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पहाड़ों पर बढ़ता बोझ, सरकार के पास नहीं जवाब

पहाड़ों पर बढ़ता बोझ, सरकार के पास नहीं जवाब

पहाड़ों पर बढ़ता बोझ, सरकार के पास नहीं जवाब

आयुषी

उत्तराखंड के पर्वतीय शहरों में तेजी से बढ़ती आबादी, अनियोजित निर्माण और पर्यटन गतिविधियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। चारधाम यात्रा, पर्यटन सीजन और शहरी विस्तार के कारण पहाड़ों पर मानव गतिविधियां पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये संवेदनशील पर्वतीय शहर कितना अतिरिक्त बोझ सुरक्षित रूप से झेल सकते हैं? हैरानी की बात यह है कि इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब आज भी सरकार और संबंधित विभागों के पास स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है।जोशीमठ भू-धंसाव आपदा के बाद राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी पर्वतीय शहरों की धारण क्षमता का वैज्ञानिक और तकनीकी आकलन कराने की घोषणा की थी। उद्देश्य था कि भविष्य में विकास योजनाओं, भवन निर्माण और पर्यटन प्रबंधन को वैज्ञानिक आधार पर संचालित किया जा सके। लेकिन आपदा के तीन वर्ष बाद भी यह महत्वाकांक्षी योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई है।

वर्ष 2023 में जोशीमठ में जमीन धंसने और मकानों में दरारें आने की घटना ने पूरे देश का ध्यान उत्तराखंड के पर्वतीय शहरों की संवेदनशीलता की ओर खींचा था। उस समय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि पहाड़ों पर बढ़ते निर्माण, कमजोर भूगर्भीय संरचना और अनियोजित विकास भविष्य में और बड़े संकट पैदा कर सकते हैं।इसी के मद्देनजर राज्य सरकार ने सभी प्रमुख पर्वतीय नगरों की धारण क्षमता का सर्वे कराने का निर्णय लिया था। इस सर्वे के माध्यम से यह पता लगाया जाना था कि किसी शहर की भूगर्भीय स्थिति, जल संसाधन, सड़क नेटवर्क और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार वहां कितनी आबादी, निर्माण और पर्यटन गतिविधियां सुरक्षित रूप से संचालित की जा सकती हैं।हालांकि, घोषणा के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं देती। जानकारी के अनुसार, आपदा प्रबंधन विभाग ने अभी तक इस प्रकार का कोई व्यापक सर्वे नहीं कराया है।वहीं, उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र ने पर्वतीय शहरों की मिट्टी और भूगर्भीय स्थिति का आकलन करने की योजना बनाई थी, ताकि भविष्य में विकास कार्यों और भवन निर्माण के लिए वैज्ञानिक मानक तय किए जा सकें। लेकिन यह योजना भी अभी प्रारंभिक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है।इस पूरे मामले में विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर भी स्पष्टता नजर नहीं आती।

सचिव आवास आर. राजेश कुमार ने कहा कि यह कार्य उनके विभाग के माध्यम से नहीं कराया गया है। वहीं सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन का कहना है कि सर्वे कराने की जिम्मेदारी उनके विभाग को नहीं सौंपी गई थी।दूसरी ओर, यूएलएलएमसी के निदेशक शांतनु सरकार ने बताया कि संस्थान के स्तर पर शहरों की मिट्टी की धारण क्षमता का आकलन करने की योजना बनाई गई है, जिस पर आगे कार्य किया जाना है। हालांकि उन्होंने भी स्पष्ट किया कि व्यापक शहरी धारण क्षमता आकलन का कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है।

उत्तराखंड के कई प्रमुख पर्वतीय शहर जैसे मसूरी, नैनीताल, जोशीमठ, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और चमोली पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं। गर्मियों और यात्रा सीजन में इन शहरों में लाखों पर्यटक पहुंचते हैं, जिससे जलापूर्ति, पार्किंग, यातायात, कचरा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ता है।विशेषज्ञों का मानना है कि बिना धारण क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन किए विकास परियोजनाओं को मंजूरी देना भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय और आपदा संबंधी जोखिम पैदा कर सकता है।
भूगर्भ वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। यहां अनियंत्रित निर्माण, पहाड़ों की कटिंग और बढ़ता यातायात भू-स्खलन, भू-धंसाव और अन्य आपदाओं की आशंका को बढ़ा सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार धारण क्षमता का अध्ययन केवल आबादी या भवनों की संख्या तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें भूगर्भीय स्थिरता, जल स्रोतों की उपलब्धता, सड़क क्षमता, कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कई पहलुओं का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है|

उत्तराखंड के पर्वतीय शहर आज विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहे हैं। धारण क्षमता का वैज्ञानिक सर्वे केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि पहाड़ों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में कब तक ठोस कार्रवाई करती है और पर्वतीय शहरों को संभावित खतरों से बचाने के लिए कितनी गंभीरता दिखाती है।


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