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खानपान से लेकर नींद तक, ये बदलाव देंगे माइग्रेन से छुटकारा

Category Archives: फिटनेस

खानपान से लेकर नींद तक, ये बदलाव देंगे माइग्रेन से छुटकारा

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जिम्मेदारियों का बोझ हर किसी पर है—कभी ऑफिस का काम, तो कभी परिवार की देखभाल। लेकिन अगर इस बीच माइग्रेन की समस्या भी हो जाए तो दिनचर्या और मुश्किल लगने लगती है। माइग्रेन सिर्फ सिरदर्द नहीं है, बल्कि इसके साथ मतली, थकान, चिड़चिड़ापन और तेज रोशनी या आवाज से परेशानी भी जुड़ी होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि संतुलित दिनचर्या, पौष्टिक आहार और सही जीवनशैली से इस परेशानी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सुबह की सही शुरुआत
दिन की शुरुआत ही आपके पूरे दिन का मूड और ऊर्जा तय करती है। कोशिश करें रोजाना एक ही समय पर उठने की। उठते ही तुरंत फोन या लैपटॉप न देखें, बल्कि कुछ मिनट स्ट्रेचिंग करें और फिर 10–15 मिनट योग या ध्यान में लगाएं। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम तनाव को कम करने और माइग्रेन के अटैक को नियंत्रित करने में बेहद असरदार माने जाते हैं।

नाश्ता कभी न छोड़ें
खाली पेट रहना माइग्रेन का बड़ा ट्रिगर है। इसलिए सुबह का नाश्ता कभी न छोड़ें। ओट्स, दलिया, फल, मूंग दाल चीला या हल्के पौष्टिक विकल्प आपके लिए बेहतर हैं। चाय-कॉफी या एनर्जी ड्रिंक का ज्यादा सेवन न करें, क्योंकि इनमें मौजूद कैफीन सिरदर्द को बढ़ा सकता है।

स्क्रीन से दूरी बनाएं
लंबे समय तक लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना भी माइग्रेन को बढ़ा सकता है। अगर आपका काम कंप्यूटर या मोबाइल से जुड़ा है तो हर 30 मिनट बाद 1-2 मिनट का छोटा ब्रेक लें। बैठते समय पीठ सीधी रखें, स्क्रीन आंखों के लेवल पर हो और पैर जमीन पर टिके हों।

हाइड्रेशन और सुकून
पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन माइग्रेन को और खराब कर सकता है। इसलिए दिनभर पर्याप्त पानी पीएं। तनाव के बीच अगर सिरदर्द बढ़ रहा हो तो गहरी सांस लें, थोड़ा टहलें या अपना पसंदीदा संगीत सुनें। ये छोटे-छोटे ब्रेक आपके मूड को बेहतर बनाते हैं और दर्द को भी कम करते हैं।

अपने ट्रिगर को पहचानें
हर व्यक्ति के माइग्रेन ट्रिगर अलग हो सकते हैं—किसी को तेज आवाज या रोशनी परेशान करती है, किसी को भूख, मौसम में बदलाव या ज्यादा स्क्रीन टाइम। जब भी माइग्रेन हो, उस दिन का खाना, नींद का समय, मौसम और तनाव का स्तर नोट करें। इससे आपको अपने ट्रिगर पहचानने में मदद मिलेगी।

शाम को रिलेक्स करें
पूरे दिन की थकान के बाद खुद को रिलेक्स करना जरूरी है। इसके लिए हल्की वॉक, बागवानी, किताब पढ़ना या पेंटिंग जैसे काम कर सकते हैं। इससे दिमाग को सुकून मिलता है और तनाव कम होता है।

पर्याप्त नींद लें
माइग्रेन के मरीजों के लिए नींद सबसे बड़ी दवा है। रोजाना 7–8 घंटे की नींद लेना बेहद जरूरी है। सोने से पहले स्क्रीन बंद करें, कमरे की रोशनी हल्की करें और आरामदायक माहौल बनाएं।

जीवनशैली पर ध्यान दें
राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. के.एस. आनंद के अनुसार, माइग्रेन से राहत पाने के लिए दवाओं से ज्यादा जरूरी है अनुशासित जीवनशैली। समय पर भोजन, पर्याप्त पानी, स्ट्रेस मैनेजमेंट और मेडिटेशन से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। वे मानते हैं कि दवाइयां सिर्फ अस्थायी राहत देती हैं, लेकिन सही दिनचर्या ही माइग्रेन से लंबे समय तक सुरक्षा देती है।

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मच्छरों के काटने से हो सकती है ये गंभीर बीमारी, जानें इसके लक्षण और बचाव के उपाय

बरसात का मौसम आते ही डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। इन्हीं में से एक है फाइलेरिया (हाथीपांव), जो मच्छरों के काटने से फैलने वाली गंभीर बीमारी है। यह रोग धीरे-धीरे शरीर की लसीका नलिकाओं को प्रभावित कर देता है और पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में असामान्य सूजन ला सकता है। अगर समय रहते इलाज न किया जाए तो मरीज के जीवन पर भारी असर पड़ता है।

भारत सरकार ने 2027 तक फाइलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में 10 से 28 अगस्त तक फाइलेरिया उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान लोगों को मुफ्त दवा दी जा रही है, जिसका सेवन करना बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस दवा का सेवन करना ही संक्रमण को फैलने से रोकने का सबसे आसान और कारगर तरीका है।

बीमारी कैसे फैलती है?

संक्रमित मच्छर जब किसी व्यक्ति को काटता है तो उसके शरीर में मौजूद कीड़े (पैरासाइट) खून के जरिए दूसरे इंसान में पहुंच जाते हैं और धीरे-धीरे उसकी लसीका नलिकाओं पर हमला करने लगते हैं। यही कारण है कि यह रोग गंदगी, खुले नाले और पानी के जमाव वाले इलाकों में ज्यादा फैलता है।

लक्षण और दिक्कतें

शुरुआत में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन धीरे-धीरे बुखार, दर्द और सूजन बढ़ने लगती है। पैरों में असामान्य सूजन आ जाती है, जिससे वे हाथी के पैर जैसे दिखने लगते हैं। पुरुषों में हाइड्रोसील (अंडकोश में पानी भरना) की समस्या भी हो सकती है।

बचाव के उपाय

हर साल सरकार की ओर से दी जाने वाली एमडीए दवा (मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) का सेवन जरूर करें।

गर्भवती महिलाओं, एक साल से छोटे बच्चों और गंभीर रोगियों को यह दवा नहीं दी जाती।

मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और रिपेलेंट का इस्तेमाल करें।

विशेषज्ञों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ती है, जिससे फाइलेरिया समेत कई मच्छर जनित रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में सावधानी और समय पर दवा का सेवन ही सबसे बड़ा बचाव है।

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स्लिप डिस्क से हैं परेशान? तो इन योगासनों का करें अभ्यास, मिलेगी राहत

आज की तेज़-तर्रार जिंदगी में घंटों मोबाइल या लैपटॉप पर बैठना और गलत तरीके से उठना-बैठना रीढ़ की हड्डी की समस्या, यानी स्लिप डिस्क, को जन्म दे सकता है। स्लिप डिस्क तब होती है जब रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद डिस्क अपनी जगह से खिसक जाती है। इसका असर कमर में तेज दर्द, पैरों में सुन्नपन और लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने में कठिनाई के रूप में दिखाई देता है। यदि समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह समस्या लंबे समय तक जीवन को प्रभावित कर सकती है।

योग के जरिए राहत
हालांकि, नियमित योगाभ्यास स्लिप डिस्क के दर्द और तकलीफ़ को काफी हद तक कम कर सकता है। सही योगासन रीढ़ की लचीलापन बढ़ाते हैं, मांसपेशियों को मजबूत करते हैं और नसों पर दबाव घटाते हैं।

स्लिप डिस्क के आम लक्षण:

कमर के निचले हिस्से में लगातार दर्द

पैरों में झनझनाहट या कमजोरी

लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने में तकलीफ़

झुकने या वजन उठाने पर दर्द बढ़ना

गर्दन या पीठ में जकड़न

स्लिप डिस्क में लाभदायक योगासन:

भुजंगासन: रीढ़ की हड्डी मजबूत बनाता है और नसों पर दबाव कम करता है।

शलभासन: कमर की मांसपेशियों को मजबूत कर पीठ दर्द से राहत देता है।

मकरासन: कमर को आराम और तनाव मुक्त करता है।

सेतुबंधासन: रीढ़ और कमर को मजबूती देता है, रक्त संचार को बेहतर बनाता है और पोस्चर सुधारता है।

बालासन: रीढ़ की स्ट्रेचिंग करता है, आराम और दर्द से राहत देता है।

सावधानियाँ:

योग विशेषज्ञ की देखरेख में ही शुरुआत करें।

अचानक झटके वाले आसनों से बचें।

शुरुआती दौर में लंबे समय तक योग न करें।

यदि दर्द असहनीय हो, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

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क्या है माइक्रोप्लास्टिक? जानें रोज़ाना ज़िंदगी में क्या पड़ता है इसका दुष्प्रभाव

आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में जाने अनजाने हम कितना कुछ ऐसा करते हैं जिसके बारे में अगर हम कुछ पल बैठकर सोचे, तो हम जान पाए कि इसके क्या दु़ष्प्रभाव हो सकते हैं। हम अपनी दिनचर्या में प्लास्टिक को इतना महत्त्व दें चुके है कि दूध से लेकर फल सब्जी तक बिना प्लास्टिक उपयोग किए हम तक नहीं पहुच रही, पर क्या आप जानते है कि प्लास्टिक में छुपे माइक्रोप्लास्टिक हमारे जीवन को कितना नुकसान पहुंचा रहे है। 

माइक्रोप्लास्टिक क्या है ?

सूक्ष्म कण, जो दिखाई नहीं देते पर उसका असर बहुत गहरा होता हैं। माइक्रोप्लास्टिक एकदम छोटे छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं, जो खाने में जाए तो खाने से आप बीमार हो सकते हैं। पानी में मिल जाए तो पांचन तंत्र पर असर, मस्तिष्क विकास पर और भी कई संभावित खतरे है जो पैदा हो जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है, हमारे शरीर के साथ साथ पर्यावरण को भी इन कणों से बेहद नुकसान पहुचता हैं। हम रोजाना प्लास्टिक के इन सूक्ष्म कणों से टकराते हैं बस वो इतने छोटे होते हैं की हम उन्हें देख नहीं पाते, कभी साँस लेते वक़्त हम उनकन्नो कणों को अपने अन्दर ले लेते हैं । 

मेकअप ब्यूटी प्रोडक्ट्स में पाए जाते है माइक्रोप्लास्टिक

आप सोचते होंगे छोटी सी तो जिंदगी है, उसमें भी एक नई जिम्मेदारी माइक्रोप्लास्टिक को कम करने की। जी हां, जो हमारे हाथ में हैं उसे हम कम कर सकते हैं। चलिए जानते है किस किस में पाए जाते है माइक्रोप्लास्टिक के कण .माइक्रोप्लास्टिक ऐसे बहुत छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते है, जो आकार में 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं। कुछ माइक्रोप्लास्टिक की बात करें तो वो चाय की थैलियों में, बोतलबंद पानी में, मेकअप के समानों में जैसे फेस स्क्रब, फेस वॉश, बॉडी वॉश, सिंथेटिक कपड़े जैसे नायलॉन, पॉलिएस्टर, ऐक्रेलिक जब धुलते हैं तो माइक्रोफाइबर निकलते हैं जो माइक्रोप्लास्टिक बन जाते हैं, समुद्री जीवों के अंदर पाए जाते हैं। आने वाले वक्त में अगर हमने अपनी आदतों को नहीं बदला माइक्रोप्लास्टिक की समस्या माइक्रो से मेक्रो रूप ले लेगी। जिस प्रकृति ने हमे जीवन दिया उसी की क्षति होना, मानव जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य बन जाएगा।

किन आदतों को अपनाकर आप पर्यावरण को बचाने में योगदान दे सकते है

अपनी आदतों में कम से कम कपड़े खरीदना, जरूरत के अनुसार खाना बनाना, प्लास्टिक की थैलियों में कम से कम समान लेना, थैले का उपयोग, बिजली का पर्याप्त मात्रा में इस्तमाल, सूखा गीला कचरा अलग अलग कर डालना, गीले कचरे से खाद्य बनाना, नेचुरल प्रोडक्ट की खरीदारी, पैदल चलना कुछ ऐसी आदतें है जिन्हें हम अपने दैनिक जीवन में शामिल कर सकते हैं। प्रकृति के साथ तालमेल बैठाना, मानव जीवन को जीने योग्य बनाता है, सभी के प्रयास से पृथ्वी में प्लास्टिक के उपयोग को सीमित किया जा सकता हैं।


बदलते मौसम में स्किन पर खुजली और दानों से हैं परेशान, तो इन घरेलू नुस्खों से पाएं राहत

अगस्त का महीना है और मौसम का मिजाज बहुत ही बदलता रहा है। कभी तेज गर्मी, तो कभी अचानक हुई बारिश से वातावरण ठंडा हो जाता है। इस बदलाव का सीधा असर हमारी त्वचा पर पड़ता है। लोग अक्सर घमौरी, खुजली और छोटे-छोटे दानों जैसी समस्याओं से जूझते हैं। यदि सही समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या गंभीर रूप भी ले सकती है और डॉक्टर के पास जाने की जरूरत पड़ सकती है।

हालांकि, कुछ आसान घरेलू नुस्खों को अपनाकर आप इन परेशानियों से राहत पा सकते हैं।

1. चंदन का लेप
चंदन का पेस्ट त्वचा पर आए दानों पर लगाएं। यह खुजली और जलन को कम करता है और त्वचा को ठंडक भी पहुंचाता है। पेस्ट बनाते समय सफाई का ध्यान रखें, ताकि कोई संक्रमण न हो।

2. नीम का पानी
यदि आपके पास नीम का पेड़ है तो इसके पत्तों को धोकर पानी में उबाल लें। ठंडा होने पर इस पानी से स्नान करें या रुई की मदद से प्रभावित हिस्सों पर लगाएं। नीम का पानी फंगल इंफेक्शन से भी राहत देता है।

3. बेसन और दही का पेस्ट
1 चम्मच बेसन और 1 चम्मच दही मिलाकर पेस्ट तैयार करें। इसे 15 मिनट के लिए त्वचा पर लगाएं और फिर साफ पानी से धो लें। बेसन त्वचा को साफ करता है और दही ठंडक पहुंचाता है।

गलतियों से बचें:

त्वचा पर दाने होने पर टाइट कपड़े न पहनें।

ज्यादा पसीना आने पर हल्के कपड़े पहनें और पसीने को साफ करते रहें।

दिन में दो बार ठंडे पानी से स्नान करें।

इन बातों का ध्यान रखें:
दाने पूरी तरह ठीक होने तक हवादार, ढीले कपड़े पहनें। खूब पानी, नारियल पानी और नींबू पानी पीते रहें। यदि दाने बढ़ जाएं, पस निकलने लगे या खुजली बहुत ज्यादा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

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क्या आपको भी आता है बार-बार गुस्सा, तो इन तरीकों से पा सकते हैं गुस्से पर काबू

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में गुस्सा एक आम भावना बन गया है। ट्रैफिक जाम, काम का दबाव, या किसी की छोटी-सी बात भी हमें भड़का देती है। लेकिन अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि गुस्सा सिर्फ़ मन की स्थिति नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर और रिश्तों दोनों को प्रभावित करता है। लगातार गुस्सा आना हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और नींद की दिक़्क़त जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। साथ ही यह हमारे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में दूरी और तनाव भी बढ़ा देता है।

इसीलिए एंगर मैनेजमेंट यानी गुस्से को सही तरीके से संभालना बेहद ज़रूरी है। इसका मतलब गुस्से को दबाना नहीं, बल्कि उसे सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से व्यक्त करना है।

गुस्से को काबू करने के असरदार तरीके

1. अपने ट्रिगर्स को पहचानें

गुस्सा कब और किन परिस्थितियों में आता है, यह जानना पहला कदम है। हो सकता है आपको काम का दबाव चिढ़ाता हो, या किसी खास व्यक्ति का बर्ताव। कभी-कभी ट्रैफिक या भीड़भाड़ भी इसकी वजह बनता है। जब आप अपने ट्रिगर्स पहचान लेते हैं, तो उन्हें बेहतर ढंग से मैनेज करना आसान हो जाता है।

2. गहरी सांस लेना सीखें

गुस्सा आते ही तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, कुछ पल रुकें और गहरी सांस लें। धीरे-धीरे सांस अंदर लेना और बाहर छोड़ना आपके शरीर और दिमाग को शांत करता है। यह तरीका दिल की धड़कन को नियंत्रित करता है और आपको सोचने का समय देता है।

3. थोड़ी दूरी बनाएं

अगर कोई स्थिति बहुत चिढ़ पैदा कर रही है, तो वहां से अस्थायी रूप से हट जाना बेहतर है। शांत होने के बाद उसी मुद्दे पर बातचीत करने से चीज़ें आसानी से सुलझ सकती हैं। दूरी बनाने से आप स्थिति को नए नजरिए से देख पाते हैं।

4. व्यायाम और ध्यान को आदत बनाएं

नियमित रूप से एक्सरसाइज करने से तनाव कम होता है और शरीर में ऐसे हार्मोन रिलीज होते हैं जो गुस्सा घटाते हैं। वहीं, योग और मेडिटेशन मन को स्थिर और शांत रखते हैं, जिससे आप छोटी-छोटी बातों पर भड़कने से बचते हैं।

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क्या आपको भी है फैटी लिवर की समस्या- तो सिर्फ खराब डाइट ही नहीं, ये आदतें भी हो सकती हैं जिम्मेदार

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फैटी लिवर एक आम स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। लोग अक्सर मान लेते हैं कि इसका कारण केवल असंतुलित खानपान है, जबकि हकीकत यह है कि कई अन्य जीवनशैली से जुड़ी आदतें भी इस रोग का खतरा बढ़ाती हैं।

अगर लिवर में वसा की मात्रा 5–10% तक पहुंच जाए, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है। शुरुआती चरण में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन समय रहते ध्यान न देने पर यह गंभीर लिवर रोग में बदल सकता है। इसलिए खानपान के साथ-साथ इन कारणों पर भी नज़र रखना जरूरी है—

1. शारीरिक निष्क्रियता और नींद की कमी
लंबे समय तक बैठे रहना, व्यायाम न करना और खराब नींद की आदतें लिवर में फैट जमा होने का कारण बन सकती हैं। इससे मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है और लिवर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

2. तनाव और दवाओं का अधिक सेवन
लगातार तनाव से शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो लिवर के कार्य को बाधित करता है। वहीं, कुछ दवाओं का लंबे समय तक या अधिक मात्रा में सेवन भी लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है।

3. तेजी से वजन कम करना
कम समय में ज्यादा वजन घटाना भी लिवर के लिए हानिकारक हो सकता है। इस दौरान फैट मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया बिगड़ जाती है और लिवर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

बचाव के उपाय
फैटी लिवर से बचने के लिए नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन बेहद जरूरी है। अगर आपको फैटी लिवर के लक्षण महसूस हों, तो खुद से इलाज करने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें। समय पर उपचार और सही जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी से आसानी से बचा जा सकता है।

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महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा ज्यादा क्यों? जानिए कारण और बचाव

पहले आर्थराइटिस (Arthritis) को केवल उम्र बढ़ने के साथ होने वाली समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह कम उम्र के लोगों में भी तेजी से बढ़ रही है। सुबह उठते ही जोड़ों में जकड़न, सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों में दर्द, या उंगलियों में सूजन—अगर आप इन लक्षणों को नज़रअंदाज कर रहे हैं, तो यह आर्थराइटिस के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। समय रहते ध्यान न देने पर यह गंभीर समस्या का रूप ले सकती है।

शोध बताते हैं कि महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है। यह केवल उम्र या कैल्शियम की कमी का नतीजा नहीं है, बल्कि हार्मोनल बदलाव, इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी और अनहेल्दी लाइफस्टाइल भी इसका बड़ा कारण बन सकते हैं।

महिलाओं में खतरा क्यों ज्यादा?

हार्मोनल बदलाव: अमेरिकन कॉलेज ऑफ रूमेटोलॉजी के अनुसार, एस्ट्रोजन हार्मोन हड्डियों और जोड़ों की सुरक्षा करता है। मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन का स्तर गिरने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, जिससे आर्थराइटिस का खतरा बढ़ जाता है।

ऑटोइम्यून डिजीज का असर: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, रुमेटाइड आर्थराइटिस महिलाओं में पुरुषों से 2-3 गुना ज्यादा पाया जाता है।

गर्भावस्था और वजन: गर्भावस्था के दौरान बढ़ा वजन और पेल्विक हड्डियों पर दबाव आगे चलकर घुटनों और कूल्हों को प्रभावित कर सकता है।

जोखिम क्यों बढ़ रहा है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 40 की उम्र के बाद 60% महिलाओं में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण दिखने लगते हैं। भारत में 70% महिलाएं विटामिन डी की कमी से जूझ रही हैं, जो जोड़ों की सेहत को और बिगाड़ देती है।

किन्हें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए?

मेनोपॉज के बाद की महिलाएं

गर्भवती या हाल ही में मां बनी महिलाएं

जिनके परिवार में आर्थराइटिस का इतिहास है

मोटापा या अधिक वजन वाली महिलाएं

आर्थराइटिस से बचाव के आसान उपाय

पौष्टिक आहार लें: दूध, दही, पनीर, हरी सब्जियां, ओमेगा-3 फैटी एसिड (मछली, अखरोट, अलसी के बीज) और एंटी-इंफ्लेमेटरी फूड्स (हल्दी, अदरक, लहसुन) का सेवन करें।

नियमित व्यायाम करें: योग, वॉकिंग, साइकिलिंग और तैराकी जोड़ों की लचीलापन बनाए रखते हैं।

वजन नियंत्रित रखें: अधिक वजन घुटनों पर दबाव डालता है, इसे कम करना जरूरी है।

हड्डियों की जांच कराएं: मेनोपॉज के बाद नियमित रूप से डॉक्टर से हड्डियों और जोड़ों की सेहत की जांच कराएं।

थोड़ी सी सतर्कता और सही जीवनशैली अपनाकर महिलाएं न केवल आर्थराइटिस के खतरे को कम कर सकती हैं, बल्कि लंबे समय तक जोड़ों को मजबूत और स्वस्थ भी रख सकती हैं।

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हाथ-पैर और आंखों के ये बदलाव बता सकते हैं बढ़ता कोलेस्ट्रॉल

कोलेस्ट्रॉल की समस्या अब सिर्फ उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। ब्लड टेस्ट में बार-बार कोलेस्ट्रॉल लेवल का बढ़ना हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, नियमित जांच और समय रहते सतर्कता ही इस खतरे से बचा सकती है।

गलत खानपान, फास्ट फूड, व्यायाम की कमी, अधिक वजन और तनाव इसके प्रमुख कारण हैं। जिन लोगों के परिवार में पहले से हार्ट की बीमारी रही है या जो लंबे समय तक बैठे-बैठे काम करते हैं, उनमें खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

हाई कोलेस्ट्रॉल के संकेत केवल आंतरिक नहीं होते, बल्कि शरीर के कुछ बाहरी बदलाव भी इसकी ओर इशारा कर सकते हैं। हाथ-पैरों या घुटनों के पास पीले रंग के सख्त उभार (टेंडन जैंथोमाटा) इसका एक मुख्य लक्षण हैं। यह त्वचा के नीचे कोलेस्ट्रॉल का जमाव होता है, जो समय के साथ बड़ा और संवेदनशील हो सकता है। इसी तरह आंखों के आसपास पीले उभार या आइरिस के चारों ओर सफेद-भूरे घेरों (कॉर्नियल आर्कस) पर भी ध्यान देना जरूरी है।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और अन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि 20 साल की उम्र में भी हाई कोलेस्ट्रॉल के लक्षण दिख सकते हैं, हालांकि 40 के बाद खतरा ज्यादा होता है। ऐसे में अपने जोखिम कारकों और पारिवारिक इतिहास को ध्यान में रखते हुए, डॉक्टर की सलाह पर नियमित ब्लड टेस्ट कराना और समय रहते कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।


बिना दवा के कंट्रोल करें थायराइड, बस इन 5 योगासनों का करें अभ्यास, मिलेगा फायदा

थायराइड गर्दन में स्थित एक महत्वपूर्ण ग्रंथि है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म और हार्मोन संतुलन को नियंत्रित करती है। आज के समय में इसकी समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा देखने को मिल रही है। वजन बढ़ना, थकान, गले में सूजन, तनाव और हार्मोनल असंतुलन इसके आम लक्षण हैं।

अच्छी खबर यह है कि कुछ आसान योगासन नियमित रूप से करने से थायराइड को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। योग न केवल इस ग्रंथि को सक्रिय करता है, बल्कि मानसिक तनाव को भी कम कर हार्मोन बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है। यहां पांच ऐसे असरदार योगासन बताए जा रहे हैं, जो थायराइड मरीजों के लिए खासतौर पर फायदेमंद हैं—

1. सर्वांगासन
थायराइड ग्रंथि को सक्रिय कर हार्मोन संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह आसन मेटाबॉलिज्म को सुधारता है। पीठ के बल लेटकर पैरों को ऊपर उठाएं और कमर को हाथों से सपोर्ट दें। पूरा शरीर कंधों पर टिकाएं। हाई ब्लड प्रेशर या गर्दन की समस्या होने पर पहले डॉक्टर से सलाह लें।

2. मत्स्यासन
गले की मांसपेशियों को स्ट्रेच कर थायराइड ग्रंथि को उत्तेजित करता है। पद्मासन में बैठकर पीछे की ओर झुकें, पीठ के बल लेटें और कोहनियों को जमीन पर टिकाएं। सिर को पीछे की ओर उठाकर गहरी सांस लें और छोड़ें।

3. भुजंगासन
गले और छाती को खोलता है तथा ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाता है। पेट के बल लेटें, हथेलियों को कंधों के पास रखें और सांस लेते हुए ऊपरी शरीर को उठाएं। 20–30 सेकंड तक रुकें। यह आसन रीढ़ की हड्डी को सीधा करता है और गर्दन-पीठ का तनाव कम करता है।

4. उष्ट्रासन
गले को पीछे की ओर स्ट्रेच कर थायराइड को सक्रिय करता है। घुटनों के बल बैठकर हाथों को पीछे ले जाकर एड़ियों को पकड़ें, फिर पेट को आगे की ओर निकालें और कुछ देर इस स्थिति में रहें।

5. भ्रामरी प्राणायाम
तनाव को कम करने और हार्मोनल संतुलन सुधारने में मदद करता है। आंखें बंद करें, गहरी सांस लें, दोनों कानों को अंगूठों से बंद करें और मधुमक्खी जैसी ध्वनि निकालें।

(साभार)


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