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बार-बार होती है एसिडिटी? जानें इसके कारण और कारगर घरेलू इलाज

Category Archives: जीवन शैली

बार-बार होती है एसिडिटी? जानें इसके कारण और कारगर घरेलू इलाज

भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियमित दिनचर्या और खराब खानपान के चलते आज एसिडिटी एक आम समस्या बन चुकी है। सीने में जलन, खट्टी डकारें और पेट फूलने जैसी परेशानियां कई लोगों के लिए रोज़मर्रा की बात हो गई हैं। यह समस्या तब होती है जब पेट का अम्ल (एसिड) भोजन नली में लौट आता है, जिससे जलन और बेचैनी महसूस होती है। मेडिकल भाषा में इसे गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिज़ीज (GERD) कहा जाता है। अच्छी बात यह है कि कुछ घरेलू उपायों से इस परेशानी को शुरूआती स्तर पर आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

एसिडिटी के प्रमुख कारण:
एसिडिटी आमतौर पर पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड की अत्यधिक मात्रा बनने से होती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:

मसालेदार और तला-भुना भोजन

देर रात खाना और तुरंत लेटना

धूम्रपान और शराब का सेवन

अत्यधिक चाय/कॉफी पीना

तनाव और नींद की कमी

इन आदतों में सुधार कर एसिडिटी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

घरेलू उपाय जो तुरंत राहत दें:

सौंफ:
पाचन शक्ति बढ़ाने वाली सौंफ में ऐसे तत्व होते हैं जो गैस, सूजन और जलन को कम करने में मदद करते हैं। आप एक चम्मच सौंफ चबा सकते हैं या सौंफ का पानी (उबला हुआ पानी + सौंफ) पी सकते हैं।

ठंडा दूध:
दूध में मौजूद कैल्शियम अतिरिक्त एसिड को निष्क्रिय करता है। बिना चीनी का ठंडा दूध पीने से जलन में राहत मिलती है। हालांकि यह उपाय कभी-कभी ही कारगर होता है; बार-बार एसिडिटी होने पर डॉक्टर से सलाह लें।

केला:
फाइबर से भरपूर केला पेट को शांत करता है और कब्ज जैसी दिक्कतों को भी कम करता है। एसिडिटी महसूस होने पर एक पका हुआ केला खाना लाभकारी होता है।

जीरे का पानी:
जीरा पाचन एंजाइमों को सक्रिय करता है और गैस को बाहर निकालने में मदद करता है। एक चम्मच जीरे को एक गिलास पानी में उबालें और ठंडा करके पी लें।

निष्कर्ष:
ये घरेलू उपाय सामान्य और शुरुआती एसिडिटी के लक्षणों में राहत देने में मदद कर सकते हैं। लेकिन यदि एसिडिटी बार-बार हो रही है या लक्षण गंभीर हैं, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें और चिकित्सकीय सलाह अवश्य लें। खानपान और जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव आपकी पाचन से जुड़ी समस्याओं को दूर रख सकते हैं।

(साभार)


बिना सिगरेट पीए भी फेफड़े हो सकते हैं खराब, जानें छिपे खतरे

आमतौर पर फेफड़ों की बीमारियों को धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सिगरेट छुए भी आपके फेफड़े खतरे में हो सकते हैं। खासकर 30 की उम्र से पहले ही अब युवाओं में भी फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

लखनऊ स्थित एक अस्पताल में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. रवि प्रकाश सिंह के अनुसार, सिर्फ तंबाकू से दूरी ही फेफड़ों को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। प्रदूषित हवा, घरेलू धुआं, अगरबत्ती, किचन गैस का धुआं, यहां तक कि रूम फ्रेशनर और सेंटेड कैंडल्स भी फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

WHO की रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण से हर साल करीब 70 लाख लोगों की जान जाती है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण जैसे PM2.5 और NO₂ सीधे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं, लैंसेट के अध्ययन में पाया गया कि लकड़ी या गोबर से खाना बनाने वाले घरों में रहने वालों को सीओपीडी जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

CDC के मुताबिक, पैसिव स्मोकिंग यानी दूसरों के धुएं में सांस लेने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा 20–30% तक बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग नियमित रूप से श्वसन व्यायाम करें, प्रदूषण से बचें और साफ-सुथरे वातावरण में रहें ताकि फेफड़ों की कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखा जा सके।


हर बार चक्कर आना सामान्य नहीं, हो सकता है इस गंभीर बीमारी का संकेत

भागदौड़ और तनाव से भरी इस ज़िंदगी में कभी-कभी अचानक चक्कर आना या सिर घूमने जैसा महसूस होना आम बात लग सकती है। अक्सर लोग इसे कमजोरी, थकान या नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर यह लक्षण बार-बार या बिना किसी स्पष्ट कारण के हो रहे हैं, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है—जैसे कि वर्टिगो।

वर्टिगो क्या है?
वर्टिगो एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि उसके चारों ओर की दुनिया घूम रही है, जबकि वह खुद स्थिर होता है। यह सिर्फ सामान्य चक्कर नहीं है, बल्कि एक असंतुलन की स्थिति है जो व्यक्ति की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।

यह समस्या आमतौर पर आंतरिक कान से जुड़ी होती है। हमारे कानों में एक जटिल प्रणाली होती है जो शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। वर्टिगो का सबसे सामान्य रूप बीपीपीवी (बेनाइन पैरॉक्सिस्मल पोजिशनल वर्टिगो) होता है, जिसमें कान के अंदर मौजूद सूक्ष्म कैल्शियम कण अपनी जगह से हट जाते हैं और संतुलन बिगाड़ देते हैं।

वर्टिगो के सामान्य लक्षण

सिर की स्थिति बदलते समय अचानक चक्कर आना

बिस्तर पर करवट लेते या उठते समय सिर घूमना

संतुलन खो जाना या गिरने जैसा एहसास

आंखों का अनियंत्रित गति से हिलना (निस्टैग्मस)

मतली या उल्टी महसूस होना

ये लक्षण कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक रह सकते हैं और व्यक्ति को असहज, घबराया और थका हुआ महसूस करा सकते हैं।

कब सतर्क होना जरूरी है?
यदि आपको बार-बार चक्कर आने, संतुलन बिगड़ने या उलझन जैसी समस्या हो रही है, तो इसे हल्के में न लें। हालांकि बीपीपीवी का इलाज संभव है, लेकिन कभी-कभी यह लक्षण किसी और बड़ी स्वास्थ्य समस्या जैसे स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का भी संकेत हो सकते हैं।

उपचार और समाधान
वर्टिगो का इलाज आमतौर पर बिना दवा के भी संभव है। डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा किया जाने वाला ‘एपली मैन्युवर’ (Epley Maneuver) एक प्रभावशाली तकनीक है, जिससे कान के अंदर खिसके हुए कणों को उनकी सही जगह पर वापस लाया जाता है। इस थेरेपी से अधिकांश मरीजों को कुछ ही सत्रों में राहत मिल जाती है।

इसके अलावा, कुछ मामलों में डॉक्टर दवाएं या विशेष व्यायाम भी सुझा सकते हैं।

निष्कर्ष:
बार-बार चक्कर आना सिर्फ एक साधारण लक्षण नहीं है। यह आपके शरीर द्वारा दिया गया संकेत हो सकता है कि कुछ गंभीर गड़बड़ी हो रही है। इसलिए, ऐसे लक्षण दिखने पर जल्द से जल्द किसी कान, नाक, गला (ENT) विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें।

(साभार)


बिना दवा और सर्जरी के दूर करें ‘बफेलो हंप’, अपनाएं ये असरदार योगासन

क्या आपने हाल ही में गर्दन के पीछे एक उभरा हुआ हिस्सा महसूस किया है? यह ‘बफेलो हंप’ या ‘कूबड़’ कहलाता है, जो शरीर की गलत मुद्रा, लंबे समय तक झुककर मोबाइल या लैपटॉप देखने, पीठ झुकाकर बैठने और मानसिक तनाव जैसे कारणों से धीरे-धीरे विकसित हो सकता है। हालांकि यह समस्या गंभीर दिख सकती है, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। नियमित योग अभ्यास के जरिए इसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। दवाओं या सर्जरी का सहारा लेने से पहले योग का यह प्राकृतिक उपाय जरूर आज़माएं — यह न केवल गर्दन और रीढ़ की संरचना को बेहतर बनाता है, बल्कि मानसिक रूप से भी सुकून देता है।

योगासन जो गर्दन के कूबड़ को दूर करने में मददगार हैं:

1. भुजंगासन (Cobra Pose)
इस आसन में शरीर की आकृति सांप जैसी बनती है। यह रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाता है।

पेट के बल लेटें, हथेलियां कंधों के पास रखें और सांस भरते हुए छाती को ऊपर उठाएं। सिर को ऊपर रखते हुए कुछ सेकंड रुकें। यह पीठ और गर्दन की मांसपेशियों का तनाव कम करता है और सही पोस्चर को बढ़ावा देता है।

2. मार्जरी आसन (Cat-Cow Pose)
यह सरल लेकिन प्रभावशाली योगाभ्यास पीठ की लचक बढ़ाने और गर्दन की अकड़न को दूर करने में मदद करता है।

घुटनों और हथेलियों के बल आकर सांस लेते हुए पीठ को नीचे और सिर को ऊपर करें, फिर सांस छोड़ते हुए पीठ को ऊपर और सिर को नीचे झुकाएं। इसे 8-10 बार दोहराएं।

3. वज्रासन में गर्दन घुमाना (Neck Rotation in Vajrasana)
वज्रासन में बैठकर गर्दन को धीरे-धीरे दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं। यह आसन गर्दन की जकड़न को दूर करता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करता है।

4. ताड़ासन (Mountain Pose)
शरीर की मुद्रा को सुधारने और संतुलन बनाए रखने में यह आसन बहुत फायदेमंद है।

सीधे खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर उठाएं और एड़ियों के बल खड़े हो जाएं। पूरी बॉडी को ऊपर की ओर स्ट्रेच करें। यह रीढ़ और गर्दन की प्राकृतिक सीध को पुनः स्थापित करता है।

5. शवासन में योग निद्रा (Yogic Sleep in Shavasana)
तनाव और थकान को दूर करने के लिए शवासन में योग निद्रा सर्वोत्तम है।

पीठ के बल लेटें, आंखें बंद करें और सांस पर ध्यान केंद्रित करें। यह अभ्यास शरीर को गहराई से आराम देता है, तनाव को कम करता है और पोस्चर सुधारने में सहायक होता है।

निष्कर्ष:
गर्दन के पीछे बनने वाला यह उभार केवल शारीरिक नहीं, बल्कि जीवनशैली से जुड़ी एक चेतावनी भी हो सकता है। योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करके न सिर्फ इससे राहत पाई जा सकती है, बल्कि मानसिक शांति और आत्मविश्वास भी प्राप्त किया जा सकता है।

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ब्लड शुगर को रखना है कंट्रोल में? तो इन खाद्य पदार्थों से तुरंत बनाएं दूरी

डायबिटीज आज केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक मौन वैश्विक संकट बन चुकी है। भारत में लगभग 10 करोड़ से अधिक लोग इस रोग से प्रभावित हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। मधुमेह तब होता है जब शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उसका प्रभावी उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। यदि इसे समय पर नियंत्रित न किया जाए, तो यह दिल, किडनी, आंखों और तंत्रिका तंत्र को स्थायी नुकसान पहुँचा सकता है।

इस बीमारी के नियंत्रण में खानपान बेहद महत्वपूर्ण है। कुछ आम दिखने वाले खाद्य पदार्थ भी ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकते हैं। आइए जानते हैं वे चार खाद्य वस्तुएं जिनसे डायबिटीज के रोगियों को खास तौर पर परहेज करना चाहिए।

सफेद चावल और रिफाइंड कार्ब्स
सफेद चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत अधिक होता है, जो ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाता है। इसी तरह सफेद ब्रेड, मैदा से बने बिस्कुट, नूडल्स और पेस्ट्री भी नुकसानदेह हैं। इनकी जगह साबुत अनाज जैसे ब्राउन राइस, ज्वार, बाजरा, और ओट्स को अपनाना चाहिए जो धीरे-धीरे शुगर बढ़ाते हैं।

आलू और तले-मसालेदार सब्जियां
आलू, शकरकंद और मक्के जैसी सब्जियां स्टार्च से भरपूर होती हैं, जिससे शुगर तेजी से बढ़ती है। वहीं ज्यादा तेल और मसाले में बनी सब्जियां भी नुकसान करती हैं। इसके बजाय पालक, पत्ता गोभी, फूलगोभी, लौकी जैसी कम स्टार्च वाली सब्जियां बेहतर हैं।

फास्ट फूड और प्रोसेस्ड स्नैक्स
बर्गर, पिज्जा, चिप्स और पैकेज्ड स्नैक्स ट्रांस फैट, रिफाइंड कार्ब्स और छिपी हुई चीनी से भरे होते हैं। ये न केवल शुगर बढ़ाते हैं, बल्कि मोटापा, हार्ट डिजीज और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा भी बढ़ाते हैं। डायबिटीज के रोगियों को इनसे पूरी तरह परहेज करना चाहिए।

मीठे फल और जूस
आम, अंगूर, केला, लीची जैसे फल प्राकृतिक शर्करा से भरपूर होते हैं, जो शुगर को तेजी से बढ़ाते हैं। वहीं फलों के रस में फाइबर नहीं होता और चीनी ज्यादा होती है। सेब, अमरूद, जामुन, संतरा और पपीता जैसे फल सीमित मात्रा में खाए जा सकते हैं।

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क्या आप भी करना चाहते हैं मोटापा कम? तो अपनी लाइफस्टाइल में करें ये बदलाव, मिलेगा फायदा 

आज मोटापा सिर्फ शरीर की बनावट से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक लाइफस्टाइल डिसऑर्डर बन चुका है, जो दुनियाभर में तेजी से फैल रहा है। भारत जैसे विकासशील देशों में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले रही है, जहां शहरीकरण, खराब खानपान और तनावपूर्ण दिनचर्या ने इसे और बढ़ावा दिया है। मोटापा न केवल शारीरिक असहजता लाता है, बल्कि डायबिटीज, हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और मानसिक तनाव जैसी कई बीमारियों की जड़ भी बनता है।

लोग अक्सर वजन घटाने के लिए जल्दबाजी में कड़े डाइट प्लान और थकाने वाले वर्कआउट चुनते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही वजन फिर से वापस लौट आता है। इसकी बजाय अगर हम छोटे-छोटे लेकिन प्रभावी बदलाव अपनी दिनचर्या में करें, तो न केवल वजन नियंत्रित रहता है, बल्कि स्वस्थ जीवन की ओर भी कदम बढ़ते हैं।

संतुलित भोजन की भूमिका:
मोटापा घटाने की शुरुआत आपके प्लेट से होती है। जरूरी नहीं कि खाना कम करें, लेकिन सही चीजें सही मात्रा में खाएं। जंक फूड, ज्यादा नमक-चीनी और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएं। इसके स्थान पर अपनी डाइट में शामिल करें:

फाइबर से भरपूर साबुत अनाज

हरी सब्जियां और मौसमी फल

प्रोटीन युक्त दालें और नट्स

पर्याप्त मात्रा में पानी (2.5-3 लीटर प्रतिदिन)

खाना धीरे-धीरे और ध्यानपूर्वक चबाएं। इससे जल्दी पेट भरने का अहसास होता है और पाचन भी सुधरता है।

व्यायाम: वजन घटाने का भरोसेमंद तरीका

रोजाना कम से कम 30 मिनट की हल्की लेकिन निरंतर शारीरिक गतिविधि वजन घटाने में बहुत सहायक होती है। अगर जिम नहीं जा सकते, तो:

तेज चलना (ब्रिस्क वॉकिंग)

घर के कामों में सक्रिय रहना

सीढ़ियां चढ़ना

योग और हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग

सप्ताह में 3-4 बार की नियमित एक्सरसाइज मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करती है और शरीर को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखती है।

तनाव और नींद को न करें नजरअंदाज:

कम नींद और ज्यादा तनाव दोनों ही मोटापे के छुपे हुए कारण होते हैं। ये शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ाकर आपकी भूख को असंतुलित कर देते हैं। इसलिए जरूरी है कि:

रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें

डिजिटल डिटॉक्स करें – स्क्रीन टाइम कम करें

मेडिटेशन, डीप ब्रीदिंग और माइंडफुलनेस अपनाएं

पॉजिटिव सोच और शांत दिनचर्या को प्राथमिकता दें

छोटे कदम, बड़े बदलाव:

मोटापा घटाना कोई एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए नियमितता, धैर्य और संतुलन जरूरी है। क्रैश डाइटिंग और एक्सट्रीम एक्सरसाइज से बचें। यदि वजन अधिक हो या मोटापा किसी बीमारी का कारण बन रहा हो, तो डॉक्टर या डायटीशियन से सलाह जरूर लें।

धूम्रपान और शराब का त्याग, नींद में सुधार और हेल्दी आदतें – ये सब मिलकर आपको फिट और हेल्दी लाइफ की ओर ले जाते हैं। शुरुआत छोटे कदमों से करें, नतीजे बड़े मिलेंगे।

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हाई बीपी में चाय पीना सही या गलत? आइये जानते हैं क्या कहते है स्वास्थ्य विशेषज्ञ

चाय भारतीय जीवनशैली का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है, लेकिन हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से पीड़ित लोगों के लिए यह सवाल अक्सर उठता है—क्या चाय पीना सुरक्षित है? क्या इससे ब्लड प्रेशर और ज्यादा बढ़ सकता है या कुछ चाय की किस्में इसके नियंत्रण में मददगार भी साबित हो सकती हैं?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और हालिया अध्ययनों के अनुसार, चाय का असर व्यक्ति की सेहत, उसकी आदतों और चाय के प्रकार पर निर्भर करता है। यानी हर चाय एक जैसी नहीं होती और इसका प्रभाव भी हर किसी पर समान नहीं होता।

शोध क्या कहते हैं?
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक, चाय में मौजूद कैफीन अस्थायी रूप से ब्लड प्रेशर को 5–10 mm Hg तक बढ़ा सकता है। यह उन लोगों के लिए चिंताजनक हो सकता है, जो पहले से हाई बीपी के शिकार हैं। हालांकि, जो लोग नियमित रूप से कैफीन लेते हैं, उनमें इसका प्रभाव सीमित होता है।

दूसरी ओर, कुछ शोधों से यह भी सामने आया है कि ब्लैक टी का लंबे समय तक सीमित सेवन (12 हफ्ते तक) सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर को 2–3 mm Hg तक कम कर सकता है, जिसके पीछे उसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और फ्लेवोनॉयड्स का हाथ होता है।

विशेषज्ञों की सलाह
डॉ. जुगल किशोर, वरिष्ठ चिकित्सक, बताते हैं कि कैफीन, टैनिन जैसे रसायनों के कारण चाय या कॉफी का अत्यधिक सेवन हाई बीपी वालों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। खासकर खाली पेट चाय पीना इस स्थिति में और अधिक दिक्कतें पैदा कर सकता है।

वे कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को पहले से कोई दिक्कत नहीं है, तो सीमित मात्रा में चाय पीना नुकसानदेह नहीं है। लेकिन जिन्हें लगातार उच्च रक्तचाप की समस्या रहती है, उन्हें कैफीन से परहेज करना चाहिए।

सही चाय, सही समय और सही मात्रा
विशेषज्ञ मानते हैं कि चाय पूरी तरह से वर्जित नहीं है, लेकिन इसका सेवन सही मात्रा, सही समय और सही प्रकार की चाय के चयन के साथ किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, ग्रीन टी या हर्बल टी हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं क्योंकि उनमें कैफीन की मात्रा बेहद कम होती है।

सावधानी ज़रूरी
दिन में दो कप से ज्यादा कैफीन युक्त पेय से बचें

ब्लड प्रेशर मापते रहें

खाली पेट चाय से बचें

ग्रीन टी को प्राथमिकता दें

यदि पहले से कोई दिल की बीमारी हो तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें

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कम उम्र में मोटापा बढ़ा सकता है गंभीर बीमारियों का खतरा, आइये जानते हैं इसके कारण और बचाव के उपाय

आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली और तकनीक पर निर्भरता ने बच्चों के स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। मोटापा अब सिर्फ बड़ों की ही नहीं, बल्कि बच्चों की भी एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में बढ़ता वजन न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और सामाजिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। यह टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों से लेकर डिप्रेशन तक का कारण बन सकता है।

बचपन का मोटापा अगर समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो यह जीवनभर की बीमारियों का कारण बन सकता है। इसलिए बच्चों की सेहत को लेकर सजग रहना और छोटी उम्र से ही सही आदतें विकसित करना ज़रूरी है। आइए समझते हैं किन वजहों से बच्चों का वजन बढ़ता है, और किन उपायों से इसे रोका जा सकता है।

बच्चों में बढ़ते मोटापे के कारण

शारीरिक गतिविधि की कमी: ऑनलाइन क्लास, वीडियो गेम्स और मोबाइल की लत बच्चों को घर के भीतर सीमित कर रही है। इससे दौड़-भाग और खेल-कूद में कमी आती है।

फास्ट फूड का बढ़ता चलन: बाहर का खाना, प्रोसेस्ड स्नैक्स, पैकेज्ड ड्रिंक्स और मीठे उत्पाद बच्चों की डाइट में बढ़ रहे हैं, जो वजन बढ़ाने के प्रमुख कारण हैं।

नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या: देर रात जागना और पर्याप्त नींद न लेना भी मोटापे को बढ़ावा देता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर
कम उम्र में बढ़ता वजन आत्मविश्वास की कमी, अकेलेपन और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकता है। समय रहते उचित उपाय न किए जाएं तो यह आगे चलकर अवसाद या सामाजिक बहिष्करण जैसी गंभीर स्थितियों में बदल सकता है।

कैसे रखें बच्चों का वजन कंट्रोल में?

संतुलित आहार: बच्चों के खाने में फल, सब्जियां, दालें और घरेलू पौष्टिक भोजन शामिल करें। जंक फूड की जगह हेल्दी स्नैक्स दें।

नियमित शारीरिक गतिविधि: दिन में कम से कम 30–45 मिनट तक कोई फिजिकल एक्टिविटी जैसे दौड़, खेल, योग या डांस जरूरी है।

स्क्रीन टाइम सीमित करें: मोबाइल, टीवी और लैपटॉप के सामने बिताए समय को नियंत्रित करें।

पूरा आराम और नींद: 7–8 घंटे की अच्छी नींद न केवल बच्चों के विकास के लिए जरूरी है, बल्कि यह वजन नियंत्रण में भी मददगार है।

नाश्ता ज़रूरी: दिन की शुरुआत हेल्दी ब्रेकफास्ट से करें जिसमें दूध, फल और प्रोटीन से भरपूर चीजें शामिल हों।

ये आदतें अभी से अपनाएं

हर दिन बच्चों को बाहर खेलने या वॉक पर ले जाएं।

घर पर ही उन्हें हेल्दी खाना बनाना सिखाएं और परिवार के साथ मिलकर खाएं।

हर हफ्ते एक “नो स्क्रीन डे” रखें, जिसमें डिजिटल डिवाइसेज़ का इस्तेमाल बिल्कुल न हो।

बचपन में मोटापा एक गंभीर समस्या बन चुकी है, लेकिन कुछ छोटे-छोटे बदलाव और सही मार्गदर्शन से इसे रोका जा सकता है। बच्चे स्वस्थ रहेंगे, तभी उनका भविष्य भी स्वस्थ होगा। इसलिए अभी से जागरूक बनें और उन्हें एक बेहतर जीवनशैली की ओर बढ़ाएं।

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खूबसूरती के चक्कर में न करें गलती, रोजाना फाउंडेशन लगाने से हो सकती है स्किन डैमेज

मेकअप आज सिर्फ सौंदर्य बढ़ाने का तरीका नहीं, बल्कि आत्मविश्वास को निखारने का भी जरिया बन चुका है। महिलाओं के साथ अब पुरुष भी डेली रूटीन में फाउंडेशन जैसे प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे त्वचा की खामियां छिप जाती हैं और चेहरा एकसार और चमकदार दिखता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही फाउंडेशन, जिसे आप खूबसूरत दिखने के लिए इस्तेमाल करते हैं, आपकी त्वचा को धीरे-धीरे नुकसान भी पहुंचा सकता है? आइए जानते हैं रोज़ाना फाउंडेशन लगाने से त्वचा को होने वाले नुकसानों के बारे में।

स्किन पोर्स हो सकते हैं बंद
रोजाना फाउंडेशन लगाने से चेहरे के पोर्स बंद हो सकते हैं। इससे त्वचा को सांस लेने में दिक्कत होती है और धीरे-धीरे पिंपल्स, ब्लैकहेड्स और ब्रेकआउट्स की समस्या सामने आने लगती है।

एलर्जी और रैशेज की आशंका
यदि आप कम गुणवत्ता वाले या सस्ते फाउंडेशन का नियमित उपयोग करते हैं, तो उसमें मौजूद हार्श केमिकल्स आपकी त्वचा में जलन, एलर्जी या रैशेज पैदा कर सकते हैं। यह समस्या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों में ज्यादा देखी जाती है।

त्वचा का नेचुरल ऑयल बैलेंस बिगड़ सकता है
बार-बार फाउंडेशन लगाने से त्वचा की नमी खत्म हो सकती है या फिर अतिरिक्त ऑयल बनने लगता है, जिससे स्किन का संतुलन गड़बड़ा जाता है और मुंहासों की संभावना बढ़ जाती है।

चेहरे की प्राकृतिक चमक हो सकती है फीकी
लगातार फाउंडेशन यूज़ करने से त्वचा का नेचुरल ग्लो धीरे-धीरे कम हो जाता है। खासकर जब आप फाउंडेशन को बिना मेकअप रिमूवर के साफ करते हैं या सस्ते प्रोडक्ट का इस्तेमाल करते हैं, तो चेहरा मुरझाया हुआ नजर आता है।

एजिंग के लक्षण जल्दी दिख सकते हैं
यदि फाउंडेशन को सही तरीके से न हटाया जाए, तो यह त्वचा की परतों में जमकर स्किन को ऑक्सीजन नहीं लेने देता। इससे समय से पहले बारीक रेखाएं, झुर्रियां और एजिंग के अन्य संकेत दिखाई देने लगते हैं।

अगर आप नियमित रूप से फाउंडेशन का इस्तेमाल करते हैं, तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आप स्किन केयर रूटीन का सही पालन करें, सही प्रोडक्ट चुनें और मेकअप हटाने की प्रक्रिया को हल्के में न लें। तभी आप खूबसूरत दिखने के साथ-साथ त्वचा को स्वस्थ भी रख पाएंगे।

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क्या आप भी हैं थायराइड के मरीज, तो इन सब्जियों से रहें सावधान, वरना बढ़ सकती है दिक्कत 

हमारे गले के पास स्थित थायराइड ग्रंथि देखने में तो बेहद छोटी होती है, लेकिन इसका काम शरीर के कई जरूरी कार्यों को संतुलित करना है। यह ग्रंथि खास हार्मोन बनाती है जो मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा और तापमान नियंत्रण जैसे अहम कार्यों को संचालित करते हैं। जब यह ग्रंथि ठीक से काम नहीं करती, खासकर हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में, तो शरीर में थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना जैसी कई समस्याएं देखने को मिलती हैं।

ऐसी स्थिति में दवाइयों के साथ-साथ सही खान-पान पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी होता है। कई बार कुछ ऐसी सब्जियां, जिन्हें हम हेल्दी मानते हैं, वे भी थायराइड की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। आइए जानते हैं किन सब्जियों और खाद्य पदार्थों को लेकर थायराइड रोगियों को सतर्क रहने की जरूरत है।

गोइट्रोजेनिक सब्जियां
थायराइड रोगियों को विशेष रूप से उन सब्जियों से सतर्क रहना चाहिए, जो गोइट्रोजेनिक गुणों से भरपूर होती हैं। ये सब्जियां आयोडीन के अवशोषण में बाधा डाल सकती हैं, जिससे थायराइड हार्मोन का निर्माण प्रभावित होता है। पत्ता गोभी, फूल गोभी, ब्रोकली, ब्रसेल्स स्प्राउट्स जैसी सब्जियां इस श्रेणी में आती हैं। इनमें मौजूद ग्लूकोसिनोलेट्स नामक यौगिक थायराइड की सक्रियता को धीमा कर सकते हैं।

कच्चा नहीं, पका हुआ ही खाएं
इन सब्जियों में पोषण भरपूर होता है, लेकिन इन्हें कच्चा खाने से गोइट्रोजेनिक प्रभाव ज्यादा हो सकता है। इन्हें उबालकर या भाप में पकाकर खाने से इनमें मौजूद नुकसानदायक यौगिक काफी हद तक निष्क्रिय हो जाते हैं। इसलिए थायराइड के मरीज इनका सेवन सीमित मात्रा में, और केवल अच्छी तरह पका कर करें।

सोया और प्रोसेस्ड फूड से भी सावधानी
कुछ अध्ययन बताते हैं कि सोया उत्पाद भी थायराइड पर प्रभाव डाल सकते हैं। साथ ही प्रोसेस्ड फूड, अधिक नमक, और ग्लूटेन युक्त खाद्य पदार्थ हाशिमोटो जैसी थायराइड स्थितियों में लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए थायराइड रोगी इनका सेवन सोच-समझकर करें।

खान-पान में संतुलन और विशेषज्ञ की सलाह है जरूरी
ध्यान रखें कि थायराइड की बीमारी सिर्फ डाइट से ठीक नहीं हो सकती — यह केवल एक सहायक माध्यम है। अपने भोजन में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ से सलाह लें। खुद से किसी भी पोषक तत्व या सब्जी को पूरी तरह बंद करना शरीर को अन्य तरह की हानि पहुंचा सकता है।

(साभार)


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