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मानवता के खिलाफ अपराध, नेतन्याहू पर आरोप

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मानवता के खिलाफ अपराध, नेतन्याहू पर आरोप

श्रुति व्यास
बेंजामिन नेतन्याहू अब उन कुख्यात लोगों की सूची में एक है जिन पर मानवता के खिलाफ अपराध करने के आरोप है। लोकतांत्रिक ढंग से चुन कर सत्ता में आए एक नेता का नाम आतंकवादी मोहम्मद डिएफ और युद्धोन्मादी तानाशाह पुतिन जैसों की लिस्ट में आ जाना, इजराइल और विश्व दोनों के लिए सदमे जैसा है। इससे एक ओर कूटनीतिक दृष्टि से कई देश असमंजस में फँसे हैं वही दूसरी ओर अमेरिका के ढोंग का पर्दाफाश भी है।

सवाल है आखिर आईसीसी (इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट या अन्तरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय) को यह कठोर फैसला क्यों लेना पड़ा?
शुरूआत इस साल मई में हुई जब आईसीसी के अभियोजक करीम खान ने नेतन्याहू और इजराइल के पूर्व रक्षा मंत्री युआव गैलेन्ट पर जानते-बूझते गाजा युद्ध में भुखमरी को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने और गाजा के नागरिकों पर हमले करने का आदेश देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ वारंट जारी करने का अनुरोध किया। हालांकि उन्होंने यह माना कि इजराइल को अपनी रक्षा करने का पूरा हक़ है लेकिन उनका कहना था कि इसके लिए नेतन्याहू ने जो तरीके अपनाए वे अमानवीय थे। खान ने सावधानी बरती और शातिरता से काम लेते हुए इजराइली सैन्य बलों के जनरलों के बजाए राजनैतिक नेताओं को निशाना बनाया। इसके अतिरिक्त, आरोप पत्र में कत्लेआम का आरोप भी नहीं लगाया गया।

नेतन्याहू और गैलेन्ट के पास उन सुबूतों को चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय था, जिनके आधार पर उन पर मानवता के विरूद्ध अपराध, जिनमें हत्या, उत्पीडऩ और अन्य अमानवीय कार्यों और भुखमरी के हालात बनाने के अपराध शामिल हैं, के आरोप लगाए गए थे। नेतन्याहू स्वयं एक स्वतंत्र आयोग के माध्यम से जांच करवाने की पहल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कदाचित इसलिए क्योंकि ऐसी किसी भी जांच से 7 अक्टूबर के भयावह घटनाक्रम के पहले उनके द्वारा की गईं गलतियां और भूलें भी जांच के दायरे में आ सकती थीं।
21 नवंबर को तीन न्यायाधीशों के एक पैनल ने पाया कि यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि इस तरह के अपराध किये गए हैं और इसलिए नेतन्याहू और गैलेन्ट के खिलाफ वारंट जारी किए गए।

हालिया घटनाक्रम से खान के तर्क और मज़बूत हुए हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ लगातार उत्तरी गाजा में अकाल की स्थितियों पनपने की चेतावनी दे रहा है क्योंकि वहां पिछले 40 दिनों से न के बराबर मानवीय मदद पहुंच पा रही है। लगभग उसी समय, 7 अक्टूबर के हमले के मास्टरमाइंड हमास नेता मोहम्मद डिएफ के खिलाफ भी वारंट जारी किया गया, जिसके बारे में इजराइल का दावा है कि वह उसे मार चुका है। खान ने इस नरसंहार के योजनकार याहया सिनवार और हमास के तत्कालीन प्रमुख इस्माइल हनीय के खिलाफ भी वारंट जारी करने का अनुरोध किया था। लेकिन इन दोनों अनुरोधों को वापिस ले लिया गया क्योंकि इसी वर्ष इजराइल ने इन दोनों को मौत के घाट उतार दिया था।
इजराइल इस घटनाक्रम से भौचक्का है।

नेतन्याहू को इस्तीफा देने की सलाह देने वाले विपक्षी नेता येअर लेपिड ने कहा, नेतन्याहू, सिनवार और डिएफ के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करना  अविश्वसनीय है। इन लोगों की कोई तुलना नहीं है। हमें यह अस्वीकार्य है। यह अक्षम्य है। प्रधानमंत्री के एक अन्य प्रतिद्वंद्वी बैनी गैन्स भी उनके समर्थन में सामने आए। नेतन्याहू ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इन्हें बेतुका और यहूदी विरोधी बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने आईसीसी को पक्षपाती और राजनीतिक आधार पर फैसला करने वाली संस्था बताया। पहली बात यह है कि आईसीसी का फैसला न तो यहूदी-विरोधी है और ना ही पक्षपातपूर्ण। व्लादिमिर पुतिन के खिलाफ भी बच्चों को जबरदस्ती यूक्रेन से रूस भेजने के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है, जहां बहुत से रूसी परिवारों ने उन्हें गोद ले लिया है। यह वारंट भी लगभग वैसे ही आधरों पर जारी हुआ है।

जहां तक इन आपत्तियों का सवाल है कि आईसीसी के न्यायाधीश इजराइल और हमास को एक तराजू में तौल रहे हैं, उसमें इसलिए दम नहीं है क्योंकि एक हत्यारा तो आखिरकार एक हत्यारा ही होता है, भले ही उसका दर्जा, उसकी राजनीति या विचारधारा कुछ भी क्यों न हो।
इजराइल का यह तर्क भी खोखला है कि यह मामला आईसीसी के क्षेत्राधिकार के बाहर है। अमेरिका, चीन, भारत और रूस की तरह, इजराइल ने भी उस रोम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे जिसके माध्यम से इस न्यायालय की स्थापना हुई थी। न ही इजराइल नेतन्याहू या गैलेंट को ‘द हेग’ (जहाँ आईसीसी का मुख्यालय है) प्रत्यर्पित करने वाला है, क्योंकि इजराइल आईसीसी का सदस्य ही नहीं है। लेकिन 124 देश, जिनमें से बहुत से इजराइल के मित्र और सहयोगी हैं, ऐसा कर सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि यदि नेतन्याहू इन देशों में से किसी की भी यात्रा पर जाएं तो उन्हें गिरफ्तार करना उस देश के लिए अनिवार्य होगा। कुल मिलकर नेतन्याहू अब केवल इजराइल में सुरक्षित हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से जो बात साफ़ उभर कर सामने आती है वह है अमेरिका का दोगलापन। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने बिना देरी किये इस फैसले की आलोचना की और उसे चौंकाने वाला बताया। अमेरिका ने कभी आईसीसी का समर्थन नहीं किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिकी सैनिकों पर लगे युद्ध अपराधों की जांच आईसीसी द्वारा किए जाने पर रोक लगा दी थी। लेकिन जो बाइडन ने यह रोक हटा दी और न्यायालय के साथ भागीदारी करके रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के खिलाफ युद्ध अपराधों के आरोप लगाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था। अतीत में अमेरिका  सूडान के पूर्व नेता उमर अल-बशीर के मामले में भी ऐसा ही कर चुका है।

दुनिया भर में अब अमेरिका के रवैये की चर्चा हो रही है। इजराइल के स्वयं की रक्षा करने के अधिकार और 7 अक्टूबर के नरसंहार का बदला लेने को कोई गलत नहीं मानता, लेकिन गाजा में बेरहमी से की गई सैन्य कार्यवाही में किए गए अंधाधुंध हमलों में लगभग 40,000 फिलिस्तीनियों को, जिनमें से अधिकांश साधारण नागरिक थे, जान गंवानी पड़ी है। इसके अलावा लाखों अन्य लोग बेइंतिहा कष्ट भोग रहे हैं। यह तो ठीक नहीं है। यह तो गलत है। क्या यह अमानवीय नहीं है? क्या निहत्थे बेकसूर लोगों को बदले की कार्यवाही का निशाना बनाना ठीक है?

यह लगभग निश्चित है कि अगले साल डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद बहुत कुछ बदल जाएगा, पलट जाएगा। लेकिन यदि पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करना उचित है, अफ्रीकी नेताओं के खिलाफ ऐसा किया जाना स्वीकार्य है, और उसी क्रम में यदि बेंजामिन नेतन्याहू के मामले में भी ऐसा ही किया जाता है, तो यह पूरी तरह औचित्यपूर्ण है। आखिर क्यों ऐसा नहीं होना चाहिए? क्या अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर नियम-कानून लागू किए जाने चाहिए? क्या लोकतांत्रिक ढंग से चुना गया एक विकसित या विकासशील देश का नेता सत्ता हाथ से खिसकती देख नरसंहार करने पर आमादा नहीं हो सकता? नेतन्याहू ने यही किया है। अमेरिका ने भी यही किया है। क्या अब आरोपी का चेहरा देखकर न्याय होगा या उस  पर लगे आरोपों को देख कर?


विध्वंसकारी हथियारों की बढ़ती उपलब्धि अधिक विनाशक

भारत डोगरा
निरंतर अधिक विध्वंसकारी हथियारों की बढ़ती उपलब्धि के कारण हिंसा की प्रवृत्तियां अधिक विनाशक रूप ले रही हैं। छोटे-बड़े विभिन्न तरह के विनाशकारी हथियारों के तेज प्रसार में विश्व के हथियार उद्योग की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह एक मोटे मुनाफे का उद्योग है जिसमें भ्रष्टाचार या अन्य उपायों से राजनीति को प्रभावित करने की भारी क्षमता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने विभिन्न उद्योगों की इस आधार पर रैंकिंग की थी कि सबसे अधिक रित कौन सा उद्योग देता है। इसमें हथियार उद्योग को दूसरा स्थान मिला। अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा जनरल एकाउंटिंग ऑफिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार विश्व के सब तरह के व्यापार में 50 प्रतिशत रित देने के मामले हथियार के व्यापार से जुड़े होते हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने अनुमान प्रस्तुत किया है कि जितने मूल्य का सौदा होता है, उसका कम से कम 10 प्रतिशत तो रित में जाता है। यह 10 प्रतिशत भी अरबों डॉलर का मामला है।

हथियारों की बिक्री से जुड़े भ्रष्टाचार की बड़ी राशि प्राय: चोरी-छिपे विदेशी खातों में जमा की जाती थी, पर इसका खुलासा हो जाने के डर के कारण अब इसमें बदलाव आ रहा है, और ऐसे उपाय खोजे गए हैं, जिनसे इस भ्रष्टाचार को दबाना और सुनिश्चित हो सके। टैंक, बड़ी तोपों, लड़ाकू जहाज, पनडुब्बी आदि के कारोबार में बहुत साधन-संपन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां लगी हैं, जिनकी पहुंच सीधी सत्ता के गलियारों में है। ये कंपनियां सत्ताधारियों को इस तरह प्रभावित करती हैं कि अरबों डॉलर के उनके सौदे होते रहें, फिर चाहे इस कारण विश्व का वर्तमान और भविष्य अत्यधिक असुरक्षित ही क्यों न हो जाए। इन कंपनियों और इनके दलालों के असर के कारण निशस्त्रीकरण के वे प्रयास आगे नहीं बढ़ पाते हैं जिनकी विश्व को बहुत जरूरत है। विश्व के अधिकांश जनसाधारण एक दूसरे से अमन-शांति से रह सकते हैं, पर हथियारों से जुड़े निहित स्वार्थ और इनके गठजोड़ के राजनीतिज्ञ ऐसी असुरक्षा फैलाते हैं कि जिसमें महंगे हथियार बहुत जरूरी प्रतीत होते हैं।

विश्व के सबसे विनाशकारी हथियारों को नियंत्रित करने के अंतरराष्ट्रीय समझौते आगे बढऩे के स्थान पर पीछे जा रहे हैं यानी इनका असर पहले से और कम हो रहा है। दूसरी ओर, तरह-तरह के छोटे और हल्के हथियारों में भी ऐसे तकनीकी बदलाव आते रहे हैं जिनसे इनकी विनाशक क्षमता बढ़ जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार की गई ‘हिंसा एवं स्वास्थ्य पर विश्व रिपोर्ट’ के अनुसार, अधिक गोलियों की अधिक तेजी से, अधिक शीघ्रता से और अधिक दूरी तक फायर करने की क्षमता बढ़ी है, और इसके साथ ही इन हथियारों की विनाशकता भी बढ़ी है। एके-47 में तीन सेकंड से भी कम समय में 30 राउंड फायर करने की क्षमता है, और प्रत्येक गोली एक किमी. से भी अधिक की दूरी तक जानलेवा हो सकती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि किसी भी अन्य हथियार की अपेक्षा छोटे हथियार अधिक लोगों को मारने, घायल करने, विस्थापित करने, उत्पीडि़त करने, अगवा करने और रेप करने के लिए उपयोग होते हैं..इस समय विश्व में लगभग 64 करोड़ छोटे हथियार हैं। लगभग 60 प्रतिशत छोटे हथियार सैन्य और  पुलिस दलों से बाहर के क्षेत्र में हैं। केवल सेनाओं के उपयोग के लिए एक वर्ष में 14 अरब गोलियों का उत्पादन किया जाता है-यानी विश्व की कुल आबादी की दोगुनी गोलियों का उत्पादन। अधिक विध्वंसक हथियारों की उपलब्धि ऐसे दौर में बढ़ रही है जब कई कारणों से हिंसक प्रवृत्तियां भी बढ़ रही हैं। इस तरह एक ओर अधिक खतरनाक हथियारों की मांग बढ़ रही है तो दूसरी ओर उनके अधिक वास्तविक उपयोग और इस कारण होने वाले विनाश की आशंका भी बढ़ रही है। हथियारों पर होने वाले बढ़ते खर्च के कारण अनेक देशों में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने की क्षमता कम होती है।

अरबों डॉलर के हथियारों के सौदे होते हैं जबकि जनसंख्या का बड़ा हिस्सा साफ पेयजल तक से वंचित रह जाता है या कुपोषण से पीडि़त होता है। दुनिया में विभिन्न स्तरों पर निशस्त्रीकरण के अभियान को तेज करने की जरूरत है ताकि हथियारों और गोला-बारूद की मांग, उत्पादन, उपलब्धि और वास्तविक उपयोग विभिन्न स्तरों पर काम हो सके। विश्व स्तर पर खतरनाक हथियार के विरुद्ध अनेक अभियान हाल के वर्षो में सक्रिय रहे हैं। ऐसे कुछ अभियानों के प्रयासों से विश्व स्तर पर कुछ खतरनाक हथियारों पर प्रतिबंध लगाने वाले समझौते भी हुए हैं।

बारूदी सुंरग या लैंडमाइंस बहुत खतरनाक हथियार हैं, जिनके कारण बहुत से निदरेष लोग बहुत दर्दनाक ढंग से घायल होते हैं, और कई बार जीवन भर के लिए अपंगता भी उन्हें सहनी पड़ती है। किसी युद्ध के समाप्त होने के समय बाद भी कई वर्ष तक युद्ध के दौरान बिछाई गई बारूदी सुरंगों के शिकार बच्चों सहित आसपास के अनेक लोग होते रहते हैं। बारूदी सुरंगों पर प्रतिबंध लगाने वाला अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ है। अधिकांश देशों ने इसे स्वीकार किया है, पर कुछ महत्त्वपूर्ण देशों की स्वीकृति मिलनी अभी शेष है। इसके अतिरिक्त कई हिंसक समूह भी अभी तक बारूदी सुरंगों का प्रयोग कर रहे हैं। क्लस्टर बम बहुत खतरनाक हथियार है जिसमें एक ही बड़े बम से बहुत छोटे-छोटे बम दूर-दूर बिखर जाते हैं। ये छोटे बम कुछ तुरंत फटते हैं और कुछ बाद में तथा बहुत दर्दनाक ढंग से घायल करते हैं या मारते हैं। विशेषकर बच्चे बहुत समय तक दर्दनाक ढंग से इनका शिकार होते रहे हैं। क्लस्टर बमों के विरुद्ध भी एक बड़ा अभियान विश्व स्तर पर चला। फलस्वरूप इन्हें प्रतिबंधित करने वाला अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ। यह भी एक महत्त्वपूर्ण सफलता है पर अभी कुछ महत्त्वपूर्ण देशों की इसके लिए स्वीकृति मिलनी शेष है। ब्लाइंडिंग लेसर या अंधापन उत्पन्न करने वाले लेसर पर प्रतिबंध के लिए भी एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ है।

अब जो आगे सबसे बड़ी चुनौती है वह रोबोटिक्स के सैन्य उपयोग की है। रोबोट के सैन्य उपयोग से बहुत गंभीर खतरे जुड़े हैं जिनमें से एक यह भी है कि ऐसे हथियार नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं तथा जो नियोजित हैं, उनसे कहीं अधिक विध्वंस कर सकते हैं। रोबोट आ जाने से बहुत खतरनाक हद तक युद्ध स्वचालित मशीनों के नियंत्रण में जा सकता है। युद्ध से जुड़ा विनाश और अनिश्चय बहुत तेजी से बढ़ सकता है। स्टीफेन हॉकिन्स जैसे विश्व के अनेक जाने-माने वैज्ञानिकों ने रोबोटिक्स के सैन्य उपयोग के विरुद्ध बयान जारी कर इन पर प्रतिबंध की मांग की। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘जानलेवा रोबोट को रोकने का अभियान’ सक्रिय है। इस तरह के अभियानों से अधिक लोग जुड़ें तो विश्व में इन अधिक खतरनाक हथियारों को रोकने में सफलता मिलेगी। यह बड़ी जरूरत बन गया है क्योंकि उभरते हुए नये तनावों के कारण विश्व में कई स्तरों पर युद्ध की आशंका बढ़ रही है। वैसे तो युद्ध की आशंका को ही न्यूनतम करने के बुनियादी प्रयास होने चाहिए पर इसके साथ ही अधिक खतरनाक हथियारों के प्रसार को भी रोकना जरूरी है ताकि कहीं युद्ध हो भी तो उसे अधिक विनाशकारी होने से रोका जा सके। सबसे बड़ी और कठिन चुनौती तो परमाणु हथियार के प्रसार और संभावित उपयोग को रोकने की है।


अराजकता फैलाने की बातें मतदाताओं को पसंद नहीं

राघवेन्द्र सिंह
आजाद भारत के इतिहास में तेईस नबंवर की तारीख़ कई मायने में बेहद अहम है। कल तक जिस भाजपा के खिलाफ राजनीतिक दलों और उनके रहनुमाओं ने मुसलमानों को जो डर दिखा कर एकजुट रक्खा था उसी फार्मूले से भाजपा ने बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने हक़ में खड़ा करने का करिश्मा कर डाला है।’बटेंगे तो कटेंगे, एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे’ज् इस के साथ ही वक़्फ़ बोर्ड के असीमित अधिकारों को लेकर जेपीसी की बैठकों में जिस तरह के विवाद और एक किसिम की हुल्लड़बाजी की खबरें और बयानबाजी हुई उसने भाजपा की राह महाराष्ट्र में आसान कर दी। आगे इस मुद्दे पर विपक्ष और सत्ता पक्ष के व्यवहार पर देश के जनमानस की पैनी नजऱ रहेगी।

बहरहाल बहुसंख्यक वर्ग को भाजपा से अधिक विपक्ष के रवैए ने यह समझाने में सहयोग किया कि अल्पसंख्यक की भाँति एक नहीं हुए तो तुम्हारे हितों को काट कर उनको दिया जाएगा जो एकमुश्त वोट करते हैं । विपक्ष ने संतुलन की रणनीति पर काम नही किया तो महाराष्ट्र जैसे नतीजे आगे भी आते रहेंगे । इसे लेकर भाजपा मारे खुशी के फूल कर कुप्पा हुई जा रही है।

नतीजतन महाराष्ट्र सरीखे अहम सूबे में कांग्रेस की लीडरशिप में चुनाव लड़ रही महा आगाड़ी विकास पार्टी की धोबी घाट वाली धुलाई हो गई । राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बनाने मराठा सरदार शरद पवार और पूर्व सीएम उद्दव ठाकरे का कांग्रेस के माईबाप राहुल गांधी जी का विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बैण्ड बाजा जुलूस निकाल दिया है । दो सौ अठ्ठासी सीटों वाले महाराष्ट्र में भाजपा नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने दो सो तीस विधायकों की जीत के साथ जो धमाका किया उसकी गूंज देर तक और बहुत दूर तक सुनाई देगी । लेकिन दूसरी तरफ़ झारखंड राज्य ने हेमंत सोरेन वाले इंडी ब्लाक को एक तरफा बहुमत देकर विपक्ष के दिए की लौ को भी ठंडी नही होने दिया।

इसलिए देश के चतुर सुजान मतदाताओं को साष्टांग दण्डवत प्रणामज्क्योंकि वह लोकसभा चुनाव में दो सौ चालीस सीट पर भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ को रोक कर नियंत्रित और नियोजित होने का निर्देश देता है तो दो सौ बहत्तर के स्थान पर केवल निन्यानवे सीटें जिताकर क़ायदे में रहने की नसीहत देता है । इसके बाद भी जब एनडीए के बहुमत वाली मोदी सरकार गिराने की धमकी देकर बांग्लादेश जैसी अराजकता फैलाने की बातें करने वाली कांग्रेस और उनके साथियों का कई राज्यों में बोरिया बिस्तर बांध कर साफ़ कर दिया है कि मतदाताओं को यह पसंद नही है।

खैर , राज्यों के चुनावी नतीजों पर आते हैं- महाराष्ट्र में विधायकों वाला जो अगाड़ी गठबंधन फिर से सरकार बनाने का दावा कर रहा था उसके मात्र अड़तालीस प्रत्याशी ही विधायक बन पाए । जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना से और एनसीपी से अजीत पवार की बगावत के पहले उद्दव ठाकरे के नेतृत्व में महा अगाड़ी गठबंधन सरकार चला रहा था। यूपी और राजस्थान में उप चुनाव में भाजपा को पहले से ज्यादा कामयाबी देकर लोकसभा चुनाव में जो झटका दिया था उस पर मरहम लगाने का काम मतदाता माइबाप ने कर दिया है।


तकनीकी विकास और आधुनिकता के प्रभाव से जूझते बच्चे

राजेश मणि
वर्तमान युग में भारतीय समाज त्वरित गति से तकनीकी और सामाजिक बदलावों का सामना कर रहा है। तकनीकी विकास ने हमारे बच्चों के जीवन को जहां नये अवसर दिए हैं, वहीं कई संकटों को भी जन्म दिया है। आज के बच्चे, जो हर रोज स्मार्टफोन, इंटरनेट और अन्य डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हैं, अपनी मानसिकता, आदतों और जीवनशैली में तेजी से बदलाव महसूस कर रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में इंटरनेट, स्मार्टफोन, कंप्यूटर और अन्य डिजिटल उपकरणों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। शिक्षा से लेकर मनोरंजन तक, सब कुछ डिजिटल हो गया है। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल गेमिंग, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और वीडियोग्राफी जैसे अत्याधुनिक साधन बच्चों की सोच, आदतें और जीवनशैली को आकार दे रहे हैं। बच्चों का अधिकांश समय स्मार्टफोन, टैबलेट, और कंप्यूटर पर बीतता है।

परिणामस्वरूप बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी हो रही है। शारीरिक निष्क्रियता से मोटापा, हड्डियों की कमजोरी और स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याएं बढ़ रही हैं। लंबे समय तक स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करने से उनकी आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और आंखों की रोशनी में भी गिरावट आ रही है। मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। बच्चों को साइबरबुलिंग, पोर्नोग्राफी, और असामाजिक सामग्री का सामना करना पड़ रहा है, जो उनके मानसिक विकास को नुकसान पहुंचाता है। सोशल मीडिया पर खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने का दबाव भी बच्चों को तनाव और अवसाद की ओर धकेल रहा है।

तकनीकी विकास ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है। ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल उपकरणों का बढ़ता उपयोग बच्चों को नई पद्धतियों से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दे रहा है। इंटरनेट ने जहां बच्चों को दुनिया भर की जानकारी से परिचित कराया है, वहीं यह पारंपरिक शिक्षा की आदतों और मूल्यों से भी उन्हें दूर कर रहा है। बच्चों को खुद से पढ़ाई करने और स्वाध्याय की आदत डालने की  बजाय वे अब इंटरनेट और तकनीकी उपकरणों पर निर्भर हो गए हैं। साथ ही, शिक्षा में नैतिक और सामाजिक शिक्षा की कमी भी महसूस हो रही है। आजकल के बच्चे भले ही तकनीकी दृष्टि से बेहद प्रगति कर गए हैं, लेकिन उनके भीतर मानवीय मूल्यों, नैतिक शिक्षा और पारिवारिक संबंधों की अहमियत धीरे-धीरे कम हो रही है। यह स्थिति बच्चों को मानसिक और सामाजिक दृष्टिकोण से कमजोर बना रही है।

भारत में पारंपरिक रूप से बच्चों से उच्च शिक्षा की उम्मीदें बहुत अधिक होती हैं। माता-पिता और समाज बच्चों से उम्मीद करते हैं कि वे हमेशा सर्वोत्तम परिणाम देंगे, जो मानसिक दबाव का कारण बन सकता है। बच्चों को अपनी पहचान बनाने में भी कठिनाई हो रही है, क्योंकि वे समाज के मानकों में बंध कर जीने की कोशिश करते हैं। यह दबाव न उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। इसके अलावा, आजकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली के कारण बच्चों को पर्याप्त समय और ध्यान नहीं मिल पाता। परिणाम यह होता है कि बच्चे अपने माता-पिता से मानसिक और भावनात्मक सहायता प्राप्त नहीं कर पाते और इस स्थिति में उनका मानसिक विकास बाधित हो सकता है।

इस संकट से उबरने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाने होंगे-संतुलित जीवनशैली: बच्चों को तकनीकी उपकरणों का उपयोग सीमित करना चाहिए। शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिलना चाहिए।  संतुलित जीवनशैली बच्चों को मानसिक-शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती है। आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा: बच्चों को तकनीकी ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा और मानवता के मूल्यों की भी शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे बच्चों का मानसिक-सामाजिक विकास संतुलित रूप से हो सकता है। पारिवारिक समर्थन: बच्चों को अपने परिवार से मानिसक-भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता होती है।

माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए, उन्हें समझने और उनकी समस्याओं का हल निकालने में मदद करनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल: बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। बच्चे किसी प्रकार के मानसिक तनाव या अवसाद से जूझ रहे हैं, तो उन्हें काउंसलिंग और उचित मानिसक उपचार की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। शिक्षा में सुधार: पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। बच्चों को आधुनिक ज्ञान के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों की भी शिक्षा दी जानी चाहिए।

सरकार भी अपने तरीकों से हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है भारत सरकार, प्रदेश सरकारें समय- समय पर जागरूकता अभियान और दिशा-निर्देश जारी कर रहे हैं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने साइबर सुरक्षा पर किशोरों/छात्रों के लिए पुस्तिका भी बनाई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि चाइल्ड पोर्न देखना या उसे स्टोर करके रखना भी पास्को और आईटी कानून के तहत अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पास्को एक्ट की धारा 15 के अनुसार चाइल्ड पोर्न देखना, रखना, प्रकाशित करना या उसे प्रसारित करना अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सुझाव भी दिया। कहा कि अदालतों को अपने फैसले में चाइल्ड पोर्नोग्राफी शब्द की जगह चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लाटेटिव मैटेरिअल का इस्तेमाल करना चाहिए।

सही मायने में ‘बाल दिवस’ का स्वरूप तब दिखेगा जब हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलें। बच्चों के प्रति कोई हिंसा न हो। बाल श्रम, बाल तस्करी, बाल यौन शोषण, बाल विवाह इस सभी चीजों से आजादी हो। भारत में आज के बच्चे तकनीकी विकास और आधुनिकता के प्रभाव से जूझ रहे हैं। यह तकनीकी युग उनके लिए कई नये अवसर उत्पन्न करता है, लेकिन इसके साथ ही यह उनके मानिसक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल रहा है। इस संकट से उबरने के लिए हमें एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें बच्चों का संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सके।


अमेरिकी इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत ट्रंप की जीत

अवधेश कुमार
डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने का विश्लेषण अभी लंबे समय तक जारी रहेगा। डोनाल्ड ट्रंप और उनके साथ अमेरिका ने भी इतिहास रच दिया। हर चुनाव में एक पक्ष जीतता और दूसरा हारता है लेकिन इसके मायने होते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की विजय और डेमोक्रेट कमला हैरिस की पराजय के साथ अमेरिकी इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत हुई है।
जिस डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका में केवल डेमोक्रेट ही नहीं उनकी अपनी पार्टी, मीडिया, पूंजीपतियों, थिंक टैंक, विविद्यालयों आदि का एक बड़ा समूह समाप्त करने के लिए पूरी शक्ति लगा चुका हो, वह वापस आकर इन सबको चुनौती दे और जीत का झंडा गाड़ दे तो इसे किसी दृष्टि से साधारण घटना नहीं माना जा सकता। मतदान समाप्त होने के साथ ही ट्रंप ने लिखा कि आज रात अमेरिका के लोगों ने बदलाव के लिए स्पष्ट जनादेश दिया।

ट्रंप और कमला हैरिस के बीच माना जा रहा था कि कांटे की टक्कर है। परिणाम ने इसे गलत साबित कर दिया। ट्रंप ने अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाया और कमला हैरिस पिछले चुनाव में बिडेन के मत की भी बराबरी नहीं कर पाई। 2020 में जिस जॉर्जिया से ट्रंप अत्यंत कम अंतर से हारे थे जब वहां का परिणाम उसके पक्ष में गया, फिर नॉर्थ कैरोलिना से उनके समर्थन का परिणाम आया तो लग गया कि अमेरिकी जनता का राजनीति और देश को लेकर मनोविज्ञान बदला है।

स्विंग माने जाने वाले अन्य राज्यों पेंसिलवेनिया, एरीजोना, मिशीगन, विस्कांसिन और नेवाडा में भी हैरिस को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। ट्रंप ने इलेक्टरल के अलावा पॉपुलर मतों के मामले में भी सफलता पाई जो उनके 2016 की जीत से अलग कहानी बताती है। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी ने 1992 के बाद ऐसा प्रदर्शन कभी नहीं किया था। अमेरिकी इतिहास में केवल 1892 में ग्रोवर क्लब्लैंड ही ऐसे राष्ट्रपति हुए जो 4 वर्ष के बाद फिर से चुने गए। इस तरह ट्रंप अमेरिकी इतिहास के ऐसे दूसरे व्यक्ति बन गए हैं। वास्तव में अनेक दृष्टि से यह असाधारण परिणाम है। ट्रंप को लोकतंत्र विरोधी, फासिस्ट साबित करने के लिए विरोधियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
आपराधिक आरोप के मुकदमे भी चले। अमेरिकी इतिहास में यह पहली बार हुआ जब डेमोक्रेटिक ने अंतिम दौर में जो बाइडेन को उम्मीदवारी के दौर से हटाकर कमला हैरिस को सामने लाया। धन के मामले में भी कमला हैरिस ट्रंप से बहुत आगे निकल गई। मीडिया ने ऐसा वातावरण बनाया मानो ट्रंप पिछड़ चुके हैं।

परिणाम क्या आया? राष्ट्रपति चुनाव ही नहीं सीनेट में भी रिपब्लिकन को बहुमत मिला तथा प्रतिनिधि सभा में बेहतर स्थिति में आए। इसका निष्कर्ष यह है कि अमेरिका के लोगों ने ऐसा जनादेश दिया ताकि ट्रंप अपनी घोषणाओं या एजेंडे में किसी तरह के बड़े अवरोध का सामना करने से बचे रहे। समाज के जिस वर्ग का समर्थन डेमोक्रेट को मिलने की परंपरा रही है उनमें भी ट्रंप प्रवेश कर चुके हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार महिलाओं का मत कमला हैरिस के पक्ष में झुका रहा, लेकिन बाइडेन को प्राप्त मतों से वह पीछे ही रही।

अेतों, लैटिन अमेरीकियों, एशियाई समूहों में से भी लगभग एक तिहाई मतदाताओं ने ट्रंप के लिए वोट किया। ये सारे तथ्य बताते हैं कि अमेरिकी जनमानस ट्रंप को लेकर कितना बदला है। सच कहें तो ट्रंप ने रिपब्लिकनों के साथ देश की सोच बदलने तथा राजनीति में नए चेहरों को खड़ा करके जीत सुनिश्चित की। डेमोक्रेट स्वयं को अति वामपंथी या लिबरल साबित करने के लिए जो कुछ करते रहे उसे आम लोगों ने सहजता से स्वीकार नहीं किया। आश्चर्यजनक रूप से शारीरिक श्रम करने वाले श्रमिकों तथा निम्न आय वर्ग के लोगों का समर्थन रिपब्लिकन में बढ़ा है। डेमोक्रेट एलिट व शिक्षित वर्ग के एक समूह तथा हॉलीवुड एवं थिंक टैंक के बीच अपनी पहचान की व नीति के लिए सिमटती गई है। लोगों ने माना कि वे जो आवाज उठा रहे हैं वह अमेरिका की सामूहिक भावना नहीं है। बाइडेन के कार्यकाल में आंतरिक रूप से अमेरिका कमजोर हुआ, वैश्विक स्तर पर भी उसकी छवि धूमिल हुई। हालांकि सर्वेक्षणों में अधिकतर मतदाताओं की चिंता वैश्विक या विदेश नीति नहीं थी।  यानी अमेरिकी लोगों की प्राथमिकताएं बदली है। ट्रंप का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ यानी ‘मागा’ लोगों के दिलों में गया। अवैध घुसपैठ, बढ़ती महंगाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध एवं अस्थिरता को उन्होंने बड़ा मुद्दा बनाया और लोगों को अपील कर गया।

वस्तुत: 2021 में ही दिखा था कि अमेरिका में ट्रंपवाद का नया दौर शुरू हो चुका है जिसका व्यापक समर्थन है, परंपरागत डेमोक्रेट, एलिट, अति लेफ्ट लिबरल राजनीति का समर्थन घट रहा है। अमेरिकी चुनाव अभियान में ट्रंप केंद्रित ठीक वैसे ही परिदृश्य ,आरोप-प्रत्यारोप एवं मुद्दे थे जो हम भारत में देखते हैं। यानी ट्रंप का आना लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-धार्मिंक स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी, अल्पसंख्यकों के अधिकार समाप्त कर दिए जाएंगे, संविधान कमजोर होगा और वैश्विक स्तर पर युद्ध एवं तनाव का खतरा ज्यादा बढ़ेगा। अमेरिका के बदले मनोविज्ञान में इनको पहले की तरह समर्थन मिलने की संभावना नहीं है। ट्रंप ने इसके विपरीत कहा कि मेरे 4 वर्ष के कार्यकाल में कोई युद्ध नहीं हुआ, मैं युद्ध का नहीं शांति का समर्थक हूं, लेकिन पीस विद स्ट्रेंथ।

ट्रंप ने अपने कार्यकाल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधारी, विदेश नीति में आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त की। पश्चिम एशिया में इस्रइल के साथ सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात के राजनीतिक संबंध स्थापित होंगे; इसकी कल्पना नहीं थी जो उन्होंने कर दिखाया। भारत के लिए इससे बेहतर परिणाम अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में कुछ नहीं आ सकता। बांग्लादेश को लेकर उन्होंने बाइडेन प्रशासन की कड़ी आलोचना की। इसका असर दिखेगा। उन्होंने वोट के लिए ही सही अगर हिन्दुओं के पक्ष में बयान दिए तथा उनकी रक्षा और साथ देने का संकल्प दिखाया तो वह इससे पीछे हटेंगे ऐसा तत्काल मानने का कोई कारण नहीं है। इस तरह मानकर चलना चाहिए कि उनके कार्यकाल में अमेरिका-भारत संबंध सशक्त होंगे।


देश के लिए चुनौती बने सड़क हादसे

अमित बैजनाथ गर्ग
यूं तो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाली सड़के देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन आए दिन होने वाले सडक़ हादसे कई सवालिया निशान भी खड़े कर रहे हैं। सड़क हादसे भारत जैसे विकासशील देश के लिए चुनौती बने हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल वैश्विक सडक़ सुरक्षा सप्ताह के दौरान एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार वैश्विक स्तर पर सडक़ दुर्घटनाओं में प्रति वर्ष 1.35 मिलियन से अधिक मौतें होती हैं, और 50 मिलियन से अधिक लोगों को गंभीर शारीरिक चोटें आती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में सडक़ दुर्घटनाओं के कारण होने वाली कुल मौतों में से 11 प्रतिशत भारत में होती हैं।

सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को होने वाले नुकसान को लेकर विश्व बैंक के आकलन के अनुसार, 18-45 आयु वर्ग के लोगों की सडक़ दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु दर सर्वाधिक 69 प्रतिशत है। इसके अलावा 54 प्रतिशत मौतें और गंभीर चोटें मुख्य रूप से संवेदनशील वगरे जैसे पैदल यात्री, साइकिल चालक और दोपहिया वाहन सवार आदि में देखी जाती हैं। भारत में 5-29 वर्ष आयु-वर्ग के बच्चों और युवा वयस्कों में सडक़ दुर्घटना मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। विश्व सडक़ सांख्यिकी के अनुसार, 2018 में सडक़ दुर्घटना से होने वाली मौतों की संख्या में भारत दुनिया में पहले स्थान पर था। इसके बाद चीन और अमेरिका का नंबर आता है।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में से 76 प्रतिशत दुर्घटनाएं ओवरस्पीडिंग और गलत साइड पर गाड़ी चलाने जैसे यातायात नियमों के उल्लंघन के कारण होती हैं। कुल सडक़ दुर्घटनाओं में दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वालों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बावजूद सडक़ यातायात इंजीनियरिंग और नियोजन के दौरान इस विषय पर ध्यान नहीं दिया जाता। यातायात इंजीनियरिंग और नियोजन सडक़ों को विस्तृत करने तक ही सीमित है, जिसके कारण कई बार सडक़ों और राजमागरे पर ब्लैक स्पॉट बन जाते हैं।

ब्लैक स्पॉट वे स्थान होते हैं, जहां सड़क दुर्घटना की आशंका सबसे अधिक रहती है। सडक़ दुर्घटनाओं के कारण होने वाली 80 प्रतिशत मौतों के लिए वाहन चालक प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होते हैं। यह तथ्य देश में अच्छे ड्राइविंग स्कूलों की कमी की ओर भी इशारा करता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ‘भारत में सडक़ दुर्घटनाएं’ शीषर्क वाली रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2022 में सड़क दुर्घटना में लगभग 68 प्रतिशत मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में हुई, जबकि कुल दुर्घटना मौतों में शहरी क्षेत्रों का योगदान 32 फीसद रहा। दुर्घटनाओं और मृत्यु दर, दोनों में दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी सर्वाधिक रही।

यूं तो सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए केंद्र सरकार अपने स्तर पर काफी प्रयास कर रही है, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। सडक़ सुरक्षा के बारे में प्रभावी जन जागरु कता बढ़ाने के लिए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से मीडिया के सभी माध्यमों द्वारा विभिन्न प्रचार उपाय एवं जागरु कता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा मंत्रालय सडक़ सुरक्षा समर्थन के संचालन के लिए विभिन्न एजेंसियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए भी योजना का संचालन कर रहा है।

इंजीनियरिंग योजना स्तर पर सडक़ सुरक्षा को सडक़ डिजाइन का एक अभिन्न अंग बनाया गया है। सभी राजमार्ग परियोजनाओं का सभी चरणों में सड़क सुरक्षा ऑडिट अनिवार्यकिया गया है। इसके साथ ही मंत्रालय ने वाहन की अगली सीट पर ड्राइवर की बगल में बैठे यात्री के लिए एयरबैग के अनिवार्यप्रावधान को लागू किया है। इसके साथ ही कानूनों और प्रवर्तन में सुधार, ढांचागत परिवर्तनों के माध्यम से सड़को को सुरक्षित बनाना और सभी वाहनों में जीवनरक्षक तकनीक उपलब्ध कराना जरूरी किया जाना चाहिए।

असल में सड़क हादसों में कमी लाने के लिए जरूरी है कि लोगों के व्यवहार में परिवर्तन का प्रयास किया जाए। हेलमेट और सीट बेल्ट के प्रयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, क्योंकि अधिकांश सडक़ दुर्घटनाएं इन्हीं कारणों से होती हैं। लोगों को शराब पीकर गाड़ी न चलाने के प्रति जागरूक करना होगा। वहीं दुर्घटना के बाद तत्काल प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराना और पीड़ति को जल्द अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था करने से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है।

दुर्घटना के बाद आस-पास खड़े लोग घायल की जान बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सडक़ों की योजना, डिजाइन और संचालन के दौरान सुरक्षा पर ध्यान देना सडक़ दुर्घटनाओं में मौतों को कम करने में प्रभावी योगदान दे सकता है। जब तक इन सुझावों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक सडक़ दुर्घटनाओं को कम करना संभव नहीं होगा। जरूरी है कि सडक़ सुरक्षा से संबंधित सभी पहलुओं पर विचार करते हुए आवश्यक उपायों की खोज की जाए।


गंदे पानी और गंदी हवा गंदी राजनीति का प्रतिफल

अजीत द्विवेदी
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की भयावहता बताने के लिए वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई के आंकड़े बताए जाते हैं। मीडिया में भी यही दिखाया जाता है कि एक्यूआई तीन से सौ ऊपर पहुंच गया तो ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान यानी ग्रैप का दूसरा चरण लागू हो गया। एक्यूआई चार सौ पहुंच गया तो ग्रैप का तीसरा और साढ़े चार सौ से ऊपर हो गया तो चौथा चरण लागू हो गया। चौथे चरण में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए।

निर्माण और तोड़ फोड़ की गतिविधियां रोक दी गईं। बीएस 3 या बीएस 4 गाडिय़ों पर पाबंदी लग गई। सडक़ों पर पानी का छिडक़ाव हो रहा है आदि, आदि। लेकिन इनसे न तो प्रदूषण की वास्तविक भयावहता का पता चलता है और न यह पता चलता है कि लोगों की सेहत पर इसका क्या असर हो रहा है। यह भी पता नहीं चल पाता है कि सरकारें किस तरह से इसके लिप्रदेश के खेल इंफ़्रास्ट्रक्चर में मील का पत्थर साबित होगा लेलू में बन रहा बहुउद्देशीय क्रीड़ा हॉल – रेखा आर्याए जिम्मेदार हैं और कैसे इसे ठीक करने के लिए वो कुछ नहीं कर रही हैं।

सबसे पहले तो आंकड़े पर ही बात करें तो एक्यूआई की अधिकतम सीमा भारत में पांच सौ तय की गई है। यानी यहां स्केल ही पांच सौ का बनाया गया है। तभी किसी भी सरकारी उपकरण से मापने पर एक्यूआई पांच सौ से ऊपर नहीं आएगा। इस वजह से यह कंफ्यूजन हुआ कि आईक्यूएयर जैसे ऐप या दूसरे ऐप एक्यूआई 19 सौ या उससे ज्यादा बता रहे हैं तो किसको सही माना जाए। असल में निजी ऐप का कोई स्केल नहीं बनाया गया है तो हवा का प्रदूषण जितना बढ़ता जाता है उतना उसका सूचकांक ऊपर जाता है। लेकिन भारत में पांच सौ का स्केल बना दिया गया है तो सरकारी आंकड़ा उससे ऊपर जाएगा ही नहीं।

पांच सौ है इसका मतलब है कि अधिकतम सीमा पहुंच गई है। लोग इसका मतलब इतना ही समझते हैं कि हवा सर्वाधिक प्रदूषण हो गई है। लेकिन असल में कितनी प्रदूषित हुई है और उसका क्या असर हो रहा है यह समझने के लिए आंकड़ों की बारीकी में जाना होता है। पुरानी कहावत है कि ‘ब्यूटी लाइज इन डिटेल्स’ उसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि ‘डेंजर लाइज इन डिटेल्स’।

एक्यूआई मुख्य रूप से पार्टिकुलेट मैटर्स यानी पीएम से तय होता है। पार्टिकुलेट मैटर्स हवा में लटके हुए हानिकारक कण होते हैं, जो सर्दियों में प्रदूषण की वजह से नीचे आ जाते हैं और स्थिर हो जाते हैं। ये दो तरह के होते हैं। एक पीएम 10 है और दूसरा पीएम 2.5 है। 2.5 माइक्रोन से ज्यादा आकार के कणों को पीएम 10 कहा जाता है। ये थोड़े मोटे कण होते हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं लेकिन पीएम 2.5 बहुत बारीक कण होते हैं और शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। 2.5 माइक्रोन से कम आकार वाले पार्टिकुलेट मैटर को पीएम 2.5 कहा जाता है।

ये बड़ी आसानी से सांस के साथ शरीर में चले जाते हैं और फेफड़े व शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच कर उसको नुकसान पहुंचाते हैं। लंग्स कैंसर या दूसरे कई किस्म के कैंसर में इसका बहुत बड़ा योगदान होता है। इनसे 10 से 15 साल के बच्चों के फेफड़ों की काम करने की क्षमता 20 फीसदी तक कम हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की अभी की हवा में बाहर अगर कोई एक घंटा भी सांस लेता है तो फेफड़े पर असर के साथ साथ हृदय रोग की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

इसका मतलब है कि पीएम 10 और पीएम 2.5 का ज्यादा मात्रा में शरीर के अंदर जाना सिर्फ फेफड़े को नुकसान नहीं पहुंचा रहा है, बल्कि हृदय सहित दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी नुकसान पहुंचाता है। दिल्ली की हवा में इसकी मात्रा कितनी है, इससे वास्तविक खतरे का पता चलता है। सोमवार, 18 नवंबर को दिल्ली के मुंडका में हवा में पीएम 2.5 की सघनता 1,193 थी। यानी जहां पांच सौ के स्केल पर एक्यूआई पांच सौ दिखा रहा था वहां पीएम 2.5 की मौजूदगी प्रति घन मीटर हवा में 1,193 थी। नजफगढ़ में 1,117 और अशोक विहार में 1,083 थी। दिल्ली की हवा में प्रति घन मीटर पीएम 2.5 की औसत मौजूदगी नौ सौ से ऊपर थी।

भारत सरकार ने तय किया है कि भारत में प्रति घन मीटर हवा में पीएम 2.5 की मौजूदगी अधिकतम 60 माइक्रोग्राम होनी चाहिए, जो कि दिल्ली में 19 गुना तक ज्यादा है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अधिकतम सीमा 15 माइक्रोग्राम तय की है और इस लिहाज से दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मौजूदगी 74 गुना ज्यादा है। यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ के मानक के मुताबिक प्रदूषण हवा से दिल्ली में लोगों की सेहत को 74 गुना ज्यादा खतरा है।

इस बात को डॉक्टर लोग दूसरी तरह से समझाने की कोशिश करते हैं। वे बताते हैं कि दिल्ली की हवा में सांस लेने का मतलब है रोज 20 सिगरेट या 30 सिगरेट का धुआं अपने शरीर में भरना। एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में इस समय हर आदमी प्रतिदिन औसतन 38 सिगरेट का धुआं अपने शरीर में भर रहा है। इसके बाद दूसरे स्थान पर जो शहर है वह हरियाणा है, जहां की हवा में सांस लेना हर दिन 25 सिगरेट पीने के बराबर है। सोचें, इसका क्या असर शरीर पर होता है।

इस बात को समझने के लिए एक और मिसाल दी जा सकती है। याद करें 2016 की जनवरी में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा नई दिल्ली आए और तीन दिन रूके तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कूटनीतिक खबरों के साथ साथ एक हेडलाइन यह भी थी कि, ‘मिस्टर प्रेसिडेंड अपनी जिंदगी के छह घंटे कम हो गए’। दिल्ली की हवा में तीन दिन सांस लेकर उनकी जिंदगी का एक चौथाई दिन कम हो गया। यह नौ साल पहले की बात है। उसके बाद तो यमुना के पानी और दिल्ली की हवा में कई गुना ज्यादा जहर घुल गया है।

हकीकत यह है कि एक्यूआई के आंकड़े, विजिबिलिटी के आंकड़े या डायवर्ट होने वाले विमानों की संख्या या देरी से चल रही ट्रेनों की संख्या से वायु प्रदूषण की भयावहता का पता नहीं चलता है। असल में यह बहुत भयावह संकट है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ रहा है। लाखों बच्चे बचपन में ही सांस की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हृदय रोग के मरीजों के जीवन पर संकट बढ़ रहा है। लाखों लोगों का जीवन दवा पर निर्भर होता जा रहा है। हर व्यक्ति के जीवन में औसतन तीन से चार साल कम हो रहे हैं।

हर व्यक्ति का मेडिकल का खर्च बढ़ रहा है क्योंकि आंख, कान, नाक और गले से लेकर फेफड़े और हृदय रोग बढ़ते जा रहे हैं। जिस तरह से दिल्ली में पानी प्रदूषण होता गया और हर घर में आरओ लगाने की मजबूरी हो गई वैसे ही हवा गंदी होती गई है और हर घर में एयर प्यूरीफायर लगाने की मजबूरी होती जा रही है। इसके बावजूद गंदे पानी और गंदी हवा से पूरी तरह बचाव नहीं होता है। दिल्ली की गंदी राजनीति का यह अनिवार्य प्रतिफल है, जिसे हर व्यक्ति को भुगतना ही है।


ट्रंप के साथ एलन मस्क की जबरदस्त जुगलबंदी

श्रुति व्यास
पिछले कुछ महीनों से ट्रंप के साथ अगर कोई जबरदस्त जुगलबंदी कर रहा था तो वे थे एलन मस्क। राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान सबसे बढ़-चढक़र लफ्फाजी करने वालों में मस्क अग्रणी थे। ट्रंप की एक रैली में उछल-कूद मचाते हुए उन्होंने दावा किया था कि वे न केवल मागा हैं बल्कि वे एक बर्बर डार्क गौथिक मागा हैं।
ट्रप के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मस्क ने ‘एक्स’ का भरपूर इस्तेमाल किया। उन्होंने ट्रंप समर्थकों और उनकी टीम को अपनी बात कहने के लिए एक्स का मंच दिया।
मस्क ने खुद के एक्स एकाउंट पर जो रोगन के साथ उनके उस पॉडकास्ट का प्रसारण किया जिसमें वे मागा और डोनाल्ड ट्रंप का गुणगान कर रहे हैं और यह बता रहे हैं कि वे ट्रप के कितने बड़े मुरीद हैं।

गौरतलब है कि एक्स पर मस्क के 20 करोड़ फालोअर हैं। मस्क ने अमेरिका के स्विंग राज्यों (वे राज्य जहाँ दोनों पार्टियों के समर्थकों की संख्या लगभग सामान है) में पंजीकृत प्रत्येक मतदाता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हथियार रखने के अधिकार के पक्ष में एक याचिका पर हस्ताक्षर करने के बदले 47 डालर देने की घोषणा भी की थी।सीधे शब्दों में कहा जाए तो उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप का पूरा समर्थन किया और उनके चुनावी अभियान पर अपना धन भी लुटाया। उन्होंने अपने प्रभाव और अपने अकूत धन, दोनों को ट्रप को समर्पित कर दिया। जाहिर है कि वे परोपकार तो कर नहीं रहे थे। अब वे यह उम्मीद कर रहे होंगे कि उनके समर्थन का ईनाम उन्हें मिलेगा। वे चाहेंगे कि टेस्ला, स्पेस एक्स और उनके अन्य कारोबारों में हो रही गड़बडिय़ों को नियामक संस्थाएं नजरअंदाज करें या कम से कम  उन पर सख्त रूख अख्तियार न करें।

ट्रप ने भी दरियादिली दिखाई और जीत बाद दिए गए भाषण में कहा, “एक नए सितारे का उदय हो गया है जिसका नाम है एलन”।
इसके फौरन बाद टेस्ला का शेयर करीब 15 प्रतिशत चढ़ गया और उस दिन वह एसएंडपी सूचकांक के सबसे ज्यादा बढऩे वाले शेयरों में से एक बना।
इससे मस्क की कुल संपत्ति में 20 बिलियन डालर का इज़ाफा हुआ और वह बढक़र 285 बिलियन डालर हो गई। ज्ञानीजन कयास लगाने लगे कि क्या वे दुनिया के पहले ऐसे व्यक्ति बनने की राह पर हैं जिसकी संपत्ति 1000 बिलियन डॉलर से अधिक हो। मस्क एक्स की खातिर कुछ भी करने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने जनमत को ट्रंप के पक्ष में करने के लिए एक्स के मालिक के तौर पर बहुत बड़ा राजनैतिक और व्यावसायिक दांव खेला है।

इसलिए ट्रंप की जीत एक्स के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। ट्रंप के शासनकाल में एक्स को एक ऐसे मंच का दर्जा मिल सकता है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति का समर्थन हासिल है – जिससे उसका प्रभाव और बढ़ जाएगा।ऐसी अफवाहें हैं कि एक्स का ट्रप के प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल की होल्डिंग कंपनी में विलय हो सकता है। चुनाव की रात मस्क ने अपने करोड़ों फालोअर्स को संबोधित एक पोस्ट में कहा था कि, “अब आप ही मीडिया हैं। यह देखा जाना बाकी है कि मस्क के व्यवसायिक साम्राज्य की संघीय जांचों का अब क्या होता है। बाइडन प्रशासन के दौरान नियामक संस्थाओं द्वारा मस्क की कंपनियों की जांच-पड़ताल काफी बढ़ गई थी।

न्याय विभाग, सिक्युरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन, नेशनल लेबर रिलेशन बोर्ड, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी और संघीय व्यापार आयोग – सभी ने उनकी कंपनियों की जांच शुरू कर दी थी। लेकिन जीत के बाद दिए गए अपने भाषण में ट्रप ने मस्क की ओर इशारा करते हुए कहा, “हमें अपनी प्रतिभाओं को संरक्षण देना होगा। हमारे पास ये ज्यादा संख्या में नहीं हैं”। मस्क को ट्रंप के सत्ता में आने से फायदा होगा इसमें कोई शक नहीं। उन्हें अपनी वफादारी का ईनाम मिलेगा। उन्हें सरकारी ठेके बिना ज्यादा जांच-पड़ताल के मिलेंगे। इस बात की भी संभावना है कि उन्हें सरकार में कोई पद दे दिया जाए।

चुनाव प्रचार के दौरान मस्क ने कहा था कि एक ‘शासकीय कार्यकुशलता आयोग’ का गठन किया जाना चाहिए जो संघीय सरकार के सभी कार्यकलापों का लेखा-जोखा रखे। यह बात उन्होंने सबसे पहले एक्स पर ट्रंप के साथ हुई चर्चा के सीधे प्रसारण के दौरान कही। मस्क ने कहा था कि यह आयोग यह सुनिश्चित कर सकता है कि करदाताओं का धन ‘ठीक से खर्च किया जाए’। हाल में ट्रंप ने घोषणा की कि वे ऐसा आयोग बनाएंगे और उसका जिम्मा मस्क को सौंपा जाएगा। इस शासकीय आयोग के प्रमुख के तौर पर मस्क का संघीय संस्थाओं पर अच्छा खासा दबदबा रहेगा और किसे कितना बजट दिया जाए, यह तय करने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। ट्रंप ने इस बात का विस्तार से खुलासा नहीं किया है कि इस आयोग की कार्यप्रणाली क्या होगी और उसे कितनी स्वायत्ता हासिल होगी। हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा है कि वह बजट में भारी कटौती करने के तरीके सुझाएगा। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि मस्क की बल्ले-बल्ले हो जाएगी।

लेकिन यह गहरी मित्रता आखिर कब तक चलेगी? ट्रप नहीं चाहेंगे कि उन्हें सुर्खियां किसी और के साथ साझा करनी पड़ें। मस्क का भी हमेशा सुर्खियों में बने रहने का अरमान रहता है। दोनों ही व्यापारी हैं जो हर रिश्ते और मित्रता को लाभ-हानि के तराजू पर तौलते हैं। दोनों ही बहुत अस्थिर मिजाज वाले हैं। और जैसे दो समान आवेश वाली चीजें एक दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं, वैसे ही एक से मिजाज और अहं वाले दो व्यक्तियों के बीच दोस्ती टूटने में देर नहीं लगती। दोस्ती कब नफरत में बदल जाए कहा नहीं जा सकते। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक मस्क ट्रंप के राष्ट्रपति होने से लाभान्वित होते रहेंगे।


जलवायु संकट अभी भी मुद्दा नहीं

श्रुति व्यास
जलवायु संकट देश, नस्ल, धर्म और जाति के भेद के बिना सभी को मार रहा है, बरबादी की और ले जा रहा है लेकिन देशों और नेताओं के लिए अभी भी मुद्दा नहीं बना है। वर्ष 2024 रिकार्ड बना रहा है। रोजाना जबरदस्त गर्मी और विनाशकारी तूफान की खबरें आ रही है। लोगों की जिंदगी और जीविका के साधन ताश के पत्तों के ढेर की तरह ढहते दिख रहे है। इस साल गर्मी के मौसम में ऐसे मौके भी आए जब सब कुछ नष्ट होना लगभग अवश्यंभावी दिख रहा था। मौसमी उन्माद के साथ-साथ बीमारियों में भी बढ़ोतरी है। बीमारियां अजीब और अप्राकृतिक है।
हाल में हमारे पारिवारिक चिकित्सक ने बताया कि इस प्रकार का डेंगू फैल रहा है जिसमें सिर्फ प्लेटलेट्स की संख्या ही नहीं घटती बल्कि एक दिन बुखार आता है और उसके बाद कई दिनों तक नहीं आता और एसजीपीटी और एसजीओटी (लीवर की स्थिति बताने वाले दो हारमोन) के स्तर में तेज वृद्धि होती है।

इसलिए यदि आपको आज बुखार है तो मेहरबानी करके कल ही अपनी जांच करवा लें। जोखिम उठाना ठीक नहीं। काफी जटिल स्थितियां का दौर है। और कोई भी इन जटिलताओं की मूल वजह – जलवायु में बदलाव – को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है। न तो राजनैतिक बहस-मुबाहिसों में और न चुनावी चर्चाओं में इसका जि़क्र होता है। पिछली गर्मियों में हुए हमारे आम चुनाव के दौरान जलवायु संकट चर्चा का मुद्दा नहीं था। इन दिनों दो राज्यों में चुनाव हो रहे है, लेकिन किसी भी छोटे-बड़े राजनैतिक दल या उसके किसी नेता ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है।

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसे जलवायु परिवर्तन का घातक प्रभाव झेलना पड़ा है – ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार पडऩे वाले सूखे से लेकर शहरी इलाकों में आने वाली बाढ़ तक। लेकिन वहां भी नौकरियाँ, आरक्षण, मुफ्त अनाज और साम्प्रदायिकता ही मुख्य मुद्दे हैं। यदि हम अपेक्षाकृत बड़े कैनवास पर  बात करें तो ट्रंप के दुबारा चुनाव जीतने से सीओपी29 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) और भविष्य में होने वाले जलवायु सम्मेलनों पर अनिश्चिता के काले बादल घिर आए हैं। फिलहाल वर्ष का वह समय है जब दुनिया भर के नेता, वैज्ञानिक, उद्योगपति, स्वयंसेवी संगठनों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता अजरबेजान के बाकू शहर में एकत्रित होकर धरती पर आपके और हमारे भविष्य के बारे में विचार  कर रहे हैं।

वे शुद्ध पानी और विशुद्ध वाइन की चुस्कियां लेते हुए वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्सजन कम करने के बारे में चिंतन-मनन कर रहे हैं। सीओपी की यह बैठक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें धन और निवेश जुटाने का मुद्दा प्रतिनिधियों के सामने होगा। सन 2009 में अगले 15 सालों में क्लाइमेट चेंज संबंधी काम के लिए 100 अरब डॉलर आवंटित किये गए थे।
इस आवंटन को खर्च करने की सीमा 2024 के अंत में समाप्त हो जाएगी। जाहिर है कि विकासशील देशों को हरित ऊर्जा स्त्रोत विकसित करने और अपेक्षाकृत गर्म धरती के साथ तालमेल बिठाने के लिए धन उपलब्ध करवाना ज़रूरी है। और अभी तो इसके लिए धन की व्यवस्था ही नहीं है।

कोई बड़ा समझौता होने की उम्मीद बहुत कम है। पहले से ही सीओपी में कड़वाहट घुल चुकी है। पापुआ न्यू गिनी ने यह कहते हुए सीओपी29 का बहिष्कार करने की घोषणा की है कि ‘यह समय की बर्बादी है’। उसका तर्क है कि ‘साल दर साल बड़ी मात्रा में प्रदूषणकारी गैसों का उर्त्सजन करने वाले देश अपने वायदों पर खरा उतरने में असफल हैं। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भी सम्मेलन में शामिल नहीं होने की संभावना है। आशंका है कि जिन नेताओं के बड़े फैसलों की उम्मीद की जा रही थी, वे नहीं हो पाएंगे। इसके अलावा, डोनाल्ड ट्रंप की जीत का असर भी दिखेगा जो जलवायु परिवर्तन को ‘एक कोरी धमकी’ बताते हैं और ऐसी अपेक्षा है कि वे राष्ट्रपति का पद संभालते ही अमेरिका के ऐतिहासिक पेरिस समझौते से हटने के अपने पिछले कार्यकाल में लिए गए निर्णय को दुहराएंगे।

कुछ दिन पहले सीओपी29 के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इल्योर सोल्तानोव, जो अजरबेजान के ऊर्जा उपमंत्री भी हैं, की एक रिर्काडिंग सामने आई थी जिसमें वे जलवायु सम्मेलन में फोसिल फ्यूल्स (मुख्यत: पेट्रोलियम और कोयला) के आगे भी उपयोग किये जाने के मुद्दे पर समझौते के लिए सहमत होते सुने जा सकते हैं। जलवायु संकट एक ऐसी समस्या है जो नस्ल, धर्म और जाति के भेद के बिना सभी को प्रभावित करती है। इसके बावजूद यह एक ज्वलंत मुद्दा, राजनैतिक स्तर पर चिंता उत्पन्न करने वाला मुद्दा नहीं बन सका है। जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों पर होने वाला खर्च अब बोझ बनता जा रहा है। सीओपी29 में कोई कड़े फैसले नहीं होंगे। होगा सिर्फ यह कि विभिन्न राष्ट्र आगे भी विचार-विमर्श जारी रखने पर राजी हो जाएंगे। वक्त कम है और उम्मीद की लौ बुझती जा रही है।


पाकिस्तान की हिमाकत पर कोई हैरानी नहीं

बलबीर पुंज
समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि भगत सिंह “मुसलमानों के प्रति शत्रुतापूर्ण मजहबी नेताओं से प्रभावित थे और भगत सिंह फाउंडेशन इस्लामी विचारधारा और पाकिस्तानी संस्कृति के खिलाफ काम कर रहा है, (और) इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए।” बकौल रिपोर्ट, “फाउंडेशन के अधिकारी जो खुद को मुस्लिम कहते हैं, क्या वह नहीं जानते कि पाकिस्तान में किसी नास्तिक के नाम पर किसी जगह का नाम रखना अस्वीकार्य है और इस्लाम में मानव मूर्तियां प्रतिबंधित है?”

जो समूह भारत-पाकिस्तान संबंध और ‘सिख-मुस्लिम सद्भावना’ की संभावनाओं पर बल देते है, वह हालिया घटनाक्रम पर क्या कहेंगे? बीते दिनों पाकिस्तानी पंजाब की सरकार ने यह कहते हुए शादमान चौक का नाम शहीद भगत सिंह समर्पित करने की वर्षों पुरानी मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया कि भगत सिंह क्रांतिकारी नहीं, बल्कि ‘अपराधी’ और आज की परिभाषा में ‘आतंकवादी’ थे। जैसे ही यह खबर भारत पहुंची, तुरंत विभिन्न राजनीतिक दलों ने पाकिस्तान को गरियाना शुरू कर दिया। परंतु मुझे पाकिस्तान की इस हिमाकत पर कोई हैरानी नहीं हुई। क्या इस इस्लामी देश से किसी अन्य व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है?

लाहौर में जिस स्थान पर 23 मार्च 1931 को महान स्वतंत्रता सेनानियों— भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी, वह जगह शादमान चौक नाम से प्रसिद्ध है। इसी मामले में 8 नवंबर को लाहौर उच्च न्यायालय में सुनवाई थी। तब ‘भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन पाकिस्तान’ द्वारा अदालत में दायर एक याचिका पर लाहौर प्रशासन ने जवाब देते हुए कहा, “शादमान चौक का नाम भगत सिंह के नाम पर रखने और वहां उनकी प्रतिमा लगाने की प्रस्तावित योजना को पूर्व नौसेना अधिकारी तारिक मजीद की टिप्पणी के आलोक में रद्द कर दिया गया है।” मजीद मामले में गठित समिति का हिस्सा है और उन्होंने कहा था कि भगत सिंह ने एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या की थी, इसलिए उन्हें दो साथियों के साथ फांसी दे दी गई थी।

इसी समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भगत सिंह “मुसलमानों के प्रति शत्रुतापूर्ण मजहबी नेताओं से प्रभावित थे और भगत सिंह फाउंडेशन इस्लामी विचारधारा और पाकिस्तानी संस्कृति के खिलाफ काम कर रहा है, (और) इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए।” बकौल रिपोर्ट, “फाउंडेशन के अधिकारी जो खुद को मुस्लिम कहते हैं, क्या वह नहीं जानते कि पाकिस्तान में किसी नास्तिक के नाम पर किसी जगह का नाम रखना अस्वीकार्य है और इस्लाम में मानव मूर्तियां प्रतिबंधित है?” मामले में अगली सुनवाई 17 जनवरी 2025 को होगी।

पाकिस्तान में भगत सिंह का रिश्ता केवल लाहौर जेल तक सीमित नहीं है। जिस अविभाजित पंजाब के लायलपुर में उनका जन्म हुआ था, वह भी अब पाकिस्तान में है। लाहौर के ही नेशनल कॉलेज में भगत सिंह के अंदर क्रांति के बीज फूटे थे और ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन भी लाहौर में किया था। यदि इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान भगत सिंह को अपना ‘नायक’ मान लेता, तो ऐसा करके वह अपने वैचारिक अस्तित्व, जिसे ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा से प्रेरणा मिलती है— उसे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से नकार देता। पाकिस्तानी सत्ता-वैचारिक अधिष्ठान के लिए भगत सिंह भी एक ‘काफिर’ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में इस जहरीले चिंतन की जड़ें बहुत गहरी है। गांधीजी ने अली बंधुओं (मौलाना मुहम्मद अली जौहर और शौकत अली) के साथ मिलकर विदेशी खिलाफत आंदोलन (1919-24) का नेतृत्व किया था। परंतु मौलाना मुहम्मद अली जौहर स्वयं गांधीजी के बारे में क्या सोचते थे, यह उनके इस विचार से स्पष्ट है— “गांधी का चरित्र चाहे कितना भी शुद्ध क्यों न हो, मजहब की दृष्टि से वे मुझे किसी भी चरित्रहीन मुसलमान से हीन प्रतीत होते हैं।” बात यदि वर्तमान पाकिस्तान की करें, तो वह विभाजन के बाद अपने दस्तावेजों, स्कूली पाठ्यक्रमों और अपनी आधिकारिक वेबसाइटों में इस बात का उल्लेख करता आया है कि उसकी जड़ें सन् 711-12 में इस्लामी आक्रांता मुहम्मद बिन कासिम द्वारा हिंदू राजा दाहिर द्वारा शासित तत्कालीन सिंध पर किए हमले में मिलती हैं। इसमें कासिम को ‘पहला पाकिस्तानी’, तो सिंध को दक्षिण एशिया का पहला ‘इस्लामी प्रांत’ बताया गया है।

जिन भारतीय क्षेत्रों को मिलाकर अगस्त 1947 में पाकिस्तान बनाया गया था, वहां हजारों वर्ष पहले वेदों की ऋचाएं सृजित हुईं थीं और बहुलतावादी सनातन संस्कृति का विकास हुआ था। इसलिए पुरातत्वविदों की खुदाई में वहां आज भी वैदिक सभ्यता के प्रतीक उभर आते हैं, जिसका इस्लाम में कोई स्थान नहीं है। परंतु पाकिस्तान अपनी छवि सुधारने के नाम पर मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, सिंधु घाटी, आर्य सभ्यता, कौटिल्य और गांधार कला से जोडऩे का प्रयास करता है। इसी वर्ष 29 मई को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा था, “पाकिस्तान को अपनी प्राचीन बौद्ध विरासत पर गर्व है।” वास्तव में, यह क्रूरतम मजाक है। जिन इस्लामी आक्रांताओं— कासिम, गजनवी, गौरी, बाबर, टीपू सुल्तान आदि को पाकिस्तान अपना घोषित ‘नायक’ मानता है, जिनके नामों पर उसने अपनी मिसाइलों-युद्धपोतों का नाम रखा है— उन्होंने ही ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा से प्रेरित होकर भारतीय उपमहाद्वीप में गैर-इस्लामी प्रतीकों (हिंदू-बौद्ध सहित) का विनाश किया था। इस चिंतन में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। जब जुलाई 2020 में खैबर पख्तूनख्वा में निर्माण कार्य के दौरान जमीन से भगवान गौतमबुद्ध की एक प्राचीन प्रतिमा मिली थी, तब स्थानीय मौलवी द्वारा इसे गैर-इस्लामी बताने पर लोगों ने मूर्ति को हथौड़े से तोड़ दिया था।

पाकिस्तानी राष्ट्रगान (कौमी तराना) का मामला और भी दिलचस्प है। वर्ष 1947 में इस्लाम के नाम पर खूनी विभाजन के बाद शेष विश्व के सामने पाकिस्तान को तथाकथित ‘सेकुलर’ दिखाने के लिए मोहम्मद अली जिन्नाह ने हिंदू मूल के उर्दू शायर जगन्नाथ आजाद द्वारा लिखित एक उर्दू गीत को राष्ट्रगान बनाया था। जिन्नाह की मृत्युपर्यंत लगभग डेढ़ वर्ष तक यह पाकिस्तान का राष्ट्रगान रहा। चूंकि इसे ‘काफिर’ हिंदू ने लिखा था, इसलिए इसका पाकिस्तानी नेतृत्व से लेकर आम लोगों ने भारी विरोध किया और इसपर प्रतिबंध लगा दिया। वर्ष 1952 में हाफिज जालंधर द्वारा फारसी भाषा में लिखित गीत को कौमी-तराना बनाना मुकर्रर हुआ। यह स्थिति तब है, जब इस इस्लामी देश की आधिकारिक राष्ट्रीय भाषा उर्दू-अंग्रेजी है और यहां पंजाबी, सिंधी, पश्तो, बलूची, सराइकी इत्यादि भाषाएं बोली जाती है। फिर भी इसका राष्ट्रगान उस फारसी भाषा में है, जिसे बोलने/समझने वालों की संख्या पाकिस्तान में बेहद सीमित है।

पाकिस्तान में यह हड़बड़ाहट उसके वैचारिक अधिष्ठान के कारण है, जो पिछले 77 वर्षों से अपनी पहचान भारत में जनित और विकसित सांस्कृतिक जड़ों से काटने और मध्यपूर्व-अरब देशों से जोडऩे का असफल प्रयास कर रहा है। इसलिए इस जड़-विहीन पाकिस्तान को उसके इस्लामी होने के बावजूद मध्यपूर्वीय देश, सम्मान या बराबर की नजर से नहीं देखते है। पाकिस्तान में एक बड़े भाग द्वारा शहीद भगत सिंह का विरोध भी अपनी मूल जड़ों को नकारने की विचारधारा से ही प्रेरित है।


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