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मोबाइल देखते-देखते सिरदर्द क्यों होता है? स्क्रीन के साथ ये आदतें भी हैं जिम्मेदार

Category Archives: जीवन शैली

मोबाइल देखते-देखते सिरदर्द क्यों होता है? स्क्रीन के साथ ये आदतें भी हैं जिम्मेदार

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बिना कामकाज की कल्पना करना मुश्किल है। पढ़ाई से लेकर ऑफिस के काम और मनोरंजन तक, दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने गुजरता है। लगातार स्क्रीन देखने के बाद सिरदर्द या आंखों में भारीपन महसूस होना आम बात है, लेकिन इसके पीछे सिर्फ स्क्रीन ही जिम्मेदार हो, यह जरूरी नहीं है। हमारी नींद, खान-पान, पानी पीने की आदत और बैठने का तरीका भी सिरदर्द को प्रभावित कर सकता है।

सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट और यूनिट हेड डॉ. नेहा पंडिता के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के इस्तेमाल के साथ अगर शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो सिरदर्द और मानसिक थकान जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम के साथ रोजमर्रा की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

लगातार स्क्रीन देखने से क्यों हो सकता है सिरदर्द?

लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार नजर टिकाए रखने से आंखों पर दबाव पड़ सकता है। स्क्रीन देखते समय हम सामान्य से कम पलकें झपकाते हैं, जिससे आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस हो सकती है। स्क्रीन की तेज रोशनी या ग्लेयर भी कुछ लोगों में असहजता और सिरदर्द की वजह बन सकता है।

गलत पॉश्चर भी बढ़ा सकता है परेशानी

मोबाइल को लगातार नीचे करके देखने या लैपटॉप पर झुककर काम करने की आदत गर्दन और कंधों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने से मांसपेशियों में तनाव पैदा हो सकता है, जिसका असर सिरदर्द के रूप में दिखाई दे सकता है।

माइग्रेन से परेशान लोगों को ज्यादा सावधानी

जिन लोगों को माइग्रेन की शिकायत रहती है, उनके लिए तेज रोशनी और लंबे समय तक स्क्रीन देखना संभावित ट्रिगर हो सकता है। हालांकि स्क्रीन के साथ-साथ तनाव, नींद की कमी, पर्याप्त पानी न पीना और लंबे समय तक भूखे रहना भी माइग्रेन की समस्या को बढ़ा सकता है।

रात में मोबाइल चलाने से नींद पर असर

बिस्तर पर जाने के बाद लंबे समय तक फोन पर वीडियो देखना या सोशल मीडिया स्क्रॉल करना नींद के समय को कम कर सकता है। नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में परेशानी और मानसिक सुस्ती महसूस हो सकती है। इसलिए सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना बेहतर आदत हो सकती है।

क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम से याददाश्त कमजोर होती है?

सामान्य स्क्रीन इस्तेमाल को सीधे तौर पर दिमाग को नुकसान पहुंचने या याददाश्त कमजोर होने से जोड़ना सही नहीं माना जाता। हालांकि लगातार नोटिफिकेशन, बार-बार काम बदलना और देर रात तक स्क्रीन इस्तेमाल करने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। ऐसे में व्यक्ति को लग सकता है कि उसकी याददाश्त कमजोर हो रही है, जबकि असल समस्या ध्यान और एकाग्रता में कमी हो सकती है।

स्क्रीन इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान
लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से बचें और बीच-बीच में छोटे ब्रेक लें।
पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें और भोजन समय पर करें।
मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल करते समय गर्दन को ज्यादा झुकाने से बचें।
स्क्रीन पर पड़ने वाली तेज रोशनी और ग्लेयर को कम करने की कोशिश करें।
सोने से पहले कुछ समय फोन और दूसरी स्क्रीन से दूरी रखें।
अगर स्क्रीन देखने के बाद बार-बार सिरदर्द होता है, तो इसके पैटर्न और संभावित कारणों पर ध्यान दें।

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

अगर सिरदर्द अचानक बहुत तेज हो, लगातार बढ़ रहा हो या उसके साथ कमजोरी, शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन, भ्रम, दौरे, बेहोशी, बोलने में परेशानी या नजर में गंभीर बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

कुल मिलाकर, सिरदर्द को केवल स्क्रीन टाइम से जोड़ना सही नहीं होगा। स्क्रीन के साथ हमारी नींद, तनाव, खान-पान, पानी की मात्रा और बैठने का तरीका भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए स्क्रीन कम करने के साथ-साथ स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखना भी जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारी और विशेषज्ञ की बताई गई बातों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लगातार बनी रहने वाली समस्या में डॉक्टर से सलाह लें।

(साभार)


टूथब्रश बदलने में न करें देरी, जानें कितने महीने बाद लेना चाहिए नया ब्रश

ओरल हेल्थ के लिए नियमित ब्रश करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी सही समय पर टूथब्रश बदलना भी है। कई लोग ब्रश के ब्रिसल्स पूरी तरह घिस जाने तक उसी टूथब्रश का इस्तेमाल करते रहते हैं। हालांकि, समय के साथ ब्रिसल्स की स्थिति खराब होने से दांतों की सफाई पहले जैसी प्रभावी नहीं रह सकती। इसलिए टूथब्रश की हालत पर ध्यान देना जरूरी है।

कितने समय में बदलें टूथब्रश?

आमतौर पर हर 3 से 4 महीने में टूथब्रश बदलने की सलाह दी जाती है। हालांकि, अगर इससे पहले ही ब्रिसल्स फैलने, मुड़ने या घिसने लगें, तो नया ब्रश इस्तेमाल करना बेहतर है। जो लोग ब्रश करते समय अधिक दबाव डालते हैं, उनके टूथब्रश के ब्रिसल्स जल्दी खराब हो सकते हैं।

ब्रिसल्स देखकर ऐसे पहचानें पुराना ब्रश

टूथब्रश बदलने का संकेत उसके ब्रिसल्स भी देते हैं। अगर ब्रिसल्स बाहर की ओर फैल गए हैं, मुड़ गए हैं या उनकी लंबाई और आकार में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है, तो ब्रश बदलने का समय आ गया है। खराब हो चुके ब्रिसल्स दांतों की सतह और मसूड़ों की लाइन की सफाई उतनी अच्छी तरह नहीं कर पाते।

ज्यादा पुराना ब्रश इस्तेमाल करने का नुकसान

समय के साथ टूथब्रश के ब्रिसल्स अपनी प्रभावशीलता खो सकते हैं, जिससे प्लाक हटाने की क्षमता प्रभावित होती है। वहीं, बहुत जोर लगाकर ब्रश करने से मसूड़ों में जलन और दांतों की बाहरी सतह पर घिसाव की समस्या भी हो सकती है। इसलिए सॉफ्ट-ब्रिसल वाले टूथब्रश का इस्तेमाल करते हुए हल्के हाथ से ब्रश करना बेहतर माना जाता है।

दिन में कितनी बार करें ब्रश?

दांतों की बेहतर सफाई के लिए दिन में दो बार करीब 2 मिनट तक ब्रश करना सामान्य सलाह है। सॉफ्ट-ब्रिसल वाले ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्रश करते समय दांतों के साथ मसूड़ों की लाइन को भी धीरे-धीरे साफ करना चाहिए।

टूथब्रश को रखने का सही तरीका

ब्रश करने के बाद टूथब्रश को साफ पानी से धोकर सीधा ऐसी जगह रखना चाहिए जहां वह अच्छी तरह सूख सके। इसे लंबे समय तक गीला और बंद डिब्बे में रखने से बचना चाहिए। टूथब्रश को अन्य लोगों के ब्रश से अलग रखना भी जरूरी है।

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

अगर मसूड़ों से बार-बार खून आता है, उनमें सूजन रहती है, दांतों में लगातार दर्द या संवेदनशीलता महसूस होती है या मुंह से लंबे समय तक दुर्गंध आती है, तो सिर्फ टूथब्रश बदलना पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में दंत चिकित्सक से जांच कराना उचित रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी भी दांत या मसूड़ों की समस्या के लिए योग्य डेंटिस्ट की सलाह लें।

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खाने के बाद सौंफ-मिश्री क्यों खाते हैं? जानिए इसके फायदे और किन लोगों को रखनी चाहिए सावधानी

खाने के बाद सौंफ और मिश्री परोसने की परंपरा भारतीय खान-पान का हिस्सा रही है। घर हो या रेस्टोरेंट, भोजन खत्म होने के बाद अक्सर लोग इसे माउथ फ्रेशनर के तौर पर लेते हैं। हालांकि, इसका इस्तेमाल केवल मुंह की ताजगी तक सीमित नहीं है। सौंफ में मौजूद कुछ पोषक तत्व और प्राकृतिक यौगिक इसे भोजन के बाद लेने वाली एक उपयोगी चीज बनाते हैं। वहीं, मिश्री को लेकर यह समझना जरूरी है कि यह भी मूल रूप से चीनी ही है, इसलिए इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए।

सौंफ खाने से क्या फायदे हो सकते हैं?

1. पाचन में मिल सकती है मदद
भोजन के बाद थोड़ी सौंफ चबाने की आदत काफी पुरानी है। माना जाता है कि यह पेट से जुड़ी हल्की असहजता और पाचन संबंधी परेशानी में कुछ लोगों को राहत दे सकती है। हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति में एक जैसा होना जरूरी नहीं है।

2. सांसों की दुर्गंध कम करने में सहायक
सौंफ की खुशबू और इसका स्वाद मुंह को ताजगी देने में मदद कर सकता है। इसी कारण इसे खाने के बाद प्राकृतिक माउथ फ्रेशनर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

3. फाइबर भी होता है मौजूद
सौंफ के बीजों में फाइबर पाया जाता है। हालांकि, भोजन के बाद खाई जाने वाली थोड़ी मात्रा से मिलने वाला फाइबर सीमित होता है। इसलिए रोजाना की फाइबर जरूरत पूरी करने के लिए केवल सौंफ पर निर्भर रहना सही नहीं है।

4. एंटीऑक्सीडेंट गुणों वाले तत्व
सौंफ में कई प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण देखे गए हैं। लेकिन इसे किसी बीमारी की रोकथाम या इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

मिश्री खाने के क्या फायदे हैं?

सौंफ के साथ मिश्री खाने से इसका स्वाद बेहतर हो जाता है और मुंह में मिठास भी बनी रहती है। लेकिन मिश्री को सामान्य चीनी से अलग या ज्यादा हेल्दी मानना सही नहीं है। इसमें मुख्य रूप से शुगर होती है और अधिक मात्रा में खाने से शरीर में अतिरिक्त कैलोरी और चीनी की मात्रा बढ़ सकती है।

इसलिए अगर आप सौंफ के साथ मिश्री लेते हैं तो इसकी मात्रा छोटी रखना बेहतर है, खासकर उन लोगों के लिए जो अपनी शुगर या कैलोरी की मात्रा नियंत्रित करना चाहते हैं।

सौंफ और मिश्री साथ खाने का क्या असर होता है?

सौंफ और मिश्री का मेल मुख्य रूप से भोजन के बाद स्वाद और ताजगी के लिए लिया जाता है। सौंफ का स्वाद कुछ लोगों को तीखा या तेज लग सकता है, ऐसे में थोड़ी मिश्री इसके स्वाद को संतुलित कर देती है। इसे किसी बीमारी का इलाज या स्वास्थ्य संबंधी समस्या का समाधान समझना उचित नहीं है।

कितनी मात्रा में खानी चाहिए?

खाने के बाद थोड़ी मात्रा में सौंफ लेना पर्याप्त माना जा सकता है। इसके साथ मिश्री लेते हैं तो उसकी मात्रा कम रखना बेहतर है। खासकर रोजाना सौंफ-मिश्री खाने की आदत है तो मिश्री की मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है।

किन लोगों को रखनी चाहिए सावधानी?
डायबिटीज या ब्लड शुगर की समस्या वाले लोगों को मिश्री की मात्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
वजन कम करने या नियंत्रित करने वालों को मिश्री से मिलने वाली अतिरिक्त कैलोरी का ध्यान रखना चाहिए।
सौंफ खाने के बाद एलर्जी, पेट में परेशानी या कोई असामान्य प्रतिक्रिया महसूस हो तो इसका सेवन रोककर डॉक्टर से सलाह लें।
किसी बीमारी के इलाज के लिए केवल सौंफ या मिश्री पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी बीमारी, दवा या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।

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केला खाने का सही समय क्या है? जानिए सुबह, दोपहर या रात में कब खाना ज्यादा बेहतर

केला रोजमर्रा की डाइट में शामिल किए जाने वाले सबसे आसान और पौष्टिक फलों में से एक है। यह न सिर्फ आसानी से मिल जाता है, बल्कि इसमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, पोटैशियम और विटामिन B6 जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। हालांकि, केला खाने को लेकर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि इसे सुबह खाना बेहतर है या रात में, क्या इसे खाली पेट खाया जा सकता है और क्या दूध के साथ केला लेना सही रहता है। आइए जानते हैं केला खाने से जुड़ी जरूरी बातें।

कैसा केला खाना बेहतर माना जाता है?

केला खरीदते समय उसकी पकने की अवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। अच्छी तरह पका केला सामान्य तौर पर नरम और स्वाद में मीठा होता है। वहीं, कम पके केले में रेजिस्टेंट स्टार्च की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। पकने के साथ केले की बनावट और स्टार्च की प्रकृति में बदलाव आता है। हालांकि, कच्चे या कम पके केले को खराब नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें अलग-अलग व्यंजनों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

दिन में कितने केले खाएं?

केला कार्बोहाइड्रेट और ऊर्जा देने वाले पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है, इसलिए इसे नाश्ते, स्नैक या एक्सरसाइज के आसपास डाइट में शामिल किया जा सकता है। लेकिन हर व्यक्ति के लिए केले की एक जैसी मात्रा तय नहीं की जा सकती। उम्र, शारीरिक गतिविधि, रोजाना की कैलोरी जरूरत और बाकी खान-पान को ध्यान में रखकर इसकी मात्रा तय करनी चाहिए।

क्या दूध के साथ केला खाना सही है?

केले और दूध से बना शेक या स्मूदी काफी लोकप्रिय है। जिन लोगों को दूध और केला आसानी से पचता है, वे दोनों को अपनी सामान्य डाइट का हिस्सा बना सकते हैं। केले से कार्बोहाइड्रेट और दूध से प्रोटीन सहित कई पोषक तत्व मिलते हैं। हालांकि, जिन लोगों को दूध से गैस, पेट फूलने या पाचन संबंधी परेशानी होती है, उन्हें इस कॉम्बिनेशन से असहजता महसूस हो सकती है।

क्या रात में केला खाने से नुकसान होता है?

केला सिर्फ सुबह खाना चाहिए और रात में इसे खाने से नुकसान होता है, ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपनी जरूरत और डाइट के अनुसार दिन में किसी भी समय केला खा सकता है। हालांकि, कुछ लोगों को रात में केला खाने के बाद पेट भारी लग सकता है या गैस जैसी परेशानी हो सकती है। ऐसी स्थिति में रात के समय केला खाने से बचना बेहतर विकल्प हो सकता है।

केला अकेले नहीं, संतुलित डाइट के साथ खाएं

केला पोषक तत्वों से भरपूर फल है, लेकिन इसे किसी बीमारी का इलाज या चमत्कारी खाद्य पदार्थ समझना सही नहीं है। शरीर को बेहतर पोषण देने के लिए डाइट में अलग-अलग तरह के फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, प्रोटीन और स्वस्थ वसा को शामिल करना जरूरी है। ऐसे में केला संतुलित आहार का एक सुविधाजनक और पौष्टिक हिस्सा बन सकता है।

इन लोगों को केला खाते समय सावधानी बरतनी चाहिए

अगर किसी व्यक्ति को केले या किसी अन्य खाद्य पदार्थ से एलर्जी या असहिष्णुता है, तो उसे सेवन के बाद होने वाले लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। वहीं, डायबिटीज, किडनी से जुड़ी समस्या या किसी अन्य मेडिकल कंडीशन से जूझ रहे लोगों को अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेनी चाहिए।

कुल मिलाकर, केला खाने का कोई एक निश्चित समय सभी लोगों के लिए जरूरी नहीं है। अपनी दिनचर्या, पाचन क्षमता और पोषण संबंधी जरूरतों के अनुसार इसे डाइट में शामिल किया जा सकता है। किसी एक फल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भोजन का हिस्सा बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और सामान्य पोषण संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी विशेष बीमारी या स्वास्थ्य स्थिति में डाइट से जुड़ा निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

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बार-बार फूल रही है सांस तो न करें नजरअंदाज, दिल से लेकर फेफड़ों तक इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलना, थोड़ी दूर चलते ही हांफने लगना या सामान्य काम करने के बाद भी सांस लेने में परेशानी होना कई लोग थकान समझकर टाल देते हैं। खासकर कम उम्र में ऐसी समस्या होने पर इसे फिटनेस की कमी या कमजोरी से जोड़ दिया जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार लगातार या असामान्य तरीके से सांस फूलना शरीर में किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। इसकी वजह केवल फेफड़ों से जुड़ी बीमारी ही नहीं, बल्कि हृदय संबंधी परेशानी, खून की कमी या अन्य गंभीर स्थितियां भी हो सकती हैं।

मेडिकल भाषा में सांस फूलने की समस्या को डिस्प्निया कहा जाता है। तेज दौड़ने, व्यायाम करने या अधिक मेहनत के बाद कुछ समय के लिए सांस तेज होना सामान्य है। लेकिन यदि बिना ज्यादा मेहनत के ही सांस फूलने लगे, थोड़ी दूरी चलने पर परेशानी होने लगे या आराम करते समय भी सांस लेने में दिक्कत महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

आखिर क्यों फूलती है सांस?

सांस फूलना अपने आप में कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर में किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए फेफड़े, हृदय, रक्त और मांसपेशियां मिलकर काम करते हैं।

फेफड़े हवा से ऑक्सीजन लेकर उसे रक्त तक पहुंचाते हैं। इसके बाद लाल रक्त कोशिकाएं ऑक्सीजन को शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाती हैं और हृदय इस रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है। इस प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर समस्या आने पर शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी महसूस हो सकती है।

दिल की बीमारी का भी हो सकता है संकेत

सांस फूलने को केवल फेफड़ों की समस्या मानना सही नहीं है। कई हृदय रोगों में भी यह शुरुआती लक्षण के रूप में सामने आ सकता है। यदि हृदय की पंपिंग क्षमता कमजोर हो जाए या हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन न पहुंच पाए, तो शरीर की जरूरत पूरी करने में परेशानी होती है और सांस फूल सकती है।

कोरोनरी आर्टरी डिजीज में हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में वसा और कोलेस्ट्रॉल जमा होने से उनका रास्ता संकरा हो सकता है। इससे हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और शारीरिक गतिविधि के दौरान सांस फूलने जैसी समस्या हो सकती है।

इसके अलावा हार्ट वाल्व की बीमारी में भी सांस फूलना देखा जा सकता है। हृदय के वाल्व रक्त को सही दिशा में प्रवाहित करने में मदद करते हैं। वाल्व के संकरे होने या सही तरीके से बंद न होने पर हृदय को रक्त पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है, जिससे सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

अस्थमा और सीओपीडी भी हो सकते हैं जिम्मेदार

सांस फूलने के प्रमुख कारणों में अस्थमा भी शामिल है। इसमें वायुमार्ग में सूजन और संकुचन हो सकता है, जिससे फेफड़ों में हवा का आवागमन प्रभावित होता है। इसके चलते सांस फूलने के साथ घरघराहट, खांसी और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

धूल, धुआं, परागकण, ठंडी हवा, एलर्जी या वायरल संक्रमण जैसी स्थितियां अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं।

वहीं क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) में वायुमार्ग और फेफड़ों की कार्यक्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होती है। इसमें लंबे समय तक खांसी, बलगम, सांस फूलना और मामूली शारीरिक गतिविधि के बाद भी थकान जैसी शिकायत हो सकती है।

खून की कमी से भी हो सकती है सांस फूलने की परेशानी

हर बार सांस फूलने की वजह हृदय या फेफड़ों की बीमारी नहीं होती। एनीमिया भी इसका एक कारण हो सकता है। शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने पर रक्त पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन को शरीर के अंगों तक नहीं पहुंचा पाता।

ऐसे में शरीर ऑक्सीजन की कमी पूरी करने के लिए तेजी से सांस लेने की कोशिश करता है। यही वजह है कि एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति को सामान्य काम करने, पैदल चलने या सीढ़ियां चढ़ने के दौरान भी सांस फूलने की शिकायत हो सकती है।

फेफड़ों में खून का थक्का पहुंचना भी गंभीर स्थिति

पल्मोनरी एम्बोलिज्म एक गंभीर स्थिति है, जिसमें शरीर की किसी नस में बना रक्त का थक्का टूटकर फेफड़ों की रक्त वाहिका तक पहुंच सकता है। इससे फेफड़ों में रक्त का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।

इस स्थिति में अचानक सांस फूलना, सीने में दर्द और दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे लक्षण अचानक सामने आएं तो इसे सामान्य थकान मानकर इंतजार करना उचित नहीं है और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

कब हो जाएं सतर्क?

अगर सांस फूलने की समस्या बार-बार हो रही है, पहले की तुलना में कम मेहनत पर ही सांस चढ़ने लगी है, आराम की स्थिति में भी सांस लेने में परेशानी होती है या इसके साथ सीने में दर्द, चक्कर, अत्यधिक कमजोरी या दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्या है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारियों और रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है। सांस फूलने की समस्या के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।


बालों को लंबा, घना और चमकदार बनाना है? रोजाना खाएं ये पोषक तत्वों से भरपूर फूड्स

मानसून के दौरान बढ़ी हुई नमी और पसीने की वजह से बालों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ जाती हैं। इस मौसम में हेयर फॉल, डैंड्रफ और बालों का बेजान होना आम बात है। ऐसे में सिर्फ महंगे शैंपू या हेयर सीरम पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाना भी जरूरी है। सही खानपान बालों को जड़ों से पोषण देकर उन्हें मजबूत, घना और चमकदार बनाए रखने में मदद कर सकता है।

बारिश के मौसम में स्कैल्प पर गंदगी, अतिरिक्त ऑयल और नमी जमा होने से बाल कमजोर होने लगते हैं। यदि शरीर को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, आयरन, बायोटिन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, जिंक और विटामिन्स नहीं मिलते, तो इसका असर बालों की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित डाइट अपनाकर बालों का झड़ना कम किया जा सकता है और उनकी ग्रोथ को बेहतर बनाया जा सकता है।

इन फूड्स को डाइट में करें शामिल

1. अंडा
अंडा उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और बायोटिन का अच्छा स्रोत माना जाता है। यह बालों की जड़ों को मजबूती देने और नए बालों के विकास में मदद कर सकता है।

2. पालक
पालक में आयरन, फोलेट, विटामिन A और विटामिन C भरपूर मात्रा में होते हैं। ये पोषक तत्व स्कैल्प को स्वस्थ रखने और बालों को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं।

3. बादाम और अखरोट
इन ड्राई फ्रूट्स में ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन E और जिंक पाया जाता है, जो बालों को टूटने से बचाने और उनकी प्राकृतिक चमक बनाए रखने में मदद करते हैं।

4. दही
दही में मौजूद प्रोटीन और प्रोबायोटिक्स स्कैल्प की सेहत सुधारने के साथ-साथ बालों की जड़ों को भी पोषण देते हैं।

5. फैटी फिश
सैल्मन जैसी मछलियां ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती हैं, जो बालों को घना, मुलायम और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।

6. शकरकंद
शकरकंद में मौजूद बीटा-कैरोटीन शरीर में विटामिन A में बदल जाता है, जो बालों की ग्रोथ को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाता है।

7. आंवला
विटामिन C से भरपूर आंवला कोलेजन बनाने में मदद करता है और बालों की जड़ों को मजबूत बनाने में उपयोगी माना जाता है।

8. फ्लैक्स सीड्स और चिया सीड्स
इन बीजों में ओमेगा-3, प्रोटीन और जिंक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो बालों की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हो सकते हैं।

9. दालें
दालें प्रोटीन, आयरन और जिंक का अच्छा स्रोत हैं। नियमित सेवन से बालों को आवश्यक पोषण मिलता है और हेयर फॉल की समस्या कम हो सकती है।

10. मौसमी फल
संतरा, अमरूद, कीवी और बेरीज जैसे फल एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन C से भरपूर होते हैं, जो बालों को फ्री-रेडिकल्स से बचाने और उन्हें स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं।

बालों की देखभाल के लिए अपनाएं ये आसान टिप्स
रोजाना पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन युक्त भोजन लें।
दिनभर में 2 से 3 लीटर पानी जरूर पिएं।
पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित रखें।
स्कैल्प की नियमित सफाई करें।
जरूरत से ज्यादा केमिकल युक्त हेयर प्रोडक्ट्स और हीट स्टाइलिंग से बचें।
संतुलित आहार के साथ नियमित हेयर केयर रूटीन अपनाएं।

नोट: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। यदि बालों का झड़ना लंबे समय तक जारी रहे या अत्यधिक बढ़ जाए, तो त्वचा एवं बाल रोग विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) से सलाह लेना उचित रहेगा।

(साभार)


सोया चाप खाने से पहले जान लें फायदे और नुकसान, सेहत पर कैसा पड़ता है असर?

आज के समय में सोया चाप फास्ट फूड और रेस्टोरेंट मेन्यू का लोकप्रिय हिस्सा बन चुकी है। खासकर शाकाहारी लोगों के बीच इसे प्रोटीन से भरपूर विकल्प के रूप में पसंद किया जाता है। हालांकि, यह जितनी स्वादिष्ट होती है, उतना ही जरूरी है यह समझना कि इसे किस तरह तैयार किया गया है और कितनी मात्रा में खाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित मात्रा में और सही तरीके से बनाई गई सोया चाप फायदेमंद हो सकती है, लेकिन अत्यधिक प्रोसेस्ड या ज्यादा तेल-मसालों वाली सोया चाप सेहत पर नकारात्मक असर भी डाल सकती है।

क्या होती है सोया चाप?

सोया चाप मुख्य रूप से सोयाबीन प्रोटीन से तैयार किया जाने वाला खाद्य पदार्थ है, जिसे अक्सर शाकाहारी लोगों के लिए मीट के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सही गुणवत्ता वाली सोया चाप में प्रति 100 ग्राम लगभग 12 से 15 ग्राम प्रोटीन हो सकता है, जो शरीर की प्रोटीन जरूरत पूरी करने में मदद करता है।

सोया चाप खाने के फायदे

प्रोटीन की अच्छी मात्रा
सोया चाप शरीर को आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध कराती है, जो मांसपेशियों के विकास और ऊतकों की मरम्मत के लिए जरूरी माना जाता है।

लंबे समय तक पेट भरा रखने में मददगार
प्रोटीन युक्त भोजन जल्दी भूख नहीं लगने देता, जिससे अनावश्यक स्नैकिंग कम हो सकती है और वजन नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

फिटनेस पसंद लोगों के लिए उपयोगी
वर्कआउट करने वाले लोगों के लिए पर्याप्त प्रोटीन जरूरी होता है। संतुलित आहार के साथ सीमित मात्रा में सोया चाप इसका एक अच्छा विकल्प बन सकती है।

किन बातों का रखें ध्यान?

अधिक तेल और मसाले बढ़ा सकते हैं जोखिम
रेस्टोरेंट या स्ट्रीट फूड में मिलने वाली सोया चाप अक्सर अधिक तेल, क्रीम और मसालों के साथ बनाई जाती है, जिससे इसकी कैलोरी और फैट काफी बढ़ जाते हैं।

प्रोसेस्ड फूड होने के कारण सावधानी जरूरी
बाजार में उपलब्ध कई प्रकार की सोया चाप अत्यधिक प्रोसेस्ड होती हैं। इनमें स्वाद और बनावट बढ़ाने के लिए अतिरिक्त सामग्री मिलाई जाती है, जो नियमित सेवन के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।

कुछ लोगों को हो सकती है एलर्जी
सोया से एलर्जी या संवेदनशीलता रखने वाले लोगों में इसका सेवन गैस, पेट फूलना या पाचन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है।

हेल्दी तरीके से कैसे खाएं?
घर पर कम तेल और हल्के मसालों के साथ तैयार करें।
तली हुई या ज्यादा क्रीमी सोया चाप खाने से बचें।
इसे हरी सब्जियों, सलाद और संतुलित भोजन के साथ शामिल करें।
रोजाना या बहुत अधिक मात्रा में सेवन करने से बचें।
क्या इसे डाइट में शामिल करना चाहिए?

सोया चाप पूरी तरह से नुकसानदायक नहीं है। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि इसे किस तरह तैयार किया गया है और कितनी मात्रा में खाया जा रहा है। यदि इसे सीमित मात्रा में, कम तेल और संतुलित आहार के साथ खाया जाए तो यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत बन सकती है। हालांकि, बाजार में मिलने वाली अधिकांश सोया चाप में सोयाबीन के अलावा मैदा और व्हीट ग्लूटेन जैसी सामग्री भी मिलाई जाती है, इसलिए इसे नियमित भोजन का मुख्य हिस्सा बनाने से पहले गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या डाइट संबंधी निर्णय के लिए डॉक्टर या योग्य न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह अवश्य लें।

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क्या वजन घटाने के लिए रोटी छोड़ना जरूरी है? आइये जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

अक्सर वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोग सबसे पहले अपनी डाइट से रोटी को बाहर कर देते हैं। उनका मानना होता है कि रोटी खाने से वजन बढ़ता है, लेकिन पोषण विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा जरूरी नहीं है। यदि सही मात्रा में और संतुलित आहार के साथ रोटी का सेवन किया जाए, तो यह वेट लॉस प्लान का हिस्सा भी बन सकती है। आइए जानते हैं कि वजन घटाने के दौरान रोटी को लेकर क्या सच है और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

वजन कम करने के लिए केवल रोटी छोड़ देना कोई जादुई उपाय नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर का वजन तब घटता है, जब आप अपनी जरूरत से कम कैलोरी लेते हैं और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करते हैं। ऐसे में रोटी को पूरी तरह छोड़ने की बजाय सही मात्रा में खाना अधिक फायदेमंद हो सकता है।

क्या वेट लॉस में रोटी खा सकते हैं?

जवाब है—हां। अगर रोटी संतुलित डाइट का हिस्सा हो और उसके साथ पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियां शामिल हों, तो यह वजन घटाने में बाधा नहीं बनती। सबसे जरूरी बात है कि पूरे दिन की कुल कैलोरी पर ध्यान दिया जाए।

रोटी क्यों हो सकती है फायदेमंद?
साबुत गेहूं की रोटी में फाइबर होता है, जो लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है।
इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे दिनभर सक्रिय रहने में सहायता मिलती है।
दाल, पनीर, दही, अंडा या अन्य प्रोटीन स्रोतों के साथ रोटी खाने से भोजन अधिक संतुलित बनता है।

एक दिन में कितनी रोटी खानी चाहिए?

रोटी की मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह उम्र, वजन, जीवनशैली और शारीरिक गतिविधि पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर एक समय के भोजन में 1 से 2 मध्यम आकार की रोटी कई लोगों के लिए पर्याप्त मानी जाती है। बेहतर होगा कि मैदा की जगह साबुत गेहूं या मल्टीग्रेन आटे की रोटी का चयन करें।

इन बातों का रखें ध्यान
रोटी पर जरूरत से ज्यादा घी या मक्खन लगाने से बचें।
भोजन के साथ तली-भुनी और अधिक तेल वाली चीजों का सेवन कम करें।
जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाएं।
नियमित व्यायाम, पर्याप्त पानी और अच्छी नींद भी वजन घटाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।

नोट: यह जानकारी विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार की गई है। किसी भी विशेष डाइट या स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह लेना उचित रहेगा।

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गलत तकिया बन सकता है गर्दन दर्द की वजह, जानें सही तकिया चुनने का तरीका

अच्छी और गहरी नींद के लिए सिर्फ सही गद्दा ही नहीं, बल्कि सही तकिया भी बेहद अहम भूमिका निभाता है। अगर सुबह उठते ही गर्दन में दर्द, कंधों में जकड़न या सिर भारी महसूस होता है, तो इसकी वजह आपका तकिया भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गलत ऊंचाई या आकार का तकिया रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में अपनी सोने की आदत के अनुसार सही तकिया चुनना जरूरी है।

अच्छी नींद के लिए सही तकिया क्यों है जरूरी?

नींद के दौरान शरीर को पूरी तरह आराम तभी मिलता है, जब सिर, गर्दन और रीढ़ एक सीध में रहें। यदि तकिया बहुत ऊंचा, बहुत पतला या जरूरत से ज्यादा कठोर है, तो शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है। इसका असर नींद की गुणवत्ता के साथ-साथ अगले दिन की सेहत पर भी दिखाई देता है।

गलत तकिया बन सकता है दर्द की वजह

विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक गलत तकिया इस्तेमाल करने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे—

सुबह उठते ही गर्दन में दर्द या अकड़न
कंधों में भारीपन और जकड़न
सिरदर्द की शिकायत
रात में बार-बार नींद खुलना
पूरे दिन थकान महसूस होना
ज्यादा ऊंचा तकिया क्यों नहीं है सही?

अगर तकिया जरूरत से ज्यादा ऊंचा है, तो सोते समय गर्दन आगे की ओर झुक जाती है। इससे गर्दन की मांसपेशियों और नसों पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर पीठ के बल सोने वालों के लिए ऊंचा तकिया नुकसानदायक साबित हो सकता है।

बहुत पतला तकिया भी बढ़ा सकता है परेशानी

सिर्फ ऊंचा ही नहीं, बहुत पतला तकिया भी सही विकल्प नहीं माना जाता। यदि तकिया सिर और गर्दन को पर्याप्त सहारा नहीं देता, तो रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति बिगड़ सकती है। इससे गर्दन में खिंचाव, दर्द और सुबह उठने पर शरीर में थकान महसूस हो सकती है।

अपनी सोने की आदत के अनुसार चुनें तकिया

हर व्यक्ति के लिए एक जैसा तकिया उपयुक्त नहीं होता। सही चुनाव आपकी सोने की पोजीशन पर निर्भर करता है।

पीठ के बल सोने वाले लोग

मध्यम ऊंचाई वाला तकिया चुनें।
गर्दन को प्राकृतिक सपोर्ट मिले।
सिर और रीढ़ एक सीध में रहें।

करवट लेकर सोने वाले लोग

थोड़ा ऊंचा और मजबूत तकिया बेहतर माना जाता है।
इससे गर्दन और कंधों के बीच सही संतुलन बना रहता है और रीढ़ सीधी रहती है।

तकिया कब बदलना चाहिए?

समय के साथ तकिए की मजबूती और आकार बदलने लगता है, जिससे उसका सपोर्ट कम हो जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो सामान्यतः 1 से 3 साल के बीच तकिया बदल देना चाहिए। यदि तकिया दब गया हो, आकार बिगड़ गया हो या उस पर सोने के बाद लगातार दर्द महसूस हो, तो नया तकिया लेना बेहतर रहेगा।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। किसी भी लगातार दर्द या स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

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लो बीपी में ज्यादा नमक खाना सही या गलत? जानिए क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट्स

लो ब्लड प्रेशर (हाइपोटेंशन) होने पर अक्सर सबसे पहले नमक खाने या नमक वाला पानी पीने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इससे ब्लड प्रेशर तेजी से सामान्य हो सकता है। हालांकि, यह उपाय हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होता। कई बार बिना डॉक्टर की सलाह के ज्यादा नमक खाना फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि लो बीपी में नमक कब लाभदायक होता है और किन परिस्थितियों में इससे बचना चाहिए।

क्या लो बीपी में नमक खाना सही है?

नमक में मौजूद सोडियम शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। जब शरीर में सोडियम या तरल पदार्थों की कमी हो जाती है तो ब्लड प्रेशर गिर सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर जरूरत के अनुसार नमक और तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाने की सलाह दे सकते हैं। लेकिन हर बार लो बीपी की वजह सोडियम की कमी नहीं होती, इसलिए बिना कारण जाने नमक का सेवन बढ़ाना उचित नहीं माना जाता।

किन परिस्थितियों में मिल सकता है फायदा?

यदि लो ब्लड प्रेशर डिहाइड्रेशन, अधिक पसीना आने, उल्टी-दस्त या शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी के कारण हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार नमक और पर्याप्त पानी लेना लाभकारी हो सकता है। इसके साथ ओआरएस या अन्य इलेक्ट्रोलाइट युक्त पेय भी कुछ मामलों में मदद कर सकते हैं। हालांकि, इसका निर्णय व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

जरूरत से ज्यादा नमक क्यों है नुकसानदायक?

अधिक मात्रा में नमक खाने से शरीर पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। लगातार ज्यादा सोडियम लेने से:

ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है।
किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
शरीर में सूजन और पानी जमा होने की समस्या हो सकती है।
हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

इसी वजह से सिर्फ लो बीपी के डर से रोजाना अतिरिक्त नमक खाना स्वास्थ्य के लिए सही विकल्प नहीं है।

लो ब्लड प्रेशर होने पर क्या करें?
दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
लंबे समय तक खाली पेट रहने से बचें।
पौष्टिक और संतुलित आहार लें।
अचानक बैठने या लेटने की स्थिति से खड़े न हों।
बार-बार चक्कर आना, बेहोशी या अत्यधिक कमजोरी महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

किन लोगों को बरतनी चाहिए विशेष सावधानी?

जिन लोगों को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी, हृदय रोग या शरीर में सूजन की समस्या है, उन्हें नमक की मात्रा बढ़ाने से पहले चिकित्सकीय सलाह अवश्य लेनी चाहिए। ऐसे मामलों में बिना सलाह के नमक का सेवन बढ़ाना नुकसान पहुंचा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध कराई गई सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

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