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Monsoon Diet Tips: आयुर्वेद के अनुसार बारिश में क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज?

Category Archives: फिटनेस

Monsoon Diet Tips: आयुर्वेद के अनुसार बारिश में क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज?

बरसात के मौसम में आयुर्वेद के अनुसार क्या खाना चाहिए और किन चीजों से बचना चाहिए? जानें मॉनसून डाइट, इम्युनिटी बढ़ाने वाले फूड्स और पाचन को बेहतर रखने के आसान आयुर्वेदिक टिप्स।

बारिश का मौसम अपने साथ ठंडक तो लाता है, लेकिन संक्रमण और पाचन संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ा देता है। आयुर्वेद के अनुसार इस दौरान सही खानपान अपनाकर इम्युनिटी मजबूत रखी जा सकती है और कई मौसमी बीमारियों से बचा जा सकता है।

मॉनसून में क्या खाएं?

  • पुराने अनाज जैसे चावल, गेहूं और जौ का सेवन करें।
  • मूंग दाल को डाइट में शामिल करें, यह पचने में हल्की होती है।
  • उबली और हल्की पकी हुई सब्जियां खाएं।
  • सीमित मात्रा में घी का सेवन करें, यह वात दोष को शांत करने में मदद करता है।
  • गर्म और ताजा भोजन करें।
  • खट्टे, नमकीन और हल्के मसालेदार भोजन का संतुलित सेवन करें।

मॉनसून में किन चीजों से बचें?

  • हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन कम करें।
  • दूध और दूध से बने उत्पादों का अधिक सेवन न करें।
  • फर्मेंटेड (खमीर वाले) खाद्य पदार्थ सीमित मात्रा में लें।
  • डीप फ्राइड और जंक फूड से दूरी बनाएं।
  • कच्चा सलाद खाने से बचें और सब्जियों को अच्छी तरह पकाकर खाएं।

नोट: आयुर्वेदिक सलाह व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ), उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकती है। यदि आपको कोई बीमारी है या विशेष डाइट का पालन कर रहे हैं, तो आयुर्वेदिक चिकित्सक या डॉक्टर की सलाह जरूर लें।


सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं ये 6 हरी पत्तियां, इम्यूनिटी बढ़ाने से लेकर दिल और पाचन तक को मिलता है फायदा

स्वस्थ रहने के लिए फल और सब्जियों का सेवन जरूरी माना जाता है, लेकिन प्रकृति ने हमें कुछ ऐसी औषधीय पत्तियां भी दी हैं जो पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। आयुर्वेद में इन पत्तियों का उपयोग सदियों से विभिन्न बीमारियों की रोकथाम और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता रहा है।

इन हरी पत्तियों में मौजूद विटामिन, मिनरल्स, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत बनाने, तनाव कम करने और हृदय को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं। आइए जानते हैं ऐसी 6 औषधीय पत्तियों के बारे में, जिन्हें अपनी दिनचर्या में सीमित मात्रा में शामिल कर आप कई स्वास्थ्य लाभ पा सकते हैं।

तुलसी के पत्ते: इम्यूनिटी और तनाव दोनों के लिए फायदेमंद

भारतीय घरों में तुलसी का धार्मिक और औषधीय दोनों ही दृष्टि से विशेष महत्व है। तुलसी की पत्तियों में विटामिन ए, सी और के के अलावा कैल्शियम, आयरन, पोटेशियम और कई शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।

नियमित रूप से तुलसी की कुछ पत्तियों का सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो सकती है। इसके अलावा यह तनाव और चिंता को कम करने, पाचन क्रिया को बेहतर बनाने तथा हृदय स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी मददगार मानी जाती है। सर्दी, खांसी और गले की खराश जैसी समस्याओं में भी तुलसी का इस्तेमाल घरेलू नुस्खों में किया जाता है।

नीम के पत्ते: प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर

नीम को प्राकृतिक औषधि कहा जाता है। इसकी पत्तियों में एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मौजूद होते हैं, जो शरीर को कई प्रकार के संक्रमणों से बचाने में सहायक माने जाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार नीम की पत्तियां इम्यूनिटी मजबूत करने, सूजन कम करने, त्वचा को स्वस्थ रखने और दांतों व मसूड़ों की समस्याओं से राहत दिलाने में उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि इसका सेवन सीमित मात्रा में और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

कड़ी पत्ता: स्वाद के साथ सेहत का भी खजाना

भारतीय रसोई में कड़ी पत्ता केवल स्वाद बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य लाभ के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आयरन, कैल्शियम, फाइबर और कई आवश्यक एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार कड़ी पत्ता कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने, पाचन तंत्र को बेहतर बनाने और कब्ज व दस्त जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। इसके अलावा आंखों की सेहत बनाए रखने और बालों के झड़ने की समस्या को कम करने में भी इसे लाभकारी माना जाता है।

पुदीना के पत्ते: पाचन और ताजगी का बेहतरीन स्रोत

पुदीना अपनी ठंडक और ताजगी के लिए जाना जाता है। इसमें विटामिन ए, आयरन, फोलेट, मैंगनीज और कई आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं।

पुदीने का सेवन पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत दिलाने तथा शरीर को तरोताजा महसूस कराने में मदद कर सकता है। इसकी खुशबू तनाव कम करने और मूड बेहतर बनाने में भी सहायक मानी जाती है।

पपीते के पत्ते: एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर

पपीते के पत्तों में विटामिन ए, सी, ई और कई शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। कुछ अध्ययनों में यह देखा गया है कि डेंगू के मरीजों में पपीते की पत्तियों के अर्क का उपयोग प्लेटलेट्स बढ़ाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इस पर अभी और वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है।

इसलिए डेंगू या मलेरिया जैसी बीमारियों में इसे इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह और उचित चिकित्सा सबसे जरूरी है।

पान के पत्ते: सिर्फ स्वाद नहीं, कई औषधीय गुण भी

पान के पत्ते का उपयोग केवल स्वाद के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि आयुर्वेद में इसे कई स्वास्थ्य लाभों के लिए भी जाना जाता है। सीमित मात्रा में साधारण पान के पत्ते का सेवन पाचन सुधारने, मुंह की दुर्गंध कम करने और सर्दी-जुकाम में राहत दिलाने में मददगार माना जाता है।

हालांकि तंबाकू, सुपारी या अन्य हानिकारक पदार्थों के साथ पान का सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।

ध्यान रखें

हालांकि ये सभी पत्तियां औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती हैं, लेकिन किसी भी बीमारी के इलाज के विकल्प के रूप में इनका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यदि आप किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, गर्भवती हैं या नियमित दवाएं ले रहे हैं, तो इनका सेवन शुरू करने से पहले डॉक्टर या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।


दांत दर्द से हैं परेशान? जानिए घर पर राहत पाने के आसान और असरदार उपाय

दांतों में अचानक होने वाला दर्द रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना सकता है। कई बार यह दर्द कुछ समय में ठीक हो जाता है, लेकिन कई मामलों में यह किसी गंभीर दंत समस्या का संकेत भी हो सकता है। ऐसे में दर्द की वजह को समझना और सही समय पर इलाज कराना बेहद जरूरी है। हल्के दर्द की स्थिति में कुछ घरेलू उपाय अस्थायी राहत दिला सकते हैं।

आखिर क्यों होता है दांतों में दर्द?

दांत दर्द के कई कारण हो सकते हैं। सबसे सामान्य वजह दांतों में कैविटी बनना है। जब बैक्टीरिया दांत की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचाते हुए अंदर की नसों तक पहुंच जाते हैं, तो तेज दर्द शुरू हो सकता है। इसके अलावा मसूड़ों में संक्रमण, अक्ल दाढ़ निकलना, दांतों में दरार आना या ठंडे-गरम खाद्य पदार्थों के प्रति संवेदनशीलता भी दर्द की वजह बन सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार दर्द निवारक दवा लेने की बजाय दर्द के वास्तविक कारण का पता लगाना ज्यादा जरूरी है। यदि दर्द लंबे समय तक बना रहे, सूजन हो या पस निकलने लगे तो तुरंत दंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

हल्के दर्द में अपनाए जा सकते हैं ये घरेलू उपाय

लौंग से मिल सकती है अस्थायी राहत

दांत दर्द के घरेलू उपायों में लौंग का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। इसमें मौजूद यूजेनॉल नामक तत्व हल्के दर्द को कम करने और बैक्टीरिया के प्रभाव को घटाने में मदद कर सकता है। दर्द वाले दांत के पास लौंग रखकर धीरे-धीरे चबाना या बहुत कम मात्रा में लौंग का तेल कॉटन की मदद से लगाना कुछ समय के लिए राहत दे सकता है। हालांकि तेल का अधिक उपयोग मसूड़ों में जलन पैदा कर सकता है।

गुनगुने नमक के पानी से करें कुल्ला

गुनगुने पानी में नमक मिलाकर कुल्ला करना मुंह की सफाई बनाए रखने का आसान तरीका माना जाता है। इससे भोजन के कण और बैक्टीरिया हटाने में मदद मिलती है, साथ ही मसूड़ों की हल्की सूजन भी कम हो सकती है। नियमित कुल्ला करने से संक्रमण बढ़ने की संभावना भी घट सकती है।

लहसुन के एंटीबैक्टीरियल गुण

लहसुन में पाया जाने वाला एलिसिन प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल तत्व माना जाता है। शुरुआती संक्रमण की स्थिति में यह बैक्टीरिया की वृद्धि को कम करने में सहायक हो सकता है। लहसुन की एक कली को हल्का कुचलकर प्रभावित दांत के पास कुछ देर रखने से कुछ लोगों को आराम महसूस हो सकता है।

सूजन होने पर करें ठंडी सिकाई

यदि दांत दर्द के साथ गाल या चेहरे पर सूजन भी हो, तो बर्फ को कपड़े में लपेटकर प्रभावित हिस्से के बाहर हल्की सिकाई की जा सकती है। इससे सूजन और दर्द में अस्थायी राहत मिल सकती है। हालांकि यदि दर्द का कारण गंभीर संक्रमण है, तो केवल ठंडी सिकाई पर्याप्त नहीं होती और डॉक्टर से इलाज कराना आवश्यक होता है।

कब डॉक्टर के पास जाना जरूरी है?

अगर दांत का दर्द लगातार कई घंटों या दिनों तक बना रहे, दर्द के साथ बुखार, सूजन या पस दिखाई दे, या खाने-पीने में दिक्कत होने लगे, तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने की बजाय तुरंत दंत चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। समय पर इलाज कराने से संक्रमण को बढ़ने से रोका जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी घरेलू उपाय को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।


क्या पीरियड्स शुरू होने के बाद लड़कियों की हाइट बढ़ना बंद हो जाती है? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

अक्सर माना जाता है कि लड़कियों की हाइट पीरियड्स शुरू होने के साथ ही बढ़ना बंद हो जाती है। अगर किसी लड़की की लंबाई कम हो और उसे जल्दी पीरियड्स आ जाएं, तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है कि अब उसकी हाइट बढ़ेगी या नहीं। हालांकि, यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। आइए जानते हैं कि पीरियड्स और हाइट के बीच क्या संबंध है और किन बातों का ध्यान रखकर बच्चों की बेहतर ग्रोथ सुनिश्चित की जा सकती है।

क्या पीरियड्स के बाद हाइट बढ़ना पूरी तरह रुक जाता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, लड़कियों की लंबाई आमतौर पर 15 से 16 वर्ष की उम्र तक बढ़ती रहती है। हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उनका पहला पीरियड (मेनार्की) किस उम्र में शुरू हुआ।

आमतौर पर लड़कियों में 8 से 13 वर्ष की उम्र के बीच प्यूबर्टी की शुरुआत होती है और 10 से 14 वर्ष के बीच पहला पीरियड आता है। इसके बाद भी हड्डियों की ग्रोथ प्लेट्स कुछ समय तक सक्रिय रहती हैं। इसलिए अधिकांश लड़कियों की हाइट पीरियड्स शुरू होने के बाद करीब 1 से 2 साल तक थोड़ी-बहुत बढ़ सकती है, लेकिन यह बढ़ोतरी आमतौर पर कुछ इंच तक ही सीमित रहती है।

लड़कों और लड़कियों की ग्रोथ में अंतर

लड़कों में प्यूबर्टी सामान्यतः 9 से 14 वर्ष के बीच शुरू होती है और उनकी ग्रोथ स्पर्ट 12 से 15 वर्ष की उम्र में देखने को मिलती है। यही वजह है कि लड़कों की लंबाई अक्सर 17 वर्ष या उससे अधिक उम्र तक बढ़ती रहती है, जबकि लड़कियों में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत पहले पूरी हो जाती है।

लड़कियों की औसत हाइट कितनी होती है?

साल 2018 के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के आंकड़ों के अनुसार, 20 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं की औसत लंबाई लगभग 5 फुट 4 इंच (करीब 162 सेंटीमीटर) होती है।

ध्यान रहे कि यह केवल औसत आंकड़ा है। किसी व्यक्ति की हाइट पर आनुवंशिक (Genetics), पोषण, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य संबंधी कई अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

किन कारणों से रुक सकती है हाइट?

पीरियड्स शुरू होना ही हाइट रुकने का एकमात्र कारण नहीं है। कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी स्थितियां भी बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं, जैसे—

  • ग्रोथ हार्मोन की कमी
  • संतुलित और पौष्टिक आहार की कमी
  • डाउन सिंड्रोम
  • नूनन सिंड्रोम
  • मार्फन सिंड्रोम
  • लंबे समय तक रहने वाली कुछ गंभीर बीमारियां या पोषण संबंधी समस्याएं

हाइट बढ़ाने के लिए क्या करें?

बच्चों की बेहतर ग्रोथ के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन-डी का सेवन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच जरूरी है। यदि बच्चे की लंबाई उम्र के अनुसार सामान्य से काफी कम लग रही हो या ग्रोथ लंबे समय से रुकी हुई दिखाई दे, तो बाल रोग विशेषज्ञ या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से सलाह लेना उचित रहेगा।

निष्कर्ष: पीरियड्स शुरू होने के बाद लड़कियों की हाइट अचानक पूरी तरह रुक नहीं जाती। अधिकांश मामलों में अगले 1-2 वर्षों तक कुछ ग्रोथ होती है, लेकिन इसकी गति धीमी हो जाती है। हाइट पर केवल पीरियड्स नहीं, बल्कि जेनेटिक्स, पोषण और समग्र स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।


धूल-मिट्टी ही नहीं, ये 6 छिपे कारण भी बढ़ा सकते हैं आपकी एलर्जी, डॉक्टर ने बताए बचाव के आसान तरीके

अक्सर लोग मानते हैं कि एलर्जी केवल धूल, मिट्टी या किसी खास खाद्य पदार्थ की वजह से होती है। इसलिए वे इन चीजों से बचने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कई बार पूरी सावधानी बरतने के बावजूद छींकें आना, नाक बंद होना, आंखों में खुजली या त्वचा पर लाल चकत्ते जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद कुछ ऐसे कारण हो सकते हैं, जिन पर आमतौर पर ध्यान नहीं जाता। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ छिपे हुए ट्रिगर्स और उनसे बचने के उपाय।

1. आपका बेडरूम भी हो सकता है वजह

गद्दे, तकिए और चादरों में डस्ट माइट्स (सूक्ष्म जीव) पनप सकते हैं। ये नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर एलर्जी की समस्या बढ़ा सकते हैं।

कैसे पहचानें?

  • सुबह उठते ही लगातार छींकें आना।
  • नाक बंद रहना या आंखों में खुजली होना।

बचाव के उपाय

  • चादर और तकिए के कवर हर सप्ताह लगभग 60°C गर्म पानी में धोएं।
  • बेडरूम में कालीन कम रखें।
  • एलर्जेन-प्रूफ गद्दे और तकिए के कवर का इस्तेमाल करें।

2. एसी और कूलर के गंदे फिल्टर

अगर एयर कंडीशनर या कूलर के फिल्टर समय पर साफ नहीं किए जाते, तो उनमें धूल, फफूंद और अन्य एलर्जी पैदा करने वाले कण जमा हो जाते हैं, जो पूरे कमरे में फैल सकते हैं।

संकेत

  • एसी या कूलर चालू करते ही छींक या सांस लेने में परेशानी बढ़ना।

बचाव

  • हर 1–3 महीने में फिल्टर साफ या बदलें।
  • संभव हो तो बेहतर गुणवत्ता वाले फिल्टर का इस्तेमाल करें।

3. रूम फ्रेशनर और तेज खुशबू वाले प्रोडक्ट

रूम फ्रेशनर, सुगंधित मोमबत्तियां, फैब्रिक सॉफ्टनर, नया पेंट और नया फर्नीचर हवा में ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो संवेदनशील लोगों में एलर्जी के लक्षण बढ़ा सकते हैं।

क्या करें?

  • कमरे में पर्याप्त वेंटिलेशन रखें।
  • तेज खुशबू वाले उत्पादों का सीमित इस्तेमाल करें।
  • नए पेंट या फर्नीचर के बाद कमरे को अच्छी तरह हवादार रखें।

4. प्रोसेस्ड फूड और छिपे हुए एलर्जेन

पैकेट वाले खाद्य पदार्थों में मौजूद कुछ रंग, प्रिजर्वेटिव और फ्लेवरिंग एजेंट संवेदनशील लोगों में एलर्जी जैसी प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं। कुछ लोगों को कच्चे फल या सब्जियां खाने के बाद भी एलर्जी के लक्षण महसूस हो सकते हैं।

बचाव

  • अगर किसी भोजन के बाद बार-बार परेशानी होती है, तो फूड डायरी बनाएं।
  • डॉक्टर की सलाह से जरूरत पड़ने पर एलर्जी टेस्ट कराएं।

5. वायु प्रदूषण

प्रदूषित हवा सांस की नलियों को प्रभावित कर एलर्जी और अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती है। खराब एयर क्वालिटी वाले दिनों में समस्या अधिक हो सकती है।

क्या करें?

  • रोजाना अपने शहर का AQI देखें।
  • प्रदूषण अधिक होने पर बाहर कम निकलें।
  • जरूरत पड़ने पर घर के अंदर एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें।

6. तनाव भी बन सकता है कारण

लगातार मानसिक तनाव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जिससे कुछ लोगों में एलर्जी के लक्षण अधिक महसूस हो सकते हैं।

तनाव कम करने के उपाय

  • पर्याप्त नींद लें।
  • नियमित व्यायाम करें।
  • योग, ध्यान या अन्य तनाव कम करने वाली गतिविधियों को अपनाएं।

कब डॉक्टर से मिलें?

अगर बार-बार छींकें आना, सांस लेने में तकलीफ, त्वचा पर चकत्ते, आंखों में तेज जलन या एलर्जी के लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो स्वयं इलाज करने के बजाय एलर्जी विशेषज्ञ या डॉक्टर से परामर्श लें। सही जांच से एलर्जी के वास्तविक कारण का पता लगाया जा सकता है और उसके अनुसार उपचार शुरू किया जा सकता है।


मानसून में दही खाना सही है या नहीं? जानिए क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

बारिश का मौसम आते ही खानपान को लेकर कई तरह की सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। इन्हीं में से एक सवाल अक्सर लोगों के मन में रहता है कि क्या मानसून के दौरान दही खाना सेहत के लिए फायदेमंद है या इससे सर्दी-जुकाम और कफ जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दही पूरी तरह से नुकसानदायक नहीं है, लेकिन इसका सेवन सही समय और संतुलित मात्रा में करना जरूरी है।

दही प्रोबायोटिक्स से भरपूर खाद्य पदार्थ है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने और आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, बारिश के मौसम में नमी और तापमान में बदलाव के कारण कुछ लोगों का पाचन कमजोर हो सकता है। ऐसे में दही का अधिक या गलत समय पर सेवन परेशानी का कारण बन सकता है।

दही खाने के प्रमुख फायदे
पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मददगार।
आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक।
शरीर को जरूरी पोषक तत्व और ऊर्जा प्रदान करता है।
किन बातों का रखें ध्यान?

विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून में दही का सेवन दिन के समय करना बेहतर माना जाता है। रात में दही खाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ लोगों को पाचन संबंधी दिक्कत या कफ की समस्या हो सकती है। दही में भुना जीरा, काली मिर्च या सेंधा नमक मिलाकर खाने से यह अधिक सुपाच्य हो जाता है। साथ ही हमेशा ताजा और घर का बना दही ही खाना चाहिए।

किन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी?

जिन लोगों को पहले से सर्दी-जुकाम, अस्थमा, एलर्जी या कमजोर इम्यूनिटी की समस्या है, उन्हें दही का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। यदि दही खाने के बाद किसी तरह की परेशानी महसूस हो तो डॉक्टर की सलाह लेना उचित रहेगा।

कुल मिलाकर, मानसून में दही खाना पूरी तरह से वर्जित नहीं है। यदि इसे सही समय, उचित मात्रा और सही तरीके से खाया जाए तो यह शरीर के लिए लाभदायक साबित हो सकता है। वहीं, किसी भी स्वास्थ्य समस्या या विशेष परिस्थिति में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देना जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या आहार संबंधी निर्णय के लिए डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

(साभार)


Full Body Checkup: क्या स्वस्थ व्यक्ति को भी हर साल कराना चाहिए हेल्थ चेकअप? जानिए किन टेस्ट्स की है जरूरत

आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हो गए हैं। हल्की-फुल्की परेशानी होने पर भी कई लोग बिना डॉक्टर की सलाह के ब्लड टेस्ट या फुल बॉडी हेल्थ चेकअप पैकेज बुक करा लेते हैं। वहीं, कुछ लोग हर तीन या छह महीने में पूरे शरीर की जांच कराना अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी हर साल फुल बॉडी चेकअप कराना जरूरी है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ है, तो उसे बार-बार फुल बॉडी चेकअप कराने की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, साल में एक बार कुछ जरूरी स्वास्थ्य जांच जरूर करानी चाहिए। कौन-कौन से टेस्ट कराए जाएं, यह व्यक्ति की उम्र, जीवनशैली, पारिवारिक बीमारी के इतिहास और स्वास्थ्य जोखिम (Risk Profile) पर निर्भर करता है।

साल में एक बार कराएं ये जरूरी टेस्ट

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार कुछ बेसिक हेल्थ टेस्ट जरूर कराने चाहिए। इनमें शामिल हैं—

  • ब्लड प्रेशर (Blood Pressure)
  • ब्लड शुगर (Blood Glucose)
  • लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल जांच)
  • लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT)
  • किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT)
  • थायरॉइड प्रोफाइल
  • हीमोग्लोबिन टेस्ट (एनीमिया की जांच)
  • विटामिन D और विटामिन B12 की जांच

इन जांचों से शरीर में होने वाली कई समस्याओं का शुरुआती चरण में ही पता लगाया जा सकता है, जिससे समय रहते इलाज शुरू करना आसान हो जाता है।

ब्लड टेस्ट के अलावा ये जांच भी हैं जरूरी

विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल ब्लड टेस्ट ही पर्याप्त नहीं हैं। समय-समय पर चेस्ट एक्स-रे और पेट का अल्ट्रासाउंड भी कराया जा सकता है। अल्ट्रासाउंड के जरिए लिवर, किडनी, पित्ताशय और पेट के अन्य अंगों की स्थिति का पता चलता है। इससे फैटी लिवर जैसी समस्याओं की भी शुरुआती पहचान संभव हो सकती है।

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?

जिन लोगों का वजन अधिक है या जो मोटापे से जूझ रहे हैं, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए क्योंकि मोटापा कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है। वहीं, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या अन्य पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर जांच कराते रहना चाहिए, ताकि बीमारी नियंत्रण में रहे और किसी जटिलता से बचा जा सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना जरूरत बार-बार टेस्ट कराने के बजाय संतुलित जीवनशैली, नियमित व्यायाम, पौष्टिक आहार और डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय पर जरूरी जांच कराना ही बेहतर विकल्प है।


बारिश में बच्चों पर सबसे ज्यादा मंडराता है मलेरिया का खतरा, इन शुरुआती लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज

बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है, लेकिन इसके साथ कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। जगह-जगह पानी जमा होने से मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ती है, जिससे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैलने लगती हैं। इनमें मलेरिया बच्चों के लिए विशेष रूप से खतरनाक माना जाता है, क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते लक्षणों की पहचान और उचित इलाज से मलेरिया को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

बच्चों में क्यों अधिक होता है मलेरिया का खतरा?

पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मलेरिया का जोखिम वयस्कों की तुलना में अधिक होता है। इसके पीछे कई कारण हैं—

  • बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती।
  • वे लंबे समय तक बाहर खेलते हैं, जिससे मच्छरों के संपर्क में अधिक आते हैं।
  • छोटे बच्चे अपनी परेशानी या लक्षण स्पष्ट रूप से नहीं बता पाते।
  • कुपोषण या कमजोर इम्युनिटी वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।
  • पहली बार मलेरिया परजीवी के संपर्क में आने पर बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।

अगर घर या आसपास गंदा पानी जमा रहता है या साफ-सफाई की कमी है, तो संक्रमण का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

बच्चों में मलेरिया के शुरुआती लक्षण

शुरुआत में मलेरिया के लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं। ऐसे में इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए—

  • तेज बुखार
  • ठंड लगना और कंपकंपी
  • अत्यधिक पसीना आना
  • सिरदर्द
  • कमजोरी और थकान
  • छोटे बच्चों में लगातार रोना या चिड़चिड़ापन
  • दूध या खाना न खाना
  • सुस्ती और सामान्य गतिविधियों में कमी

यदि बच्चा ऐसे क्षेत्र में रहता है जहां मलेरिया के मामले अधिक हैं, तो इन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

समय पर इलाज न मिलने पर क्या हो सकता है?

इलाज में देरी होने पर मलेरिया गंभीर रूप ले सकता है। इसके कारण—

  • दौरे पड़ सकते हैं।
  • बेहोशी की स्थिति हो सकती है।
  • सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।
  • किडनी और लिवर प्रभावित हो सकते हैं।
  • गंभीर मामलों में शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, समय पर जांच और सही उपचार मिलने पर अधिकांश बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का पूरा कोर्स करना बेहद जरूरी होता है।

बच्चों को मलेरिया से कैसे बचाएं?

  • घर और आसपास पानी जमा न होने दें।
  • बच्चों को पूरी बांह के कपड़े पहनाएं।
  • रात में मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
  • मच्छर भगाने वाली क्रीम या रिपेलेंट का उपयोग करें।
  • घर की नियमित साफ-सफाई रखें।
  • बुखार आने पर स्वयं दवा देने के बजाय तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं।

अस्वीकरण  :  यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि बच्चे को तेज बुखार या मलेरिया जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत योग्य चिकित्सक से संपर्क करें।


क्या टमाटर खाने से बढ़ जाती है किडनी स्टोन की समस्या? जानिए विशेषज्ञों की राय

टमाटर भारतीय रसोई का एक प्रमुख हिस्सा है और इसका उपयोग सब्जी, सलाद, सूप समेत कई व्यंजनों में किया जाता है। हालांकि, किडनी स्टोन (पथरी) से पीड़ित लोगों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या टमाटर का सेवन पथरी को बढ़ा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसका जवाब व्यक्ति की पथरी के प्रकार और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किडनी स्टोन का सबसे सामान्य प्रकार कैल्शियम ऑक्सालेट स्टोन होता है। टमाटर में ऑक्सालेट की थोड़ी मात्रा मौजूद होती है, इसलिए जिन लोगों को बार-बार इस प्रकार की पथरी होती है, उन्हें डॉक्टर सीमित मात्रा में टमाटर खाने की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, अधिकांश लोगों के लिए सामान्य मात्रा में टमाटर का सेवन नुकसानदायक नहीं माना जाता।

टमाटर के बीजों को लेकर भी कई तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक ऐसे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं, जो यह साबित करें कि केवल टमाटर के बीज किडनी स्टोन का कारण बनते हैं। फिर भी, जिन मरीजों को बार-बार पथरी की समस्या होती है, उन्हें चिकित्सकीय सलाह के अनुसार बीज निकालकर टमाटर खाने की सलाह दी जा सकती है।

डॉक्टरों का मानना है कि किडनी स्टोन के हर मरीज को टमाटर पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं होती। सही आहार का निर्णय पथरी के प्रकार, मेडिकल हिस्ट्री और जांच रिपोर्ट के आधार पर किया जाना चाहिए। इसलिए बिना डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के किसी भी खाद्य पदार्थ को आहार से हटाना उचित नहीं है।

किडनी स्टोन से बचाव के लिए पर्याप्त पानी पीना, नमक और प्रोसेस्ड फूड का सीमित सेवन करना, संतुलित आहार अपनाना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना जरूरी है। यदि पहले से पथरी की समस्या है, तो व्यक्तिगत डाइट प्लान के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है.

नोट: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी बीमारी, उपचार या आहार में बदलाव से पहले योग्य चिकित्सक या डाइट विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।


हेल्दी डाइट के बावजूद भी क्यों बढ़ता है बैड कोलेस्ट्रॉल? जानें इसके कारण

आजकल कम उम्र में भी हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है। कई लोग संतुलित और हेल्दी डाइट लेने के बावजूद बढ़ते बैड कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) से परेशान रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे सिर्फ खानपान ही नहीं, बल्कि कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

दिल को स्वस्थ रखने के लिए केवल हेल्दी भोजन करना ही काफी नहीं होता। शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के पीछे आनुवंशिक कारण, निष्क्रिय जीवनशैली, तनाव, नींद की कमी और प्रोसेस्ड फूड जैसी कई आदतें अहम भूमिका निभाती हैं। आइए जानते हैं वे प्रमुख कारण, जिनकी वजह से एलडीएल का स्तर बढ़ सकता है।

1. आनुवंशिक कारण भी बन सकते हैं वजह
कुछ लोगों में हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या परिवार से ही मिलती है। इस स्थिति को फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया कहा जाता है, जिसमें शरीर खून से एलडीएल को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पाता। ऐसे लोगों को नियमित जांच और डॉक्टर की निगरानी में रहना चाहिए।

2. शारीरिक गतिविधि का अभाव
घंटों बैठे रहना और नियमित व्यायाम न करना शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) के स्तर को कम कर सकता है। इससे बैड कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। रोजाना 30 से 45 मिनट की वॉक, योग या किसी भी तरह की फिजिकल एक्टिविटी फायदेमंद साबित हो सकती है।

3. ज्यादा फैट वाला भोजन
घी, मक्खन, तला-भुना भोजन, बेकरी उत्पाद और ट्रांस फैट से भरपूर खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन एलडीएल को बढ़ा सकता है। हेल्दी फैट भी सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा सेवन नुकसानदायक हो सकता है।

4. तनाव और अपर्याप्त नींद
लगातार तनाव रहने से शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो फैट मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं। वहीं पर्याप्त नींद न लेने से शरीर की रिकवरी प्रक्रिया बाधित होती है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए रोजाना 7–8 घंटे की अच्छी नींद लेना जरूरी है।

5. प्रोसेस्ड फूड और छिपी हुई शुगर
पैकेज्ड फूड, मीठे पेय, एनर्जी ड्रिंक्स और इंस्टेंट स्नैक्स में मौजूद अतिरिक्त शुगर, प्रिजर्वेटिव और एडिटिव्स शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स और बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकते हैं। बेहतर होगा कि भोजन में ताजे, प्राकृतिक और कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जाए।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य सलाह पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या उपचार के लिए डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

(साभार)


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