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रोजाना एक कीवी का सेवन, सेहत को मिलते हैं कई बड़े फायदे

Category Archives: जीवन शैली

रोजाना एक कीवी का सेवन, सेहत को मिलते हैं कई बड़े फायदे

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग ऐसी डाइट की तलाश में रहते हैं, जो कम मात्रा में अधिक पोषण दे सके। इसी कड़ी में कीवी फल को सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जा रहा है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति रोजाना एक कीवी का सेवन करता है, तो इससे इम्युनिटी मजबूत होने के साथ-साथ पाचन, हृदय और त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं से राहत मिल सकती है। विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर कीवी को अब सुपरफूड की श्रेणी में गिना जाने लगा है।

इम्युनिटी मजबूत करने में कारगर

कीवी में भरपूर मात्रा में विटामिन-C पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फल मौसमी सर्दी-खांसी, वायरल संक्रमण और फ्लू से बचाव में मदद करता है। नियमित सेवन से शरीर अंदर से मजबूत बनता है और थकान भी कम महसूस होती है।

प्लेटलेट्स बढ़ाने में सहायक

डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों के दौरान प्लेटलेट्स कम होने की समस्या आम है। ऐसे समय में डॉक्टर कीवी खाने की सलाह देते हैं। इसमें मौजूद फोलेट और विटामिन-C नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करते हैं, जिससे प्लेटलेट्स का स्तर तेजी से सुधर सकता है।

त्वचा और आंखों के लिए फायदेमंद

कीवी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को समय से पहले बूढ़ा होने से बचाते हैं। यह झुर्रियों को कम करने और चेहरे पर प्राकृतिक चमक लाने में सहायक है। वहीं, इसमें पाए जाने वाले ल्यूटिन और जेक्सैन्थिन आंखों की रोशनी बनाए रखने और उम्र से जुड़ी दृष्टि समस्याओं से बचाव में मदद करते हैं।

पाचन तंत्र को रखे दुरुस्त

पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए कीवी काफी लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और एक्टिनिडिन एंजाइम भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है। इससे कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है।

वजन घटाने में भी उपयोगी

कम कैलोरी और अधिक फाइबर होने के कारण कीवी वजन कम करने वालों के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराता है, जिससे बार-बार खाने की आदत कम होती है और अनहेल्दी स्नैकिंग से बचाव होता है।

हृदय को देता है सुरक्षा

कीवी में पोटेशियम और ओमेगा फैटी एसिड पाए जाते हैं, जो ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने और दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। नियमित सेवन से रक्त संचार बेहतर होता है और हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।

निष्कर्ष

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि रोजमर्रा की डाइट में कीवी को शामिल करना एक छोटा लेकिन असरदार बदलाव हो सकता है। यह न केवल शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है, बल्कि लंबे समय तक सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखने में भी सहायक है।

नोट: यह लेख विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित जानकारियों के अनुसार तैयार किया गया है।

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पेट की अनदेखी बन सकती है जानलेवा, तेजी से बढ़ रहा बाउल कैंसर का खतरा

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोग अक्सर पेट की समस्याओं को मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यही लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है। हाल के वर्षों में पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर, खासतौर पर कोलोरेक्टल यानी बाउल कैंसर के मामलों में दुनिया भर में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में तीसरा सबसे आम कैंसर बन चुका है और कैंसर से होने वाली मौतों के मामलों में यह दूसरे स्थान पर है। कुल कैंसर मामलों में इसकी हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत बताई जाती है। पहले यह बीमारी मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

आंतों की पुरानी बीमारी बढ़ा सकती है कैंसर का जोखिम

कोलन या कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत या मलाशय में विकसित होता है। शौच की आदतों में बदलाव, मल में खून, पेट में लगातार दर्द या ऐंठन जैसे लक्षण इसके शुरुआती संकेत माने जाते हैं। विशेषज्ञों ने हाल ही में चेतावनी दी है कि आंतों से जुड़ी एक आम लेकिन गंभीर बीमारी इस कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) से पीड़ित लोगों में आगे चलकर बाउल कैंसर का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में करीब 600 प्रतिशत तक अधिक हो सकता है। IBD के मरीजों में लंबे समय तक आंतों में सूजन बनी रहती है, जो कैंसर के लिए अनुकूल स्थिति बना देती है।

अगर किसी व्यक्ति को बार-बार दस्त या कब्ज, पेट में तेज दर्द, बार-बार शौच जाने की जरूरत या बिना कारण वजन घटने जैसी समस्याएं हो रही हैं, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ये IBD के संकेत हो सकते हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी

ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन की न्यूट्रिशन साइंटिस्ट प्रोफेसर सारा बेरी का कहना है कि IBD से पीड़ित लोगों में कम उम्र में ही कोलोरेक्टल कैंसर विकसित होने का खतरा ज्यादा रहता है। उनके अनुसार, आंतों में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन कैंसर को ट्रिगर कर सकती है।

उन्होंने बताया कि IBD एक अम्ब्रेला टर्म है, जिसके अंतर्गत क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी बीमारियां आती हैं। ये दोनों ही आंतों को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं और समय के साथ कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं।

भारत में भी बढ़ रहे मामले

भारत में भी बाउल कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। यह देश के टॉप-पांच कैंसर में शामिल हो चुका है। शहरी क्षेत्रों में इसके मामले अधिक सामने आ रहे हैं। वर्ष 2022 में भारत में कोलन कैंसर के 64 हजार से ज्यादा नए मामले दर्ज किए गए, जिनमें 15 से 20 प्रतिशत मरीज 50 साल से कम उम्र के थे।

विशेषज्ञों के अनुसार, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, शराब का सेवन और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का अधिक उपयोग इस बीमारी के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं।

बचाव ही सबसे बेहतर उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर बाउल कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। प्रोसेस्ड फूड्स और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाना, पेट से जुड़ी समस्याओं को समय रहते गंभीरता से लेना और नियमित जांच कराना इस जानलेवा बीमारी से बचाव में अहम भूमिका निभा सकता है।

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धुंधली नजर को न करें नजरअंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत

आंखों से धुंधला दिखना अक्सर लोग थकान, मोबाइल स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल या उम्र बढ़ने का सामान्य असर मानकर टाल देते हैं। कई लोग सीधे चश्मा लगवाने को ही इसका समाधान समझ लेते हैं। लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक या लगातार धुंधला दिखना सिर्फ आंखों की कमजोरी नहीं, बल्कि शरीर में छिपी किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।

डॉक्टरों का कहना है कि आंखें सीधे तौर पर मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी होती हैं। ऐसे में शरीर के अंदर चल रही कई बीमारियों का असर सबसे पहले आंखों की रोशनी पर दिखाई देता है। खासकर जब बिना किसी स्पष्ट कारण के नजर कमजोर होने लगे, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है।

डायबिटीज से जुड़ी आंखों की बीमारियां

विशेषज्ञों के अनुसार, धुंधली नजर का एक बड़ा कारण अनियंत्रित डायबिटीज हो सकती है। खून में शुगर का स्तर बढ़ने पर आंखों के लेंस में सूजन आ जाती है, जिससे दिखाई देना धुंधला हो जाता है। लंबे समय तक शुगर कंट्रोल में न रहने पर डायबिटिक रेटिनोपैथी की आशंका बढ़ जाती है। इस स्थिति में रेटिना की बारीक रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जो आगे चलकर स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती हैं।

हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक का खतरा

हाई ब्लड प्रेशर का असर भी आंखों की नसों पर पड़ता है। डॉक्टर बताते हैं कि अचानक नजर का कम होना, एक आंख से दिखाई न देना या दोहरी छवि दिखना स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है। मस्तिष्क के जिस हिस्से से दृष्टि नियंत्रित होती है, वहां रक्त प्रवाह बाधित होने पर यह समस्या सामने आती है। ऐसी स्थिति को मेडिकल इमरजेंसी मानते हुए तुरंत इलाज जरूरी है।

ब्रेन ट्यूमर और तंत्रिका तंत्र की समस्याएं

मस्तिष्क में ट्यूमर या किसी असामान्य वृद्धि के कारण भी आंखों की नसों पर दबाव बन सकता है। इसके चलते धुंधली नजर के साथ तेज सिरदर्द, उलझन, चक्कर आना या उल्टी जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इसके अलावा मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी दृष्टि को प्रभावित कर सकती हैं। समय रहते इलाज न मिलने पर नुकसान स्थायी हो सकता है।

डॉक्टरों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दृष्टि में किसी भी तरह का अचानक बदलाव गंभीरता से लिया जाना चाहिए। नियमित रूप से आंखों की जांच कराने के साथ-साथ ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की भी निगरानी जरूरी है। संतुलित आहार, विटामिन-ए और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर भोजन आंखों की सेहत के लिए लाभकारी माना जाता है। अगर धुंधली नजर के साथ आंखों में दर्द, जलन या लालिमा हो, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

नोट: यह रिपोर्ट विभिन्न मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

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पैसिव स्मोकिंग- बिना सिगरेट पिए भी सेहत पर मंडराता गंभीर खतरा

अक्सर यह माना जाता है कि धूम्रपान न करने वाले लोग फेफड़ों की बीमारियों और कैंसर जैसी घातक समस्याओं से सुरक्षित रहते हैं, लेकिन यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। सिगरेट या बीड़ी न पीने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति दूसरे के धुएं के संपर्क में आता है, तो वह भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम झेल सकता है। इसी खतरे को चिकित्सा भाषा में पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सिगरेट के धुएं में करीब 7,000 से अधिक जहरीले रसायन पाए जाते हैं, जिनमें से दर्जनों तत्व सीधे कैंसर का कारण बन सकते हैं। यह धुआं लंबे समय तक हवा में बना रहता है, जिससे बंद कमरे, दफ्तर या वाहन में इसका असर और भी खतरनाक हो जाता है।

हृदय और रक्त वाहिकाओं पर तुरंत असर

अध्ययनों से सामने आया है कि पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में आने के 30 मिनट के भीतर ही हृदय और रक्त वाहिकाओं पर नकारात्मक प्रभाव शुरू हो जाता है। धुएं में मौजूद निकोटीन और कार्बन मोनोऑक्साइड धमनियों की भीतरी सतह को क्षतिग्रस्त कर देती हैं, जिससे रक्त संचार बाधित होता है। लंबे समय तक संपर्क में रहने से हार्ट अटैक और कोरोनरी हार्ट डिजीज का खतरा 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।

फेफड़ों का कैंसर और सांस की बीमारियां

जो लोग स्वयं धूम्रपान नहीं करते, उनमें भी फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण पैसिव स्मोकिंग मानी जाती है। यह धुआं फेफड़ों की संवेदनशील कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, यह धुआं फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई प्रणाली को भी निष्क्रिय कर देता है।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा जोखिम

चिकित्सकों का कहना है कि पैसिव स्मोकिंग का सबसे गंभीर असर बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते, ऐसे में यह धुआं उनके लिए धीमे ज़हर की तरह काम करता है। इसके संपर्क में रहने वाले बच्चों में कान के संक्रमण, निमोनिया और अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (SIDS) का खतरा बढ़ जाता है। वहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव और नवजात का वजन कम होने जैसी जटिलताएं देखी गई हैं।

धुआं मुक्त वातावरण ही है बचाव का उपाय

पैसिव स्मोकिंग से बचने का सबसे प्रभावी तरीका धुआं मुक्त माहौल बनाना है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि घर, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर सख्ती से रोक लगाई जाए। परिवार के किसी भी सदस्य को घर के अंदर सिगरेट या बीड़ी पीने की अनुमति न देना स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में एक जरूरी कदम है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि दूसरे के धुएं को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। समय रहते जागरूकता और सावधानी ही आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन दे सकती है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य अध्ययनों पर आधारित है।

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बिना दवाइयों के पाना चाहते हैं कमर दर्द से राहत, अपनाएं ये आसान घरेलू उपाय

आज के डिजिटल युग में घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर काम करना, शारीरिक गतिविधियों की कमी और गलत लाइफस्टाइल ने कमर दर्द को आम लेकिन गंभीर समस्या बना दिया है। पहले यह परेशानी बढ़ती उम्र से जुड़ी मानी जाती थी, लेकिन अब युवा वर्ग भी इसकी चपेट में तेजी से आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गलत बैठने की आदत, अचानक भारी वजन उठाना और नियमित व्यायाम न करना रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे मांसपेशियों में सूजन और तेज दर्द शुरू हो जाता है।

चिकित्सकीय भाषा में इसे मस्कुलोस्केलेटल पेन कहा जाता है। यदि समय रहते इसका समाधान न किया जाए तो यह दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है और व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि शुरुआती अवस्था में कमर दर्द को घरेलू और प्राकृतिक तरीकों से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सही देखभाल, हल्का व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव से बिना दवाओं के भी दर्द से राहत मिल सकती है।

गर्म और ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत

कमर दर्द में सिकाई को सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। यदि दर्द किसी ताजा चोट या खिंचाव के कारण हुआ है, तो पहले 48 से 72 घंटे तक ठंडी सिकाई करना फायदेमंद होता है। बर्फ की सिकाई सूजन को कम करने में मदद करती है। इसके बाद गर्म पानी की थैली या हीटिंग पैड का उपयोग मांसपेशियों की जकड़न को खोलता है। गर्म सिकाई से रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे दर्द में कमी आती है।

पूरी तरह आराम नहीं, हल्की सक्रियता जरूरी

दर्द होने पर अक्सर लोग पूरी तरह बिस्तर पर आराम करने लगते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे गलत मानते हैं। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से मांसपेशियां और कमजोर हो सकती हैं। इसके बजाय हल्की सैर, स्ट्रेचिंग या तैराकी को दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। योग में भुजंगासन और मर्कटासन जैसे आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और दर्द को कम करने में सहायक होते हैं। हल्की शारीरिक गतिविधि से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज होता है, जो प्राकृतिक रूप से दर्द को कम करता है।

मालिश से मांसपेशियों को मिले आराम

कमर दर्द में सही तेल से हल्की मालिश भी काफी लाभकारी मानी जाती है। सरसों के तेल में लहसुन की कलियां डालकर गर्म किया गया तेल पारंपरिक रूप से असरदार माना जाता है। तिल के तेल से की गई मालिश भी मांसपेशियों के तनाव को कम करती है। ध्यान रहे कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करें और रीढ़ की हड्डी पर सीधा दबाव न डालें।

पोस्चर सुधारना है सबसे जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार कमर दर्द से स्थायी राहत तभी संभव है, जब व्यक्ति अपनी बैठने और उठने की आदतों में सुधार करे। काम करते समय पीठ सीधी रखें, पैरों को जमीन पर टिकाकर बैठें और बहुत नरम गद्दे से बचें। भारी सामान उठाते समय कमर झुकाने के बजाय घुटनों को मोड़ें। छोटे-छोटे बदलाव भविष्य में गंभीर रीढ़ संबंधी समस्याओं से बचा सकते हैं।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

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गलत लाइफस्टाइल बढ़ा रही फैटी लिवर की समस्या, सही डाइट से संभव है बचाव

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में अनियमित खान-पान, बढ़ता मोटापा, शराब का सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी लोगों की सेहत पर भारी पड़ रही है। इन्हीं कारणों से फैटी लिवर डिज़ीज़ के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। शुरुआती दौर में यह बीमारी बिना किसी खास लक्षण के रहती है, लेकिन लापरवाही बरतने पर आगे चलकर लिवर में सूजन, डैमेज और सिरोसिस जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सही डाइट और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर फैटी लिवर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

क्या है फैटी लिवर?

जब लिवर में सामान्य से अधिक चर्बी जमा होने लगती है, तो उसे फैटी लिवर कहा जाता है। यह समस्या दो प्रकार की होती है—

अल्कोहलिक फैटी लिवर, जो अधिक शराब के सेवन से होता है।

नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर, जो मोटापा, डायबिटीज़ और गलत खान-पान से जुड़ा होता है।

डाइट के साथ बदलें ये आदतें

फैटी लिवर से बचाव के लिए खान-पान के साथ-साथ दिनचर्या में सुधार बेहद जरूरी है।

रोज़ कम से कम 30 मिनट टहलना या योग करना

वजन को धीरे-धीरे कम करना

रात का भोजन हल्का रखना

7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद

समय-समय पर हेल्थ चेकअप

फैटी लिवर में क्या खाएं?

हरी सब्जियां:
पालक, ब्रोकली, लौकी और तोरी जैसी सब्जियां लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद करती हैं। इनमें फाइबर भरपूर मात्रा में होता है।

फल (सीमित मात्रा में):
सेब, पपीता, नाशपाती और बेरीज एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं, लेकिन शुगर की मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।

साबुत अनाज:
ओट्स, ब्राउन राइस और जौ वजन नियंत्रित करने में मदद करते हैं और इंसुलिन रेजिस्टेंस को कम करते हैं।

प्रोटीन युक्त आहार:
दालें, चना, राजमा, अंडे का सफेद भाग और लो-फैट पनीर लिवर के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।

हेल्दी फैट:
अखरोट, अलसी के बीज और जैतून का तेल ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं, जो लिवर की सेहत सुधारने में सहायक हैं।

ग्रीन टी और हल्दी:
ग्रीन टी फैट बर्न करने में मदद करती है, जबकि हल्दी लिवर की सूजन कम करने में कारगर मानी जाती है।

किन चीज़ों से करें परहेज?

शराब: फैटी लिवर की सबसे बड़ी वजह, जो लिवर डैमेज को तेजी से बढ़ाती है।

तला-भुना और जंक फूड: समोसा, पिज़्ज़ा और बर्गर में मौजूद ट्रांस फैट लिवर को नुकसान पहुंचाता है।

ज्यादा मीठा: मिठाइयां, केक और कोल्ड ड्रिंक में मौजूद शुगर सीधे लिवर फैट में बदलती है।

मैदा और रिफाइंड कार्ब्स: सफेद ब्रेड और बिस्किट वजन और फैटी लिवर दोनों बढ़ाते हैं।

प्रोसेस्ड फूड: पैकेट वाले स्नैक्स में अधिक नमक और केमिकल्स लिवर के लिए हानिकारक होते हैं।

निष्कर्ष

विशेषज्ञों का कहना है कि फैटी लिवर कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। समय रहते खान-पान और जीवनशैली में बदलाव कर लिवर को फिर से स्वस्थ बनाया जा सकता है। सेहतमंद लिवर ही पूरे शरीर की सेहत की बुनियाद है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।

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हाई ब्लड प्रेशर पर काबू पाने का आसान तरीका, दो हफ्तों में दिख सकता है असर

आज की तेज़ रफ्तार और अनियमित जीवनशैली के बीच हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। खास बात यह है कि इसके लक्षण लंबे समय तक नजर नहीं आते, लेकिन यह धीरे-धीरे हृदय रोग, किडनी की समस्या और स्ट्रोक जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते जीवनशैली में सुधार कर इस खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है।

फिटनेस एवं वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शालिनी सिंह सोलंकी के अनुसार हाई बीपी की जड़ें अधिकतर गलत खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक तनाव में छिपी होती हैं। उन्होंने ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए एक प्रभावी ‘5 स्टेप लाइफस्टाइल फॉर्मूला’ साझा किया है, जिसे अपनाकर महज दो सप्ताह में बीपी को लगभग 10 पॉइंट तक कम किया जा सकता है।

डॉ. शालिनी का कहना है कि यह फॉर्मूला दवाइयों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके साथ या बिना दवा के भी शरीर को प्राकृतिक रूप से संतुलित करने में मदद करता है। नियमित रूप से इन उपायों को अपनाने से रक्त वाहिकाओं पर दबाव कम होता है और शरीर का आंतरिक सिस्टम बेहतर तरीके से काम करने लगता है।

स्टेप 1: नमक की मात्रा पर लगाएं लगाम

हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने का सबसे पहला और जरूरी कदम सोडियम की मात्रा कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार दिनभर में 5 ग्राम से अधिक नमक का सेवन बीपी बढ़ा सकता है। पैकेज्ड फूड, चिप्स, नमकीन और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से दूरी बनाना जरूरी है।

स्टेप 2: पोटैशियम युक्त आहार बढ़ाएं

डाइट में पोटैशियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे केला, संतरा, पालक और टमाटर शामिल करें। पोटैशियम शरीर से अतिरिक्त सोडियम को बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे धमनियों पर दबाव कम होता है और ब्लड प्रेशर संतुलन में रहता है।

स्टेप 3: रोजाना शारीरिक गतिविधि जरूरी

बैठकर काम करने वाली जीवनशैली हाई बीपी का बड़ा कारण बन रही है। डॉ. शालिनी के अनुसार रोजाना 30 से 45 मिनट वॉक, योग या हल्का व्यायाम दिल को मजबूत बनाता है। इससे रक्त संचार बेहतर होता है और सिस्टोलिक व डायस्टोलिक दोनों स्तर नियंत्रित रहते हैं।

स्टेप 4: तनाव से रखें दूरी

मानसिक तनाव सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर को प्रभावित करता है। तनाव बढ़ने से शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे बीपी अचानक बढ़ सकता है। इसे नियंत्रित करने के लिए रोजाना 10 मिनट ध्यान, गहरी सांस लेने के अभ्यास या योग को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी जाती है।

स्टेप 5: पूरी नींद लेना है जरूरी

स्वस्थ शरीर के लिए 7 से 8 घंटे की गहरी नींद बेहद जरूरी मानी जाती है। नींद की कमी से हार्मोन असंतुलन होता है, जिसका सीधा असर ब्लड प्रेशर पर पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह 5 स्टेप फॉर्मूला तभी असरदार होगा जब इसे नियमित आदत के रूप में अपनाया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि दवाइयों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अगर लोग अपनी दिनचर्या और खानपान में सुधार करें, तो हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या को लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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मौसम बदलते ही क्यों बढ़ जाते हैं सर्दी-जुकाम के मामले? जानिए इसके कारण और बचाव के उपाय

फरवरी का महीना मौसम के लिहाज से संक्रमण के लिहाज से सबसे संवेदनशील माना जाता है। दिन में तेज धूप और रात में अचानक बढ़ती ठंड शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करती है। तापमान में बार-बार होने वाला यह उतार-चढ़ाव वायरस और बैक्टीरिया के सक्रिय होने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है, जिससे सर्दी-जुकाम, गले में खराश और वायरल बुखार के मामलों में इजाफा देखने को मिलता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौरान हवा में नमी कम हो जाती है और धूल कणों की मात्रा बढ़ने लगती है, जिससे राइनोवायरस तेजी से फैलता है। यही वायरस सामान्य सर्दी और खांसी का प्रमुख कारण होता है। अक्सर लोग दिन की गर्मी को देखकर ठंडे पानी का सेवन शुरू कर देते हैं या गर्म कपड़े पहनना छोड़ देते हैं, लेकिन जैसे ही शाम होते-होते तापमान गिरता है, शरीर संक्रमण की चपेट में आ जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो सामान्य सर्दी आगे चलकर फ्लू या वायरल फीवर का रूप ले सकती है। ऐसे में खान-पान, कपड़ों और दिनचर्या में थोड़े से बदलाव आपको बीमारियों से सुरक्षित रख सकते हैं।

खान-पान में बरतें विशेष सावधानी

मौसम बदलने के साथ आहार में भी बदलाव जरूरी है। शरीर की गर्मी बनाए रखने और इम्यूनिटी मजबूत करने वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दें। ठंडा पानी और फ्रिज में रखे खाद्य पदार्थों से परहेज करें। इसके स्थान पर गुनगुना पानी, तुलसी-अदरक का काढ़ा और हल्का सुपाच्य भोजन लाभकारी होता है। विटामिन-सी युक्त फल जैसे संतरा, नींबू और आंवला शरीर को संक्रमण से लड़ने की ताकत देते हैं और मौसमी बीमारियों से बचाव करते हैं।

कपड़ों को लेकर न करें लापरवाही

दोपहर की धूप देखकर पूरी तरह गर्म कपड़े छोड़ना नुकसानदायक हो सकता है। सुबह और शाम की ठंडी हवा शरीर को जल्दी प्रभावित करती है। चिकित्सकों की सलाह है कि लेयरिंग पद्धति अपनाई जाए, जिससे जरूरत के अनुसार कपड़े उतारे या पहने जा सकें। कान, गला और छाती को ढंककर रखने से ठंडी हवा के सीधे प्रभाव से बचाव होता है और जुकाम का खतरा कम रहता है।

स्वच्छता और सक्रिय जीवनशैली अपनाएं

संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता बेहद जरूरी है। बाहर से लौटने के बाद हाथ साबुन से जरूर धोएं और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर मास्क का उपयोग करें।
इसके साथ ही रोजाना हल्का व्यायाम, प्राणायाम या योग करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। पर्याप्त नींद लें, क्योंकि नींद की कमी इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देती है।

छोटी सावधानियां, बड़ा फायदा

मौसम का यह बदलाव भले ही सुहावना लगे, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही आपको लंबे समय तक बीमार कर सकती है। रात को समय पर सोना, घर का ताजा भोजन करना और गुनगुने पानी का सेवन जैसे छोटे कदम सर्दी-जुकाम से बचाने में बेहद कारगर हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज से बेहतर बचाव है, इसलिए बदलते मौसम में सतर्क रहें और स्वस्थ रहकर इस मौसम का आनंद लें।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है।


क्या आपके जोड़ों में भी है सूजन और असहनीय दर्द? शरीर में यूरिक एसिड का बढ़ना हो सकता है वजह

आज की बदलती जीवनशैली और गलत खान-पान के कारण शरीर में यूरिक एसिड का बढ़ना एक आम लेकिन गंभीर समस्या बनता जा रहा है। अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो यही समस्या आगे चलकर गाउट जैसे दर्दनाक गठिया रोग का रूप ले सकती है। मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक खून में यूरिक एसिड का स्तर अधिक रहने की स्थिति को हाइपरयूरिसेमिया कहा जाता है, जो जोड़ों में सूजन और असहनीय दर्द का कारण बनती है।

यूरिक एसिड दरअसल शरीर में मौजूद प्यूरीन नामक तत्व के टूटने से बनने वाला एक अपशिष्ट पदार्थ है। सामान्य स्थिति में किडनी इसे फिल्टर कर पेशाब के जरिए बाहर निकाल देती है, लेकिन जब किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती या यूरिक एसिड जरूरत से ज्यादा बनने लगता है, तो यह जोड़ों में क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगता है। इसका असर खासतौर पर पैरों के अंगूठे, घुटनों और टखनों में अधिक देखा जाता है, जहां सूजन, लालिमा और जकड़न की शिकायत बढ़ जाती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि गलत डाइट, मोटापा, पानी की कमी और निष्क्रिय जीवनशैली यूरिक एसिड बढ़ने के प्रमुख कारण हैं। समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह समस्या सिर्फ जोड़ों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि किडनी स्टोन और हृदय रोगों के खतरे को भी बढ़ा सकती है। ऐसे में जरूरी है कि खान-पान और जीवनशैली में सही बदलाव किए जाएं।

किन खाद्य पदार्थों से बनाएं दूरी?

यूरिक एसिड को नियंत्रित रखने के लिए सबसे पहले डाइट पर ध्यान देना जरूरी है।

रेड मीट और कुछ मछलियों में प्यूरीन की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इनका सेवन सीमित करें।

राजमा, उड़द, अरहर और काबुली चना जैसी दालों का अत्यधिक सेवन भी यूरिक एसिड बढ़ा सकता है, इन्हें संतुलन में लें।

कोल्ड ड्रिंक्स और सोडा जैसे शुगर-युक्त पेय यूरिक एसिड लेवल तेजी से बढ़ाते हैं, इनसे परहेज करें।

प्यूरीन युक्त भोजन कम करने से भविष्य में जोड़ों की सूजन और दर्द के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

पानी और विटामिन-C की अहम भूमिका

शरीर से अतिरिक्त यूरिक एसिड बाहर निकालने में पानी सबसे अहम हथियार माना जाता है।

दिनभर में कम से कम 8 से 10 गिलास पानी पीने की सलाह दी जाती है।

पर्याप्त पानी से किडनी को टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद मिलती है।

इसके साथ ही संतरा, नींबू और आंवला जैसे विटामिन-C से भरपूर फल डाइट में शामिल करें। विटामिन-C किडनी के कार्य को बेहतर बनाकर यूरिक एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है।

फाइबर और चेरी क्यों हैं फायदेमंद?

फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शरीर में अतिरिक्त यूरिक एसिड को अवशोषित करने में मदद करते हैं।

दलिया, साबुत अनाज और हरी सब्जियां रोजाना आहार में शामिल करें।

चेरी को यूरिक एसिड और गाउट के मरीजों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है।

चेरी में मौजूद एंथोसायनिन नामक तत्व जोड़ों की सूजन और दर्द को कम करने में मदद करता है।

जीवनशैली में जरूरी बदलाव

नियमित व्यायाम: रोजाना हल्की एक्सरसाइज या वॉक से मेटाबॉलिज्म बेहतर रहता है।

वजन नियंत्रण: बढ़ा हुआ वजन जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, इसलिए वजन संतुलित रखना जरूरी है।

समय पर जांच: जोड़ों में लगातार दर्द, सूजन या लालिमा होने पर सीरम यूरिक एसिड टेस्ट जरूर कराएं।

शुरुआती सावधानी: छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर इस समस्या को गंभीर होने से पहले ही रोका जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी तरह की दवा या उपचार शुरू करने से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

(साभार)


कैंसर बना वैश्विक चुनौती, युवाओं में बढ़ता खतरा चिंता का विषय

कैंसर आज दुनिया भर में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यह बीमारी वैश्विक स्तर पर मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है। वर्ष 2020 में करीब एक करोड़ लोगों की जान कैंसर के कारण गई, यानी हर छह में से एक मौत की वजह कैंसर रहा। ब्रेस्ट, फेफड़े, कोलन, रेक्टम और प्रोस्टेट कैंसर सबसे ज्यादा जानलेवा साबित हो रहे हैं। बीते कुछ दशकों में कैंसर के मामलों और इससे होने वाली मौतों में तेज़ बढ़ोतरी ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

इसी गंभीरता को देखते हुए कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने और इसकी रोकथाम, समय पर पहचान व बेहतर इलाज को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे मनाया जाता है।

दिल्ली की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, युवाओं पर भारी पड़ रहा कैंसर

इस बीच दिल्ली से सामने आई एक सरकारी रिपोर्ट ने हालात को और चिंताजनक बना दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 20 वर्षों में दिल्ली में कैंसर से होने वाली हर तीन में से एक मौत 44 वर्ष से कम उम्र के लोगों की हुई है। यह आंकड़ा युवाओं में कैंसर के बढ़ते खतरे की ओर साफ इशारा करता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बीमारी की देर से पहचान, नियमित स्क्रीनिंग की कमी, तंबाकू और शराब का बढ़ता सेवन, प्रदूषण तथा तनाव जैसे कारण इस बढ़ते खतरे के लिए जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञ समय से पहले होने वाली मौतों को रोकने के लिए शुरुआती जांच, जन-जागरूकता और जीवनशैली में सुधार पर जोर दे रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते दो दशकों में दिल्ली में कैंसर से 1.1 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ा

साल 2005 में जहां कैंसर से करीब 2,000 मौतें दर्ज की गई थीं, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर लगभग 7,400 तक पहुंच गई।
साल 2011 में कैंसर से करीब 10,000 मौतें हुईं, जिनमें 45–64 वर्ष आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित रहे। इसके अलावा, 14 साल से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत और 15–24 वर्ष के युवाओं की करीब 5.8 प्रतिशत रही।

दिल्ली में सालाना 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहीं कैंसर से मौतें

विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली में कैंसर से होने वाली मौतें हर साल औसतन 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही हैं, जो राजधानी की जनसंख्या वृद्धि दर से लगभग तीन गुना ज्यादा है।

कैंसर से होने वाली 90 प्रतिशत से अधिक मौतें अस्पतालों में दर्ज की गई हैं। वर्ष 2018 में यह आंकड़ा लगभग 98 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समय के साथ कैंसर की रिपोर्टिंग और इलाज की पहुंच बढ़ी है।

2005 से 2024 के बीच अस्पतालों में 45–64 वर्ष आयु वर्ग के 38,481 लोगों की कैंसर से मौत हुई, जबकि 65 वर्ष से अधिक आयु के 23,141 और 25–44 वर्ष आयु वर्ग के 18,220 लोगों की जान गई।

कौन-सा कैंसर सबसे ज्यादा जानलेवा?

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में कैंसर से मौत के मामले अधिक हैं।

पुरुषों में करीब 40 प्रतिशत मौतें 45–64 वर्ष आयु वर्ग में दर्ज की गईं

महिलाओं में इसी आयु वर्ग में यह आंकड़ा 43 प्रतिशत से अधिक रहा

महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर (411 मौतें) और ओवेरियन कैंसर (194 मौतें) प्रमुख कारण रहे

पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर (117) और सांस की नली के कैंसर (553) सबसे ज्यादा जानलेवा साबित हुए

मुंह और गले के कैंसर से पुरुषों में 607 और महिलाओं में 214 मौतें दर्ज की गईं, जो तंबाकू सेवन से जुड़े जोखिम को दर्शाता है

25–44 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में कैंसर से होने वाली अधिकांश मौतों की वजह ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर रहे।

देर से पहचान बन रही सबसे बड़ी वजह

कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर मामलों में मौतों की मुख्य वजह बीमारी का देर से पता चलना है। लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं, यह सोचकर कि कम उम्र में कैंसर होना संभव नहीं। नतीजतन, बीमारी का पता तब चलता है जब वह एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है।

डॉक्टरों के अनुसार, युवाओं में कैंसर की बायोलॉजी अधिक आक्रामक होती है। शरीर में गांठ, असामान्य ब्लीडिंग, लंबे समय तक मुंह के छाले या आवाज में बदलाव जैसे संकेतों को सामान्य समझना इलाज में देरी का कारण बनता है।

डॉक्टरों की सलाह

विशेषज्ञ कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने के लिए नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम बढ़ाने, तंबाकू और शराब से दूरी बनाने, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करने की अपील कर रहे हैं।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है।

(साभार)


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