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भारी वजन उठाने से ही नहीं, इन कारणों से भी हो सकता है हर्निया

Category Archives: जीवन शैली

भारी वजन उठाने से ही नहीं, इन कारणों से भी हो सकता है हर्निया

हर्निया एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें शरीर के अंदरूनी अंग या ऊतक कमजोर मांसपेशी के माध्यम से बाहर निकल आते हैं। यह दर्दनाक हो सकता है और समय पर इलाज न होने पर गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। हर्निया किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन पुरुषों में इसकी संभावना ज्यादा होती है। हालांकि लोग अक्सर सोचते हैं कि यह केवल भारी वजन उठाने से होता है, लेकिन असल में यह कई रोजमर्रा की आदतों और जीवनशैली की गलतियों के कारण भी हो सकता है।

मुख्य कारण और सावधानियां:

गलत तरीके से भारी वजन उठाना:
भारी वस्तुएं उठाते समय सीधे पीठ या पेट की मांसपेशियों पर जोर डालना हर्निया का सबसे बड़ा कारण है। हमेशा घुटनों को मोड़कर और पीठ को सीधा रखते हुए वजन उठाना चाहिए। इससे मांसपेशियों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा और हर्निया का खतरा कम होगा।

मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता:
लंबे समय तक बैठकर काम करना और व्यायाम न करना मोटापे का कारण बनता है, जो पेट की मांसपेशियों पर दबाव डालता है। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार हर्निया के जोखिम को काफी हद तक घटा सकते हैं।

पुरानी खांसी और कब्ज:
लगातार खांसी या कब्ज के कारण पेट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे मांसपेशियां कमजोर होती हैं और हर्निया का खतरा बढ़ता है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

पोषक तत्वों की कमी:
मांसपेशियों की मजबूती के लिए सही पोषण बेहद जरूरी है। प्रोटीन, विटामिन सी और अन्य पोषक तत्वों की कमी से मांसपेशियां कमजोर होती हैं। अपने आहार में प्रोटीन और विटामिन से भरपूर भोजन शामिल करें।

निष्कर्ष:
छोटी-छोटी जीवनशैली की आदतों में बदलाव कर हर्निया के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सही वजन उठाने की तकनीक अपनाएं, नियमित व्यायाम करें, कब्ज और खांसी को अनदेखा न करें और संतुलित आहार लें।

(साभार)


कद्दू के फूल में पाए जाते है कई लाभकारी गुण, जानिए कैसे करे अपनी डाइट में शामिल

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कद्दू को हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सब्ज़ी मानते हैं, असल में वह फल है? जी हाँ! वनस्पति विज्ञान (Botany) के अनुसार कद्दू एक फल है, क्योंकि यह फूल से विकसित होता है और इसके अंदर बीज मौजूद होते हैं। लेकिन हमारी थाली में इसकी जगह हमेशा सब्ज़ी की ही रही है। यही इसकी सबसे दिलचस्प बात है—एक फल जो सब्ज़ियों की तरह पकाया जाता है और मीठे से लेकर नमकीन हर व्यंजन में अपनी खास पहचान रखता है। कद्दू की यही बहुमुखी प्रकृति इसे आम लोगों से लेकर पोषण विशेषज्ञों तक सबका पसंदीदा बनाती है। और यही नहीं, इसके फल और पत्तों के अलावा इसके सुनहरे फूल भी स्वाद और सेहत दोनों के खजाने माने जाते हैं।

कद्दू के फूल (Pumpkin Flower) बेहद पौष्टिक और फायदेमंद होते हैं, पीले और नारंगी रंग के ये फूल न सिर्फ स्वाद में खास होते हैं बल्कि सेहत के लिए भी वरदान माने जाते हैं।

भरपूर मात्र में विटामिन सी

कद्दू के फूलों में विटामिन C, कैल्शियम, आयरन और फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि ये हमारी इम्यूनिटी बढ़ाने में मददगार होते हैं और शरीर को संक्रमण से बचाते हैं। खासकर बारिश के मौसम में जब बैक्टीरिया और फंगल इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा होता है, तब कद्दू के फूल का सेवन बहुत उपयोगी साबित होता है। इसके अलावा, ये कोल्ड और कफ जैसी समस्याओं को भी कम करने में सहायक हैं।

फाइबर से भरपूर है कद्दू के फूल

फाइबर से भरपूर होने के कारण कद्दू के फूल पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। इसका नियमित सेवन करने से अपच, कब्ज और पेट में भारीपन जैसी समस्याएं दूर होती हैं। यही वजह है कि कद्दू के फूलों को भारतीय परंपरागत आहार में प्राचीन काल से ही शामिल किया जाता रहा है।

डाइट में शामिल करना आसान

कद्दू के फूलों को डाइट में शामिल करना भी आसान है। सबसे लोकप्रिय तरीका है कद्दू के फूलों की पकौड़ी, जिसे बेसन के घोल में डुबोकर तला जाता है। दक्षिण भारत में इसे “मथापू थोरन” नामक डिश के रूप में बनाया जाता है जिसमें नारियल और मसालों का खास स्वाद होता है। वहीं, उत्तर भारत में इसका साग भी खूब खाया जाता है। आधुनिक डाइट में इसे स्टफ्ड और बेक्ड डिश के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

कुल मिलाकर, कद्दू के फूल स्वाद और पोषण का बेहतरीन मेल हैं। इन्हें डाइट में शामिल करके आप न सिर्फ अपने खाने को खास बना सकते हैं बल्कि शरीर को भी कई तरह की बीमारियों से बचा सकते हैं। आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स और सलाह केवल सामान्य जानकारी प्रदान करते हैं। इन्हें आजमाने से पहले किसी विशेषज्ञ अथवा चिकित्सक से सलाह जरूर लें।


घर बनाते वक़्त कहीं आप भी ये गलतियाँ तो नहीं कर रहे? जानें कुछ सिंपल टिप्स

हर इंसान के जीवन की सबसे पहली ज़रूरत है – रोटी, कपड़ा और मकान। रोटी का मतलब है पेट भरने के लिए भोजन, कपड़ा का मतलब है तन ढकने के लिए वस्त्र, और मकान का मतलब है सुरक्षित रहने की जगह। जीवन की जरूरतों का आधार हैं रोटी, कपड़ा और मकान। तीनों ही सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जरुरी हैं। आज हम मकान के बारे में बात करेंगे, जीवन में घर एक बार ही बनाया जाता हैं। मकान बनाते वक़्त आप क्या सामान लगा रहे है, किस तरह के लोगों को आपने रखा हुआ हैं, यहाँ जानना बहुत जरुरी हैं। कहीं वो मार्किट में घर को बर्बाद कर पैसे लूटकर चले जाने वालों में से एक तो नहीं. ऐसी कई बाते हैं जिनसे सावधानी बहुत जरूरी हैं।

कौन कौन सी हो सकती हैं गलतियाँ

घर बनाते समय सबसे बड़ी गलती होती है बजट का सही अनुमान न लगाना। अधूरे निर्माण से बचने के लिए विस्तृत बजट और इमरजेंसी फंड ज़रूरी है। इसके अलावा वास्तु शास्त्र की अनदेखी, खराब प्लानिंग और घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग भी भविष्य में समस्याएं खड़ी कर सकता है। घर में जल निकासी, बिजली-पाइपलाइन की सही व्यवस्था और प्राकृतिक रोशनी का ध्यान न रखना आम भूलें हैं। वहीं, अनुभवी ठेकेदार और इंजीनियर का चयन न करना भी निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

प्रॉपर्टी के कागजात की हो सही जांच 

घर खरीदते समय भी सावधानी उतनी ही ज़रूरी है। प्रॉपर्टी के कागजात की सही जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि उस पर किसी बैंक का लोन या कानूनी विवाद न हो। बिल्डर की विश्वसनीयता और पिछला रिकॉर्ड भी परखें। कई लोग केवल कीमत देखकर घर खरीद लेते हैं, लेकिन इसमें स्टांप ड्यूटी, टैक्स और अन्य चार्ज जोड़कर वास्तविक लागत कहीं अधिक हो सकती है। इसलिए बजट का निर्धारण पहले से करना चाहिए।

आस पास का माहोल भी जरुर देखे 

इसके अलावा लोकेशन और सुविधाएं भी महत्वपूर्ण हैं। घर ऐसी जगह होना चाहिए जहां बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल और यातायात की सुविधाएं मौजूद हों। साथ ही इलाके की सुरक्षा और पड़ोसियों की विश्वसनीयता भी परखनी चाहिए। आस पास कही जंगली जानवरों का खतरा तो नहीं, चोरी की घटनाएँ आम बात हो या फिर खुले आम नशीले पदार्थ बिकते हो।

आप पहली बार घर बना रहे है तो आस पास के लोगों से जरुर बात करे कि आपका घर किसने बनाया, कही कोई गड़बड़ी हुई तो वो भी जाने, किसने ज्यादा पैसे लेकर काम ठीक से नहीं किया। नया घर बनाते या खरीदते समय सही योजना, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और कानूनी जांच से ही आप अपने सपनों का घर सुरक्षित बना सकते हैं और धोखाधड़ी से बच सकते हैं।


क्यों होता है ब्लड शुगर लेवल हाई? आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ

आजकल हर उम्र के लोगों में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ने की समस्या आम हो गई है। हाई ब्लड शुगर (डायबिटीज) केवल मीठा खाने की बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर में इंसुलिन हार्मोन की गड़बड़ी से जुड़ी गंभीर स्थिति है। अगर इसे समय पर कंट्रोल न किया जाए, तो यह दिल, किडनी, आंखों और नसों तक को नुकसान पहुंचा सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 30 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों को हर छह महीने में ब्लड शुगर की जांच अवश्य करानी चाहिए। इससे शुरुआती अवस्था में ही डायबिटीज का पता लगाकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में करीब 54 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, वहीं भारत में तेजी से बढ़ते मामलों की वजह से इसे डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड कहा जाने लगा है।

तो सवाल यह है कि आखिर किन वजहों से हमारा ब्लड शुगर लेवल लगातार बढ़ता रहता है?

शुगर लेवल कैसे बढ़ता है?

डॉक्टरों के अनुसार, जब हम भोजन करते हैं तो उसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट ग्लूकोज में बदलकर खून में पहुंचता है। सामान्य स्थिति में इंसुलिन इस ग्लूकोज को कोशिकाओं तक ले जाकर ऊर्जा में बदल देता है। लेकिन जब इंसुलिन की मात्रा कम हो जाती है या शरीर उसे सही तरह से इस्तेमाल नहीं करता, तो शुगर खून में जमा होने लगता है। लगातार 120 mg/dl से ऊपर का लेवल डायबिटीज की ओर इशारा करता है।

एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. वसीम गौहरी के अनुसार, चार मुख्य कारण ब्लड शुगर बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं:

1. नींद की कमी

अगर आप रोज़ाना 7 घंटे से कम सोते हैं तो शुगर लेवल बिगड़ सकता है। नींद की कमी से शरीर का हार्मोनल बैलेंस गड़बड़ा जाता है, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है। इसके अलावा, कम नींद मीठा खाने की लालसा को भी बढ़ा सकती है।

2. ज्यादा फास्टिंग

बिना गाइडेंस के लंबे समय तक फास्टिंग करना भी शुगर लेवल बढ़ा सकता है। रिसर्च में पाया गया है कि इससे स्ट्रेस हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, जिससे डायबिटीज के मरीजों के लिए खतरा बढ़ जाता है। उपवास करने से पहले और बाद में संतुलित आहार लेना जरूरी है।

3. लगातार तनाव

तनाव की स्थिति में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे हार्मोन ज्यादा मात्रा में बनते हैं। इससे शरीर में ग्लूकोज लेवल ऊपर चला जाता है और कोशिकाएं इंसुलिन को सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पातीं। यही वजह है कि क्रॉनिक स्ट्रेस डायबिटीज को और खराब कर सकता है।

4. देर रात भोजन

रात को देर से और भारी खाना खाने से शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी कम हो जाती है। इससे ब्लड शुगर लेवल बढ़ने लगता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रात का भोजन हल्का और समय पर करें, ताकि ग्लूकोज को पचाने में शरीर पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

निष्कर्ष:
ब्लड शुगर कंट्रोल में रखने के लिए समय पर जांच, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, तनाव से बचाव और सही समय पर भोजन करना बेहद जरूरी है। इन छोटी-छोटी आदतों में सुधार करके डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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क्या सुबह उठते ही शरीर में होती है जकड़न? तो इन योगासनों का करें अभ्यास, मिलेगा आराम

सुबह उठते ही अगर शरीर में जकड़न, पैरों में खिंचाव या पीठ में अकड़न महसूस होती है, तो यह केवल नींद की वजह नहीं बल्कि स्वास्थ्य का संकेत भी हो सकता है। अक्सर यह ब्लड सर्कुलेशन की कमी, मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों की समस्या, बढ़ता वजन या उम्र के असर के कारण होता है। अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो भविष्य में आर्थराइटिस, कमर दर्द, सर्वाइकल या घुटनों की समस्या का खतरा बढ़ सकता है।

सही दिनचर्या और सरल व्यायाम से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सुबह उठते ही अचानक बिस्तर से न उठें, बल्कि पहले 2-3 मिनट आराम से बैठें, हल्की स्ट्रेचिंग करें और गहरी सांस लें। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नियमित योगासन से न केवल अकड़न दूर होगी, बल्कि शरीर ऊर्जावान और सक्रिय भी रहेगा।

नीचे कुछ सरल योगासन दिए गए हैं, जो सुबह की अकड़न को कम करने और जोड़ों की लचीलापन बनाए रखने में मदद करते हैं:

ताड़ासन (Mountain Pose)

सीधे खड़े हों और दोनों हाथ ऊपर उठाएं। एड़ियों को ऊपर उठाकर पंजों के बल खड़े रहें। पूरे शरीर को ऊपर की ओर खींचें और गहरी सांस लें। यह आसन पूरे शरीर में स्ट्रेच देकर अकड़न कम करता है और ऊर्जा बढ़ाता है।

पवनमुक्तासन

पीठ के बल लेट जाएं और घुटनों को मोड़कर सीने से लगाएं। दोनों हाथों से घुटनों को पकड़ें और गर्दन को उठाकर ठोड़ी को घुटनों के पास लाएं। 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। यह आसन कमर, पीठ और पैरों की अकड़न को दूर करता है।

भुजंगासन (Cobra Pose)

पेट के बल लेटें और हथेलियों को कंधों के पास रखें। सांस भरते हुए सिर और सीने को ऊपर उठाएं। नाभि तक शरीर उठाकर 15–20 सेकंड रुकें। यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है और पीठ की जकड़न को कम करता है।

वज्रासन

घुटनों को मोड़कर एड़ियों पर बैठें। रीढ़ को सीधा रखें और हथेलियों को जांघों पर रखें। 2-5 मिनट तक इसी स्थिति में बैठें। यह आसन पैरों और घुटनों की नसों को आराम देता है और शरीर को स्थिरता प्रदान करता है।

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दिल को रखें स्वस्थ, अपनाएं ये पौष्टिक शाकाहारी आहार

तेज़ जीवनशैली, बढ़ता तनाव, अनियमित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने हृदय रोगों को आम समस्या बना दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल लाखों लोग हृदय संबंधी बीमारियों से प्रभावित होते हैं और कई असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इसलिए अब जरूरी है कि हम अपने दिल का ख्याल रखें और आहार तथा जीवनशैली में ऐसे बदलाव करें जो दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रखें।

पौष्टिक और संतुलित आहार से दिल की सुरक्षा

अध्ययन बताते हैं कि अधिक तैलीय, जंक फूड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ न केवल मोटापे का कारण बनते हैं, बल्कि ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को भी असंतुलित कर देते हैं। वहीं, संतुलित और पौष्टिक आहार, विशेषकर शाकाहारी विकल्प, दिल की बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद करते हैं।

प्लांट-बेस्ड डाइट के फायदे

हरी सब्जियां, फल, दालें, अनाज और मेवे हृदय के लिए बेहद लाभकारी हैं। इनमें मौजूद फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और मिनरल्स धमनियों को साफ रखते हैं और बैड कोलेस्ट्रॉल कम करते हैं। इसके अलावा, यह ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।

दिल के लिए लाभकारी खाद्य पदार्थ:

नट्स और सीड्स:
बादाम, अखरोट, चिया सीड्स और अलसी के बीज में ओमेगा-3 फैटी एसिड और फाइबर होता है, जो ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखकर हृदय स्वास्थ्य को सुधारते हैं।

ग्रीन-टी:
इसमें मौजूद कैटेचिन्स एंटीऑक्सीडेंट्स हृदय के लिए लाभकारी हैं। रोजाना दो-तीन कप ग्रीन-टी पीने से ब्लड प्रेशर और दिल की अन्य समस्याओं का खतरा कम होता है।

एवोकाडो:
मोनोअनसैचुरेटेड फैट का अच्छा स्रोत, जो बैड कोलेस्ट्रॉल कम और गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है। हफ्ते में दो बार एवोकाडो खाने से कार्डियोवस्कुलर रोगों का जोखिम 21% तक घट सकता है।

फाइबर युक्त सब्जियां और पत्तेदार साग:
पालक, केल, ब्रोकली जैसी सब्जियां फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन-के से भरपूर होती हैं। ये रक्तचाप को नियंत्रित रखने और धमनियों को कठोर होने से बचाने में मदद करती हैं।

निष्कर्ष:
दिल की सेहत बनाए रखने के लिए सिर्फ व्यायाम ही नहीं, बल्कि सही आहार भी उतना ही जरूरी है। पौष्टिक और संतुलित शाकाहारी विकल्प अपनाकर आप अपने दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं।

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खानपान से लेकर नींद तक, ये बदलाव देंगे माइग्रेन से छुटकारा

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जिम्मेदारियों का बोझ हर किसी पर है—कभी ऑफिस का काम, तो कभी परिवार की देखभाल। लेकिन अगर इस बीच माइग्रेन की समस्या भी हो जाए तो दिनचर्या और मुश्किल लगने लगती है। माइग्रेन सिर्फ सिरदर्द नहीं है, बल्कि इसके साथ मतली, थकान, चिड़चिड़ापन और तेज रोशनी या आवाज से परेशानी भी जुड़ी होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि संतुलित दिनचर्या, पौष्टिक आहार और सही जीवनशैली से इस परेशानी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सुबह की सही शुरुआत
दिन की शुरुआत ही आपके पूरे दिन का मूड और ऊर्जा तय करती है। कोशिश करें रोजाना एक ही समय पर उठने की। उठते ही तुरंत फोन या लैपटॉप न देखें, बल्कि कुछ मिनट स्ट्रेचिंग करें और फिर 10–15 मिनट योग या ध्यान में लगाएं। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम तनाव को कम करने और माइग्रेन के अटैक को नियंत्रित करने में बेहद असरदार माने जाते हैं।

नाश्ता कभी न छोड़ें
खाली पेट रहना माइग्रेन का बड़ा ट्रिगर है। इसलिए सुबह का नाश्ता कभी न छोड़ें। ओट्स, दलिया, फल, मूंग दाल चीला या हल्के पौष्टिक विकल्प आपके लिए बेहतर हैं। चाय-कॉफी या एनर्जी ड्रिंक का ज्यादा सेवन न करें, क्योंकि इनमें मौजूद कैफीन सिरदर्द को बढ़ा सकता है।

स्क्रीन से दूरी बनाएं
लंबे समय तक लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना भी माइग्रेन को बढ़ा सकता है। अगर आपका काम कंप्यूटर या मोबाइल से जुड़ा है तो हर 30 मिनट बाद 1-2 मिनट का छोटा ब्रेक लें। बैठते समय पीठ सीधी रखें, स्क्रीन आंखों के लेवल पर हो और पैर जमीन पर टिके हों।

हाइड्रेशन और सुकून
पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन माइग्रेन को और खराब कर सकता है। इसलिए दिनभर पर्याप्त पानी पीएं। तनाव के बीच अगर सिरदर्द बढ़ रहा हो तो गहरी सांस लें, थोड़ा टहलें या अपना पसंदीदा संगीत सुनें। ये छोटे-छोटे ब्रेक आपके मूड को बेहतर बनाते हैं और दर्द को भी कम करते हैं।

अपने ट्रिगर को पहचानें
हर व्यक्ति के माइग्रेन ट्रिगर अलग हो सकते हैं—किसी को तेज आवाज या रोशनी परेशान करती है, किसी को भूख, मौसम में बदलाव या ज्यादा स्क्रीन टाइम। जब भी माइग्रेन हो, उस दिन का खाना, नींद का समय, मौसम और तनाव का स्तर नोट करें। इससे आपको अपने ट्रिगर पहचानने में मदद मिलेगी।

शाम को रिलेक्स करें
पूरे दिन की थकान के बाद खुद को रिलेक्स करना जरूरी है। इसके लिए हल्की वॉक, बागवानी, किताब पढ़ना या पेंटिंग जैसे काम कर सकते हैं। इससे दिमाग को सुकून मिलता है और तनाव कम होता है।

पर्याप्त नींद लें
माइग्रेन के मरीजों के लिए नींद सबसे बड़ी दवा है। रोजाना 7–8 घंटे की नींद लेना बेहद जरूरी है। सोने से पहले स्क्रीन बंद करें, कमरे की रोशनी हल्की करें और आरामदायक माहौल बनाएं।

जीवनशैली पर ध्यान दें
राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. के.एस. आनंद के अनुसार, माइग्रेन से राहत पाने के लिए दवाओं से ज्यादा जरूरी है अनुशासित जीवनशैली। समय पर भोजन, पर्याप्त पानी, स्ट्रेस मैनेजमेंट और मेडिटेशन से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। वे मानते हैं कि दवाइयां सिर्फ अस्थायी राहत देती हैं, लेकिन सही दिनचर्या ही माइग्रेन से लंबे समय तक सुरक्षा देती है।

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मच्छरों के काटने से हो सकती है ये गंभीर बीमारी, जानें इसके लक्षण और बचाव के उपाय

बरसात का मौसम आते ही डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। इन्हीं में से एक है फाइलेरिया (हाथीपांव), जो मच्छरों के काटने से फैलने वाली गंभीर बीमारी है। यह रोग धीरे-धीरे शरीर की लसीका नलिकाओं को प्रभावित कर देता है और पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में असामान्य सूजन ला सकता है। अगर समय रहते इलाज न किया जाए तो मरीज के जीवन पर भारी असर पड़ता है।

भारत सरकार ने 2027 तक फाइलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में 10 से 28 अगस्त तक फाइलेरिया उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान लोगों को मुफ्त दवा दी जा रही है, जिसका सेवन करना बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस दवा का सेवन करना ही संक्रमण को फैलने से रोकने का सबसे आसान और कारगर तरीका है।

बीमारी कैसे फैलती है?

संक्रमित मच्छर जब किसी व्यक्ति को काटता है तो उसके शरीर में मौजूद कीड़े (पैरासाइट) खून के जरिए दूसरे इंसान में पहुंच जाते हैं और धीरे-धीरे उसकी लसीका नलिकाओं पर हमला करने लगते हैं। यही कारण है कि यह रोग गंदगी, खुले नाले और पानी के जमाव वाले इलाकों में ज्यादा फैलता है।

लक्षण और दिक्कतें

शुरुआत में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन धीरे-धीरे बुखार, दर्द और सूजन बढ़ने लगती है। पैरों में असामान्य सूजन आ जाती है, जिससे वे हाथी के पैर जैसे दिखने लगते हैं। पुरुषों में हाइड्रोसील (अंडकोश में पानी भरना) की समस्या भी हो सकती है।

बचाव के उपाय

हर साल सरकार की ओर से दी जाने वाली एमडीए दवा (मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) का सेवन जरूर करें।

गर्भवती महिलाओं, एक साल से छोटे बच्चों और गंभीर रोगियों को यह दवा नहीं दी जाती।

मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और रिपेलेंट का इस्तेमाल करें।

विशेषज्ञों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ती है, जिससे फाइलेरिया समेत कई मच्छर जनित रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में सावधानी और समय पर दवा का सेवन ही सबसे बड़ा बचाव है।

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स्लिप डिस्क से हैं परेशान? तो इन योगासनों का करें अभ्यास, मिलेगी राहत

आज की तेज़-तर्रार जिंदगी में घंटों मोबाइल या लैपटॉप पर बैठना और गलत तरीके से उठना-बैठना रीढ़ की हड्डी की समस्या, यानी स्लिप डिस्क, को जन्म दे सकता है। स्लिप डिस्क तब होती है जब रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद डिस्क अपनी जगह से खिसक जाती है। इसका असर कमर में तेज दर्द, पैरों में सुन्नपन और लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने में कठिनाई के रूप में दिखाई देता है। यदि समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह समस्या लंबे समय तक जीवन को प्रभावित कर सकती है।

योग के जरिए राहत
हालांकि, नियमित योगाभ्यास स्लिप डिस्क के दर्द और तकलीफ़ को काफी हद तक कम कर सकता है। सही योगासन रीढ़ की लचीलापन बढ़ाते हैं, मांसपेशियों को मजबूत करते हैं और नसों पर दबाव घटाते हैं।

स्लिप डिस्क के आम लक्षण:

कमर के निचले हिस्से में लगातार दर्द

पैरों में झनझनाहट या कमजोरी

लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने में तकलीफ़

झुकने या वजन उठाने पर दर्द बढ़ना

गर्दन या पीठ में जकड़न

स्लिप डिस्क में लाभदायक योगासन:

भुजंगासन: रीढ़ की हड्डी मजबूत बनाता है और नसों पर दबाव कम करता है।

शलभासन: कमर की मांसपेशियों को मजबूत कर पीठ दर्द से राहत देता है।

मकरासन: कमर को आराम और तनाव मुक्त करता है।

सेतुबंधासन: रीढ़ और कमर को मजबूती देता है, रक्त संचार को बेहतर बनाता है और पोस्चर सुधारता है।

बालासन: रीढ़ की स्ट्रेचिंग करता है, आराम और दर्द से राहत देता है।

सावधानियाँ:

योग विशेषज्ञ की देखरेख में ही शुरुआत करें।

अचानक झटके वाले आसनों से बचें।

शुरुआती दौर में लंबे समय तक योग न करें।

यदि दर्द असहनीय हो, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

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क्या है माइक्रोप्लास्टिक? जानें रोज़ाना ज़िंदगी में क्या पड़ता है इसका दुष्प्रभाव

आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में जाने अनजाने हम कितना कुछ ऐसा करते हैं जिसके बारे में अगर हम कुछ पल बैठकर सोचे, तो हम जान पाए कि इसके क्या दु़ष्प्रभाव हो सकते हैं। हम अपनी दिनचर्या में प्लास्टिक को इतना महत्त्व दें चुके है कि दूध से लेकर फल सब्जी तक बिना प्लास्टिक उपयोग किए हम तक नहीं पहुच रही, पर क्या आप जानते है कि प्लास्टिक में छुपे माइक्रोप्लास्टिक हमारे जीवन को कितना नुकसान पहुंचा रहे है। 

माइक्रोप्लास्टिक क्या है ?

सूक्ष्म कण, जो दिखाई नहीं देते पर उसका असर बहुत गहरा होता हैं। माइक्रोप्लास्टिक एकदम छोटे छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं, जो खाने में जाए तो खाने से आप बीमार हो सकते हैं। पानी में मिल जाए तो पांचन तंत्र पर असर, मस्तिष्क विकास पर और भी कई संभावित खतरे है जो पैदा हो जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है, हमारे शरीर के साथ साथ पर्यावरण को भी इन कणों से बेहद नुकसान पहुचता हैं। हम रोजाना प्लास्टिक के इन सूक्ष्म कणों से टकराते हैं बस वो इतने छोटे होते हैं की हम उन्हें देख नहीं पाते, कभी साँस लेते वक़्त हम उनकन्नो कणों को अपने अन्दर ले लेते हैं । 

मेकअप ब्यूटी प्रोडक्ट्स में पाए जाते है माइक्रोप्लास्टिक

आप सोचते होंगे छोटी सी तो जिंदगी है, उसमें भी एक नई जिम्मेदारी माइक्रोप्लास्टिक को कम करने की। जी हां, जो हमारे हाथ में हैं उसे हम कम कर सकते हैं। चलिए जानते है किस किस में पाए जाते है माइक्रोप्लास्टिक के कण .माइक्रोप्लास्टिक ऐसे बहुत छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते है, जो आकार में 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं। कुछ माइक्रोप्लास्टिक की बात करें तो वो चाय की थैलियों में, बोतलबंद पानी में, मेकअप के समानों में जैसे फेस स्क्रब, फेस वॉश, बॉडी वॉश, सिंथेटिक कपड़े जैसे नायलॉन, पॉलिएस्टर, ऐक्रेलिक जब धुलते हैं तो माइक्रोफाइबर निकलते हैं जो माइक्रोप्लास्टिक बन जाते हैं, समुद्री जीवों के अंदर पाए जाते हैं। आने वाले वक्त में अगर हमने अपनी आदतों को नहीं बदला माइक्रोप्लास्टिक की समस्या माइक्रो से मेक्रो रूप ले लेगी। जिस प्रकृति ने हमे जीवन दिया उसी की क्षति होना, मानव जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य बन जाएगा।

किन आदतों को अपनाकर आप पर्यावरण को बचाने में योगदान दे सकते है

अपनी आदतों में कम से कम कपड़े खरीदना, जरूरत के अनुसार खाना बनाना, प्लास्टिक की थैलियों में कम से कम समान लेना, थैले का उपयोग, बिजली का पर्याप्त मात्रा में इस्तमाल, सूखा गीला कचरा अलग अलग कर डालना, गीले कचरे से खाद्य बनाना, नेचुरल प्रोडक्ट की खरीदारी, पैदल चलना कुछ ऐसी आदतें है जिन्हें हम अपने दैनिक जीवन में शामिल कर सकते हैं। प्रकृति के साथ तालमेल बैठाना, मानव जीवन को जीने योग्य बनाता है, सभी के प्रयास से पृथ्वी में प्लास्टिक के उपयोग को सीमित किया जा सकता हैं।


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