Drop Us An Email Any Enquiry Drop Us An Emailshailesh.lekhwar2000@gmail.com
Call Us For Consultation Call Us For Consultation +91 9818666272

विटामिन B12 की कमी दूर करने के आसान प्राकृतिक तरीके: शाकाहारी–मांसाहारी सभी के लिए उपयोगी गाइड

Category Archives: फिटनेस

विटामिन B12 की कमी दूर करने के आसान प्राकृतिक तरीके: शाकाहारी–मांसाहारी सभी के लिए उपयोगी गाइड

How to Add Vitamin B12 in Diet: विटामिन B12 शरीर के लिए उन पोषक तत्वों में शामिल है, जिनकी कमी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ बन सकती है। इसे कोबालामिन भी कहा जाता है और यह लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण, नसों की सुरक्षा और डीएनए बनने की प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब शरीर में इसकी मात्रा कम होने लगती है तो हाथ-पैरों में झनझनाहट, लगातार थकान, याददाश्त कमजोर होना और एनीमिया जैसे लक्षण सामने आने लगते हैं।

चूंकि यह विटामिन मुख्य रूप से पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, इसलिए शाकाहारी और वीगन लोगों में इसकी कमी का खतरा ज्यादा रहता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि बी12 की कमी दूर करने के लिए हमेशा महंगे सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे रोजमर्रा के खाने में भी कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जो इस पोषक तत्व की जरूरत को पूरा कर सकते हैं।

दूध और डेयरी उत्पाद शाकाहारियों के लिए बी12 के सर्वोत्तम प्राकृतिक स्रोत हैं। गाय का दूध, दही, पनीर और छाछ न केवल आसानी से उपलब्ध हैं, बल्कि इनमें बी12 की मात्रा भी काफी अच्छी होती है। फुल-फैट या टोन्ड दूध इस विटामिन के अवशोषण के लिए अधिक फायदेमंद माना जाता है।

मांसाहारी लोगों के लिए अंडा विटामिन बी12 का बेहद प्रभावी और किफायती विकल्प है। इसके अलावा मछली—खासकर सैल्मन और टूना—चिकन और रेड मीट भी इस विटामिन की कमी को तेजी से पूरा करने में मदद करते हैं।

वहीं, वीगन और सख्त शाकाहारी लोग फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों की मदद ले सकते हैं। आजकल बाजार में कई उत्पाद ऐसे उपलब्ध हैं, जिनमें बी12 को अतिरिक्त रूप से मिलाया जाता है—जैसे फोर्टिफाइड सोया दूध, बादाम दूध, ओट्स और नाश्ते में खाए जाने वाले कई प्रकार के सीरियल।

इसके अलावा न्यूट्रिशनल यीस्ट भी बी12 का एक लोकप्रिय विकल्प बनकर उभरा है। इसे अक्सर वीगन डाइट में चीज जैसा स्वाद देने और पोषण बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता है।

यदि टेस्ट में कमी गंभीर पाई जाती है, तो डॉक्टर की सलाह से ही सप्लीमेंट (टैबलेट या इंजेक्शन) शुरू करना चाहिए, क्योंकि केवल आहार के जरिए गंभीर कमी को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।


अस्थमा मरीजों के लिए विंटर अलर्ट, विशेषज्ञ बोले—छोटी गलतियां भी बिगाड़ सकती हैं स्थिति

सर्दियों का मौसम अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए हर साल नई चुनौतियां लेकर आता है। तापमान गिरते ही अस्थमा के अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ठंडी और शुष्क हवा सांस की नलियों को संकुचित कर देती है, जिससे उनमें सूजन बढ़ने लगती है। इसके अलावा जीवनशैली से जुड़ी कुछ सामान्य गलतियां भी अस्थमा को गंभीर रूप से ट्रिगर करती हैं।

अस्थमा मरीजों की सांस नलियां पहले से ही अत्यंत संवेदनशील होती हैं, ऐसे में हल्का सा ट्रिगर भी तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि सर्दियों में इन छोटी-छोटी आदतों पर ध्यान न देने से अस्थमा अनियंत्रित हो सकता है, जो लंबे समय में फेफड़ों को स्थायी क्षति पहुंचाने तक का जोखिम पैदा करता है।

प्रदूषण और संक्रमण बन रहे मुख्य कारक

सर्दियों के महीनों में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है, जो अस्थमा के प्रमुख ट्रिगर्स में से एक है। विशेषज्ञों के अनुसार उच्च AQI में बिना मास्क के बाहर निकलना, घर के अंदर धूपबत्ती या मच्छर कॉइल का उपयोग करना फेफड़ों में सीधे सूजन बढ़ाता है। वहीं सर्दी-ज़ुकाम और फ्लू जैसे वायरल संक्रमण भी अस्थमा को गंभीर कर देते हैं।

अचानक तापमान परिवर्तन से बढ़ता जोखिम

ठंड में गर्म कमरे से सीधे बाहर निकलना या बहुत गर्म पानी से नहाकर तुरंत ठंडी हवा में जाना सांस नलियों को झटका देता है, जिससे अटैक का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि बाहर निकलते समय नाक और मुंह को स्कार्फ या मास्क से ढकना जरूरी है।

इन्हेलर और दवाओं में अनियमितता से स्थिति बिगड़ती है

अस्थमा से पीड़ित कई लोग लक्षणों में सुधार महसूस होते ही निवारक इन्हेलर या नियमित दवाओं का उपयोग कम कर देते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ऐसा करने से फेफड़ों की सूजन फिर से बढ़ सकती है और मामूली प्रदूषण या ठंड भी गंभीर अटैक का कारण बन सकती है।

कम पानी पीना और व्यायाम की कमी भी हानिकारक

सर्दियों में पानी का सेवन कम होने से डिहाइड्रेशन होता है, जिससे बलगम गाढ़ा होकर सांस की नलियों में जमने लगता है। घर के अंदर हल्का व्यायाम, योग या वॉक न करने से फेफड़ों की क्षमता भी प्रभावित होती है।

नोट: यह रिपोर्ट मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

(साभार)


टॉयलेट में फोन चलाना बढ़ा रहा 46% तक पाइल्स का खतरा, स्टडी में हुआ खुलासा

आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में स्मार्टफोन लोगों की दिनचर्या का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। यही कारण है कि कई लोग टॉयलेट पर भी फोन लेकर बैठ जाते हैं—जहाँ वे मिनटों का काम घंटों तक खींच देते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक यह seemingly harmless आदत अब स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुकी है। अमेरिका स्थित बेथ इजराइल डिकॉनेस मेडिकल सेंटर द्वारा की गई एक नई स्टडी ने बताया कि टॉयलेट सीट पर बैठकर स्मार्टफोन चलाना पाइल्स (हेमोरॉयड्स) के बढ़ते मामलों का बड़ा कारण बन रहा है।

पाइल्स एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुदा क्षेत्र की नसों में सूजन आ जाती है, जिससे दर्द, खुजली और कभी-कभी रक्तस्राव तक हो सकता है। शोध के अनुसार, अकेले अमेरिका में हर साल करीब 40 लाख लोग इस समस्या के कारण डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। नई स्टडी में पाया गया कि स्मार्टफोन उपयोग की वजह से लोग टॉयलेट में जरूरत से ज्यादा देर बैठे रहते हैं, जिससे गुदा क्षेत्र पर लगातार दबाव पड़ता है और जोखिम बढ़ जाता है—विशेषकर युवा वर्ग में।

स्टडी का निष्कर्ष: स्मार्टफोन यूजर्स में 46% तक बढ़ा खतरा

125 वयस्कों पर किए गए सर्वे में यह सामने आया कि 66% प्रतिभागी टॉयलेट पर फोन इस्तेमाल करते हैं। इन लोगों में पाइल्स का खतरा उन लोगों की तुलना में 46% अधिक पाया गया जो टॉयलेट में फोन नहीं ले जाते। यह विश्लेषण उम्र, फाइबर सेवन और शारीरिक गतिविधि जैसे कारकों को ध्यान में रखकर किया गया।

समस्या फोन नहीं, टॉयलेट पर बढ़ता समय

अध्ययन के अनुसार, असली समस्या है—अनावश्यक रूप से टॉयलेट पर लंबे समय तक बैठना। विशेषज्ञों का कहना है कि फोन स्क्रॉल करते-करते व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह टॉयलेट पर बैठा है। इससे गुदा क्षेत्र के ऊतकों और नसों पर दबाव बढ़ जाता है, जो पाइल्स जैसी समस्या को जन्म देता है।

सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग बनी मुख्य वजह

सर्वे में प्रतिभागियों ने बताया कि टॉयलेट पर किए जाने वाले कामों में सबसे आम हैं:

सोशल मीडिया स्क्रॉल करना

न्यूज़ या आर्टिकल पढ़ना

ये आदतें अनजाने में टॉयलेट टाइम को कई गुना बढ़ा देती हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है। स्टडी के शोधकर्ता बताते हैं कि यह परिणाम भविष्य में चिकित्सकीय सलाह और बचाव उपाय तय करने में मददगार होंगे।

कैसे बचें इस जोखिम से—विशेषज्ञों की सलाह

टॉयलेट पर 5–10 मिनट से ज्यादा न बैठें

फोन को बाथरूम में न ले जाएं

डाइट में फाइबर और पानी की मात्रा बढ़ाएं

नियमित व्यायाम करें

कब्ज से बचने की कोशिश करें

इन उपायों से टॉयलेट पर समय स्वतः कम होगा और पाइल्स का खतरा भी काफी घटेगा।

नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ अध्ययन पर आधारित है।

(साभार)


बार-बार होता है पेट दर्द? तो हल्के में न लें, हो सकता है कई गंभीर बीमारियों का संकेत

पेट दर्द को अक्सर लोग सामान्य गैस, अपच या खानपान की गड़बड़ी का परिणाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हर बार होने वाला पेट दर्द उतना सामान्य नहीं होता। कई बार यह दर्द शरीर के भीतर चल रही गंभीर समस्याओं का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिन पर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो स्थिति खतरनाक भी बन सकती है। पेट वह केंद्र है जहां लिवर, किडनी, पित्ताशय, अग्न्याशय और आंत जैसे कई महत्वपूर्ण अंग मौजूद होते हैं, इसलिए इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी पेट दर्द के रूप में दिखाई दे सकती है। ऐसे में जरूरी है कि व्यक्ति दर्द की प्रकृति को समझे और समय पर चिकित्सकीय सलाह ले।

1. पित्ताशय में पथरी का संकेत

अगर पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में अचानक तेज दर्द उठे, जो तली-भुनी या भारी चीजें खाने के बाद बढ़ जाए और दर्द कंधे या पीठ तक पहुंचने लगे, तो यह पित्ताशय की पथरी की ओर इशारा करता है। पथरी जब पित्त नलिकाओं में फंस जाती है, तो तीव्र दर्द के साथ मतली और उल्टी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में तुरंत चिकित्सा जरूरी है।

2. अपेंडिसाइटिस और आंत्र संबंधी रोग

नाभि के आसपास महसूस होने वाला दर्द यदि धीरे-धीरे दाहिने निचले हिस्से की ओर बढ़कर तेज हो जाए, तो यह अपेंडिसाइटिस हो सकता है—जो एक मेडिकल इमरजेंसी है और त्वरित सर्जरी की मांग करता है।

इसके अलावा, लंबे समय तक लगातार दस्त, कब्ज, या पेट में ऐंठन रहना इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) जैसी गंभीर आंत्र बीमारियों का लक्षण हो सकता है।

3. किडनी स्टोन और पेट के अल्सर का दर्द

तेज, लहरों जैसा और कमर से पेट की ओर फैलने वाला दर्द किडनी स्टोन की ओर संकेत करता है। यह दर्द बेहद तीव्र हो सकता है और कई बार पेशाब में जलन या खून के साथ भी दिखाई देता है।
इसके विपरीत, पेट के ऊपरी हिस्से में खाली पेट बढ़ने वाला जलनयुक्त दर्द अक्सर पेट के अल्सर का लक्षण होता है, जिसे अनदेखा करने पर स्थिति बिगड़ सकती है।

4. कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?

यदि पेट दर्द के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें:

तेज बुखार

उल्टी में खून

मल या पेशाब में खून

लगातार दस्त

अचानक वजन घटना

दर्द का लंबे समय तक बना रहना

सामान्य अपच से होने वाला दर्द जल्द ठीक हो जाता है, लेकिन लगातार या असहनीय दर्द शरीर में किसी गंभीर समस्या की चेतावनी है, जिसे अनदेखा करना खतरनाक साबित हो सकता है।

नोट:

यह लेख चिकित्सकीय रिपोर्टों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है।

(साभार)


सर्दियों में क्यों होती है हाथ-पैर पर सूजन और जलन की समस्या? आइये जानते हैं इसके कारण

सर्दियों में तापमान गिरते ही कई लोगों की उंगलियों में सूजन, लाल धब्बे, जलन और तेज खुजली जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। खासतौर पर ठंड में काम करने वाली महिलाओं में यह दिक्कत अधिक देखी जाती है। मेडिकल साइंस में इस स्थिति को ‘चिलब्लेन्स’ कहा जाता है, जो ठंड और गर्मी के अचानक बदलाव पर शरीर की असामान्य प्रतिक्रिया के कारण पैदा होती है।

सर्द मौसम में जब उंगलियां ठंड के लंबे संपर्क में रहती हैं और फिर अचानक गर्म वातावरण में आती हैं, तो त्वचा के नीचे मौजूद सूक्ष्म रक्त वाहिकाएं तेजी से फैल जाती हैं। वहीं ठंड में ये वाहिकाएं सिकुड़ चुकी होती हैं। यह अचानक फैलाव उन्हें नुकसान पहुंचाता है और तरल पदार्थ बाहर निकलकर आसपास के ऊतकों में जमा हो जाता है। इसी वजह से उंगलियों में जलन, सूजन या लालिमा दिखाई देती है—इसे ही चिलब्लेन्स कहा जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार जिन लोगों में रक्त परिसंचरण पहले से धीमा रहता है, उनमें यह समस्या अधिक पाई जाती है। यह कोई संक्रमण या एलर्जी नहीं, बल्कि तापमान परिवर्तन से होने वाली संवहनी प्रतिक्रिया है।

महिलाओं में क्यों अधिक होती है समस्या?

घर की महिलाओं को ठंड में लगातार पानी के संपर्क में रहना पड़ता है, खासकर बर्तन धोने या घर के कामों के दौरान। नम उंगलियां ठंड को तेजी से पकड़ती हैं, जिससे रक्त वाहिकाएं जल्दी सिकुड़ती हैं और बाद में शिकायत बढ़ जाती है।
सर्दियों में तंग जूते या नम दस्ताने पहनने से भी रक्त प्रवाह रुकता है और चिलब्लेन्स के लक्षण उभर सकते हैं।

चिलब्लेन्स में क्या होता है – सरल समझ

ठंड में रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं

अचानक गर्मी मिलने पर वे तेजी से फैलती हैं

इस तेजी से फैलाव के कारण वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं

तरल पदार्थ आसपास की त्वचा में जमा होकर सूजन और लालिमा पैदा करता है

बचाव का सबसे आसान उपाय

ठंड से आने के बाद हाथ-पैर को अचानक गर्म न करें।
हीटर, गीजर या गर्म पानी की बाल्टी में तुरंत हाथ डालने की गलती न करें।
इसके बजाय:

पहले हाथ-पैर को सूखे कपड़े से हल्के से पोंछें

सरसों के तेल या किसी हल्के तेल से धीमी मालिश करें

शरीर को धीरे-धीरे सामान्य तापमान पर आने दें

जरूरी सावधानियाँ (सर्दियों में बिल्कुल ध्यान रखें)

बाहर जाते समय दस्ताने और गर्म, आरामदायक फुटवियर पहनें

हाथ-पैर को देर तक पानी के संपर्क में न रखें

रोजाना हल्की मालिश कर रक्त संचार बेहतर बनाए रखें

हल्के व्यायाम से भी रक्त प्रवाह मजबूत होता है

नोट:

यह लेख विभिन्न मेडिकल अध्ययन और विशेषज्ञ रिपोर्टों से संकलित जानकारी पर आधारित है।

(साभार)


जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा मोटापे का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी बड़ी चेतावनी

Climate Change Health Warning: दुनियाभर में लगातार बढ़ता मोटापा अब सिर्फ गलत खानपान और भागदौड़ भरी दिनचर्या का नतीजा नहीं रह गया है। नई वैज्ञानिक रिपोर्टें बताती हैं कि बदलती जलवायु भी इंसानी वजन बढ़ने में एक छुपे हुए कारक की तरह काम कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, तापमान में हो रही बढ़ोतरी और वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड हमारे भोजन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित कर रही है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें, जैसे कम शारीरिक गतिविधि, तनाव और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन तो मोटापे को बढ़ाते ही हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण हमारी रोजमर्रा की फसलों में भी पोषक तत्वों की मात्रा कम होने लगी है। परिणामस्वरूप लोग ज्यादा कैलोरी और कम पोषण वाला भोजन खा रहे हैं, जो धीरे-धीरे वजन बढ़ाने की स्थिति बना रहा है।

नीदरलैंड्स के वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया कि हवा में CO2 के बढ़ते स्तर से चावल, गेहूं, जौ और अन्य प्रमुख फसलों में शर्करा और स्टार्च का स्तर बढ़ रहा है, जबकि उनमें मौजूद प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे अहम पोषक तत्व घटते जा रहे हैं। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है क्योंकि ऐसी फसलें अधिक ऊर्जा देने वाली लेकिन कम पोषण मूल्य की बन रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, उच्च CO2 वाले इलाकों में उगाई गई फसलों में पोषक तत्वों की कमी 4% से लेकर 30% से अधिक तक दर्ज की गई। चावल और गेहूं जैसे मुख्य अनाज भी इससे बुरी तरह प्रभावित पाए गए, जबकि चने में मिलने वाले जिंक की मात्रा में तुलनात्मक रूप से सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए पौष्टिक भोजन की उपलब्धता चुनौती बन सकती है। पोषण में कमी न सिर्फ मोटापा बढ़ाएगी, बल्कि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने, क्रॉनिक बीमारियों के उभरने और संपूर्ण स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

विशेषज्ञ इस स्थिति को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहते हैं कि खाद्य सुरक्षा को केवल मात्रा के हिसाब से नहीं, बल्कि गुणवत्ता के आधार पर भी समझने की जरूरत है। अगर तुरंत समाधान नहीं खोजे गए तो बदलता मौसम मानव स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी समस्या बन सकता है।


क्या है पीलिया, और यह कैसे विकसित होता है? आइये जानते हैं इसके लक्षण और कारण

पीलिया को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि त्वचा और आंखों का पीला पड़ना शरीर में किसी गंभीर विकार का शुरुआती संकेत हो सकता है। चिकित्सा भाषा में जॉन्डिस के नाम से पहचानी जाने वाली यह स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब शरीर में बिलीरुबिन नामक पिगमेंट की मात्रा असामान्य रूप से बढ़ जाती है। सामान्य स्थिति में लिवर इस पदार्थ को पित्त के माध्यम से बाहर निकाल देता है, लेकिन लिवर की कार्यप्रणाली प्रभावित होने या पित्त नलिकाओं में रुकावट आने पर यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है।

पीलिया कैसे विकसित होता है?

विशेषज्ञों के अनुसार पीलिया अपने आप में कोई बीमारी नहीं, बल्कि किसी गहरी स्वास्थ्य समस्या का संकेत है। लिवर का कमजोर होना, पित्त नलिकाओं में अवरोध या लाल रक्त कोशिकाओं का तेजी से टूटना—ये सभी स्थितियां रक्त में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ा देती हैं। बढ़ा हुआ बिलीरुबिन त्वचा और आंखों को पीला कर देता है। यह समस्या शिशुओं से लेकर बुजुर्गों तक किसी को भी प्रभावित कर सकती है।

शुरुआती लक्षणों पर रखें ध्यान

पीलिया का प्रमुख लक्षण आंखों का पीला होना है, लेकिन इसके साथ कई अन्य संकेत भी दिखाई देते हैं। त्वचा का पीला या नारंगी दिखने लगना, पेशाब का गहरा रंग और मल का हल्का रंग होना इसके आम संकेत माने जाते हैं। कई मरीजों को तेज खुजली, थकान, हल्का बुखार और पेट दर्द जैसी समस्याएं भी महसूस होती हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

लिवर पर असर और पाचन समस्याएं

लिवर पर भार बढ़ने के कारण मरीजों को पाचन संबंधी परेशानियां होने लगती हैं। लगातार मतली, उल्टी, भूख में भारी कमी और पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में दर्द इसके सामान्य लक्षण हैं। यदि पीलिया पित्त नलिकाओं में रुकावट की वजह से है, तो दर्द और ज्यादा तीव्र हो सकता है, जिसके लिए तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है।

विटामिन B12 की कमी भी बन सकती है कारण

विशेषज्ञों का कहना है कि विटामिन B12 की भारी कमी से उत्पन्न पर्निशियस एनीमिया भी पीलिया की वजह बन सकता है। इस स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं असामान्य रूप से बड़ी और कमजोर बन जाती हैं, जो जल्दी टूटती हैं और बिलीरुबिन का स्तर बढ़ा देती हैं। हालांकि, एक बार पीलिया हो जाने के बाद केवल B12 सप्लीमेंट लेने से समस्या ठीक नहीं होती—उपचार उसके मूल कारण पर आधारित होना जरूरी है।

कब लें डॉक्टर की मदद?

यदि आंखों या त्वचा में पीलापन दिखाई दे, पेशाब का रंग असामान्य रूप से गहरा हो या बिना वजह तेज खुजली हो रही हो, तो विशेषज्ञ डॉक्टर से तत्काल जांच कराने की सलाह देते हैं। लिवर फंक्शन टेस्ट और संबंधित ब्लड टेस्ट के जरिए पीलिया के पीछे छिपे कारणों का शीघ्र पता लगाया जा सकता है। समय पर की गई जांच से हेपेटाइटिस, लिवर सिरोसिस या पित्त नलिकाओं की रुकावट जैसी गंभीर स्थितियों को नियंत्रित करना संभव होता है।

(साभार)


क्या आप भी करते हैं मखाने का अत्यधिक सेवन? अगर हां, तो जान लीजिये इसके नुकसान

मखाना एक बेहद फायदेमंद ड्राई फ्रुट है। इसका सेवन करने के कई स्वास्थ्य लाभ हैं। मखाना अपनी उच्च पोषण क्षमता के कारण आजकल स्वास्थ्य प्रेमियों की पहली पसंद बन चुका है। प्रोटीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर होने के कारण इसे सुपरफूड की श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन किसी भी चीज़ की तरह, इसका अत्यधिक सेवन या बिना समझे इसका उपयोग कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि इसके लाभों के साथ-साथ इसके संभावित नुकसान भी समझे जाएं। इस लेख में हम जानेंगे कि मखाना किन परिस्थितियों में आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है और इसे कितना खाया जाना सुरक्षित है।

1. पाचन संबंधी परेशानी और कब्ज का खतरा

मखाने में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो सामान्य मात्रा में शरीर के लिए लाभकारी है। लेकिन इसकी अधिक मात्रा का सेवन और पानी कम पीना पाचन तंत्र को धीमा कर देता है। ज्यादा मखाना खाने पर यह पेट में सूखकर सख्त रूप ले सकता है, जिससे गैस, पेट फूलना और कब्ज जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसे खाने के बाद पर्याप्त पानी पीना जरूरी है।

2. शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन)

फाइबर युक्त भोजन को पचाने में शरीर को अतिरिक्त पानी की जरूरत होती है। अगर आप एक बार में अधिक मखाना खा लेते हैं लेकिन पानी का सेवन नहीं बढ़ाते, तो डिहाइड्रेशन की स्थिति बन सकती है। इससे न सिर्फ पाचन तंत्र प्रभावित होता है, बल्कि शरीर सुस्त महसूस करने लगता है।

3. किडनी स्टोन का बढ़ा जोखिम (ऑक्सालेट मौजूद)

कुछ शोध बताते हैं कि मखाने में ऑक्सालेट पाया जाता है। वही तत्व जो किडनी स्टोन बनने में योगदान देता है। जिन लोगों को पहले से पथरी, गाउट या किडनी से जुड़ी समस्या है, उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के मखाने का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्टोन बनने के खतरे को बढ़ा सकता है।

4. एक दिन में कितने मखाने सुरक्षित हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन लगभग 30 ग्राम (एक मुट्ठी) मखाना पर्याप्त है। यह मात्रा शरीर को जरूरी पोषक तत्व देती है और किसी प्रकार की पाचन समस्या भी नहीं पैदा करती।

कुछ लोग अपनी शारीरिक गतिविधि के आधार पर 30 से 50 ग्राम तक का सेवन भी कर सकते हैं, लेकिन इससे अधिक मात्रा में मखाना खाने पर कब्ज, गैस और डिहाइड्रेशन की समस्या होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए मात्रा तय करते समय अपने पानी के सेवन और जीवनशैली को भी ध्यान में रखें।

(साभार)


सर्दियों में जुकाम से तुरंत राहत: तुलसी-अजवाइन की भाप है सबसे असरदार उपाय

Remedy For Instant Cold Relief: सर्दियों में ठंडी हवाओं के साथ गले में खिंचाव, नाक बहना और जुकाम जैसी परेशानियाँ अक्सर बढ़ जाती हैं। ऐसे समय में दवाइयों पर निर्भर होने के बजाय प्राकृतिक उपचार ज्यादा सुरक्षित और असरदार माने जाते हैं। इन्हीं में से एक है—तुलसी और अजवाइन के मिश्रित पानी की भाप, जो आयुर्वेद में लंबे समय से श्वसन संबंधी समस्याओं के लिए उपयोग की जाती रही है। इनके औषधीय गुण भाप के साथ शरीर में पहुंचकर जल्दी राहत दिलाते हैं और प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत बनाते हैं।

सर्दी-जुकाम में तुरंत आराम देने वाला घरेलू उपाय

तुलसी में मौजूद एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व जहां संक्रमण को कम करने में मदद करते हैं, वहीं अजवाइन में पाया जाने वाला थाइमोल एक नैचुरल एंटीसेप्टिक की तरह काम करता है। जब इन दोनों को पानी में उबालकर भाप ली जाती है, तो इनके गुण वाष्प के रूप में सीधे नाक, गले और फेफड़ों तक पहुँचते हैं। यह प्रक्रिया श्वसन मार्ग की सूजन कम करने और जमे हुए बलगम को ढीला करने में बेहद प्रभावी मानी जाती है।

बंद नाक खोलने में कारगर

ठंडी हवा के कारण नाक बंद होना आम समस्या है, खासकर रात के समय। तुलसी-अजवाइन की गर्म भाप सांस की नलियों को तुरंत खोलती है। अजवाइन के तेज़ सुगंधित तेल नाक के मार्ग में जमी रुकावटों को ढीला करते हैं, जिससे साँस लेना आसान हो जाता है।

संक्रमण से बचाव में मददगार

तुलसी के पत्ते स्वाभाविक रूप से संक्रमण पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया से लड़ने की क्षमता रखते हैं। जब इसकी भाप ली जाती है, तो ये औषधीय गुण सीधे श्वसन तंत्र में पहुंचते हैं और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं से मुकाबला करते हैं।

साइनस और सिरदर्द में राहत

साइनस ब्लॉकेज या लगातार जुकाम की वजह से होने वाला सिरदर्द काफी परेशान करता है। तुलसी और अजवाइन के संयुक्त वाष्प साइनस कैविटी को आराम देते हैं और सिर में रक्त प्रवाह को बेहतर करते हैं। इस वजह से दर्द में तेज़ और प्रभावी राहत मिलती है।

भाप लेने का सही तरीका

एक गहरे बर्तन में पानी अच्छी तरह उबालें।

इसमें 8–10 तुलसी की पत्तियाँ और 1 चम्मच अजवाइन डालें।

अपने सिर को तौलिये से ढककर भाप को गहराई से अंदर लें।

यह प्रक्रिया 5–10 मिनट तक करें।

दिन में 2–3 बार दोहराने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।

ध्यान रखें—बहुत ज़्यादा देर तक भाप न लें, इससे त्वचा या नाक को जलन हो सकती है।

(साभार)


पित्ताशय में पथरी क्यों बनती है? जानें वे आदतें जो खतरा बढ़ा देती हैं

Reason Behind Stone in Gallbladder: लिवर के नीचे मौजूद छोटा अंग पित्ताशय (Gallbladder) शरीर में वसा को पचाने के लिए आवश्यक पित्त को सुरक्षित रखता है। लेकिन जब पित्त में मौजूद तत्व—जैसे कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन—अपने सामान्य अनुपात से बिगड़ जाते हैं, तो ये जमकर छोटे–बड़े कठोर कणों में बदल जाते हैं, जिन्हें गॉलस्टोन कहा जाता है। यह समस्या कई बार बिना किसी लक्षण के बनी रहती है और तभी सामने आती है जब पथरी नलिकाओं में फंसकर तेज दर्द उत्पन्न करती है।

आधुनिक जीवनशैली और गलत खान–पान इस समस्या को तेजी से बढ़ा रहे हैं। समय रहते इन कारणों को समझना जरूरी है ताकि आगे चलकर सर्जरी जैसे बड़े उपचार की जरूरत न पड़े।

कौन-सी गलत आदतें बढ़ाती हैं पित्ताशय की पथरी का खतरा?

1. अत्यधिक फैट वाला भोजन

अगर भोजन में वसा की मात्रा अधिक और फाइबर कम है, तो पित्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है। यही अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे पथरी बनाने लगता है।

2. तेजी से वजन कम करना

बहुत सख्त डाइट, लंबा उपवास या अचानक वजन कम करना पित्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा देता है और पित्ताशय सही ढंग से खाली नहीं होता। इससे गॉलस्टोन बनने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

3. हार्मोन से जुड़ी दवाएं

एस्ट्रोजन वाली दवाएं—जैसे कुछ गर्भनिरोधक गोलियां या हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी—पित्त में कोलेस्ट्रॉल स्तर बढ़ा देती हैं। गर्भावस्था के दौरान भी हार्मोनल बदलाव यह जोखिम बढ़ा सकते हैं।

4. शारीरिक गतिविधि की कमी

लंबे समय तक बैठे रहना या व्यायाम न करना पित्ताशय को पूरी तरह खाली नहीं होने देता। इससे पित्त गाढ़ा हो जाता है और पथरी बनने की स्थिति पैदा होती है।

5. मोटापा

अधिक वजन होने से शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है, जो सीधे-सीधे गॉलस्टोन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

कैसे बचा जा सकता है इस समस्या से?

संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, नियंत्रित वजन और विशेषज्ञ की सलाह से दवाओं का सेवन पित्ताशय की पथरी के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। जीवनशैली में छोटे-मोटे सुधार इस दर्दनाक बीमारी से बचाव में बड़ी भूमिका निभाते हैं।


Latest News in hindi

Call Us On  Whatsapp