए वहां वीजा लेना मुश्किल होगा।

एच वन वीजा की संख्या सीमित होगी तो एच फोर वीजा के कानून में बदलाव होगा। इस कानून के तहत अमेरिका में एच वन वीजाधारक के आश्रित को रहने और काम करने की आजादी मिलती है। इसे ट्रंप बदल देंगे। उनकी संरक्षणवादी नीतियों से हिंदुओं की मुश्किल बढ़ेगी तो भारतीय कंपनियों के लिए भी कामकाज मुश्किल होगा। यह भी उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अमेरिकी कांग्रेस की कमेटियां भारत में धार्मिक और जातीय भेदभाव पर हर साल देने वाली अपनी रिपोर्ट में भारत को लेकर चिंता जताना बंद कर देंगी।


अमेरिका के साथ भारत के संबंध अब भी अच्छे

एस. सुनील
ट्रंप का एक और भाषण जो भारत में बहुत प्रसारित हुआ उसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहा है वह बर्बर है। दुनिया का कोई नेता, जब बांग्लादेश में प्रताडि़त हो रहे हिंदओं के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ तो ट्रंप हुए। क्या यह कोई मामूली बात है? क्या इस पर भारत के लोगों को खुशी नहीं मनानी चाहिए?

डोनाल्ड ट्रंप लौट आए हैं। अमेरिका के इतिहास में 131 साल में वे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने कमबैक किया है। चार साल राष्ट्रपति रहने और फिर बेहद कड़वाहट भरे चुनाव में हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद वापसी करके ट्रंप ने दिखाया है कि वे एक योद्धा हैं। उनके ऊपर महाभियोग चला। कई मुकदमे हुए। मुकदमे में सजा हुई। चुनाव प्रचार के दौरान उनके ऊपर गोली चली। लेकिन वे मैदान में डटे रहे और चुनाव जीता। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नतीजों के 24 घंटे से ज्यादा समय बीत जाने के बाद जब बधाई दी तो उनके साहस और योद्धा वाली भावना की तारीफ की और कहा कि वे ट्रंप के साथ यूक्रेन युद्ध पर बात करने के लिए तैयार हैं। ध्यान रखने की जरुरत है कि ट्रंप ने चुनाव प्रचार में कहा था कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद एक घंटे में यूक्रेन का युद्ध रूकवा देंगे। ट्रंप की जीत के बाद पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलदोमीर जेलेंस्की दोनों उम्मीद कर रहे हैं कि वे युद्ध खत्म कराएंगे। अगर ऐसा होता है तो सोचिए यह दुनिया के लिए कितनी राहत की बात होगी!

दुनिया का हर देश ट्रंप के लौटने को अपने हिसाब से देख रहा है और उस पर प्रतिक्रिया दे रहा है। यूरोप के देशों खास कर फ्रांस और जर्मनी की प्रतिक्रिया सधी हुई लेकिन आशंका वाली थी। ट्रंप के आने के बाद इमैनुएल मैक्रों और ओलाफ शुल्ज दोनों यूरोपीय संघ की एकजुटता की बात कर रहे हैं। ब्रिटेन की प्रतिक्रिया सामान्य थी लेकिन सबको पता है कि लेबर प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कोई बड़े प्रशंसक नहीं हैं। चीन के राष्ट्रपति ने तो उनको जीत पर निजी तौर पर बधाई ही नहीं दी। कुल मिला कर दुनिया के दो देश ऐसे हैं, भारत और इजराइल, जिनकी प्रतिक्रिया वास्तविक अर्थों में ट्रंप की जीत पर खुशी और संतोष वाली थी। इसी खुशी और संतोष के अंदाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अपने दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ को बधाई दी। नतीजों के तुरंत बाद उन्होंने बधाई दी और उसके थोड़ी देर बाद दोनों की बातचीत भी हुई, जिसकी जानकारी खुद प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी।

आश्चर्य नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप की जीत पर आम भारतीय नागरिकों ने भी खुशी मनाई। भारत के लोगों ने उनके भाषणों के वीडियो शेयर किए। उनके दो भाषण सबसे ज्यादा शेयर किए गए। अपने एक भाषण में ट्रंप ने कहा कि, ‘मैं हिंदुओं का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। अगर मैं चुनाव जीता तो हिंदुओं का, भारतीयों का एक सच्चा दोस्त व्हाइट हाउस में होगा’। उन्होंने आगे कहा, ‘भारतीय हिंदुओं की कई पीढिय़ों ने हमारे देश अमेरिका को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है’। अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव के 256 साल के इतिहास में किसी राष्ट्रपति ने भारत और हिंदुओं के बारे में इतनी सकारात्मक, सार्थक और अच्छी बातें नहीं कही हैं। ट्रंप का एक और भाषण जो भारत में बहुत प्रसारित हुआ उसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहा है वह बर्बर है। दुनिया का कोई नेता, जब बांग्लादेश में प्रताडि़त हो रहे हिंदओं के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ तो ट्रंप हुए। क्या यह कोई मामूली बात है? क्या इस पर भारत के लोगों को खुशी नहीं मनानी चाहिए?

ट्रंप की जीत पर भारतीयों के खुशी मनाने के एक नहीं कई कारण हैं। एक कारण तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके निजी संबंध बहुत अच्छे हैं। वे हमेशा प्रधानमंत्री की तारीफ करते रहे हैं और कई मौकों पर कहा है कि भारत के हितों की रक्षा के लिए नरेंद्र मोदी कुछ भी कर सकते हैं। दोनों नेताओं के निजी संबंधों की केमिस्ट्री कैसी है यह टेक्सास के ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ और अहमदाबाद में हुए ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम में दिखा। एक कार्यक्रम में अमेरिका में मोदी, मोदी के नारे लगे थे तो दूसरे में भारत में ट्रंप, ट्रंप के नारे लगे थे। दुनिया के दो सबसे बड़े और जीवंत लोकतांत्रिक देशों के नेताओं के हित एकाकार हो गए दिखते हैं। ट्रंप की जीत और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके प्रगाढ़ संबंधों से इस बात की गारंटी है कि अब दुनिया में कहीं भी भारत के और हिंदुओं के हितों को नुकसान पहुंचाने वालों की खैर नहीं होगी।

दुनिया जानती है कि आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीडि़त देश भारत है। भारत का एक पड़ोसी देश दशकों से छद्म युद्ध छेड़े हुआ है। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा और मजबूत होती आर्थिकी से परेशान अनेक वैश्विक ताकतें भारत विरोधी गतिविधियों में जुट गई हैं। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और कनाडा तक की सरजमीं से भारत विरोधी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। भारत के टुकड़े टुकड़े करने की इच्छा रखने वालों को मदद दी जा रही है। अलगाववादियों को शरण मिल रही है। डोनाल्ड ट्रंप की आतंकवाद पर सख्त नीति से ऐसी गतिविधियों पर लगाम लगेगी। कनाडा और अमेरिका में बैठ कर भारत के खिलाफ अभियान चलाने वाली ताकतें कमजोर होंगी। अलगाववादियों के प्रत्यर्पण का रास्ता भी साफ होगा। अमेरिका से हाल के दिनों में जो तनाव बना था उसमें कमी आएगी।

अमेरिका के बाद कनाडा में सत्ता परिवर्तन की बारी है। डोनाल्ड ट्रंप के सबसे मुखर समर्थक और दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति इलॉन मस्क ने कहा है कि अगले चुनाव में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो हारेंगे। गौरतलब है कि मस्क ने ट्रंप के समर्थन में अपना सब कुछ दांव पर लगाया था। दुनिया के किसी कारोबारी ने कभी भी राजनीति में जो नहीं किया होगा वह मस्क ने किया। उन्होंने ट्रंप के प्रचार में करोड़ों डॉलर खर्च किए। मस्क ने ही अर्ली वोटिंग में हर दिन एक मतदाता को 10 लाख डॉलर देने का ऐलान करके ट्रंप का माहौल बनाया। तभी पांच नवंबर को हुए मतदान से पहले ही अर्ली वोटिंग में आठ करोड़ से ज्यादा वोट पड़े और ट्रंप के जीतने का आधार पहले ही बन गया था। अभिव्यक्ति की आजादी, निर्बाध व्यापार की स्वतंत्रता, लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता और आतंकवाद विरोध के विचार में मस्क ने ट्रंप का साथ दिया। इसी सोच में वे कनाडा में ट्रूडो सरकार की विदाई का बंदोबस्त भी करेंगे। सोचिए यह भारत के लिए कितनी सुखद बात होगी कि अपनी मूर्खता और स्वार्थ से भरी राजनीति में भारत और कनाडा के संबंधों को तहस नहस करने वाले जस्टिन ट्रूडो विदा होंगे।

डोनाल्ड ट्रंप ने हमेशा पाकिस्तान को एक मवाली मुल्क माना है। उन्होंने राष्ट्रपति रहते उसकी मदद रोक दी थी। जो बाइडेन के शासन में फिर से पाकिस्तान को मदद मिलनी शुरू हुई है। लेकिन अब इस बात की पूरी संभावना है कि डोनाल्ड ट्रंप के राज में पाकिस्तान फिर अलग थलग होगा। उसे अमेरिका से कोई मदद नहीं मिलेगी। इतना ही विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ जैसी संस्थाओं से भी पाकिस्तान को जो मदद मिल रही है वह बंद होगी। यह सामान्य सामरिक समझ की बात है कि अगर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद बंद होती है तो उसके यहां फल फूल रहे आतंकवाद के नेटवर्क की कमर टूटेगी, जिसका सबसे बड़ा फायदा भारत को होगा। इससे भारत के खिलाफ चल रहा छद्म युद्ध कमजोर पड़ेगा। इसी तरह राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप पहले कार्यकाल की तरह इजराइल और अरब के देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने का प्रयास करेंगे। अगर अमेरिका, इजराइल और अरब देशों के संबंध सामान्य होते हैं तो यह भारत के लिए सामरिक और आर्थिक दोनों नजरिए से अच्छा होगा।

रूस और चीन के साथ ट्रंप के संबंध उलझे हुए हैं। परंतु इस उलझाव के बावजूद वे जो भी नीति अख्तियार करेंगे उससे भारत को फायदा ही होगा। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने जिस तरह से ट्रंप के प्रति रुख दिखाया है उससे लगता है कि रूस और अमेरिका के संबंधों में भी सामान्यीकरण की शुरुआत होगी। बाइडेन प्रशासन में दोनों के संबंध तनाव वाले रहे। तभी भारत के लिए भी अपने पुराने और आजमाए हुए दोस्त रूस के साथ कारोबारी या सामरिक संबंधों में मुश्किलें आईं। पिछले ही दिनों खबर आई कि अमेरिका ने भारत की 19 कंपनियों को इसलिए काली सूची में डाल दिया क्योंकि वे रूस के साथ कारोबार कर रही थीं। ट्रंप के कार्यकाल में इस तरह की घटनाएं नहीं होंगी। इससे रूस के साथ भारत के आर्थिक और रक्षा संबंध मजबूत होंगे। इसी तरह ट्रंप कह चुके हैं कि वे चीनी उत्पादों पर दो सौ फीसदी आयात शुल्क लगाएंगे। चीन जो दुनिया की फैक्टरी बना हुआ है, उसका यह स्टैटस ट्रंप खत्म करना चाहेंगे और ऐसे में उनकी व दुनिया की पहली पसंद भारत होगा। अगर चीन से व्यापार में कमी आती है तो भारत के साथ व्यापार बढ़ सकता है। भारत में सेमी कंडक्टर सहित दूसरे उत्पादों के निर्माण की नई इकाइयों के लिए भी रास्ता बनेगा।

अगर सामरिक मामले की बात करें तो अमेरिका के साथ भारत के संबंध अब भी अच्छे हैं। हाल ही में भारत ने अमेरिका से 32 हजार करोड़ रुपए की हथियार खरीद का समझौता किया है। भारत 31 प्रिडेटर ड्रोन खरीद रहा है। परंतु ट्रंप के शासन में भारत को अमेरिका का विशेष लड़ाकू विमान एफ 35 भी मिल सकता है। राफेल के बाद अगर एफ 35 लड़ाकू विमान भारत को मिलता है तो भारत की वायु प्रतिरक्षा ताकत कितनी बढ़ जाएगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्वाड से लेकर फाइव आइज देशों के साथ भारत के संबंध बेहतर होंगे और इन देशों के साथ खुफिया सूचनाओं की साझेदारी भी बढ़ेगी। सो, हिंदू हितों की बात हो या भारत की आर्थिक, सामरिक या कूटनीतिक ताकत का मामला हो, ट्रंप हर मोर्चे पर भारत के सच्चे मित्र साबित होंगे।


दशकों से अमेरिका और वैश्वीकरण एक-दूसरे का पर्याय

बलबीर पुंज
दीपावली के अवसर पर ट्रंप ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताया था। साथ ही अपनी सरकार आने पर दोनों देशों के बीच की साझेदारी को और आगे बढ़ाने का वादा किया था। ट्रंप बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा की कड़ी निंदा भी कर चुके हैं।

अमेरिका में रिपब्लिकन प्रत्याक्षी डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर इतिहास रचा है। वे अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति होंगे। सामरिक-आर्थिक रूप से विश्व के सबसे ताकतवर देशों में से एक होने के कारण शेष दुनिया में इस चुनाव को लेकर स्वाभाविक चर्चा रही। भारत में भी इसे लेकर दो कारणों से उत्साह दिखा। पहला— ट्रंप की प्रतिद्वंदी और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला देवी हैरिस का भारत से तथाकथित जुड़ाव’ होना। यह अलग बात है कि हैरिस कमोबेश भारत-हिंदू विरोधी ही रही हैं। दूसरा— डोनाल्ड ट्रंप, जोकि पहले भी राष्ट्रपति (2016-20) रह चुके है— उनका खुलकर हिंदू हितों की बात करना और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे मजहबी हमलों का संज्ञान लेना। परंतु इस सच का एक अलग पहलू भी है।

यह ठीक है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में तुलनात्मक रूप से भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिका ने बहुत कम हस्तक्षेप किया है। ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2019 में धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण और पुलवामा आतंकवादी हमले के प्रतिकार स्वरूप पाकिस्तान के भीतर भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया था। इस बार भी ट्रंप ने भारत-अमेरिका के संबंधों को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है। दीपावली के अवसर पर ट्रंप ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताया था। साथ ही अपनी सरकार आने पर दोनों देशों के बीच की साझेदारी को और आगे बढ़ाने का वादा किया था। ट्रंप बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा की कड़ी निंदा भी कर चुके हैं। अब तक सामने आई कई रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि बांग्लादेश में असंख्य हिंदुओं को मजहब के नाम पर जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या ट्रंप की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जीत, वैश्वीकरण के ताबूत में अंतिम कील होगी? ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में जो निर्णय लिए थे, जिसमें सात इस्लामी देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का फैसला तक शामिल था— उसमें उनकी सबसे प्रमुख नीति अमेरिका फर्स्ट’ थी, जिसे ट्रंप ने इस बार भी दोहराया है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने शुल्कों के माध्यम से भारत-चीन सहित अन्य एशियाई देशों के साथ यूरोपीय सहयोगियों पर भी निशाना साधा था। मई 2019 में ट्रंप ने भारत को न केवल टैरिफ किंग’ बताया था, साथ ही अमेरिकी बाजार में भारत को मिले विशेष व्यापार सुविधा (अमेरिकी व्यापारिक वरीयता कार्यक्रम) को भी समाप्त कर दिया था। तब ट्रंप ने कहा था, भारत एक उच्च शुल्क वाला देश है।ज् जब हम भारत को मोटरसाइकिल भेजते हैं, तो उसपर 100 प्रतिशत शुल्क होता है। जब भारत हमारे पास मोटरसाइकिल भेजता है, तो हम उनसे कोई शुल्क नहीं लेते। वो हमसे 100 प्रतिशत वसूल रहे हैं। ठीक उसी उत्पाद के लिए, मैं उनसे 25 प्रतिशत वसूलना चाहता हूं। इस बार ट्रंप अमेरिका में सभी आयातों पर 10 प्रतिशत, तो चीन से आयात पर 60 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने की बात की है। वास्तव में, ट्रंप की यह नीति संरक्षणवाद से प्रेरित है, जो वैश्वीकरण के लिए खतरा है। यह घटनाक्रम इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि दशकों से अमेरिका और वैश्वीकरण एक-दूसरे का पर्याय रहा है।
यह ठीक है कि साम्राज्यवादी चीन के बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ दशकों तक अस्पष्ट स्थिति अपनाने के बाद अमेरिका ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वर्ष 2016 के बाद ट्रंप प्रशासन ने पहली बार चीन को एक खतरे’ और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी’ के रूप में पेश किया था। उनसे पहले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन को इस तरह नहीं देखा था। भारत, जो चीन के साथ लगभग 3,488 किमी लंबी विवादित सीमा साझा करता है— पिछले छह दशकों से चीन की आक्रामक नीति का सामना कर रहा है, जिसमें 1962 का युद्ध और हालिया वर्षों में डोकलाम-गलवान-तवांग सहित अन्य सैन्य टकराव शामिल है। इस परिप्रेक्ष्य में ट्रंप से उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने पहले कार्यकाल की नीतियों का ही विस्तार करेंगे, जिसमें चीन के साम्राज्यवादी रवैये के खिलाफ मुखर होकर क्वाड समूह (भारत सहित) को मूर्त रूप दिया गया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अप्रवासन एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से इसपर आक्रमक रहे है और उनका दूसरा कार्यकाल अपेक्षित रूप से अवैध अप्रवासन को रोकने के अपने वादे को और सख्ती से लागू करने का प्रयास करेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक वर्ष में बाइडन प्रशासन के नेतृत्व में अमेरिका ने लगभग 1100 अवैध भारतीय प्रवासियों को वापस भेजा है। भारत भी स्पष्ट कर चुका है कि वह अवैध प्रवास का समर्थन नहीं करता। परंतु यदि ट्रंप अप्रवासन के मामले में और सख्ती दिखाते है, तो यह निसंदेह भारत के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है।

ट्रंप और हैरिस ने अपने चुनावी भाषणों में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को लुभाने (दीपावली पर बधाई सहित) का भरसक प्रयास किया। जहां कमला अपनी भारतीय पहचान स्थापित करने हेतु प्रसिद्ध भारतीय व्यंजन इडली-सांभर’ का उपयोग करती दिखी, तो ट्रंप ने अपने प्रतिनिधि विवेक रामास्वामी और उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार जेडी वैंस की पत्नी उषा वैंस को चुनाव-प्रचार में शामिल किया। सच तो यह है कि ट्रंप-हैरिस की कवायद विशुद्ध रूप से राजनीतिक थी। भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मान्यताओं और मूल्यों से जुड़े होने के कारण अधिकांश हिंदू और सिख अमेरिका के सबसे संपन्न, समृद्ध और शिक्षित वर्ग में गिने जाते है। अमेरिका की कुल आबादी में अमेरिकी-भारतीयों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम हैं, लेकिन उनकी औसत वार्षिक घरेलू आय लगभग 1,53,000 डॉलर (लगभग 1.3 करोड़ रुपये) है, जो अमेरिका के राष्ट्रीय औसत के दोगुने से भी अधिक है। यही नहीं, अमेरिका में 34 फीसदी के राष्ट्रीय औसत की तुलना में 79 प्रतिशत भारतीय ग्रेजुएट हैं।

विश्व के समक्ष आतंकवाद एक बड़ी समस्या है और भारत सदियों से इसका शिकार है। मजहबी आतंकवाद विरोधी अभियान में अमेरिका का दोहरा मापदंड किसी से छिपा नहीं है। गुड तालिबान, बैड तालिबान’ इसका एक हालिया प्रमाण है। क्या ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से इस संबंध में सुधार की अपेक्षा की जा सकती है?


नेपाल में भारतीय हिंदुओं की स्थितियां बहुत खराब

हरिशंकर व्यास
नेपाल एक समय हिंदू राष्ट्र था। दोनों देशों के लोगों के बीच रोटी, बेटी का संबंध था। जनकपुर धाम नेपाल में है, जिसे भगवान राम की ससुराल मानते हैं। पुराने मिथिला राज की राजधानी जनकपुर मानी जाती है। भारत के हजारों हिंदुओं का कारोबार नेपाल में है। सीमावर्ती शहरों का लगभग सारा कारोबार भारत के हिंदुओं के हाथ में है। नेपाल की 80 फीसदी आबादी हिंदू है। लेकिन पहले नीतिगत कारणों से भारतीय लोग नेपाली नागरिकों के निशाने पर आए और उसके बाद भारत के हिंदुओं को भी निशाना बनाया जाने लगा। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि भारत में हिंदू, मुस्लिम का विभाजन वहां भी पहुंच गया है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पिछले साल अक्टूबर में एक बड़ा विवाद हुआ था, जिसकी वजह से कई दिन तक उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे नेपालगंज के बांके शहर में कर्फ्यू लगा। असल में किसी व्यक्ति ने इंटरनेट पर इस्लाम के प्रति कोई आपत्तिजनक कंटेंट डाल दिया था। इसके विरोध में मुसलमानों ने प्रदर्शन किया। अगले दिन हिंदुओं ने शांति जुलूस निकाला तो जुलूस के ऊपर हमला हो गया। जम कर पथराव हुआ और गोलियां चलीं। वीडियो वायरल हुआ, जिसमें हिंदू भगवा ध्वज लिए हुए भाग रहे हैं और उन पर पत्थरों की बौछार हो रही है।

नेपाल में भले 80 फीसदी आबादी हिंदुओं की है लेकिन वहां भारतीय हिंदुओं की स्थितियां बहुत खराब है। भारत के लोगों के साथ भेदभाव हो रहा है, जिससे उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है। भू राजनीतिक कारणों से नेपाल की एक के बाद एक सरकारों ने भारत के प्रति विद्वेष की नीति अपनाई है। सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है तो चीन की दखल की वजह से भी नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं भडक़ी हैं। भारत के हिंदू, जो वहां कारोबार किसी तरह से अपने को बचाए हुए हैं वे कारोबार बंद करके भारत लौट रहे हैं।

पिछले साल दो हजार रुपए का नोट बंद किए जाने के बाद अचानक ऐसी स्थितियां बनीं, जिनसे भारतीयों, हिंदुओं को बड़ा नुकसान हुआ। नेपाल ने एकतरफा तरीके से भारतीय मुद्रा पर पाबंदी लगा दी। एक सौ रुपए से ऊपर के मूल्य की सारी मुद्राएं प्रतिबंधित कर दी गईं। सौ रुपए से ऊपर की खरीदारी पर नजर रखी जा रही है और टैक्स लगाया जा रहा है। भारतीय मुद्रा रुपए का नेपाली रूपए के मुकाबले तेजी से अवमूल्यित हो रहा है। भारत के कानून के मुताबिक कोई भारतीय नागरिक 25 हजार रुपए नकद लेकर नेपाल जा सकता है लेकिन नेपाल अब इस नियम को भी नहीं मान रहा है। 25 हजार रुपए नकद रखने पर नेपाल में गिरफ्तार किया जा सकता है। नेपाल के इस रवैए से सीमा के आसपास के लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपए का प्रतिदिन का कारोबार प्रभावित हो रहा है। नवंबर 2016 की नोटबंदी के समय से ही ऐसी स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों के बीच इसे लेकर बातचीत भी हुई, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकल सका। दूसरी ओर नेपाल के इस रवैए से तस्करी में बढ़ोतरी है। ड्रग्स और हथियारों से लेकर सोना और रोजमर्रा की जरुरत की चीजों की तस्करी हो रही है।


भारतीय रेलवे- पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित      

ए.के.खंडेलवाल
भारतीय रेलवे में सुरक्षा पहले से कहीं अधिक बेहतर हो गई है, जिसका श्रेय पिछले दशक में की गई योजनाबद्ध पहलों को दिया जा सकता है। भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे व्यस्त यात्री परिवहन नेटवर्क है और रेल-यात्री परिवहन में इसका विश्व में पहला स्थान है। रेलवे हर साल 1 लाख करोड़ यात्री किलोमीटर (पीकेएम) से अधिक की दूरी तय करती है और 685 करोड़ से अधिक यात्रियों को सफर कराती है। यह आँकड़ा चीन से भी काफी बड़ा है, जहाँ अपने विशाल नेटवर्क और आबादी के बावजूद लगभग 300 करोड़ यात्री ही रेल का उपयोग करते हैं।

सुरक्षा में इस उल्लेखनीय सुधार का प्रमाण दुर्घटनाओं की घटती संख्या से मिलता है। जहाँ 2000-01 में 473 बड़ी रेल दुर्घटनाएँ हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर केवल 40 रह गई है। यह गिरावट ट्रैक सुधार, मानव रहित लेवल क्रॉसिंग को हटाने, पुलों की स्थिति की नियमित निगरानी और डिजिटल तकनीक के प्रयोग से संभव हुई है।

रेलवे के सुरक्षा प्रयासों को यात्री और पटरियों की लंबाई के आधार पर और भी सराहा जा सकता है। प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक लोग 70,000 किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर यात्रा करते हैं। त्यौहारों के समय यह संख्या 3 करोड़ तक पहुँच जाती है। इसका मतलब है कि भारत में प्रतिदिन लगभग 2त्न लोग सुरक्षित रूप से रेल से सफर करते हैं, जबकि चीन में यह आँकड़ा 0.58त्न और अमेरिका में मात्र 0.09% है।

भारतीय रेलवे के लिए यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यह 2023-24 में सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से स्पष्ट होता है, और चालू वित्त वर्ष में इससे भी अधिक खर्च करने की योजना है। इसका उद्देश्य रेलों, पुलों, पटरियों और संकेत प्रणालियों के रखरखाव में सुधार करना है। साथ ही, ओवर- और अंडर-ब्रिज के निर्माण के माध्यम से पटरियों के निकट की सडक़ सुरक्षा में भी सुधार किया जाएगा।

रेलवे सुरक्षा प्रदर्शन का एक प्रमुख सूचकांक ‘प्रति दस लाख ट्रेन किलोमीटर पर दुर्घटना की संख्या’ (एपीएमटीके) है, जो 2000-01 में 0.65 से घटकर 2023-24 में 0.03 पर आ गया है। यह सुधार अत्याधुनिक तरीकों और उन्नत तकनीकों के उपयोग के कारण संभव हुआ है, जैसे कि बेहतर पटरी रखरखाव, पटरी दोषों का पता लगाने में सुधार, रेल वेल्ड विफलताओं को रोकना और मानवीय त्रुटियों को कम करना। पटरी रखरखाव में सुधार के लिए आधुनिक मशीनों की तैनाती में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहाँ 2013-14 में केवल 700 मशीनें उपयोग में थीं, वहीं अब यह संख्या बढक़र 1,667 हो गई है। इसके अतिरिक्त, परिसंपत्ति की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पूरे नेटवर्क में रेल ग्राइंडिंग का भी उपयोग किया जा रहा है। जिससे पटरियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। इसके साथ ही,उपद्रवी गतिविधियों, पटरियों से छेड़छाड़ और पटरियों पर अवरोध वस्तुओं के कारण होने वाले जोखिमों से निपटने के लिए नियमित गश्त की जाती है।

यात्रियों की सुरक्षा से आगे बढक़र, रेलवे अब वन्यजीव और पशुधन की सुरक्षा पर भी ध्यान दे रही है। 2024-25 तक 6,433 किलोमीटर रेलवे ट्रैक के किनारे बाड़ लगाने का लक्ष्य है, जिसमें से अगस्त 2024 तक 1,396 किलोमीटर पर काम पूरा कर लिया गया है। इससे मवेशियों के साथ टकराव की घटनाओं में कमी आएगी।
इन परिणामों को बनाए रखने और सुधार करने के लिए भारतीय रेलवे ने तकनीकी कार्यक्रमों और लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अपनाया है। इस पहल के तहत लोकोपायलटों को कोहरे वाले क्षेत्रों में परिचालन में सहायता के लिए जीपीएस-आधारित फॉग-पास डिवाइसेस की संख्या में वृद्धि की गई है, जो 2014-15 में केवल 90 थी और अब बढक़र 21,742 हो गई है। लोकोपायलटों की सतर्कता बढ़ाने के लिए सभी लोकोमोटिव में सतर्कता नियंत्रण उपकरण (वीसीडी) लगाए गए हैं, जिनकी संख्या 2013-14 में 10,000 से बढक़र अब 16,021 हो चुकी है। सुरक्षा उपायों के अंतर्गत, बड़ी पटरी (ब्रॉड-गेज) मार्गों पर स्थित 6,637 स्टेशनों में से 6,575 स्टेशनों पर पैनल इंटरलॉकिंग, रूट रिले इंटरलॉकिंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग जैसी उन्नत संकेत प्रणालियाँ स्थापित की गई हैं।

लोकोपायलटों की दक्षता को बेहतर बनाने के लिए ड्राइविंग कौशल और प्रतिक्रिया समय में सुधार के उद्देश्य से सिम्युलेटर-आधारित प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जो क्षेत्रीय अनुभव का अनुकरण करता है। अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को अग्निशमन और अग्निशामक यंत्रों के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 2023-24 के दौरान 6 लाख से अधिक रेलवे कर्मचारियों ने प्रारंभिक, प्रगति-उन्मुख, पुन: अभ्यास और विशिष्ट जैसे विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त किए हैं।

यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोत्तम प्राथमिकता देते हुए, एलएचबी कोचों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जो बेहतर दुर्घटना-रोकथाम सुविधाओं से लैस हैं। इन कोचों का डिज़ाइन इस तरह किया गया है कि यह रेल के पटरी से उतरने और यात्रियों के घायल होने की संभावना को कम करता है। टक्कर के दौरान एक-दूसरे पर चढऩे से बचने के लिए इन्हें इस प्रकार से बनाया गया है कि ये 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर भी सुरक्षित तरीके से परिचालित हो सकें। इसकी उत्पादन संख्या में भी महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। 2023-24 में 4,977 एलएचबी कोच बनाए गए हैं, जो 2013-14 के 2,467 से दोगुने से भी अधिक हैं।

इन सभी प्रयासों से भारतीय रेलवे पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो गई है। यात्री सुरक्षा और रेलवे में सुधार की दिशा में निरंतर प्रयास इसे एक सुरक्षित और विश्वसनीय परिवहन विकल्प बनाते हैं।


किसानों के लिए अधिक लाभदायक होगी

अमित बैजनाथ गर्ग
हाल में केंद्र सरकार ने छह रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (रूस्क्क) में वृद्धि की है। यह वृद्धि न्यूनतम 130 रु पये और अधिकतम तीन सौ रुपये प्रति क्विंटल है। गेहूं के एमएसपी में 150 रु पये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई।

रेपसीड और सरसों के दाम में  प्रति क्विंटल तीन सौ रु पये बढ़ाया गया है। मसूर में 275 रुपये की वृद्धि की गई है। सरकारी दर पर रबी फसलों की खरीद-बिक्री का सत्र अप्रैल, 2025 से शुरू होगा।

खास बात यह है कि अधिकतर फसलों की एमएसपी अब लागत के लगभग डेढ़ गुना हो चुकी है, जिसकी मांग किसानों की ओर से लगातार हो रही थी। एमएसपी में 23 फसलों को शामिल किया जा चुका है। एमएसपी बढ़ाने को लेकर किसान आंदोलन करते रहे हैं। सवाल है कि क्या इस बार एमएसपी बढऩे से अगली बार आंदोलन नहीं होगा! एमएसपी किसानों से तय दर पर फसल खरीदने की गारंटी है। इसकी वजह से किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है।

एमएसपी की शुरु आत 1967 में हुई थी। एमएसपी तय करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की रिपोर्ट का इस्तेमाल किया जाता है। सीएसीपी उत्पादन लागत, बाजार के रुझान और मांग-आपूर्ति के हिसाब से एमएसपी तय करता है। एमएसपी की गणना के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन हिस्सों में बांटता है। इसमें फसल उत्पादन के लिए किसानों के नकद खर्च के साथ-साथ पारिवारिक श्रम का भी हिसाब लगाया जाता है। एमएसपी बढऩे से किसानों को लाभकारी मूल्य मिलता है, और फसल विविधीकरण में मदद मिलती है।

एमएसपी बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी। हालांकि किसान नेता सरकार के दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार के कई उपाय हो सकते हैं। इसमें एक है मूल्य स्थिरता कोष का गठन यानी जब फसल की बाजार कीमत एमएसपी से नीचे चली जाए तो सरकार इसकी भरपाई करे। किसानों को धान-गेहूं की फसल की बजाय ज्यादा कीमत देने वाली फसल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। फल, सब्जी, मवेशी, मछली पालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंंग की आड़ में किसानों को कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। ये कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट तोड़ देती हैं, और किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। कर्ज में डूब जाता है और आत्महत्या तक के लिए मजबूर हो जाता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एमएसपी व्यवस्था का दबदबा इस सेक्टर में इनोवेशन को हतोत्साहित करेगा। किसान सरकारी व्यवस्था पर निर्भर होकर रह जाएंगे और जोखिम लेने से डरेंगे। इसलिए किसानों को चावल-गेहूं की एमएसपी खरीद के चक्र से छुटकारा दिलाने की जरूरत है। एमएसपी की कानूनी गारंटी किसानों का अहित करेगी। उनका दावा है कि स्वामीनाथन आयोग के मुताबिक फसलों के दाम बढ़ेंगे तो खाद्य वस्तुओं के दाम 25 से 30 फीसद बढ़ जाएंगे और सरकार के लिए महंगाई नियंत्रण कठिन हो जाएगा। किसानों का कहना है कि उनकी फसल की पूरी खरीद की जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी। किसान जितनी फसल पैदा करेंगे, उसकी एमएसपी पर पूरी खरीद सरकार और उसकी एजेंसियों को करनी होगी। तभी किसानों का भला होगा और फसलों का विविधीकरण भी पूरा हो जाएगा।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा आत्मनिर्भरता देश के स्थायित्व और सम्मान का विषय है। एमएसपी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ खुले बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप तंत्र भी साबित हुआ है। आयात द्वारा खाद्य सुरक्षा कतर, बहरीन आदि जैसे कम आबादी और मजबूत औद्योगिक-आर्थिक आधार वाले देशों के लिए व्यवहार्य मॉडल हो सकता है।

उनका दावा है कि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका प्रतिस्पर्धी कीमतों पर दुनिया के बाकी देशों के लिए गेहूं का उत्पादन और निर्यात कर सकते हैं, लेकिन तब कृषि गतिविधियों से जुड़े भारतीयों सहित दुनिया की आधी आबादी बेरोजगार हो जाएगी। उनका कहना है कि कुछ मामलों में आयात की पक्षपातपूर्ण सरकारी नीति ने देश में तिलहन किसानों और खाद्य तेलों के उद्योगों को हानि पहुंचाई है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में ऐसी नीतियों से बचना चाहिए।

कृषि विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर कहते हैं कि एमएसपी की कानूनी गारंटी देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ बाजारी मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित करेगी जिससे किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाया जा सकेगा। एमएसपी की कानूनी गारंटी तिलहन-दालों सहित सभी कृषि वस्तुओं में आत्मनिर्भरता के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगी जो ज्यादा पानी और संसाधनों की खपत वाली अनाज फसलों के उत्पादन की तुलना में किसानों के लिए अधिक लाभदायक होगी।


ईवीएम पर संदेह की उंगली

तनवीर जाफरी
हरियाणा विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों ने पूरे देश के न केवल सभी प्रमुख एजेंसीज द्वारा किए गए एक्जिट पोल्स को बुरी तरह झुठला दिया था, बल्कि बड़े-बड़े राजनैतिक विश्लेषकों को भी हैरानी में डाल दिया था। मजे की बात तो यह कि केवल कांग्रेस पार्टी ही  हरियाणा में सत्ता में वापसी की उमीदों को लेकर गद्गद् नहीं थी, बल्कि स्वयं भाजपा को भी यह अहसास था कि किसान आंदोलन, अग्निवीर योजना, पहलवानों, महंगाई जैसे तमाम ज्वलंत मुद्दे उठने के बाद राज्य में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में इनके अलावा भाजपा को दस वर्ष की सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी आशंका के कारण भाजपा ने लगभग 35 प्रतिशत वर्तमान विधायकों के टिकट काट दिए थे। टिकट कटने वालों में कई मंत्री भी शामिल थे।

भाजपा की इस कवायद के बावजूद उसके 12 में से 9 मंत्री चुनाव में पराजित हो गए। हद तो यह है कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और डिप्टी स्पीकर रणबीर सिंह गंगवा की सीटों को भी बदल दिया गया था। इन सबके बावजूद नायब सिंह सैनी और अनिल विज जैसे नेताओं को भी मामूली मतों से ही जीत हासिल हुई। राज्य में 10 विधानसभा सीटें तो ऐसी रही जहां बीजेपी की जीत का अंतर 5 हजार से भी कम रहा। चूंकि हरियाणा में विधानसभा के नतीजे कांग्रेस के लिए  अप्रत्याशित थे, इससिलए कांग्रेस ने सीधा आरोप लगा दिया कि हरियाणा चुनाव में उसे हरवाया गया है। उसका आरोप था कि कई जगह ईवीएम को हैक किया गया। इस सबके बीच सवाल यह भी उठा कि अनेक ईवीएम इंडिकेटर में बैटरी की मात्रा 90 व 95त्न तक दिखा रही थी, जबकि मतदान के अंतिम समय में प्राय: ईवीएम की बैटरी चार्जिंग की मात्रा 60-70 फीसद के बीच या इससे भी कम ही हुआ करती है। कांग्रेस का आरोप था कि जहां-जहां ईवीएम में बैटरी कम थी वहां-वहां कांग्रेस को प्राय: बढ़त मिली। इस आरोप का सीधा अर्थ है कि ईवीएम को बदल दिया गया था। कांग्रेस द्वारा 20 सीटों पर इस तरह की गड़बड़ी होने की शिकायत दर्ज कराई।

सवाल यह है कि बीती 17 मार्च को भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन के समय पर मुंबई में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था, राजा की आत्मा ईवीएम में है’, उस समय राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि एमके स्टालिन और फारूक अब्दुल्ला जैसे अनेक बड़े नेताओं ने भी ईवीएम का मुद्दा उठाया था। और उस समय भी सभी का ईवीएम को लेकर एक ही स्वर था कि यदि उनकी सरकार आएगी तो वे ईवीएम को हटा देंगे। सवाल यह है कि हरियाणा के साथ-साथ जम्मू कश्मीर विधानसभा के भी चुनाव परिणाम आए तो जम्मू कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को मिले स्पष्ट बहुमत को स्वीकारा जा रहा है, लेकिन हरियाणा में भाजपा को मिली जीत प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को पच नहीं पा रही। और वे खिसियायी बिल्ली खंबा नोचे के अंदाज में अपनी हार की भड़ास ईवीएम के त्रुटिपूर्ण होने की बात कहकर निकाल रहे हैं। बेशक, लोकतंत्र को सबको अपनी बात या राय रखने का हक है, लेकिन आचरण में दोहरापन नहीं होना चाहिए। यदि कांग्रेस के नेता हरियाणा में ईवीएम की कार्यप्रणाली में त्रुटियां निकाल रहे हैं तो फिर जम्मू कश्मीर विधानसभा परिणामों से सहमत क्यों? इससे पता चलता है कि वे अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, और चुनाव प्रक्रिया का अभिन्न और अविश्सनीय अंग बन चुके जरिए पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

इस प्रकार का आचरण किसी भी सूरत में लोकतंत्र के हित में नहीं है। उसे ध्यान रहना चाहिए कि पिछले लोक सभा चुनावों में इंडिया गठबंधन ने बेहतर प्रदर्शन किया था। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी अच्छा प्रदर्शन रहा। उस समय भी किसी ने ईवीएम पर इतना दोष नहीं मढ़ा। कर्नाटक में जीते तो भी ईवीएम ठीक थी? और इन सबसे बड़ी बात यह कि जब विपक्षी दलों के नेता ईवीएम को ही गलत बताते हैं फिर आखिर अब तक पूरे विपक्ष ने मिल कर ईवीएम के विरुद्ध संयुक्त रूप से कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं किया? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे ईवीएम विरोधी आंदोलन का भी किसी राजनैतिक दल ने खुल कर साथ नहीं दिया था?

यदि वास्तव में ईवीएम निष्पक्ष चुनाव प्रभावित करने की क्षमता रखती है तो निश्चित रूप से यह लोकतंत्र के लिए घातक है। सभी राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए। यहां तक कि यदि सत्ता पक्ष के भी कई वरिष्ठ नेता, तकनीकी एक्सपर्ट और पूरा विपक्ष ईवीएम से चुनाव नहीं चाहता तो इसके द्वारा होने वाले चुनावों का बहिष्कार तक किया जाना चाहिए क्योंकि सच तो यह है कि ईवीएम पर शुरु आती संदेह की उंगली तो भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा ही उठाई गई थी। वैसे भी इसकी संदिग्धता को लेकर इसलिए भी सवाल उठते रहते हैं कि आखिर, दुनिया के अनेक आधुनिक देशों ने इसका प्रचलन अपने देशों में क्यों बंद कर दिया? और आधुनिक होने के बावजूद ऐसे देशों में आज भी चुनाव बैलट पेपर द्वारा ही क्यों कराए जाते हैं? ईवीएम की संदिग्धता को लेकर स्थिति स्पष्ट,पारदर्शी और सर्वस्वीकार्य होनी चाहिए। बेईमानी पर आधारित लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र का परिचायक नहीं हो सकता।


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