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भोजन करने का सही तरीका कौन सा है, आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

Category Archives: जीवन शैली

भोजन करने का सही तरीका कौन सा है, आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में लोग क्या खा रहे हैं इस पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन कैसे खा रहे हैं, इस पर कम ध्यान दिया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भोजन का तरीका और बैठने की मुद्रा भी पाचन और संपूर्ण स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है। सही पोस्चर में भोजन करना न केवल पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं से भी बचाव कर सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार आजकल कई लोग सोफे, बिस्तर या आरामदायक मुद्रा में लेटकर या झुककर भोजन करने की आदत रखते हैं, जो पाचन तंत्र के लिए सही नहीं मानी जाती। गलत पोस्चर में भोजन करने से पेट पर दबाव बढ़ता है और शरीर को भोजन पचाने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इसके कारण बदहजमी, गैस, एसिडिटी और ओवरईटिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि भोजन करते समय रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठना सबसे बेहतर माना जाता है। पारंपरिक तरीके से पालथी मारकर यानी सुखासन में बैठकर भोजन करना पाचन के लिए लाभकारी माना जाता है। इससे पेट की मांसपेशियों को पर्याप्त जगह मिलती है और पाचन प्रक्रिया सुचारू रूप से काम करती है। यदि जमीन पर बैठना संभव न हो तो डाइनिंग टेबल पर भी सीधे बैठकर आराम से भोजन किया जा सकता है।

विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि भोजन को धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए। जल्दबाजी में भोजन करने से हवा भी पेट में चली जाती है, जिससे गैस और भारीपन की समस्या बढ़ सकती है। इसके साथ ही पेट को पूरी तरह भरने के बजाय लगभग 70 से 80 प्रतिशत तक ही भोजन करना स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है।

खाना खत्म करने के तुरंत बाद उठने के बजाय कुछ देर शांत बैठना भी फायदेमंद बताया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार भोजन के बाद कुछ मिनट आराम से बैठने से शरीर पाचन प्रक्रिया के लिए तैयार होता है और भोजन बेहतर तरीके से पचता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खानपान की सही आदतों के साथ-साथ भोजन करने का सही तरीका अपनाना भी जरूरी है। यह छोटा सा बदलाव पाचन संबंधी समस्याओं को कम करने के साथ-साथ शरीर को अधिक ऊर्जावान और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है।

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हाई ब्लड प्रेशर और शुगर बढ़ा सकते हैं किडनी रोग का खतरा, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

किडनी शरीर का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो शरीर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है। यह खून को फिल्टर कर शरीर से विषैले तत्वों और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालती है। लेकिन बदलती जीवनशैली, बढ़ता ब्लड प्रेशर और अनियंत्रित शुगर लेवल किडनी की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते सावधानी न बरतने पर किडनी से जुड़ी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार किडनी का मुख्य कार्य शरीर में मौजूद खून को शुद्ध करना और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना है। एक स्वस्थ किडनी रोजाना बड़ी मात्रा में खून को फिल्टर कर यूरिया, क्रिएटिनिन जैसे जहरीले तत्वों को शरीर से बाहर निकालती है। इसके साथ ही यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने, ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने और रक्त के pH स्तर को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हाल के वर्षों में किडनी से जुड़ी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर कम उम्र के लोगों में भी किडनी संबंधी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार खराब खानपान, अनियमित दिनचर्या और बढ़ता तनाव किडनी के लिए जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं।

किडनी रोग विशेषज्ञों का कहना है कि जिन लोगों का ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रहता, उनमें किडनी की बीमारी होने की संभावना अधिक होती है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को दुनिया भर में क्रॉनिक किडनी डिजीज के प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

डॉक्टर बताते हैं कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ शुगर लेवल किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे फिल्टरिंग सिस्टम कमजोर पड़ने लगता है। इस स्थिति को डायबिटिक नेफ्रोपैथी कहा जाता है, जिसमें पेशाब में प्रोटीन आने लगता है और धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।

इसी तरह हाई ब्लड प्रेशर भी किडनी की नाजुक नसों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर किडनी की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे किडनी सही तरीके से काम नहीं कर पाती। जब किडनी की कार्यक्षमता घटती है तो शरीर में नमक और पानी जमा होने लगता है, जिससे ब्लड प्रेशर और बढ़ सकता है। जिन लोगों को हाई बीपी और डायबिटीज दोनों समस्याएं होती हैं, उनमें किडनी खराब होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

हर साल मार्च महीने के दूसरे गुरुवार को विश्व किडनी दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को किडनी की बीमारियों के प्रति जागरूक करना और समय रहते जांच व उपचार के लिए प्रेरित करना है।

विशेषज्ञों के अनुसार किडनी को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम करना, संतुलित आहार लेना और नमक का सीमित मात्रा में सेवन करना जरूरी है। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, ताजे फल-सब्जियों और साबुत अनाज को आहार में शामिल करना भी लाभदायक माना जाता है। प्रोसेस्ड फूड, अधिक नमक और मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी बनाना किडनी की सेहत के लिए बेहतर होता है।

डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि वजन को नियंत्रित रखें और धूम्रपान व शराब से बचें, क्योंकि ये आदतें किडनी पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं। नियमित स्वास्थ्य जांच और ब्लड प्रेशर तथा शुगर को नियंत्रण में रखकर किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है।

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खाना खाने के बाद क्यों आती है नींद? जानिए क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

खाना खाने के बाद अचानक नींद आना, शरीर में भारीपन महसूस होना या आलस लगना कई लोगों के लिए आम बात है। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक यह स्थिति शरीर के मेटाबॉलिज्म और ब्लड शुगर के स्तर से जुड़ी हो सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि भोजन के बाद कुछ छोटी-छोटी आदतें अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार भोजन करने के बाद शरीर में ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ता है। अगर इस दौरान व्यक्ति लंबे समय तक बैठे या लेटे रहता है तो मांसपेशियां उस ग्लूकोज का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पातीं। ऐसे में अतिरिक्त ग्लूकोज शरीर में फैट के रूप में जमा होने लगता है, जिससे वजन बढ़ने के साथ-साथ सुस्ती और भारीपन की समस्या भी बढ़ सकती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि भोजन के बाद अक्सर होने वाली एसिडिटी, गैस और पेट फूलने की समस्या भी इसी कारण से जुड़ी हो सकती है। पाचन प्रक्रिया धीमी होने से व्यक्ति को थकान और नींद का अनुभव होने लगता है। इसलिए भोजन के बाद शरीर को थोड़ी सक्रियता देना जरूरी माना जाता है।

भोजन के बाद टहलना क्यों है फायदेमंद

डॉक्टरों के मुताबिक खाने के बाद हल्की वॉक करने से शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और वे बढ़ते ग्लूकोज को ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करने लगती हैं। इससे इंसुलिन का स्तर संतुलित रहता है और शरीर में शुगर स्पाइक की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा टहलने से आंतों की गति भी बढ़ती है, जिससे पाचन बेहतर होता है और पेट में भारीपन या गैस की समस्या कम होती है।

कितनी देर और कैसे करें वॉक

विशेषज्ञों का सुझाव है कि भोजन के लगभग 5 मिनट बाद हल्की वॉक शुरू की जा सकती है। 10 से 15 मिनट तक धीमी गति से टहलना पर्याप्त माना जाता है। बहुत तेज चलने से पाचन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, इसलिए सामान्य और आरामदायक गति बनाए रखना बेहतर रहता है।

ऑफिस में क्या करें

अगर ऑफिस में बाहर टहलना संभव न हो तो अपनी सीट के पास ही थोड़ी देर चलना-फिरना या कदमताल करना भी फायदेमंद हो सकता है। यह छोटी-सी शारीरिक गतिविधि भी ब्लड शुगर के स्तर को संतुलित रखने और शरीर को सक्रिय बनाए रखने में मदद करती है।

विशेषज्ञों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन के बाद कुछ मिनट की हल्की वॉक को रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल करने से पाचन बेहतर रहता है और मोटापा व डायबिटीज जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

नोट: यह लेख विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स में दी गई जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

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बदलती जीवनशैली और अनियमित खान-पान से बढ़ रहा किडनी रोग का खतरा, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

हर साल मार्च महीने के दूसरे गुरुवार को विश्व किडनी दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिन 12 मार्च को मनाया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को किडनी से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना और समय रहते बचाव के उपायों की जानकारी देना है। विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जीवनशैली, अनियमित खान-पान और बढ़ते तनाव के कारण किडनी रोगों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

किडनी हमारे शरीर का बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो खून को फिल्टर करने के साथ-साथ शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने का काम करती है। कुशीनगर के चिकित्सक डॉ. रवि कुशवाहा बताते हैं कि किडनी शरीर के ‘नेचुरल फिल्टर’ की तरह काम करती है और इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

डॉ. कुशवाहा के अनुसार अधिकतर लोग किडनी की सेहत को तब तक गंभीरता से नहीं लेते, जब तक इसकी कार्यक्षमता काफी हद तक प्रभावित नहीं हो जाती। किडनी से जुड़ी शुरुआती समस्याओं के लक्षण अक्सर सामान्य थकान, पाचन संबंधी परेशानी या शरीर में हल्की सूजन के रूप में दिखाई देते हैं, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी खराब होने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

पानी और नमक के सेवन पर रखें नियंत्रण

डॉ. कुशवाहा का कहना है कि दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना किडनी को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है, क्योंकि इससे शरीर के टॉक्सिन्स बाहर निकलने में मदद मिलती है। हालांकि जरूरत से ज्यादा पानी पीना भी किडनी पर दबाव डाल सकता है। सामान्य रूप से एक व्यक्ति को दिनभर में लगभग 2.5 से 3 लीटर पानी पीना चाहिए। इसके अलावा नमक का अत्यधिक सेवन भी किडनी के लिए नुकसानदायक हो सकता है। डॉक्टरों के मुताबिक रोजाना करीब 5 ग्राम नमक का सेवन ही पर्याप्त माना जाता है।

बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेने से बचें

डॉ. कुशवाहा ने चेतावनी देते हुए कहा कि सिरदर्द या शरीर दर्द होने पर लोग अक्सर बिना सलाह के पेनकिलर दवाओं का सेवन कर लेते हैं, जो किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इन दवाओं के अधिक और लगातार उपयोग से किडनी में रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और ‘एक्यूट किडनी इंजरी’ का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए किसी भी दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।

नियमित जांच और बीपी-शुगर पर रखें नियंत्रण

किडनी को स्वस्थ बनाए रखने के लिए नियमित जांच कराना भी जरूरी है। डॉ. रवि कुशवाहा के अनुसार हर साल कम से कम एक बार किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) और यूरिन टेस्ट जरूर कराना चाहिए, खासकर उन लोगों को जो डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं।

इसके साथ ही नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और वजन को नियंत्रित रखना भी किडनी की सेहत के लिए बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर किडनी से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों से बचाव किया जा सकता है।

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कान साफ करने के लिए ईयरबड्स का इस्तेमाल हो सकता है खतरनाक, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

कान हमारे शरीर का बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण अंग है, जिसकी सही देखभाल करना जरूरी है। अक्सर लोग कानों की सफाई के लिए कॉटन वाले ईयरबड्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे सुरक्षित नहीं मानते। डॉक्टरों के मुताबिक, गलत तरीके से कान साफ करना कई बार संक्रमण, चोट और सुनने की समस्या तक पैदा कर सकता है। इसलिए कानों की सफाई को लेकर सही जानकारी होना बेहद जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे कान खुद को साफ रखने की प्राकृतिक क्षमता रखते हैं। कान के अंदर बनने वाला ईयरवैक्स (मैला) कई लोगों को गंदगी लगता है, जबकि वास्तव में यह कानों के लिए एक सुरक्षात्मक परत का काम करता है। यह धूल, बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक तत्वों को कान के अंदर जाने से रोकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग कान साफ करने के लिए कॉटन प्लग या ईयरबड्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह तरीका सुरक्षित नहीं है। इससे अक्सर वैक्स बाहर निकलने की बजाय और अंदर की ओर चला जाता है, जिससे कान में ब्लॉकेज बनने की आशंका बढ़ जाती है। इस स्थिति में कान बंद होने जैसा महसूस होना, सुनाई कम देना और असहजता जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि कान के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील होती है। ऐसे में ईयरबड्स या किसी नुकीली वस्तु का इस्तेमाल करने से कान के अंदर खरोंच या चोट लग सकती है। यदि कान में चोट लग जाए तो वहां बैक्टीरिया पनप सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कान केवल सुनने के लिए ही नहीं, बल्कि शरीर के संतुलन को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए कान में किसी भी तरह की चोट या समस्या होने पर चक्कर आना या संतुलन बिगड़ने जैसी परेशानी भी हो सकती है।

इसके अलावा, अगर कॉटन प्लग गलती से ज्यादा अंदर चला जाए तो यह कान के पर्दे को नुकसान पहुंचा सकता है। कई मामलों में ईयरबड्स के गलत इस्तेमाल से कान के पर्दे को नुकसान पहुंचने तक की स्थिति बन जाती है। बार-बार ईयरबड्स इस्तेमाल करने से कान में सूखापन, खुजली और ज्यादा वैक्स बनने की समस्या भी हो सकती है।

डॉक्टरों की सलाह है कि कानों की सफाई के लिए ईयरबड्स का नियमित इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। यदि कान में ज्यादा वैक्स जमा हो जाए, दर्द हो या सुनने में परेशानी महसूस हो तो खुद से उपचार करने के बजाय किसी ईएनटी विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

नोट: यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स में दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

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किडनी स्टोन को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, समय पर इलाज जरूरी

बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों के कारण किडनी में पथरी यानी किडनी स्टोन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पहले जहां यह बीमारी अधिकतर वयस्कों में देखी जाती थी, वहीं अब कम उम्र के युवाओं और बच्चों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पर्याप्त पानी न पीना, असंतुलित आहार और अनियमित दिनचर्या इसके प्रमुख कारण हैं। इसलिए समय रहते सावधानी और इलाज बेहद जरूरी है।

विशेषज्ञों के अनुसार किडनी में पथरी तब बनती है जब शरीर में कैल्शियम, ऑक्सलेट और यूरिक एसिड जैसे खनिज पदार्थ अधिक मात्रा में जमा होकर धीरे-धीरे क्रिस्टल का रूप ले लेते हैं। पर्याप्त पानी न पीने से इन तत्वों का जमाव बढ़ जाता है, जिससे पथरी बनने का खतरा अधिक हो जाता है। किडनी स्टोन का समय पर उपचार न कराने पर यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

कम उम्र में भी बढ़ रहे मामले

वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. कुलदीप राय के अनुसार अस्पतालों की ओपीडी में अब कम उम्र के लोगों में भी किडनी स्टोन के मरीज बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। कई बार शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन जैसे-जैसे पथरी का आकार बढ़ता है, मरीज को कमर या पेट में तेज दर्द, पेशाब में जलन और अन्य समस्याएं होने लगती हैं। कई लोग इस दर्द को सामान्य पेट दर्द समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।

छोटी और बड़ी पथरी का इलाज अलग

डॉक्टरों के मुताबिक 3 से 4 मिलीमीटर से छोटी पथरी कई बार अधिक पानी पीने, दवाइयों और खान-पान में बदलाव से अपने-आप निकल सकती है। लेकिन बड़ी पथरी या लंबे समय तक किडनी में मौजूद पथरी गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में सर्जरी की जरूरत भी पड़ सकती है। कुछ मरीजों में एक से अधिक पथरी होने पर भी ऑपरेशन की सलाह दी जाती है।

इलाज में देरी से बढ़ सकता है खतरा

विशेषज्ञ बताते हैं कि बड़ी पथरी किडनी और मूत्राशय को जोड़ने वाली नलिका (यूरेटर) में फंस सकती है, जिससे पेशाब का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इससे पेशाब में रुकावट, संक्रमण और तेज दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय तक यह स्थिति रहने पर किडनी को स्थायी नुकसान या किडनी फेलियर का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए समय रहते जांच और इलाज बेहद जरूरी है।

बीयर से पथरी निकलने का दावा गलत

कई लोग मानते हैं कि बीयर पीने से पेशाब ज्यादा आता है और इससे किडनी स्टोन निकल सकता है। हालांकि डॉक्टर इस धारणा को गलत बताते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी स्टोन का इलाज केवल चिकित्सकीय सलाह और उचित उपचार से ही संभव है, इसलिए किसी भी घरेलू धारणा के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

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बुजुर्गों ही नहीं, युवाओं और बच्चों में भी बढ़ रही सुनने की समस्या, जानिए इसके कारण

आमतौर पर यह माना जाता है कि सुनने की क्षमता उम्र बढ़ने के साथ कम होती है, लेकिन अब यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। हाल के वर्षों में युवाओं और बच्चों में भी कम सुनाई देने और बहरेपन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज में लंबे समय तक संगीत सुनना, कानों में संक्रमण, चोट, अधिक वैक्स जमा होना और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या स्थायी बहरेपन में भी बदल सकती है।

बहरेपन के पीछे क्या हैं कारण

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने के कई कारण हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ कान के अंदर मौजूद संवेदनशील हिस्सों में धीरे-धीरे क्षति होने लगती है और रक्त संचार भी कम हो जाता है, जिससे सुनने में दिक्कत आती है। इसके अलावा तेज आवाज, जैसे डीजे या धमाके जैसी ध्वनियां कान के भीतर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कान में संक्रमण, खसरा जैसी बीमारियां और कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी सुनने की समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

समय पर इलाज न होने पर बढ़ सकती है परेशानी

स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग सुनने की क्षमता में कमी से जूझ रहे हैं। यदि कान की सामान्य समस्या का समय पर इलाज न कराया जाए तो यह स्थायी बहरेपन का कारण बन सकती है। कम सुनाई देने का असर केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। लंबे समय तक इस समस्या से जूझ रहे लोगों में अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं भी देखी गई हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार 85 डेसिबल से अधिक तेज आवाज में रहने से कान के अंदरूनी हिस्से को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी सुनने की क्षमता कम होने के जोखिम को बढ़ाती हैं।

क्या बहरेपन का इलाज संभव है?

डॉक्टरों का कहना है कि हर प्रकार का बहरापन स्थायी नहीं होता। यदि सुनने की समस्या कान में मैल जमा होने या संक्रमण की वजह से है तो सही इलाज और दवाओं से सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। हालांकि यदि कान के अंदर की संवेदनशील कोशिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, तो इसे पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में हियरिंग एड जैसे उपकरण मरीजों की मदद करते हैं।

नवजात शिशुओं में यदि सुनने की समस्या का समय रहते पता चल जाए तो कुछ मामलों में उपचार के जरिए स्थिति में सुधार संभव होता है।

जीन थेरेपी से नई उम्मीद

हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों ने बहरेपन के इलाज की दिशा में नई उम्मीदें भी जगाई हैं। वर्ष 2025 में स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में जीन थेरेपी के जरिए जन्मजात बहरेपन के इलाज की संभावना सामने आई। अध्ययन में शामिल कुछ मरीजों में एक विशेष इंजेक्शन के बाद सुनने की क्षमता में सुधार देखा गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने से पहले अभी और बड़े स्तर पर परीक्षण की जरूरत है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

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कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर होली खेलना पड़ सकता है भारी, जान लीजिये इसके नुकसान

होली के रंगों के साथ मस्ती करना हर किसी को पसंद होता है, लेकिन इस उत्साह में अक्सर लोग अपनी आंखों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर देते हैं। खासतौर पर कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले लोगों के लिए यह लापरवाही गंभीर समस्या बन सकती है, क्योंकि केमिकल युक्त रंग आंखों को गहरा नुकसान पहुंचा सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर होली खेलना सुरक्षित नहीं माना जाता। बाजार में मिलने वाले कई रंगों में हानिकारक रसायन, भारी धातुएं और बारीक कण मौजूद होते हैं। जब ये रंग लेंस के संपर्क में आते हैं, तो लेंस उन्हें सोख लेते हैं और ये रसायन लंबे समय तक आंखों के संपर्क में बने रहते हैं, जिससे कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है।

डॉक्टरों के मुताबिक होली खेलते समय लेंस की बजाय चश्मा पहनना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है। चश्मा आंखों को बाहरी कणों और रंगों से बचाने में मदद करता है। अगर कोई व्यक्ति लेंस पहनकर रंगों के संपर्क में आता है, तो आंखों में जलन, संक्रमण और गंभीर स्थिति में कॉर्नियल अल्सर जैसी समस्या भी हो सकती है।

दरअसल, कॉन्टैक्ट लेंस की सतह छिद्रयुक्त होती है, जो रंगों में मौजूद केमिकल को अपने अंदर समाहित कर लेती है। इससे आंखों में जलन, लालिमा और केमिकल बर्न का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, लेंस की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे देखने में धुंधलापन आ सकता है।

यदि रंग लेंस और आंख के बीच फंस जाए, तो यह कॉर्निया पर रगड़ पैदा करता है, जिससे उसकी ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा, इस स्थिति में बैक्टीरिया पनपने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे संक्रमण और पस बनने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

अगर गलती से आंख में रंग चला जाए, तो तुरंत लेंस को निकालकर आंखों को साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। कम से कम 10 से 15 मिनट तक आंखों को धोना जरूरी है और इस दौरान आंखों को रगड़ने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे स्थिति और खराब हो सकती है।

यदि आंखों में लालिमा, जलन, पानी आना या धुंधलापन महसूस हो, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। घरेलू उपायों से बचना बेहतर होता है, क्योंकि गलत तरीके स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आंखों की चोट के बाद शुरुआती कुछ घंटे इलाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

(यह जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है, किसी भी समस्या की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।)

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क्या मालिश करने से बच्चा ज्यादा मजबूत, हेल्दी और तेजी से विकसित होता है? जानिए डॉक्टर की राय

नवजात शिशुओं की मालिश को लेकर हमारे समाज में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। अक्सर यह माना जाता है कि नियमित मालिश से बच्चा ज्यादा मजबूत, हेल्दी और तेजी से विकसित होता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन धारणाओं में पूरी सच्चाई नहीं है। प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. माधवी भारद्वाज ने हाल ही में इस विषय पर जागरूकता बढ़ाते हुए बताया कि मालिश के फायदे अलग हैं और उससे जुड़ी कई मान्यताएं गलतफहमी पर आधारित हैं।

डॉ. माधवी के अनुसार, बच्चे की मालिश का असली उद्देश्य उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना, आंखों के संपर्क के जरिए संवाद बनाना और त्वचा को पोषण देना होता है। कई बार लोग बहुत तेज या ज्यादा दबाव के साथ मालिश करते हैं, जिससे बच्चे को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए हल्के हाथों से और सही तरीके से मालिश करना जरूरी है।

विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि मालिश का बच्चे की हड्डियों की मजबूती या मांसपेशियों के विकास पर सीधा असर नहीं पड़ता। यानी यह सोच गलत है कि मालिश न करने से बच्चा कमजोर रह जाएगा।

क्या मालिश से सिर का आकार बदल सकता है?
डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चे के सिर का आकार मालिश या विशेष तकिए से नहीं बदलता। इसके लिए बच्चे की पोजिशन समय-समय पर बदलना ज्यादा प्रभावी होता है। सिर पर दबाव डालना सुरक्षित नहीं होता।

क्या मालिश से बच्चा जल्दी चलना या रेंगना सीखता है?
मालिश का बच्चे के विकास के पड़ावों जैसे बैठना, रेंगना या चलना सीखने से सीधा संबंध नहीं है। ये चीजें मुख्य रूप से जेनेटिक्स और बच्चे को मिलने वाले अवसरों पर निर्भर करती हैं। अगर बच्चे को पर्याप्त मूवमेंट का मौका नहीं मिलता, तो उसका विकास धीमा हो सकता है।

क्या मालिश से वजन बढ़ता है या पैर सीधे होते हैं?
डॉ. माधवी के अनुसार, बच्चे का वजन उसके आनुवंशिक गुणों पर निर्भर करता है, न कि मालिश पर। जन्म के समय बच्चों के पैर हल्के मुड़े हुए होते हैं, जो समय के साथ खुद ही सीधे हो जाते हैं। इसमें मालिश की कोई भूमिका नहीं होती।

तो क्या मालिश जरूरी नहीं है?
मालिश को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे माता-पिता और बच्चे के बीच जुड़ाव मजबूत होता है। साथ ही बच्चा रिलैक्स महसूस करता है, उसकी त्वचा स्वस्थ रहती है और वह धीरे-धीरे अपने शरीर को मूव करना भी सीखता है।

अंत में यह समझना जरूरी है कि मालिश को चमत्कारिक उपाय की तरह न देखें। यह बच्चे की देखभाल का एक हिस्सा है, लेकिन उसका संपूर्ण विकास प्राकृतिक प्रक्रियाओं और सही माहौल पर ही निर्भर करता है।

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क्या रोजाना सेंधा नमक खाना सही है? जानिए क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

भारतीय खानपान में नमक सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि सेहत से भी जुड़ा एक अहम तत्व है। पिछले कुछ समय में लोगों के बीच सेंधा नमक का चलन तेजी से बढ़ा है और इसे ज्यादा प्राकृतिक व हेल्दी विकल्प मानकर अपनाया जा रहा है। लेकिन क्या वाकई यह रोजाना के इस्तेमाल के लिए सही है? विशेषज्ञों की मानें तो इस ट्रेंड के पीछे कुछ ऐसे तथ्य भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है।

आजकल फिटनेस और हेल्दी लाइफस्टाइल के नाम पर कई लोग साधारण आयोडीन युक्त नमक की जगह पूरी तरह सेंधा नमक का इस्तेमाल करने लगे हैं। इसे शुद्ध और मिनरल्स से भरपूर मानकर लोग अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ इस बदलाव को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।

फेमस न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रियंका सहरावत के अनुसार सेंधा नमक और आयोडीन युक्त नमक के बीच सबसे बड़ा अंतर आयोडीन की मौजूदगी का है। आयोडीन शरीर में थायराइड ग्रंथि के सही कामकाज के लिए बेहद जरूरी होता है। अगर शरीर को पर्याप्त आयोडीन नहीं मिलता, तो थायराइड हार्मोन का निर्माण प्रभावित होता है।

आयोडीन की कमी से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ने लगता है, जिससे कब्ज, वजन बढ़ना, बालों का झड़ना, थकान और ठंड ज्यादा लगना जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में सेंधा नमक के बढ़ते उपयोग के साथ हाइपोथायरायडिज्म के मामलों में भी इजाफा देखा गया है।

अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि सेंधा नमक में कई जरूरी मिनरल्स होते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन मिनरल्स की मात्रा बहुत कम होती है, जिसे हम सामान्य संतुलित आहार से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। वहीं, जरूरत से ज्यादा किसी भी प्रकार का नमक खाने से हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ सकता है।

डॉक्टरों का मानना है कि बिना किसी मेडिकल सलाह के आयोडीन युक्त नमक को पूरी तरह छोड़ देना सही नहीं है। दोनों तरह के नमक के अपने-अपने फायदे हैं, लेकिन संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है।

क्या रखें ध्यान में?
रोजमर्रा के उपयोग के लिए आयोडीन युक्त नमक को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है। सेंधा नमक का इस्तेमाल कभी-कभार या विशेष परिस्थितियों (जैसे व्रत) में किया जा सकता है। अगर किसी को थायराइड से जुड़ी समस्या है, तो नमक के सेवन में बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

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