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हिंसा पर अहिंसा की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व एक ही दिन

Category Archives: फीचर

हिंसा पर अहिंसा की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व एक ही दिन

Two Festival in One Day: महात्मा गाँधी का जन्मदिवस हर वर्ष 2 अक्टूबर को गाँधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। गाँधी, जिन्हें भारतवासी ‘बापू’ कहकर पुकारते हैं, भारत को ब्रिटिश राज से आज़ाद करवाने में उनकी भूमिका अहम रही है। इस वर्ष 2 अक्टूबर को भारत दो महान पर्वों का एक साथ साक्षी बनने जा रहा है, महात्मा गांधी की जयंती और विजयदशमी। यह केवल तिथि का संयोग नहीं, बल्कि दो महान विचारों, सत्य और अहिंसा तथा अधर्म पर धर्म की विजय का संगम है। एक ओर हम महात्मा गांधी के जीवन और विचारों को याद करते हैं, वहीं दूसरी ओर भगवान राम की रावण पर विजय की कथा को नमन करते हैं।

सत्य, अहिंसा और आत्म संयम — जीवन के मूल्य

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके जीवन के मूल्य सत्य, अहिंसा, आत्म-संयम और सेवा, उन्होंने अपनी मां पुतलीबाई से सीखे। इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में पढ़ाई और संघर्ष के दौरान उन्होंने कई बार अपमान सहा, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं हुए। 1948 में जब उनकी हत्या हुई, उनके अंतिम शब्द थे – “हे राम” – जो आज भी एक शांतिपूर्ण आत्मा की पहचान हैं।

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व — दशहरा

दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का पर्व है। यह दिन दर्शाता है कि चाहे बुराई कितनी भी ताक़तवर क्यों न हो, सत्य और धर्म की जीत निश्चित है। रावण के दस सिर केवल एक राक्षस के प्रतीक नहीं थे, बल्कि क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह, ईर्ष्या जैसे मानव दोषों के प्रतीक माने जाते हैं। उत्तर भारत में दशहरा पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है। जगह-जगह रामलीलाओं का मंचन होता है, जिसमें भगवान राम के आदर्श चरित्र को प्रस्तुत किया जाता है।

एक दिन में दो पर्वों का अद्भुत संगम

एक दिन, दो प्रेरणाएँ गांधी और श्री राम। गांधी ने राम को जीवन का आदर्श माना। उनका जीवन रामराज्य की कल्पना पर आधारित था, एक ऐसा समाज जहाँ न्याय, समानता और करुणा हो। दशहरे पर जब रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं गांधी जयंती पर अहिंसा और आत्मनिरीक्षण का दीप जलाया जाता है। इस साल का 2 अक्टूबर हमें यह सोचने पर मजबूर करता है, क्या हमने अपने भीतर के रावण को जला दिया, क्या हम गांधी की तरह सत्य और नैतिकता के रास्ते पर चल रहे हैं?

2 अक्टूबर 2025 केवल एक तारीख नहीं है, यह भारतीय चेतना का पर्व है, जहां एक ओर हम राष्ट्रपिता को याद करते हैं जिन्होंने हमें आज़ादी दिलाई, वहीं दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को प्रणाम करते हैं, जिनकी विजय ने धर्म की स्थापना की।


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