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अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे ?

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अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे ?

रजनीश कपूर
विज्ञापन जगत ने आम जनता के मन में एक बात बिठा दी है कि अंडे शाकाहारी नहीं हैं। अंडे का उपयोग बढ़ाने के लिए इसे प्रोटीन का बढिय़ा स्रेत बताया जाता है। प्रोटीन की मात्रा बहुत सारी शाकाहारी चीजों में भी काफी ज्यादा है पर इस विवाद में नहीं भी पड़ा जाए तो यह तथ्यात्मक रूप से गलत है कि अंडा शाकाहारी है। इसलिए शाकाहारियों के लिए अंडे को लोकप्रिय बनाने के लिए किए जाने वाले प्रचार का उल्टा नारा लगाया जा सकता है – ‘संडे हो या मंडे, कभी न खाओ अंडे’। कोई क्या खाए और क्या नहीं इसमें बहुत कुछ आदमी की अपनी पसंद और जीवनशैली के साथ-साथ कई अन्य बातों पर निर्भर करता है। फिर भी आप जो चीज खाते हैं या किसी कारण से नहीं खाते हैं उसके बारे में आपको आवश्यक जानकारी अवश्य होनी चाहिए।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 100 ग्राम अंडों में जहां 13 ग्राम प्रोटीन होगा, वहीं पनीर में 24 ग्राम, मूंगफली में 31 ग्राम, दूध से बने कई पदाथरे में तो इससे भी अधिक एवं सोयाबीन में 53 ग्राम प्रोटीन होता है। यही तथ्य कैलोरी के बारे में है। जहां 100 ग्राम अंडों में 173 कैलोरी, मछली में 93 कैलोरी व मुर्गे के गोश्त में 194 कैलोरी प्राप्त होती है, वहीं गेहूं व दालों में 300 कैलोरी, सोयाबीन में 350 कैलोरी व मूंगफली में 550 कैलोरी और मक्खन निकले दूध एवं पनीर से लगभग 350 कैलोरी प्राप्त होती है तो हम यह निर्णय ले सकते हैं कि स्वास्थ्य के लिए क्या चीज जरूरी है? यह स्पष्ट करना भी उचित रहेगा कि अधिक कोलेस्ट्रोल शरीर के लिए लाभदायक नहीं है।

100 ग्राम अंडों में कोलेस्ट्रोल की मात्रा 500 मिलीग्राम है और मुर्गी के गोश्त में 60 है तो वही कोलेस्ट्रोल सभी प्रकार के अन्न, फलों, सब्जियों आदि में शून्य है। अमेरीका के विविख्यात विशेषज्ञ डॉ. माइकेल कलेपर का कहना है कि अंडे का पीला भाग विश्व में कोलेस्ट्रोल एवं जमी चिकनाई का सबसे बड़ा स्रेत है जो स्वास्थ्य के लिए घातक है। उन्होंने यह भी साबित किया है कि जो व्यक्ति मांस या अंडे खाते हैं उनके शरीर में ‘रिस्पटरों’ की संख्या में कमी हो जाती है जिससे रक्त के अन्दर कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक हो जाती है। इससे हृदय रोग शुरू हो जाता है और गुर्दे के रोग एवं पथरी जैसी बीमारियों को भी बढ़ावा मिलता है। वास्तविकता यह है कि 1962 में यूनीसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की तथा अंडों को लोकप्रिय बनाने के लिए अनिषेचित (इनफर्टाइल) अंडों को शाकाहारी अंडे (वेजीटेरियन) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया।

1971 में मिशिगन यूनीर्वसटिी (अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ. फिलिप जे. स्केन्ट ने यह सिद्ध किया कि: अनिषेचित अंडे किसी भी प्रकार से शाकाहारी नहीं होते क्योंकि वे न तो पेड़ों पर उगते हैं और न किसी पौधे पर बल्कि वे सब मुर्गी के पेट में से ही उत्पन्न होते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोग के आधार पर यह देखा गया है कि विद्युत धारा के द्वारा अंडों को आंका जा सकता है। अनिषेचित अंडे में निषेचित अंडे की भांति ही यह विद्युत धारा होती है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि निर्जीव वस्तु में कभी भी विद्युत धारा का अंकन नहीं किया जा सकता। विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी प्राणी के जीवन का आधार मात्र लैंगिक प्रजनन क्रिया ही नहीं है बल्कि अलैंगिक प्रजनन के द्वारा भी जीवन हो सकता है जैसे अमीबा और अनेक एककोशीय प्राणी बिना निषेचन क्रिया के उत्पन्न होते रहते हैं। इसी प्रकार से ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ या उसके द्वारा उत्पन्न प्राणी निर्जीव नहीं गिने जा सकते।

सच्चाई यह है कि अंडे दो प्रकार के होते हैं एक वे जिनसे बच्चे निकल सकते हैं तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। मुर्गी यदि मुर्गे के संसर्ग में न आए तो भी जवानी में अंडे दे सकती है। इन अंडों की तुलना स्त्री के रज:स्रव से की जा सकती है। जिस प्रकार स्त्री के मासिक धर्म होता है। उसी तरह मुर्गी के भी यह धर्म अंडों के रूप में होता है। यह अंडा मुर्गी की आंतरिक गंदगी का परिणाम है। मुर्गियां जो अंडे देती हैं वे सब अपनी स्वेच्छा से या स्वभावतया नहीं देतीं! बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फर्मयुलेशन के इंजेक्शन दिए जाते हैं। इन इंजेक्शनों के कारण ही मुर्गियां लगातार अंडे दे पाती हैं। अंडे के बाहर आते ही उसे इन्क्यूबेटर (सेटर) में डाल दिया जाता है ताकि उसमें से 21 दिन की जगह 18 दिनों में ही चूजा बाहर आ जाए।

मुर्गी का बच्चा जैसे ही अंडे से बाहर निकलता है नर तथा मादा बच्चों को अलग-अलग कर लिया जाता है। मादा बच्चों को शीघ्र जवान करने के लिए एक खास प्रकार की खुराक दी जाती है और इन्हें चैबीसों घंटे तेज प्रकाश में रखकर सोने नहीं दिया जाता ताकि ये दिन रात खा-खा कर जल्दी ही रज:स्रव करने लगें और अंडा देने लायक हो जाएं। अब इन्हें जमीन की जगह तंग पिंजरों में रख दिया जाता है। इन पिंजरों में इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती हैं कि वे पंख भी नहीं फडफड़़ा सकतीं। तंग जगह के कारण आपस में चोंचें मारती हैं, जख्मी होती हैं, गुस्सा करती हैं व कष्ट भोगती हैं। जब मुर्गी अंडा देती है तो अंडा जाली में से किनारे पडक़र अलग हो जाता है और उसे अपनी अंडे सेने की प्राकृतिक भावना से वंचित रखा जाता है ताकि वह अगला अंडा जल्दी दे। जिंदगी भर पिंजरे में कैद रहने व चल फिर न सकने के कारण उसकी टांगे बेकार हो जाती हैं। जब उसकी उपयोगिता घट जाती है, तो उसे कत्लखाने भेज दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे हो सकते हैं?


देवेन्द्र यादव चुनावी तैयारी में कहीं आगे निकल चुके

अनिल चतुर्वेदी
दिल्ली में सरकार किसकी बनती है और कौन बनता है दिल्ली का सीएम यह तो बाद की बातें हैं लेकिन सच तो यह भी है कि कांग्रेस या भाजपा में नेता इस मक़सद से तो टिकट की माँग भी नहीं कर रहे और न ही हिम्मत जुटा पा रहे हैं पर हाँ यह ज़रूर है कि पब्लिसिटी और नंबर बनाने या फिर रुतबे के लिए पार्टियों के नेता केजरीवाल के रहते खुद को उनके सामने लाना चाह रहे हैं। नई दिल्ली से जीतने वाला नेता अक्सर सीएम का दावेदार रहा है सो आप पार्टी से पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस विधानसभा से मैदान आ चुके हैं ,कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप को अपना उम्मीदवार बना चुकी है रही बात भाजपा की सो अभी उम्मीदवार तय नहीं है।

दिसंबर के आखरि़ में उम्मीदवार तय किए जाने की उम्मीद है। यह अलग बात है कि पार्टी ने यहाँ से उम्मीदवारी को लेकर कई बार रणनीति बनाई पर नतीजा कुछ नहीं निकला। अब जो सबसे ज़्यादा दावेदारी कर रहे हैं वे हैं पूर्व मुख्यमंत्री स्व: साहिब सिंह वर्मा के बेटे और पूर्व सांसद प्रवेश साहिब सिंह । नेताजी बाहरी दिल्ली से सांसद रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में जिन छह सांसदों के टिकट पार्टी ने काटे थे प्रवेश उनमें से एक हैं। अब पार्टी ने भले प्रवेश के नाम की घोषणा यहाँ से चुनाव लडऩे के लिए नहीं की हो पर नेताजी ने इस विधानसभा की दीवारों को अपने नाम और यहाँ से लडऩे का संकेत देकर पाट दिया है। यही नहीं सोशल मीडिया और अख़बारों में भी इसी तरह की पिछले दिनों खबरें भी छपीं हैं।

बाहरी दिल्ली से ही लोकसभा चुनावों में पार्टी उम्मीदवार को समर्थन देने को लेकर भी अपने ये नेताजी सुर्खयि़ों में रहे थे। और तो और पिछले दिनों कार्यकर्ताओं की मीटिंग में भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए गए कि मानो वे नई दिल्ली से पार्टी उम्मीदवार है और सीएम के दावेदार हों । साथी नेताओं ने तो इस मीटिंग में यहाँ तक कह भी डाला कि उन्हें इन नेताजी को जिताना है पर शायद भाजपा की ज़मीन पर अभी ऐसा कुछ भी नहीं बताया जा रहा है। कि नेताजी उम्मीद हैं भी या नहीं । या यह मानिए कि अभी सिर्फ ख्याली पुलाव वाली बात है। यह ज़रूर है कि नेताजी ने इस मीटिंग में खान-पान की व्यवस्था ज़रूर की थी और नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज इसमें मौजूद थीं।अब भला नेताजी अपने संसदीय क्षेत्र की दस विधानसभाओं में किसी एक से लडक़र बाहर की नई दिल्ली से लडऩे की इच्छा क्यूं जता रहे हैं भाजपा ही नहीं बाक़ी राजनीतिक दलों में भी यह चर्चा का सवाल बना हुआ है।

यूँ नेताजी जाट विरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं पर नई दिल्ली विधानसभा में जाट वोटों की संख्या न के समान मानिए। यहाँ वाल्मीकि,धोबी ,वैश्य दलित, उत्तराखंड के और पंजाबी आदि वोटर तो हैं पर जाट या मुस्लिम वोटरों की संख्या तो बेहद कम है। ऐसे में अपने ये नेताजी किसके दम पर चुनाव का दम भर रहे हैं यह तो राम जाने पर हाँ अगर आकाओं का फ़ैसला साम दाम दंड भेद से जीतने का ही होगा तो बाक़ी तो सभी कुछ नगण्य ही होना है। यह बात दूसरी है कि खुद भाजपा के नेता भी अपने बूते 70 में से 20 से 25 सीटें जीत पाने के दम के साथ केजरीवाल की सरकार एक बार बनते देख रहे हैं। दिल्ली में सरकार किसकी बनती है यह भले इंतज़ार की बात हो लेकिन सरकार बनाने की कोशिश में तो फिलाहल भाजपा से कहीं आगे हैं। आप और भाजपा के ख़िलाफ़ तकऱीबन 60 जगहों पर प्रदर्शन और दिल्ली न्याय यात्रा निकाल कर कांग्रेस ने वोटरों के दिलों में कहीं न कहीं जगह ज़रूर बनाई है। या यूँ कहिए कि अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष देवेन्द्र यादव चुनावी तैयारी में कहीं आगे निकल चुके हैं। विधानसभा की 70 सीटों के लिए अब तक 21 सीटों के उम्मीदवार तय किए जा चुके हैं और दिसंबर के आखरि़ी दिनों में बाक़ी विधानसभाओं के उम्मीदवार तय कर दिए जाने हैं।

यह अलग बात है कि आप पार्टी अपनी तैयारी को लेकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती दिए हुए हैं पर यह भी ज़रूर है कि कांग्रेस दिल्ली की सत्ता में वापिसी के लिए हर कोशिश में लगी है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के साथ ही अड़ानी मामले को लेकर कांग्रेस अब हर रोज़ सडक़ों पर अपनी आवाज़ बुलंद करती दिख रही है। कांग्रेस नेताओं की मानो तो वह अपनी चुनावी तैयारी या दोनों सरकारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा यह बता देना चाहती है कि वह बाक़ी दोनों पार्टियों से कहीं कमतर नहीं है और पूरी मुस्तैदी के साथ दिल्ली जीतने के लिए चुनावी मैदान में उतरेगी। अब भले भाजपा कऱीब तीन दशक का अपना वनवास ख़त्म कर दिल्ली जीतने को बेताब हो पर फिलाहल तो वह आप ही नहीं बल्कि कांग्रेस से भी चुनावी तैयारी में पीछे है। कांग्रेस अगर 21 उम्मीदवार तय कर चुकी है तो आप के 31उम्मीदवार तय किए सजा चुके हैं। दिल्ली की गलियों और चौबारों तक आप के नेता संपर्क किए हुए हैं। महिला सम्मान योजना के तहत आप महिलाओं को हर महीने 2100 रूपये देने का भरोसा देकर अपना वोट बैंक तैयार करने में लगी है। मुफ़्त बिजली पानी ,बसों में मुफ़्त महिलाओं को यात्रा की सुविधा और अब 2100 रूपये की सौग़ात देकर वह भाजपा और कांग्रेस की आँखों की किरकिरी बनी हुई है। पर शहर में आप की चर्चा भी है। अब भाजपा के इरादे क्या हों यह दूसरी बात है पर दूसरे राज्यों में सबसे पहले उम्मीदवार तय करने वाली भाजपा दिल्ली में तो पिछड़ी दिख रही है। चर्चा तो यह भी है कि भाजपा की इस देरी के लिए कहीं न कहीं प्रदेश संगठन में बदलाव की खबर भी चल निकली है। कहा तो जा रहा कि विधानसभा चुनाव एक बड़ा चुनाव है और खास कर इस बार का सो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को बदल कर कोई बड़ा चेहरा सामने लाकर भी चुनावी मैदान में उतर सकती है। लेकिन वो कौन? बस इसी का इंतज़ार है।

यूँ नेताओं को भले मंदिर जाने की फ़ुरसत न होती हो पर चुनावों में उन्हें न सिफऱ् मंदिर जाना याद रहता है बल्कि वे पंडित ,ज्योतिषियों और मौलवियों की गणेश परिक्रमा से भी दूरी नहीं रख पाते हैं। या यूँ कहिए कि जीत के लिए ये कोई भी जतन करने को तैयार रहते हैं। फिर आप पार्टी के एक बड़े नेता कैसे चूकते आखरि़ इस बार सत्ता को लेकर भाजपा से आप-पार लड़ाई जो हैं। पर हाँ नेताजी मंदिर जांए और किसी आम आदमी की आँखें नेताजी से दो-चार हो जांए तो नेताजी का थोड़ा असहज होना भी लाज़मी ही है । ऐसा ही हुआ अपने आप पार्टी नेताजी का। नेताजी मंदिर पहुँचे पंडित जी से मिले ,गपशप हुई और बात आगे चली तो तो नेताज ने पंडित जी से चुनाव जीतने के लिए आशीर्वाद तो माँगा ही साथ ही विद्या भी । आखिर क्या जतन किया और क्या नहीं इसमें घंटा गुजर गया। अब भला ज्योतिषी ने क्या कहा और क्या नहीं यह तोसुनना मुश्किल ही था पर यह ज़रूर सुना गया कि एक तो पुराने विधायकों में बदलाव किया और दूसरे चुनाव चिन्ह या नहीं झाड़ू का रंग भी। भला अब ज्योतिषी की बात नेताजी की समझ में क्यों न आती। भला हो अपने आप पार्टी के उन नेताजी का कि वे ज्योतिषी की बात समझ बैठे।और तभी अब पार्टी हलकों में यह चर्चा शुरू हो ली है कि आप पार्टी के चुनाव चिन्ह और प्रचार सामग्री का रंग यानी झाड़ू और पोस्टर बैनर आदि। का रंग अब जल्दी ही सफ़ेद से काला कर दिया जाना है। यूँ काला रंग तो बुरी नजऱ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। तो आप पार्टी को किसी नजऱ लगती है और उसका नतीजा क्या आता है इंतज़ार इसका रहना ही है,अब यह अलग बात रही कि पार्टी की तरफ़ से यह जानकारी किसी को कब दी जाए।


नदी जोड़ो अभियान, एक सदी का सपना

भूपेन्द्र गुप्ता
नदी जोड़ो अभियान आज चर्चा का विषय है।  इसका श्रेय सभी पार्टियों लेने की कोशिश भी करती हैं लेकिन इन परियोजनाओं का इतिहास 100साल से भी अधिक पुराना है।इस इतिहास को जानकर यह समझा जा सकता है कि सपनों के फलीभूत होने में सैकड़ों साल  की तपस्या शामिल होती है ।इसमें कोई एक व्यक्ति अकेला नहीं है,बल्कि सरकारों के निरंतर और सकारात्मक प्रयास हैं।हालांकि गुलाम भारत मे 1900 के दशक में एक अंग्रेज इंजीनियर आर्थर कॉटन ने भारत की नदियों को जोडऩे की कल्पना की थी ।उसका उद्देश्य था कि नदियों के अतिरिक्त जल से बड़ी-बड़ी नहरें बनाकर जल मार्गों की वृद्धि की जा सकती है जिससे ब्रिटिश सरकार को व्यापारिक सुविधा मिलेगी तथा दक्षिण भारत के तथा उड़ीसा के सूखे से निपटा जा सकेगा और वहां पर अतिरिक्त जल भेज कर उत्पादन में वृद्धि भी की जा सकेगी ।किंतु इसमें आने वाले खर्च को देखकर ब्रिटिश हुकूमत भी आगे नहीं बढ़ी और यह ठंडे बस्ते में चली गई।

देश आजाद हुआ और राष्ट्र निर्माण की योजनायें बननी शुरू हुईं।गरीबी संसाधनों के अभाव और तकनीशियनों की कमी से प्रथमिकताये आगे बढ़ती गईं। आजादी के  लगभग 23 साल बाद जब इंदिरा जी की सरकार में डा़ के एल राव जो कि बांध बनाने वाले इंजीनियर थे,सिंचाई मंत्री बने तब उन्होंने आर्थर काटन के इस सपने से धूल झाड़ी और इंदिरा जी के सामने रखा।कांग्रेस ने 1970 में   इस योजना को नये दृष्टिकोण से जीवित किया।  डा. के एल राव की सोच थी कि जो हिमालयीन नदियां हैं उनमें ग्लेशियरों के पिघलने के कारण गर्मियों में अतिरिक्त जल होता है और बाढ़ आती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियां गर्मियों में सूख जाती हैं और उनमें बरसाती मौसम में बाढ़ आती है अत: हिमालयीन नदियों और  प्रायद्वीपीय नदियों की आपस में जोड़ दिया जाता है तो सूखे के मौसम में जल की उपलब्धता बनी रह सकती है इसे इंटर-वेसिन रिवर लिंकिंग कहा गया।  इंदिरा गांधी ने 1980  में इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए एनडीआरडी की रिपोर्ट तैयार करवाई ।इसकी वित्तीय व्यवस्था बनाने के लिए शुरुआत की गई और उन्होंने 1982 में   नेशनल वाटर डेवलपमेंट अथॉरिटी का निर्माण किया यह नदी जोड़ो अभियान का पहला कदम था।इसके अंतर्गत इंटर-वेसिन नदियों को जोडऩे की योजनाओं पर कार्य शुरू हुआ ।कध्धययन हुए रिपोर्टें तैयार हुईं।

जब 1999 में एनडीए की सरकार आई और अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इसे  उलटकर योजना के पूरे स्वरूप को ही बदल दिया और इंटर-बेसिन परियोजनाओं को इंट्रा-वेसिन परियोजनाओं में बदल दिया किंतु 2003 तक यह विचार स्वरूप लेता इसके पहले ही 2002 में सुप्रीम कोर्ट में इसके विरोध में पीआईएल लग गई ।आगामी चुनाव में बाजपेयी सरकार उलट गई और 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार का गठन हुआ। तब इस परियोजना को फिर वास्तविक स्वरूप  यानि इंटर- बेसिन योजना के रूप में जीवित किया गया तथा सरकार ने इस पर व्यापक अध्ययन करवाया ।

साल 2012 में जब सुप्रीम कोर्ट में यह फैसला दिया कि नदियों के इंटरलिंकिंग का फैसला नीतिगत है और इसे सरकारें ही करें ।तब इस योजना के लिए 2012 से गति प्रदान की गई विभिन्न राज्यों के जल बंटवारे के आपसी समझौते और विवादों के निपटारे, पर्यावरणीय जोखिम एवं इकोसिस्टम को पहुंचने वाले नुकसानों के अध्ययन करते-करते और सुलझाते-सुलझाते 2021 में केन बेतवा योजना को कैबिनेट की स्वीकृति मिली जिसका भूमि पूजन वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया है। इंटर बेसिन नदी जोड़ो परियोजना मूलत आर्थर कॉटन का सपना था जिसे  डॉक्टर केएल राव ने आगे बढ़ाया और इंदिरा गांधी  की सरकार ने इसे संस्थागत स्वरूप प्रदान कर राष्ट्रीय जल विकास अथॉरिटी का निर्माण किया और इस अथॉरिटी ने ही इस कल्पना को जमीन पर उतारने की शुरुआत की ।संसाधन जुटाये, अध्ययन करवाया और यह योजना लगभग  54 साल बाद अब आकार ले रही है ।

आज देश में विकास को एक निरंतर अवधारणा के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है। इसका श्रेय अकेली एनडीए सरकार को देना आर्थर कॉटन के सपने के साथ भी धोखा होगा और डा. के एल राव तथा इंदिरा गांधी की संकल्पना के साथ भी बेईमानी होगी । विकास की योजनाओं की निरंतरता के लिए जिन-जिन लोगों ने काम किया है सभी सरकारों को श्रेय दें इसमें इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेई, मनमोहन सिंह एवं नरेंद्र मोदी सभी शामिल हैं ।सपनों के जमीन पर उतरने की यही सच्चाई है।


मोदी-शाह राज में सब मुमकिन

हरिशंकर व्यास
इस सप्ताह नीतीश कुमार को भारत रत्न देने का कयास सुना तो वही उद्धव ठाकरे ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की। जबकि सरकार ने सर्वत्र अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर का कीर्तन बनाया हुआ है। तो क्यों नहीं मोदी सरकार अपने दिल में बसे डॉ. भीमराव अंबेडकर को दिखाने के लिए इस जनवरी उनके पोते प्रकाश अंबेडकर को भारत रत्न से नवाज देती है? हालांकि कांशीराम, मायावती भी दलितों के आईकॉन हैं!

हां, मोदी-शाह राज में सब मुमकिन है। आखिर यथा राजा तथा प्रजा के सत्य में टके सेर भाजी टके सेर खाजा भी तो हम हिंदुओं का इतिहासजन्य अनुभव है। कुछ भी संभव है! बस, राजा के कान में हेडलाइन’ का मंत्र फूंक जाए। सोचें, अंबेडकर शब्द के मंत्र पर! भाजपा जन्म से आज तक कभी भी अंबेडकर के नाम पर, दलित वोटों से नहीं जीती। हमेशा रामजी, हिंदू वोट, हिंदू राजनीति से जीती। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को न गुजरात में, न बनारस में कभी थोक दलित वोट मिले और न हाल में महाराष्ट्र, झारखंड के चुनावों में मिले। यह भी सत्य है कि संविधान पर हुई बहस में अमित शाह के कहे में कुछ भी गलत नहीं था।

अमित शाह का कहना था- हमारे संविधान को कभी भी अपरिवर्तनशील नहीं माना गया। समय के साथ साथ देश भी बदलना चाहिए। समय के साथ कानून भी बदलने चाहिए और समय के साथ साथ समाज भी बदलना चाहिए।ज्अब ये एक फ़ैशन हो गया है। आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकरज् इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।

भाषण का यह अंश संसद कार्यवाही का हिस्सा है। तब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कान में किसने यह मंत्र फूंका कि राहुल गांधी के इस ट्विट (मनुस्मृति मानने वालों को अंबेडकर जी से तकलीफ़ बेशक होगी ही) से दलित भडक़ेंगे? और भविष्य में प्रधानमंत्री बनने का आपका सपना बिखर जाएगा इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस को अंबेडकर विरोधी करार देने के लिए भाजपा पिल पड़े! तभी संसद परिसर मानों आर-पार की लडाई का पानीपत हुआ। सोचें, बैठक खाने में सावरकर, चाणक्य की तस्वीर लगाए अमित शाह की अंबेडकर पर पहले स्पष्टवादिता, फिर रक्षात्मक, आक्रामक होने की इस राजनीति पर। भला राहुल गांधी, खडग़े के मनुस्मृति के जुमले से भाजपा का क्या कोई वोट खराब होता है? अंबेडकर का पोता प्रकाश अंबेडकर दशकों की दलित राजनीति के बावजूद आज भी जीरो है। मायावती जब तक तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा लगाती थी तब तक सडक़ पर रही और मनुस्मृति के वंशज ब्राह्मणों को हाथी नहीं गणेश का नारा लगा पटाया तो सत्ता में आईं!
ऐसे ही आरएसएस के लाठीधारियों के लिए हमेशा पूजनीय यदि सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर थे और उन्हीं की बदौलत अंतत: हिंदू राजनीति को केंद्र का शासन मिला तो मोदी-शाह को सावरकर के सत्य पर अटल रहना चाहिए था या कांग्रेस पर यह पलट वार करना था कि हम असली अंबेडकरवादी हैं और कांग्रेस ने उन्हें धोखा किया जबकि हमने अंबेडकर को भारत रत्न दिया!

तभी नैरेटिव के अधबीच उद्धव ठाकरे का संघ परिवार को यह थप्पड़ है जो (सावरकर पर राहुल गांधी की टिप्पणी के ताजा संदर्भ में) उन्होंने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की। उन्होंने देश-दुनिया को बताया है कि मोदी राज अंबेडकर, अंबेडकर तो कर रहा है लेकिन जिस हिंदुवाद तथा संघ परिवार की बदौलत मोदी-शाह सत्ता भोग रहे हैं उसके पितामह सावरकर को अभी तक इस मोदी राज ने भारत रत्न क्यों नहीं दिया? अंबेडकर को दिया और उन्हें नहीं दिया तो यह कथित हिंदुत्व, हिंदू राजनीति की अहसानफरामोशी है या नहीं? जब प्रणब मुखर्जी से कर्पूरी ठाकुर तक तमाम लोगों को भारत रत्न बांट दिए तो आरएसएस के हेडगेवार, गोलवलकर को भी बांट देते? ये क्या अंबेडकर, अंबेडकर कर उनसे अपनी वफादारी दिखा रहे हैं? वही यदि अपने सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर का ही नाम ले लिया होता तो कम से कम अपने वंश, अपनी विचारधारा के तो सगे कहलाते!


उस्ताद जाकिर हुसैन अपने प्रशंसकों को आह भरता छोड़ गए

आलोक पराडक़र
उस्ताद जाकिर हुसैन को भारतीय शास्त्रीय संगीत का सुपरस्टॉर कहना गलत न होगा। साधक तो वे तबला के थे, जिसे मुख्यत: संगत वाद्य ही माना गया है, लेकिन उनकी लोकप्रियता सब पर भारी थी। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के संभवत: सर्वाधिक पारिश्रमिक लेने वाले कलाकार थे, उनके कार्यक्रमों के लिए आयोजकों को लंबा इंतजार करना होता था, उनका आकषर्ण ऐसा था कि फिल्मों और विज्ञापनों में भी उन्हें लिया जाता रहा। वे विश्व में भारत के सांस्कृतिक राजदूत भी थे और प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के बाद वे ही थे जिन्होंने विभिन्न देशों में भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाया और एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार किया। ग्रैमी’ जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड में भी उन्होंने भारतीयता का परचम लहराया, लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर होने और अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उनके काम में कहीं समझौता नहीं था। वास्तव में उनमें नाम और काम का संतुलन कुछ वैसा ही था जैसा उनके तबले में बाएं और दाएं का। उनकी उपस्थिति जहां समारोहों की सफलता का पर्याय थी, वहीं उनकी संगत से मुख्य कलाकार का कार्यक्रम भी निखर उठता था। लंबे समय की सफलता उनकी विनम्रता को बदल नहीं सकी थी। हंसमुख, हाजिर जवाब और हरदिल अजीज उस्ताद जाकिर हुसैन अपने व्यक्तित्व में भी कृतित्व जैसी खूबसूरती जीवनपर्यत कायम रख सके।

तबले को मुख्यत: संगत का वाद्य ही माना गया है, लेकिन उस्ताद जाकिर हुसैन उन कुछ तबला वादकों में थे जिन्होंने इसे एकल और मुख्य वाद्य के रूप में भी स्थापित किया। वे जब लोकप्रिय होने लगे तो पिता के साथ उनकी जुगलबंदी का चलन खूब था। पिता-पुत्र का तबला वादन खूब पसंद किया जाता था। उस्ताद जाकिर हुसैन के एकल वादन की खास बात यह भी होती कि उन्होंने अपने वादन को शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञों के योग्य ही नहीं बनाया बल्कि इसे आम लोगों के लिए भी रुचिकर बना दिया था। जिस प्रकार प्रख्यात कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज अपनी तिहाइयों को दर्शकों को समझाने के लिए तरह-तरह की कथा-प्रसंगों का सहारा लेते थे, कभी चिडिय़ों का उदाहरण देते तो कभी बच्चों के गेंद खेलने का, उस्ताद जाकिर हुसैन भी तबले पर कभी डमरू, कभी मंदिर की घंटी, कभी रेल तो कभी घोड़े की टाप का वादन करते हुए आम लोगों में भी अपनी गहरी पैठ बना लेते थे।

शास्त्र को लोकप्रिय मुहावरे में इस प्रकार ढाल लेने का कौशल उन्हें खूब आता था, लेकिन ऐसा नहीं था कि वे एकल वादन के ही उस्ताद थे। एकल वादन के साथ ही उनकी संगत की भी खूब मांग और धूम थी। वे जब संगत करते तो कार्यक्रमों का एक नया ही रंग बन जाता। पहले प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के साथ और फिर प्रख्यात बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, प्रख्यात संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा, प्रख्यात कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज जैसे कलाकारों के साथ उन्होंने खूब कार्यक्रम किए। शिव-हरि के साथ उनकी संगत खूब फबती थी जिसके कई वीडियो आज भी यू-ट्यूब पर देखे जा सकते हैं। हालांकि उन्होंने हर प्रमुख कलाकार के साथ संगत की, शास्त्रीय संगीत से लेकर सुगम और फिल्म संगीत तक, वरिष्ठ एवं प्रख्यात कलाकार से लेकर युवा और उभरते कलाकारों तक, उन्होंने सबके साथ बजाया।

लोकप्रिय पाश्र्व गायक हरिहरन के साथ गजलों के अलबम में उनकी उपस्थिति साफ नजर आती है। उस्ताद जाकिर हुसैन ने संगत को लेकर अपने दृष्टिकोण से जुड़ा एक बड़ा जरूरी किस्सा एक बार लखनऊ में बताया था। उन्होंने बताया था कि मैं 17 साल का था और पंडित रविशंकर के साथ यात्रा पर था। एक कार्यक्रम हुए, दूसरा कार्यक्रम हुआ, मैंने रविशंकर जी से पूछा कि कैसा हो रहा है? रविशंकर ने कहा कि तुम मेरे साथ तबला बजाते हो लेकिन मुझे देखते क्यों नहीं? उसके बाद शाम को जब कार्यक्रम हुआ तो उस्ताद जाकिर हुसैन पंडित रविशंकर की ओर थोड़ा और घूमकर बैठ गए। उस दिन संगत की एक नई किताब खुल गई। वह पंडित को देखकर बजाने लगे और उन्हें समझ में आने लगा कि संगत कैसे करनी है। वह कहते थे कि जब आपकी तालीम होती है तो आपकी एकल वादन की तालीम होती है। आप सीखी हुई चीजें बजा देंगे और आपकी प्रशंसा हो जाएगी, लेकिन जब तक संगत करना नहीं आएगा तब तक आप तबलिए नहीं बन सकते।

वह यह भी कहते थे कि सभी रंग का तबला आपके तबले में समाहित नहीं है तो आप एक अच्छे संगतकार नहीं बन सकते। सिर्फ दिल्ली का बजाकर, सिर्फ बनारस का बजाकर, सिर्फ पंजाब का बजाकर आप अच्छे संगतकार नहीं बन सकते। हालांकि उस्ताद जाकिर हुसैन कभी भी संगत में हावी होने की कोशिश नहीं करते थे, अपनी लोकप्रियता का दंभ नहीं दिखाते थे,  वे मुख्य कलाकार की जरूरत और सोच के अनुसार ही तबला वादन करते थे लेकिन कई बार ऐसा भी होता था कि उनकी लोकप्रियता पूरे कार्यक्रम में हावी हो जाती थी। ऐसे में यह भी हुआ कि कई कलाकार उनकी लोकप्रियता से आक्रांत होने लगे, उनसे परहेज करने लगे। उस्ताद जाकिर हुसैन भारतीय संगीत के सांस्कृतिक राजदूत भी थे। ज्यादातर प्रसिद्ध कलाकार विदेश में कार्यक्रम करते हैं, कई-कई महीने वहां गुजारते हैं, लेकिन प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के बाद उस्ताद जाकिर हुसैन ही थे जिन्हें विश्व के संगीतप्रेमियों ने सिर-आंखों पर बिठाया। वे लंबे समय से अमेरिका  में ही रहते थे। विभिन्न देशों के संगीत के साथ उनके कार्यक्रम भी खूब होते थे।

इन सबके बावजूद वे भारत में भी लगातार सक्रिय रहते थे। अपने सुदर्शन व्यक्तित्व के कारण उन्हें फिल्मों में अभिनय करने का आमंतण्रमिला था। विज्ञापन में तो वे बहुत पहले ही आ चुके थे। उनके समकालीन मानते थे कि उनकी लोकप्रियता में बड़ा योगदान विज्ञापनों का भी रहा है, जिसके कारण वह घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। वाह उस्ताद उनके नाम से जुड़ गया था, लेकिन अचानक वे अपने प्रशंसकों को आह भरता छोड़ गए।


हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नजारा

श्रुति व्यास
घूमने के सारे ठिकाने, पर्यटन स्थल चाहे कितने ही मनमोहक क्यों न हों, वहां कुंभ की रेलमपेल मची रहती है। जबकि छुट्टियों का एक मकसद भीड़-भाड़ से दूर जाना भी होता है। भारत भर में पूरे साल हर तरह के पर्यटन स्थल-बीच हों या पहाड़, तीर्थ हो या नेशनल पार्क-हमेशा बुक रहते हैं। हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नज़ारा रहता है।
गहरा नीला आसमान और हवा में झूमते ताड़ के वृक्ष। बालकनी से मैं ज़मीन पर बिछी सफ़ेद रेत का अंतहीन सिलसिला देख सकती हूँ। धूप ठीक उतनी गर्म है, जितनी होनी चाहिए। दूर कहीं से समुद्र की लहरों के तट से टकराने की आवाज़ आ रही है। मै अक्सर मनपसिंदा ‘रोज’ पेय की चुस्कियां लेती हूँ और साथ-साथ बीच में चॉकलेट केक के टुकड़े भी मुंह में डालती हूँ। यहाँ की हर सुबह हेमंत जैसी है और हर शाम, वसंत जैसी। यह स्वर्ग है। यहाँ सपने हकीकत बन जाते हैं। यहाँ आनंद ही आनंद है। और मैं यहाँ तब तक रहूंगी जब तक कि सर्दी का मौसम विदा नहीं हो जाता। और फिर मेरी आँख खुल जाती है!

मैं तो दिल्ली में हूँ-जापान में बने गर्म कपडे पहनकर, अंग्रेज़ इंजीनियरों द्वारा डिजाईन किये हुए एयर प्युरिफायर के बगल में। हवा जहरीली है। और आँखें जल रही हैं, नाक बह रही है। मैं ‘रोज़’ नहीं बल्कि ‘काढ़ा’ पी रही हूँ। ‘चॉकलेट केक’ नहीं बल्कि ‘च्यवनप्राश’ खा रही हूँ। खिडक़ी के पास अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ कर आकाश में एक के बाद हवाईजहाजों को उड़ान भरते देख रही हूँ। वे अपने यात्रियों को उन सुन्दर जगहों पर ले जा रहे हैं, जहाँ के बारे में मैं केवल सोच सकती हूँ। हाय री किस्मत! मेरा मन खिन्न हो जाता है।

ईमानदारी की बात तो यह है कि दिल्ली एकदम बेदिल हो गई है। वे चीज़ें जो दिल्ली को एक आकर्षण, एक चरित्र और एक व्यक्तित्व देती थीं, गुमशुदा हैं। यहाँ बहुत ज्यादा लोग हैं, बहुत ज्यादा। हर जगह को खोद डाला गया है, मोहल्लों-सडक़ों  के नाम बदल दिए गए हैं, नल का पानी काला होता है, हवा काली हो गई है। यह शहर अब चाट प्रेमियों का स्वर्ग नहीं रहा। अब यहाँ मोमो का राज है। अजीब सी मूर्तियाँ-बेढब और निरीह सी-कई जगह ऊग आईं हैं। नई उम्र के लडक़े-लड़कियों को वे रील बनाने के लिए एकदम उपयुक्त लगती हैं।

शहर में इतनी भीड़ है कि इटली के दूतावास में बड़े दिन, क्रिसमस के मेले में घुसने पर ऐसा लगता है मानों आप कुम्भ मेले में हों। यह शहर एक समय उत्कृष्ट संस्कृतियों और पाक शैलियों का गुलदस्ता था, उनका मिलन स्थल था। अब यहाँ ज़हर है-हवा में भी और लोगों के दिलों में भी। मैं अपने आप को भाग्यवान मानती हूँ कि मैं उस दिल्ली में पली-बढ़ी जो सदियों से सत्ता का केंद्र थी, जिसकी अपनी शान थी, जो अपने लोगों, अपनी इमारतों और अपने खान-पान के लिए जानी जाती थी। यहाँ की सर्दियों खुशनुमा हुआ करती थी। चमकीली धूप, नीला आकाश और चारों तरफ खिलखिलाते बोगेनविलिया। करीने से छटाई किये हुए पौधों और पेड़ों से भरे पार्कों में हम परिवार या दोस्तों के साथ पिकनिक मनाते, खाना खाते, क्रिकेट और लूडो खेलते या अलसाते हुए अगाथा क्रिस्टी या ब्रोंटी पढ़ते। अचार को सुखाने के लिए छत पर धूप में रखा जाता था, सर्दियों में गर्मी के लिए आलू के चिप्स बनाये जाते थे और माएं बच्चों को जबरदस्ती मूली खिलाती थीं। सैलानी पुरानी दिल्ली की गलियों की ख़ाक छानते थे और इंडिया गेट-जब वह इंडिया गेट हुआ करता था-पर स्थानीय लोगों की भीड़ जुटती थी। शाम की हवा साफ़-सुथरी और ठंडी हुआ करती थी। आप घर में बनी स्वेटरें पहनें अलाव के आसपास बैठकर, हॉट चॉकलेट पीते हुए रेवडिय़ाँ टूंगते थे-कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य हुआ करता था जैसा कि भारतीय फिल्मों में क्रिसमस का दिखाया जाता है।
मगर अब दिल्ली न तो आदर्श राजधानी बची है और ना ही आदर्श शहर। वह ऐसी जगह भी नहीं है जहाँ आप घूमने जा सकते हैं। पार्कों की कटाई-छटाई नहीं होती और वे हँसते-खेलते परिवारों से भरे नहीं रहते। हवा ऐसी नहीं है जो अचार को अचार बना सके और चिप्स को सुखा सके। विदेशी सैलानियों के लिए दिल्ली अब गोल्डन ट्रायंगल की यात्रा का एक पड़ाव भर है। स्थानीय लोग शहर से बाहर जाने के लिए आतुर रहते हैं-चाहे वह एक वीकेंड के लिए ही क्यों न हो।

जिस स्वर्ग में होने का सपना मैं देख रही थी, दुर्भाग्यवश, वह बहुत दूर है और इतनी जल्दी वहां जाने का कार्यक्रम बनाना मुमकिन नहीं है। कुल मिलाकर, सर्दियों में फ्रेंच रीविएरा जाने की योजना एक और साल के लिए मुल्तवी! दिल्ली और उसके उदास मौसम, और समुद्र के किनारे गुनगुनी धूप का मज़ा लेने का एक और मौका खो देने पर मेरी झल्लाहट और बड़बड़ाना सुन कर मेरे पिता कुछ गुस्से से बोले, तो तुम गोवा ही चली जाओ। वाह, क्या घिसापिटा मशविरा है, मैंने तुरंत कहा। आप मॉरिशस, सेशेल्स या मालदीव जाने के लिए भी तो कह सकते थे। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और उन्हें समझ आ गया कि मैं सही कह रही हूँ। वैसे मैं बता दूं कि ऐसे मौके कम ही आते हैं!

मैं जानती हूँ कि दिव्य और स्वर्गिक समुद्री बीचों वाले इन देशों के मोदी के भारत से सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं हैं और हमारी सरकार ने ढेर सारे देशी पर्यटन स्थलों के उनसे बेहतर होने के बारे में इतना शोर मचाया है कि गोवा का नाम जुबान पर आ जाना एकदम स्वाभाविक है। मगर समस्या यह है कि हमारे अपने पर्यटन स्थल चाहे कितने ही मनमोहक क्यों न हों, वहां लोगों की रेलमपेल मची रहती है। जबकि क्या छुट्टियां मनाने का एक मकसद भीड़-भाड़ से दूर जाना नहीं होता? मगर फिर भी, अपने मन को बहलाने के लिए मैंने गोवा, पोंडिचेरी, कोवलम, अंडमान-भारत के लगभग सभी समुद्री तट के पर्यटन स्थलों की यात्रा के लिए फ्लाइट और होटलें खोजना शुरू कीं। मगर अफ़सोस, मुझे कहीं भी जाने के लिए फ्लाइट और रुकने के लिए ठीक-ठाक होटल में जगह नहीं दिखी। सब कुछ पहले से ही बुक था-कहीं कोई जगह नहीं है। मैं शायद नीमराना भी नहीं जा पाऊंगी!

और यह साल के इस समय की बात नहीं है। भारत भर में पूरे साल हर तरह के पर्यटन स्थल-बीच हों या पहाड़, तीर्थ हो या नेशनल पार्क-हमेशा बुक रहते हैं। हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नज़ारा रहता है। बहरहाल, एक बार फिर, लगातार पांचवें बरस, मेरा हॉलिडे सीजन दिल्ली में ही कटेगा। हवा और गन्दी होती जाएगी। और चूँकि मेरी कार बीएस-4 है, इसलिए मैं शहर में भी नहीं घूम पाऊँगी। जापान में बने गर्म कपडे पहनकर, अंग्रेज़ इंजीनियरों द्वारा डिजाईन किये हुए एयर प्युरिफायर के बगल में खिडक़ी के पास अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ कर मैं पेड़ों को धूसर रंग ओढ़ते देखूँगी और देखूँगी धूसर आकाश में उड़ान भरते हवाईजहाजों की टिमटिमाती रौशनियाँ। और कहवा के हर घूँट के साथ यहीं सोचूंगी कि काश मैं भी इनमें से किसी जहाज़ में बैठी, नीले आकाश और ताड़ के पेड़ों की दुनिया की तरफ उड़ी जा रही होती।


ईवीएम मुद्दे पर कांग्रेस को पंचर करने का प्रयास

अजीत द्विवेदी
संसद का शीतकालीन सत्र कई मायने में बहुत दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम वाला रहा है। इस सत्र में जो विधायी कामकाज हुए या दोनों सदनों में संविधान पर जो चर्चा हुई वह अपनी जगह है लेकिन जो राजनीति हुई वह ज्यादा दिलचस्प रही। यह पहली बार हुआ कि पूरे सत्र में कांग्रेस सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्ष की पार्टियों के निशाने पर भी रही। कांग्रेस को अलग थलग करने का प्रयास भाजपा की ओर से हो रहा था तो साथ साथ विपक्षी गठबंधन की पार्टियों की ओर से भी हो रहा था। यह प्रयास इतना व्यवस्थित था कि शुरू में तो कांग्रेस भी नहीं भांप सकी कि जो हो रहा है वह एक डिजाइन के तहत हो रहा है। लेकिन फिर कांग्रेस को समझ में आया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। एक महीने के सत्र में वह अपना एक भी एजेंडा सदन में ठीक से नहीं उठा सकी। सरकार से ज्यादा विपक्ष की पार्टियों ने कांग्रेस के एजेंडे को पंक्चर किया।
कांग्रेस का इस सत्र में सबसे बड़ा एजेंडा अडानी का था। सत्र से ठीक पहले अमेरिकी अदालत में गौतम अडानी और सागर अडानी सहित आठ लोगों के खिलाफ फ्रॉड और घूसखोरी के आरोप लगे थे और वारंट जारी होने की खबर आई थी। इस लिहाज से यह विपक्ष के लिए बड़ा मौका था कि वह केंद्र सरकार को क्रोनी कैपिटलिज्म पर घेरे। कांग्रेस ने यही किया। उसने संसद ठप्प किया और संसद परिसर में प्रदर्शन भी किया। लेकिन दो दिन के बाद ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने अपने को कांग्रेस के प्रदर्शन से अलग कर लिया।

इतना ही नहीं तृणमूल कांग्रेस ने यह भी कह दिया कि वह अडानी के मसले पर संसद ठप्प करने के समर्थन में नहीं है। वह चाहती है कि दूसरे मुद्दों पर संसद में चर्चा हो।
हालांकि ऐसा नहीं है कि अडानी के अलावा दूसरे मुद्दे नहीं उठाए जा रहे थे। लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने अपने राज्य के स्थानीय मुद्दे और मणिपुर का मुद्दा उठाने के नाम पर अपने को कांग्रेस से दूर किया। तृणमूल के यह स्टैंड लेने के करीब एक हफ्ते बाद समाजवादी पार्टी ने भी यही स्टैंड ले लिया। सपा ने भी कह दिया कि वह अडानी के मसले पर कांग्रेस के साथ नहीं है। उसके लिए संभल की शाही मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा का मुद्दा ज्यादा बड़ा था। जिस समय तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अडानी मसले पर कांग्रेस को अलग थलग करने का अपना दांव चला उसी समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपनी जिद में कहा कि कांग्रेस अडानी का मुद्दा नहीं छोडऩे जा रही है।

उनको पता था कि यह मुद्दा सरकार को और भाजपा को सबसे ज्यादा तकलीफ दे रहा है। तभी उन्होंने साफ कर दिया कि संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस यह मुद्दा उठाती रहेगी। उस समय तक संभवत: उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि इस मुद्दे की हवा निकालने के लिए तृणमूल कांग्रेस किस हद तक जाएगी। तृणमूल कांग्रेस का अगला कदम था, सीधे कांग्रेस के नेतृत्व को चुनौती देना और विपक्षी गठबंधन में उसकी ऑथोरिटी को कमजोर करना। इसके लिए सीधे ममता बनर्जी मैदान में उतरीं। पहले कल्याण बनर्जी या काकोली घोष दस्तीदार या दूसरे नेताओं के जरिए बयानबाजी हो रही थी लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती देने की बात आई तो खुद ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने इंडिया’ ब्लॉक का गठन किया था मौका मिले तो वे इसका नेतृत्व करना चाहेंगी। इसके बाद तो पंडोरा बॉक्स खुल गया। ऐसा लगा, जैसे पार्टियां कांग्रेस से भरी बैठी हैं। एक के बाद एक नेताओं ने कांग्रेस से नेतृत्व छीन कर ममता बनर्जी को देने की मांग शुरू कर दी। संजय राउत से लेकर शरद पवार और रामगोपाल यादव से लेकर लालू यादव तक सब ममता की जयकार करने लगे।

रामगोपाल यादव ने कहा कि राहुल विपक्षी गठबंधन के नेता नहीं हैं तो लालू यादव ने कहा कि कांग्रेस के विरोध की परवाह किए बगैर ममता को नेता बनाना चाहिए।
इसके बाद मीडिया में कथित राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा बताया जाने लगा कि ममता बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के क्या क्या फायदे इंडिया’ ब्लॉक को मिल सकते हैँ। जब राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर इससे भी फर्क नहीं पड़ा और वे अडानी का मुद्दा उठाते रहे तब ईवीएम के मुद्दे पर कांग्रेस को पंक्चर करने का प्रयास शुरू हुआ। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि कांग्रेस ईवीएम का रोना बंद करे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जब चुनाव जीत जाती है तो जश्न मनाती है और हारने पर ईवीएम को दोष देती है।

इसके तुरंत बाद ईडी और सीबीआई की जांच में फंसे ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस के ईवीएम विरोध को खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस सबूत पेश करे कि कैसे ईवीएम हैक किया जाता है। अडानी के बाद ईवीएम दूसरा मुद्दा था, जिस पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार के विरोध का पूरा नैरेटिव बनाया था। लेकिन भाजपा के साथ साथ विपक्ष की पार्टियों ने ही इन दोनों मुद्दों को पंक्चर करने का प्रयास किया। सवाल है कि विपक्षी पार्टियों ने कांग्रेस को अलग थलग करने का यह जो प्रयास संसद सत्र में किया उससे कांग्रेस कमजोर हुई, बैकफुट पर गई, अलग थलग हुई या विपक्ष की चुनिंदा पार्टियों की पोल खुली? क्या इससे ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ज्यादा एक्सपोज नहीं हुए हैं? क्या इन दोनों को अंदाजा है कि इनको लेकर क्या नैरेटिव बन रहा है? सहज रूप से यह धारणा बनी है कि देश के सबसे अमीर कारोबारी गौतम अडानी ने चाहे जिस तरह से हो इन दोनों नेताओं को अपना बना लिया है। यह भी कहा और माना जा रहा है कि विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां अडानी मसले पर राहुल के अभियान से इसलिए असहज हैं क्योंकि उनको किसी न किसी तरह का लालच है या भय है।

किसको लालच है और किसको भय है, यह अलग चर्चा का विषय है लेकिन हकीकत है कि कांग्रेस को अलग थलग करने के चक्कर में ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के साथ साथ विपक्ष की कई पार्टियों ने अपने को एक्सपोज कर लिया है। असल में इन पार्टियों ने एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया। उनको लगा कि कांग्रेस के एजेंडे को पंक्चर करेंगे तो सरदार खुश होगा, शाबाशी देगा और दूसरे, कांग्रेस को भी अलग थलग कर देंगे तो विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व की राह निष्कंटक बनेगी।
साथ ही वोट की राजनीति में भी कांग्रेस की ओर से पैदा की जा रही चुनौती खत्म होगी। पता नहीं यह लक्ष्य कितना पूरा हुआ लेकिन यह जरूर हुआ कि इन नेताओं ने अपनी जो छवि लडऩे वाले और क्रांतिकारी नेता की बनाई थी वह अब पूंजी के सामने झुकने और सत्ता की ताकत से दबने वाले नेता की हो गई है। कहने को ये पार्टियां अब भी केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ बयानबाजी करेंगी लेकिन उनका कोई खास मतलब नहीं होगा। उसे नूरा कुश्ती ही माना जाएगा।


अब सब विपक्षी दल वापस एकजुट होने लगे

शकील अख़्तर
कांग्रेस और सभी विपक्षी दल इस मुद्दे को छोड़ेंगे नहीं। इंडिया गठबंधन वापस एकजुट होने लगेगा। मगर अमित शाह ने अंबेडकर का मुद्दा ऐसा दिया कि अब सब विपक्षी दल वापस एकजुट होने लगे हैं। बुधवार को संसद में अमित शाह के खिलाफ प्रदर्शन में सब शामिल हुए। राहुल के जाति गणना मुद्दे को भी इससे बल मिलेगा। जाति गणना का सबसे बड़ा फायदा ओबीसी को मिलने वाला है। दलित की आदिवासी की संख्या तो सबको मालूम है।

‘वन नेशन वन इलेक्शन’ का हेडलाईन मेनेजमेंट एक दिन भी नहीं चल सका। भाजपा राहुल की पिच पर फंस गई। मंगलवार की सुबह सारे चुनाव एक साथ का बिल लोकसभा में पेश हुआ और उसी दिन शाम को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में यह कहकर कि एक नया फैशन चला है अंबेडकर अंबेडकर अंबेडकर . ..! अगर इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। राहुल गांधी ने लपक कर इस बात को सही साबित कर दिया कि भाजपा के मन में डा. आंबेडकर और संविधान के लिए कोई सम्मान नहीं है। अमित शाह की टिप्पणी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने, जिन्होंने एक दिन पहले संविधान पर बोलते हुए ही कहा था कि आरएसएस और भाजपा तिरंगे, अशोक चक्र और संविधान से नफरत करती है एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा कि आंबेडकर से भी नफरत करती है।

बुधवार को विपक्ष के सासंदों ने संसद परिसर में अमित शाह माफी मांगों के नारों के साथ प्रदर्शन किया। और उसके बाद अंदर जाकर दोनों सदनों में इस मांग को जोरदार तरीके से उठाया। मोदी सरकार के लिए यह बड़ी मुश्किल आ गई। अभी संविधान पर चर्चा के दौरान उनका सारा फोकस इस बात पर था कि कांग्रेस ने अंबेडकर को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया। मगर अब उसके उपर ही बाबा साहब अंबेडकर के अपमान का सीधा आरोप आ गया है।

अंबेडकर देश के 20 प्रतिशत दलितों के लिए वाकई भगवान का दर्जा रखते हैं। वह उनका संविधान ही है जिसने आरक्षण के जरिए उनके बड़े वर्ग को पीढ़ीगत काम से निकालकर शहरी मध्यम वर्ग बनाया। शिक्षा में वजीफा, उनके लिए अलग बनाए गए होस्टल, उच्च शिक्षा में आरक्षित सीटें और फिर नौकरी में आरक्षण ने 75 सालों में वह कर दिखाया जो पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। इसके साथ लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव में आरक्षण ने उन्हें राजनीतिक रुप से मजबूत बनाया। नौकरी के आरक्षण ने आर्थिक ताकत के साथ सामाजिक हैसियत और चुनाव प्रणाली में आरक्षण से सत्ता में भागीदारी दी।

पांच हजार साल तक अछूत बने रहने वाले सारे मानवीय अधिकारों से वंचित देश के इस समुदाय के लिए बाबा साहब आंबेडकर भगवान नहीं तो और क्या हैं? कांग्रेस और समूचे विपक्ष को यह एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया है। खरगे का सवाल है कि क्या अंबेडकर का नाम लेना गुनाह है? खुद दलित समुदाय से आने वाले खरगे ने कहा कि अमित शाह का राज्यसभा में संविधान पर बोलते हुए सवाल था कि क्या अंबेडकर बहुत बड़े आदमी थे? जो अंबेडकर, अंबेडकर करते हो!

कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने कहा कि उनके इस बयान से देश में आग लग जाएगी। उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। और देश से माफी मांगना चाहिए। अंबेडकर दलितों आदिवासियों के भगवान हैं। कांग्रेस महासचिव और खुद दलित समाज से आने वाली कुमारी सैलजा ने कहा कि संविधान हमारा सबसे बड़ी किताब है और बाबा साहब अंबेडकर हमारे भगवान।

दलितों की तरह आदिवासी भी डा. आंबेडकर को अपना उद्धारक मानते हैं। और अन्य पिछड़ा समुदाय ओबीसी जिसकी आबादी 50 प्रतिशत के करीब है भी डा अंबेडकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांत का बड़ा लाभार्थी समूह है। दलित 20 प्रतिशत, आदिवासी 9 प्रतिशत और लगभग 50 प्रतिशत के आसपास ओबीसी इतना बड़ा समूह देश का अंबेडकर के विचारों और उनके बनाए संविधान से लाभान्वित हुआ है। इसलिए खरगे ने कहा कि उनका अपमान देश में आग लगा देगा।

अंबेडकर कितनी बड़ी चीज हैं वह इससे समझिए कि कांग्रेस और भाजपा दोनों समान भाव से उनका नाम लेते हैं। अभी चार दिन संविधान पर चर्चा में उनका ही नाम गुंजता रहा। मायावती, रामविलास पासवान ने उनका नाम लेकर ही अपनी पार्टियां चलाईं। दलितों में उनका नाम ही वोट ही गारंटी है। जब ये दोनों नेता इनकी पार्टी नहीं थीं तो कांग्रेस ही उनकी विरासत संभालती थी। और लंबे समय तक दलित वोटों की एक मात्र प्राप्तकर्ता थी।

मगर बाद में कांशीराम और मायावती ने इसे कांग्रेस से छीना और उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री पद प्राप्त किया। और फिर भाजपा की धर्म की राजनीति ने दलित वोट को मायवती से भी छीन लिया। लेकिन सरकारी नौकरियां नहीं निकलने और इससे उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिलने, तेजी से किए जा रहे नीजिकरण जहां दलितों के लिए नौकरी नहीं थी और डायरेक्ट भर्ती लेटरल एंट्री जिसमें आरक्षण नहीं था के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में यह समुदाय बीजेपी से भी छिटका और कांग्रेस एवं इन्डिया गठबंधन के साथ आया।

यूपी में भाजपा को इसने बहुत बड़ा झटका दिया। लोकसभा में भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिलीं और भाजपा 33 पर रह गई। कांग्रेस को 6 मिलीं। और बसपा जीरो। जबकि पिछले चुनाव 2019 में भाजपा को 61 सीटें मिली थीं। मायावती से मोहभंग के बाद बीजेपी धर्म के नाम पर दलितों को अपने साथ लाई। और भावनात्मक रूप से उनसे संबंध बनाने के लिए वह डा. अम्बेडकर का नाम भी लेने लगी। दलितों का अंबेडकर से बहुत गहरा लगाव है। उनका जीवन अंबेडकर ने बदला। वे उनके लिए मसीहा हैं। अमित शाह का यह कहना कि क्या अंबेडकर अंबेडकर करते हो भाजपा को बहुत मंहगा पड़ेगा।

कांग्रेस और सभी विपक्षी दल इस मुद्दे को छोड़ेंगे नहीं। इंडिया गठबंधन वापस एकजुट होने लगेगा। अभी ईवीएम के मुद्दे पर उमर अब्दुल्ला और टीएमसी कांग्रेस पर हमलावर हो रहे थे। लग रहा था कि बीजेपी की कोशिशें सफल हो रही हैं। इंडिया गठबंधन में फूट पड़ रही है। मगर अमित शाह ने अंबेडकर का मुद्दा ऐसा दिया कि अब सब विपक्षी दल वापस एकजुट होने लगे हैं।

बुधवार को संसद में अमित शाह के खिलाफ प्रदर्शन में सब शामिल हुए। राहुल के जाति गणना मुद्दे को भी इससे बल मिलेगा। जाति गणना का सबसे बड़ा फायदा ओबीसी को मिलने वाला है। दलित की आदिवासी की संख्या तो सबको मालूम है। हर दस साल बाद होने वाली जनगणना जो इस बार अभी तक नहीं हुई में इसकी गिनती होती है। आंकड़े आते हैं। लास्ट 2011 में हुई थी। उसके अनुसार देश में 29 प्रतिशत दलित और आदिवासी हैं। ये अंबेडकर के कट्टर समर्थक हैं।

आरक्षण जिसे अंबेडकर की ही देन कहा जाता है के सबसे बड़े लाभार्थी यही हैं। भाजपा और आरएसएस कभी अंबेडकर के साथ एडजस्ट नहीं कर पाए। उनके बनाए संविधान का भी बहुत विरोध किया। अभी राज्यसभा में ही खरगे ने बताया कि जब संविधान बना तो संघ वालों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अंबेडकर का पुतला जलाया था। उन्होंने सदन में ‘बंच आफ थाट्स किताब’ दिखा कर कहा कि दूसरे सर संघ चालक गुरु गोलवलकर ने इसमें वर्णाश्रम व्यवस्था का समर्थन किया है। और आरक्षण का विरोध। राहुल ने लोकसभा में एक हाथ में संविधान और दूसरे में मनुस्मृति लेकर साफ कहा कि हम संविधान वाले हैं और बीजेपी मनुस्मृति वाली।

यह सब बातें अपना असर कर ही रहीं थीं कि अमित शाह का यह बयान आ गया। सीधा अंबेडकर के खिलाफ। भाजपा के लिए यह बड़ी मुसीबत बन गई। कांग्रेस ने बुधवार को ही देशव्यापी प्रदर्शन किए। दलित राजनीतिक रूप से देश में सबसे जागरूक समुदाय है। उसमें एक बार यह बात पहुंच जाएगी कि भाजपा बाबा साहब का अपमान कर रही है तो फिर कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को कुछ करने की जरूरत नहीं है। वह भाजपा से अपना हिसाब खुद कर लेगी।


वन नेशन, वन इलेक्शन से विकास की नई ऊंचाइयों को हासिल करेगा देश

एस. सुनील
सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हमेशा चलने वाले चुनावों पर विराम लग जाएगा। सरकारों का ध्यान विकास कार्यों की ओर होगा। आचार संहिता की वजह से विकास कार्य ठप्प नहीं होंगे। और सबसे ऊपर हर बार चुनाव में होने वाले बेहिसाब खर्चों पर लगाम लगेगी। चुनाव आयोग से लेकर राजनीतिक दलों का चुनावों पर बेहिसाब खर्च होता है। एक साथ चुनाव से इन खर्चों में कटौती होगी। सुरक्षा बलों को भी लगातार इस राज्य से उस राज्य तक यात्रा करनी पड़ती है। आम लोगों का ध्यान भी चुनाव पर लगा रहता है। यह सब कुछ एक निर्णय से बदल जाएगा।

देश सचमुच बदल रहा है। न सिर्फ बदल रहा है, बल्कि शक्तिशाली हो रहा है। लोकतंत्र सशक्त हो रहा है। वैश्विक स्तर पर देश का मान बढ़ रहा है। देश में आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता आई है। अभी जिस समय देश संविधान अंगीकार करने के 75 साल पूरे होने का उत्सव मना रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक और ऐतिहासिक निर्णय किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक देश, एक चुनाव’ के लिए बनाए गए दो विधेयक को मंजूरी दे दी है। संसद के शीतकालीन सत्र में इसके लिए सरकार दो विधेयक पेश करेगी। इनके जरिए संविधान के अनुच्छेद 82ए, 83, 172 और 327 में संशोधन का प्रस्ताव रखा जाएगा। इससे लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने और लोकसभा व सभी विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़े जरूरी बदलाव किए जाएंगे। केंद्र सरकार ने इससे पहले सितंबर में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट मंजूर कर ली थी, जिसकी सिफारिशों के आधार पर ये विधेयक तैयार किए गए हैं।

रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने सभी संबंधित पक्षों के साथ विचार विमर्श किया था। उनकी समिति के सामने अनेक विपक्षी पार्टियों ने सारे चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का विरोध किया था, लेकिन ज्यादातर पार्टियां इस विचार के समर्थन में थीं। चुनाव आयोग और आम लोगों से भी समिति ने राय ली थी। इसके बावजूद सरकार अपने संपूर्ण बहुमत के दम पर एकतरफा तरीके से इन विधेयकों को नहीं पास कराने जा रही है। सरकार इस मामले में आम राय बनाने का प्रयास कर रही है। इसलिए संविधान संशोधन के विधेयक पेश करने के बाद उसे संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी को भेजा जा सकता है, जहां सभी पार्टियों के सांसद इस पर विचार करेंगे। यह समिति सभी संबंधित पक्षों से सलाह मशविरा करेगी और आम लोगों की राय भी लेगी। उसके बाद सहमति बना कर इसे पास कराया जाएगा। वैसे सरकार जब चाहती तब इसे पास करा सकती थी क्योंकि ये साधारण संशोधन हैं, जिनके लिए संसद में साधारण बहुमत की जरुरत है और राज्यों की विधानसभा से मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी सरकार आम सहमति का रास्ता अपनाएगी।

जिस समय रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति बनाई गई थी तभी से इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष पूछ रहा है कि इसका क्रियान्वयन कैसे होगा? अगर 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ सभी राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव कराने हैं तो अगले चार साल में होने वाले विधानसभा चुनावों का क्या होगा? यह भी पूछा जा रहा है कि अगर लोकसभा और सभी विधानसभाओं का कार्यकाल तय कर दिया जाएगा तो बीच में सरकार ने बहुमत गंवाया या सरकार गिरी तब क्या होगा? क्या वहां राष्ट्रपति शासन लगा रहेगा और अगले लोकसभा चुनाव के साथ ही वहां चुनाव होगा? वैसे इन सभी सवालों का जवाब सरकार की ओर से प्रस्तावित विधेयक में मिल जाएगा। परंतु अगर राजनीतिक पूर्वाग्रह छोड़ दें तो इन सवालों के जवाब बहुत मुश्किल नहीं हैं। कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल बढ़ा कर और कुछ के कार्यकाल घटा कर सभी विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ कराए जा सकते हैं।

जहां तक बीच में सरकार गिरने का सवाल है तो पिछले काफी समय से मध्यावधि चुनाव का चलन समाप्त हो गया है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से दिल्ली के एक अपवाद को छोड़ दें तो किसी राज्य में मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आई है। यह लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है। फिर भी इस संभावना को देखते हुए सकारात्मक अविश्वास प्रस्ताव का प्रावधान किया जा सकता है। यानी सरकार गिरने के साथ ही नई सरकार बनाने का प्रस्ताव भी रखा जाए। इसके बावजूद अगर कहीं सरकार गिरती है और नई सरकार नहीं बनती है तो वहां बचे हुए कार्यकाल के लिए चुनाव कराया जा सकता है। अगर इतने बड़े ऐतिहासिक निर्णय पर अमल करना है तो छोटे छोटे कुछ अपवाद बनाने होंगे।

विपक्ष की ओर से पहले दिन से इस प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है। विपक्ष का विरोध सिर्फ इस कारण से है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इसका प्रस्ताव किया है। विपक्ष को सरकार के हर प्रस्ताव और हर अच्छी पहल का विरोध करना है इसलिए वह विरोध कर रही है। विरोध में विपक्ष की ओर से ऐसे तर्क दिए जा रहे हैं, जिनसे खुद ही विपक्षी पार्टियां कठघरे में खड़ी होती हैं। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां लोकसभा के साथ सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव को लोकतंत्र विरोधी बता रही हैं। प्रश्न है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराना लोकतंत्र विरोधी कैसे है और अगर यह लोकतंत्र विरोधी है तो स्वतंत्रता के बाद करीब 20 साल तक चार लोकसभा चुनाव और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कैसे हुए?

क्या देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के दूसरे नेता लोकतंत्र विरोधी कार्य कर रहे थे? ध्यान रहे आजादी के बाद 1952 में हुए पहले चुनाव से लेकर 1967 के चौथे चुनाव तक देश के सारे चुनाव एक साथ होते थे। उस समय भी अगर कांग्रेस पार्टी ने अपनी संविधान विरोधी सोच में गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों को बरखास्त करना नहीं शुरू किया होता तो आगे भी एक साथ चुनाव की प्रक्रिया चलती रहती। लेकिन कांग्रेस को बरदाश्त नहीं हुआ कि राज्यों में उसको हरा कर गैर कांग्रेसी सरकारें कैसे बन गई हैं। सो, उसने अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करके उन सरकारों को बरखास्त किया, जिसकी वजह से एक साथ चुनाव का चक्र टूट गया। उसके बाद गठबंधन की राजनीति के दौर में केंद्र में और राज्यों में भी एक के बाद एक मध्यावधि चुनाव हुए। कहने की जरुरत नहीं है कि नब्बे के दशक का वह दौर देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए सबसे खराब दौर रहा।

देश उस दौर से निकल आया है। अब राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता है और देश प्रगति के रास्ते पर अग्रसर है। इसलिए अब उससे और आगे बढऩे की जरुरत है। देश की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की मजबूती के लिए अगला चरण सभी चुनाव एक साथ कराने का है। ध्यान रहे भारत में चुनावों का ऐसा चक्र बना हुआ है कि हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं। इस साल लोकसभा चुनाव के साथ चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए और उसके बाद छह महीने में चार और राज्यों के चुनाव हो चुके हैं। अगले साल यानी 2025 में दो राज्यों के चुनाव हैं। उसके अगले साल 2026 में छह राज्यों के चुनाव हैं। उसके अगले साल भी छह राज्यों के चुनाव होने हैं।

इसी तरह साल दर साल चुनाव चलते रहते हैं और चुनाव भले किसी छोटे राज्य का हो लेकिन उस पर राष्ट्रीय दृष्टि लगी रहती है। लोग भी उसमें व्यस्त रहते हैं और विकास के कामकाज या तो ठप्प रहते हैं या उनकी रफ्तार धीमी हो जाती है। राजनीतिक दल संगठनात्मक कार्यों और आम नागरिकों का राजनीतिक, सामाजिक प्रशिक्षण करने की बजाय चुनावों में व्यस्त रहते हैं तो सरकारें सकारात्मक व टिकाऊ विकास के कार्यों की बजाय लोक लुभावन कार्यों में व्यस्त रहती हैं। एक साथ चुनावों के जरिए हर समय चलने वाले चुनावों पर विराम लगाया जा सकेगा और सरकारें टिकाऊ विकास के प्रति ज्यादा समर्पण के साथ काम कर सकेंगी। सरकार जो विधेयक ला रही है उसके मुताबिक लोकसभा के साथ सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव होंगे और उसके एक सौ दिन के अंदर सभी स्थानीय निकायों के चुनाव हो जाएंगे।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हमेशा चलने वाले चुनावों पर विराम लग जाएगा।

सरकारों का ध्यान विकास कार्यों की ओर होगा। आचार संहिता की वजह से विकास कार्य ठप्प नहीं होंगे। और सबसे ऊपर हर बार चुनाव में होने वाले बेहिसाब खर्चों पर लगाम लगेगी। चुनाव आयोग से लेकर राजनीतिक दलों का चुनावों पर बेहिसाब खर्च होता है। एक साथ चुनाव से इन खर्चों में कटौती होगी। सुरक्षा बलों को भी लगातार इस राज्य से उस राज्य तक यात्रा करनी पड़ती है। आम लोगों का ध्यान भी चुनाव पर लगा रहता है। यह सब कुछ एक निर्णय से बदल जाएगा। तभी एक साथ चुनाव कराने का निर्णय ऐतिहासिक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2014 के बाद से देश बदलने वाले जो ऐतिहासिक निर्णय किए हैं यह भी उसी कड़ी का एक महान निर्णय है। इस निर्णय को 2017 में एक देश, एक कर’ यानी वस्तु व सेवा कर, जीएसटी की व्यवस्था लागू करने और 2019 में अनुच्छेद 370 व 35ए को समाप्त कर जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने की श्रेणी में रखा जा सकता है।

यह देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने वाला निर्णय है। सभी पार्टियों, नेताओं, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों को अपने पूर्वाग्रह छोड़ कर इस निर्णय का समर्थन करना चाहिए। इससे देश की अर्थव्यवस्था में भी स्थिरता आएगी और देश विकास की नई ऊंचाइयों को हासिल करेगा।


अडानी पर आरोप डीप स्टेट की साजिश का प्रोपेगेंडा

हरिशंकर व्यास
भारत पूंजीवाद का नया इतिहास रच रहा है! भारत मानों गौतम अडानी का गिरवी हो गया है! यदि अडानी ग्रुप का कोई भी भंडा फूटे तो वह दुश्मन के ‘डीप स्टेट’ की साजिश है! उसकी बात करना, उस पर संसद में बहस चाहना विपक्ष का देशद्रोह है। भारत को अस्थिर बनाना है। सीधे प्रधानमंत्री पर हमला है! सत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ साजिश है! दुनिया की नंबर एक महाशक्ति अमेरिका के ‘डीप स्टेट’ का भारत पर हमला है! इसलिए हम अमेरिका को एक्सपोज करेंगे। अमेरिका से लड़ेंगे।
विपक्ष की बोलती बंद करेंगे। विपक्ष, नेता विपक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी और उस नेहरू-गांधी परिवार को देशद्रोही करार देंगे, जिसने देश को पचास साल चलाया।
यह परिवार अमेरिका, उसकी संस्थाओं, उसकी ‘डीप स्टेट’ का पि_ू है। ये भारत के जगत सेठ गौतम अडानी के खिलाफ इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि इसने अमेरिका और दुनिया के खरबपति पूंजीपतियों को पछाड़ा है।

वे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व-कृतित्व की उस इकलौती उपलब्धि, 140 करोड़ भारतवासियों की आन-बान-शान के विरोधी हैं, जबकि वह सवा सौ करोड़ भूखों के फ्री लंगर की शान है। देश-दुनिया में मोदी की आन है, जिससे भारत सोने की चिडिय़ा बना है। दुनिया में, पूंजीवाद के इतिहास का ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जो अडानी का है। इतिहास में नए पुराने जितने खरबपति-अरबपति हुए हैं उनमें आज तक ऐसा एक भी पूंजीपति नहीं हुआ है जिस पर गोलमाल के आरोप लगे और वह राष्ट्र का गौरव बने! उसकी रक्षा के लिए राष्ट्र, सरकार, संसद सब कुरबान हो तथा विपक्ष या विरोधी भ्रष्टाचार का शोर करें तो ससंद में बहस न हो।  मीडिया खबरें न छापे। और अडानी के लिए सरकार, उसके चेहरे सब वैसी ही जनसंपर्क, लॉबी की भूमिका में हों जैसे कभी धीरूभाई अंबानी के लिए दिल्ली में बालू और टोनी किया करते थे। अंबानी पर भी कई बार बवाल हुए। लेकिन मुझे ध्यान नहीं है कि इंदिरा गांधी, प्रणब मुखर्जी या किसी भी सरकार ने धीरूभाई अंबानी को भारत की आन-बान-शान करार दे कर उनके खिलाफ अमेरिका की ‘डीप स्टेट’ या सीआईए की साजिश बताई हो। या संसद में बहस नहीं होने दी हो। या वाणिज्य, वित्त आदि की किसी भी भूमिका में प्रणब मुखर्जी ने रिलायंस का बचाव किया हो। इसलिए समकालीन इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने अडानी के लिए देश के विपक्ष, राहुल गांधी-सोनिया गांधी, अमेरिका, ‘डीप स्टेट’ आदि पर हमले का जो कर्म किया है वह न केवल पूंजीवाद और आजाद भारत के इतिहास की अनहोनी है, बल्कि यह सवाल भी बनाते हुए है कि अडानी पर हल्ला क्या मोदी सरकार की अस्थिरता है?

ऐसा कैसे है कि गली-गली में शोर अडानी का है और घबराई हुई सरकार है! इतना ही नहीं भाजपा और उसके प्रवक्ता सब अडानी के कारतूस बने हुए हैं! यदि अमेरिकी ‘डीप स्टेट’, अस्थिरता की साजिश, राहुल-सोनिया देशद्रोही, वित्तीय गोलमाल जैसी बातें हैं तो इसके लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस विदेश मंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसों को करनी चाहिए या नहीं? अडानी ग्रुप न भाजपा सदस्य है और न आरएसएस का स्वंयसेवक है। और यदि वह चंदा या गुरू दक्षिणा देता भी हो तब भी वैश्विक बदनामी (याद करें और उन रिपोर्टों को पढ़ें, जिनमें अडानी के ठेके को रद्द करते हुए केन्या की संसद ने कैसी तालियां बजाईं तथा लोगों ने भारतीयों पर कैसी टिप्पणियां कीं) की हकीकत में संघ परिवार उसके लिए क्योंकर लाठी ले कर खड़ा होगा? चाल, चेहरे, चरित्र का कोई लोकलाज नहीं? सोचें, अडानी, हिंडनबर्ग रिपोर्ट, हेज फंड मैनेजर 92 वर्षीय सोरोस की तुकबंदी से भाजपा कह रही है कि सबके पीछे उद्देश्य मोदी सरकार को अस्थिर करना है। कांग्रेस नेतृत्व (राहुल गांधी, सोनिया गांधी) देश और अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने के लिए जॉर्ज सोरोस के पेरोल पर हैं। भारत के खिलाफ गतिविधियों में अमेरिका के डीप स्टेट का हाथ है।
ऐसी कथित भयावह साजिश के बावजूद सरकार से अधिकृत या विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का एक शब्द नहीं बोलना।

अडानी पर आरोप और सीधे अमेरिका की ‘डीप स्टेट’ की साजिश का प्रोपेगेंडा! जबकि हाल में अमेरिकी अदालत ने खालिस्तानी पन्नू की हत्या की साजिश में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, पूर्व रॉ चीफ, ऱॉ एजेंट व एक कारोबारी को समन जारी किया मगर तब तो सरकार और भाजपा ने एक शब्द इनके बचाव में नहीं बोला।
तब अमेरिकी ‘डीप साजिश’ का हल्ला नहीं था। लेकिन अडानी की ऐसी चिंता जो संसद का पूरा सत्र इसलिए कुरबान क्योंकि राहुल गांधी ने अडानी पर लगे आरोपों पर बहस चाही! अमेरिकी अदालत से अडानी ग्रुप को समन है तो भारत के सुरक्षा प्रमुख अजित डोवाल पर भी अमेरिकी अदालत की कारवाई है। एक का कारोबारी-सिविल मामला है तो दूसरा हत्या की साजिश का फौजदारी मुकद्दमा।

सोचें, भारत राष्ट्र-राज्य की आन-बान-शान के लिए कारोबारी-सिविल-भ्रष्टाचार का आरोप अधिक चिंता वाला होना चाहिए या फौजदारी का? प्रधानमंत्री मोदी, सत्तारूढ़ पार्टी को अजित डोवाल एंड पार्टी की रक्षा में संसद में या बाहर यह हल्ला क्या नहीं करना चाहिए था कि अमेरिका की ‘डीप स्टेट’ भारत के खुफिया प्रमुखों को कटघरे में खड़ा कर भारत को अस्थिर कर रही है? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत अडानी की बदनाम गौरव गाथा पर कुरबान है न कि भारत की सुरक्षा के रणबांकुरों (डोवाल एंड पार्टी) का अहसानमंद! इस अंतर से क्या साबित होता है? तभी सोचें, प्रधानमंत्री मोदी के लिए उपयोगी कौन अधिक रहा है? अडानी या डोवाल?


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