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मलेरिया के इलाज के बाद भी रहती है कमजोरी और थकान, इन योगासनों का करे अभ्यास, मिलेगा लाभ

Category Archives: जीवन शैली

मलेरिया के इलाज के बाद भी रहती है कमजोरी और थकान, इन योगासनों का करे अभ्यास, मिलेगा लाभ

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मलेरिया एक जानलेवा बीमारी है जो संक्रमित मादा एनाफिलीज मच्छरों के काटने से फैलती है। आमतौर पर मलेरिया वातावरण में नमी या बरसात के मौसम में जमा पानी के कारण हो सकता है। मलेरिया के मच्छर के काटने के कुछ सामान्य लक्षण हैं, जैसे बुखार, सिरदर्द, उल्टी आना, ठंड लगना, थकान होना, चक्कर आना और पेट में दर्द होना।

मलेरिया के इलाज के लिए करीब दो सप्ताह दवाइयां चलती हैं। हालांकि मलेरिया के इलाज के बाद भी कमजोरी और थकान बनी रहती है। मलेरिया के बाद शरीर बहुत कमजोर हो जाता है। ऐसे में जब दवाइयों से राहत मिल जाए तो धीरे-धीरे शरीर को फिर से ऊर्जा देने के लिए योगासनों का अभ्यास करना बहुत फायदेमंद हो सकता है। इस लेख में कुछ ऐसे योगासन दिए गए हैं जो मलेरिया से ठीक हो रहे मरीजों के लिए बेहद लाभकारी हैं।

वज्रासन

इस आसन के अभ्यास से पाचन ठीक होता है। ये आसन शरीर को आराम देता है और दवाइयों से हुए अपच को दूर करता है। वज्रासन के अभ्यास के लिए घुटनों के बल बैठकर अपने पैरों को पीछे की ओर मोड़ें। पीठ को सीधा रखें और हाथों को घुटनों पर रखें।  गहरी सांस लेते हुए 5-10 मिनट तक इसी स्थिति में बैठें।

भुजंगासन

मलेरिया के मरीजों को थकावट होती है, जिसे दूर करने के लिए भुजंगासन का अभ्यास किया जा सकता है। इससे रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है और ऊर्जा मिलती है। भुजंगासन के अभ्यास के लिए पेट के बल लेटकर हथेलियों को कंधों के नीचे रखें। सांस लेते हुए छाती को ऊपर उठाएं और नजर सामने रहे। कुछ सेकंड इसी मुद्रा में रहने के बाद धीरे से नीचे आएं।

बालासन

बालासन शरीर को विश्राम देता है। तनाव कम करता है और मानसिक ऊर्जा लौटाता है। इसके अभ्यास के लिए घुटनों के बल बैठकर सिर को जमीन पर टिकाएं और हाथों को आगे की ओर फैलाएं।

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शरीर में क्यों होती है कैल्शियम की कमी? आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

शरीर को फिट रखने के लिए हड्डियों का मजबूत होना बहुत आवश्यक माना जाता है। हालांकि लाइफस्टाइल और आहार की गड़बड़ी के कारण कम उम्र में ही हड्डियों से संबंधित समस्याओं का जोखिम तेजी से बढ़ता देखा जा रहा है, कैल्शियम की कमी को इसका एक कारण माना जा सकता है।

भारत में कैल्शियम की कमी एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, अध्ययनों से पता चलता है कि विभिन्न आयु समूहों में लो कैल्शियम की दिक्कत देखी जाती रही है। अध्ययन में पाया गया कि भारत में शहरी क्षेत्र में स्कूल जाने वाले 59.9% बच्चों और किशोरों में कैल्शियम की कमी हो सकती है। कैल्शियम हड्डियों, दांतों, मांसपेशियों, नसों और हृदय के सामान्य कामकाज के लिए बहुत जरूरी खनिज है।

क्यों होती है कैल्शियम की कमी?

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी लोगों को नियमित रूप से आहार में कैल्शियम युक्त चीजों को शामिल करने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कैल्शियम हड्डियों-दांतों से संबंधित लाभ के अलावा हृदय की लय और मांसपेशियों के संकुचन को भी नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण है। क्या आप अपने आहार के माध्यम से इस पोषक तत्व की पूर्ति कर पा रहे हैं?

शरीर में अपर्याप्त कैल्शियम हाइपोकैल्सीमिया नामक स्थिति का कारण बन सकती है। इस समस्या में भ्रम, मांसपेशियों में ऐंठन, हाथ-पैर में सुन्नता और हड्डियों के फ्रैक्चर होने का खतरा अधिक होता है। कैल्शियम की कमी हड्डियों की ताकत को कम कर सकती है और ऑस्टियोपोरोसिस का कारण बन सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, उम्र के साथ शरीर में कैल्शियम का अवशोषण घट जाता है, यही कारण है कि 50 की आयु के बाद वाले लोगों में इसकी महत्वपूर्ण कमी देखी जाती है। इसके अलावा महिलाओं में विशेषकर रजोनिवृत्ति के बाद, एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं।

आहार में डेयरी उत्पादों की कमी या किडनी-लिवर की बीमारी वाले लोग भी कैल्शियम की कमी से परेशान देखे जाते हैं। कुछ बातों का ध्यान रखकर आप शरीर में कैल्शियम की पूर्ति कर सकते हैं।

कैल्शियम के लिए इस बात का भी रखें ध्यान

शरीर में कैल्शियम की पूर्ति के लिए विटामिन-डी वाले आहार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। असल में कैल्शियम को अवशोषित करने के लिए शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता होती है। कैल्शियम हड्डियों के निर्माण और इसकी मजबूती को बनाए रखने में मदद करता है, जबकि विटामिन-डी आपके शरीर में कैल्शियम को प्रभावी ढंग से अवशोषित करने में मदद करता है। इसलिए भले ही आप पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम ले रहे हों, लेकिन विटामिन डी की कमी होने पर यह बेकार हो सकता है।

कैल्शियम के लिए क्या खाएं?

सभी मेवों में से बादाम में सबसे अधिक कैल्शियम होता है। केवल 28 ग्राम बादाम से आप कैल्शियम की दैनिक जरूरतों के 6% की पूर्ति कर सकते हैं। हड्डियों को स्वस्थ रखने के साथ दिमाग के लिए भी बादाम लाभकारी है।

दूध, दही और पनीर जैसे उत्पाद कैल्शियम से भरपूर होते हैं और इसके सेवन से शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम प्राप्त हो सकता है।

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रोजाना दूध का सेवन जरूर करना चाहिए।

दूध से न सिर्फ कैल्शियम मिलता है साथ ही यह पूर्ण आहार भी माना जाता है। रोजाना दूध के साथ बादाम खाने से हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत रखने में विशेष लाभ मिल सकता है।

हरी पत्तेदार सब्जियां सिर्फ आयरन ही नहीं कैल्शियम का भी बेहतर स्रोत हैं। गोभी, पालक और कोलार्ड कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं।

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क्या आप भी लेते हैं ज्यादा स्ट्रेस, अगर हां, तो जान लीजिये इसके नुकसान

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, यही कारण है कि मेंटल हेल्थ की समस्याओं के कारण शारीरिक स्वास्थ्य और शारीरिक समस्याओं के कारण मेंटल हेल्थ पर असर हो सकता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को स्ट्रेस को कंट्रोल रखने की सलाह देते हैं। अगर आप भी तनाव के शिकार हैं तो समय रहते इसे कंट्रोल करने के उपाय कर लीजिए, ये संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्याओं को बढ़ाने वाला हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, स्ट्रेस एक शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया है जो तब होती है जब आप किसी चुनौतीपूर्ण या खतरनाक स्थिति का सामना करते हैं। यह प्रतिक्रिया शरीर को फाइट मोड में ले जाती है, जहां से कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होते हैं और आपको उस समस्या से निपटने में मदद करते हैं।

पर क्या आप जानते हैं कि बहुत अधिक या लंबे समय तक बने रहने वाले तनाव के कारण शरीर में कोर्टिसोल की अधिकता होती है जिसका संपूर्ण स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर हो सकता है।

गड़बड़ तो नहीं रहता है पाचन?

पाचन से संबंधित समस्याओं को आमतौर पर खान-पान और लाइफस्टाइल में गड़बड़ी की दिक्कत के रूप में जाना जाता है, पर क्या आप जानते हैं कि लंबे समय तक बने रहने वाली पाचन की दिक्कतें इस बात का भी संकेत हो सकती हैं कि आप स्ट्रेस का शिकार है?

जॉन्स हॉप्किंस की रिपोर्ट के मुताबिक तनाव का पाचन प्रणाली पर सीधा असर पड़ता है। इतना ही नहीं लंबे समय तक बने रहने वाली स्ट्रेस की समस्या के कारण इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (आईबीएस) और पेप्टिक अल्सर जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। अक्सर एसिडिटी-कब्ज, गैस या अपच बनी रहती है और सामान्य दवाओं से लाभ नहीं मिल रहा है तो ये स्ट्रेस का भी संकेत हो सकता है।

हार्ट बीट बढ़ना भी हो सकता है स्ट्रेस का संकेत

स्ट्रेस का आपके हार्ट हेल्थ पर भी नकारात्मक असर हो सकता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक तनाव की समस्या हृदय रोगों (जैसे हाई ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन तेज़ होना, हार्ट अटैक) का खतरा बढ़ा देती है।

असल में तनाव की स्थिति ब्लड प्रेशर को बढ़ा देती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। वहीं कोर्टिसोल की अधिक कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स को बढ़ाने वाली हो सकती है। ये सभी स्थितियां दिल की बीमारियों का कारण बन सकती हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

क्रॉनिक स्ट्रेस से डिप्रेशन, एंग्जायटी डिसऑर्डर, और नींद की समस्याएं भी बढ़ जाती है। अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग अधिक तनाव में रहते हैं उनमें डिप्रेशन होने का जोखिम अधिक रहता है। इससे दिमाग की कार्यक्षमता और याददाश्त की भी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। डिप्रेशन मेंटल हेल्थ की गंभीर समस्या है जिसका शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर होता है।

स्ट्रेस के कारण होने वाली अन्य समस्या

लंबे समय तक बनी रहने वाली स्ट्रेस की समस्या आपको संपूर्ण स्वास्थ्य को कई और प्रकार से भी प्रभावित करने लगती है।
अमेरिकल साइकोलॉजी एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय तक अगर आप तनाव का शिकार रहते हैं तो ये प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है। इससे संक्रमण, एलर्जी और ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
स्ट्रेस के कारण कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ने से भूख भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि इससे वजन बढ़ने और मोटापे की भी दिक्कत हो सकती है।

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क्या आप भी रात में देर से करते है भोजन? तो हो जाए सावधान, बढ़ सकता है बीमारियों का खतरा 

खान-पान की गड़बड़ी ने कई प्रकार की बीमारियों के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। भोजन के दो पहलू हैं- आप क्या खाते हैं और कब खाते हैं? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अच्छी सेहत चाहते हैं तो हमेशा ऐसी चीजों का सेवन करना चाहिए जिससे शरीर के लिए आवश्यक अधिकतर पोषक तत्वों की पूर्ति हो सके। आहार की पौष्टिकता के साथ आप किस समय भोजन करते हैं इसका भी सेहत पर असर होता है।

आहार विशेषज्ञ कहते हैं, शरीर को स्वस्थ और पाचन क्रिया को बेहतर रखने के लिए भोजन का एक समय निर्धारित करें और रोजाना उसी समय पर ही भोजन करें। रात के भोजन को लेकर और भी सावधानी बरतना जरूरी है। आइए जानते हैं कि रात में खाने का सही समय क्या है? और देर में खाना खाने के क्या नुकसान हो सकते हैं?

रात में देर से भोजन करने के क्या नुकसान हैं?

हाल ही में किए गए अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने पाया कि रात में देर से भोजन करने वाले लोगों में कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम अधिक हो सकता है, इससे मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है। इसी तरह एंडोक्राइन सोसाइटी के जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के मुताबिक, देर से खाना खाने से वजन और रक्त शर्करा का स्तर बढ़ सकता है।

देर से डिनर और वजन बढ़ने की समस्या

पहले अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उन स्थितियों के बारे में जानने की कोशिश की जिनके कारण रात में देर से खाने से मोटापे का खतरा बढ़ सकता है। प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखक फ्रैंक ए जे एल स्कीर कहते हैं,  देर से भोजन करने वाले लोगों में लेप्टिन और ग्रेलिन जैसे भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन्स पर असर देखा गया।

लेप्टिन हार्मोन जो पेट भरा होने का संकेत देता है, इसकी देर से भोजन करने वाले लोगों में विशेष कमी देखी गई। जो लोग रात 11 बजे के बाद भोजन करते हैं  उनमें कैलोरी बर्न की गति भी कम देखी गई जिसके कारण वजन बढ़ने का खतरा भी अधिक देखा गया।

भोजन करने के समय में बदलाव शरीर के सर्केडियन रिदम को प्रभावित कर देता है जिसके कारण इस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।

डायबिटीज का भी हो सकता है खतरा

दूसरे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि देर से खाना खाने से वजन और रक्त शर्करा का स्तर बढ़ सकता है।

जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. जोनाथन सी. जेन कहते हैं अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि देर से खाना खाने वालों में रक्त शर्करा का स्तर अधिक और फैट बर्न की मात्रा कम होती है।  यदि आप अपनी दिनचर्या को सामान्य सर्कैडियन रिदम के साथ लेकर नहीं चलते हैं, तो शरीर में ग्लूकोज का उस तरह से मेटाबॉलिज्म नहीं हो पाता है जो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है।

देर से डिनर करने से टाइप-2 डायबिटीज और इसके कारण होने वाली जटिलताओं का खतरा भी बढ़ जाता है। रात में सोने से 2-3 घंटे पहले डिनर करने से शरीर, इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सक्षम होता है।

अब सवाल उठता है कि फिर डिनर का सही समय क्या है?

अधिकांश विशेषज्ञों और शोध के अनुसार, रात का खाना सोने से कम से कम 2 से 3 घंटे पहले कर लेना चाहिए। अगर आप रात को 10 बजे सोते हैं, तो डिनर 7 से 8 बजे के बीच होना बेहतर माना जाता है। सोने से दो घंटे पहले खाना खाने से शरीर को भोजन को पचाने के लिए समय मिलता है।

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क्या खाना खाने के बाद आपका भी फूल जाता है पेट? अगर हां, तो आइए जानते हैं इसके पीछे के कारण

पाचन स्वास्थ्य को पूरे शरीर का केंद्र माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर आपका पाचन ठीक है तो ये संकेत है कि आप कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षित हो सकते हैं। हालांकि जिस तरह से हमारी लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी बढ़ती जा रही है, इसका पाचन स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर देखा जा रहा है।

अक्सर गैस-एसिडिटी, हार्ट बर्न या अपच की समस्या बने रहना इस बात का संकेत है कि आपके पेट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ऐसी दिक्कतों का समय रहते डॉक्टर से मिलकर निदान कराना जरूरी है क्योंकि पाचन की समस्याएं कई बार गंभीर बीमारियों का लक्षण भी हो सकती हैं।

क्या खाना खाने के बाद आपका भी पेट फूल जाता है? अगर हां, तो आइए जानते हैं कि इसके पीछे कौन से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं?

पेट फूलने (ब्लोटिंग) की दिक्कत

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, कई बार दैनिक जीवन की कुछ आदतें पेट फूलने (ब्लोटिंग) के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं, जिनको बदलने से ही इसमें राहत मिल जाती है। वहीं कुछ मामलों में ये किसी गंभीर बीमारी का लक्षण भी हो सकता है।

रात के भोजन के बाद कई लोगों को पेट फूलने (ब्लोटिंग) की समस्या हो जाती है। लोग इसे आम समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, हालांकि सही जानकारी और आदतों को अपनाकर पेट फूलने की समस्या से बचा जा सकता है।

क्या हो सकती है इसकी वजह?

आहार विशेषज्ञ कहते हैं, रात के समय भारी-तैलीय और मसालेदार भोजन पचने में ज्यादा समय लेता है, अगर आप इस तरह की चीजें खाते हैं तो ये पाचन के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। इसके कारण पेट में गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। भोजन करते समय जल्दबाजी में खाना खाने से पेट में ज्यादा हवा चली जाती है, इससे भी पेट फूलने की समस्या हो सकती है।

क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. जुगल किशोर कहते हैं, रात का खाना धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबा कर खाएं और भोजन के बाद 10-15 मिनट तक जरूर टहलें। भोजन के बाद थोड़ी देर भी टहलने की आदत बना ली जाए तो इससे पाचन की कई दिक्कतों को कम किया जा सकता है। अपनी डाइट में फाइबर और दही जैसे प्रोबायोटिक फूड शामिल करें, इससे पाचन में सुधार होता है और ब्लोटिंग की दिक्कत भी कम होती है।

इन कारणों पर भी दें ध्यान

पेट फूलने का एक कारण खाना खाने के तुरंत बाद लेट जाना भी है, इसका भी पाचन तंत्र पर अधिक दबाव पड़ता है, जिससे खाना सही से पच नहीं पाता और गैस की समस्या हो जाती है।
अधिक नमक खाना भी शरीर में पानी को रोककर पेट फूलने (ब्लोटिंग) का कारण बन सकता है। इसलिए नमक का कम सेवन करें।
अगर आपका पाचन तंत्र कमजोर है तो रात का खाना पचने में मुश्किल हो सकती है। इसलिए ऐसे आहार का सेवन करें, जो पचने में आसान हो।
आप दलिया या खिचड़ी का सेवन करें। सोडा और कोल्ड ड्रिंक पेट में गैस बढ़ा सकती है, जिससे ब्लोटिंग होती है। सोने से पहले इनका सेवन बिल्कुल न करें।

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बढ़ती गर्मी के साथ क्यों बढ़ रहा डायबिटीज का खतरा, आइये जानते हैं इसके कारण और बचाव के उपाय 

अप्रैल के तीसरे हफ्ते में ही पूर्वी भारत के अधिकतर राज्यों में पारा 40 के पार होने लगा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिस तरह से गर्मी बढ़ती जा रही है और मौसम वैज्ञानिकों का जो पूर्वानुमान है, उसे ध्यान में रखते हुए सभी लोगों को अभी से अलर्ट हो जाने की जरूरत है।

40 से ऊपर जाता तापमान हमारे शरीर को कई प्रकार से प्रभावित करने वाला हो सकता है। बढ़ती गर्मी के साथ शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) और इसके कारण होने वाली समस्याएं तो बढ़ ही जाती है, साथ ही इस तरह का मौसम पहले से ही ब्लड प्रेशर-शुगर के मरीजों के लिए और भी दिक्कतें बढ़ाने वाला हो सकता है।

डॉक्टर्स कहते हैं, बढ़ती गर्मी के साथ डायबिटीज के मरीजों की दिक्कतें भी बढ़ने लगती हैं, आपको बार-बार हाई शुगर की समस्या हो सकती है इसलिए इस मौसम में सेहत को लेकर विशेष सावधानी बरतते रहने की आवश्यकता है।

अब सवाल ये है कि गर्मियों में ब्लड शुगर क्यों बढ़ने लगता है और इसे कंट्रोल में रखने के लिए क्या उपाय करने जरूरी हैं?

डिहाइड्रेशन और हाई शुगर का खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बढ़ती गर्मी का हमारी सेहत पर कई प्रकार से नकारात्मक असर होता है, यही वजह है कि पहले से ही क्रॉनिक बीमारियों जैसे डायबिटीज-ब्लड प्रेशर के शिकार लोगों को इस मौसम में अलर्ट रहना चाहिए।

गर्मी के कारण निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) का जोखिम बढ़ जाता है जो ब्लड शुगर के स्तर में उतार-चढ़ाव का कारण बन सकती है। बढ़ता तापमान इंसुलिन के अवशोषण और इसकी क्रियाशीलता को भी प्रभावित कर देती है।

डॉक्टर बताते हैं कि उच्च रक्त शर्करा के कारण बार-बार पेशाब आता है जिससे निर्जलीकरण होने का जोखिम अधिक हो सकता है। गर्मी के दिनों में शुगर के मरीजों की समस्या बढ़ने के लिए इसे प्रमुख कारण माना जाता है।

डायबिटीज की बढ़ जाती है दिक्कतें

अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन (एडीए) की रिपोर्ट के मुताबिक ब्लड शुगर लो या हाई होना दोनों ही स्थितियों में आपको पसीना अधिक आता है। जिन लोगों का ब्लड शुगर लगातार उच्च बना रहता है, उनके लिए पसीना अधिक आना तंत्रिका क्षति से संबंधित समस्याओं को भी बढ़ाने वाला हो सकता है।

मधुमेह से पीड़ित लगभग आधे लोगों को किसी न किसी रूप में तंत्रिका क्षति का अनुभव होता है। ये आंखों, हृदय से लेकर डायबिटिक फुट जैसी समस्याओं को भी बढ़ाने वाली स्थिति हो सकती है। यही कारण है कि डायबिटीज वाले सभी रोगियों को गर्मी के दिनों में सेहत को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

गर्मियों में शुगर बढ़ने के ये भी हो सकते हैं कारण
गर्मियों में लोग अक्सर बाहर कम निकलते हैं, जिससे व्यायाम या फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है। शारीरिक गतिविधि में कमी ब्लड शुगर कंट्रोल में अहम भूमिका निभाती है।
गर्मी के कारण तनाव का स्तर बढ़ जाता है, जो शरीर में कोर्टिसोल को बढ़ाने लगती है। हाई कोर्टिसोल के कारण भी ब्लड शुगर बढ़ने का जोखिम रहता है।
गर्मियों में लोग अक्सर शुगर वाले कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस और आइसक्रीम का सेवन ज्यादा करते हैं जो ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकते हैं।

गर्मियों में ब्लड शुगर कंट्रोल रखने के उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, गर्मियों में शुगर को कंट्रोल रखने के लिए कुछ उपाय मददगार हो सकते हैं।
रोजाना कम से कम 2-3 लीटर पानी पिएं ताकि डिहाइड्रेशन से बचा जा सके।
सुबह या शाम को जब तापमान कम हो, उस समय वॉक या योग करें।
नींबू पानी (बिना चीनी), नारियल पानी, छाछ आदि का सेवन करें। मीठे ड्रिंक्स से बचें।
गर्मियों में ब्लड शुगर को हफ्ते में कम से कम 3-4 बार मॉनिटर करें, खासकर अगर आप इंसुलिन या दवाइयों पर हैं।
नियमित रूप से डॉक्टर के संपर्क में रहें। अगर शुगर बढ़ा हुआ रहता है तो तुरंत डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

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युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ती जा रही है फैटी लिवर की समस्या, आइये जानते हैं इसके कारण और बचाव के उपाय 

लाइफस्टाइल और आहार की गड़बड़ी ने कई प्रकार की बीमारियों के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। इसका संपूर्ण स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, लिवर-किडनी सहित कई अंगों की बढ़ती बीमारियों के लिए भी इसे एक कारण माना जा सकता है।

लिवर की बढ़ती बीमारियों को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ अलर्ट करते हैं। लिवर से संबंधित समस्याओं पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो इसके जानलेवा दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। लिवर की बढ़ती बीमारियों के बारे में लोगों को अलर्ट करने और इससे बचाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 19 अप्रैल को विश्व लिवर दिवस मनाया जाता है।

डॉक्टर कहते हैं, युवाओं में फैटी लिवर की दिक्कत तेजी से बढ़ती जा रही है। फैटी लिवर (हेपेटिक स्टीटोसिस) होने पर लिवर की कोशिकाओं में अतिरिक्त फैट जमा हो जाता है। सही इलाज न मिलने पर यह बीमारी फाइब्रोसिस, सिरोसिस और यहां तक कि लिवर कैंसर का रूप ले लेती है।

इसके गंभीर मामलों में लिवर सामान्य काम करना बंद कर देता है, जिसके बाद लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है। इस बीमारी का कोई सटीक उपचार नहीं हैं, लेकिन जीवनशैली और खानपान में कुछ बदलाव करके इसके नुकसान को रोकने या ठीक करने में मदद मिल सकती है।

क्यों बढ़ती जा रही है लिवर की ये समस्या

अल्कोहल के अत्यधिक सेवन, मोटापे, हाई कोलेस्ट्रॉल और टाइप-2 डायबिटीज की वजह से फैटी लिवर का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है। इसके अलावा अधिक मात्रा में तेल और वसा युक्त भोजन करने, शरीर का वजन अधिक होने, इंसुलिन प्रतिरोध होने पर, रक्त में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का उच्च स्तर, तेजी से वजन कम होने से भी फैटी लिवर हो सकता है।

कहीं आपको भी तो नहीं हो रही हैं ये दिक्कतें

फैटी लिवर होने पर पेट के ऊपरी दाहिने भाग में हल्का दर्द या बेचैनी महसूस हो सकती है। इसके अलावा पेट में भारीपन और जल्दी थकान एवं कमजोरी महसूस करना, भूख न लगना, त्वचा और आंखों का पीला पड़ना, वजन कम होना, पीलिया, पेट, पैरों और पंजों में सूजन दिखाई दे सकती है। यदि आप इन लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं तो चिकित्सक से सलाह जरूर लें।

फैटी लिवर से बचने के लिए आप फल, सब्जियां, साबुत अनाज, प्रोटीन और स्वस्थ वसा से भरपूर संतुलित आहार का सेवन करें। मीठे पेय पदार्थों, मिठाइयों और उच्च ट्रांस वसा वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें। फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, जैसे- फलियां, और साबुत अनाज लिवर की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इसके अलावा एवोकाडो, नट्स, बीज को आहार में शामिल करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं। अधिक से अधिक ताजा जूस, जैसे- नारियल पानी या नींबू पानी पीएं।

लिवर को स्वस्थ रखने के लिए इन बातों पर भी दें ध्यान

तेजी से वजन घटाने से फैटी लिवर की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए आहार और व्यायाम से प्रति सप्ताह 1-2 पाउंड वजन धीरे-धीरे और स्थायी रूप से घटाने का लक्ष्य रखें। शरीर के वजन में 5-10 प्रतिशत की कमी भी लिवर के स्वास्थ्य में काफी सुधार कर सकती है। इसलिए धीरे-धीरे वजन घटाने के तरीकों को अपनाएं। नियमित व्यायाम, जैसे-तेज चलना, साइकिल चलाना या तैराकी जरूर करें।
अल्कोहल का सेवन न करें। दवाओं का इस्तेमाल निर्देशानुसार करें और उन दवाओं से बचें, जो लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
यदि आपको मधुमेह है तो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखें।
कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित बनाए रखने के लिए आहार, व्यायाम और यदि आवश्यक हो तो दवाओं का इस्तेमाल चिकित्सक की सलाह के बाद करें।
समय-समय पर रक्त परीक्षण से लिवर एंजाइम के स्तर और उसके स्वास्थ्य पर नजर रखने में मदद मिल सकती है।

कम उम्र में ही बढ़ रहा जोखिम

खासकर शहरी क्षेत्रों में। युवाओं में इसके प्रसार के लिए अक्सर खराब आहार, गतिहीन जीवनशैली, मोटापा और आनुवंशिक कारकों के संयोजन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। जब लिवर पर अतिरिक्त वसा का बोझ बढ़ जाता है तो रक्त से विषाक्त पदार्थों को छानने और पोषक तत्वों को संसाधित करने की क्षमता कम हो जाती है। फैटी लिवर से रोगी को दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है।

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डायबिटीज को करना चाहते हैं कंट्रोल, तो इन दो प्रकार के आटे को करें अपने आहार में शामिल, मिलेगा लाभ 

डायबिटीज एक गंभीर बीमारी है जिसका खतरा सभी उम्र के लोगों में देखा जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसका शिकार पाए जा रहे हैं। लाइफस्टाल और खान-पान में गड़बड़ी के कारण होने वाली इस बीमारी पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो इसके जानलेवा दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, डायबिटीज से बचे रहना है या फिर इसे कंट्रोल में रखना है तो सबसे पहले अपने आहार में सुधार कर लें। खाने में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स, लो कैलोरी और हाई फाइबर वाली चीजों को अधिक मात्रा में शामिल करें।

एक्सपर्ट्स कहते हैं, डायबिटीज को कंट्रोल में रखने के लिए आपको आटे में भी बदलाव करना चाहिए। अध्ययनों में दो प्रकार के आटे को डायबिटीज को कंट्रोल में रखने में लाभकारी प्रभावों वाला पाया गया है।

सोयाबीन के आटे को आहार में करें शामिल

शोध से पता चलता है कि मधुमेह में सोयाबीन का आटा खाना आपके लिए लाभप्रद हो सकता है। सोयाबीन लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला होने के साथ फाइबर और प्रोटीन का भी अच्छा स्रोत है जिससे शरीर में इंसुलिन के स्तर को बेहतर रखने में मदद मिलती है।

सोयाबीन के आटे में सोडियम, पोटेशियम, आयरन और प्रोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो हड्डियों को पोषण देते हैं और टूटने के खतरे को कम करते हैं। इस आटे के सेवन से मांसपेशियों में होने वाले दर्द में भी काफी राहत मिलती है। अगर आप लंबे समय से अपने मोटापे को कम करने के लिए प्रयास कर रहे हैं तो डाइट में सोयाबीन के आटे से बनी रोटी को शामिल कर सकते हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

इस आटे से बनी रोटी के सेवन से पेट लंबे समय तक भरा रहता है और आप अतिरिक्त खाने से बच जाते हैं। जिससे धीरे-धीरे वजन कम होने लगता है, इससे डायबिटीज भी कंट्रोल में आने लगती है। बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में भी इसके लाभ देखे गए हैं, जिससे हार्ट अटैक और हार्ट स्ट्रोक का खतरा भी कम हो सकता है।

आहार विशेषज्ञ नेहा पठानिया कहती हैं, सोयाबीन के आटे का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम होता है और इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा भी कम होती है। मधुमेह के मरीजों के लिए इस आटे से बनी रोटी काफी फायदेमंद होती है। हालांकि अगर आपको कोई बीमारी या एलर्जी की समस्या है, तो आहार विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही सोयाबीन आटे का सेवन करें। इसे गेहूं के आटे में मिलाकर इसकी रोटियां बनाकर भी खाई जा सकती है।

डायबिटीज में फायदेमंद है कटहल का आटा

सोयाबीन की ही तरह हरे कटहल के आटे को भी अध्ययनों में डायबिटीज के मरीजों लिए फायदेमंद पाया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया कि हरे कटहल के आटे का इस्तेमाल करने से टाइप-2 डायबिटीज के रोगियों को काफी लाभ मिल सकता है।

कटहल का आटा मधुमेह रोगियों में प्लाज्मा शर्करा के स्तर को कम करने और ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) को नियंत्रित करने में काफी कारगर गया था। ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन का बढ़ना, मधुमेह का संकेत माना जाता है।

मरीजों पर देखे गए अच्छे परिणाम

शोधकर्ताओं ने हरे कटहल के आटे के प्रभाव को जानने के लिए 12 सप्ताह तक 40 प्रतिभागियों (24 पुरुषों और 16 महिलाओं) पर अध्ययन किया। प्रतिभागियों को दैनिक भोजन के साथ हरे कटहल के आटे से तैयार चीजें खाने को दी गईं।

इस अध्ययन के परिणाम को अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन में रखा गया। शोधकर्ताओं ने बताया कि हरे कटहल के आटे के नियमित सेवन से टाइप-2 डायबिटीज रोगियों में ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

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गर्मी के मौसम में लू से बचे रहने के लिए रोज कितना पानी पीना चाहिए?, आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ 

देशभर में पिछले कुछ हफ्तों से तापमान में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। अप्रैल के दूसरे हफ्ते में ही पारा 40 को पार करने लगा है। शुक्रवार (11 अप्रैल) को तापमान 36 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पूर्वानुमानों के मुताबिक इस बार की गर्मी पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड्स तोड़ सकती है।

पहले ही इस साल की फरवरी 125 साल में तीसरी सबसे गर्म फरवरी रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सभी लोगों को अलर्ट किया है अभी से ही गर्मी से बचने रहने के उपाय शुरू कर दें, विशेषकर बच्चों-बुजुर्गों की सेहत के लिए समस्याकारक हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, गर्मी के दिनों में हीटस्ट्रोक होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इससे बचे रहने के लिए सबसे जरूरी है धूप के संपर्क में आने से बचना और दिनभर में खूब पानी पीते रहना। इन दिनों लू से बचे रहने के लिए रोज कितना पानी पीना चाहिए? अगर आपके मन में भी ये सवाल है तो आइए इसका जवाब जान लेते हैं?

गर्मियों में तरल पदार्थों का करें अधिक सेवन

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, लू से बचने और डिहाइड्रेशन के खतरे को कम करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहद जरूरी है। गर्मियों में शरीर से पसीने के रूप में बहुत सारा पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स निकल जाते हैं, जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए सभी लोगों को भरपूर मात्रा में पानी पीते रहने की सलाह दी जाती है।

गर्मियों में बढ़ जाता है डिहाइड्रेशन का खतरा

गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए आपको अधिक पसीना आता है और पसीने के माध्यम से शरीर से पानी के साथ सोडियम, पोटैशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स भी निकल जाते हैं। जो लोग गर्म वातावरण में या बाहर काम करते हैं जैसे मजदूर, किसान, पुलिस आदि उन्हें डिहाइड्रेशन को खतरा और अधिक होता है।

यही कारण है कि गर्मी के दिनों में तरल पदार्थों का सेवन बढ़ाने की सलाह दी जाती है।

शरीर को रोज कितने पानी की जरूरत होती है?

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग और मेडिसिन की रिपोर्ट्स के अनुसार शरीर को स्वस्थ रखने और धूप-लू से बचे रहने के लिए पुरुषों को रोजाना लगभग 3.7 लीटर तरल पदार्थ की जरूरत होती है।
महिलाओं को लगभग 2.7 लीटर तरल पदार्थ पीने की सलाह दी जाती रही है। इसमें पानी और अन्य तरल पेय शामिल होते हैं।
हालांकि सभी लोगों को कम से कम 2 से 2.5 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए।
गर्मियों में चूंकि शरीर से अत्यधिक पानी निकल जाता है इसलिए सभी लोगों को आधे से एक लीटर अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है।

इलेक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति पर भी दें ध्यान

दिन में 8–10 गिलास पानी जरूर पिएं।
नींबू पानी में थोड़ा नमक और चीनी डालकर पीने से शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है।
नारियल पानी पीना इलेक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति के लिए सबसे अच्छा तरीका है।
घर का बना छाछ या लस्सी पिएं।

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मधुमेह को बढ़ने से रोकने के लिए शुरू करें ग्रीन-टी, होगा काफी लाभकारी

मधुमेह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है जिसका जोखिम सभी उम्र के लोगों में देखा जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसका शिकार पाए जा रहे हैं। इसे कंट्रोल में रखने के लिए लाइफस्टाइल और आहार दोनों में सुधार करना जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, शुगर को कंट्रोल में रखने के लिए ऐसी चीजों का सेवन करना चाहिए जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 से कम होता है। इन चीजों के खाने से तेजी से शुगर बढ़ने का खतरा नहीं रहता है।

कुछ अध्ययन बताते हैं कि शुगर को बढ़ने से रोकने के लिए नियमित रूप से ग्रीन-टी पीने की आदत बनाना भी आपके लिए बहुत लाभकारी हो सकता है।

ग्रीन-टी के चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ को देखते हुए दुनियाभर में इसकी मांग काफी तेजी से बढ़ी है। इसमें प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जिन्हें कई प्रकार की क्रॉनिक बीमारियों के खतरे को कम करने वाला पाया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं इसका सेवन शुगर के मरीजों के लिए भी काफी लाभकारी हो सकता है।

ग्रीन-टी और इसके लाभ

ग्रीन-टी सिर्फ एक ताजगी देने वाला पेय पदार्थ नहीं है, ये आपको बीमारियों से बचाए रखने में भी सहायक है।शोधकर्ताओं ने पाया कि ग्रीन-टी ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल रखने के साथ समग्र स्वास्थ्य को बेहतर  बनाए रखने के लिए एक बेहतर पेय हो सकती है।

ग्रीन टी में कैटेचिन नामक एक तत्व होता है जिसे इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए फायदेमंद माना जाता है। कोशिकाओं की ग्लूकोज को अवशोषित करने की क्षमता में सुधार करके ब्लड शुगर को प्रभावी ढंग से कंट्रोल करने में इससे आप लाभ पा सकते हैं।

डायबिटीज में ग्रीन-टी के लाभ

शोध से पता चलता है कि मेडिटेरेनियन डाइट प्लान के हिस्से के रूप में ग्रीन-टी को शामिल करना टाइप-2 डायबिटीज को रोकने में सहायक हो सकता है। जिन लोगों ने नियमित रूप से इसके सेवन की आदत बनाई उनमें डायबिटीज विकसित होने का जोखिम भी कम देखा गया।

शोध में विशेषज्ञों ने पाया कि ग्रीन-टी इंसुलिन की क्रियाशीलता को बढ़ाने में मदद करती है, साथ ही इंसुलिन प्रतिरोध को कम करती है।

कुछ अध्ययनों के अनुसार, जो लोग प्रतिदिन दो से तीन कप ग्रीन टी पीते हैं, उनमें टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने का जोखिम 19% तक कम हो सकता है। इस पेय पदार्थ के नियमित सेवन से उपवास के दौरान रक्त शर्करा का स्तर कम होता है जिससे डायबिटीज के कारण होने वाली अन्य समस्याओं जैसे आंखों की दिक्कत, हार्ट की समस्या और तंत्रिकाओं की दिक्कतों से बचा जा सकता है।

 मधुमेह प्रबंधन में वजन को नियंत्रित रखने की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ग्रीन-टी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाकर वेट लॉस करने में भी आपके लिए सहायक है।

कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर भी रहता है कंट्रोल

डायबिटीज के मरीजों में हृदय रोगों का खतरा भी अधिक होता है। अध्ययनों में पाया गया कि ग्रीन-टी का सेवन कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने और रक्तचाप को संतुलित करने में भी मदद करता है। शोध बताते हैं कि यह बैड कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करके गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में भी मददगार पेय है, जिससे हृदय रोगों का खतरा कम होता है।

एक अध्ययन के अनुसार, ग्रीन-टी पीने से हृदय रोग के जोखिम को 31% तक कम किया जा सकता है। हालांकि, ग्रीन-टी से हृदय स्वास्थ्य को होने वाले फायदों को जानने के लिए अभी और नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता है।

  • (साभार)

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