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युवाओं में तेजी से बढ़ रहा हाई ब्लड प्रेशर का खतरा, ये शुरुआती लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान

Category Archives: जीवन शैली

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा हाई ब्लड प्रेशर का खतरा, ये शुरुआती लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान

आजकल बदलती जीवनशैली और खानपान की आदतों का असर लोगों की सेहत पर साफ दिखाई देने लगा है। हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप भी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है। कम उम्र के युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। लंबे समय तक तनाव में रहना, पर्याप्त नींद न लेना, शारीरिक गतिविधियों की कमी और असंतुलित खानपान इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हाई ब्लड प्रेशर के शुरुआती दौर में अक्सर कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में कई लोगों को लंबे समय तक इस समस्या का पता ही नहीं चलता। समय पर इसकी पहचान न होने पर हृदय और किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में युवाओं के लिए इसके कारणों, संभावित लक्षणों और बचाव के उपायों को समझना बेहद जरूरी है।

युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर बढ़ने के क्या हैं कारण?

1. लगातार तनाव में रहना: पढ़ाई, नौकरी और निजी जीवन से जुड़ी परेशानियां युवाओं में मानसिक तनाव बढ़ा सकती हैं। लंबे समय तक तनाव में रहने से ब्लड प्रेशर बढ़ने का जोखिम हो सकता है। तनाव के कारण लोग कई बार अस्वस्थ खानपान और अन्य खराब आदतें भी अपना लेते हैं।

2. पर्याप्त नींद न लेना: देर रात तक जागना और नियमित रूप से कम नींद लेना भी हाई ब्लड प्रेशर के जोखिम को बढ़ा सकता है। शरीर को पर्याप्त आराम न मिलने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

3. शारीरिक गतिविधियों की कमी: आजकल ज्यादातर युवा लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर के सामने बैठे रहते हैं। शारीरिक मेहनत और व्यायाम की कमी से वजन बढ़ सकता है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर का खतरा भी बढ़ जाता है।

4. अधिक नमक का सेवन: खाने में जरूरत से ज्यादा नमक का इस्तेमाल और चिप्स, पैकेटबंद स्नैक्स जैसे अधिक सोडियम वाले खाद्य पदार्थों का सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ने की वजह बन सकता है।

5. मोटापा और बढ़ता वजन: शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने से हृदय को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इससे उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ सकता है।

6. धूम्रपान और शराब का सेवन: सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं, अधिक मात्रा में शराब पीने से भी ब्लड प्रेशर बढ़ने की आशंका रहती है।

7. आनुवंशिक कारण: यदि परिवार में माता-पिता या अन्य करीबी सदस्यों को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या रही है, तो युवाओं में भी इसका खतरा अधिक हो सकता है।

8. अन्य बीमारियां और दवाएं: किडनी से जुड़ी बीमारियां, हार्मोन संबंधी समस्याएं और कुछ दवाओं के सेवन से भी ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर के शुरुआती लक्षणों को न करें नजरअंदाज

हाई ब्लड प्रेशर को साइलेंट किलर भी कहा जाता है, क्योंकि अधिकतर मामलों में शुरुआत में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। यही वजह है कि नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना जरूरी है। हालांकि, कुछ लोगों को निम्नलिखित परेशानियां हो सकती हैं।

बार-बार सिरदर्द होना।
चक्कर आना या सिर हल्का महसूस होना।
आंखों से धुंधला दिखाई देना।
बिना किसी स्पष्ट कारण के थकान महसूस होना।
कभी-कभी नाक से खून आना।
सांस लेने में परेशानी होना।

ध्यान रहे कि ये लक्षण केवल हाई ब्लड प्रेशर के कारण ही नहीं होते। इनकी दूसरी वजहें भी हो सकती हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर हाई बीपी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

यदि ब्लड प्रेशर बहुत अधिक हो और इसके साथ सीने में दर्द, सांस लेने में गंभीर परेशानी, शरीर के किसी हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में दिक्कत अथवा अचानक नजर कमजोर होने जैसी समस्या हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

युवाओं को हाई बीपी से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

हाई ब्लड प्रेशर के खतरे को कम करने के लिए युवाओं को अपनी दिनचर्या में कुछ जरूरी बदलाव करने चाहिए।

नियमित व्यायाम करें: रोजाना पैदल चलना, साइकिल चलाना या अन्य शारीरिक गतिविधियां करना फायदेमंद हो सकता है।
नमक का सेवन सीमित रखें: भोजन में अतिरिक्त नमक डालने से बचें और अधिक नमक वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें।
पर्याप्त नींद लें: हर दिन पर्याप्त और नियमित नींद लेने की आदत डालें।
तनाव को नियंत्रित करें: योग, ध्यान और अपनी पसंद की गतिविधियों के लिए समय निकालें।
वजन संतुलित रखें: संतुलित आहार और नियमित व्यायाम के जरिए स्वस्थ वजन बनाए रखने की कोशिश करें।
धूम्रपान से बचें: तंबाकू का सेवन छोड़ना हृदय और रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
नियमित जांच कराएं: समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहें, भले ही किसी तरह की परेशानी महसूस न हो।

यदि बार-बार जांच में ब्लड प्रेशर सामान्य से अधिक आता है, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। चिकित्सक की सलाह के बिना दवाएं शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए।

नोट: यह लेख स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण, जांच और उपचार के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।


सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन खाना कितना फायदेमंद? जानें फायदे, नुकसान और सही तरीका

लहसुन भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाली ऐसी चीज है, जिसे स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ पारंपरिक रूप से सेहत के लिए भी उपयोगी माना जाता रहा है। हाल के दिनों में सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन खाने को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने से लेकर ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और वजन को नियंत्रित करने तक की बातें शामिल हैं।

हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ को चमत्कारी उपाय मानना उचित नहीं है। लहसुन में मौजूद कुछ सक्रिय यौगिक स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इसका असर व्यक्ति की सेहत और सेवन के तरीके पर निर्भर कर सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि खाली पेट कच्चा लहसुन खाने से वास्तव में क्या फायदे हो सकते हैं और किन परिस्थितियों में इससे सावधानी बरतनी चाहिए।

लहसुन में कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं?

लहसुन में सल्फर युक्त कई सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इनमें एलिसिन प्रमुख है, जो लहसुन को काटने या कुचलने के बाद बनने लगता है। इसके अलावा इसमें कुछ विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक भी मौजूद होते हैं। यही कारण है कि लहसुन का इस्तेमाल लंबे समय से भोजन और पारंपरिक स्वास्थ्य उपायों में किया जाता रहा है।

क्या ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है?

कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में लहसुन या उससे तैयार सप्लीमेंट्स के सेवन के बाद ब्लड प्रेशर में मामूली कमी देखी गई है। हालांकि, इसका प्रभाव सभी लोगों में एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए हाई ब्लड प्रेशर की स्थिति में केवल लहसुन के भरोसे रहना या डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं को बंद करना उचित नहीं है।

कोलेस्ट्रॉल पर कितना असर?

लहसुन और कोलेस्ट्रॉल के बीच संबंध को लेकर भी कई शोध किए गए हैं। कुछ अध्ययनों में कुल और एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल में मामूली बदलाव की बात सामने आई है, लेकिन सभी शोधों के नतीजे एक जैसे नहीं रहे हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि रोज सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन खाने से कोलेस्ट्रॉल निश्चित रूप से सामान्य हो जाएगा।

क्या लहसुन खाने से वजन कम हो सकता है?

लहसुन को वजन घटाने का कोई जादुई उपाय नहीं माना जा सकता। वजन कम करने के लिए संतुलित आहार, कैलोरी का संतुलन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। लहसुन को डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है, लेकिन केवल इसके सेवन से वजन घटने की उम्मीद करना सही नहीं है।

खाली पेट कच्चा लहसुन खाने से हो सकती हैं ये परेशानियां

हर व्यक्ति का शरीर कच्चे लहसुन को एक तरह से स्वीकार नहीं करता। खासकर खाली पेट इसका सेवन करने पर कुछ लोगों को पेट में जलन, गैस, पेट दर्द, मतली या सीने में जलन की शिकायत हो सकती है। इसके अलावा लहसुन की तेज गंध के कारण मुंह से दुर्गंध भी आ सकती है।

अगर खाली पेट लहसुन खाने के बाद बार-बार पाचन संबंधी समस्या होती है, तो इसे भोजन के साथ लेने पर विचार किया जा सकता है। परेशानी लगातार बनी रहे तो इसका सेवन रोककर चिकित्सक से सलाह लेना बेहतर है।

इन लोगों को लहसुन के सेवन में बरतनी चाहिए सावधानी

जो लोग खून पतला करने वाली दवाएं लेते हैं, उन्हें ज्यादा मात्रा में कच्चा लहसुन या लहसुन से बने सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। किसी सर्जरी की योजना हो तो चिकित्सक को लहसुन या इसके सप्लीमेंट के सेवन के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है।

रोज कितनी मात्रा में लहसुन खाना सही है?

हर व्यक्ति के लिए लहसुन की कोई एक निश्चित मात्रा तय नहीं की जा सकती। इसे सामान्य भोजन का हिस्सा बनाकर सीमित मात्रा में लेना ज्यादा व्यावहारिक तरीका है। ज्यादा स्वास्थ्य लाभ की उम्मीद में बड़ी मात्रा में कच्चा लहसुन खाना जरूरी नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लहसुन को किसी बीमारी की दवा या इलाज का विकल्प न समझें। अगर आप ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज या किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जारी रखें।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और शोध में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या नियमित दवा के साथ आहार में बड़ा बदलाव करने से पहले चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।

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घर में जमा पानी बन सकता है मलेरिया की वजह, बरसात में ऐसे करें मच्छरों की रोकथाम

बरसात के मौसम में मच्छरों का प्रकोप बढ़ने के साथ ही मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। मलेरिया एक संक्रामक बीमारी है, जो संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। इस मच्छर के शरीर में मौजूद प्लाज्मोडियम परजीवी इंसान के खून में पहुंचकर संक्रमण पैदा करता है। समय पर बीमारी की पहचान और उपचार न होने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसलिए मलेरिया के लक्षणों को पहचानना और इससे बचाव के उपाय अपनाना बेहद जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, मलेरिया का संक्रमण किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन छोटे बच्चों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में इसके गंभीर होने का खतरा अधिक रहता है। मधुमेह, कैंसर और एचआईवी से पीड़ित मरीजों को भी विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। ऐसे में बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

आइए जानते हैं कि मलेरिया किन लोगों के लिए अधिक खतरनाक हो सकता है, संक्रमण होने पर क्या सावधानियां बरतनी चाहिए और इससे बचाव के लिए कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं।

इन लोगों के लिए गंभीर हो सकता है मलेरिया

मलेरिया का संक्रमण कुछ लोगों के लिए अधिक जोखिम भरा हो सकता है। मधुमेह, कैंसर और एचआईवी से पीड़ित मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में मलेरिया का संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। इसके अलावा छोटे बच्चों में भी इस बीमारी के कारण गंभीर जटिलताएं होने की आशंका रहती है।

मलेरिया का संक्रमण होने पर प्लाज्मोडियम परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। गंभीर मामलों में यह मस्तिष्क सहित शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। मस्तिष्क से संबंधित मलेरिया की स्थिति में मरीज को दौरे पड़ने, बेहोशी और अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए बुखार, ठंड लगने या कंपकंपी जैसे लक्षण दिखाई देने पर समय रहते चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। विशेष रूप से पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।

मलेरिया होने पर खानपान का रखें ध्यान

मलेरिया होने पर शरीर में कमजोरी और पानी की कमी की समस्या हो सकती है। ऐसे में मरीज को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। पानी, नारियल पानी और ताजे फलों का सेवन शरीर में पानी की कमी को दूर करने में मदद कर सकता है।

इसके अलावा संतुलित और पौष्टिक आहार लेना भी जरूरी है। भोजन में विटामिन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर चीजों को शामिल किया जा सकता है। हालांकि, केवल खानपान के सहारे मलेरिया का इलाज संभव नहीं है।

मलेरिया के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। चिकित्सक की सलाह के अनुसार जांच कराकर निर्धारित दवाओं का पूरा कोर्स लेना जरूरी है। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा लेने से बचना चाहिए। समय पर उपचार से बीमारी के गंभीर होने की आशंका को कम किया जा सकता है।

मलेरिया से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय

मलेरिया से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों के काटने और उनके पनपने की जगहों को नियंत्रित करना है। मादा एनोफिलीज मच्छर आमतौर पर साफ पानी में प्रजनन करते हैं। इसलिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें।

घर में रखी पानी की टंकियों, कूलर, गमलों और अन्य बर्तनों की नियमित सफाई करें। पानी से भरे बर्तनों को सप्ताह में कम से कम एक बार खाली करके अच्छी तरह साफ करें। इसके बाद ही उनमें दोबारा पानी भरें। घर के आसपास मौजूद गड्ढों और नालियों में पानी जमा होने से रोकें।

जहां पानी जमा होने से रोकना संभव न हो, वहां स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की सलाह के अनुसार मच्छरों के लार्वा को नष्ट करने के उपाय अपनाएं। जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य विभाग से कीटनाशकों के छिड़काव के लिए संपर्क करें। घर के आसपास साफ-सफाई बनाए रखना भी जरूरी है।

मच्छरों से बचाव के लिए करें ये काम

मलेरिया फैलाने वाले मच्छर मुख्य रूप से शाम और रात के समय सक्रिय होते हैं। ऐसे में इस दौरान मच्छरों से बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। घर से बाहर निकलते समय पूरी बाजू के कपड़े पहनें और शरीर के खुले हिस्सों पर मच्छर भगाने वाली क्रीम का इस्तेमाल करें।

सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें। घर की खिड़कियों और दरवाजों पर मच्छर रोकने वाली जालियां लगवाना भी फायदेमंद हो सकता है। इसके अलावा घर के आसपास पानी जमा होने की स्थिति पर नियमित रूप से नजर रखें।

बारिश के मौसम में मच्छरों के पनपने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ आसपास के वातावरण को साफ रखना भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को बुखार, ठंड लगने या कंपकंपी जैसे लक्षण महसूस हों, तो उन्हें सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों और मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित है। मलेरिया के लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सक से सलाह लेकर उचित जांच और उपचार कराएं।

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रोजाना ब्रोकली खाने से शरीर को मिलते हैं ये 5 बड़े फायदे, हड्डियां भी होंगी मजबूत

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर आहार लेना बेहद जरूरी है। हरी सब्जियां इस जरूरत को पूरा करने में अहम भूमिका निभाती हैं। इन्हीं सब्जियों में शामिल ब्रोकली सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद मानी जाती है। इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और फाइबर शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण शारीरिक कार्यों को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं।

ब्रोकली देखने में फूलगोभी जैसी होती है, लेकिन पोषण के लिहाज से इसे काफी महत्वपूर्ण सब्जी माना जाता है। कम कैलोरी और अधिक पोषक तत्वों के कारण इसे वजन नियंत्रित रखने वाले लोगों के आहार में भी शामिल किया जाता है। इसमें विटामिन सी, विटामिन के, फोलेट, कैल्शियम और फाइबर जैसे कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। नियमित रूप से संतुलित आहार में ब्रोकली को शामिल करने से शरीर को कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।

विटामिन और मिनरल्स का अच्छा स्रोत है ब्रोकली

ब्रोकली में कई ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिनकी शरीर को बेहतर तरीके से काम करने के लिए जरूरत होती है। खास बात यह है कि कम कैलोरी होने के बावजूद यह विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होती है।

लगभग 100 ग्राम ब्रोकली खाने से शरीर को दिनभर की विटामिन सी की जरूरत का करीब 91 प्रतिशत और विटामिन के की आवश्यकता का लगभग 77 प्रतिशत मिल सकता है।

विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा यह त्वचा को स्वस्थ रखने और शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं, विटामिन के रक्त का थक्का जमने की सामान्य प्रक्रिया और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

ब्रोकली में फोलेट भी पाया जाता है, जिसे विटामिन बी9 के नाम से जाना जाता है। यह कोशिकाओं के विकास और उनके सामान्य कामकाज के लिए आवश्यक है। गर्भावस्था के दौरान फोलेट का पर्याप्त सेवन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

दिल को स्वस्थ रखने में मददगार हो सकती है ब्रोकली

ब्रोकली का सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिहाज से भी फायदेमंद हो सकता है। इसमें मौजूद फाइबर और प्राकृतिक पौधों से मिलने वाले यौगिक शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं।

कुछ अध्ययनों में ब्रोकली के सेवन और खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल के कम स्तर के बीच संबंध पाया गया है। इसके अलावा कुछ शोध में ट्राइग्लिसराइड के स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है।

एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा हुआ स्तर हृदय रोगों के जोखिम से जुड़ा होता है। ब्रोकली में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिकों में सूजन कम करने वाले गुण भी पाए जाते हैं। हालांकि, केवल ब्रोकली खाने से हृदय रोगों से बचाव की गारंटी नहीं मिलती। इसके लिए संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली भी जरूरी है।

हड्डियों की मजबूती के लिए भी जरूरी है ब्रोकली

हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम और विटामिन के की जरूरत होती है। ब्रोकली में ये दोनों पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें फास्फोरस और जिंक भी पाया जाता है, जो शरीर के सामान्य स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संतुलित आहार के हिस्से के रूप में ब्रोकली का सेवन हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकता है। हालांकि, हड्डियों की मजबूती के लिए केवल एक सब्जी पर निर्भर रहने के बजाय कैल्शियम और विटामिन डी सहित सभी जरूरी पोषक तत्वों का पर्याप्त सेवन करना चाहिए।

मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद

ब्रोकली में पाए जाने वाले प्राकृतिक पौधों के यौगिक मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कुछ अध्ययनों में क्रूसीफेरस श्रेणी की सब्जियों में मौजूद यौगिकों और मस्तिष्क के सामान्य कामकाज के बीच संभावित संबंध सामने आया है।

इन सब्जियों में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, ब्रोकली खाने से याददाश्त बेहतर होने या मस्तिष्क संबंधी बीमारियों से बचाव होने के दावों की पुष्टि के लिए अभी और शोध की जरूरत है।

संतुलित आहार में शामिल करें ब्रोकली

ब्रोकली को सलाद, सब्जी, सूप या हल्का पकाकर भोजन में शामिल किया जा सकता है। इसे बहुत अधिक पकाने से कुछ पोषक तत्वों की मात्रा कम हो सकती है। इसलिए इसे हल्का पकाकर खाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

कुल मिलाकर, ब्रोकली कम कैलोरी में कई जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने वाली सब्जी है। इसे नियमित और संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर शरीर को जरूरी पोषण दिया जा सकता है।

नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट और उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों पर आधारित है। इसे किसी बीमारी के इलाज या चिकित्सकीय सलाह के विकल्प के रूप में न लें।

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सामान्य बीपी फिर भी चक्कर और शरीर कांपे तो नजरअंदाज न करें, इन वजहों से हो सकती है परेशानी

अचानक सिर घूमने लगे, शरीर में कंपकंपी महसूस हो या बिना किसी खास वजह के कमजोरी आने लगे तो व्यक्ति स्वाभाविक रूप से परेशान हो जाता है। ऐसे में कई लोग तुरंत ब्लड प्रेशर चेक करते हैं। अगर बीपी सामान्य निकलता है, तो अक्सर लगता है कि शायद कोई बड़ी समस्या नहीं है। हालांकि, चक्कर और शरीर कांपने के पीछे सिर्फ ब्लड प्रेशर ही जिम्मेदार नहीं होता। शरीर में पानी की कमी से लेकर लो ब्लड शुगर, तनाव, नींद की कमी और कान के संतुलन से जुड़ी समस्या तक कई कारण इसके पीछे हो सकते हैं।

डॉ. विनीत बंगा, डायरेक्टर एवं एचओडी-न्यूरोलॉजी के अनुसार, इन लक्षणों का कारण समझने के लिए केवल बीपी देखना पर्याप्त नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि चक्कर या कंपकंपी कब शुरू हुई, उस समय व्यक्ति क्या कर रहा था और इसके साथ कौन-कौन से दूसरे लक्षण दिखाई दे रहे थे। आइए जानते हैं सामान्य ब्लड प्रेशर होने के बावजूद चक्कर और शरीर कांपने की समस्या किन कारणों से हो सकती है।

सामान्य बीपी के बावजूद चक्कर और कंपकंपी क्यों होती है?

1. ब्लड शुगर कम होना

लंबे समय तक कुछ न खाने, जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करने या डायबिटीज की स्थिति में ब्लड शुगर कम हो सकती है। लो ब्लड शुगर होने पर शरीर कांपने के साथ पसीना आना, भूख लगना, कमजोरी, दिल की धड़कन तेज होना और चक्कर जैसे लक्षण भी महसूस हो सकते हैं।

2. शरीर में पानी की कमी

पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीने या ज्यादा पसीना निकलने से शरीर डिहाइड्रेट हो सकता है। उल्टी और दस्त जैसी स्थितियों में भी शरीर में पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है। इसके कारण कमजोरी, चक्कर और थकान महसूस हो सकती है।

3. तनाव और घबराहट

ज्यादा तनाव, एंग्जायटी या पैनिक की स्थिति में शरीर में कई तरह की शारीरिक प्रतिक्रियाएं होती हैं। इस दौरान हाथ-पैर कांपना, चक्कर आना, सांस तेज चलना और दिल की धड़कन बढ़ना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

4. नींद पूरी न होना और ज्यादा चाय-कॉफी

लगातार नींद पूरी नहीं होने से शरीर और दिमाग पर असर पड़ सकता है। वहीं, जरूरत से ज्यादा कैफीन का सेवन कुछ लोगों में बेचैनी और कंपकंपी बढ़ा सकता है। ऐसी स्थिति में चक्कर या कमजोरी की शिकायत भी हो सकती है।

5. शरीर में खून की कमी

एनीमिया यानी शरीर में पर्याप्त हीमोग्लोबिन न होने की स्थिति में थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है। कुछ लोगों को इसके साथ चक्कर आने की शिकायत भी रहती है। आयरन की कमी एनीमिया का एक सामान्य कारण हो सकती है।

6. अचानक खड़े होने पर चक्कर

अगर लेटे या बैठे रहने के बाद अचानक खड़े होने पर चक्कर आता है, तो इसकी वजह कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर का नीचे गिरना हो सकती है। ऐसे में एक सामान्य बीपी रीडिंग पूरी स्थिति को नहीं दर्शाती। इसलिए यह ध्यान देना जरूरी है कि चक्कर किस परिस्थिति में आता है।

7. कान के अंदर संतुलन से जुड़ी समस्या

हर बार चक्कर का संबंध ब्लड प्रेशर या कमजोरी से नहीं होता। अंदरूनी कान शरीर का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कान के संतुलन तंत्र में परेशानी होने पर घूमने जैसा महसूस होना या असंतुलन की समस्या हो सकती है।

किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें?

अगर चक्कर या शरीर कांपने के साथ सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी, अचानक तेज सिरदर्द, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में परेशानी, भ्रम की स्थिति या चलने में दिक्कत हो रही है, तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

वहीं, अगर चक्कर और कंपकंपी की समस्या बार-बार हो रही है या लंबे समय तक बनी रहती है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। समस्या का कारण समझने में यह जानकारी भी उपयोगी हो सकती है कि लक्षण कब शुरू हुए, उस समय आपने क्या खाया था, कितनी नींद ली थी, कौन-सी दवा ली थी और क्या कोई अन्य लक्षण भी मौजूद था।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर से परामर्श लें।

(साभार)


हर बार खाना खाने के बाद क्यों फूल जाता है पेट? जानिए गैस बनने की असली वजह

खाना खाने के कुछ देर बाद पेट फूलना, डकार आना, भारीपन महसूस होना या गैस की शिकायत होना काफी आम है। कई बार खान-पान की आदतों या कुछ खास खाद्य पदार्थों के कारण ऐसा हो सकता है। लेकिन अगर हर बार भोजन करने के बाद पेट में गैस बनने लगे या यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

अक्सर लोग गैस और एसिडिटी को एक ही समस्या समझ लेते हैं, जबकि दोनों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। गैस की समस्या के पीछे खाने का तरीका, ज्यादा भोजन करना, कब्ज, कुछ खाद्य पदार्थों से संवेदनशीलता या दूध न पचना जैसी वजहें हो सकती हैं। वहीं, अगर गैस के साथ लगातार पेट दर्द, उल्टी, वजन कम होना, मल में खून आना या खाना निगलने में परेशानी हो रही है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

खाना खाने के बाद गैस बनने की प्रमुख वजहें

1. जल्दबाजी में खाना खाना

अगर आप खाना बहुत तेजी से खाते हैं तो भोजन के साथ अधिक हवा भी पेट में जा सकती है। इससे डकार आने और पेट फूलने की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए भोजन को आराम से और अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए।

2. कुछ खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन

राजमा, छोले, चना और कुछ सब्जियां कई लोगों में गैस बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा कार्बोनेटेड पेय भी पेट फूलने और डकार की समस्या को बढ़ा सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के शरीर पर खाद्य पदार्थों का असर अलग-अलग हो सकता है।

3. जरूरत से ज्यादा भोजन करना

एक बार में बहुत अधिक खाना खाने से पेट पर दबाव बढ़ सकता है। इसके चलते भारीपन, पेट फूलना और गैस जैसी परेशानियां महसूस हो सकती हैं। इसलिए भोजन की मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है।

4. दूध या डेयरी उत्पाद न पचना

कुछ लोगों के शरीर में लैक्टोज को पचाने की क्षमता कम होती है। ऐसे लोगों को दूध या कुछ डेयरी उत्पाद लेने के बाद गैस, पेट फूलने या दस्त की शिकायत हो सकती है।

5. कब्ज की समस्या

कब्ज होने पर आंतों में गैस फंस सकती है, जिससे पेट फूला हुआ और भारी महसूस हो सकता है। पर्याप्त पानी पीना, फाइबर युक्त भोजन लेना और नियमित शारीरिक गतिविधि करना पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद हो सकता है।

6. अपच या एसिड रिफ्लक्स

खाना खाने के बाद पेट के ऊपरी हिस्से में असहजता, जलन या खट्टी डकार जैसी शिकायत केवल गैस की वजह से नहीं हो सकती। ये लक्षण अपच या एसिड रिफ्लक्स से भी जुड़े हो सकते हैं। इसलिए लगातार होने वाली परेशानी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

गैस की समस्या से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें
खाना धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर खाएं।
एक बार में बहुत ज्यादा भोजन करने से बचें।
जिन खाद्य पदार्थों से बार-बार गैस बनती है, उनका सेवन कम करें।
कार्बोनेटेड पेय पदार्थों से दूरी बनाएं।
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
रोजाना हल्की शारीरिक गतिविधि या पैदल चलने की आदत डालें।

गैस बनने पर क्या करें?

अगर खाना खाने के बाद पेट में गैस या भारीपन महसूस हो रहा है तो गुनगुना पानी धीरे-धीरे पी सकते हैं। भोजन के बाद करीब 10 से 15 मिनट हल्की वॉक करना भी मददगार हो सकता है। इस दौरान बहुत अधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन तथा कार्बोनेटेड पेय लेने से बचना बेहतर है।

हालांकि, अगर गैस की शिकायत बार-बार होती है या इसके साथ तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी, मल में खून, निगलने में परेशानी या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लें।

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ओट्स सेहतमंद है, लेकिन ज्यादा खाना पड़ सकता है भारी, जानिए सही तरीका

आजकल हेल्दी नाश्ते के विकल्प के तौर पर ओट्स काफी लोकप्रिय हो चुका है। वजन नियंत्रित रखने से लेकर पाचन बेहतर करने तक, इसके कई फायदे बताए जाते हैं। ओट्स में फाइबर, प्रोटीन और कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, इसलिए इसे संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, किसी भी दूसरी पौष्टिक चीज की तरह ओट्स का सेवन भी सीमित मात्रा में करना जरूरी है। जरूरत से ज्यादा ओट्स खाने या अचानक डाइट में फाइबर बढ़ाने से कुछ लोगों को पेट से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। इसके अलावा बाजार में मिलने वाले फ्लेवर्ड ओट्स में चीनी और नमक की मात्रा भी अधिक हो सकती है। ऐसे में ओट्स चुनते और खाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

ओट्स खाने से शरीर को क्या फायदे मिलते हैं?

ओट्स में भरपूर मात्रा में आहार फाइबर पाया जाता है। फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा हुआ रखने में मदद करता है, जिससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम हो सकती है। संतुलित खान-पान और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ ओट्स वजन को नियंत्रित रखने वाली डाइट का हिस्सा बन सकता है।

ओट्स में बीटा-ग्लूकान नाम का घुलनशील फाइबर भी पाया जाता है। यह शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। इसी वजह से हृदय को स्वस्थ रखने वाली डाइट में ओट्स को शामिल किया जाता है।

इसके अलावा ओट्स में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी माना जाता है। पर्याप्त मात्रा में फाइबर लेने से मल त्याग को सामान्य रखने और कब्ज से बचाव में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका असर व्यक्ति की खान-पान की आदतों और पाचन क्षमता पर निर्भर करता है।

ज्यादा ओट्स खाने पर हो सकती हैं ये परेशानियां

ओट्स में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। अगर कोई व्यक्ति अचानक बहुत ज्यादा मात्रा में ओट्स खाना शुरू कर देता है तो शरीर को अतिरिक्त फाइबर के साथ तालमेल बैठाने में समय लग सकता है। ऐसी स्थिति में गैस, पेट फूलना, भारीपन या पेट में ऐंठन जैसी समस्या हो सकती है।

इसके अलावा पर्याप्त पानी नहीं पीने की स्थिति में अधिक फाइबर का सेवन कुछ लोगों में कब्ज की समस्या बढ़ा सकता है। इसलिए डाइट में ओट्स की मात्रा बढ़ाने के साथ दिनभर पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है।

बाजार से ओट्स खरीदते समय रखें ध्यान

हर तरह के ओट्स को एक जैसा मानना सही नहीं है। सादे ओट्स की तुलना में फ्लेवर्ड ओट्स में अतिरिक्त चीनी, नमक और दूसरी सामग्री मिलाई जा सकती है। इसलिए पैकेट खरीदते समय पोषण संबंधी जानकारी और सामग्री की सूची जरूर देखनी चाहिए।

अगर आप रोजाना ओट्स खाते हैं तो बिना अतिरिक्त चीनी और कम नमक वाले सादे ओट्स को प्राथमिकता देना बेहतर विकल्प हो सकता है।

ओट्स को कैसे खाएं?

ओट्स को दूध या दही के साथ खाया जा सकता है। इसे अधिक पौष्टिक बनाने के लिए इसमें ताजे फल, थोड़े मेवे या बीज भी मिलाए जा सकते हैं। स्वाद के लिए बहुत ज्यादा चीनी, सिरप या अन्य मीठी चीजें डालने से बचना बेहतर है।

अगर आपने हाल ही में अपनी डाइट में ओट्स शामिल किया है तो शुरुआत में कम मात्रा लें और धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाएं। इससे शरीर को बढ़ी हुई फाइबर की मात्रा के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद मिल सकती है। साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है।

किन लोगों को ओट्स खाते समय सावधानी बरतनी चाहिए?

जिन लोगों को पहले से पाचन संबंधी परेशानी रहती है, उन्हें ओट्स की मात्रा अपनी सहनशीलता के अनुसार तय करनी चाहिए। अगर ओट्स खाने के बाद लगातार गैस, पेट फूलना, दर्द या दूसरी समस्या महसूस होती है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित रहेगा। खासकर तब, जब परेशानी लगातार बनी रहे या रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर डालने लगे।

संतुलित मात्रा में ही करें सेवन

ओट्स पौष्टिक आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी के इलाज के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इससे मिलने वाले फायदे इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि इसे कितनी मात्रा में खाया जा रहा है, किस तरह का ओट्स चुना गया है और आपकी पूरी डाइट कैसी है। इसलिए ओट्स को संतुलित मात्रा में और सही तरीके से अपनी डाइट में शामिल करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या विशेष डाइट की जरूरत होने पर चिकित्सक या योग्य आहार विशेषज्ञ की सलाह लें।

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30 मिनट की वॉक से कम होगा वजन या नहीं? आइये जानते हैं क्या है पूरा सच

वजन कम करने के लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति कठिन कसरत या जिम से शुरुआत करे। रोजाना पैदल चलना भी शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है। यही वजह है कि कई लोग वजन घटाने के लिए रोज 30 मिनट वॉक करने की सलाह देते हैं। हालांकि, सवाल यह है कि क्या केवल 30 मिनट पैदल चलने से वास्तव में वजन कम किया जा सकता है? क्या वॉक की रफ्तार भी इसमें कोई भूमिका निभाती है और क्या खान-पान पर ध्यान दिए बिना इसका फायदा मिल सकता है?

अगर आप भी वजन घटाने के लिए वॉकिंग शुरू करने की सोच रहे हैं, तो इन सवालों के जवाब जानना जरूरी है। आइए समझते हैं कि 30 मिनट की रोजाना वॉक वजन प्रबंधन में कितनी मदद कर सकती है।

क्या रोज 30 मिनट वॉक करने से वजन कम हो सकता है?

रोजाना 30 मिनट पैदल चलना वजन कम करने की प्रक्रिया में योगदान दे सकता है। वॉकिंग कम प्रभाव वाली शारीरिक गतिविधि है, इसलिए स्वस्थ लोग इसे अपनी दिनचर्या में आसानी से शामिल कर सकते हैं।

पैदल चलने के दौरान शरीर ऊर्जा का इस्तेमाल करता है। वजन घटाने के लिए आम तौर पर शरीर द्वारा खर्च की जाने वाली ऊर्जा और भोजन से मिलने वाली ऊर्जा के बीच संतुलन महत्वपूर्ण होता है। अगर लंबे समय तक शरीर की कुल ऊर्जा जरूरत के मुकाबले कम कैलोरी मिलती हैं, तो वजन घटने की संभावना रहती है।

इसलिए 30 मिनट की वॉक का फायदा केवल उस दौरान खर्च होने वाली कैलोरी तक सीमित नहीं है। नियमित रूप से चलने की आदत व्यक्ति को पूरे दिन अधिक सक्रिय रहने में भी मदद कर सकती है।

वजन घटाने के लिए वॉक की स्पीड कैसी होनी चाहिए?

सिर्फ धीमी गति से टहलना ही जरूरी नहीं है। अगर आपकी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य इसकी अनुमति देते हैं, तो सामान्य चाल की तुलना में कुछ तेज गति से चलना भी किया जा सकता है।

तेज चलने पर सांस और हृदय गति सामान्य से कुछ बढ़ सकती है। हालांकि, वॉक की गति हर व्यक्ति की उम्र, फिटनेस और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है।

जो लोग लंबे समय से शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे हैं, उन्हें शुरुआत आरामदायक गति से करनी चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे चलने का समय और गति बढ़ाई जा सकती है।

क्या वॉकिंग से सिर्फ पेट की चर्बी कम होगी?

अगर आपका लक्ष्य पेट की चर्बी कम करना है, तो यह समझना जरूरी है कि शरीर के किसी एक हिस्से की चर्बी को केवल उसी हिस्से की गतिविधि के जरिए अलग से कम करना संभव नहीं होता।

नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर में कुल वसा कम करने की प्रक्रिया में मदद कर सकती है। इसके साथ संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, तनाव को नियंत्रित रखना और पूरी दिनचर्या में सक्रिय रहना भी महत्वपूर्ण है।

वजन घटाने में डाइट क्यों है जरूरी?

रोज 30 मिनट वॉक करने के बावजूद अगर व्यक्ति अपनी जरूरत से काफी ज्यादा कैलोरी का सेवन करता है, तो वजन कम करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए वॉकिंग के साथ खान-पान पर भी ध्यान देना जरूरी है। डाइट में प्रोटीन, सब्जियां, फल, साबुत अनाज और पर्याप्त फाइबर वाले खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। वहीं अत्यधिक कैलोरी वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मीठे पेय और जरूरत से ज्यादा स्नैकिंग को सीमित करना मददगार हो सकता है।

सुबह या शाम, किस समय करनी चाहिए वॉक?

वजन कम करने के लिए वॉक करने का कोई एक निश्चित समय सभी लोगों के लिए जरूरी नहीं है। आप अपनी सुविधा और दिनचर्या के अनुसार सुबह, शाम या दिन के किसी अन्य समय पर पैदल चल सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात नियमितता है। अगर किसी व्यक्ति के लिए लगातार 30 मिनट वॉक करना संभव नहीं है, तो वह दिन में 10-10 मिनट की तीन अलग-अलग वॉक करके भी अपनी कुल शारीरिक गतिविधि बढ़ा सकता है।

कितने समय में दिख सकता है वजन घटने का असर?

वजन घटने की रफ्तार हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। शुरुआती वजन, उम्र, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, नींद और शरीर की चयापचय संबंधी स्थिति जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभाते हैं।

इसलिए कुछ दिनों तक वॉक करने के बाद वजन में बड़ा बदलाव दिखने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। नियमित रूप से कई हफ्तों तक शारीरिक गतिविधि जारी रखने और खान-पान को संतुलित रखने पर धीरे-धीरे बदलाव नजर आ सकते हैं।

निष्कर्ष

रोजाना 30 मिनट की वॉक वजन प्रबंधन की दिशा में एक उपयोगी शुरुआत हो सकती है। हालांकि, केवल वॉकिंग को ही वजन घटाने का एकमात्र उपाय नहीं माना जाना चाहिए। नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी महत्वपूर्ण है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए तैयार किया गया है। किसी विशेष स्वास्थ्य स्थिति, बीमारी या वजन घटाने की योजना के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लें।

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वजन घटाने के लिए कर रहे हैं इंटरमिटेंट फास्टिंग? पहले जान लें इसके फायदे और नुकसान

आज के दौर में तेजी से वजन कम करने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग का चलन काफी बढ़ गया है। इस तरीके में व्यक्ति दिन के कुछ तय घंटों में ही भोजन करता है और बाकी समय उपवास रखता है। वजन नियंत्रित करने के साथ-साथ कुछ शोधों में इसके ब्लड प्रेशर और आराम की अवस्था में दिल की धड़कन पर सकारात्मक प्रभाव के संकेत भी मिले हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित या उपयुक्त है।

खासकर पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों या नियमित रूप से दवाइयां लेने वालों को इसे शुरू करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। लंबे समय तक भोजन न करने से कुछ लोगों में सिरदर्द, कमजोरी, चक्कर या ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए वजन घटाने के लिए फास्टिंग शुरू करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

इंटरमिटेंट फास्टिंग से मिल सकते हैं ये फायदे

इंटरमिटेंट फास्टिंग का सबसे प्रमुख उद्देश्य खाने की अवधि को सीमित करना है। इससे कई लोगों में कुल कैलोरी का सेवन कम हो सकता है, जिसके चलते वजन घटाने में मदद मिल सकती है।

कुछ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने और आराम की अवस्था में दिल की धड़कन कम करने में मदद कर सकती है। एक अध्ययन में 16 घंटे तक उपवास रखने वाले पुरुषों में शरीर की चर्बी कम होने के संकेत देखे गए थे।

हालांकि, इन अध्ययनों के परिणामों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फास्टिंग का असर व्यक्ति की उम्र, वजन, खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

लंबे समय तक खाना न खाने से सिरदर्द की समस्या

इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने के बाद कुछ लोगों को सिरदर्द की शिकायत हो सकती है। लंबे समय तक भोजन न मिलने के कारण शरीर में होने वाले बदलाव इसके पीछे एक कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके साथ कमजोरी या चक्कर भी महसूस हो सकते हैं।

2020 में प्रकाशित एक समीक्षा में भी इंटरमिटेंट फास्टिंग करने वाले लोगों में सिरदर्द की समस्या सामने आई थी। हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति में समान नहीं होता। किसी व्यक्ति को हल्का सिरदर्द हो सकता है, जबकि किसी अन्य को ज्यादा परेशानी महसूस हो सकती है।

अगर फास्टिंग के दौरान बार-बार या तेज सिरदर्द की समस्या हो रही है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

डायबिटीज के मरीज रहें विशेष सावधान

डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करना सामान्य लोगों की तुलना में अधिक सावधानी की मांग करता है। लंबे समय तक भोजन न करने से ब्लड शुगर के स्तर में उतार-चढ़ाव हो सकता है।

खासकर इंसुलिन या ब्लड शुगर कम करने वाली दवाइयां लेने वाले लोगों में हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर बहुत कम होने का जोखिम बढ़ सकता है।

ऐसे में डायबिटीज के मरीजों को केवल वजन कम करने के उद्देश्य से अपने स्तर पर फास्टिंग शुरू नहीं करनी चाहिए। उन्हें पहले डॉक्टर से सलाह लेकर यह तय करना चाहिए कि उनके लिए किस तरह का खान-पान और भोजन का समय सुरक्षित रहेगा।

नियमित दवा लेते हैं तो पहले डॉक्टर से पूछें

अगर कोई व्यक्ति ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की दवाइयां नियमित रूप से ले रहा है, तो इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

फास्टिंग के कारण भोजन करने का समय बदल जाता है और ऐसे में कुछ दवाइयों के सेवन का समय भी प्रभावित हो सकता है। वहीं, कुछ दवाइयां भोजन के साथ लेना जरूरी होता है। लंबे समय तक खाली पेट रहने पर कमजोरी या चक्कर जैसी समस्या भी हो सकती है।

इसलिए किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति या नियमित दवा लेने वाले लोगों के लिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करना सही नहीं माना जाता। वजन कम करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सुरक्षित तरीके से करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्टों और अध्ययनों में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या नियमित दवा के मामले में फास्टिंग शुरू करने से पहले चिकित्सक की सलाह लें।


क्या RO का पानी घटा रहा है शरीर का B12? नए अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

आजकल घरों और दफ्तरों में साफ पानी के लिए आरओ का इस्तेमाल आम हो गया है। ज्यादातर लोग आरओ पानी को शुद्ध और सुरक्षित मानकर नियमित रूप से इसका सेवन करते हैं। हालांकि, एक हालिया स्वास्थ्य अध्ययन ने आरओ पानी पीने और शरीर में विटामिन B12 की कमी के बीच संभावित संबंध को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

पश्चिमी भारत में किए गए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि आरओ पानी का लंबे समय तक सेवन करने वाले लोगों में विटामिन B12 का स्तर कैसा रहता है। अध्ययन के आंकड़ों में आरओ पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों में B12 की कमी का अनुपात अन्य स्रोतों का पानी पीने वालों की तुलना में अधिक पाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इन नतीजों को सीधे तौर पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि आरओ पानी ही B12 की कमी की वजह है।

250 लोगों पर किया गया अध्ययन

शोध में कुल 250 लोगों को शामिल किया गया। जांच के दौरान 70 प्रतिभागियों यानी करीब 28 प्रतिशत लोगों में विटामिन B12 की कमी पाई गई।

आंकड़ों के मुताबिक आरओ पानी का इस्तेमाल करने वाले 79 प्रतिभागियों में से 40 लोगों यानी 50.6 प्रतिशत में B12 की कमी थी। वहीं, आरओ के अलावा दूसरे स्रोतों का पानी पीने वाले 171 लोगों में से 30 यानी करीब 17.5 प्रतिशत लोगों में विटामिन B12 का स्तर कम पाया गया।

अध्ययन के सांख्यिकीय विश्लेषण में भी आरओ पानी के इस्तेमाल और विटामिन B12 की कमी के बीच एक स्वतंत्र संबंध सामने आया।

क्या आरओ पानी सीधे B12 की कमी करता है?

अध्ययन का सबसे अहम पहलू यही है कि इसमें केवल दोनों चीजों के बीच संबंध देखा गया है। शोध ने यह साबित नहीं किया कि आरओ पानी पीने से सीधे शरीर में विटामिन B12 की कमी हो जाती है।

दरअसल, यह एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन था, जिसमें प्रतिभागियों की स्वास्थ्य स्थिति को एक निश्चित समय पर देखा गया। ऐसे अध्ययन किसी स्थिति और संभावित कारण के बीच संबंध तो दिखा सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से साबित नहीं कर सकते कि एक चीज दूसरी की वजह है।

खान-पान समेत कई पहलुओं की हुई जांच

शोध के दौरान प्रतिभागियों से उनके लिंग, खान-पान, दूध और डेयरी उत्पादों के सेवन तथा आरओ पानी के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी ली गई। साथ ही उनके विटामिन B12 स्तर की भी जांच की गई।

जिन प्रतिभागियों में पहले से ही विटामिन B12 की कमी के ज्ञात कारण मौजूद थे, उन्हें अध्ययन से बाहर रखा गया था। इसके बावजूद शोधकर्ताओं ने माना कि इस संबंध को बेहतर तरीके से समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है।

बड़े और लंबे अध्ययन की जरूरत

शोध के निष्कर्षों के आधार पर फिलहाल आरओ पानी को विटामिन B12 की कमी का सीधा और निश्चित कारण बताना उचित नहीं होगा। इस संबंध की पुष्टि के लिए ज्यादा लोगों को शामिल करते हुए लंबे समय तक अध्ययन करने की आवश्यकता है।

भविष्य के शोध में लोगों के खान-पान, जीवनशैली, पोषण और पानी के अलग-अलग स्रोतों जैसे कई कारकों को साथ में देखा जाना जरूरी होगा। इसलिए अगर आप नियमित रूप से आरओ पानी पीते हैं तो केवल इस अध्ययन के आधार पर इसे बंद करने का फैसला न लें। शरीर में B12 की कमी को लेकर चिंता हो तो चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच कराना बेहतर विकल्प है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट और शोध निष्कर्षों के आधार पर तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न माना जाए।

(साभार)


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