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अब अदालतों में नहीं चलेगी लंबी प्रतीक्षा, सुप्रीम कोर्ट ने तय की फैसलों की समयसीमा

अब अदालतों में नहीं चलेगी लंबी प्रतीक्षा, सुप्रीम कोर्ट ने तय की फैसलों की समयसीमा

अब अदालतों में नहीं चलेगी लंबी प्रतीक्षा, सुप्रीम कोर्ट ने तय की फैसलों की समयसीमा

पूजा भट्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं किया जाता है तो मामला किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सकता है| वहीं, यदि फैसले के कारण 30 दिनों के भीतर अपलोड नहीं किए जाते हैं तो मामला वापस लेकर नई पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है|शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोटों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों को संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके|देश की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्ट्स के लिए नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा। अदालत का मानना है कि लंबे समय तक फैसले लंबित रहने से न केवल न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि आम लोगों का भरोसा भी कमजोर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े मामलों को लेकर भी अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि जमानत आदेश आदर्श रूप से अगले ही दिन जारी किया जाए और तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाया जाए, ताकि कैदियों की रिहाई में अनावश्यक देरी न हो।इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन अंडरट्रायल कैदियों को जमानत मिल चुकी है, उनकी रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नए दिशा-निर्देशों के तहत अदालत पहले फैसले का प्रभावी हिस्सा (ऑपरेटिव पार्ट) खुले कोर्ट में सुनाएगी, जबकि विस्तृत कारण सात दिनों के भीतर संबंधित हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि जिस दिन किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखा जाए, उसकी जानकारी भी हाईकोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि पक्षकारों को स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिल सके।

शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि तय समयसीमा का पालन नहीं किया गया तो मामला दूसरी पीठ को सौंपा जा सकता है। वहीं, यदि फैसले के विस्तृत कारण 30 दिनों के भीतर अपलोड नहीं किए जाते हैं, तो केस वापस लेकर नई पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिए हैं कि वे इन दिशानिर्देशों को संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें और इनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करें।न्यायपालिका के इस कदम को “त्वरित और पारदर्शी न्याय” की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है, जिससे आम लोगों को समय पर न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी है।


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